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Monday, March 27, 2017

तुम बड़े वो हो

तुम ऐसे ही हो या फिर बनने का नाटक करते हो
कभी कभी संदेह होता है कि तुम पहले वाले हो या  फिर दूसरे
या फिर कोई भी नहीं
विश्वास किस पर हो
दुनिया में सबसे अधिक तुम्हें माना
पर तुमने  अनसुना किया
विश्वास रिश्तों को जोड़ता है, सही है
विश्वास रिश्तों को तोड़ता भी है
जुड़ने से प्रेम दिखता है
टूटने की वजह भी तो प्रेम है

Thursday, March 16, 2017

पतझड़ (कविता)

कुछ पेड़ों में  पतझड़ आ गया था
कुछ अभी भी हरे-भरे थे
समय  की पतवार में सभी बह रहे
धूप की कोहराई सफेदी में
दिन धुधलाने लगा
मन स्थिर साधक सा खोने लगा
संगीत के सुरों में बेवफाई वफा करती लगी
संवेदना की गर्मी से कुछ लोग हाथ सेंक रहे थे
डिजीटल भारत  की करवट में   सिकुड़े  लोग
गीत, संगीत को खुलकर गाना छोड़ने लगे
लंगड़ा कर चल रही बूढ़ी औरतें
हरी कुर्सियों  पर बैठी धूप सेक रही थीं
घर टूट रहे थे
न जाने क्यों सड़कों से आती  बसों की आवाजें
संस्कृति की धूल उड़ती लग रही थीं
बाउल और इकतारा रूपये के मोहताज बन रहे थे
मधुरता पर बनावटीपन का मुलम्मा चढ़ा लगा
पेड़ों  जमी धूल ने नीम की पत्तियों का आकार ही बदल दिया
काली बनी उसकी पत्तियाँ किसी और देश की लगीं
कुछ कौवे, चिड़िया पक्षियों का कलरव प्रकृति का अहसास लगा
एक बात बताऊँ
मुझे सूखी पत्तियों का हवा में लहराते हुए गिरना जीवंतता लगी
दुरूहता, कठोरता  में पेड़ की डालों को छोड़
चमकते सितारे सा गिरना भी अच्छा लगा
कोई गिला नहीं, शिकवा नहीं
सिर्फ बहना और बहना
अनुकूल और सकारात्मकता की चरम परिणति
 पतझड़ से प्यार होने लगा
फिर जो मिलना था