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Tuesday, June 28, 2016

जीवन के रंग

पत्तों के जंगलों में
घरोंदा बनाया
न आंखों से, न कानों से
न हाथों से कोई टोह पा सका
वह और उसके बच्चे
पहरे में रहे, पल रहे
पेड़ की जड़ों पर नजरें गड़ी थींं
दरिंदे इंसान की
खच्च की आवाज ने
बिखेर दिए तिनके तिनके
उजाड़ दिया सुखद संसार को
सुरक्षा बेनक़ाब हुई
परदे न रहे
खुली धरती और खुला आसमान
हंसने लगा
हाहाकार सुनाई पड़ने लगा
कोमलता कुचली गई
मानव दानव में बदला लगा
पत्तों में लिपटे मासूमों ने मूंद ली आंखें
वे बच्चे मां के थे
मां ने अंतिम श्वास
अपने बच्चों पर अपने पूरे पंखों को
फैलाते हुए ली।







सच में तुम मेरे हो

तुमने तो कहा था तुम आओगे एक दिन
सच को फिर से लोगों के सामने रखने
तुम सच में सच बोलते हो
तभी तो हर रोज दिल की धड़कन तुमसे ही धड़कती है
बस मिलना ही नहीं होता
वैसे तो तुम मेरे आसपास नहीं
दिल में जो छिपे हो
बाहर नहीं हो, अंदर से ही आवाज लगाते रहते हो
बाहर मेरे हावभाव, मेरी बातचीत, मेरे शरीर के सभी अंगों में समाये रहते हो
तुम मेरी वाणी के मालिक हो
झूठ, फरेब, धोखा, विश्वासघात और कई अनचाहे कार्य भी करवाते हो
मन नहीं होता फिर भी करवा लेते हो
किस कोने में बैठे रहते हो
सच में उस समय मैं कितना कोसती हूँ तुम्हें और तुम्हारे सच को
आंख मिचौली के खेल में माहिर तुम
मुझे हैरान करने में लगे रहते
पर फिर तुम सही राह दिखाते
और ऐसी राह जो सही को साबित करती
सच में तुम सच हो
मेरे हो,मुझमें हो,मेरे हो
मैं ही गलती कर जाती
तुम्हें पहचान कर भी न पहचानने का ढोंग करती
मैं तुम्हारी हूँ सिर्फ तुम्हारी
सच में तुम सच में मेरे हो
तुम तो आए हुए ही हो।