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Monday, February 21, 2022

प्रेम की खोज - कविता

प्रेम की खोज मैं भटका पलायन करने लगा घर छोड़ हवा में उडा़ एक और घर बनाया घर टँगा रहा समाज देखता रहा क्रिया प्रतिक्रिया चलती रही मेरे अंश घर में रह गए प्रेम खो गया, मैं खो गया लटके घर में प्रेम की परिभाषा बदल गई सिर्फ कंधे तक रह गया मैं प्रेम बँट गया कई रूपों में जीवन से गया भटक कर्तव्य बोध से रहा अनजान कोशिशें खत्म होने लगीं मैं निहारने लगा मुझको उम्र के इस पड़ाव पर ठहर स्थिर हो, देखता रहा पीछे छूटती गलियों, पगडंडियों पर पैरों के निशान देते रहे तुम्हारे होने का प्रमाण कुरेदना, खोदना एक - एक कण को सहेजना कितना कठिन है इस भाषा को पढ़ना तुम भी तब अनजान भटका करते थे अपनी पहचान पाने के लिए आज सिर्फ़ तुम्हारे पैरों के पीछे ही लोगों की जमात भाग रही है

अंशु का प्रथम जन्मदिन 18.02.2022

नन्हें अंशु को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं। नाना और नानी का आशीर्वाद। तुम्हें जीवन की सभी सुख और समृद्धि मिले। घर के सभी लोग माँ पापा आशी दादा दादी तुम पर गर्व करे। प्यार पाते रहो प्यार देते रहो बचपन के इन लम्हों को खुशियों से भरते रहो सब के लाडले घर के चिराग तुमसे ही है उजियारा पहला जन्मदिन मुबारक 🎂💐💕@नानी

लता मंगेशकर - परिचय

लता मंगेशकर विश्व एवं भारत की प्रख्यात पार्श्व गायिका तथा भारत रत्न से सम्मानित हस्ती (1929-2022)लता का जन्म गोमंतक मराठा समाज परिवार में, मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में सबसे बड़ी बेटी के रूप में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता रंगमंच एलजीके कलाकार और गायक थे। इनके परिवार से भाई हृदयनाथ मंगेशकर और बहनों उषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और आशा भोंसले सभी ने संगीत को ही अपनी आजीविका के लिये चुना। हालाँकि लता का जन्म इंदौर में हुआ था लेकिन उनकी परवरिश महाराष्ट्र मे हुई। वह बचपन से ही गायक बनना चाहती थीं। बचपन में कुन्दन लाल सहगल की एक फ़िल्म चंडीदास देखकर उन्होने कहा था कि वो बड़ी होकर सहगल से शादी करेगी। पहली बार लता ने वसंग जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म कीर्ती हसाल के लिये गाया। उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया। लेकिन उसकी प्रतिभा से वसंत जोगलेकर काफी प्रभावित हुये। पिता की मृत्यु के बाद (जब लता सिर्फ़ तेरह साल की थीं), लता को पैसों की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्हें अभिनय बहुत पसंद नहीं था लेकिन पिता की असामयिक मृत्यु की कारण से पैसों के लिये उन्हें कुछ हिन्दी और मराठी फिल्मों में काम करना पड़ा। अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली फिल्म पाहिली मंगलागौर (1942) रही, जिसमें उन्होंने स्नेहप्रभा प्रधान की छोटी बहन की भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें, माझे बाल, चिमुकला संसार (1943), गजभाऊ (1944), बड़ी माँ (1945), जीवन यात्रा (1946), माँद (1948), छत्रपति शिवाजी (1952) शामिल थी। बड़ी माँ, में लता ने नूरजहाँ के साथ अभिनय किया और उसके छोटी बहन की भूमिका निभाई आशा भोंसलेने। उन्होंने खुद की भूमिका के लिये गाने भी गाये और आशा के लिये पार्श्वगायन किया। वर्ष 1942 ई में लताजी के पिताजी का देहांत हो गया इस समय इनकी आयु मात्र तेरह वर्ष थी. भाई बहिनों में बड़ी होने के कारण परिवार की जिम्मेदारी का बोझ भी उनके कंधों पर आ गया था. दूसरी ओर उन्हें अपने करियर की तलाश भी थी. जिस समय लताजी ने (1948) में पार्श्वगायिकी में कदम रखा तब इस क्षेत्र में नूरजहां, अमीरबाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम और राजकुमारी आदि की तूती बोलती थी. ऐसे में उनके लिए अपनी पहचान बनाना इतना आसान नही था. लता का पहला गाना एक मराठी फिल्म कीति हसाल के लिए था, मगर वो रिलीज नहीं हो पाया. 1945 में उस्ताद ग़ुलाम हैदर (जिन्होंने पहले नूरजहाँ की खोज की थी) अपनी आनेवाली फ़िल्म के लिये लता को एक निर्माता के स्टूडियो ले गये जिसमे कामिनी कौशल मुख्य भूमिका निभा रही थी। वे चाहते थे कि लता उस फ़िल्म के लिये पार्श्वगायन करे। लेकिन गुलाम हैदर को निराशा हाथ लगी। 1947 में वसंत जोगलेकर ने अपनी फ़िल्म आपकी सेवा में में लता को गाने का मौका दिया। इस फ़िल्म के गानों से लता की खूब चर्चा हुई। इसके बाद लता ने मज़बूर फ़िल्म के गानों "अंग्रेजी छोरा चला गया" और "दिल मेरा तोड़ा हाय मुझे कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने" जैसे गानों से अपनी स्थिती सुदृढ की। हालाँकि इसके बावज़ूद लता को उस खास हिट की अभी भी तलाश थी। 1949 में लता को ऐसा मौका फ़िल्म "महल" के "आयेगा आनेवाला" गीत से मिला। इस गीत को उस समय की सबसे खूबसूरत और चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माया गया था। यह फ़िल्म अत्यंत सफल रही थी और लता तथा मधुबाला दोनों के लिये बहुत शुभ साबित हुई। इसके बाद लता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। विविध पिता दिनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायक थे। उन्होने अपना पहला गाना मराठी फिल्म 'किती हसाल' (कितना हसोगे?) (1942) में गाया था। लता मंगेशकर को सबसे बड़ा ब्रेक फिल्म महल से मिला। उनका गाया "आयेगा आने वाला" सुपर डुपर हिट था। लता मंगेशकर अब तक 20 से अधिक भाषाओं में 30000 से अधिक गाने गा चुकी हैं। लता मंगेशकर ने 1980 के बाद से फ़िल्मो में गाना कम कर दिया और स्टेज शो पर अधिक ध्यान देने लगी। लता ही एकमात्र ऐसी जीवित व्यक्ति हैं जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। लता मंगेशकर ने आनंद घन बैनर तले फ़िल्मो का निर्माण भी किया है और संगीत भी दिया है। वे हमेशा नंगे पाँव गाना गाती हैं।

ठंडी रातों में - कविता

ठंडी रातों में -- शाम गहराती रही अंधेरा बढ़ता रहा रात की कालिमा मन में उतरने लगी न तन का ख्याल न मन का। रात खेल के मैदान- सी काले रंग की रेखाओं में उतरने लगीं कई आकृतियाँ डराती - सी साँप सीढ़ी पर चढ़ती - उतराती। काले रंग में वह गोरी - सी लड़की ठिठुरन से सिकुड़ी दिवारों पर चलती संभल- संभल गिरती - पड़ती चेहरे पर मुस्कान झलक जाती ओ मेरी प्यारी सखी! नव शरद सी मन की बगिया में खिलती कलियाँ आँखें चुलबुली कमर कली- सी आकाशगंगा में झिलमिलाती बिल्कुल मेरी परछाई लगी रिसते ठंडे झरनों - सी सिहरन पा दुबक गई शिव की बाँहों में महक उठी क्यारी - क्यारी गुलाब की पंखुड़ियों- सी होठों पर स्मित मुस्कान लिए जा पहुँची हृदय पटल पर सर्द ठंडी रातों में हिमालय की चादर में उन बोझिल पलकों में खामोशी के उन लम्हों में एक - दूसरे में खो जाने की दिल से एक हो जाने की ललक जगाती आँखें। उभरी टेढ़ी - मेढ़ी रेखाएंँ एक चेहरे पर चेहरा तब बर्फ से भरे हाथों को अंजुरी में भर लेता भाले तीर चलाता - सा फिसल फिसल दम भरता। ओ मेरी गोरी सखी! कालेपन में श्वेत लकीरों- सी पवित्र, सत्य और शिव की प्यारी त्रिशूल धारिणी नवल धवल शिखरों से गिरती निश्छल गंगा- सी अर्द्ध नारीश्वर से लिपट लिपट जाती सिर से पैर पैर से सिर तक गहरे भावों में उतराती आओ एकमेक हो फिर से सृष्टि का निर्माण करें। इन काली ठंडी रातों में सूरज की उष्णता का संचार करें मौन अंधेरे को चीर एक नया अध्याय जोड़ गीत सुनहरे गाएँ ओ काम ताप हरने वाली! नए स्वर नए ताल छंदों में प्रेम स्नेह की गंगा बहाएँ। @वसुंधरा मिश्र, 29.12.2021

हर पल नई सुबह - कविता

हर पल नई सुबह हर क्षण है परिवर्तित हर पल बीत रहा है जीवन तो चलने का नाम नेक रास्ते देते पहचान सब कुछ नया नया है हर दिन नया नया है सोच नई हो जाए तो फूलों की बगिया खिल जाए नदियों की धाराएँ बिछ जाएँ चारों ओर हरित हो जाए खेतों में अनाज लहलहा जाए बच्चों में खुशियॉं छा जाए स्त्री पुरुषों के मन निर्मल हो जाएँ जीवन की लंबी पगडंडियों में खुशियों की क्यारी लगाएँ राग द्वेष लोभ मोह के कीड़ों को मन से दूर भगाएँ हर पल नयी सुबह को आओ गले लगाएँ। @डॉ वसुंधरा मिश्र, 1.1.22

दिन में भी ख्वाब - कविता

दिन में भी ख्वाब जब भी बंद करती हूँ आँखों को ख्वाब चोरी हो जाते हैं खुली आँखें सपने देख नहीं पातीं मस्तिष्क मन पर हावी रहता है चाँद सितारों सी इस झिलमिलाती दुनिया में मैं भी भावों की नाव पर सवार ख्वाबों के विशाल कैनवास पर बड़े-बड़े लक्ष्यों को भेदती रही कुछ अंधेरे में चल गए कुछ तो पहुंँचे ही नहीं ठंडे बस्ते में पड़े रहे सब कहते हैं आदमी का काम है ख्वाब देखना पूरा करना भगवान का बैठे - बैठे ख्वाबों का पहाड़ बनाया पुल भी बनाए कई टूटे, कई पर पानी फिरे सोचा कुछ, होता कुछ कभी शेख चिल्ली की कहानी लगती कुछ करना है तो ख्वाब चुनना वहाँ भी पुलाव पकाते रहे एक ख्वाहिश पे दम टूटा एक पे मन टूटा हौसला मत हार मेरे प्यारे नहीं तो कहर टूट पड़ेगा चुनौतियों का सामना करना है बहुत हाथ पैर मारे कान पकड़ उठक बैठक भी किए एक पैर पर खड़े भी रहे ख्वाब कब कोई और चुरा कर ले गया हम भी अडे़ रहे हमारा ख्वाब हमारा है पूरी लगन से एकचित्त हो लगे रहे कई सालों का अनुभव काम आया मेहनत और अक्ल दोनों पक्षों का हाथ रहा ख्वाब में सबसे जुड़े रहे हम जब सबके साथ मिले सोच के पंखों से उड़ने लगे अब दिन में भी ख्वाबों के ख्याल में रहते हैं @वसुंधरा मिश्र, 7.1.22, समय 11.3रात्रि

भारतीय वेद चिंतक हैं - डॉ वसुंधरा मिश्र - लेख

भारतीय वेद चिंतक हैं - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता मनुष्य के लिए उसका जीवन प्रत्यक्ष ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय है। जीवन क्या है तथा इसे कैसे सफल बनाया जा सकता है, इसे जानने की आवश्यकता है। मनुष्य को सुख संपत्ति वस्तुओं की इच्छा रहती है परंतु उसका यह दृष्टिकोण बहिर्मुखी होता है। इंद्रियों के विषयों में से प्रेरित - प्रचालित होता है वह, अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व के संबंध में सजग हो सकता है तथा इसे सजगता पूर्वक परिस्थितियों में प्रेरित प्रचालित कर सकता है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में 'आत्मानं विद्धि' ज्ञान तथा योग का प्रथम आदर्श रहा है। वेदों में अमर शब्दों द्वारा तथा उपनिषदों में आत्मजिज्ञासा द्वारा जीवन का प्रथम तथा पूर्ण विषय माना है। आत्मा और ब्रह्म विषयक खोज ही इस समय के आचार्यों और शिष्यों का विशेष कार्य था । बाद में, संस्कृत साहित्य तथा मध्यकालीन संतों की वाणी में भी भारतीय संस्कृति की यह प्रेरणा तथा भारतीय स्वभाव की यह प्रवृत्ति बराबर मिलती रही है। प्रकृति सदैव से ही चिंतन का विषय रही है। चाहे वह वैदिक काल हो या वर्तमान, वैज्ञानिक युग या भौतिकवाद। अब ये माना जा रहा है कि विज्ञान अब एक अंध गली में आ गया है जिसका निवर्तन केवल परम सत्ता और परम सत्य की मान्यताओं से ही संभव है। डॉ रघुवीर ने वैदिक मिस्टिसिज्म से संबंधित वेदों की अनेक रहस्यमयी ऋचाओं के उद्धरण दिए हैं। (धर्म, दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद, संपादक कल्याणमल लोढा, वसुंधरा मिश्र, पृष्ठ 1) वेदों के ये चार महावाक्य प्रसिद्ध हैं जो जीवन के रहस्यों को उजागर करते हैं - 'अहं ब्रह्मास्मि' जो यजुर्वेद बृहदारण्यक उपनिषद् से ,'प्रज्ञानं ब्रह्म' जो ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद् से, 'अयमात्मा ब्रह्म' जो अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद् से , 'तत्वमसि' सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद् से। ये उपनिषद् व्यक्ति को क्षुद्रता, तुच्छता व संकीर्णता से मुक्त कर उसे उसके विराट स्वरूप से परिचित होने का संदेश देते हैं। नाद - बिंदु के बीच भी रहस्य है और इसी संबंध के कारण ही कला की अभिव्यक्ति है। परम रहस्य को परम प्रेम से कहने वाला मुझे ही प्राप्त होगा। इस गुह्य परमतत्व को मापना उतना ही कठिन है जितना पैर से सिर की छाया को मापना। डॉ राधाकृष्णन इस रहस्य को मानवीय प्रकृति का सतत अभ्यास कहते हैं और उसकी उपलब्धि को आध्यात्मिक तत्व कहते हैं। यह एक जीवन पद्धति है। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद का मानना है कि इंद्रियों से हम परम सत्य का संधान नहीं कर सकते। हमें आंतरिक आस्वादन प्राप्त करने के लिए विषयों का त्याग करना होगा। यह विश्वातीत और विश्वात्मक दोनों का बोध कराता है।( पूर्व और पश्चिम के दर्शन का इतिहास, प्रथम खंड, पृ 20,धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद, पृष्ठ 3-4 )रहस्यवाद, रहस्य संप्रदाय के कई अर्थ हैं, गुह्य ब्रह्म, गुह्य तत्व, गुह्य मार्ग आदि शब्द भी आते हैं। वेद, उपनिषद ऋषि की 'निव्यावचांसी' गुह्य वाणी है।ऋग्वेद में 1.164.39 में कहा गया है 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदुः यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति च इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।' अविनाशी ऋचाएँ व्योम में व्याप्त हैं, उनमें संपूर्ण देव शक्तियों का वास है, जो इस तत्व को नहीं जानता, उसके लिए ऋचाएँ क्या करेंगी, जो जानते हैं वे ही सदुपयोग करते हैं। परा पश्यंती और मध्यमा वाणी को गुह्य बताया है (ऋग्वेद 1.164.45)पुनः ऋग्वेद 1.170.1 में इंद्र कहता है जो आज नहीं वह कल भी नहीं। जो हुआ नहीं, उसे किस प्रकार जानें। चित्त चलायमान है, उसे कौन जानता है, जो सर्वोच्च और अनन्य है। जब विचार से उसके समीप पहुँचा जाता है, तब वह विलुप्त होता है। सृष्टि रहस्य, ईश्वर, ब्रह्म, माया, जीव जगत से संबंधित चिंतन को प्रायः रहस्यवादी विवेचना के भीतर विश्लेषित किया जाता है। यह प्रक्रिया प्रायः एक सौ वर्ष पुरानी है मिस्ट कोहरा या झिलमिलाते अंधकार या प्रकाश से भारतीय ज्ञान काण्ड का क्या संबंध है? इस पर भी सोचना बंद है। रहस्यवाद शब्द को अभिधान या संज्ञा या नाम की प्रतीकात्मक रूढ़ि में व्यक्त करते हैं फिर भी एक सौ वर्ष पुराने इस कोहरे की बात पर बातचीत की आवश्यकता है। वास्तव में, अंधेरे का कोहरा या उजाले का कोहरा अर्थात् अमाक्षपा का झिलमिल कुहासा पूर्णिमाक्षपा का झिलमिल कुहासा दोनों समान है। यूरोप जैसे ठंडे देशों में चांँदनी, शुक्ल पक्ष, सुदी का भी कोहरा होता है और कृष्ण पक्ष बदी का भी कोहरा होता है। वहाँ के चिंतन की मुख्य प्रवृत्ति कोहरा हटाने की होती है। यह अदृश्य, मात्रिका - विद्या से संबंधित हो या रूढ़ि प्राप्त प्रतीक बद्ध संख्याओं से संबंधित हो, सारा चिंतन उनके लिए मिस्टिक है। यूरोप के चिंतन में मिस्टिक शब्द का प्रयोग अस्पष्ट, अपरिभाषित और आध्यात्मिक तीनों के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग दर्शन की मीमांसा, साहित्य का विवेचन और प्रकृति, विकृति, संस्कृति तीनों की समीक्षा के लिए भी किया गया है। अंग्रेज सत्ता के भारतवर्ष में स्थापन के आरंभ में बंगाल और महाराष्ट्र में जो शिक्षित ब्राह्मण वर्ग या विद्वत समाज खड़ा हुआ वह विदेशियों की सख्ती से उतना अपवित्र नहीं हुआ, न उनके शोषण से ही विचलित हुआ। यह विद्याव्यसनी - समाज पश्चिमी- विद्या, जीवन - शैली और ज्ञान - मीमांसा से अधिक प्रभावित हुआ। सूरत और कलकत्ता में केवल विदेशी कपड़े और विलास संबंधी सामग्री ही नहीं आती थीं किताबें भी आती थी उनका पहला पाठक महाराष्ट्र और बंगाल का पंडित होता था। बाद में साहित्य में भी रोमांटिक पोयट्री, शेली, कीट्स आदि में कुछ अस्पष्ट अमूर्त सांकेतिक तत्व हैं जिनको रहस्यवाद ही कहा गया। दक्षिण से लेकर उत्तर तक साहित्यिक क्षेत्र में रहस्यवाद शब्द चल पड़ा। कोई आध्यात्मिक आभा थी जो पश्चिमी रहस्यवाद से संवाद करती हुई दिखाई पड़ती थी। इसलिए ऋषियों मुनियों के प्रकाशवाद संतों के ज्योतिवाद और पश्चिमी दार्शनिकों और कवियों के रहस्यवाद में 'जोगजुगति'बैठ गई। इस पर सूक्ष्म मीमांसा होनी चाहिए। वेदों के कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड के साथ ज्ञानकाण्ड का जो विकास हुआ उसी का क्रमशः विकास उपनिषदों वेदांत और अनेक आस्तिक भारतीय दर्शनों में भी हुआ। ब्रह्मविद्या से संबंधित जिज्ञासाओं और जिज्ञासाओं का मण्डन या विवेचन भारतीय दर्शनों में हुआ है। इसकी मूल धारणा अंधकार और प्रकाश, जीवन और मृत्यु, नाम और रूप, जीव और जगत जैसे निर्धारित द्वंद्वों से संबंधित है। इन द्वंद्वों की मीमांसा को तन्त्र योग और अध्यात्म में 'सहज' कहा जाता है। 'स' अर्थात रचना 'ह' अर्थात संहार। रचना और संहार से उत्पन्न विचार, थॉट, धारणा या चिन्तन को सहज कहा जाता है। इस सहज के भीतर ही अस्ति और नास्ति के दो सीमान्त निश्चित है। अंधकार ही तो प्रकाश है, बीच में कोई कोहरा नहीं है, कोई मिस्ट नहीं है, कोई अबूझ नहीं है, गूढ़ अवश्य है। भारतीय चिंतन में गूढ़ से अगूढ़ की ओर यात्रा की जाती है। हमारा ऋषि अंधकार से सीधे प्रकाश की ओर जाने की बात करता है। यह समझने की बात है कि रहस्य के सिद्धांत और प्रकाश के सिद्धांत में अंतर क्या है। रहस्य गोपन गुप्ताचार या छद्म के भीतर होता है। लेकिन प्रकाश, ज्ञान के अभाव और भाव से पूर्ण के बीच की दूरियाँ तय करता है। उपनिषदकार ईश्वर को इस प्रकार परिभाषित करता है - - - ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। जब ईश्वर को पूर्ण और शून्य एकसाथ कहा जाता है तो मात्रिका ओम् को मानते हुए सारे अक्षरों और सारी संख्याओं का उसी एक सत्ता में विलय कर दिया जाता है। वह पूरा है। इसलिए कि उसमें पूरा जोड़ने पर पूरा परिणाम प्राप्त होता है। उस पूरे में से पूरा निकालने पर भी पूरा का पूरा बच जाता है। (धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 83-84 ) पूर्ण सत्ता अर्थात ब्रह्म की अवधारणा, ब्रह्म साथ ब्रह्मांड , ब्रह्मांड के साथ पिण्ड, अणु अक्षर स्वर मात्रा व्यंजन का विचार करते हुए भारतीय दर्शन में ज्ञानज्योति या ज्ञान काण्ड का विलक्षण ढंग से विकास हुआ है। प्रायः सभी उपनिषदों में आत्मा की व्यापकता, अज्ञेयता, ब्रह्म की अनिर्वचनीयता, आत्मज्ञान इत्यादि का वर्णन है। वास्तव में ज्ञानकाण्ड कर्म काण्ड के समानांतर भीतरी संज्ञान से संबंधित विद्या है। केनोपनिषद् के तीसरे खण्ड के सत्रहवें भाग में उमा के प्रादुर्भाव का वर्णन है। जिसमें उमा जैसी आद्याशक्ति की धारणा विद्यमान है। इस रूपवती स्त्री के उद्भव की बात कही गई है जिसका रंग सोने का है और वह सदैव ईश्वर के साथ रहती है। वस्तुत यह विद्या है जो सारी सृष्टि को धारण करती है। ब्रह्मा विष्णु और महेश उसी से है। यही कबीर आदि संतों की उमा की अन्तर्ज्योति कल्पना में सीधा तादात्म्य है। यही ऋषि-मुनियों का ज्ञान संत के अनुभव के रूप में सामने आता है। (रहस्यवाद का रहस्य और ज्योतिवाद - डॉ शुकदेव सिंह, धर्म दर्शन और रहस्यवाद पृष्ठ 85) संतों के यहाँ ब्रह्मांड कल्पना बहुत दूर तक पुराणों, साथ ही सूफियों और ऋगवेदीय धारणाओं का मिलाजुला मौलिक विस्तार है। ये सभी ब्रह्मांड के खण्ड मन बुद्धि और अहंकार से आवृत्त माने जाते हैं।। मन का अहंकार तामस, बुद्धि का राजस, और अहंकार के आवरण को सात्विक अहंकार कहा जाता है। (पृष्ठ 87) इस पूरे ब्रह्माण्ड पर एक प्रणव कवच की भी कल्पना जुड़ी हुई है जो माण्डूक्य उपनिषद् के 'ओ$म इति अक्षर इदम्' की धारणा का परवर्ती विकास है। ओम् का कवच ब्रह्मांड का ज्योति कवच है। कुछ संतों के यहाँ ओ$म् के अ को ब्रह्मा उ को विष्णु और म को शिव माना गया है। इस तरह यह ज्योति कवच त्रिदेवता त्रिकाल त्रिलोक अर्थात तीन के जातीय विश्वास से सम्बद्ध हो जाता है। त्रिकोटी त्रिभुवन अर्थात तीन की धारणा ज्योतितत्व से पूर्ण संबद्ध है। संभवतः संत कबीर की रमैनी में इसी अन्तर्ज्योति सबद की बात कही गई है। सबद अर्थात ध्वनि, ध्वनि अर्थात आकाश, इस प्रकार के जगत मंडल इत्यादि की धारणाओं से खेचर साधनाओं, खेचरी मुद्राओं का तंत्र भी दायें बायें जुड़ जाता है। प्रत्येक ब्रह्मांड के साथ एक व्यष्टि ज्योति सम्बद्ध मानी जाती है जिसे नाद या स्वभाव ज्योति कहते हैं - - - अकारश्चाप्युकारश्च मकारो बिन्दुनादकौ । पञ्चाक्षराण्यमून्याहुः प्रणवस्थानि पण्डिताः।। (तंत्रोक्त) ओम् के बिंदु से प्रणव का व्याख्यान होता है यह एक ऐसी ज्योति है जिसे गायत्री भी कहते हैं। गायत्री ज्योति से सम्बद्ध एक मार्ग तत्व भी है जिसके ज्ञान से अंधकार दूर होता है। संतों की और भी अनेक कल्पनाएँ हैं और ब्रह्मांड की विविध रचनाएँ हैं जहाँ अंधेरे से बाहर निकलने की एक प्रक्रिया है। कुहरा - मिस्ट या अर्धप्रकाश, अंधकार की झिलमिलाहट नहीं है। वह सहस्र सूर्यों से भी अधिक आत्मप्रकाश है इसे ही संत ज्योति का ज्योति से मिलना कहते हैं।' जोत में जोत समानी 'यही है, अध्यात्म और प्रकाश से प्रकाश का मिलन है। यही परम अनुभूति प्रज्ञा है। यही ब्रह्मानंद की स्थिति है। योगशास्त्र में चित्त शक्ति को 'स्वबुद्धि संवेदन कहा है। प्रज्ञा को' नव नवोन्मेष शालिनी प्रतिभा मता 'अथवा अभिनव गुप्त के अनुसार प्रतिभा अपूर्व वस्तु निर्माण क्षमता को कहा गया है। इस अवसर पर स्तर पर अचेतन, अवचेतन और शुभकामनाएं सचेतन की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। यही अध्यात्मिक विकास की पूर्णता है। इसे ही परम सत्ता का उद्भावना कह सकते हैं। अरविंद ने इसे ही अतिमानस की संज्ञा दी है। लब्धप्रतिष्ठ वैज्ञानिक पाल डेविस मानते हैं कि रहस्यवादी मार्ग आंतरिक शांति से भी महत है। वह आनंद में स्थैर्य प्राप्त कर उच्चतम भावना प्राप्त करता है।यही वास्तविक पवित्र विजन है। वैज्ञानिक केन विलबर मानते हैं कि रहस्यवादी चेतना सत्य और ऋत का प्रत्यक्ष बोध कराती है। जहांँ अहं और इदं का भेद नहीं रहता। राबर्ट बेरी चेतना को सामान्य और विशवचेतना से जोड़ते हैं। सूफी रहस्यवादी मंसूर ने भी कहा कि मैं ब्रह्म हूँ। श्री अरविंद ने इसे ही आत्मा का संशुद्धिकरण और एक दृष्टि से सांस्कृतिककरण कहा है। छांदोग्य श्रुति (6.15,3.15.1)में कहा गया है कि जिसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज परमदेवता में लीन हो जाती है वह आत्मा 'तत्वमसि' हो जाती है और यही चेतना की उच्चतम स्थिति है। 'मैं ही सब कुछ हूँ' 'अह्मैवेदं सर्वम् ', मैं ही भूमा हूँ। इस चेतना का विकास 'ममैवासो' 'तस्मैवाहम् स एवाहम्' मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो और तुम और हम एक हैं आदि से हैं। (वृहदारण्यक 7.25, छांदोग्य 2.1.1,1.3.14)(देखें - धर्म दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 15)इसी तरह वाक् साधना में बैखरी जो अभिव्यक्ति है और बैखरी से मध्यमा, पश्यंती और परा तक की यात्रा है। बैखरी 'विश्व विग्रहाः' है। इसके अतिक्रमण के पश्चात आंतर शब्द का समाश्रय होता है। बैखरी श्रवण मध्यमा मंत्रभूमि आत्मप्रकाश(हृदयस्थ) है। यही हिरण्यमय शब्द है। इसमें नादमय चिद्ररश्मियाँ हैं और इसे व्यक्ताव्यक्तता कहा जाता है। पश्यंती दिव्य वाक् है, वह स्वप्रकाश रूप है। इच्छा शक्ति पश्यंती, ज्ञान शक्ति मध्यमा और क्रियाशक्ति बैखरी है। पश्यंती अमृत कला है, परा महेशी और छत्तीस तत्वों के विकास की भूमि। यजुः ने इसे 'परास्य शक्ति विवधैव श्रूयते 'कहा है। परम योगी की यह अखण्ड आनन्दानुभूति है। 'स्वरूप ज्योति रेवान्तः पराः वागनपायिनी 'रहस्यानुभूति की चरम अवस्था ही परा होती है। अभिव्यक्ति मध्यमा और बैखरी में होती है। सारी प्रतीकात्मकता का यही क्रम है। वेदों में में ऋत का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अथर्ववेद (12.1.1)में सत्य, ऋत, बृहत ऋत को चित्त कहा गया है 'ऋतस्थ पन्था 'अर्थात परम तत्व की उपलब्धि का मार्ग। कठोपनिषद् के अनुसार ऋत निरपेक्ष और सत्य सापेक्ष है। ऋत परिस्थिति पर आश्रित नहीं रहता।ऋत विबन्तौ सुकृतस्य लोकं गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे (3.1)।तैत्तिरीय में भी ऋत और सत्य को भिन्न माना है। ऋत ही संवित् है, सर्वसाक्षी, परम, निर्विकल्प। जड़ - चेतन सबमें यह नियम परिव्याप्त है।( धर्म ,दर्शन और विज्ञान में रहस्यवाद पृष्ठ 16)यही वह जीवन पद्धति है जिसमें भीतर और बाहर द्वैत वैषम्य विशवचेतना की समरसता में परिणत होता है। रहस्यवादी चेतना का संबंध अन्तः प्रज्ञा से है, पर वह बौद्धिक न होकर असाधारण अनुभूति से अभिव्यक्ति होती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने भी माना है कि स्वसंवेदन ज्ञान ही स्मृति संवेदन है। आधुनिक मनोविज्ञान में भी विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने रहस्यवाद ईश्वर के साथ एकता का स्पष्ट संवेदन है जो ब्रह्म के साथ जीवन का पूर्ण तादात्म्य है। आज मनोविज्ञान एक्स्ट्रा संवेदन की चर्चा करता है जिसमें अतिन्द्रिय दृष्टि का भी विवेचन किया गया है। यही रहस्यवादी संवेदन और प्रातिभ ज्ञान से अपने व्यक्तित्व की रक्षा करते हुए समष्टिबोध की ओर उन्मुख होता है। पश्चिम में इस विषय पर अनुसंधान चल रहे हैं। आज धार्मिक यूटोपिया जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। वैज्ञानिक रहस्यवाद में भी जड़ चेतन की अखंड चेतना, ब्रह्मांड की सतत क्रियान्वित और उसके केंद्र में मानव को माना है। यत् पिण्डे तत् ब्रह्मांडे पिण्ड ब्रह्मांड से एकाकार हो जाता है, व्यष्टि समष्टि से। रहस्यवादी जीवन के प्रत्येक स्पंदन में इस तदाकारता में विराट पुरुष को देखता है एवं परम तत्व का संधान करता है।' इदमहं य एवास्मि सो$स्मि 'अब मैं वही हूँ। यही मानवीय जीवन की उच्चतम स्थिति है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में सार्वभौमिक रूप से सभी संस्कृतियों में परमतत्व और परमसत्य की की अनुभूतियाँ का प्रमाणिक सन्निवेश मिलता है। ऋषि अंगिरास कहते हैं, 'पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः' अर्थात हे मंत्राधिपति आपके पवित्र अंश सर्वत्र विद्यमान हैं। तप से परिपक्व होकर ही साधक उसे प्राप्त कर सकते हैं। वेद के पुरुष, हिरण्यगर्भ और नासदीय सूक्त तात्विक विवेचन में सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का स्वामी हिरण्यगर्भ माना गया है - हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्यजातः पतिरेक आसीत् (ऋग्वेद 10.121.1) ईशावास्य उपनिषद के प्रथम मंत्र 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत' में ही ब्रह्म की व्यापकता से प्रारंभ है। वहीं यजुर्वेद 40.17 में 'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्' आदि कहते हैं। ऋषि इसी को दिव्य दृष्टि से देखकर उस स्वरूप को प्रकट करते हैं। चेतनशील और जड़ सृष्टि सब उसी का रूप है। एक ही सतरूपं परमेश्वर का विद्वज्जन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं।कहा गया है, 'एक सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वान माहुः'। भारतीय मनीषा सब कोषों की मंजूषा हृदय को मानती है जो उस रहस्यमय आनंदस्वरूप को सुरक्षित रखता है। हृदय में स्थित दीपवत की जो अनंत रश्मियांँ हैं उनमें एक सूर्य मण्डल को भेदकर उठती हैं और उसी से ब्रह्मलोक का अतिक्रकर वपरमगति की प्राप्ति होती है (मैत्रायणी उपनिषद 6.30) कहा गया है 'हृदये चित्त संविद'। संविद का अर्थ है आभ्यंतर ज्ञान। हृदय आत्मा और शरीर का संधिस्थल है। हृदय में ही सबकी प्रतिष्ठा है। भारतीय वेदों की चिंतन प्रक्रिया व्यष्टि से समष्टि की ओर जाती है जो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए है। यजुर्वेद में शिक्षा का प्रारंभ ही इन मंत्रों से होता है - - ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु. सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु माँ विद्विषावहै।। ओम् शांतिः ओम् शांतिः ओम् शांतिः

मंगल पांडेय - परिचय

मैं मंगल पांडेय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम क्रांतिकारी सेनानी। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में मैंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब मैं मात्र 22 वर्ष का था मैं ईस्ट इंडिया कंपनी की 34 वीं बंगाल नेटिव इंफैक्टरी के रेजिमेंट का सिपाही बना। अंग्रेजों के खिलाफ़ मेरा नारा था 'मारो फिरंगी को ' जिसने भारतीयों का हौसला बढ़ाया। मेरा जन्म नगवा, बलिया, उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार में 19 जुलाई 1827 में हुआ। मेरे पिता दिवाकर पांडेय मुझ पर गर्व महसूस करते थे। जानते हो---- 1857 की क्रांति वहा क्रांति है जिसने अंग्रेजी साम्राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में नींव हिला दी,विभिन्न जगह पर चल रहे अंग्रेजी साम्राज्य की मनमानी को भारत की आक्रोशित जनता ने नकारा और विरोध किया। 1857 का सिपाही विद्रोह कैसे शुरु हुआ? सिर्फ एक बंदूक की वजह से। उस समय तक सिपाहियों को पुरानी बंदूक 0. 577 कैलीबर दी जाती थी जो ब्राउन बैस के मुकाबले बहुत शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक दी गई लेकिन उसमें गोली दागने का जो प्रिकशन कैप था उसे दाँतों से काटकर ही खोलना पड़ता था और वह चर्बी का बना होता था। बस, सिपाहियों में अफवाह फैल गई कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनी है।फिर क्या विद्रोह की आग भड़क उठी। मैने कारतूस को काटने से इंकार कर दिया। 29 मार्च 1857 में मैंने प्रथम बार एन्फील्ड राइफल का प्रयोग किया था। दो ब्रिटिश अफसरों पर हमला किया जिससे मुझपर मुकदमा चला। अंग्रेजों को मुझसे डर लगने लगा। उन्होंने सोचा कि यदि मंगल पांडेय को फांसी नहीं दी गई तो स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी पूरे भारत में फैल जाएगी। अंग्रेजों ने 18 अप्रैल की जगह 8 अप्रैल 1857 को ही मुझे फांसी दे दी। मैंने अपने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। मेरे मृत्यु दिवस को मेरा भारत 'बलिदान दिवस' के रूप में मनाता है। आजादी की इस लड़ाई में जनता ने मुझे नायक के रूप में सम्मान दिया। 1984 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया। जय हिंद जय भारत।

आग - कविता

आग जलती हुई आग धुएँ से लिपटी न जाने कितने रहस्य दब कर मर जाते हैं जब घर के भीतर ही उगल रहे थीं चिंगारियांँ भीतर से आग उगलती मोटे बरगद की हर डालियाँ ताबड़तोड़ मारपीट से भरे घर में दहशत का धुंध फैल रहा था कितने ही भावों को कुचला गया विचारों को दफनाया गया अस्मिताओं की खिल्ली उड़ाई छोटी- सी आशाओं पर डंडे का प्रहार उम्मीद की परतों की जम कर धुलाई आग की रोशनी में दम तोड़ती श्वासें जीवन किसका और किसी और का अधिकार खोखले होते घर की दीवारों पर काले रंग का प्रहार आग जब जलती है राख हो जाती हैं आशाएंँ, उम्मीद और आकांक्षाएँ वह अभी-अभी चिता से उठ कर आई थी घर की आग ने उसे नहीं छोड़ा विचारों के मतभेद, मन के भेद शरीर के भेद-भाव, समाज

देश की ओर आँखें दिखाने वालों की आँखें निकाल ही लेना - कविता

अमृत महोत्सव पर स्वतंत्रता संग्राम के महानायक सुभाष चंद्र बोस और देश के असंख्य शहीदों को शत शत नमन 💐💐💐 देश की ओर आँखें दिखाने वालों की आँखें निकाल ही लेना ओ मेरे युवा साथी! अपना देश बस अपना ही होता है परायों के गलत इरादों को लहूलुहान कर देना ही अच्छा होता है हर घर बंगाल का करता नमन महानायक वीर सुभाष को कुछ कर गुजरने की इच्छा ही देती जन्म कई सुभाषों को आजादी की लौ जब - जब जलती तन - मन सुलग - सुलग जाता है अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को माथे पर सदा लगाना वीर शहीदों की शहादत पर उनको शीश नवाना अपना देश अपना होता है प्रकृति भी अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ती तो मनुष्य क्यों हुआ प्रकृति से दूर घर की संपत्ति के लिए हम भाई भाई से लड़ते माता-पिता घर परिवार से लड़ जाते सुरक्षा कर हम रक्षक बन घर की सुरक्षा करते रहते कभी कम तो कभी ज्यादा सब कुछ सहते रहते भारत का हर कोना भी अपनी ही संपत्ति का हिस्सा है इसे संभालना और देखना अपने ही कर्तव्यों का विस्तार है बूंद बूंद सागर बन जाता है मिलकर हाथ बढ़ाने से मुट्ठी में भी आसमान भर आता है आओ हम सभी संकल्प लें मिलकर, देश की रंगत को कभी न फीका होने देगें कुछ भी हो जाए तिरंगे की शान को हर पल हर क्षण विकास की ओर ले जाएंगें। @वसुंधरा मिश्र 23.01.2022

हे देवी! वर ऐसा देना - कविता

हे देवी! वर ऐसा देना वीणावादिनी पुस्तकधारिणी वासंती की देवी गीत - संगीत - कला - संस्कार और संस्कृति की धूरी हे देवी! वर देना ऐसा सत्य और ईमान की घुट्टी पिला देना देश की सोंधी मिट्टी से प्यार सिखा देना युवाओं को सुमति - सुधर्म और उन्नति के पथ पर चलने देना हर पल, हर दिन, नये रंगों से प्रतिदिन झोली भर देना नई सोच, नए विचार और व्यवहार दे देना हर बच्चे के अभिभावक को आदर और सम्मान दे देना हे देवी! वर ऐसा देना रिद्धि-सिद्धि और वृद्धि से भर पूर्णता देना हर बालक - बूढ़े को अन्न सदैव ही देना छाया रहे बड़ों की हरदम बरगद के फैले पत्तों को सहलाते रहना चिड़ियों के कलरव में वीणा के गीत सुनाना छल - कपट - अत्याचार - हिंसा को मन से दूर भगाना हे देवी! वर ऐसा देना कण कण में देश प्रीत की गंगा ही बह जाए हर युवा के कण्ठ कण्ठ में सरस्वती बस जाए नव गति नव ताल छंद नव सब कुछ नया नया हो हर भाषा के भावों में भारत उन्नत बन जाए वाक् शक्ति की ही उपासना मानव की ऊर्जा है चारों ओर दिशाओं में फैला है यही उजास फेंक दूर तमस को ज्योति के बंधन में बांँध बस देना हर मानव के मन में नैसर्गिक प्रवृत्ति के बीज बो देना हे देवी! वर ऐसा देना हे देवी! वर ऐसा देना @वसुंधरा मिश्र, 4.2.2022

कुछ बातें ऋतुराज वसंत की

कुछ बातें ऋतुराज वसंत की-- सुभद्राकुमारी चौहान जी ने वसंत आगमन पर जलियांवाला बाग में शहीदों के रक्त से सनी धरती को याद कर वसंत से कहती हैं - - - आना हे ऋतुराज! किंतु तू धीरे से आना यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना। **** वीरों का कैसा हो वसंत भूषण अथवा कवि चंद नहीं बिजली भर दे वह छंद नहीं है कलम बँधी स्वछंद नहीं फिर हमें बतावे कौन हन्त? वीरों का कैसा हो वसंत? सच ही तो है वसंत आता है तो मनुष्य मन में कई प्रश्न उठाता है और कई उत्तर की चाहत जगाता है - - - मेरी रचना 'वसंत' में मैंने वसंत को बड़े लोगों की कृपा माना है - - - नभ से उतरता वसंत इतराता इठलाता भर गया जब सूखी टहनियों पर लहलहा उठा तब वह गरीब वृक्ष पूर्ण आश्वस्त लगा सोचने अभी भी बाकी है इतनी संवेदना जो बाँटती है प्रकृति में रंगीनियाँ मुकतहस्त हो निर्जीव पतझड़ में भरती है प्राणों का संचार सच ही सुना है बड़े लोग ही होते हैं करुणा और शील के मूर्त तभी तो उतर आता है जमीन पर मदमस्त हो वसंत भी। (काव्य संग्रह - हर दिन नया, डॉ वसुंधरा मिश्र, पृष्ठ 27)

टुकड़ा टुकड़ा सच - रमेश बोराणा, जोधपुर

टुकड़ा टुकड़ा सच काव्य संग्रह पढ़ते हुए - - -डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता सत्ता प्राप्ति के खेले हैं नित नए निराले खेले हैं नाच नाच कर करतब अजीब दिखा रहे हैं लगा कर मुखौटे देशभक्ति जता रहे हैं ये पंक्तियाँ जोधपुर राजस्थान के रमेश बोराणा की हैं जो स्वयं राजनीति की बारिकियों से रूबरू हैं। राजस्थान मुख्यमंत्री के संस्कृति सलाहकार, राजस्थान कला साहित्य संस्थान जोधपुर के संस्थापक अध्यक्ष के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिष्ठित हैं। रमेश बोराणा सबसे पहले एक संवेदनशील व्यक्ति हैं जो राजनीति में रहते हुए भी अपने शब्दों को ईमानदारी से कविता में ढालते हैं। कवि नाट्यकला के पारखी हैं। रंगकर्मी होने के साथ बहुप्रतिभा के धनी हैं। गद्य , पद्य, नाटक, निबंध, समसामयिक आलेख, जैन फिल्मों के गीतकार, स्तवन, स्क्रिप्ट आदि विविध विधाओं पर आपकी लेखनी चलती रही। हिंदी और राजस्थानी भाषा पर समान अधिकार रखने वाले कवि ने प्रेम, प्यार, मोहब्बत, जीवन दर्शन आदि पर अपनी लेखनी चलाई है। एक रंगकर्मी का यह काव्य संग्रह निश्चित रूप से विविध अनुभवों का संग्रह साबित होगा। राजस्थान के वरिष्ठ रंग अभिनेता, निर्देशक लेखक रंग तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में राष्ट्रीय पहचान हासिल करने वाले कवि रमेश बोराणा ने सौ से अधिक नाटकों में अभिनय, सत्रह का निर्देशन, नौ नाटकों का लेखन, मंचन, प्रसारण किया है, कई पुरस्कार भी मिले हैं। जीवन अनुभवों का टुकड़ा टुकड़ा सच 74 कविताओं की बगिया है जो अँधेरे से उजाले की ओर जाने की यात्रा करवाती है। पहली कविता 'अंधेरे की ख़ामोशी 'में महाभारत में फैले षडयंत्र के पासों से उपजा यह संसार अंधेरों की ख़ामोशी को उजागर करती हैं। कवि आपसी विश्वास और आशा के दीपक जलाने का संदेश देता है क्योंकि वह उन्हीं सड़कों से होकर गुजरा है। 'अनहद नाद' कबीर दास जी के अनहद नाद की ओर ले जाती है जहाँ कवि' अहं ब्रह्मास्मि ' की गंभीरता को समझाने का प्रयास करता है। वह फटकारता नहीं है बल्कि ज्ञान बघारने वालों पर व्यंग करता है - जीवन ज्ञान बघारने वालों अभी खुद से खुद की पहचान बाक़ी है अभी तो जहांँ सारा बाक़ी है समझने की समझ अभी बाक़ी है कुछ ही समझे हैं बहुत कुछ बाक़ी है (टुकड़ा टुकड़ा सच, पृष्ठ 15) जीवन इतना आसान नहीं है। मनुष्य सोचता है वह सर्वशक्तिमान है, सबकुछ कर लेगा। अपने इस झूठे अहंकार से निकलना होगा। अहंकार को छोड़ना होगा-- सफ़र ज़िन्दगी का पार नहीं होता मंसूबी घोड़ों से ये जहाँ अनंत है जो चलता है अपनी ही फ़ितरत से ऐ मैं सुन चल उठ वक्त को पहचान लेते हैं चल उठ नियति को समझ लेते हैं (पृष्ठ 14) कवि कहता है - - दोस्त दूरियांँ बेशक रखना पर दिल को नजदीक ही रखना (पृष्ठ 15) वर्तमान समय की विभीषिका से कवि चिंतित है-- पहचानो तुम /लौट आओ /पांवों तले की जमीन /धंसने से पहले (पृष्ठ 16) अपने अस्तित्व के प्रति कवि आश्वस्त है क्योंकि उसका अस्तित्व सर्वकालिक है - - जंगल में आदमी है या /आदमी में जंगल और अजगर कौन है? जो सबको अपने - अपने सामने सबके अस्तित्व को नकारता है। कवि बैचेन है वह आदमी को ढूँढता है। उसके अहसास को, उसके चरित्र को, उसके मुखौटों को, उसके दंभीपन को, उसकी निर्दयता को जिसने धर्म - मज़हब को बाज़ारू और मज़ाक बनाकर रख दिया है - - 'दो मुंँहा हो गया है आदमी 'और 'सत्य से भटक गया है' आदमी /अपने ही साये से /डरने लगा है आदमी यह कैसी विडंबना है (पृष्ठ 19-20)।कवि मनुष्य के इस भयावह जंगल में 'भयावह अर्थहीन विदूषक सा लगता है' वह 'अज़ानों' व 'आरतियों' के बेसुरे सुर से दुखी है लेकिन जानना चाहता है कि आस्था के पर्दे में हाथ डाले कौन है?( पृष्ठ 21) समाज के ऐसे लोगों से दुखी है जो इस तरह के भ्रम फैला रहे हैं। अच्छा इंसान कैसे बनाया जाए, इस पर विचार करता है - नियति अटल /नहीं मिलता इक कुँआ दूजे कुएँ से कभी /ज़िन्दा है इंसानियत तो आओ इंसान से मुलाकात को निकलो( पृष्ठ 22) 'कविता क़ागजी पहचान का मोहताज़ है आदमी' कविता में वर्तमान व्यक्ति की पहचान काग़ज़ों तक सिमट कर रह गई है। 'कोरा कागज' में प्रतीकात्मक प्रयोग है जहाँ उस 'मासूम' पवित्र और निश्छल व्यक्ति को बदरंग बना दिया जाता है। 'खंडित अक्षर' में ढाई अक्षर वाले शब्द 'प्यार' को अभिशप्त माना है क्योंकि जिसका 'पहला हर्फ़ ही खंडित है' तो वह क्या देगा। कवि की यह कल्पना उसकी अनूठी सोच है जो पाठकों के साथ एकमतता दर्शाती है। वह युद्ध मिलने - बिछुड़ने का मेला, टूटे ख़वाबों का मंजर, बेसुधी, बेखुदी, अरमानों की अर्थी, बर्बादी, विरह का आर्तनाद, मृगतृष्णा का समंदर, भ्रम आदि से वाकिफ़ है लेकिन 'प्यार' को जिसने समझा है, उसके लिए सबकुछ है (पृष्ठ 25)। 'बूंँदे छोटी-छोटी 'कविता में 'धरा आंँगन को तृप्ति' देने वाली छोटी-छोटी बूंँदों के महत्वपूर्ण योगदान को बताया गया है जो जीवन को रंगों से भर देती हैं। बूँदों से ही सागर भरते हैं। कवि अकेले ही रहना चाहता है क्योंकि उसने दुनिया को अच्छी तरह देख लिया है इसलिए उसे लोगों की संगत से डर लगता है (पृष्ठ 27)' घुटन' कविता में जीवन के सत्य को दर्शाया है जहांँ 'भीतर और बाहर घुटन ही घुटन है' जिसे कवि 'सृष्टि का कालचक्र' मानता है।'चाह की राह' कविता में जागरण गीत गाता कवि 'भरोसे का मंगल गीत' और 'धोरों पर सोनल दांडी 'बनाने का आह्वान करता है।उसकी नज़रों में जननायक वही बन सकता है जो' जन के मन 'में चढ़ जाए। दूसरों का कल्याण करना ही 'सत्य कर्म' का पालन करना है, मानवता की सेवा करने वाले सेनानी ही सच्चे पुजारी हैं। देश की आन- बान - शान और गौरव पर लिखी कविता 'जय जय तिरंगा' में देश के लिए प्राणों तक को न्योछावर करना हर देशवासी का धर्म माना है क्योंकि 'जन - मन की धड़कन है तिरंगा'। कवि विश्व गौरव की कामना करता है।उसका मानना है कि मनुष्य जीवन मिला है तो अवसर भी मिला है। अवसर का लाभ उठाने का संदेश देता और अपने देश के लिए लिए हर देशवासी को अपने-अपने क्षेत्र में कार्यों को करते हुए 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना रखनी चाहिए। छोटे-मोटे संघर्षों से घबड़ाना नहीं चाहिए, कवि ऐसी दृष्टि रखता है। संपूर्ण रूप से कोई भी व्यक्ति सब कुछ न प्राप्त कर सकता है और न ही पूरा कर पाता है। हम जितना ही जीवन और संसार के पास जाते हैं, सोचते हैं, देखते हैं, उससे कहीं और 'अनंत अथाह पहेली है 'यह संसार। (पृष्ठ 39) यह सच है कि हम अलग - अलग धर्म, जन्म - मरण, ईश्वर - अल्लाह, गॉड, धर्म सब अलग - अलग टुकडों में समझते हैं। इंसान के व्यवहार में 'सबका अपना टुकड़ा टुकड़ा सच है 'तो सूरज - चाँद एक ही क्यों है?, मनुष्य का खून और उसकी पीड़ा का अहसास एक क्यों है? कवि निष्ठा - भरोसा और समर्पण को हर मनुष्य की पूंँजी उस सत्य को मानता है जो वह टुकड़े टुकड़े में समझता है। कवि प्रकृति के झरने की बात करता है जो चट्टानों के थपेड़े खाकर भी ऊपर से अविरल गिरता है, अपनी चोटों को सीने में छिपा लेता है। डॉ एस एन सुब्बाराव की राष्ट्र भक्ति का अलख जगाते हैं। कवि का मानना है कि धर्म, मजहब, नैतिक मूल्य, गाँधी का सपना देश धर्म निभाने वाले ही अंँधेरे में उजाले खोज रहे हैं, ऐसे लोग धन्य हैं। तभी भारत स्वराज प्राप्त कर सकता है। (पृष्ठ 40) गाँधी को शुद्ध विचारों में खोजा जा सकता है - - मैं मरा नहीं हूँ न ही कहीं गया हूँ *** *** *** सत्य - अहिंसा में अस्तेय - अपरिग्रह सत्याग्रह - अनशन में शुद्ध विचारों में गाँधी हर एक व्यक्ति के हृदय में शुद्ध विचारों के रूप में विराजित हैं। झरना, तितली, मोह लिप्सा, धूप, नारीत्व, नियति, परछाइयाँ, पानी, पसीना, समंदर, बेटी की अभिलाषा, माँ, रंग, रिश्ते, घुंँघरू, मुझमें, होली, धूल, हिम्मत आदि कई कविताएँ कवि की विभिन्न संवेदनाओं को नए रंग प्रदान करती हैं जिनमें वह बच्चा बन जाता है। निश्छल और सत्य का संधान करता है। 'षड्यंत्र हो गया हो जैसे' , 'महाभारत', 'वक्त का कमाल' , 'बाजार' , 'यह बहुरूपियों के टोले हैं' , 'सुन सके तो सुन वक्त'आदि कविताएँ कवि के विविध तेवर की कविताएँ हैं। वर्तमान राजनीति की बखिया उधेड़ते दिखाई पड़ता है कवि - - वाचालता से जन - मन को बहला लेते हैं कुर्सी भी धड़ल्ले से हथिया लेते हैं (पृष्ठ 78) वर्तमान परिस्थितियों से कवि दुखी है,' ख़ुद को इंसान कहते हुए भी शर्म आती है 'और व़क्त के चेहरे को काग़ज़ पर उतार कर उसे कोसता है (पृष्ठ 86)। ख़ामोशी भी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है - - चुप्पी से शब्द को औक़ात बता देती हैं अल्फाज़ कंगूरों की मानिंद जता देते हैं ख़ामोशियाँ नींव भाँति भार छुपा लेती हैं।( पृष्ठ 90)इस संघर्षों से भरे संसार में वह पीछे नहीं हटता, सभी को प्रोत्साहित करता है। कवि आशावादी है और वह हौसला देता है - - यह सारा फ़लक तेरा है हर सफलता तेरे कदमों में है (पृष्ठ 91) समाज में स्त्री के अस्तित्व को सही स्थान न मिलने पर दुखी और पीड़ा से भरा हुआ है और उसको इस सृष्टि की संवाहिका मानता है। 'माँ' कविता में स्त्री कहती है, 'स्नेह, प्यार और वात्सल्य से पगी /एक स्त्री होती हुई भी /आखिर/जननी ही तो हूँ तुम्हारी' (पृष्ठ 65)। माँ से होती हुई एक स्त्री की जीवन यात्रा के सभी रूपों पर चार भागों में लिखी लंबी कविताएँ उसका प्रमाण है। 'अपेक्षा' और 'उपेक्षा' इन अचूक मंत्रों से कवि मनुष्य मात्र को आश्वासन देता है कि जीवन को सुखद बनाने के ही ये दो मंत्र काफ़ी है। अंधेरों से उजाले की ओर कवि की रचनात्मक यात्रा है 'टुकड़ा टुकड़ा सच ' मन का उजास की सकारात्मक सोच लिए समाप्त होती है जहाँ वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि - - 'गर ढूंँढना ही है /किसी को तो /अपने भीतर ढूंँढ वह तो वहीं बैठा है /तेरे इंतजार में /उसके लिए चिराग़ नहीं /मन का उजास चाहिए (पृष्ठ 96) कवि रमेश बोराणा ने उर्दू और हिंदी के शब्दों का प्रयोग किया है जो बोलचाल में रचे बसे हुए हैं। शिल्प विधान की दृष्टि से कहीं - कहीं शिथिलता दिखाई पड़ती है। कवि ने भारतीय संस्कृति और संस्कार के भावों को प्रमुखता से लिखा है जो रचनाकार की प्रमुख विशेषता है कवि का प्रथम संस्करण 2021 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'टुकड़ा टुकड़ा सच' का आवरण पद्मश्री शाकिर अली, जयपुर द्वारा रेखाओं का उत्कृष्ट रेखांकन है।मात्र 150 रूपये की यह पुस्तक राजस्थानी ग्रंथागार, प्रथम मंजिल , गणेश मंदिर के सामने, सोजती गेट, जोधपुर - 342001 से प्रकाशित हुई है। कला और संस्कृति के संरक्षण और विकास के लिए प्रतिबद्ध रंगकर्मी रमेश बोराणा के मित्र उपन्यासकार और शायर ने 'दो शब्द'में सही लिखा है, 'सादगी में सौन्दर्य इनकी कविताओं का गुण है जिसे इन्होंने राजनीति में रहते हुए भी बरकरार रखा। - - - किताब के बगैर बात नहीं बनती'।