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Tuesday, October 25, 2022

साहित्यिकी संस्था में दीपावली संगोष्ठी संपन्न रिपोर्ट

साहित्यिकी संस्था की दीपावली संगोष्ठी संपन्न - - कविता,गीत ,व्यंग्य, संस्मरण,आलेख,गीत, गज़ल के साथ साहित्यिकी संस्था की सदस्याओं ने आलोक पर्व दीपावली सम्मेलन मनाया । इस अवसर पर सभी सदस्याओं ने दीपावली पर अपने अपने भावों की एक से बढ़कर एक रचनाओं की प्रस्तुति दी जिसने सभी को बांधा रखा। कार्यक्रम के आरंभ में वरिष्ठ लेखिका डॉ आशा जायसवाल ने दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं देते अपने वक्तव्य में कहा कि प्रकाश ज्ञान का आलोक है, राम की रावण जैसी आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करना और फिर दीप उत्सव मनाना मंगल का ही प्रतीक है, वस्तुतः यह त्योहार आसुरी शक्तियों का ही नाश है। संस्था की सचिव डॉ मंजू रानी गुप्ता ने स्वागत भाषण देते हुए सभी सदस्याओं को शुभकामनाएँ दी ।दीपावली के रंगारंग कार्यक्रम में भागीदारी के लिए जिन सदस्याओं ने भाग लिया उनमें कुसुम जैन (कविता), विद्या भंडारी (गीत), सुधा भार्गव (संस्मरण), डॉ मंजुरानी गुप्ता(स्वरचित रचना), डॉ सुषमा हंस (कविता), दुर्गा व्यास (कविता), डॉ गीता दूबे(कविता), नुपुर अशोक (व्यंग्य), डॉ वसुंधरा मिश्र (कविता), मंजु गुटगुटिया (गीत), उषा श्राॅफ(कविता), संजना तिवारी (वक्तव्य), मीना चतुर्वेदी (कविता), संगीता चौधरी (छंदबद्ध रचना), सरिता बैंगानी(गज़ल), बबिता माँधना(कविता), वाणी मुरारका (आलेख), नीता उपाध्याय (कविता), रंजना पाठक (भजन), उर्मिला प्रसाद (गीत), सविता पोद्दार (कविता), चंदा सिंह (कविता), रेणु गौरिसरिया (संस्मरण), रंजना शर्मा (पंडावनी) प्रमुख रहीं। वर्चुअल कार्यक्रम का लाभ यह रहा कि कैलिफोर्निया से वरिष्ठ बाल कथाकार सुधा भार्गव, रांची से व्यंगकार नूपुर अशोक और मीना चतुर्वेदी दिल्ली से जुड़ीं और दीपोत्सव की इस दीपमाला में अपनी महत्वपूर्ण रचनाओं की प्रस्तुति दी। इस कार्यक्रम में साहित्यिकी संस्था की निर्देशक कुसुम जैन ने धन्यवाद ज्ञापन किया। रेवा जाजोदिया की गौरवपूर्ण उपस्थिति रही। वाणीश्री बाजोरिया ने भी अपनी स्वरचित कविता सुनाते हुए इस कार्यक्रम का संयोजन और संचालन किया।

कहीं मानवता शर्मसार तो नहीं? लेख

कहीं मानवता शर्मसार तो नहीं? - डॉ वसुंधरा मिश्र कोरोना वायरस की गति को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे हैं जो पूरे विश्व को आतंकित कर रहे हैं। कुछ देश तो तृतीय स्तर में संक्रमित हो रहे हैं और प्रति दिन के हिसाब से वहां मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है। इटली, स्पेन और अब अमरीका में आंकड़े बढ़ रहे हैं। भारत अभी तो नियंत्रण में है, कहीं उस ओर चला गया तो इस महामारी से होने वाली तबाही को रोकना बेकाबू हो जाएगा। आज हम कोरोना वायरस के पंजों की गिरफ़्त में हैं जो अदृश्य रूप से मानवता को कुचलने में लगने लगी है। बड़े बड़े देशों में कोरोना वायरस ने खलबली मचा दी है। क्या यह एकछत्र सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी का खतरनाक खेल तो नहीं? इस वायरस को कहीं से भेजा तो नहीं गया है? और यदि ऐसा नहीं है तो पूरे विश्व में इस वायरस का प्रकोप कहीं अधिक और कहीं कम क्यों है ? साइबेरिया के पक्षियों की तरह क्या इस वायरस को स्थान विशेष के मार्ग का ज्ञान है? आधुनिक काल ने मनुष्य की अस्मिता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी। व्यक्ति महत्वकांक्षी और मैं यानि अहम् पर केन्द्रित होता चला गया। चरित्र आदर्श और मूल्यों का स्खलन होता चला गया। हम मनुष्य के नैसर्गिक प्रकृति को भुलाने लगे और भारतीय संस्कृति और मूल्यों से खिलवाड़ करने लगे। आज हम उत्तर आधुनिक युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्यता के नाम पर संवेदना को परोसे जाने का उत्पाद आरंभ होने लगा है।यह बाजारवाद का बहुत बड़ा सिद्धांत तो नहीं है? चाहे प्राकृतिक आपदा हो या राजनीतिक सत्ताधारियों की आपसी लड़ाई हो, आम आदमी आशंकाओं के बीच ही फंसे रहते हैं।वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटकने को बाध्य होते हैं। सरकार और मीडिया बेचारी का भला हो, निष्पक्षता के साथ अपनी अपनी भूमिकाएं निभाते हुए उन्हें भी खबरदार रहना पड़ता है। भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। ऐसे सरकार के पास आर्थिक मंदी नहीं है लेकिन जब आम लोगों को आपदाओं से उबरने के लिए सहायता राशि देने का समय आता है तो सरकार देश के लोगों से ही वसूल करती है। यह लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाता दिखाई पड़ता है। समय पर आम जनता की छोटी-छोटी अनिवार्य आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पातीं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का ईनाम है। जनता को पिसना पड़ता है। वर्तमान समय में कोविद 19महामारी को संभालना अब भारी लगने लगा है। अचानक ऐसी अदृश्य आपदाओं का प्रकोप होने पर सरकार, प्रशासन और संबंधित विभाग अपने को व्यक्त करने का तरीका भी बदल देते हैं। जनता को उन्हीं की मानसिकता में संवेदना के औजारों द्वारा सेट किया जाता है। वही दिखाया जाता है जो वे देखना चाहते हैं। बिना किसी पूर्व सुरक्षा और सुविधाओं के घर बंद कर बहुत अच्छा कदम उठाया जिसकी सराहना तो पूरे विश्व में हो रही है। भारत भी उससे अपने तरीके से लड़ रहा है। यह महामारी तृतीय विश्व युद्ध के रूप में उभर कर आई है। इसके भयंकर परिणामों को भी जनता को ही झेलना पड़ेगा। कोविद - 19 की गतिशीलता एक ऐसे योद्धा की चाल है जो दिखाई नहीं दे रही और अपना काम तमाम करती जा रही है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सरकार सभी अपनी बेबसी पर हैरान हैं। यह वायरस पूरी दुनिया के 190 से अधिक देशों को आक्रांत कर चुका है। जहाँ जहाँ गया वहाँ वहाँ उसने अपना संपर्क बनाया और लोगों को गुणात्मक संख्या में लपेटने लगा। कुछ खास लोगों तक गया फिर वहाँ से दूसरों तक चेन बनाता चला गया। जहाँ से शुरू हुआ वहाँ तो सामान्य जीवन भी शुरू हो गया। लोगों में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चीन के प्रमुख शहरों में कोरोना वायरस का न फैलना कहीं कोई साजिश के तहत तो नहीं है। मानवता को अपनी मुट्ठी में रखने के स्वप्न को पूरा करने के लिए कहीं विश्व को ठगा तो नहीं जा रहा है। लोगों का मनुष्यता पर से ही विश्वास न उठता जा रहा है। यह वायरस कहीं मानव संवेदना और संस्कृति पर प्रहार तो नहीं है? सत्ता हथियाने का दम वही देश भर सकता है जिसके पास ताकत और अर्थतंत्र मजबूत हो।प्रतिस्पर्द्धा में वही शक्ति विजयी होती है जो मानवता की सेवा में अपने को लगाती है क्योंकि मानवीय संवेदनाओं से ही सत्ता विजयी होती है अन्यथा उसका भी विनाश होता हैऔर उसकी जगह फिर कोई दूसरा नायक जन्म लेता है। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक पृष्ठ हैं जहाँ मानवता को कुचलकर अपना झंडा फहराया गया है। आधुनिक युग ने हमें जो दिया, उत्तर आधुनिकता हमसे छीन रही है। यह संकेत संकटों का है। हमारी संवेदना को खतरा है। मनुष्यता के नाम पर संवेदना का गला घोटा जा रहा है। मेरी पंक्तियां याद आ रही हैं - - संवेदनाओं को धागों में पिरोने के बीच /न जाने टूट जाती हैं कितनी ही कड़ियाँ /मैंने उसे पुचकारा /कोमल स्पर्श को फेरा /उसने हल्की- सी ली करवट /और फिर वह गया बदल - - - उसकी कुर्बानी को /भुनाने लगी रिश्तों में / मेरा शौक बढ़ता चला गया/ और मैं /अपने तानों - बानों को लगी इच्छानुसार मरोड़ने /खेलने लगी तंतुओं की नरमाई से (हर दिन नया(काव्य संग्रह) , ताने-बाने, पृष्ठ 28-29) अभी तो जीने की आशा है।विश्व के बड़े-बड़े देश कोरोना वायरस से जूझ रहे हैं। कितने ही डॉक्टर और नर्स भी उसकी चपेट में आ गए हैं। हजारों की संख्या में लोग मर रहे हैं। इस भयावह स्थिति में हम घर में ही रहें तो अधिक सुरक्षित रह सकते हैं। कोरोना वायरस से बचने का रामबाण औषधि घर में रहना है। मानवता को बचाना है तो भीतर ही रहें। विषाद का साम्राज्य और कोरोना - - डॉ वसुंधरा मिश्र भारत की संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम् " और "सर्वे भवंतु सुखिनम् " की रही है। पारंपरिक और देशीय पद्धति से जीवन यापन करने वाले भारतीयों में जब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बढ़ी उसके साथ - साथ अर्थ - धर्म- काम- मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की चिंतन पद्धतियों में भी परिवर्तन आता गया। प्रकृति से जुड़ा मनुष्य प्रकृति से दूरी बनाने में अपनी शान समझने लगा। मनुष्य की नैसर्गिक प्रकृति में विरोधी प्रदर्शन की होड़ को बढ़ावा मिलने लगा। मनुष्य ने अपनी एक अलग दुनिया बनाई जिसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय जैसे बड़े- बड़े मुद्दे हैं जिनको अपनी मर्जी से बनाने लगा। विज्ञान, प्रौद्योगिकी तकनीक और संचार क्रांति ने उसे अंतरिक्ष पर भी सत्तासीन करा दिया है। प्रकृति के साथ मनुष्य जाति का सामंजस्य नहीं रहा। 130 करोड़ भारतीयों को अचानक कोरोना वायरस के कारण घर बंद कर सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया।पूरा देश एकाएक घर में बंद होने पर मजबूर हो गया। बिना किसी पूर्व व्यवस्था के अचानक से आई हुई लॉकडाउन की स्थिति भी कोरोना की तरह ही भयावह है लेकिन इसके साथ ही जीवन बचने की उम्मीद भी है। सामाजिक स्तर पर सभी समाज कोरोना वायरस से ग्रसित हैं। विदेशों से आने वाले भारतीय मूल या फिर वहाँ से आए पर्यटक, विद्यार्थी या व्यापारिक आदान-प्रदान द्वारा कोरोना वायरस का संक्रमण किसी को भी हो सकता है। चीन के बुहान से इसका आगमन माना गया जहाँ से ईरान, इटली, स्पेन, अमेरिका, भारत आदि देशों में इस महामारी का फैलना हुआ । समाज कोई भी हो सभी वर्गों के लोगों को इस वायरस ने अपनी चपेट में ले लिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हों या फिल्म सितारे, बच्चे बूढ़े जवान स्त्री पुरुष सभी। परिवार और देश को बचाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के इस पहल ने कि "जान है तो जहान है" महामारी की भयंकर आशंकाओं को भापते हुए यह मुश्किल कदम उठाए हैं। हमें सवाल करने की स्वतंत्रता है। हम घरबंद हो गए। जब बहुत संख्या में लोगों की मौत होती तब यदि ऐसा कदम उठाया जाता तो सरकार को अधिक कोसते लेकिन हर व्यक्ति को अपने प्राण प्यारे होते हैं। भारत सदैव से विभिन्न विपदाओं से कम संसाधनों में भी अपने को बचाने में आगे रहा है। ऋषि - मुनियों और तप - उपवास का देश रहा है। अदृश्य कोरोना वायरस से लड़ना 130 करोड़ लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण है। सरकारें बदलती रही हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण को ठीक करने में ही वर्षों गुजर गए। हम जैसा सोचेंगे वैसे ही जीवनशैली को अपनाएंगे। धर्म में हमारी अगाध आस्था है। भारत अपनी शक्ति और बुद्धि को आदिकाल से पहचानता है लेकिन अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोशिश करता रहता है। धर्म के नाम पर गरीबों और भिखारियों को भोजन करवाना पुण्य का कार्य है। धार्मिक अनुष्ठानों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन सड़कों पर सोए हुए मजदूरों को बड़ी गाड़ियां आराम से कुचल कर निकल जाती हैं। आर्थिक असमानता के कारण अचानक आई दैवीय आपदाओं से निपटने के लिए रुपये पैसे के लिए मृत्यु को दांव पर लगाना हमने सीखा है। हम महत्वाकांक्षी देश में जी रहे हैं। सुविधाओं की कमी है और सुविधाभोगी हो गए हैं। आजीविका और नौकरी की तलाश में राजस्थान, गुजरात, बिहार से लोगों का पलायन बंगाल और महाराष्ट्र में हुआ था। वे अपने ही देश की मिट्टी के हैं। विभिन्न जातियों भाषाओं और संस्कृति का देश है लेकिन हमने अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश न के बराबर की। चिकित्सा में हम बहुत आगे हैं लेकिन संसाधन और सुविधाओं की कमी है। डॉक्टर और नर्सों की कमी है। वर्तमान समय में आई आर्थिक मंदी से उबरना हर वर्ग के व्यक्ति के लिए चुनौतियों से भरा हुआ समय है। । आज सरकार सजगता और सतर्कता से काम कर रही है जो सराहनीय प्रयास है। श्रमिक वर्ग की भावनाओं को ठेस न लगे नहीं तो देश में काम करने वालों की संख्या और भी घट जाएगी। चोर उचक्कों की संख्या बढ़ जाएगी। पर्यावरण के अनुकूल हम भारतीयों ने अपनी जीवनी शक्ति को मजबूत बनाया था। दूसरों की नकल करने में हम अपनी संस्कृति भूल गए। अभी भी वक्त है। घरबंद रह कर बिना रुपया पैसा खर्च करके कोरोना वायरस का समापन किया जा सकता है। "हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा होय" भारतवासियों को आदत है और सरकार भी अच्छी तरह से प्रजा की देखभाल कर रही है तो फिर हमें किस कोरोना से डर है। बाद में फिर वही पटरी और वही सवारी। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ "बाढ़ की संभावनाएं हैं नदियों के किनारे घर बसे हैं"। आठ करोड़ किसानों को उनकी रबी की फसल बचानी है।मंदी में भी सबकुछ मिलता है। सुख दुख बंट जाता है। ईश्वर की कृपा है भारत में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोता है।

भवानीपुर कॉलेज में ओपन माइक कार्यक्रम 2022

आज लब्जों को मैंने चाय पे बुलाया है: ओपन माइक में - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के प्रथम सत्र के विद्यार्थियों ने ओपन माइक के अंतर्गत गीत गज़ल संगीत कविताओं बीट्स स्टेंडिंग कॉमेडी के विविध प्रस्तुतियां दी। वाद्ययंत्र गिटार का उपयोग कर गीतों का गायन किया गया। कॉलेज के टर्फ पर हुए यह कार्यक्रम तीस सितंबर 22 को हुआ जो दुर्गा पूजा की छुट्टियों का अंतिम दिन था। विद्यार्थियों की भारी संख्या में उपस्थिति दर्ज कराई। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने चाय पर कविता की पंक्तियाँ 'आज लब्जों को मैंने चाय पे बुलाया है 'सुना कर कार्यक्रम का उद्घाटन कॉलेज कैंटीन में किया लेकिन विद्यार्थियों की भीड़ देखकर कार्यक्रम टर्फ पर किया गया जहां सभी ने दरी पर बैठ कर ओपन माइक का आनंद उठाया। ओपन माइक में 26 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया और बेहतरीन प्रस्तुति दी। कृष गुप्ता, प्रियांशु, कृष्णा सोमानी, टायबा मोहसिन, वानी शर्मा, अनिरुद्ध जालान, राघव, जेसिका कौर, अदिति चटर्जी, अनुष्का सिंह, मयंक शर्मा, हर्ष केसरी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। अंत में प्रो विवेक पटवारी ने विद्यार्थियों को दुर्गा पूजा और दीपावली छठ पूजा की शुभकामनाएं देते हुए गीत सुनाया।प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उदेशी, डॉ वसुंधरा मिश्र ने आयोजन में सहभागिता की। इस कार्यक्रम का संचालन किया अतिका खान और आयोजन किया उस्मा मोहम्मद ने। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर कॉलेज ने हिंदी दिवस मनाया रिपोर्ट

भवानीपुर कॉलेज ने हिंदी दिवस मनाया - - भवानीपुर कॉलेज के हिंदी विभाग ने हिंदी दिवस मनाया।इस अवसर पर छात्र छात्राओं द्वारा कविता, नृत्य और वाद विवाद के कार्यक्रम रखे। कार्यक्रम की शुरुआत सृष्टि चंदा ने सरस्वती वंदना, आयुषी भट्टाचार्य ने नृत्य भरत नाट्यम,नेहा मंडल ने कविता सुनाई, आकांक्षा सिंह ने हिंदी इतिहास पर बताया, नागार्जुन की उनको प्रणाम कविता पाठ किया गया ।गीतांजलि दास ने नृत्य, कहानी इंस्पैक्टर मातादीन चांद तान्या और प्रतीक्षा सरकार। प्रो देवाजानी गांगुली ने हिंदी भाषा की राजभाषा यात्रा पर अपना वक्तव्य दिया और सभी छात्र छात्राओं को शुभकामनाएँ दी। गंगा पर विनीत ठक्कर ने कविता सुनायी । रात्रिका घोष और विनीत ठक्कर ने वाद विवाद में पक्ष विपक्ष पर अपनी राय जाहिर की। प्रार्थना फतेहपुरिया ने हिंदी पर अपनी बात रखी। इस अवसर पर सभी प्रतिभागियों को पोलिटिकल साइंस की विभागाध्यक्ष अमला ढांढनिया ने सर्टिफिकेट प्रदान किए।डॉ रेखा नारिवाल, डॉ प्रीति शाह डॉ वसुंधरा मिश्र, डॉ सम्पा सिन्हा, डॉ आभा झा आदि शिक्षक उपस्थित रहे ।हिंदी की विभागाध्यक्ष कविता मेहरोत्रा ने कार्यक्रम का संयोजन और धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

कोरोना की परछाई में शिक्षा का बदलता स्वरूप (लेख)

कोरोना की परछाईं में शिक्षा का बदलता स्वरूप - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता आज हम जिस कोरोना महामारी से गुजर रहे हैं वह अपनी मंद गति की ओर है। फिर भी कुछ कहा नहीं जा सकता है न ही इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। सर्वेक्षण और व्यवहारिकता के अनुसार अब हमें कोरोना के साथ ही जीना है। कोरोना महामारी के डर से मनुष्य जाति के सभी कार्यों पर ताला लग गया था। वह प्रकृति की इस विभीषिका को कभी नहीं समझ पाएगा कि उसके साथ अब आगे क्या होगा। मनुष्य की सहनशक्ति और इच्छाशक्ति उसे बचाए रखने के लिए प्रेरित करती रहती है। यह मनुष्य जाति की प्राण शक्ति ही है जो उसे जीवन से जुड़ने के नए अवसर खोज देती है। इन दो वर्षों के दौरान बहुत से लोग कोरोना की चपेट में कालकवलित हो गए तथा सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में सब कुछ उलट-पलट हो गया , कुछ संभल गए कुछ संभलना सीख गए।कोरोना महामारी ने जीवन से जुड़े हर क्षेत्र को प्रभावित किया। विश्व की बात करें तो मई 2021 तक, 26 देशों में स्कूल पूरी तरह से बंद थे और 55 देशों में स्कूल केवल आंशिक रूप से - या तो कुछ स्थानों में या केवल कुछ कक्षाओं के लिए - खुले थे।यूनेस्को के अनुसार, दुनिया भर में स्कूल जाने वाले करीब 90 फीसदी बच्चों की शिक्षा महामारी में बाधित हुई है। रूक्मिणी बनर्जी के कॉलम के अनुसार ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि विदेशों में लाखों छात्रों के लिए स्कूलों का बंद होना उनकी शिक्षा में अस्थायी व्यवधान भर नहीं, बल्कि अचानक से इसका अंत होगा। बच्चों ने काम करना शुरू कर दिया है, शादी कर ली है, माता-पिता बन गए हैं, शिक्षा से उनका मोहभंग हो गया है, यह मान लिया है वे फिर से पढ़ाई शुरू नहीं कर पाएंँगे या उम्र अधिक हो जाने के कारण अपने देश के कानूनों के तहत सुनिश्चित मुफ़्त या अनिवार्य शिक्षा से वंचित हो जाएँगे। विभिन्न क्षेत्रों की तरह कोरोना महामारी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव डाला है।दो साल से चली आ रही महामारी से अभी पूरी तरह निजात मिलने की उम्मीद भी नहीं दिखायी दे रही है। गत वर्ष जिन छात्रों ने स्नातक कक्षाओं में प्रवेश लिया था, उन्हें कॉलेज कैंपस में पढ़ने का मौका नहीं मिला और अब वे दूसरे वर्ष के छात्र हो गये ।दो अकादमिक सत्रों से सामान्य कक्षाएँ नहीं चल पा रही थीं । शैक्षणिक संस्थानों के पास शिक्षण के अन्य विकल्प तलाशने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। इस दौर में तीन तरह के शिक्षण संस्थान उभरे हैं-- सर्वप्रथम जिन संस्थानों के पास डिजिटल ढाँचा था, उन्होंने कक्षाओं को ऑनलाइन माध्यम में बदल लिया। दूसरी श्रेणी में तकनीकी रूप से उभरते संस्थान हैं, जिन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन शिक्षण का एक मिश्रित स्वरूप बनाया है। तीसरी श्रेणी में ऐसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय आते हैं, जो तकनीकी रूप से बहुत पीछे हैं। इन संस्थाओं के नामांकित छात्र 'डिजिटल असमानता' के शिकार हैं।इसमें भी लड़कियांँ और महिलाएँ डिजिटल और जेंडर दोनों नजरिये से विषमता की शिकार हैं।स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक के शिक्षकों पर तकनीक के साथ सामंजस्य बिठाने का दबाव भी है।इस साल के अंत में भी हमारे सामने ओमिक्रॉन वैरिएंट के रूप में नयी चुनौती खड़ी हो गयी थी। संक्रमण की स्थिति कुछ भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि शिक्षण संस्थाएँ अब पहले जैसी नहीं रह जायेंगी। देश में कोरोना की आमद 30 जनवरी 2020 में केरल में मिले एक मरीज से हुई थी और धीरे-धीरे 2020 के खत्म होते-होते कोरोना ने देश में तबाही के कई मंज़र दिखा दिए। इसका व्यापक असर, न केवल उद्योगों और व्यापार पर पड़ा, बल्कि इसका एक बड़ा असर स्कूलों पर, बच्चों की मानसिक स्थिति और उनकी मनोदशा पर भी पड़ा है। लगभग दो वर्ष से महामारी के कारण पूरे भारत के अधिकांश स्कूल बंद रहे हैं। बच्चे घरों में ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे । स्कूली छात्रों की सामान्य दिनचर्या, जिसमें केवल क्लासरूम में प्रत्यक्ष पढ़ाई ही नहीं शामिल होती है, बल्कि स्पोर्ट्स, हॉबी विकास, अन्य शिक्षणेतर गतिविधियाँ भी होती हैं, बाधित हो गयी थीं । अचानक हुए इस परिवर्तन ने सभी राज्यों, वर्गों, जाति, लिंग और सभी क्षेत्रों के बच्चों की एक बड़ी संख्या को प्रभावित किया है। बच्चे एक प्रकार के कैदखाने में कैद हो गए थे । विशेषकर उन घरों में जो एकल परिवार के थे और छोटे-छोटे फ्लैटों में पहले ही एक प्रकार के आइसोलेशन में जी रहे थे । संयुक्त परिवारों और बड़े घरों में तो थोड़ी बहुत, राहत है, पर एकल परिवार और कामकाजी दंपतियों के परिवार के बच्चों पर इस महामारी जन्य कैदखाने का बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है।ऐसी स्थिति में शिक्षा के क्षेत्र में हाइब्रिड क्लास एक ऐसी ही व्यवस्था है जो ऑनलाइन सीखने के साथ आमने-सामने की बातचीत को जोड़ती है, जो ऑनलाइन और पारंपरिक दोनों तरह के सीखने के सर्वोत्तम अभ्यासों को जोड़ती है जो पूरक भी है और एक दूसरे को बल देते हैं। यह शिक्षार्थियों को दिनचर्या के आसपास काम करने की अनुमति देता है जो दोनों के लिए उपयुक्त है। कोरोना काल में तकनीकी कंपनियों के लिए शिक्षा जगत में विशाल बाजार खुल गया है।दुनियाभर में कई कंपनियांँ शिक्षा को ऑनलाइन करने में लगी हुई हैं क्योंकि यह क्षेत्र लाखों-करोड़ों डॉलर के सालाना व्यापार की संभावना जगाता है। तकनीक के सहारे कंटेंट से लेकर एप बनानेवाली कंपनियांँ शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए अनुबंधित कर रही हैं।कई देशों में सरकारें भी शिक्षकों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण की व्यवस्था बना रही हैं। कुछ तकनीकी कंपनियांँ शिक्षकों की भूमिका को एक 'रिसोर्स मैनेजर' के तौर पर देख रही हैं, जो जरूरत के अनुसार बने-बनाये कंटेंट को बच्चों के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं। दुनियाभर में जब अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता चाल से चल रही थी , तब शिक्षा में तकनीक (जूम, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि) वाली कंपनियों के शेयरों में बड़ी उछाल दर्ज हो रही थी। वर्तमान में जूम, गूगल क्लासरूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम जैसे एप अब शिक्षक के लिए उपयोग होनेवाले कंप्यूटर और मोबाइल के आवश्यक तत्व बन चुके हैं। ट्यूटोरियल के लिए यूट्यूब ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर ली है।महामारी का इतिहास यह संकेत देता है कि कोरोना का कहर साल दो साल में रुक जायेगा लेकिन कोरोना ने शिक्षा के स्वरूप में जो बदलाव किया है, वह आगे भी बना रहेगा। बिना कंप्यूटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर वाले स्कूल के बच्चों के लिए चुनौतियाँ तो कम होती नहीं दिख रही हैं। जिन स्कूलों में अभी तक शिक्षकों और फर्नीचर की जरूरत पूरी नहीं हुई है, वहाँ के बच्चे 21वीं शताब्दी में शिक्षा के जरिये अपने लिए कैसा सुनहरा सपना बुनते हैं, यह शोध (और शायद क्षोभ!) का विषय होगा! जिन विश्वविद्यालयों में अभी हाइब्रिड मॉडल का अध्यापन भी शुरू नहीं हुआ, उनको आनेवाले दिनों में संसाधनों और छात्रों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। यूनिसेफ ने इस अध्ययन में, ऑनलाइन स्कूली शिक्षा की प्रभावशीलता को अपने अध्ययन का एक प्रमुख बिंदु रखा है। यूनिसेफ के इस अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार, ‘माता-पिता और शिक्षक दोनों महसूस करते हैं कि छात्र स्कूलों की तुलना में दूरस्थ (ऑनलाइन अध्ययन के लिए, दूरस्थ शब्द का प्रयोग किया गया है) शिक्षा के माध्यम से कम सीखते हैं। 5 से 13 वर्ष की आयु के छात्रों के 76 प्रतिशत और 14 से 18 वर्ष की आयु के 80 प्रतिशत, किशोरों के बारे में इस अध्ययन की रिपोर्ट है कि छात्र स्कूलों में जितना सीखते हैं, उसकी तुलना में ऑनलाइन शिक्षा में वे कम सीख रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, 67 प्रतिशत शिक्षक यह मानते हैं कि यदि स्कूल खुले रहते तो जितना छात्र स्कूलों में जाकर पढ़ते सीखते हैं, उसकी तुलना में छात्र अपनी समग्र सीखने की क्षमता में पिछड़ रहे हैं, खासकर प्राथमिक स्कूलों के छात्र इसमें अधिक नुकसान में हैं। स्कूल बंद होने के कारण छात्रों के सीखने की क्षमता में कमी के अतिरिक्त, स्कूल बंद होने के कारण, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर (Impact on mental health of students due to school closure) पड़ा है। जैसे-जैसे छात्र अपने घरों में, महामारी जन्य आइसोलेशन में कैद होते गए, वे अपने मित्रों और शिक्षकों से दूर होते गए। साथ ही महामारी में आने वाली बुरी खबरों का असर जो घर के बड़ों पर पड़ा, उनके तनाव से भी बच्चों और किशोरों के मन मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। माता-पिता की नौकरियों पर असर पड़ा, कुछ महामारी के ग्रास बन गए तो, इसका असर पड़ा और घर में लगातार महामारी जन्य नकारात्मकता ने बच्चों को मानसिक रूप से रुग्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। घर के जबरिया थोपे गए एकांत और हमउम्र मित्रों के अभाव के कारण उपजी संवादहीनता ने बच्चों के सीखने की क्षमता और स्वाभाविक जिज्ञासु भाव को बहुत अधिक प्रभावित किया है। अध्ययन से यह पता चलता है कि, 5 से 13 वर्ष की आयु के एक तिहाई छात्रों और लगभग आधे किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर खराब असर या बहुत ही खराब असर पड़ा है। अध्ययन के दौरान परिवारों से साक्षात्कार भी लिये गये। उनके अनुसार, सामाजिक अलगाव, सीखने में व्यवधान और परिवार की वित्तीय असुरक्षा खराब मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख कारण हैं। हाल ही में, मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय ने एजुकेशन पॉलिसी में बदलाव किया है। यह बदलाव इसरो प्रमुख डॉक्टर के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में किया गया है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत स्कूलों तथा कॉलेजों में होने वाली शिक्षा की नीति तैयार की जाती है। भारत सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 का आरंभ किया है जिसके अंतर्गत सरकार ने एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे मुख्य बदलाव किए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। अब मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा। नेशनल एजुकेशन पालिसी के अंतर्गत 2030 तक स्कूली शिक्षा में शत प्रतिशत जी ई आर के साथ पूर्व विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय तक शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा (मेडिकल और कानून अध्ययन इसमें शामिल नहीं है ) पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई शिक्षा नीति के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न का अनुकरण किया जाएगा। राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (एनईपी) केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जुलाई 2020 को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) शुरू करके स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली में परिवर्तनकारी सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में एमएचआरडी का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया । पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति जो 1986 में बहुत पहले शुरू की गई थी, उसके बाद यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है जिसने 34 साल पुरानी शिक्षा नीति को बदल दिया है । नया एनईपी चार स्तंभों पर आधारित है जो एक्सेस, इक्विटी, गुणवत्ता और जवाबदेही हैं। इस नई नीति में, 5+3+3+4 संरचना होगी जिसमें 12 साल का स्कूल और 3 साल का आंँगनबाडी/पूर्व-विद्यालय पुराने 10+2 ढांँचे की जगह शामिल हैं। कोरोना महामारी के बाद आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों आदि में दूरस्थ शिक्षा और कौशल उद्यम का प्रयोग विशेष रूप से स्थान लेते जा रहे हैं। ट्रांजिशन के दौरान शिक्षकों के लिए स्मार्ट क्लासरूम बनाये जा रहे हैं , जिनमें वीडियो बनाने, आवाज पहचानने और साथ ही अनुवाद करने की तकनीक को भी विकसित किया जा रहा है। स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए नए कोर्स भी तैयार किए जा रहे हैं। यह सच है कि तकनीक के प्रभाव से शिक्षा का जो स्वरूप आज उभर रहा है, उसकी व्यापकता के साथ पीछे छूट जानेवाले बच्चे और संस्थान कहांँ जायेंगे, इसका रास्ता साफ नहीं दिख रहा है।यह एक गंभीर समस्या है।संकट शिक्षकों पर भी है और सरकारी शिक्षण संस्थानों पर भी। शिक्षा में बदलाव के लिए जरूरी है कि इसके दार्शनिक और वैचारिक आधार पर भी विचार किए जाएंँ । पिछले दशकों में शिक्षा में सुधार के जो प्रयोग हुए, उनसे हमने क्या सीखा है? शिक्षा में बदलाव के मौजूदा तरीके इस संक्रमण में कितने उपयोगी होंगे? आदि पर विचार विमर्श करने की भी आवश्यकता है। लॉकडाउन का शिक्षा क्षेत्र पर काफी प्रभाव पड़ा है और इसके वास्तविक प्रभाव को आंकना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए उपलब्ध व्यापक आधिकारिक आंकड़े 2019-2020 से पहले के हैं। इन आंकड़ों से कोरोना पूर्व के रुझान का पता चलता है लेकिन यह नहीं पता चलता कि कोरोना की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों का इस रुझान पर क्या असर पड़ा। वैसे तो कोरोना की वजह से देशभर में एहतियात के तौर पर स्कूल, कॉलेज और शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया गया था। एएसईआर 2021 की रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूलों में दाखिला नहीं लेने वाले छह से 14 साल की आयुवर्ग के बच्चों की संख्या 2018 में 2.5 फीसदी की तुलना में 2021 में दोगुनी होकर 4.6 फीसदी हो गई। इस सर्वे में यह भी पता चला कि लॉकडाउन की वजह से माता-पिता के वित्तीय संकट की वजह से बच्चों का निजी स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया गया और कई परिवार गांँव लौटने को मजबूर हुए। 10 में से लगभग छह ग्रामीण बच्चों को महामारी के दौरान किसी तरह की शिक्षण सामग्री नहीं मिली या वे किसी तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाए। एएसईआर की रिपोर्ट में कहा गया कि डिजिटल विभाजन ने शिक्षा के पहुंँच की असमानता को बढ़ा दिया। साथ ही स्मार्टफोन नहीं होने और इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़े मुद्दों की वजह से बड़ी संख्या में ग्रामीण बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से महरूम रहे।10 में से लगभग छह ग्रामीण बच्चों को महामारी के दौरान किसी तरह की शिक्षण सामग्री नहीं मिली या वे किसी तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाए। सर्वेक्षण में कहा गया कि इन आकंड़ों की पुष्टि के लिए कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। भारत अभी तो नियंत्रण में है, कहीं उस ओर चला जाता तो इस महामारी से होने वाली तबाही को रोकना बेकाबू हो जाता । आज भी हम कोरोना वायरस के पंजों की गिरफ़्त में हैं जो अदृश्य रूप से मानवता को कुचलने में लगने लगी है। बड़े बड़े देशों में कोरोना वायरस ने खलबली मचा दी थी । क्या यह एकछत्र सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी का खतरनाक खेल तो नहीं? इस वायरस को कहीं से भेजा तो नहीं गया था ? और यदि ऐसा नहीं है तो पूरे विश्व में इस वायरस का प्रकोप कहीं अधिक और कहीं कम क्यों था ? साइबेरिया के पक्षियों की तरह क्या इस वायरस को स्थान विशेष के मार्ग का ज्ञान था? आधुनिक काल ने मनुष्य की अस्मिता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी। व्यक्ति महत्वकांक्षी और मैं यानि अहम् पर केन्द्रित होता चला गया। चरित्र, आदर्श और मूल्यों का स्खलन होता चला गया। हम मनुष्य के नैसर्गिक प्रकृति को भुलाने लगे और भारतीय संस्कृति और मूल्यों से खिलवाड़ करने लगे। आज हम उत्तर आधुनिक युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्यता के नाम पर संवेदना को परोसे जाने का उत्पाद आरंभ होने लगा है।यह बाजारवाद का बहुत बड़ा सिद्धांत तो नहीं है? चाहे प्राकृतिक आपदा हो या राजनीतिक सत्ताधारियों की आपसी लड़ाई हो, आम आदमी आशंकाओं के बीच ही फंसे रहते हैं।वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटकने को बाध्य होते हैं। सरकार और मीडिया निष्पक्षता के साथ अपनी - अपनी भूमिकाएँ निभाते हुए उन्हें भी खबरदार रहना पड़ता है। भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। सरकार के पास आर्थिक मंदी नहीं थी लेकिन जब आम लोगों को आपदाओं से उबरने के लिए सहायता राशि देने का समय आता है तो सरकार देश के लोगों से ही वसूल करती है। यह लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाता दिखाई पड़ता है। समय पर आम जनता की छोटी-छोटी अनिवार्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का ईनाम लगता है। जनता को पिसना पड़ता है। वर्तमान समय में कोविद महामारी को संभालना भारी लगने लगा था । अचानक ऐसी अदृश्य आपदाओं का प्रकोप होने पर सरकार, प्रशासन और संबंधित विभाग अपने को व्यक्त करने का तरीका भी बदल देते हैं। जनता को उन्हीं की मानसिकता में संवेदना के औजारों द्वारा सेट किया जाता है। वही दिखाया जाता है जो वे देखना चाहते हैं। बिना किसी पूर्व सुरक्षा और सुविधाओं के घर बंद कर बहुत अच्छा कदम उठाया जिसकी सराहना तो पूरे विश्व में हो रही है। भारत भी उससे अपने तरीके से लड़ रहा है। यह महामारी तृतीय विश्व युद्ध के रूप में उभर कर आई है। इसके भयंकर परिणामों को भी जनता को ही झेलना पड़ेगा। कोविद महामारी की गतिशीलता एक ऐसे योद्धा की चाल है जो दिखाई नहीं दे रही और अपना काम तमाम करती जा रही है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सरकार सभी अपनी बेबसी पर हैरान हैं। यह वायरस पूरी दुनिया के 190 से अधिक देशों को आक्रांत कर चुका है। जहाँ जहाँ गया वहाँ वहाँ उसने अपना संपर्क बनाया और लोगों को गुणात्मक संख्या में लपेटने लगा। कुछ खास लोगों तक गया फिर वहाँ से दूसरों तक चेन बनाता चला गया। जहाँ से शुरू हुआ वहाँ तो सामान्य जीवन भी शुरू हो गया था । लोगों में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चीन के प्रमुख शहरों में कोरोना वायरस का न फैलना कहीं कोई साजिश के तहत तो नहीं है। मानवता को अपनी मुट्ठी में रखने के स्वप्न को पूरा करने के लिए कहीं विश्व को ठगा तो नहीं जा रहा है? लोगों का मनुष्यता पर से ही विश्वास उठता जा रहा है। यह वायरस कहीं मानव संवेदना और संस्कृति पर प्रहार तो नहीं है? सत्ता हथियाने का दम वही देश भर सकता है जिसके पास ताकत और अर्थतंत्र मजबूत हो।प्रतिस्पर्द्धा में वही शक्ति विजयी होती है जो मानवता की सेवा में अपने को लगाती है क्योंकि मानवीय संवेदनाओं से ही सत्ता विजयी होती है अन्यथा उसका भी विनाश होता हैऔर उसकी जगह फिर कोई दूसरा नायक जन्म लेता है। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक पृष्ठ हैं जहाँ मानवता को कुचलकर अपना झंडा फहराया गया है। आधुनिक युग ने हमें जो दिया, उत्तर आधुनिकता हमसे छीन रही है। यह संकेत संकटों का है। हमारी संवेदना को खतरा है। मनुष्यता के नाम पर संवेदना का गला घोटा जा रहा है। मेरी पंक्तियाँ याद आ रही हैं - - संवेदनाओं को धागों में पिरोने के बीच /न जाने टूट जाती हैं कितनी ही कड़ियाँ /मैंने उसे पुचकारा /कोमल स्पर्श को फेरा /उसने हल्की- सी ली करवट /और फिर वह गया बदल - - - उसकी कुर्बानी को /भुनाने लगी रिश्तों में / मेरा शौक बढ़ता चला गया/ और मैं /अपने तानों - बानों को लगी इच्छानुसार मरोड़ने /खेलने लगी तंतुओं की नरमाई से (हर दिन नया(काव्य संग्रह) ,डॉ वसुंधरा मिश्र ताने-बाने, पृष्ठ 28-29) अभी तो जीने की आशा है।विश्व के बड़े-बड़े देश कोरोना वायरस से जूझ रहे थे । कितने ही डॉक्टर और नर्स भी उसकी चपेट में आ गए थे । हजारों की संख्या में लोग मर रहे थे । इस भयावह स्थिति में हम घर में ही रहें तो अधिक सुरक्षित रह सकते हैं। कोरोना वायरस से बचने का रामबाण औषधि घर में रहना ही था । मानवता को बचाना है तो सुरक्षा से रहना जरूरी है । भारत की शिक्षा और संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम् " और "सर्वे भवंतु सुखिनम् " की रही है। पारंपरिक और देशीय पद्धति से जीवन यापन करने वाले भारतीयों में जब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बढ़ी उसके साथ - साथ धर्म-अर्थ - काम- मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की चिंतन पद्धतियों में भी परिवर्तन आता गया। प्रकृति से जुड़ा मनुष्य प्रकृति से दूरी बनाने में अपनी शान समझने लगा। मनुष्य की नैसर्गिक प्रकृति में विरोधी प्रदर्शन की होड़ को बढ़ावा मिलने लगा। मनुष्य ने अपनी एक अलग दुनिया बनाई जिसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय जैसे बड़े- बड़े मुद्दे हैं जिनको अपनी मर्जी से बनाने लगा। विज्ञान, प्रौद्योगिकी तकनीक और संचार क्रांति ने उसे अंतरिक्ष पर भी सत्तासीन करा दिया है। 5जी का उद्घाटन भारत सरकार द्वारा किया गया है जो विकास और उन्नति की विभिन्न संभावनाओं की तलाश करने में महत्वपूर्ण कदम उठाएगा। देश की उन्नति वहाँ के लोगों की शिक्षा पर निर्भर करती है। शिक्षा की महत्ता प्रत्येक देशकाल एवं परिस्थितियों के लिये उतनी ही आवश्यक रही है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य, लक्ष्य आदि पर चर्चा होती रही है एवं सदैव उसके वास्तविक स्वरूप को खोजने का प्रयास किया जाता रहा है। हमारे भारत के ऋषि मुनियों ने ‘सा विद्या या विमुक्तये’ का ज्ञान देकर शिक्षा की महत्ता पर बल दिया था। वास्तविक शिक्षा वही होती है जो मुक्ति का मार्ग प्रदान करे। मुक्ति का अर्थ सामान्यतः संसार से पलायन के संदर्भ में लिया जाता है परंतु विद्या का जोर इस पलायन पर नहीं अपितु धर्म के साथ जीविका उपार्जन एवं धर्म युक्त कर्मों की महत्ता पर है।

मेरी क्षणिकाएं

*समय के साथ भूल गए हैं लोग चाँद का दाग चंद्र किरणों से खेलना किसे नहीं अच्छा लगता *निंदा की आदतें अच्छी थीं अब प्रशंसा से भी पेट भरता नहीं *वो आज देर से लौटा था देवी के दर्शन से मन नहीं भरा *सडकों पर जगमगाहट थी गलियों में अंधेरा था *चले जाने का दुख न था कुछ भी नहीं कहा *ऊपर से दुख दिखाई नहीं देता भीतर उतरता रहता है *सुख की चाहत में उम्र रीत रही छोटी-छोटी बातों में जिंदगी उलझती गई *शब्दों से खेलते हैं लोग जब जुआ और चौपड़ भी फेल हैं तब आराधना में वाग्देवी बन समाज को नई दिशा देती है तब

मैं छोटा सा दीप (कविता)

मैं छोटा सा दीप हूँ मिल जाऊंगा फिर मिट्टी में। पर उजाला करके अंधेरों को खाक करके इश्क की चाहत में मैने तुमको चाहा था नफरत की आंँधी को स्नेह से जलाया था मैं छोटा सा दीप हूँ पानी की बूंँद सा समंदर की थाह सा मैं मिट्टी का छोटा सा दीप हूँ आंँधी ने मुझको छुआ था कभी घबरा कर मेरी लौ बुझने लगी हिम्मत न हारी जलता रहा हिलता रहा ललकारता रहा हवाओं से मैं लड़ता रहा अपना बचाव करता रहा मैं मिट्टी का छोटा-सा दीप हूँ मेरा तन मन भरा हुआ था बाती मुझको छू रही थी एक दूजे में थे लिपटे मालूम नहीं था कब तक जीते पर जब तक हम हैं साथ तेरे साथ जिएंँगे साथ मरेंगे छोटा हूँ पर बड़ों - बडों को देता हूँ मैं सीख विश्वास करो अपने ऊपर काम बड़े बस करते जाओ फूलों की खुशबू से जग सुरभित हो जाता है फूल सभी मिट्टी बन जाते मैं मिट्टी से बनता हूँ अग्नि मेरी हमजोली-सी काली रातों की सहेली-सी साथ निभाती वह भी तब तक जब तक रहता जीवन उसमें भारत की संस्कृति के प्रहरी हैं नहीं कोई बदले की चाहत बस देते ही जाना है भले ही हो थोड़ा ही प्रकाश धरती का ही वंशज हूँ धन्य हमारी जाति है हम अभिमानी और दानी नहीं कोई हमारा है सानी पांचों तत्व ही मुझमें रचते - बसते हैं ' वसुधैव कुटुम्बकम' की इस धरती का कण - कण भरा हुआ है मुझमें छोटा- सा हूँ पर, जीने का उद्देश्य बड़ा है मानव, दानव, पशु - पक्षी सब मिट्टी से ही बनते हैं और उसमें ही मिट जाते हैं समझाते जीवन दर्शन को मिट्टी से बनते हैं और फिर मिट्टी में मिल जाते ज्योत से ज्योत जलाता हूँ छोटा - सा दीप हूँ, हांँ छोटा- सा दीप हूँ पर अंधकार के बादल को भी चीर कर रख देती है मेरी दुर्बल और चमकती लौ दिखा देती है मेरे अस्तित्व का आईना बिना डरे बिना झुके राह दिखाता स्वाभिमान से मैं छोटा - सा नन्हा दीप आशा और उम्मीद की लौ किरणों को फैलाता जीवन के संघर्षों से लड़ने की रीति सिखाता आस्था और विश्वास की सीढ़ी पर चलते रहने की ऊर्जा को प्रतिपल प्रज्वलित रखता मैं छोटा - सा दीप हूँ झिलमिल झिलमिल कर सबके मन को भाता हूँ तीज-त्यौहार बिना मेरे लगते सभी अधूरे से देवों का मंदिर भी करता प्यार मुझे जी भरकर के स्नेह और भाव के अर्घ्य चढा़ता हरदम जगमग जगमग करता जगमग जगमग करता मैं छोटा सा दीप मैं नन्हा - सा दीप @वसुंधरा मिश्र, 9.10.22

सूरज ग्रहण पस्त (कविता)

सूरज ग्रहण पस्त सूर्य को जन्म देना नहीं है आसान यश तेज ओज यूं ही नहीं मिल जाते प्रतीक है भारत और भारतवासियों के निभाते आ रहे हैं धर्म और अधर्म को बुराई पर अच्छाई की जीत राम की रावण पर विजय महिषासुर पर शक्ति की जय सूर्य देव हों या फिर कोई सशक्त राजा पुरुष हो या महापुरुष या फिर कोई देवी देवता नकारात्मक ऊर्जा को कर ध्वस्त सकारात्मकता सोच विचार को कर प्रतिष्ठित लाखों-करोड़ों वर्षों से चमकता सूर्य भी कुछ काल तक रहा ग्रस्त उसकी किरणों के प्रकाश को भी रोका गया धर्म वहां भी अधर्म को करता रहा असफल संस्कृति और सभ्यता को बढ़ाता रहा है अध्यात्म जप तप मंत्रों की शक्ति ने बढ़ाया सदैव ही मान गंगा का पावन जल आज भी हमें करता है पवित्र तन मन धन खोलते हैं त्याग संकल्प और करुणा की राहें मानवता के पथ पर चलने के नैतिक मूल्यों और आदर्शों के द्वार क्या है विश्व में ऐसा दर्शन या धर्म जो सभी को देखता हो एक दृष्टि से साधारण भी बन जाता असाधारण सूर्य को जन्म देना नहीं है आसान असाध्य वीणा के तार भी बजने लगते हैं गीता में कृष्ण का करते हैं जब ध्यान कर्म को बना लेते हैं जब आराध्य पूजा अर्चन वदंन सब कुछ जीवन को कर देते श्रीमंडित हो जाता दुनिया का हर ग्रहण तब पस्त @वसुंधरा मिश्र, 25.10.2022

Tuesday, September 13, 2022

गुरु दक्षिणा रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/नॉलेज-कार्निवाल-में-प्रो/

सुंदरवन में पुस्तकालय रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/सुन्दरवन-हिंगलगंज-में-स्/

कविता द्वारा

वसुंधरा शत-शत नमन तुमको, हे वसुंधरा। तुमसे ही हैं ये जीव सारे ओ धरा। तुमने ही जीवनदान है सबको दिया। सुख-भाग सबको बाँटती हो ओ धरा। सुख और दुख समरूप से हो झेेलती। उर में छिपा लेती हो निज दुख ओ धरा। सबको तुम्हीं हो बाँटती अमृत-सुधा, पर मिला तुमको गरल-विष ओ धरा। उफ़ न करती तुम रही हँसती सदा। जग ने कहाँ समझा है तुमको ओ धरा।

आओ देश से माफी मांगें कविता

https://www.shubhjita.com/आओ-देश-से-माफी-माँगें/

15 अगस्त रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/15-अगस्त/

बिरसा मुंडा रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-ने-बिरसा-म/

अमृत महोत्सव 22 रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/तिरंगा-है-हमारी-आन-बान-और-श/

नेक्सस 22 रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-में-दो-दिव-2/

ओपन माइक रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-में-ओपन-मा-2/

प्लेसमेंट ड्राइव रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-में-विद्य/

द्वितीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का उद्घाटन समारोह संपन्न रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/द्वितीय-राष्ट्रीय-हिंदी/

शिक्षकों को प्रणाम कार्यक्रम रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-में-शिक्ष/

देश में आर्थिक विकास डॉ सुमन मुखर्जी रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/देश-के-समग्र-आर्थिक-विकास/

भवानीपुर कॉलेज में विपणन रूपांतरण रिपोर्ट

https://www.shubhjita.com/भवानीपुर-कॉलेज-में-विपणन/

संस्मरणों में डॉ कल्याण मल लोढा

https://youtu.be/KFS2rV4tYx8

माँ के पेट से बंधा रहा कविता

https://youtu.be/ge1vZbtjLW8

प्रेम की खोज कविता

https://youtu.be/OU9wyK4zFpM

रिश्तों का बीमा नहीं होता कविता

https://youtu.be/idIyjANpXX4

उत्तरायण में सूर्य कविता

https://youtu.be/urdqkb8P1ww

युद्ध युद्ध युद्ध कविता

https://youtu.be/iIPg2gq5vYk

सुरधारा होरी-आई

https://youtu.be/v7mPttdhhx4

वंदना सिंह की प्रदर्शनी

https://youtu.be/_kmpc3Sbh34

भवानीपुर कॉलेज में संस्कृति के रंग

https://youtu.be/-9DnVC-jXKc

भवानीपुर कॉलेज में वैक्सीन

https://youtu.be/IA3iUJhq8EM

Monday, September 12, 2022

डॉ सुमन मुखर्जी (रिपोर्ट)

भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के डायरेक्टर जनरल प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ सुमन मुखर्जी ने मेन्टर के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।इस अवसर पर डॉ सुमन मुखर्जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए अपने विचार व्यक्त किए। यह कार्यक्रम एक पेशेवर निकाय द्वारा किया गया था जिसमें सीए सीएमए, सीएस वकील शामिल थे। कॉर्पोरेट सलाहकार और अधिकारियों की ACAE एसोसिएशन द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम ताज बंगाल में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में भारत में डिजिटल तकनीक, सांस्थानिक ढांचे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विषयों पर सभी गणमान्य वक्ताओं ने अपने वक्तव्य रखे। प्रमुख अतिथि आईसीएआई नई दिल्ली अध्यक्ष सीए डॉ देबाशीष मित्रा की उपस्थिति में एसीएई का वार्षिक कॉन्फ्रेंस 22 का आयोजन किया गया।

विपणन रूपांतरण पर चर्चा (रिपोर्ट)

भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों ने विपणन रूपांतरण विषय पर की चर्चा - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के जुबली सभागार में कॉमर्स लैब के अंतर्गत मार्केटिंग मेटाफारमेसिस विषय पर विद्यार्थियों ने चर्चा की। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने कॉमर्स लैब के अंतर्गत विपणन कायाकल्प के उद्देश्य को रखते हुए मार्केटिंग के महत्वपूर्ण पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए एक उदाहरण स्वरूप है जिसमें वे अलग - अलग उत्पाद की मार्केटिंग का अनुभव प्राप्त करेंगे। मेटाफारमेसिस का अर्थ है किसी भी क्षेत्र में कायाकल्प या रूपांतरण करना। विद्यार्थियों ने स्वयं अपने विभिन्न उत्पादों की मार्केटिंग की। यह कार्यक्रम तीन भागों में विभाजित रहा। प्रथम भाग में प्रोडक्ट पिचिंग बाजार के विभिन्न उत्पादों के स्लोगन पूछे गए और द्वितीय भाग में गैस दि प्रोडक्ट और तृतीय भाग में मिम पिक्चर द्वारा विद्यार्थियों की टीम ने प्रतियोगिता में भाग लिया। इस कार्यक्रम के सहसंयोजन और वक्ता के रूप में प्रो लक्ष्मी झा, प्रो दिव्या उदेशी, प्रो नितीन चतुर्वेदी रहे।कार्यक्रम के आरंभ में प्रो दिव्या उदेशी ने मार्केटिंग पर अपने विचार व्यक्त किए ।विद्यार्थियों की उनतीस टीमों ने अपने प्रोडक्ट डांडिया, नेलपालिश, स्मोक डिटेक्टर, कैलकुलेटर, लैंप, लिप बाम, जेली, मीरर, वायर, प्रैशर कूकर, शर्ट, नाइफ, कैप, रेडियो, सीसी टीवी , सुपर कम्पास, नेलकटर, नेक मसाज, नेल, फेवकोल, डस्टबीन, स्करुड्राइ, बेल्ट, सार्ट, कंबल, फोन कवर, स्मार्ट वाच, स्वीच आदि ने अपने उत्पादन की मार्केटिंग की।वहीं दिवारें बोल उठेंगी - जेके वाल पुट्टी, टोटल कंट्रोल - जेके टायर, ऐसी आजादी और कहां - एअर टेल, प्रकृति का आशीर्वाद - पतंजलि, पैंट योर ईमेजिनेसन - बर्जर पेंट, शुभआरंभ - सेलेब्रेशन आदि विभिन्न स्लोगनों के उत्तर पूछे गए। प्रो नितीन चतुर्वेदी ने मिम पिक्चर के विषय पर वक्तव्य देते हुए स्लाइड पिक्चर्स द्वारा मिम द्वारा बाजार उत्पाद के प्रति लोगों को आकर्षित कैसे किया जाए, बताया। निर्णायक मंडल में साक्षी शॉ, दुष्यंत चतुर्वेदी, पूजा अग्रवाल , और अमृता राय चौधरी ने अपने निर्णय रखे। प्रमुख अतिथि निर्णायक आईआईएम जयशंकर गोपाल ने अंत में सभी प्रतिभागियों को समवेत रूप से प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान दिए।आईआईएम जयशंकर ने कहा कि विद्यार्थियों द्वारा अपने उत्पादों में अंग्रेजी, हिंदी और बांग्ला आदि बहुविध भाषा का प्रयोग किया जो हमें हमारी संस्कृति से जोड़ती है जिससे उत्पाद के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित होता है, जो बाजार बढ़ाने में कारगर सिद्ध होता है। डीन्स अॉफिस द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिलीप शाह ने सभी निर्णायकों और विजेता विद्यार्थियों को सर्टिफिकेट प्रदान किए। कैरियर कनेक्ट प्रो उर्वी शुक्ला ने अपने वक्तव्य में मार्केटिंग के परंपरागत तरीकों में नए रूप में अपने विचार लाने के लिए विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम में सौ से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही ।कार्यक्रम का संचालन किया प्रो लक्ष्मी झा, प्रो दिव्या उदेशी और प्रो नितीन चतुर्वेदी ने। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने अपना धन्यवाद वक्तव्य रखा। शिक्षण और शिक्षिकाओं ने भी इसमें भाग लिया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

Sunday, September 11, 2022

बहती नदी (कविता)

बहती नदी पूछा नदी को कहांँ बहती जा रही हो तुम वही हो तुम्हारी नियति वही है एक पूरी संस्कृति को ढोती क्या तुम स्त्री हो तुम्हारे दोनों किनारों पर बसे हैं गाँव शहर महानगर जिनसे जुड़ती है तुम्हारी कहानी तुम तो बहती नदी हो चलती हो उछलती हो चंचल हो सुंदर युवती सी हो। @वसुंधरा मिश्र, 6.9.22

कुछ बातें (कविता)

*कुछ बातें बस बातें ही बन कर जी लेती हैं *उनको तो खबर ही न थी पूरे शहर के हंगामे की रात के गहरे अंधेरे को चीर कुछ राज खुल चुके थे बाकी थी जो उसकी आत्महत्या जो इसी रात घट चुकी थी *उन्हें थी आहट उनके आने की तभी तो रात कब सुबह हो गई जान ही न पाए *तुम पर प्यार ही प्यार बरसने लगा यह तो दिल का धड़कना है * प्रेम में कब हम गए भीग कपड़े और जेवर सूखे ही रहे @वसुंधरा मिश्र 6.9.22

गढ्ढों की जय हो (कविता)

गढ्ढों की जय हो सड़क के दोनों तटों के बीच गढ्ढे क्या सड़क है? उस पर चलने का मजा ही कुछ और है टोटो अॉटो का रिश्तेदार उसकी सवारी करने का सफेद बालों वाला बेचारा वह जवान काले बालों वाली मैं जवान सी दिखने वाली टोटो के हिचकोलों ने कितने करीब ला दिया याद आ गए कॉलेज के वे दिन बाइक पे बैठ जब हो जाती थी सभी दूरियाँ दूर जान बूझ कर खोजी जाती थीं ऐसी सड़कों को अब तो हर सड़क पर नमूने बने हैं गढ्ढे भी सोच - समझ कर डिजाइनदार बनते हैं कभी दायीं ओर का पहिया धँस जाता तो कभी बायें गढ्ढे के पहिया संतुलित करता वो परेशान सा कभी मेरे बाएंँ कंधे से टकराता तो कभी बाएंँ हाथ से स्पर्श कर जाता धीरे से पूछने लगा लगी तो नहीं, सड़कें ही ऐसी हैं अरे ये गढ्ढे क्या हैं, जान की आफत हैं जोर से रॉड को पकड़े रहें सीट भी उछल उछल गढ्ढे को निहारने में लगी है छह महीने में ही उनके कपड़े जगह-जगह से फटने लगते हैं कभी पूजा की आस या फिर चुनाव के इंतजार में गढ्ढों को गालियाँ सुननी पड़ती आते-जाते सभी ताने मारते भगवान ही मालिक है कभी हम टोटो पे तो कभी टोटो हमपे खैर हम सभी प्यारे गढ्ढों को धन्यवाद देते हुए सकुशल पहुँचने वाले ही थे कि हमारी बातों का सिलसिला सरकार, राजनीति के कई गलियारों से गुजरा मीडिया, भ्रष्टाचार और न जाने क्या क्या पर वह बात तो हुई ही नहीं जिस तरह से टकराए थे गढ्ढे अच्छों अच्छों को मिलाते हैं तो तोड़ भी देते हैं पूरी सावधानी से सुरक्षित हो रहें कह कर चला गया गढ्ढे भी तो प्रकृति के ही बनाए हुए हैं न बारिश होती न उसके चेहरे का श्रृंगार हटता इतनी बेरहमी भी ठीक नहीं आखिर मिलवाया तो ऐसे शख्स से जो सामाजिक सरोकारों से वास्ता तो रखता है जहाँ बाजार जोरों पर हो वे अधिक संख्या में बनते हैं गढ्ढों की जय हो @वसुंधरा मिश्र, 10.9.2022

Saturday, September 10, 2022

नाट्य उत्सव शरत सदन 22 उमा झुनझुनवाला

पश्चिम बंग हिंदी अकादमी द्वारा द्वितीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का उद्घाटन समारोह संपन्न --बंगाल नाट्य संस्कृति की धरती में हिंदी और बांग्ला नाटक एक- दूसरे से जुड़े हुए हैं :डॉ सोमा बंदोपाध्याय - - - माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अनुप्रेरणा थथथसेस्व पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के सूचना और संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित द्वितीय राष्ट्रीय हिंदी नाटक उत्सव के उद्घाटन समारोह में डायमंड हार्बर विश्विद्यालय और शिक्षण प्रशिक्षण से संबद्ध कुलपति प्रो सोमा बंदोपाध्याय ने अपने बहुमूल्य वक्तव्य में कहा कि बंगाल ही वह सांस्कृतिक भूमि है जहाँ नाटकों के विकास की लंबी परंपरा रही है। नाटकों के इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि बंगाल में वृन्दावन लाल वर्मा, भगवती चरण वर्मा आदि से लेकर श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल ,उषा गांगुली,अजहर आलम, प्रताप जयसवाल आदि नाटककारों और उनकी नाट्य संस्थाओं के महत्वपूर्ण योगदान से हिंदी नाटकों को पहचान मिली। बंगाल की धरती पर ही पहली बार बंगाली स्त्रियों ने नाटकों में अभिनय किया। हिंदी नाटकों में बंगाली महिलाओं ने अभिनय किया। रंगकर्मी, पदातिक, लिटिल थेस्पियन, अभिनव आदि विभिन्न हिंदी नाट्य संस्थाओं में बांग्लाभाषी भी अभिनय कर रहे हैं। बंगाल में सभी भाषाओं का सम्मान रहा है। वर्तमान सरकार द्वारा इस प्रकार के नाट्य उत्सव आयोजित करना महत्वपूर्ण कदम है। इस कार्यक्रम के प्रथम दिन लिटिल थेस्पियन द्वारा 'रेत और इंद्रधनुष' कोलाज नाटक की प्रस्तुति दी गई जिसका निर्देशन उमा झुनझुनवाला ने किया। द्वितीय दिन पदातिक नाट्य संस्था के निर्देशन में ताजमहल और तृतीय दिन मुश्ताक काक के नाटक आधी रात के बाद का मंचन किया जाएगा। तीन दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव के प्रथम दिवस में उद्घाटन समारोह में डॉ सोमा बंदोपाध्याय कुलपति डायमंड हार्बर विश्विद्यालय और शिक्षण प्रशिक्षण ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। पश्चिम हिंदी अकादमी के सदस्य सचिव गौतम गांगुली, हावड़ा जिला परिषद के उप सभापति अजय भट्टाचार्य, हावड़ा डेवलपमेंट के एडीएम अज़हर जिया, हावड़ा जिला परिषद के कर्माध्यक्ष श्रीधर मंडल और पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के अधिकारीगण ने अपने वक्तव्य रखे। जिला सूचना व संस्कृति कार्यालय, हावड़ा की व्यवस्था में शरत सदन हावड़ा के सभागार में आयोजित यह नाट्य उत्सव तीन दिनों तक सात आठ नौ सितंबर तक चलेगा। समारोह सत्र के पश्चात शशि सहगल की कविताओं के कोलाज रेत और इंद्रधनुष कविता कोलाज की नाट्य अभिनयात्मक प्रस्तुति दी गई जिसमें लिटिल थेस्पियन के कलाकारों हीना परवेज़, पार्वती कुमारी शॉ, प्रियंका सिंह, पूर्णिमा मेहरा, नेहा यादव, मनोहर कुमार झा, इंतेख़ाब वारसी, रितेश कुमार राव, राकेश, राहुल शर्मा ने मंचीय प्रस्तुति दी। प्रकाश परिकल्पना जॉयदीप रॉय, ध्वनि संचालक सब्यसाची पाल और निर्देशन उमा झुनझुनवाला का रहा। लिटिल थेस्पियन एस एम अज़हर आलम और उमा झुनझुनवाला द्वारा 1994 में स्थापित अखिल भारतीय स्तर की भारतीय नाट्य संस्था है जिसका उद्देश्य समाज में कला और संस्कृति का विकास है। इस संस्था की सह संस्थापक और निर्देशिका उमा झुनझुनवाला पचास से अधिक नाटकों में अभिनय कर चुकी हैं और बंगाल में युवा पीढ़ी को नाट्य कला की शिक्षा प्रदान कर हिंदी नाट्यकला को समृद्ध कर रही हैं। उमा झुनझुनवाला द्वारा निर्देशित रेत और इंद्रधनुष नाट्य प्रस्तुति प्रसिद्ध कवयित्री डॉ शशि सहगल की बीस कविताओं का एक खूबसूरत कोलाज है जिसमें कलमकार के आंतरिक और बाहरी संघर्ष के ब्यौरे को भावों को अभिनयात्मक रूप में दर्शाया गया है। साथ ही इंद्रधनुषी रंगों से रेत होते ख्वाबों के मध्य एक नई राह की तलाश कर सकारात्मक दृष्टि से भरपूर ऊर्जा से भरा संदेश दिया गया है।इस अवसर पर कोलकाता और हावड़ा के हिंदी शिक्षक शिक्षिकाएं, विद्यार्थियों और नाटक प्रेमियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

Friday, September 9, 2022

रिपोर्ट - भवानीपुर कॉलेज में शिक्षकों को प्रणाम

भवानीपुर कॉलेज में शिक्षकों को किया प्रणाम - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा जुबली सभागार में शिक्षक दिवस का भव्य आयोजन शिक्षकों को प्रणाम कार्यक्रम किया गया। कार्यक्रम का आरंभ गणेश नृत्य से हुआ। कॉलेज के डायरेक्टर जनरल डॉ सुमन मुखर्जी ने शिक्षक दिवस पर अपना प्रेरक वक्तव्य दिया। टीआईसी डॉ पिंकी साहा सरदार ने बांग्ला कविता का पाठ किया। क्रिसेंडो इन एक्ट, फैशनिस्टा, फ्लेम क्लासिकल और वेस्टर्न ने अपने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत संगीत, फैशन, लघु नाटक, शास्त्रीय और बॉलीवुड नृत्य किए गए। इस अवसर पर वॉलंटियर्स आर्ट एंड मी के विद्यार्थियों ने शिक्षक दिवस पर सभागार की सजावट की। डीन प्रो दिलीप शाह , प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उदेशी ने कार्यक्रम संयोजन में सहभागिता की।सभी शिक्षकों को उपहार और नाश्ता दिया गया। अतिका खान और तुषिता चुगानी ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

Friday, September 2, 2022

तिरंगा है हमारी आन-बान और शान अर्चना ने मनाया अमृत महोत्सव 22

तिरंगा है हमारी आन-बान और शान अर्चना ने मनाया अमृत महोत्सव - - अर्चना संस्था ने अमृत महोत्सव के पावन अवसर पर देशभक्ति की रचनाएं सुनाई और अमृत महोत्सव वर्ष पर अपनी कलम को धार देते हुए स्वरचित रचनाओं की प्रस्तुति दी। डॉ वसुंधरा मिश्र ने 75वीं स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं देते हुए कविता आओ देश से माफी मांगें, विद्या भंडारी ने चोट है हौसला,दृढ संकल्प लीजिए हथियार बनाकर कलम को,कुछ तो नया कीजिए ।नौरतनमल भंडारी ने , तिरंगा है हमारी आन-बान और शान, हम सबको गर्व है,देश हमारा है महान कभी रूके ना,कभी झुके ना,देश हमारा।उषा श्राफ ने आज़ादी का अमृत महोत्सव आज हम मना रहे, मृदुला कोठारी ने नई उमंगे नई तरंगे नव उल्लास मनाएं, आओ हिलमिल आज तिरंगा धरती पर फहराएं, भारती मेहता ने हर भारतीय के चेहरे में पूरा भारत दिखाईं देता है ।, बनेचंद मालू नेे आजादी की कहानी कविता, हिम्मत चौरडिया प्रज्ञा ने कुण्डलिया-आजादी की आड़ ले, भूल रहा संस्कार।गीत-सागर जिसके पाँव पखारे, सुरपति करे बखान।गूँज उठे धरती पर फिर से, जय जय हिन्दुस्तान।।, सुशीला चनानी ने क्षणिकायें और गीत राजनीति का एक ही कायदा, बन जाओ सूरजमुखी का फूल, मुड़ जाओ जिधर हो फायदा, 15 अगस्त के बाद कौन करता है तिरंगे को याद।, इंदू चांडक ने गूँज उठे जल थल और नभ मेंभारत मेरा महान,स्वरचित रचनाओं की प्रस्तुति दी।संगीता चौधरी ने अमृत महोत्सव पर सभी को शुभकामनाएँ प्रेषित की। देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत कविताओं के साथ इंदु चांडक ने अॉन-लाइन जूम पर संचालन किया।धन्यवाद ज्ञापन किया सुशीला चनानी ने।

भवानीपुर कॉलेज की कैंटीन में ओपन माइक कार्यक्रम( रिपोर्ट)

भवानीपुर कॉलेज की कैंटीन में ओपन माइक--- भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने कॉलेज की पुननिर्मित आधुनिक कैंटीन में ओपन माइक कार्यक्रम में गीत, संगीत, गज़ल, शायरी और कविताओं का भरपूर आनंद लिया। यह कॉलेज में प्रथम बार है जहाँ कैंटीन में विद्यार्थियों ने अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान किया गया । प्रो दिलीप शाह ने सभी विभागों के विद्यार्थियों को उत्साहित करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की और चाय पर एक कविता सुनाई। पूरी कैंटीन में विद्यार्थियों ने फुड स्नेक्स चाय छाछ कॉफी पेस्ट्री कचौडी सब्जी आदि विभिन्न खाने-पीने की वस्तुओं को खाते हुए गीत, कविता और शायरी सुनी। कॉमर्स, पोलिटिकल साइंस, विज्ञान, अंग्रेजी आदि सभी विभागों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। गीटार पर देवांग नागर और प्रियांशु दत्ता ने अपने गीतों से सभी का मन मोह लिया। आतिका खान ने ओपन माइक का संचालन किया और संयोजन मोहम्मद शाकिर हुसैन का रहा ।हर्ष केसरी, भावना जगनानी, मसूद आतिफ, अंशु अग्रवाल, मोहम्मद फरहान अहमद, प्रियांशु शर्मा, संस्कार केसरी, अब्दुल रज्जाक, कौशल कुमार सिंह, साहिल लखमानी, राहुल कुमार यादव, नेहा मंडल, प्रियांशु दत्ता विद्यार्थियों और शिक्षकों में डॉ वसुंधरा मिश्र ने ओपन माइक में प्रमुखता से भाग लिया।स्पोर्ट्स एरिना विभाग के रूपेश गांधी की उपस्थिति रही। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

माँ (कविता)

माँ जब नहीं होती है माँ तभी बहुत याद आती है माँ यूँ तो हवा की तरह कब सांसो में आती जाती रहती थी कब पानी की तरह अपनी ममता से प्यास बुझाती रहती थी कब खाने की तरह हमारी भूख मिटाती रहती थी कुछ पता नहीं चलता था उसका होना अपने वजूद से इस कदर जुड़ा रहता था कि कभी अलगाव ही महसूस नहीं होता पर जब नहीं होती है माँ तभी बहुत याद आती है माँ आज नहीं होने पर होता है महसूस कि माँ तुम मेरे लिए चिराग जिन थी जो मेरी हर जरूरत को चुटकी में पूरा कर दिया करती थी कब कैसे नींद ना आने पर थपकियों से सुला दिया करती थी सपनों को मेरे साकार कर आकार दिया करती थी सच ही माँ तुम चिराग जिन हुआ करती थी @वसुंधरा मिश्र, 22.8.2022

Thursday, September 1, 2022

भवानीपुर में नेक्सस 22 (रिपोर्ट)

भवानीपुर कॉलेज में नेक्सस 22 का उद्घाटन किया ऋषभ कोठारी ने - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज द्वारा आयोजित दो दिवसीय नेक्सस 22 का उद्घाटन मर्चेंट चेम्बर अॉफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष ऋषभ कोठारी ने दीपमाला प्रज्वलित कर किया जिसमें कोलकाता के प्रसिद्ध चौदह कॉलेज जैसे आशुतोष कॉलेज , स्कॉटिश चर्चकॉलेज, टीएचके कॉलेज, हेरिटेज एकेडमी आदि के प्रतिनिधियों ने भी साथ दिया।यह कार्यक्रम कॉलेज के जुबली सभागार में संपन्न हुआ। दो दिन चलने वाले इस कार्यक्रम में विभिन्न इवेंट्स में बहुत ही महत्वपूर्ण और समसामयिक विषयों पर कॉलेजों के विद्यार्थियों ने प्रतिभागी बनकर हिस्सा लिया। भवानीपुर कॉलेज का विद्यार्थी आदित्य अग्रवाल बीबीए तृतीय वर्ष जिसने नेक्सस के इवेंट अपना विषय रखा फंडिंग और आर ओ आई के अंतर्गत कार्बन, फार्मिंग और कार्बन ट्रेडिंग पर अपने विचार रखे ।प्रमुख रूप से ड्रीम टू डॉन, नेक्स्ट बिग बैंकरप्सी, दी ग्रेट ओवरहॉल, सोशयल मिडिया टाइकॉन, दी सूट स्क्वाड, स्पेशल परफार्मेंस, अंडर दी हैमर, कोर्पोरेट चाणक्य आदि विभिन्न इवेंट्स रहे जिसके अंतर्गत चौदह कॉलेज के विद्यार्थियों ने भाग लिया। आशुतोष कॉलेज, टीएचके कॉलेज, जीडी बिरला हैरिटेज एकेडमी, स्कॉटिश चर्चकॉलेज, श्री शिक्षायतन कॉलेज, शिवनाथ शास्त्री कॉलेज आदि कॉलेजों ने बढ़चढ़कर भाग लिया। विनय चौधरी, अभिषेक टेकरीवाल निर्णायक मंडल में रहे ।कोर्पोरेट चाणक्य में स्कॉटिश चर्चकॉलेज, श्री शिक्षायतन कॉलेज, हेरिटेज एकेडमी, शिवनाथ शास्त्री कॉलेज,भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, मौलाना आजाद कॉलेज आदि कॉलेज की टीम ने हिस्सा लिया जिसमें कई महत्वपूर्ण प्रोडक्ट के विषयों जैसे,टाटा ग्लूको प्लस, पत्रावली, ड्रीम केक, नायज़पोड्स वायरलेस हेडफोन, प्राकट जो प्राकृतिक कटलरी पर था। निर्णायक मंडल ने मार्केटिंग, कॉस्ट और वितरण संबंधित कई प्रश्न किए । इन्स्टाग्राम पर 'हम भी इको फ्रेंडली' शीर्षक से भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों ने अपना प्रेजेंटेशन दिया जो सराहनीय रहा। टीएचके कॉलेज के विद्यार्थियों ने 'जूट वाला' प्रोडक्ट के विषय में विस्तार से जानकारी दी।गौरव बाजोरिया, सुधीर बांठिया, चंद्रेयी बागची, सिद्धार्थ मल्लिक, सृष्टि चेतनी, अंकुर चतुर्वेदी, विनय चौधरी, अभिषेक टेकरीवाल और सिद्धार्थ मल्होत्रा निर्णायक मंडल में रहे।इस दो दिवसीय नेक्सस में सत्तर से अधिक वालेन्टियर्स ने नेक्सस में होने वाले हर विषय से संबंधित प्रबंधन और व्यवस्था में योगदान दिया। अंडर दि हैमर इवेंट के अंतर्गत आईपीएल अॉपशन में ग्यारह कॉलेज की टीम के विद्यार्थियों ने बहुत ही उत्साह से भाग लिया जिसे गौरव बाजोरिया द्वारा संचालित किया गया। विद्यार्थियों को आईपीएल के खिलाड़ियों का अॉक्शन करवाया और टीम को प्रोत्साहित किया जिसकी परिकल्पना हूबहू आईपीएल के आप्शन के अनुरूप रही। कॉलेज के जुबली हॉल, कॉन्सेप्ट हॉल और प्लेसमेंट हॉल में दोनों दिन पूरे दिन कार्यक्रम चले। सभी वोलिंटियर्स, निर्णायक मंडल को लंच पेकेट भी दिए गए। चौबीस अगस्त चार बजे नेक्सस के समाप्त होने पर सभी जीते हुए विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में 350 विद्यार्थियों और चालीस से अधिक शिक्षकों और शिक्षिकाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।प्रो दिव्या ने वोलिंटियर्स की टीम का चुनाव किया और उनके कार्यों का ब्यौरा लिया। ७डीन प्रो दिलीप शाह और प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया। भवानीपुर कॉलेज, जेडी बिरला कॉलेज, शिक्षायतन कॉलेज, आशुतोष कॉलेज के विद्यार्थियों को कई प्रतियोगिता में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए प्लेसमेंट ड्राइव (रिपोर्ट)

भवानीपुर कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए प्लेसमेंट ड्राइव - - भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए प्लेसमेंट ड्राइव का आयोजन किया।इसके लिए दस कंपनियाँ मौजूद थीं। प्रमुख कंपनियों में प्लेक्सस प्रबंधन सेवाएं, जीआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड, अंत्योदय व्यावसाय प्रा। लिमिटेड, कानून बिंदु प्रकाशन, रिवर्स फैक्टर,कोफुकु टेक्नोलॉजीज प्रा. लिमिटेड, अडांसा सॉल्यूशन प्रा. लिमिटेड, लीवरेज्ड ग्रोथ प्रा. लिमिटेड, टोपुनी नेटवर्क, एरुडाइट रहीं प्लेसमेंट ड्राइव का संचालन प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो. दिव्या पी उदेशी के साथ छात्र मामलों के डीन प्रो. दिलीप शाह ने किया। कुल 153 छात्रों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से 75 को शॉर्टलिस्ट किया गया। कॉलेज उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता है।अक्षिता सूरी और डॉ वसुंधरा मिश्र ने कार्यक्रम की जानकारी दी ।

भवानीपुर कॉलेज में प्रोग्रामिंग भाषा पायथन पर परिचर्चा (रिपोर्ट)

भवानीपुर कॉलेज में प्रोग्रामिंग भाषा पायथन पर परिचर्चा - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के प्लेसमेंट हॉल में प्रोग्रामिंग भाषा पायथन पर 'पायथन का परिचय' विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। प्रारंभ में कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने उद्घाटन भाषण दिया तत्पश्चात कार्यक्रम के संयोजक नेहल मेहता ने कार्यक्रम की रूपरेखा दी। इसके बाद स्पीकर डेटा विश्लेषक धनंजय दास ने इस प्रोग्रामिंग भाषा के विषय में विस्तार से जानकारी दी जो आज के समय में आवश्यक है। डेटा संचालित निर्णय लेने के लिए डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करता है।यह कार्यक्रम पच्चीस अगस्त को सुबह किया गया। जब किसी व्यक्ति को अपने निर्णयों का समर्थन डेटा के साथ करना हो, न कि केवल पिछले अनुभवों के साथ तब इसकी उपयोगिता है। उपयोग की जाने वाली तकनीक ईआरपी बिजनेस एप्लिकेशन, इंफॉर्मेटिका, एल्टरी एक्स, एसक्यूएल सर्वर, पायथन और पावरबी कुछ नाम हैं। इन उपकरणों के संयोजन से ही व्यक्ति को डेटा प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कंपनी का लक्ष्य 5 बिलियन डॉलर प्राप्त करने का है, लेकिन वह केवल 4.5 बिलियन डॉलर ही प्राप्त कर सकती है, तो किसी को बीच की समस्या को देखना होगा। समस्या को पायथन, एक्सेल जैसे उपकरणों के माध्यम से डेटा विश्लेषण के माध्यम से डेटा की पहचान के माध्यम से हल किया जाना है। मशीन लर्निंग पिछले व्यवहार से सीख रहा है और एआईएमएल तकनीक के माध्यम से भविष्यवाणी कर रहा है। परीक्षण परिकल्पनाओं के माध्यम से आउटपुट के प्रति उत्तेजनाओं की प्रतिक्रिया के माध्यम से ग्राहक सेवा में सुधार किया जा सकता है। बिजनेस सिमुलेशन आउटपुट बनाने के लिए इनपुट का एक संयोजन है। प्रोग्रामिंग भाषा पायथन का आविष्कार 1991 में किया गया था। यह नाम एक प्रचलित टेलीविजन शो पर आधारित था। पायथन एक उच्च-स्तरीय, व्याख्या की गई, वस्तु उन्मुख और अधिक उद्देश्य वाली प्रोग्रामिंग भाषा है। 2008 पायथन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इसके बाद इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा। गुइडो वैन रोसुम द्वारा विकसित इस कोडिंग प्रोग्राम ने इसके उपयोग ने जावा को भी पीछे छोड़ दिया। पायथन एक बहुउद्देशीय कोडिंग एप्लिकेशन है जिसका उपयोग वेब डेवलपमेंट, डेटा एनालिटिक्स, एंड्रॉइड डेवलपमेंट के लिए किया जाता है। पायथन का उपयोग करना आसान है, इसमें संसाधन उपलब्धता है, यह बहु-इंटरफ़ेस और ओपनसोर्स है। सैद्धांतिक पहलुओं के बाद वक्ताओं ने विद्यार्थियों को पायथन की आवेदन प्रक्रिया के विषय में समझाया। अंत में वक्ताओं ने विद्यार्थियों के पायथन संबंधित भ्रमों का भी समाधान किया। हॉल में उपस्थित सौ से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। डॉ वसुंधरा मिश्र ने अतिथि वक्ता का कॉलेज मोमेंटो प्रदान कर स्वागत किया।

Monday, August 8, 2022

कविता वाट्सप की महिमा

माँ तुम्हारा ध्यान कहाँ है? अरे मैंने पूछा कहाँ हो? तुम्हारे ठीक आगे दूध-की-बोतल कहाँ है वह तो तुम्हारे मुंँह से लगी है तुम दूध पियो, मैं वाट्सप देख लूँ बच्चा और दूध-की-बोतल का बेलेंस बिगड़ गया दूध कहीं बच्चा कहीं माँ वाट्सप पर मानसिक खुराक लेने में व्यस्त टाइमर सेट नहीं किया इससे तो अच्छा होता बच्चा वर्चुअल ही दूध पी लेता बोतल खिसक गई, बच्चा रोने लगा माँ ने तकिये को मुंह समझ उसी में बोतल घूसेड दी वाह रे वाट्सप बच्चे का बचपन भी वर्चुअल लगा एक कार्टून जैसा बच्चा लगा बच्चा उछल कर मोबाइल छीन ले और दूध-की-बोतल माँ के मुंँह में लगा दे और वाट्सप करने लगे।

आई सावनिए री तीज अर्चना संस्था गोष्ठी 2022

कभी टप टप तो कभी मूसलाधार - - अर्चना संस्था ने किया वर्षा का स्वागत - - अर्चना संस्था की ओर से आयोजित गोष्ठी में अर्चना संस्था के सदस्यों ने वर्षा ऋतु का स्वागत करते हुए अपनी-अपनी स्वरचित रचनाएँ और गीत पढे़।इंदू चांडक ने मनहरण छंद बरखा बहार आई, हरियाली मन भाई मन मोर नाच रहा,आई ऋतु रानी, उमड़ घुमड़ कर रुमझुम रुमझुम बदरा छाए आज गगन में, मृदुला कोठारी ने सतरंगी सावनी गोष्ठी में नन्हे काले भूरे बादल झूम रहे मेरे गांव में, राजस्थानी गीत आई आई सावनिए री तीज, मीना दूगड़ ने सावन का महिना हरितिमा की बौछार, प्रकृति रमणी ने सजे सोलह श्रंगार, बनेचंद मालू नेे कभी टप टप , तो कभी मूसलाधार, हिम्मत चोरडिया ने, कुण्डलिया मेघ बजाते ढ़ोल अब, जागो रे इंसान।सुशीला चनानी ने ,दोहा सावन की सखी क्या कहूँ ,अजब निराला ढंग, शशि कंकानी ने प्यार के रिश्तो से बंँधकर, गहरा हो जाता है राखी का रंग, डॉ वसुंधरा मिश्र ने बारिश से पहले और बारिश के बाद कविता सुनाई। कार्यक्रम का संचालन किया इंदू चांडक ने और धन्यवाद ज्ञापन किया मृदुला कोठारी ने। सभी उपस्थित सदस्यों ने जूम अॉन-लाइन पर वर्षा ऋतु के मनोहारी प्रकृति के साथ अपने भावों को जोड़ते हुए स्वरचित रचनाएँ पढी़ंऔर गीतों की प्रस्तुति दी।

हिंदी हमसे है हम हिंदी से हैं

हिंदी सरल और ग्राह्य भाषा है जो सहज ही सबके हृदय में बस जाती है। हिंदी सबको आंतरिक और बाह्य रूप से मिलाने वाली भाषा है। मातृभूमि की ऋषि गंध है, अखंडता का पावन प्रदीप है। ऋग्वेद की वाणी 'भारततीभिः भारती सजोषा' को चरितार्थ करती है हिंदी। भारत के दक्षिण से उत्तर की ओर हिंदी ही रही जो हमारी भावनाओं को जोड़ती रही। कबीर ने कहा है' भाषा बहता नीर' । जायसी ने कहा- 'तुरकी अरबी हिंदुई भाषा जेती आहि, जेहि मह मारग प्रेम का सबै सराहे ताहि।' हिंदी सचमुच प्रेम का मारग रही है। हिंदी तो जबां है हमारी, कहने न लगे हमन कूँ मारी। कवि गरीब 18वीं सदी में कहते हैं-' हिंदी पर ना मारो ताना सभी बतावें हिंदी माना यह जो है कुरान खुदा का हिंदी करें बयान सदा का। ' केरल, आंध्र, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल और पूरे उत्तर भारत में गैर हिंदी राज्यों में हिंदी साहित्य के साथ संपर्क स्थापित करने वाली भाषा हिंदी ही है। 14 सितंबर 1953 से पूरे देश में हिंदी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। राजभाषा होते हुए भी आज पूरे विश्व में भी तीसरे नम्बर पर बोलने वाली भाषा है। सही कहा है - 'कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमांँ हमारा' भारत के संविधान में भी अनुच्छेद 343 के अंतर्गत ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है । लेकिन अपनी लोकप्रियता के कारण अपनी हृदय ग्रहिता के कारण आज पूरे देश के साथ विश्व में भी अपना स्थान रखती है। भारतेंदु ने बहुत पहले ही कहा था - ' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय की शूल' सन्मार्ग के संस्थापक राम अवतार गुप्त जी को अपनी भाषा के प्रति प्रेम था और आज उनके नाम पर यह हिंदी पुरस्कार हर भारतीय नागरिक के लिए गौरव की बात है। भावी पीढ़ी ही भाषा को सुरक्षित और संरक्षित करने का काम करेंगे। - हिंदी में हम जीते हैं हिंदी से हम ऊंँचे हैं हिंदी सबकी अपनी है भाषा ही तो जोड़े हैं नहीं तो सब कुछ भ्रम है आओ भूल राजनीति को भाषा को मन से अपनाएँ हम भाषा से भाषा है हम से पूछने अमीर गरीब सब से हाथ मिलाते हिंदी और जोड़े हिंदी से सबको मान बढ़ाएं हिंदी के हम हिंदी हमसे @वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 30,7,22

मैं बिरसा मुंडा 2022 श्रद्धांजलि

मैं बिरसा मुंडा एक भारतीय आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक नेता और लोक नायक हूँ। मैं मुंडा जनजाति का हूँ । मैंने ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं शताब्दी के अंत में बंगाल प्रेसीडेंसी (अब झारखंड ) में पैदा हुआ और एक आदिवासी धार्मिक सहस्राब्दी आंदोलन का नेतृत्व किया , जिससे मैं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया । विद्रोह मुख्य रूप से खूंटी के मुंडा बेल्ट में केंद्रित था , तामार , सरवाड़ा और बंदगांव। 15 नवंबर 1875 उलिहातु , लोहरदगा जिला , बंगाल प्रेसीडेंसी (अब खूंटी जिला , झारखंड ) में मेरा जन्म हुआ और 9 जून 1900 (उम्र 24) रांची जेल, लोहरदगा जिला , बंगाल प्रेसीडेंसी (अब रांची जिले , झारखंड में मृत्यु हुई। मैंने अपने शिक्षक जयपाल नाग के मार्गदर्शन में सलगा में अपनी शिक्षा प्राप्त की। बाद में, बिरसा जर्मन मिशन स्कूल में शामिल होने के लिए एक ईसाई में परिवर्तित हो गया , लेकिन जल्द ही मुझे यह पता चला कि अंग्रेज शिक्षा के माध्यम से आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का लक्ष्य बना रहे हैं । स्कूल छोड़ने के बाद, मैंने 'बिरसैत' नामक एक धर्म का निर्माण किया। मुंडा समुदाय के सदस्य जल्द ही इस विश्वास में शामिल होने लगे जो बदले में ब्रिटिश बातचीत गतिविधियों के लिए एक चुनौती बन गया। मुंडा विद्रोह का कारण था 'औपनिवेशिक और स्थानीय अधिकारियों द्वारा अनुचित भूमि हथियाने की प्रथा जिसने आदिवासी पारंपरिक भूमि व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया'था। मुझे ईसाई मिशनरियों को चुनौती देने और मुंडा एवं उरांव समुदायों के साथ-साथ धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए जाना जाता है। उलिहातु मेरे पिता सुगना मुंडा का जन्मस्थान था। उलिहातु का दावा गांव में रहने वाले मेरे बड़े भाई कोमता मुंडा पर टिका है, जहांँ उनका घर अभी भी जर्जर हालत में मौजूद है। मेरे पिता, माता करमी हाटू, और छोटा भाई, पासना मुंडा, उलिहातु को छोड़कर बीरबंकी के पास कुरुम्बडा, मजदूरों (साझेदारी) या फसल-भागीदार (रैयत) के रूप में रोजगार की तलाश में चले गए । कुरुम्बडा में, मेरे बड़े भाई, कोमटा और उनकी बहन, दासकिर का जन्म हुआ। वहाँ से परिवार बंबा चला गया जहांँ मेरी बड़ी बहन चंपा का जन्म हुआ। मेरा प्रारंभिक वर्ष मेरे माता-पिता के साथ चलकड़ में ही व्यतीत हुआ। मैं भी एक औसत मुंडा बच्चे की तरह पला बढ़ा। मैं अपने दोस्तों के साथ रेत और धूल में लुढ़कता और खेलता था ,बड़े होने पर मैं मजबूत और सुंदर दिखता था । मैं भी बोहोंडा के जंगल में भेड़ चराता था। जब मैं बड़ा हुआ तो मुझे बाँसुरी बजाने में रुचि थी,बाद में बाँसुरी वादक भी बना। मैं अपने हाथ में कद्दू से बना एक तार वाला तुइला और कमर से जुड़ी बांँसुरी लेकर घूमता था । मेरे बचपन के रोमांचक पल अखाड़े (गांव का कुश्ती मैदान) में बीते। गरीबी के कारण मैं मामा के गांव अयुभातु गया। कोमता मुंडा, मेरा सबसे बड़ा भाई, जो दस वर्ष का था, कुंडी बारटोली गया, मुंडा सेवा की , शादी भी की और वहाँ आठ साल तक रहे, और फिर पिता और छोटे भाई के साथ चलकड़ चले गए। अयुभातु में मैं दो वर्ष तक जीवित रहा । वहाँ जयपाल नाग नाम के सलगा में स्कूल जाता था। मेरी मौसी जोनी मुझसे बहुत प्यार करती थी, तब उसकी शादी हुई थी, उसके नए घर खटंगा में साथ आया था । उस समय मैं एक ईसाई मिशनरी के संपर्क में आया, जिसने गाँव के कुछ परिवारों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। मैं बहुत जल्द समझ गया था कि ईसाई मिशनरी आदिवासियों को ईसाई बना रहे हैं। मैंने जल्द ही ईसाई मिशनरियों को चुनौती देना शुरू कर दिया। मुंडा एवं उरांव समुदायों के साथ होने वाले धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। मैं पढ़ाई में बहुत तेज था , जयपाल नाग ने मुझे जर्मन मिशन स्कूल में दाखिल करवा दिया और ईसाई धर्म में धर्मांतरित करवा दिया । वहाँ मेरा नाम बदलकर बिरसा डेविड कर दिया गया, जो बाद में बिरसा दाऊद बन गया। कुछ वर्षों तक अध्ययन करने के बाद मैंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया। मेरा चित्र भारतीय संसद संग्रहालय में लटका हुआ है । मुझे पारंपरिक आदिवासी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है, जो ईसाई मिशनरी कार्यों से बिल्कुल ही अलग था। मेरे संप्रदाय के तहत कई आदिवासी पहले ही ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके थे। मैंने चर्च और उसकी प्रथाओं जैसे करों और धार्मिक रूपांतरणों का विरोध और आलोचना की। मैं स्वयं एक प्रचारक और उनके पारंपरिक आदिवासी धर्म के प्रतिनिधि बन गया , और जल्द ही, मैंने एक मरहम लगाने वाले, एक चमत्कार-कार्यकर्ता और एक उपदेशक की प्रतिष्ठा बना ली। मुंडा, उरांव और खरियासीउसे देखने और अपनी बीमारियों से ठीक होने के लिए चलकड़ के पास आए। बरवाड़ी और चेचरी तक उरांव और मुंडा दोनों की आबादी बिरसाइयों के प्रति आश्वस्त हो गई। मेरे समय में और बाद के लोक गीत में मेरा और अपने लोगों का जबरदस्त प्रभाव रहा। ये लोकगीत बहुत आनंद और उम्मीद जगाते थे। उस समय हर किसी की जुबान पर धरती आबा का नाम था। मैंने मूल पारंपरिक आदिवासी धार्मिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने की सलाह देना आरंभ किया। मेरी शिक्षाओं से प्रभावित होकर, आदिवासी लोग मुझे संत रूप में मानने लगे और वे मेरा आशीर्वाद मांगते। मेरा यह नारा ब्रिटिश राज के लिए खतरा बन गया था - - अबुआ राज ते जाना, महारानी राज टुंडू जाना ("रानी का राज्य समाप्त हो जाए और हमारा राज्य स्थापित हो जाए") आज भी झारखंड , ओडिशा , बिहार , पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में याद किया जाता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने आदिवासी कृषि व्यवस्था के एक सामंती राज्य में परिवर्तन को तेज कर दिया । आदिवासी अपनी आदिम तकनीक से उन्नति नहीं कर पा रहे थे , इसलिए गैर-आदिवासी किसानों को छोटानागपुर के प्रमुखों द्वारा भूमि पर बसने और खेती करने के लिए आमंत्रित किया गया था। इससे आदिवासियों की जमीन का बंटवारा हो गया। ठिकादारों का नया वर्ग अधिक लालची किस्म का था और अपनी संपत्ति का अधिकतम लाभ उठाने के लिए उत्सुक था। 1856 में जागीर लगभग 600 थे, और वे एक गाँव से 150 गाँवों तक थे। लेकिन 1874 तक, पुराने मुंडा या उरांव प्रमुखों के अधिकार को लगभग पूरी तरह से किसानों के अधिकार से हटा दिया गया था, जिसे जमींदारों द्वारा पेश किया गया था। कुछ गांवों में, वे अपने मालिकाना अधिकार पूरी तरह से खो चुके थे और खेत मजदूरों की स्थिति में सिमट गए थे। कृषि टूटने और संस्कृति परिवर्तन के लिए मैंने मुंडा के साथ उनके नेतृत्व में विद्रोहों और विद्रोहों की एक श्रृंखला के माध्यम से जवाब दिया। 1895 में, तामार के चलकड़ गांव में , मैंने ईसाई धर्म का त्याग कर दिया, अपने साथी आदिवासियों को केवल एक भगवान की पूजा करने और बोंगा की पूजा छोड़ने के लिए कहा । मैंने खुद को एक नबी घोषित किया जो हमारे खोए हुए राज्य को वापस पाने के लिए आया था। मैंने कहा कि अब महारानी विक्टोरिया का शासन समाप्त हो गया और मुंडा राज शुरू हो गया है । उन्होंने रैयतों (किसानों) को कोई लगान न देने का आदेश दिया । मुंडाओं ने मुझे धरती का पिता धरती आबा कहा। एक अफवाह के कारण कि मेरी आज्ञा का पालन नहीं करने वालों की हत्या कर दी जाएगी इस कारण मुझे 24 अगस्त 1895 को गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल की कैद की सजा सुनाई गई। 28 जनवरी 1898 को, जेल से रिहा होने के बाद, मैं अपने अनुयायियों के साथ रिकॉर्ड इकट्ठा करने और मंदिर के साथ नस्लीय संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिए चुटिया गया । मैंने कहा कि मंदिर कोल का है । ईसाई मिशनरी मुझे और मेरे अनुयायियों को गिरफ्तार करना चाहते थे, जो धर्मान्तरित करने के लिए बाधा बने थे। इस कारण मैं दो साल के लिए भूमिगत हो गया और कई गुप्त बैठकों में भाग लिया। ऐसा कहा जाता है कि 1899 के क्रिसमस के आसपास लगभग 7000 पुरुष और महिलाएं उलगुलान (क्रांति) की शुरुआत करने के लिए इकट्ठे हुए थे, जो जल्द ही खूंटी , तामार , बसिया और रांची में फैल गया । मुर्हू में एंग्लिकन मिशन और सरवाड़ा में रोमन कैथोलिक मिशन मुख्य लक्ष्य थे। बिरसैट ने खुले तौर पर घोषणा की कि असली दुश्मन ब्रिटिश थे न कि ईसाई मुंडा और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक युद्ध का आह्वान किया। दो साल तक उन्होंने अंग्रेजों के प्रति वफादार जगहों पर हमला किया। 5 जनवरी 1900 को एतकेडीह में बिरसा के अनुयायियों ने दो पुलिस कांस्टेबलों की हत्या कर दी। 7 जनवरी को, उन्होंने खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला किया, एक कांस्टेबल की हत्या कर दी और स्थानीय दुकानदारों के घरों को तोड़ दिया। स्थानीय आयुक्त, ए. फोब्स, और उपायुक्त, एचसी स्ट्रीटफील्ड, बढ़ते विद्रोह को दबाने के लिए 150 लोगों के बल के साथ खूंटी पहुंचे। औपनिवेशिक प्रशासन ने मुझ पर पर 500 रुपये का इनाम भी रखा था। फोब्स और स्ट्रेटफील्ड की कमान के तहत सैनिकों ने डंबरी हिल पर मुंडा के छापामारों पर हमला किया और उन्हें हराया , हालांकि मुंडा खुद सिंहबम पहाड़ियों में भाग गए। मुझे चक्रधरपुर के जामकोपई जंगल में 3 फरवरी 1900 को गिरफ्तार किया गया था। उपायुक्त रांची के अनुसार, पत्र के माध्यम से, 15 विभिन्न आपराधिक मामलों में 460 आदिवासियों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से 63 को दोषी ठहराया गया था। एक को मौत की सजा, 39 को आजीवन कारावास और 23 को चौदह साल तक की कैद की सजा सुनाई गई थी। मुकदमे के दौरान जेल में मेरी और मेरे साथ छह मुंडा लोगों की मौतें हुईं। जेल में ही 9 जून 1900 को जेल में मेरी मृत्यु हो गई। मेरी मृत्यु के बाद, आंदोलन फीका पड़ गया। 1908 में, औपनिवेशिक सरकार ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT) पेश किया, जो आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगाता है। 1988 में भारत के टिकट पर बिरसा मुंडा केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 नवंबर 2021 को हुई एक बैठक में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद करने के लिए 15 नवंबर, बिरसा मुंडा की जयंती, जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने के लिए मतदान किया। उनकी जयंती अभी भी कर्नाटक में मैसूर और कोडागु जिलों के रूप में आदिवासी लोगों द्वारा मनाई जाती है। आधिकारिक उत्सव झारखंड की राजधानी रांची के कोकर पड़ोस में उनके समाधि स्थल (मकबरे) में होता है । आज, उनके नाम पर कई संगठन, निकाय और संरचनाएं हैं, विशेष रूप से बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रांची, बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सिंदरी , बिरसा मुंडा वनवासी छत्रवास, कानपुर, सिद्धो कान्हो बिरशा विश्वविद्यालय , पुरुलिया और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय । बिहार रेजिमेंट की जंग (बिरसा मुंडा की जीत) है। 2004 में, एक हिंदी फिल्म, उलगुलान-एक क्रांति ( क्रांति ) अशोक सरन द्वारा बनाई गई थी। दीपराज राणा ने फिल्म में बिरसा मुंडा की भूमिका निभाई, और 500 बिरसा (बिरसा के अनुयायी) अतिरिक्त के रूप में दिखाई दिए। [23] राजेश मित्तल की एक और फिल्म, बिरसा मुंडा - द ब्लैक आयरन मैन , उसी वर्ष रिलीज़ हुई थी। [24] 2008 में, बिरसा के जीवन पर आधारित एक हिंदी फिल्म, गांधी से पहले गांधी ( गांधी से पहले गांधी ), उसी नाम के अपमैं बिरसा मुंडा एक भारतीय आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक नेता और लोक नायक हूँ। मैं मुंडा जनजाति का हूँ । मैंने ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं शताब्दी के अंत में बंगाल प्रेसीडेंसी (अब झारखंड ) में पैदा हुआ और एक आदिवासी धार्मिक सहस्राब्दी आंदोलन का नेतृत्व किया , जिससे मैं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया । विद्रोह मुख्य रूप से खूंटी के मुंडा बेल्ट में केंद्रित था , तामार , सरवाड़ा और बंदगांव। 15 नवंबर 1875 उलिहातु , लोहरदगा जिला , बंगाल प्रेसीडेंसी (अब खूंटी जिला , झारखंड ) में मेरा जन्म हुआ और 9 जून 1900 (उम्र 24) रांची जेल, लोहरदगा जिला , बंगाल प्रेसीडेंसी (अब रांची जिले , झारखंड में मृत्यु हुई। मैंने अपने शिक्षक जयपाल नाग के मार्गदर्शन में सलगा में अपनी शिक्षा प्राप्त की। बाद में, बिरसा जर्मन मिशन स्कूल में शामिल होने के लिए एक ईसाई में परिवर्तित हो गया , लेकिन जल्द ही मुझे यह पता चला कि अंग्रेज शिक्षा के माध्यम से आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का लक्ष्य बना रहे हैं । स्कूल छोड़ने के बाद, मैंने 'बिरसैत' नामक एक धर्म का निर्माण किया। मुंडा समुदाय के सदस्य जल्द ही इस विश्वास में शामिल होने लगे जो बदले में ब्रिटिश बातचीत गतिविधियों के लिए एक चुनौती बन गया। मुंडा विद्रोह का कारण था 'औपनिवेशिक और स्थानीय अधिकारियों द्वारा अनुचित भूमि हथियाने की प्रथा जिसने आदिवासी पारंपरिक भूमि व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया'था। मुझे ईसाई मिशनरियों को चुनौती देने और मुंडा एवं उरांव समुदायों के साथ-साथ धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए जाना जाता है। उलिहातु मेरे पिता सुगना मुंडा का जन्मस्थान था। उलिहातु का दावा गांव में रहने वाले मेरे बड़े भाई कोमता मुंडा पर टिका है, जहांँ उनका घर अभी भी जर्जर हालत में मौजूद है। मेरे पिता, माता करमी हाटू, और छोटा भाई, पासना मुंडा, उलिहातु को छोड़कर बीरबंकी के पास कुरुम्बडा, मजदूरों (साझेदारी) या फसल-भागीदार (रैयत) के रूप में रोजगार की तलाश में चले गए । कुरुम्बडा में, मेरे बड़े भाई, कोमटा और उनकी बहन, दासकिर का जन्म हुआ। वहाँ से परिवार बंबा चला गया जहांँ मेरी बड़ी बहन चंपा का जन्म हुआ। मेरा प्रारंभिक वर्ष मेरे माता-पिता के साथ चलकड़ में ही व्यतीत हुआ। मैं भी एक औसत मुंडा बच्चे की तरह पला बढ़ा। मैं अपने दोस्तों के साथ रेत और धूल में लुढ़कता और खेलता था ,बड़े होने पर मैं मजबूत और सुंदर दिखता था । मैं भी बोहोंडा के जंगल में भेड़ चराता था। जब मैं बड़ा हुआ तो मुझे बाँसुरी बजाने में रुचि थी,बाद में बाँसुरी वादक भी बना। मैं अपने हाथ में कद्दू से बना एक तार वाला तुइला और कमर से जुड़ी बांँसुरी लेकर घूमता था । मेरे बचपन के रोमांचक पल अखाड़े (गांव का कुश्ती मैदान) में बीते। गरीबी के कारण मैं मामा के गांव अयुभातु गया। कोमता मुंडा, मेरा सबसे बड़ा भाई, जो दस वर्ष का था, कुंडी बारटोली गया, मुंडा सेवा की , शादी भी की और वहाँ आठ साल तक रहे, और फिर पिता और छोटे भाई के साथ चलकड़ चले गए। अयुभातु में मैं दो वर्ष तक जीवित रहा । वहाँ जयपाल नाग नाम के सलगा में स्कूल जाता था। मेरी मौसी जोनी मुझसे बहुत प्यार करती थी, तब उसकी शादी हुई थी, उसके नए घर खटंगा में साथ आया था । उस समय मैं एक ईसाई मिशनरी के संपर्क में आया, जिसने गाँव के कुछ परिवारों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। मैं बहुत जल्द समझ गया था कि ईसाई मिशनरी आदिवासियों को ईसाई बना रहे हैं। मैंने जल्द ही ईसाई मिशनरियों को चुनौती देना शुरू कर दिया। मुंडा एवं उरांव समुदायों के साथ होने वाले धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। मैं पढ़ाई में बहुत तेज था , जयपाल नाग ने मुझे जर्मन मिशन स्कूल में दाखिल करवा दिया और ईसाई धर्म में धर्मांतरित करवा दिया । वहाँ मेरा नाम बदलकर बिरसा डेविड कर दिया गया, जो बाद में बिरसा दाऊद बन गया। कुछ वर्षों तक अध्ययन करने के बाद मैंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया। मेरा चित्र भारतीय संसद संग्रहालय में लटका हुआ है । मुझे पारंपरिक आदिवासी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है, जो ईसाई मिशनरी कार्यों से बिल्कुल ही अलग था। मेरे संप्रदाय के तहत कई आदिवासी पहले ही ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके थे। मैंने चर्च और उसकी प्रथाओं जैसे करों और धार्मिक रूपांतरणों का विरोध और आलोचना की। मैं स्वयं एक प्रचारक और उनके पारंपरिक आदिवासी धर्म के प्रतिनिधि बन गया , और जल्द ही, मैंने एक मरहम लगाने वाले, एक चमत्कार-कार्यकर्ता और एक उपदेशक की प्रतिष्ठा बना ली। मुंडा, उरांव और खरियासीउसे देखने और अपनी बीमारियों से ठीक होने के लिए चलकड़ के पास आए। बरवाड़ी और चेचरी तक उरांव और मुंडा दोनों की आबादी बिरसाइयों के प्रति आश्वस्त हो गई। मेरे समय में और बाद के लोक गीत में मेरा और अपने लोगों का जबरदस्त प्रभाव रहा। ये लोकगीत बहुत आनंद और उम्मीद जगाते थे। उस समय हर किसी की जुबान पर धरती आबा का नाम था। मैंने मूल पारंपरिक आदिवासी धार्मिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने की सलाह देना आरंभ किया। मेरी शिक्षाओं से प्रभावित होकर, आदिवासी लोग मुझे संत रूप में मानने लगे और वे मेरा आशीर्वाद मांगते। मेरा यह नारा ब्रिटिश राज के लिए खतरा बन गया था - - अबुआ राज ते जाना, महारानी राज टुंडू जाना ("रानी का राज्य समाप्त हो जाए और हमारा राज्य स्थापित हो जाए") आज भी झारखंड , ओडिशा , बिहार , पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में याद किया जाता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने आदिवासी कृषि व्यवस्था के एक सामंती राज्य में परिवर्तन को तेज कर दिया । आदिवासी अपनी आदिम तकनीक से उन्नति नहीं कर पा रहे थे , इसलिए गैर-आदिवासी किसानों को छोटानागपुर के प्रमुखों द्वारा भूमि पर बसने और खेती करने के लिए आमंत्रित किया गया था। इससे आदिवासियों की जमीन का बंटवारा हो गया। ठिकादारों का नया वर्ग अधिक लालची किस्म का था और अपनी संपत्ति का अधिकतम लाभ उठाने के लिए उत्सुक था। 1856 में जागीर लगभग 600 थे, और वे एक गाँव से 150 गाँवों तक थे। लेकिन 1874 तक, पुराने मुंडा या उरांव प्रमुखों के अधिकार को लगभग पूरी तरह से किसानों के अधिकार से हटा दिया गया था, जिसे जमींदारों द्वारा पेश किया गया था। कुछ गांवों में, वे अपने मालिकाना अधिकार पूरी तरह से खो चुके थे और खेत मजदूरों की स्थिति में सिमट गए थे। कृषि टूटने और संस्कृति परिवर्तन के लिए मैंने मुंडा के साथ उनके नेतृत्व में विद्रोहों और विद्रोहों की एक श्रृंखला के माध्यम से जवाब दिया। 1895 में, तामार के चलकड़ गांव में , मैंने ईसाई धर्म का त्याग कर दिया, अपने साथी आदिवासियों को केवल एक भगवान की पूजा करने और बोंगा की पूजा छोड़ने के लिए कहा । मैंने खुद को एक नबी घोषित किया जो हमारे खोए हुए राज्य को वापस पाने के लिए आया था। मैंने कहा कि अब महारानी विक्टोरिया का शासन समाप्त हो गया और मुंडा राज शुरू हो गया है । उन्होंने रैयतों (किसानों) को कोई लगान न देने का आदेश दिया । मुंडाओं ने मुझे धरती का पिता धरती आबा कहा। एक अफवाह के कारण कि मेरी आज्ञा का पालन नहीं करने वालों की हत्या कर दी जाएगी इस कारण मुझे 24 अगस्त 1895 को गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल की कैद की सजा सुनाई गई। 28 जनवरी 1898 को, जेल से रिहा होने के बाद, मैं अपने अनुयायियों के साथ रिकॉर्ड इकट्ठा करने और मंदिर के साथ नस्लीय संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिए चुटिया गया । मैंने कहा कि मंदिर कोल का है । ईसाई मिशनरी मुझे और मेरे अनुयायियों को गिरफ्तार करना चाहते थे, जो धर्मान्तरित करने के लिए बाधा बने थे। इस कारण मैं दो साल के लिए भूमिगत हो गया और कई गुप्त बैठकों में भाग लिया। ऐसा कहा जाता है कि 1899 के क्रिसमस के आसपास लगभग 7000 पुरुष और महिलाएं उलगुलान (क्रांति) की शुरुआत करने के लिए इकट्ठे हुए थे, जो जल्द ही खूंटी , तामार , बसिया और रांची में फैल गया । मुर्हू में एंग्लिकन मिशन और सरवाड़ा में रोमन कैथोलिक मिशन मुख्य लक्ष्य थे। बिरसैट ने खुले तौर पर घोषणा की कि असली दुश्मन ब्रिटिश थे न कि ईसाई मुंडा और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक युद्ध का आह्वान किया। दो साल तक उन्होंने अंग्रेजों के प्रति वफादार जगहों पर हमला किया। 5 जनवरी 1900 को एतकेडीह में बिरसा के अनुयायियों ने दो पुलिस कांस्टेबलों की हत्या कर दी। 7 जनवरी को, उन्होंने खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला किया, एक कांस्टेबल की हत्या कर दी और स्थानीय दुकानदारों के घरों को तोड़ दिया। स्थानीय आयुक्त, ए. फोब्स, और उपायुक्त, एचसी स्ट्रीटफील्ड, बढ़ते विद्रोह को दबाने के लिए 150 लोगों के बल के साथ खूंटी पहुंचे। औपनिवेशिक प्रशासन ने मुझ पर पर 500 रुपये का इनाम भी रखा था। फोब्स और स्ट्रेटफील्ड की कमान के तहत सैनिकों ने डंबरी हिल पर मुंडा के छापामारों पर हमला किया और उन्हें हराया , हालांकि मुंडा खुद सिंहबम पहाड़ियों में भाग गए। मुझे चक्रधरपुर के जामकोपई जंगल में 3 फरवरी 1900 को गिरफ्तार किया गया था। उपायुक्त रांची के अनुसार, पत्र के माध्यम से, 15 विभिन्न आपराधिक मामलों में 460 आदिवासियों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से 63 को दोषी ठहराया गया था। एक को मौत की सजा, 39 को आजीवन कारावास और 23 को चौदह साल तक की कैद की सजा सुनाई गई थी। मुकदमे के दौरान जेल में मेरी और मेरे साथ छह मुंडा लोगों की मौतें हुईं। जेल में ही 9 जून 1900 को जेल में मेरी मृत्यु हो गई। मेरी मृत्यु के बाद, आंदोलन फीका पड़ गया। 1908 में, औपनिवेशिक सरकार ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT) पेश किया, जो आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगाता है। 1988 में भारत के टिकट पर बिरसा मुंडा केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 नवंबर 2021 को हुई एक बैठक में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद करने के लिए 15 नवंबर, बिरसा मुंडा की जयंती, जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने के लिए मतदान किया। उनकी जयंती अभी भी कर्नाटक में मैसूर और कोडागु जिलों के रूप में आदिवासी लोगों द्वारा मनाई जाती है। आधिकारिक उत्सव झारखंड की राजधानी रांची के कोकर पड़ोस में उनके समाधि स्थल (मकबरे) में होता है । आज, उनके नाम पर कई संगठन, निकाय और संरचनाएं हैं, विशेष रूप से बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रांची, बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सिंदरी , बिरसा मुंडा वनवासी छत्रवास, कानपुर, सिद्धो कान्हो बिरशा विश्वविद्यालय , पुरुलिया और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय । बिहार रेजिमेंट की जंग (बिरसा मुंडा की जीत) है। 2004 में, एक हिंदी फिल्म, उलगुलान-एक क्रांति ( क्रांति ) अशोक सरन द्वारा बनाई गई थी। दीपराज राणा ने फिल्म में बिरसा मुंडा की भूमिका निभाई, और 500 बिरसा (बिरसा के अनुयायी) अतिरिक्त के रूप में दिखाई दिए। [23] राजेश मित्तल की एक और फिल्म, बिरसा मुंडा - द ब्लैक आयरन मैन , उसी वर्ष रिलीज़ हुई थी। [24] 2008 में, बिरसा के जीवन पर आधारित एक हिंदी फिल्म, गांधी से पहले गांधी ( गांधी से पहले गांधी ), उसी नाम के अपने उपन्यास पर आधारित इकबाल दुर्रान द्वारा निर्देशित थी। [25] भगवान बिरसा मुंडा , राजन खोसा की एक भारतीय जीवनी पर आधारित लघु फिल्म , 2020 में रिलीज़ हुई थी। [26] रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता, लेखिका-कार्यकर्ता महाश्वेता देवी की ऐतिहासिक कथा, अरण्यर अधिकार (वन का अधिकार, 1977), एक उपन्यास जिसके लिए उन्होंने 1979 में बंगाली के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता , उनके जीवन और मुंडा विद्रोह पर आधारित है। 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश राज के खिलाफ ; बाद में उन्होंने एक संक्षिप्त संस्करण, बिरसा मुंडा, विशेष रूप से युवा पाठकों के लिए लिखा। [27] उलगुलान की मूर्ति झारखंड में बिरसा मुंडा की प्रस्तावित 150 फुट ऊंची प्रतिमा है जिसे इस क्षेत्र के घरों से एकत्र किए गए पत्थरों से बनाया जाएगा। [28] रांची में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ का वार्षिक कॉलेज उत्सव उलगुलान, बिरसा मुंडा के स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित है। अराम के निर्देशक गोपी नैनार, बिरसा मुंडा के जीवन पर तमिल में एक फिल्म का निर्देशन करने के लिए तैयार हैं। जाने-माने तमिल निर्देशक और जाति-विरोधी कार्यकर्ता पा. रंजीत एक हिंदी फिल्म का निर्देशन करेंगे जो बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित है। मेरे नाम से निम्नलिखित संस्थान और संगठन हैं : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय बिरसा प्रौद्योगिकी संस्थान बिरसा कॉलेज, खूंटीक बिरसा प्रौद्योगिकी संस्थान सिंदरी सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका सिद्धो कान्हो बिरशा विश्वविद्यालय बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम बिरसा मुंडा हवाई अड्डा बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल बिरसा सेवा दल , एक विवादास्पद निष्क्रिय संगठन बिरसा मुंडा जनजातीय विश्वविद्यालय

Thursday, July 21, 2022

साहित्यिकी में अध्यक्षीय वक्तव्य

साहित्यिकी संस्था में अध्यक्षीय वक्तव्य - - - साहित्यिकी संस्था की मैं हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मुझे यह गुरुभार दिया। आदरणीय रेणु गौरीसरिया जी और प्रमिला धूपिया जी को प्रणाम करती हूँ जिन्होनें अपनी रचनात्मकता से हम सभी को समृद्ध किया। यह सच है कि किसी भी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को पूर्णतया समझना कठिन कार्य है। एक लेखक जिस समय जैसी रचना लिख जाता है बाद में पढ़कर स्वयं भी अपनी रचना को देख अचंभित हो जाता है कि क्या ये मैंने ही लिखा था। अभिव्यक्ति की इच्छा ने अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने तथा दूसरों तक पहुंचाने के माध्यम से भाषा को जन्म दिया। शब्द या वाणी बाह्य अभिव्यक्ति के कारण हैं। वाणी और मन दोनों की जोड़ी है। विचारकों ने इसे मनोमय जगत् कहा है। भारतीय चिंतन पद्धति वर्तमान जीवन को पूर्वजन्म के कर्मों की वासना का परिणाम मानती है। वासनाओं को संस्कार भी कहा गया है। तभी रचनाकार को मनीषी, स्वयंभू तक कहा जाता है। कालिदास ने भी कहा है कि - - - फलानुमेयाः प्रारंभाः संस्काराः प्राक्तना इव। डॉ नगेंद्र मानते हैं कि सर्जना के लिए पहली आवश्यकता है अनुभूति की भोगावस्था समाप्त हो संस्कार में परिणत होना। अज्ञेय ने जीवन द्वारा भोगी हुई अनुभूतियों को कच्चामाल कहा है जिसको सर्जक की प्रतिभा कूट पीस कर रचना का रूप दे देती है। यही आधुनिक युग में आभ्यंतरी करण प्रक्रिया कही गई है। राजशेखर ने प्रतिभा के दो रूप बताए हैं जो कारयित्री और भावयित्री है जो रचनाकार के रचनात्मक भावों को आकार देते हैं। सृजन प्रकिया अनुभवों के ग्रहण एवं संचयन से प्रारंभ होती है। हमारा अज्ञात मानस अनेक विचारों तथा अनुभवों से भरा है जो अनुकूल परिस्थितियाँ एवं प्रेरणा पाकर चेतन धरातल पर आते हैं। अचेतन मानस में स्थित भाव, विचार या अनुभव को जागृत करने के लिए संवेगात्मक परिस्थिति का होना अनिवार्य है। कालिदास का यह श्लोक इस विषय को उजागर करता है - - रम्याणी वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पर्यत्सुकी भवति यत्सुखिनो$पि जन्तुः । तच्चेतसा स्मरति नूनमबोध पूर्वं भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि ।(अभिज्ञान शाकुंतलम् 5/2) सृजनात्मक कार्य अचेतन की गहराइयों से उद्भूत होता है। रचनाकार का संबंध अनुभव, अनुभूति और अभिव्यक्ति के बीच अन्तर्केन्द्रित होता है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसी सत्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है - -' ये सभी आत्माभिव्यक्ति के माध्यम हैं चाहे वे शब्दों, स्वरों, रेखाओं और रंगों की भाषा द्वारा हो (आर्ट एंड एस्थेटिक, पृष्ठ 9)।' साहित्य का प्रयोजन आत्मानुभूति ही है और इसका प्रमुख श्रेय जाता है लेखक की वर्णन -क्षमता और साथ ही श्रोता या पाठक की ग्रहण शक्ति पर। रचनाकार या साहित्यकार जब तल्लीन होकर रचना करता है तो वह उसी तरह का भाव पाठकों के मन में भी उत्पन्न करता है। मुक्तिबोध लिखते हैं कि सत्य का प्रकाश सत्य से भिन्न है। साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश है किंतु हमें प्रकाशों में सत्य को ढूंँढना है। हम केवल साहित्य की दुनिया में नहीं, वास्तविक जीवन में रहते हैं। साहित्य के सहित अर्थ से संश्लिष्ट रह, साहित्यकार या लेखक जब अपनी कल्पनाशीलता का उच्छ्वास लेखनी के माध्यम से करता है तो अभिप्रयुक्त कौशल रचनाधर्मिता का विशेषण पाता है। आज हम जितने भी बड़े साहित्यकारों को जानते हैं, उनकी वाक् शक्ति के कारण ही जानते हैं। किसी भी रचनाकार की रचनाधर्मिता एक स्वच्छंद इकाई है जो पूर्णतः व्यष्टिगत होती है। यह लेखक के मानस की व्यापकता और भौतिक मानसिक परिवेश की उन सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंगों से जो चेतन - अचेतन मन को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। कहने का तात्पर्य है कि रचना धर्मिता और शिल्प सजगता दोनों पायदानों पर टिका होता है लेखक का साहित्यिक अवदान। सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास, संवेदन शून्यता, भौतिकवाद की अंधी दौड़, पर्यावरण आदि बहुत से ज्वलंत प्रश्न है जो समय और समाज से टकराते हैं। किसी भी साहित्यकार से उसकी रचना धर्मिता को सुनना उसके अनुभवों से रूबरू कराती है। इस तरह के संज्ञान से रचना के संप्रेषणीयता बढ़ती है। रचना के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है जिससे पाठक संसार में वृद्धि होती है। लेखिका शब्द साधक हैं। प्रभाव तभी पड़ता है, जब प्रभावशाली शब्द आयेंगे । महादेवी वर्मा ने 1956 में ' पथ के साथी' संस्मरण साहित्य में अपने समकालीन लेखकों का संस्मरणात्मक वर्णन किया है । डॉ नगेंद्र ने भी माना है कि साहित्य आत्मकथ्य भी होता है। पश्चिम की आंधी से जब हम संत्रस्त थे रवीन्द्र नाथ ने पश्चिम की इस हृदय हीन यांत्रिक सभ्यता, स्वेच्छाचारिता और साम्राज्य लिप्सा का घोर विरोध किया। रक्तकरबी की यक्ष पुरी का राजा भी शक्ति और सत्ता के मद में कहता है' या तो प्राप्त करूंगा नहीं, तो नष्ट हो जाऊंगा'। गुजराती कवि उमाशंकर जोशी कहते हैं, 'जो जन्महीन और भविष्य में दीन बनकर जिएंगे, उन सबके कलंक का अन्याय कर्ण अपने रक्त से धोता है। वस्तुतः कर्ण एक ऐसा अभागा व्यक्ति था जिसका जीवन उसकी माता ने नष्ट किया, जो सदैव पूर्णतः अलगाव की स्थिति में रहा। दुर्गा भागवत के शब्दों में,' प्रत्येक युग में, प्रत्येक व्यक्ति में, प्रत्येक दुख और निराशा के क्षण में, सुख की लालसा में, पराक्रम के दुर्दम्य आवेग में, स्नेह के अविष्करण में एक कर्ण स्थान - स्थान पर अवतीर्ण होता है, मात्र क्षणार्ध के लिए परंतु सब की वेदना को अपने अंदर लेता हुआ दिखाई पड़ता है। 19 वी सदी का इतिहास विश्व व भारतीय जन- जागरण का नवोत्थान था और बीसवीं सदी में अंतिम सांस ली और 21वीं सदी भी आ गई जो परिवर्तन की नई सदी है। एक ओर हमारे देश में महात्मा गांधी जैसे अवतारी पुरुष हुए तो दूसरी ओर मार्क्स और आइंस्टाइन जैसे चिंतक और मनोवैज्ञानिक भी हुए जिन्होंने मनुष्य के जीवन और उसकी पद्धति को नवीन आयाम दिए। 19 वीं सदी का युग मानववाद के विकास का युग था। मानववाद का ध्येय था मानव समाज की समान समस्या और समयानुसार चुनौतियों का सामना करना। 'कभी तो अनुभूति उमडेगी, प्लवन का सांद्र घन बन।' अतीत के धरातल पर ही वर्तमान फलता - फूलता है और भविष्य की ओर अभिमुख होता है। साहित्य के इतिहास में अतीत जड़ और अविस्मरणीय नहीं रहता। वह तो एक गवाक्ष है जिससे वर्तमान का क्षितिज स्पष्ट दिखाई देता है। वाक् की सिद्धि उन तपः पूत साधकों से ही होती है, समाज के नई चेतना को प्रमाणित करती है। महाश्वेता जी ने कहा था कि भारत की संस्कृति की वास्तविक परख और पहचान हम हिंदी साहित्य के माध्यम से ही कर सकते हैं। अर्नेस्ट फिशर के शब्दों में कलाकार अपने युग के विचारों, पूर्वाग्रहों, मूल्य बोध और वैचारिकता से अछूता और स्वाधीन नहीं रहता। उसका समय उसे गतिमान करता है, बनाता है और विकसित करता है। वह उपेक्षा को अपेक्षा समझता है। कला या सृजन समाज के ध्रुवकेंद्र का परिवेषण करती है। इनसे ही उन प्रत्ययों का समावेश होता है, जो उसके कृतित्व को स्वांतः सुखाय बनाता है तो परार्थ सुखाय भी। आदर्श समाज किसे कहेंगे? जहांँ संन्यासी भी गृहस्थ और गृहस्थ भी संन्यासी होंगे अथवा दोनों के बीच कोई भेद नहीं होगा। विवेकानंद, अरविंद, गांधी जिस ध्येय को लेकर चले उसका सामाजिक रूप यह है कि वहाँ धर्म को केवल चंदन, कंठी, माला, पूजा, होम और मंदिर तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि समग्र जीवन ही उसमें एक साधना की तरह है। अज्ञेय की पंक्तियाँ हैं - - 'कहा तो सहज पीछे लौट देखेंगे नहीं पर नकारों के सहारे कब चला जीवन? स्मरण को पाथेय बनने दो'

भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह को गुरुदक्षिणा पुरस्कार

नॉलेज कार्निवाल में प्रो दिलीप शाह को गुरुदक्षिणा पुरस्कार - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह को शिक्षा के क्षेत्र में नॉलेज कार्निवाल में गुरुदक्षिणा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध समाचार पत्र टाइम्स अॉफ इंडिया ने उन्नीस जुलाई 2022 को, पहली बार कोलकाता के होटल हयात रीजेंसी में 'नॉलेज कार्निवल' का आयोजन किया गया । इस कार्निवल का फोकस 'ईस्ट इंडिया' था। इस नॉलेज कार्निवाल में स्टालों, स्टैंडियों और अन्य प्रचार सामग्री के माध्यम से कई संस्थानों का प्रतिनिधित्व रहा जो सभी छात्रों और शिक्षकों के गौरव के लिए एक हॉल में प्रदर्शित किए गए थे, जो शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोत्तम रूप को दर्शाता है। भवानीपुर कॉलेज के लगभग बीस विद्यार्थियों के साथ फैकल्टी प्रो. दिव्या पी उदेशी के साथ इस कार्यक्रम के लिए गए थे।इस कार्यक्रम के मुख्य कलाकार रहे देवांग नगर और देवेन खड़का। भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह को श्री शिरशेंदु मुखोपाध्याय (वयोवृद्ध लेखक) द्वारा 'गुरुदक्षिणा' पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर भवानीपुर कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ दी। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

साहित्यिकी संस्था ने लेखिका रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर की चर्चा

साहित्यिकी संस्था ने लेखिका रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर की चर्चा - - - साहित्यिकी संस्था द्वारा वर्चुअल गोष्ठी में संस्था की वरिष्ठ लेखिका रेणु गौरीसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर परिचर्चा का आयोजन किया गया ।दोनों का ही जन्म 1941 का है और दोनों ही बालिका शिक्षा सदन विद्यालय की छात्रा रही हैं। प्रमुख वक्ताओं में गीता दूबे और कुसुम जैन ने क्रमशः रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया की साहित्यिक यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार व्यक्त किए । कथाकार और साहित्यकार रेणु गौरीसरिया के जीवन यात्रा पर गीता दूबे ने विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि रेणु जी बालिका शिक्षा सदन में प्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी की शिष्या और साहित्य मर्मज्ञ रहीं। साथ में एक लोकप्रिय शिक्षिका भी रहीं। उनके जीवन के संघर्षों और दुखों को कभी भी हाईलाइट न करते हुए सकारात्मक ऊर्जा सोच से अपने अस्सी वर्ष में आज भी ऊर्जा से भरी हुई हैं। बताया कि रेणु जी की हिंदी आत्मकथा 'जकारिया स्ट्रीट से मेफेयर तक' का अब द्वितीय संस्करण आ रहा है और बांग्ला में भी अनुवाद हो रहा है। रेणु जी के आलेख 'समस्या' को साहित्यिकी की वरिष्ठ सदस्या मीना चतुर्वेदी ने पढ़ा। रेणु गौरीसरिया ने अपने वक्तव्य में संस्था को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्हें जीवन के हर मोड़ पर प्रेम मिला। पुस्तकें पढ़ना, फिल्म, नाटक आदि देखना रुचि रही है और हंँसते रहना ही जीवन का मूलमंत्र माना है, रोना कोई नहीं सुनता। लेखिका प्रकृति से सौम्य हैं और जीवंतता इनके जीवन के महत्वपूर्ण अंग है। उनकी अनुभूतियों को उनकी रचनाओं में पढ़ा जा सकता है। बीस जुलाई 2022 को हुई इस गोष्ठी में मीना चतुर्वेदी ने रेणु के आलेख 'समस्या' का पाठ बहुत ही भावपूर्ण होकर किया जो बहुत ही सहज और प्रभावी रचना है। रेणु गौरीसरिया ने अपने वक्तव्य में अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया।स्कॉटिश चर्च कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष और साहित्यकार गीता दूबे ने रेणु गौरीसरिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करते हुए कहा कि वे एक शिक्षिका होने के साथ-साथ एक सफल लेखिका हैं। इस अवसर पर उषा श्राफ और पूनम पाठक ने प्रश्न भी किए जो रेणु जी के जीवन के दुखों और अच्छी शिक्षिका कैसे बनें से संबंधित रहे। साहित्यिकी की दूसरी वरिष्ठ सदस्या प्रमिला धूपिया रानी जीजी के रूप में लोकप्रिय हैं। जिनकी कविता 'स्वागत है स्वर्ग में तुम्हारा 'का पाठ बबीता माँधणा ने किया। माँधणा ने स्वरचित दोहे के साथ दोनों लेखिकाओं के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया। प्रमिला जी ने बताया कि संस्था की निदेशक कुसुम जैन की प्रेरणा से उन्होंने लिखना शुरू किया। विशारद प्रमिला जी भी बालिका शिक्षा सदन में मन्नू भंडारी जी की शिष्या रहीं और वहीं से पढ़ने-लिखने लिखने की रुचि विकसित हुई। कुसुम जैन ने प्रमिला धूपिया के साथ अपने पचास वर्षों की यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार की परंपरा और पुरुष प्रधान संस्कृति में एक सशक्त महिला के रूप में अपने को प्रतिष्ठित करते हुए प्रमिला यानी रानी जीजी को एक सशक्त व्यक्तित्व की मलिका बताया। समझौता और प्रतिरोध दोनों ही उनके व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलू हैं। उनके प्रगतिशील विचारों से भरे लेखन पर विस्तार से जानकारी दी। प्रमिला धूपिया ने कहा कि मेरे लेखन पर इस तरह की चर्चा करने के लिए संस्था को धन्यवाद देती हूँ अपने जीवन में आए अच्छे शिक्षकों मन्नू भंडारी और रमेश सर के संस्कार और पढ़ने की रुचि को महत्वपूर्ण बताया। अध्यक्षता करते हुए भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की हिंदी व्याख्याता डॉ वसुंधरा मिश्र ने वरिष्ठ लेखिकाओं की रचनाधर्मिता पर अपने महत्वपूर्ण विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान संदर्भ में रेणु गौरीसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही प्रेरित करने वाले हैं। दोनों ही अपने - अपने जीवन में एक संपूर्ण महिला हैं । अस्सी की उम्र में रेणु जी का लेखन अभी भी अपनी ऊंँचाइयों को छू रहा है और प्रमिला धूपिया की जीवन शैली, अनुशासन, संकल्प और आदर्शों को लेकर परिवार, समाज और संस्कृति की विरासत के रूप में सभी को प्रेरित करता है। अनुभूति जब लेखन में उतरती है तो वह सृजन बन समष्टि से जुड़ जाती है। कार्यक्रम का संयोजन व संचालन वरिष्ठ सदस्या डॉ सुषमा हंस ने किया। संस्था की सचिव डॉ मंजु रानी गुप्ता ने कार्यक्रम के प्रारंभ में सभी का स्वागत करते हुए अपने विचार व्यक्त किए। अंत में, डॉ वसुंधरा मिश्र ने सभी सदस्याओं को धन्यवाद देते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम लेखन को बढ़ावा देते हैं और साहित्यिकी कई महत्वपूर्ण लेखिकाओं से समय-समय पर रूबरू कराती रहती है जिससे दूसरे लेखकों को प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार की साहित्यिक परिचर्चा से विचारों का आदान-प्रदान होने के साथ-साथ लेखन और पाठक समृद्ध होता है। तकनीकी सहयोग दिया नुपूर अशोक ने। कार्यक्रम में साहित्यिकी संस्था की सदस्याओं की अच्छी-खासी उपस्थिति रही।

Sunday, July 17, 2022

साहित्यिकी संस्था को प्रभात खबर में स्थान मिला दिनांक 17.07.2022

प्रतिस्पर्धा की दौड़ के बीच साहित्य के प्रति रुझान पैदा करती “साहित्यकी" वर्तमान समय की जरुरतों के बीच आज जब अधिकांश लोग आर्थिक व सामाजिक महत्वाकांक्षाअों को मन में पाले प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सिर्फ दौड़े जा रहे है. लोगों में संवेदनाअों का खास एहसास बनाये रखने के लिए साहित्यकी संस्था प्रतिबद्ध होकर कार्य करती आ रही है. यह संस्था महिलाअों को न सिर्फ लेखन विद्या में ही आगे तक जाने के लिए प्रेरित करती है बल्कि योग्य प्रतिभाअों का समय-समय पर उचित सम्मान भी करती है. लेखन कला में रुचि रखने वाली महिलाअों को यह संस्था एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करती है. एक एेसा मंच जहाँ योग्य प्रतिभा की कद्र है अौर संवेदनाअों- भावनाअों को समझने वाले लोग है. संस्था की अध्यक्ष विद्या भंडारी कहती है -आज के समय की जरुरतों ने लोगों के जीवन को एक दौड़ में बदल दिया हैं. मानवीय मूल्यों से संपृक्त लोगों में साहित्य के प्रति लगाव व अभिरुचि कमतर होती जा रही है. जबकि सत्य यह है कि साहित्य हर युग में प्रांसगिक है.यह जीवन को एक ध्येय प्रदान करने वाली विशेष आवश्यक विषयवस्तु है. साहित्य के बिना जीवन नीरस अौर अनुभव हीन है.यह भावनाअों की अभिव्यक्ति है तो इसमें संवेदनाअों का एहसास है. साहित्य का महत्व न कभी खत्म हुआ है अौर ना ही कभी खत्म हो सकता है. साहित्य ही मनुष्य को अपूर्णता से पूर्णता की अोर ले जा सकता है. साहित्य के इसी महत्व अौर उद्देश्य को महसूस करते हुए डॉ. सुकीर्ति गुप्ता ने 1998 में “साहित्यकी” संस्था की स्थापना की थी. उन्होंने साहित्य लेखन, पठन-पाठन में रुचि रखने वाली बौद्धिक विचारों की महिलाओं को इस संस्था के माध्यम से जोड़कर एक सुंदर लेखकीय मंच प्रदान किया. थोड़े ही समय में संस्था की लोकप्रियता बढ़ी अौर देखते ही देखते लेखन कला में रुचि रखने वाली कई महिलाएं संस्था से जुड़ती चली गई.अध्ययन- अध्यापन से जुड़ी महिलायें ही नहीं बल्कि साहित्य के प्रति रुचि रखनेवाली घरेलू शिक्षित महिलायें भी साहित्यिकी से जुड़ीं अौर अपनी लेखन कला को विस्तार रूप दिया. मंच के माध्यम से उन्हें काफी अच्छा प्रोत्साहन मिला. प्रतिभाएँ अौर निखरती चली गईं. सदस्याओं को लेखन कला को अौर अधिक विकसित करने और विस्तार रूप देने के लिए संस्था ने एक हस्तलिखित पत्रिका 'साहित्यिकी' का प्रकाशन भी आरम्भ किया. विद्या भंडारी ने बताया कि साहित्यिकी के तत्वावधान में प्रत्येक मास एक गोष्ठी का आयोजन भी नियमित रूप से किया जाता है जिसमें विभिन्न विषयों, पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित होती है. विद्या भंडारी संस्था की गतिशील यात्रा पर चर्चा करते हुए कहती है- 2013 में डॉ. सुकीर्ति गुप्ता का निधन हो गया. उनके निधन के पश्चात् कुसुम जैन, डॉ किरण सिपानी के सहयोग के साथ मुझे अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी मिली. हम सभी ने मिलकर कोशिश की कि संस्था गतिशील और सक्रिय बनी रहे. विद्या भंडारी कहती है कि किसी एक परिवार की तरह आप हमारी इस संस्था को समझ सकते है. हमारी इस संस्था में सभी सदस्याओं के बीच एक अपनापन और अनुराग भरा है. इसी की बदौलत वरिष्ठ व युवा सदस्याओं में एक सुंदर समन्वय दिखाई देता है. सभी सदस्याओं की सामूहिक साझेदारी के बल पर ही संस्था ने न सिर्फ कोलकाता बल्कि पूरे भारत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. हमें इस बात की खुशी है कि एक परिवार की तरह साहित्यिकी संस्था का सघन वृक्ष के रूप में निरंतर विस्तार हो रहा है. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था की सबसे विशेष बात यह है कि कोलकाता में कार्यरत हिन्दी की लगभग सभी प्राध्यापिकाएंँ एवं अध्यापिकाएँ इस संस्था की सक्रिय सदस्याएंँ हैं. सभी मार्गदर्शक के रूप में संस्था की प्रगति के लिए निरंतर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहीं हैं. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था 24 वर्षों से निरंतर साहित्यकारों और पुस्तकों पर चर्चा के कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है. विशिष्ट साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति का कार्यक्रम तो आकर्षक होता ही है. इसके अलावा हम समय-समय पर काव्य गोष्ठी का आयोजन करने के साथ प्रसिद्ध कवियों और साहित्यिकारों को आमंत्रित कर अपना ज्ञानवर्द्धन करते रहते है. विद्या भंडारी कहती हैं कि साहित्यकारों में भीष्म साहनी, केदारनाथ अग्रवाल, अमृत राय, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी इत्यादि सुप्रसिद्ध साहित्यकारों पर चर्चा होती रही है.आशुतोषजी, शंभूनाथजी, सुधा अरोड़ा ने इन चर्चाओें में भाग लेकर संस्था का गौरव बढ़ाया है. डॉ अजय राय ने अब तक प्रसाद,पंत,निराला,महादेवी इत्यादि कई साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति साहित्यिकी मंच के माध्यम से दी है. साहित्यिकी संस्था की मंत्री डॉ मंजुरानी गुप्ता ने जानकारी देते हुए कहा कि हमारी संस्था पुस्तकों ने महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया है. जैसे (प्रिय कोलकाता तोमाके भालो बाशि-संपादक सिद्धेशजी व विद्या भंडारी -काव्य संग्रह-बांग्ला अनुवाद सहित), ( दर्पण- लघुकथा संग्रह- संपादक-मंजुरानी गुप्ता व विद्या भंडारी), (विचार सरणी- संपादक-किरण सिपानी व विजय लक्ष्मी मिश्रा) (विसंगतियों के व्यूह में-मधुबाला रोहतगी, रेवा जाजोदिया एवं सरोजिनी शाह) , (यादों के झरोखे से-यात्रा संस्मरण-रेणु गौरिसरिया, विनोदिनी गोयनका व आशा जायसवाल), ( स्त्री लेखन-स्त्री दृष्टि-गीता दूबे-रेशमी पांडा मुखर्जी),( सद्य- पर्यावरण पर प्रकाशाधीन पुस्तक- जिसमें देश के कई लेखकों की रचनाएँ सम्मिलित हैं -गीता दूबे) के अलावा अध्यक्ष विद्या भंडारी की चार पुस्तकों का प्रकाशन भी साहित्यिकी प्रकाशन से ही हुआ है. इसके अलावा देश की एक मात्र हस्तलिखित पत्रिका के 30 अंकों का प्रकाशन भी संस्था अब तक कर चुकी है. विशेष जानकारी देते हुए पदाधिकारियों ने बताया कि हस्तलिखित इस पत्रिका के संपादक को सभी को अवसर देने के उद्देश्य से समय -समय पर बदला जाता है. वसुंधरा मिश्र, राज जैन, कमलेश जैन, सुनंदा रायचौधरी, गीता दूबे, मंजुरानी गुप्ता, सुषमा हंस, रेशमी पांडा मुखर्जी, कविता महरोत्रा, विद्या भंडारी आदि किरण सिपानी के सहयोग के साथ इस पत्रिका का संपादक बनने का सौभाग्य पा चुकी है.

Thursday, July 14, 2022

सुरंगों सावन - भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता

सुरंगों सावन - - भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता द्वारा सुरंगों सावन में मुझे का अवसर मिला उसके लिए मैं आभारी हूँ। मंच पर आसीन कोलकाता की प्रसिद्ध महिला शक्तियों को नमन। प्रो दीपाली सिंघी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में नया दृष्टिकोण दिया है और जे डी बिरला के विद्यार्थियों को ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य किया है। शिक्षण संस्थानों में जेडी बिड़ला महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हिंदी मीडिया हाउस छपते छपते हिंदी दैनिक और ताजा टीवी के नैपथ्य में काम करने में अमृता नेवर का महत्वपूर्ण योगदान है जिसके कारण हम रोज सुबह से लेकर रात तक दुनिया की सभी खबरों और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों को देखते और सुनते हैं। सुमधुर स्वरों की मलिका जैस्मीन जैसा नाम वैसा ही गुण है। महिला सशक्तिकरण में स्वयं को स्थापित करने में एक मिसाल कायम की है। भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता संस्था की मेरुदंड हैं अंजू सेठिया और सरोज भंसाली जी ।आप दोनों ने अपनी टीम का नेतृत्व किया और विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यों के प्रति अपने दायित्व का पालन किया। अंजू सेठिया एक सफल बिजनेस वोमन होने के साथ-साथ हैं साथ ही समाज सेवी कवयित्री और लेखन से भी जुडी हैं। संस्था के माध्यम से पिछले डेढ़ साल से बहुत सारे कार्यक्रम कर चुकी हैं। मैं उनकी संस्था को शुभकामनाएँ देती हूँ। महिलाओं पर समाज परिवार का दायित्व रहा है। बच्चों से लेकर परिवार, संस्कृति से लेकर संस्कार, शिक्षा से लेकर अच्छे नागरिक बनाने का कार्य सब कुछ महिलाओं पर होता है। तीज-त्यौहार रीति-रिवाज परंपराओं को महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं। वसंत के समान ही वर्षा भी भारतीय साहित्य में सम्मान और गौरव का स्थान पाती रही है।हर भाषा के लोक गीत हैं, वैदिक ऋषियों ने मेघों के शक्तिशाली रूप का यशोगान उल्लसित कंठ से किया है।इंद्र मेघों के शक्तिशाली अधिपति रहे। समय के साथ उनका प्रभाव असफल होता गया और इंद्र देवता की छवि में कमी आती गई और बाद में उपेंद्र देवता ने भारतवर्ष में धर्म साहित्य शिल्प संगीत और कला के क्षेत्र को छा लिया। घनों के राजा इंद्र रंगमंच से चुपचाप हट गए और घनश्याम वहाँ डट गए। हिंदू पुराणों के अनुसार यह घटना द्वापर युग में घटी थी। भागवत पुराण में इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पूजा करवाई। इंद्र ने भी बदला लेने के लिए मूसलाधार वर्षा करवाई जिससे द्युलोक से भूलोक तक जल ही जल हो गया। श्रावण का महीना उत्सव का महीना है। मानसूनी हवाएँ वारिश लाती हैं और तपती धरती को भीगो देती हैं। नागार्जुन की पंक्तियाँ हैं - बादल को घिरते देखा है कन्हैयालाल सेठिया जी की पंक्तियाँ नीर भरी नदियाँ लहराते /सागर उनमें प्यास बुझाते /किंतु गगन की एक बूंद हित /चातक के नयनों में जल है। वेदों से लेकर अभी तक न जाने कितने ही कवियों और साहित्यकारों और दार्शनिकों आदि ने वर्षा के प्रति अपने भावों को व्यक्त किया है। आषाढ़ से ही वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है। बंगाल में काल बैशाखी बैशाख से ही दस्तक देने लगता है। कालिदास ने मेघदूत की रचना ही कर डाली जो विश्व में एक अनूठी और अद्भुत रचना है। आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघमाश्लिष्ट सानु /वप्र क्रीडा परिणत गज प्रेक्षणियम ददर्श। प्रथम श्लोक से ही मेघों को अपना संदेशवाहक मानते हुए अभूतपूर्व वर्णन किया है। बादल वही हैं जो प्रकृति जड़ चेतन और पूरे ब्रह्माण्ड को अपनी शीतलता प्रदान करते हैं। सावन और संगीत का अटूट रिश्ता है। सुरंगो सावन पर मेरी कविता है - - - मन का सावन-- सावन मन में बरसता है। जब रस रंग और रास से मन पूर्ण होता है तो सावन होता है। निश्छल और उन्मुक्त हँसी से चेहरा भरा हो तो सावन है। चिंताओं की तमाम लकीरें जब पानी की तरह पारदर्शी हो जाए तो सावन है। होठ पर जब बचपन के गीत आने लगें तो सावन है। एक पैर से दूसरा पैर जब खेलने लगे तो सावन है। पेड़ों की पत्तियों से गिरती बूदें जब शरीर को भिगो दें तो सावन है। तन और मन के पोर पोर कुछ कहकर भी जब कुछ न कहें तो सावन है। आसमान में सात रंगों का इंद्रधनुष दिखाई दे तो सावन है। हमारे मन का मयूर जब नाचे तो सावन है। यूँ ही तो कोई सावन नहीं मनाता है। किसान अपनी लहलहाती फसलें देखकर झूम उठता है, तब सावन है भारत ऋतुओं से फलता-फूलता है, त्योहार मनाता है, खुशियाँ मनाता है। तब सावन है कोयल की कूंक जब सुनाई दे तो सावन है। हर बच्चा वृद्ध और स्त्री के चेहरे पर सुकून हो तो सावन है मजदूर जब त्योहार मनाए तो सावन है कृषि के साथ कृष्ण बांसुरी बजाएं तो सावन हैं क्रोधित वर्षा के नैनों की धारा जब बुझ जाएं तो सावन है बाढ़ के खतरे न आएं पशु-पक्षी और मानव के जीवन सुरक्षित हों तो सावन है। निराला कहते हैं - बादल गरजो घेर घेर घोर गगन धाराधर ओ ललित ललित काले घुंघराले बाल कल्पना के से पाले सूर तुलसी जायसी सभी ने पावस ऋतु का सुंदर सरस वर्णन किया है। महादेवी वर्मा जी ने - - नीर भरी दुख की बदली नागार्जुन - - मेघ बजे घन कुरंग बादल को घिरते देखा है। बूंदों की रिमझिम में संगीत का सरगम होता है। इस मौसम में हवा बादल पेड़ पपीहे सब झूमते गाते हुए से लगते हैं। भक्ति संगीत और कविताओं में वर्षा ऋतु प्रकृति की सहचरी है। वर्षा मानव मन की अनुभूतियों का यह उल्लास लोककंठ से बारहमासी कजरी झूलागीतों के रूपों में फूटता है। मेघ मल्हार का आदि राग कवि हृदय में भी गीत के रूप में उतरता है। सावन और संगीत का अटूट संबंध कई नवगीतों में मिलता है। बरसात का प्रेम से चिर संबंध है। इस ऋतु में प्रणय की पुरानी स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं। विरह की वेदना तीव्र हो जाती है और मिलन की आतुरता बढ़ जाती है। बादलों का अत्याचार बाढ़ के रूप में तबाही भी लाता है। बाढ़ की त्रासदी के कई वर्णन मिलते हैं। तुलसी के रामचरित मानस में सीता वियोग में राम को भी बादलों के गरजने से डर लगता है। घन घमंड नभ गरजत घोरा प्रिया हीन डरपत मन मोरा। सूर की गोपियां कृष्ण के वियोग में कहती हैं निस दिन बरसत नैन हमारे सदा रहत पावस ऋतु इन पे जब से स्याम सिधारे। कबीर की उलटवासी - बरसे कंबल भीजे पानी कबिरा बादल प्रेम का हम परि बरष्या आइ अंतरि भीगी आत्मां हरि भयी बनराई जायसी - - - नागमती की विरह पीड़ा - - चढा असाढ गगन घन बाजा साजा विरह दुंद दल बाजा -सावन बरस मेह अति पानी -भरनी परिहौं बिरह झुरानी वर्षा ऋतु सांस्कृतिक नवोन्मेष का बीजारोपण करता है।

Friday, July 1, 2022

नई पीढ़ी और एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट

शिक्षकों को समय के साथ अपडेट होना आवश्यक - डॉ सोमा बंदोपाध्याय - - भारतीय संस्कृति में शिक्षकों का दर्जा श्रेष्ठतम व अतुलनीय है और बात जब नई पीढ़ी के नव निर्माण की हो तो बिना शिक्षक के अधूरी है । इसी को मद्देनजर रखते हुए मंगलवार दिनांक 1 मार्च 2022 को नई पीढ़ी तथा राइटर्स एण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ( वाजा इंडिया) कोलकाता इकाई द्वारा "नई पीढ़ी के नव निर्माण में शिक्षकों की भूमिका" नामक ई -परिचर्चा का आयोजन हुआ। उपरोक्त परिचर्चा का संचालन डॉ वसुंधरा मिश्रा, अध्यक्ष वाजा इंडिया महिला शाखा ,कोलकाता इकाई ने किया साथ ही स्वागत ज्ञापन शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ,संस्थापक , 'नई पीढ़ी' तथा संस्थापक महासचिव, वाजा इंडिया द्वारा संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विषय प्रवेश देते हुए वाजा इंडिया, कोलकाता इकाई के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर (निदेशक ताजा टी.वी. व छपते-छपते) ने कहा कि आजादी के बाद शिक्षा में आए उतार-चढ़ाव के बीच आज शिक्षा की खिचड़ी बन गई है । उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी और वाजा इंडिया द्वारा संपन्न हो रही है यह ई-परिचर्चा हमारा ध्यान एक गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित करती है। मुख्य वक्ता के तौर पर मौजूद रही प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय का कहना था कि यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है, हमारे भारतीय परिवेश में माता-पिता के बाद शिक्षक व गुरु का ही महत्व होता है। मेरा मानना है कि शिक्षक को समय के साथ खुद को अपडेट रखना चाहिए और साथ ही यह एक गुरु का दायित्व है कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक दायित्व बोध के प्रति भी जागरूक करें । सुश्री सोमा ने आगे कहा कि आज नई पीढ़ी के पास ज्ञान व सूचना के साधन बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं तो यहां शिक्षकों के सामने नई पीढ़ी की बढ़ती आकांक्षाओं की पूर्ति भी बड़ी चुनौती हो जाती है । इस मौके पर सोमा बंदोपाध्याय ने शिक्षकों से अनुरोध किया है कि वह मानव रोबोट ना तैयार कर विद्यार्थियों को व्यवहारिक शिक्षा प्रदान करें। आपको बता दें कि प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय वर्तमान में पश्चिम बंगाल प्रशिक्षण शिक्षण योजना एवं प्रबंधन विश्वविद्यालय की साथ ही डायमंड हार्बर विश्वविद्यालय की कुलपति हैं तथा यह संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भी रह चुकी हैं। आमंत्रित वक्ता के रूप में अपना वक्तव्य रखते हुए शिक्षा सदन फॉर गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल ,हावड़ा, कोलकाता की पूर्व प्रधानाचार्य दुर्गा व्यास ने कहा कि भारतीय संस्कृति में शिक्षकों को विशेष सम्मान मिला है इसलिए एक शिक्षक का दायित्व है कि नई पीढ़ी का नव निर्माण करें । परिचर्चा के दौरान द बीएसएफ स्कूल कोलकाता की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रियंका मिश्रा ने कहा कि आज शिक्षा व शिक्षकों का व्यवसायीकरण हो रहा है । इसी तरह आमंत्रित वक्ता के तौर पर भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज पश्चिम बंगाल में कार्यरत डॉ.रेखा नारीवाल ने कहा कि आज हम वैल्यू और नैतिक मूल्यों पर समझौता कर रहे हैं। यह स्थिति घातक है । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कोलकाता के प्रतिष्ठित बिरला हाई स्कूल्स की डायरेक्टर मुक्ता नैन ने कहा कि पहले शिक्षक रोल मॉडल्स हुआ करते थे। पूर्व समय के शिक्षक स्कूल को एक जॉब नहीं बल्कि ज्ञान दान की भावना को अपना कर्तव्य समझते थे। कार्यक्रम की प्रायोजक बॉल पेन की निर्माता कंपनी ' Kolorite' रही जिसके डायरेक्टर अमित पॉल ने भी कार्यक्रम के अंत में अपने विचार व्यक्त किए। इस परिचर्चा में भारत के तमाम शहरों के शिक्षक ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। कोलकाता ईकाई में साहित्यकार रेणु गौरसरिया, साहित्य प्रेमी शशि कंकानी और बहुत संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। यह इ- परिचर्चा एक महत्वपूर्ण और गंभीर विषय को लेकर आयोजित हुई जिससे वर्तमान काल खंड में हमारा, देश, समाज व नई पीढ़ी उसमें अपना अक्स देख सके ।