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Thursday, March 7, 2024

बहती नदी हो

बहती नदी हो

आलेख बंगाल की महिला रंगकर्मी 24

बंगाल की प्रमुख हिंदी महिला रंगकर्मी - - - - -डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है, यह सच है कि बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। भारत में उन्नत परंपरा और विदूषी महिलाओं के रहते हुए भी स्त्रियों को सदैव ही दोयम दर्जे पर रखा गया है। वैसे तो प्राचीन काल से ही नाटकों का जिक्र महाभारत और संस्कृत में प्रमुखता से मिलता है।कुछ काल तक नाटक और रंगमंच का अभाव रहा लेकिन ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ ही आधुनिक काल में नाटक और रंगमंच की परंपरा एक बार फिर पुनर्जीवित होती है। संपूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रंगमंच को एक नया रूप देने का प्रयास किया गया। स्त्रियों को कदम कदम पर अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं सुरक्षा हेतु संघर्ष करना पड़ा है। नाटक तो आरंभ से ही पुरुषों के अधिकार में रहा था। यहां तक कि स्त्री पात्र के चरित्र को भी पुरुष ही करते थे तो पुरुषों के वर्चस्ववादी क्षेत्र रंगमंच में स्त्रियों को आसानी से प्रवेश कैसे मिल सकता था? उस दौर में नाटक एवं रंगमंच राज दरबार या कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। स्त्री का नाचना - गाना नीचा और घृणित कार्य समझा जाता था। थियेटर आदि में कार्य करने वाली स्त्रियों को वेश्या तक की संज्ञा दी गई। बंगाल थियेटर और नाटकों के मंचन के क्षेत्र में सदैव आगे रहा है। बंगाल में हिंदी नाट्य कला को आगे बढ़ाने में प्रसिद्ध नाट्य कार अभिनेत्री ,निर्देशक,कवयित्री साहित्यकार प्रतिभा अग्रवाल, उषा गांगुली, उमा झुनझुनवाला तीनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिन्होंने रंगमंच के नए प्रयोग और प्रतिमान स्थापित किए। बांग्ला और हिंदी के रंगमंच में सेतु का काम किया। वर्तमान में स्त्रियों ने अपनी पहचान का आंकलन किया है और विषम चुनौतियों का सामना कर जीवन के हर क्षेत्र में उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। बंगाल के जिस पुरुष नाटककार के नाटक सबसे ज्यादा हिंदी में खेले गए उनका नाम बादल सरकार और श्यामानंद जालान है । आधुनिक युग 19-20वीं सदी से बंगाल में हिंदी के नाटकों का मंचन आरंभ हुआ जिसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। बादल सरकार जितने बड़े नाटककार थे उतने ही बड़े अभिनेता और निर्देशक भी। इसके लिए उन्होंने रंगमंच को विकसित किया। वे रंगमंच के सिध्दांतकार थे। उन्होंने तीसरे रंगमंच का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया और उसे बाकायदा मंच पर उतारा भी। भारतीय रंगमंच में तीसरे रंगमंच की मौलिक धारणा को बादल सरकार ने कई पड़ावों से गुजरते वर्षों रंगकर्म करते हुए एक नए रंगभाषा की खोज की। उस खोज के भी कई चरण रहे जिन्हें पार करते हुए ही अंततः तीसरे रंगमंच का सिद्धांत रच सकते थे। बादल सरकार ने नाटक जब हिंदी वह अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित होकर खेले तो उनकी जनप्रियता बंगाल के बाहर समूचे भारत वर्ष में फैली। यानी हिंदी में आने के बाद ही बादल दा पूरे भारत के नाटककार बने। आंगन मंच में उन्होंने अपने नाटक प्रस्तुत किए। इस शैली में शारीरिक अभिनय को विशेष महत्व दिया जाता है। 1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। घर-घर, गांव- गांव और शहरों में, आंगन में, छत पर नुक्कड़ और गांव में नाटकों को पहुंचाया। मराठी, हिंदी, पंजाबी, गुजराती, मलयाली, कन्नड़, ओड़िया आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक लोकप्रिय हुए। एक अलग किस्म के थिएटर के जनक जिसे साइको फिजिकल थिएटर के नाम से जाना गया। सन् 1965 में बादल दा ने दो नाटकों का निर्देशन किया जो एवं इंद्रजीत और बल्लभपुर की रूपकथा थी । बंगाल में रंगमंच पर स्त्री रंगकर्मियों की बात हो तो हिंदी में कम से कम तीन हिंदी भाषी रंगकर्मियों का जिक्र आवश्यक है। इस कड़ी में श्यामनंद जालान का प्रमुख नाम है जिन्होंने बंगाल में हिंदी रंगमंच को प्रसिद्धि दिलाई। प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली , उमा झुनझुनवाला इन तीनों रंग स्तंभों ने स्वतंत्र उत्तर काल में बंगाल तथा हिंदी रंगमंच के बीच महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण किया। इसके पहले नाटककार, निर्देशक और अभिनेता श्यामनंद जालान के नाट्य कला के कुछ बिंदुओं को भी समझने की आवश्यकता है। श्यामानंद जालान ने बंगाल की कई महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। जालान ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास पगला घोड़ा का हिंदी में नाटक रूपांतरण किया तो बादल सरकार के दो नाटकों एवं इंद्रजीत और पगला घोड़ा का भी हिंदी में नाट्य रूपांतरण कर मंचन किया। जालान ने ही समूची हिंदी पट्टी से बादल सरकार का परिचय कराया था। श्यामानंद जालान ने महाश्वेता देवी के उपन्यास 'हजार 84 की मॉं' का हिंदी में नाटक रूपांतरण का मंचन किया तो दिव्येंदु पालीत की कहानी मॉं का अभिनय कर हिंदी में पट कथा तैयार की और फिल्म भी बनाई जो जालान द्वारा निर्देशित यह एकमात्र फिल्म थी। जालान ने 1972 में पश्चिम बंगाल नाटक उन्नयन समिति के नाटक तुगलक में बंगाल के लोकप्रिय रंगकर्मी शंभू मित्र के साथ मंच पर अभिनय किया था। इस बांग्ला नाटक में देवव्रत और रूद्र प्रसाद सेनगुप्त ने भी अभिनय किया था। बांग्ला नाटकों के अलावा बांग्ला फिल्मों में भी अभिनय किया। बांग्ला फिल्म चोख में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें श्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। जालान ने रंगमंच साहित्य में ही अपने छह दशक से ज्यादा का जीवन लगा दिया। छात्र जीवन में ही रंगमंच उनकी पसंदीदा विधा बन गई थी। 15 साल की उम्र में उन्होंने 1949 में नया समाज नामक एक नाटक में अभिनय किया। तरुण संघ की तरफ से यह नाटक खेला गया और कोणार्क, चंद्रगुप्त जैसे बहुत से नाटकों का निर्देशन भी किया। 1955 में ही जालान ने अपनी नई रंगसंस्था 'अनामिका' की स्थापना की, बाद में पदातिक भी। तब तक अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में वे अपनी प्रतिभा का लोहा रंगकर्मी के रूप में मनवा चुके थे। प्रसिद्ध नाटककार साहित्यकार और स्त्री रंगकर्मी प्रतिभा अग्रवाल अनामिका से उसके स्थापना काल से जुड़ी रहीं। प्रतिभा अग्रवाल के मुताबिक उस समय किसी भी नाटक को मंचन करने का निर्णय करने पर उसके उपयुक्त साधनों को जुटाना बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती थी। कलाकारों, तकनीकी सहायकों को साथ लेना श्यामानंद का पहला काम होता। परिस्थितियों के आगे - पीछे, आजू-बाजू लड़ाई झगड़ा, मत विरोध व मनुष्य कारक वितरण जो भी चला रहा हो,उनका रिहर्सल आमतौर पर सुखद होता था। श्यामानंद जालान हमेशा बड़े रूप में चीजों की परिकल्पना करते। अनेक बार इतने बड़े रूप में कार्य करने के बाद कई तरह की उलझने खड़ी हो जाती। पर वे मानते थे कि बड़े रूप में सोचे बिना बड़ा काम नहीं किया जा सकता। इसी कारण अनामिका ने बहुत सी यादगार प्रस्तुतियाँ दी। अनामिका और श्यामानंद जालान जल्द ही एक दूसरे के पर्याय बन गए। स्त्री नाट्ककार प्रतिभा अग्रवाल एक प्रसिद्ध रंगकर्मी रही हैं जिनकी शुरुआत अनामिका नाट्य संस्था से हुई। सन् 1955 में भँवरमल सिंघी, सुशीला सिंघी, प्रतिभा अग्रवाल के साथ मिलकर ‘अनामिका’ की स्थापना हुई । संगीत नाटक एकेडमी एवार्ड 2005 से पुरस्कृत प्रतिभा अग्रवाल एक ऐसी प्रतिभा संपन्न महिला है जिन्होंने अपने नाम को सार्थक किया है। उनका जन्म 1930 में बनारस में एक ऐसे घराने में हुआ जिसने हिंदी भाषा और हिंदी नाटक को सशक्त बनाने में विशेष भूमिका निभाई।रंगमंच के प्रति प्रतिभा जी की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण मिलता है जो इस प्रकार है - सन् 1959 में उनके पिता मृत्यु शय्या पर थे। दिल्ली में नाटक नए हाथ का मंचन था। 12 अगस्त को पिता की इह जीवन लीला की समाप्ति हुई। प्रतिभा 18 को दिल्ली गईं 19 अगस्त को नाटक किया और 21 की सुबह लौटकर पिता के दशकर्म विधान में भाग लिया। रंगमंच से उनकी इस प्रतिबद्धता और समर्पण के पीछे अभिनय, संगीत और साहित्य के गहन संस्कार रहे हैं जो उन्हें विरासत में मिले। उनके पिता बाल कृष्ण दास बनारस में रंगमंच की मशहूर शख्सियत थे और दादा राय कृष्ण दास प्रसिद्ध लेखक थे। वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के सगे फुफेरे भाई थे। भारतेंदु के निवास स्थान भारतेंदु भवन में ही 10 अगस्त 1930 को प्रतिभा अग्रवाल का जन्म हुआ था। प्रतिभा का दाखिला वाराणसी के अग्रवाल कन्या पाठशाला में कराया गया, कक्षा तीन में सुशीला का इनाम मिला। स्कूल के वार्षिकोत्सव में नृत्य और गायन का बराबर मौका मिला और रंगमंच से जुड़ने की शुरुआत भी इस समय से हो गई थी। उनको छोटी उम्र में ही डेढ़ सौ कविताएं कंठस्थ थीं । पिता रोज कहीं - न - कहीं नाटक खेलने जाते। कभी-कभी बेटी को भी साथ ले जाते नाटक दिखाने। नाटक देख उनके भीतर भी रंगकर्म की प्रेरणा जागृत हुई और वह स्कूल के वार्षिकोत्सव में नाटकों में भाग लेने लगी। इसके अलावा काशी के महिला मंडल के वार्षिकोत्सव में राधा कृष्ण दास के 'महाराणा प्रताप' में प्रतिभा ने पहली बार मंच पर अभिनय किया। तब उनकी उम्र 13 वर्ष की थी। इस दौरान प्रतिभा को मदन मोहन अग्रवाल ने हनुमान भैया के यहाँ देखा। मदन बाबू को प्रतिभा का रूप रंग भा गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। बगैर दहेज के 15 फरवरी 1945 को विवाह हुआ। तब प्रतिभा की उम्र 15 वर्ष और मदन बाबू की 25 वर्ष थी। शादी के 15 दिन बाद ही प्रतिभा पति के साथ कोलकाता आ गईं। शादी के साल भर बाद ही इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए प्रतिभा को शांतिनिकेतन भेजा गया । वहाँ प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' का आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रूपांतरण किया जिसमें नवाब वाजिद अली शाह की भूमिका प्रतिभा ने निभाई। शांति निकेतन से तीन वर्ष बाद कोलकाता में प्रतिभा ने पहली बार दो अतिथि और कला और जीवन में अभिनय किया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। समस्या अलग-अलग रास्ते, चंद्रगुप्त और शाहजहां में अभिनय करने के बाद 1955 में प्रतिभा 'अनामिका' नाट्य संस्था से जुड़ गई। अनामिका की रंग प्रस्तुतियां नए हाथ, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, घर बाहर, छलावा, सुहाग के नूपुर और आधे अधूरे में उनके अभिनय की धूम मच गई। इसी तरह गोदान में धनिया के रूप में उनके अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं। 1981 में प्रतिभा अग्रवाल ने कोलकाता में नाट्य शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्थान भारत की हर भाषा से जुड़े थिएटर के ऐतिहासिक तत्वों का संग्रह है और इतिहास की मुकम्मल जानकारी प्रदान करता है। दुर्लभ नाट्य पांडुलिपियों, पोस्ट नाट्य समीक्षाएं, पत्र- पत्रिकाओं की कतरनी, पुस्तक ऑडियो वीडियो कैसेट, फिल्म, मॉडल, स्लाइड, तस्वीर, पोशाक आभूषण, ब्रोशर्स आदि का अनुपम संग्रह है। 1986 में मास्टर फिदा हुसैन पर प्रतिभा अग्रवाल की किताब से यह संस्थान काफी सक्रिय हुआ। उसके बाद उनकी किताब रंगकर्मी हबीब तनवीर एक रंगकर्मी पुस्तक भी आई । नाट्य संस्थान की स्थापना के बाद से प्रतिभा जी का अभिनय निर्देशन छूट गया लेकिन संस्थान के रंग संरक्षण का महत्वपूर्ण काम उन्होंने किया। वह लेखिका और अनुवादिका भी हैं। उन्होंने सृजन का सुख-दुख दस्तक जिंदगी की मोड जिंदगी का हिंदी में मौलिक कृतियांँ लिखीं। प्रतिभा जी उपन्यासकार भी हैं। प्यारे हरिश्चंद्र जू शीर्षक से उन्होंने जीवनी उपन्यास लिखा। उनका शोध प्रबंध हिंदी मुहावरे विश्लेषणात्मक विवेचन भी एक मूल्यवान कृति है। मौलिक लेखन के अलावा प्रतिभा जी ने 6 उपन्यासों के नाटक रूपांतरण किया। गोरे भाई (रवींद्रनाथ ठाकुर) , सुहाग के नूपुर (अमृतलाल नागर), गोदान, (प्रेमचंद), मैला आंचल ((रेनू) प्रतिभा अग्रवाल ने 40 से अधिक नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है जिसमें बंगाल और गुजराती नाटकों का विशेष रूप से अंग्रेजी से एप्सन ऑथर मिलर के नाटकों का हिंदी अनुवाद किया। कई पुस्तकों का संपादन भी किया जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है हिंदी रंग कोष और उन्होंने कई वर्षों तक कोलकाता साहित्य संकलन भी निकाला । नाट्यकार, साहित्यकार और शिक्षिका डॉ उषा गांगुली ने कोलकाता में हिंदी नाटक को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। बांग्ला नाटक रंगमंच के जरिए बांग्ला हिंदी सेतु बंधन में अहम भूमिका अदा करने वाली उषा गांगुली को जानने का अवसर उन्हीं की रंग प्रस्तुति 'अंतर्यात्रा' देती है। यह नाटक उनकी आत्मकथा है। उनके निजी और रंग जीवन में जो स्त्रियां आईं सभी इसमें है। दूर खड़ी एक स्त्री जो पुरुष के प्रेम के द्वंद में फंसी बीना । आत्म सम्मान से जीने के लिए घर से बाहर आई मुनिया राजनीतिक विप्लव की साकार छवि बन गई, गोर्की की मां। गाड़ी के बोझ को अकेले खींच रही हिम्मत में, साहसी सावित्री। रुदाली की शनिचरी जिसका पेशा है अमीरों के मुर्दे पर रो कर पैसा कमाना। उषा गांगुली निर्देशित अभिनीत अंतर्यात्रा सिर्फ नाटक नहीं, बाहर - भीतर के जंग से निरंतर जूझती स्त्री की संघर्ष गाथा है। इस नाटक में तीन ज्यामिति आकृतियाँ मंच सज्जा का जरूरी हिस्सा है। मंच सज्जा चौधरी की है और प्रकाश व्यवस्था तपन सेन की। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के धुरंधर हैं मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में जो अंतर्यात्रा में कथा की संप्रेषणीयता को कई गुना बढ़ा देती है। ढाक बजता है और उसी के साथ उषा मंच पर प्रकट होती हैं। ढाक की आवाज उषा को बचपन की याद दिलाती है और जब वह स्मृतियों में उतरती है तो उनके निजी जीवन और रंग जीवन में आई कई स्त्रियों की वेदना उनका संघर्ष उनकी आंखों के सामने दर्शाया जाता है। इस तरह उषा गांगुली के अंतर्यात्रा में कई कई स्त्रियों की अंतर्यात्राएँ जुड़ती जाती हैं और सभी मिलकर नाटक को स्त्री संघर्ष की महागाथा के रूप में परिणत कर देती है। उषा गांगुली इसमें हिंदी और बांग्ला में भी अपनी बात कहती हैं। उषा का संपूर्ण जीवन अनुभव व रंग अनुभव इस नाटक में तनाव और जीवंतता को बनाए रखता है। दृश्य श्रव्य के सहारे पूरे एक घंटे तक वह दर्शकों को खींचे रखती हैं। उनकी संवादमयी भंगिमा इतनी असरदार है कि दर्शक पूरी अंतर्यात्रा में शरीक होता चलता है और उनकी चिंताओं में भी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की हैसियत का बोध उषा को बचपन में ही हो जाता है। उनकी यह जिज्ञासा कि छोटे भाई की तरह मेरा जन्मदिन क्यों नहीं मनाया जाता, बहुत ही मार्मिक है। यह छोटा सा संवाद स्त्री-पुरुष समानता की पूरी कहानी खोल देता है। फिर शुरू हो जाती है एक-एक पात्र की दुख भरी कहानी बीना की याद आ रही है। बीना बस ड्राइवर की बेटी है। नौकरी करने दिल्ली जाती है।बुद्धिजीवी सुदीप के प्रेम में डूब जाती है। बीना परिवार के साथ सुदीप का इंतजार करती है, पर सुदीप नहीं आता है। आता है उसका एक खत जिसमें लिखा होता है कि उसने जो जो कहा सब झूठ है। पूरा घर बीना पर बरस पड़ता है। बहुत से ऐसे नाटक हैं जिसमें उषा ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है । अंतर्यात्रा नाटक मुनिया के सिंदूर प्रसंग को अनिमा दी के प्रसंग से जोड़ता है। हम सबके घर में अनिमाएं रहती हैं जो उप नगरों से आकर हमारे घरों को संभालती हैं। अनिमा दी अपने घर से निर्वासित होकर कोलकाता आई थी। उषा पूछती है कि सीता से जो निर्वासन शुरु हुआ उसका अंत कब होगा। अनिमा दी मांग में सिंदूर लगाती थी। वे अपना गांव मथुरापुर इसलिए छोड़ कर आई थी क्योंकि वहां उनकी सौत आ गई थी। अनिमा दी के बाद उषा गोर्की व ब्रेख्त की मां का स्मरण करती है। 1992 में मां का मंचन हुआ । किंतु वही एक संपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के प्रति मूर्ति होती है। सिमिलगीं को गोली लग जाती है। तब भी धीरे-धीरे जमीन पर झुकती है झंडा उठाती है। झंडा मैं उठाऊंगी इन सबको बदलना होगा बालासवा तुम्हारे बेटे को गोली मार दी गई है यह सुनकर मां बेटे के शोक में कमजोर नहीं होती बल्कि और मजबूत होकर सामने आती है।सुरक्षा के सवाल से रोज स्त्री को रूबरू होना पड़ता है। स्वयं उषा गांगुली को भी जूझना पड़ा है। अंतर्यात्रा में उषा का स्वयं का एक अनुभव है। वे नंदन सभागार में एक सेमिनार में बोलकर वापस आ रही थीं। सड़क पार कर टैक्सी के इंतजार में गोखले रोड के किनारे खड़ी हुई थी कि अचानक एक अनजान अपरिचित सामने आकर कहता है कि मेरे साथ कॉफी पीने जाएंगी! उस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने हजार हजार बाल्टी ठंडा पानी उषा पर डाल दिया हो। लगा उनकी शिक्षा उनका सम्मान उनका अध्यापन उनका सुंदर थिएटर सब कुछ खाक में मिल गया। वह सिर्फ एक नारी है इस तरह बहुत से कार्य उन्होंने किए। माधुरी रंगकर्मी की संस्थापक सदस्य थी। देखने पढ़ने में सुंदर थी, स्वर्ण पदक मिला था। वही माधुरी एक दिन दोपहर के वक्त दौड़ती आई, उसके पूरे शरीर से केरोसिन की गंध आ रही थी। बोली वह लोग मुझे मार डालेंगे। मेरे हाथ में माचिस की तिल्ली देकर चिल्लाने लगी आग लगा दो। 14 दिन कमांड अस्पताल में रहकर चल बसी। उसने लास्ट स्टेटमेंट दिया मेरी मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं। जीवन में मिली स्त्रियों की कथा व्यथा सुनाते हुए उषा बराबर स्त्री की अवस्था को व्यापक सामाजिक संदर्भों के बीच रखकर जांचने पररखने की कोशिश करती है। नाटक का एक संवाद है मीराबाई की जंजीर भी कम भारी नहीं थी।मेरा मन प्रभु चरणों में लगा ही रहा। इसमें जो होना हो सो हो। उषा आखिर में लिखती हैं कि मैं भी बचूंगी, मैं बच गई इस संवाद के साथ ही पर्दा गिरता है। कहना न होगा कि स्त्री का संघर्ष और उसका आत्म संघर्ष चलता रहता है। अभी भी चल रहा है, संघर्ष में ही निर्मित भी होती है और स्त्री विमर्श के नए गवाक्ष खोलते हैं।(डॉ कृपाशंकर चौबे के लेख बंगाल में रंगमंच का इतिहास और वर्तमान से) वर्जिनिया वूल्फ ने कहा है कि स्त्री का लेखन स्त्री का लेखन होता है, स्त्रीवादी होने से बच नहीं सकता। हिंदी महिला नाट्यकार उमा झुनझुनवाला लिटिल थेस्पियन थियेटर की संस्थापक हैं जिन्होंने अपने पति अज़हर आलम के सपनों को साकार करने में दिन-रात एक किया। उनकी नाट्य यात्रा तीन दशकों से अनवरत चल रही है जिसमें पति नाटककार अज़हर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं। कोरोना महामारी में अजहर के मरणोपरांत भी उमा ने रंगमंच की बागडोर को संभाले रखा और शो कभी बंद नहीं किया बल्कि एक नया मुकाम हासिल किया। औरत_की_एक_डायरी महज लेखिका की डायरी नहीं, बल्कि यह किसी भी स्त्री के विश्वास और उसके टूटने तथा उससे उपजी मनस्थितियों के आरोह-अवरोह, द्वंद्व, विषाद, दृश्य-अदृश्य की पीड़ा आदि का लेखाजोखा है, जहां एक औरत के भीतर जीती दो औरतें या फिर एक औरत के भीतर जीती कई-कई औरतें बड़बड़ाती-सी प्रतीत होती हैं। इसके पन्नों में दर्द की अपनी कहानी है, जो एक पात्र से निकल कर दूसरे से होते हुए कई जानी-अनजानी स्त्रियों को छूते हुए, उन्हें कुरेदते हुए पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ती है। इन पन्नों में औरतों के मनोभावों को समझने का प्रयास है और इसीलिए इस डायरी के पन्नों को न तो किसी तारीख में बांधा गया है और न ही दिन में। उन्होंने इसके कुछ पृष्ठों का मंचन भी किया है। तीन नाटक विसर्जन, भीगी औरतें, लम्हों की मुलाकात, लाल फूल का एक जोड़ा उमा झुनझुनवाला की नाट्य कला के महत्वपूर्ण नमूने हैं। उनके पात्रों में सीमा सिंह कोई मामूली लड़की नहीं थी। उसके व्यक्तित्व में एक ख़ास आकर्षण था। बातचीत का सलीका ऐसा कि सुनने वाला उसके असर से बंध जाए जबकि आवाज़ में कोई एक रेशा ऐसा भी मिश्रित रहता कि उससे बंध कर भी सुननेवाला नियंत्रण की हद में ही रहे और आँखे तो लगता है ईश्वर ने किसी ख़ास मकसद से ही बनाई थी, गज़ब का चुम्बकीय आकर्षण था। काजल लगी आँखें ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे समंदर में तिरती कोई नौका। शहर के प्रतिष्ठित आनन्द मोहन राय कॉलेज के फाइनल इयर की विख्यात छात्रा थी। रेंगती परछाई नाटक में एक बेवा और उसके तीन अधेड़ बेटियों की कहानी है ।घर के चप्पे-चप्पे पर रेंगती परछाई के इर्द-गिर्द घूमती है। जहां सभी को एक पुरुष की कमी खलती है। घर के सन्नाटे को दूर करने के लिए वे सभी बेटियां भोग विलास के लिए एक-एक करके मां के शौहर ऑफिज से रिश्ता बना लेती है।बाद में छोटी बेटी यह राज़ खोलती है। तुम्हे याद है न..कविता में उमा झुनझुनवाला की प्रत्येक कविताओं में सच्चे भोगे हुए शब्दों के भाव लहराते हुए प्रवाहित होते रहते हैं। जब नदी किनारे हम मिला करते थे तो नदी लहराती हुई हमारे क़दम चूमने आ जाती थी अब तो कई युग बीत गए। तुम्हें याद है न... हरी घास पर बैठे जब हम गिन रहे होते थे। रूमानी घड़ियाँ। हरी घास कैसे कैसे गुलाबी हो जाया .. कुछ इसी तरह की अन्य कविताओं में भी एक ऐसे लोक में ले जाती हैं जहां प्रेम की ऊंचाईयां हैं - - नदी में नौका चल रही थी माझी नदी का दिल गुनगुना रहा था कि औरत को बहता हुआ एक लाल फूल दिखा रोज दिखता है इसी वक्त कोई नहीं जानता रोज़ इसी वक्त नदी में यह लाल फूल कौन बहाता है कहीं यह भ्रम तो नहीं ------------- एक जोड़ी आँख दिख जाती है वह उस तरफ दौड़ कर जाती है चारों तरफ घूम घूम कर उस आँख को तलाशती है मगर वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता भीगी औरतें नाटक का निर्देशन किया जिसकी परिकल्पना और नाटक लेखन भी उमा झुनझुनवाला का रहा। भीगी औरतें नाटक अमृता प्रीतम की कहानियों और कविताओं की आग से उत्पन्न स्त्री कथा है। उमा का मानना है कि अमृता को पढ़ना एक स्त्री के तीव्र दर्द से गुजरने जैसा है। यह स्त्री की आस्था, टूटन और उसकी त्रासदी को दर्शाने वाली है। साथ ही स्त्री के विश्वास उसकी महानता और क्षमा करने और आगे बढ़ने की उदारता की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। वे मानती हैं कि नाटक में स्त्री कलाकार ही अपने रंगों को महसूस कर सकती है। यही इसे एक वास्तविकता को दर्शा सकता है। 21 वीं सदी में निर्देशक,अभिनेत्री के रूप में देश में प्रसिद्धि प्राप्त उमा झुनझुनवाला नाट्य गुरु के रूप में अपनी कला को विस्तार देने के लिए लगातार थियेटर को विकसित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। विभिन्न संभावनाओं को, प्रतिभाओं को उभारने का काम कर रही हैं।13 वर्षों से जश्न ए अज़हर राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन कर रही हैं जो छह दिनों तक चलता है।देश भर की नाट्य संस्थाएं आकर नाटकों का मंचन करती हैं। श्रव्य के अंतर्गत रंग संवाद का सत्र और फिर नाटक की प्रस्तुति इस नाट्य उत्सव की खासियत है।अज़हर आलम मेमोरियल सम्मान से भी नाटककारों को सम्मानित किया गया। इस वर्ष यह नाट्य उत्सव 19-24 जनवरी 2024 तक चला जिसमें कोलकाता के कॉलेज युवाओं को जोड़ा गया। सभी के खाने-पीने की सुचारू रूप से व्यवस्था रहीऔर विद्यार्थियों ने नाटक में भी भाग लिया। सच कहा गया है कि नाटक प्राण है तो रंगमंच शरीर है। अज़हर आलम और उमा झुनझुनवाला ने 1994 में भारतीय नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन की स्थापना की जो सांस्कृतिक तथा व्यवसायिक आधार पर रंगकर्म के लिए प्रतिबद्ध है। 29 वर्षों से इस संस्था ने 35 नाटक, 46 कहानियाँ,10 एकांकी और 100 से अधिक कहानियों और कविताओं का अभिनयात्मक किस्से ख्वानी के रंगमंच प्रदर्शन किए हैं जिन्हें बहुत सराहना मिली है। रंगमंच की पहली उर्दू मैग्ज़ीन रंगरस का प्रकाशन भी किया गया है। भीगी औरतें, परछाइयाँ, कोई और रास्ता, रेत और इंद्रधनुष, एंडगे, हजारों ख्वाहिशें, रूहें, बलकान की औरतें, धोखा, कबीरा खड़ा बाजार में, गैंडा, शुतुरमुर्ग, यादों के बुझे हुए सवेरे आदि कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तुतियां हैं।सभी में अज़हर और उमा दोनों का निर्देशन रहा है। पति अज़हर आलम को पश्चिम बंगाल की ओर से नमक की गुड़िया के लिए बेस्ट प्ले राइट तथा सवालिया निशान के लिए बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से सम्मानित किया गया था। नटरंग प्रतिष्ठान ने अज़हर आलम को उनके नाटक रूहें के लिए नेमिचंद्र जैन नाट्यालेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कोरोना काल में अज़हर का साथ छूट गया लेकिन उमा ने हौसला नहीं छोड़ा। नारी शक्ति और रंगमंच का मतलब नारी को और शक्तिशाली बनाना लेकिन उसमें कलात्मकता और संवेदना भी होनी चाहिए। रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है। बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। रंगमंच के क्षेत्र में अभी भी महिला नाटककारों की कमी है। 80 के दशक के बाद से हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी स्त्री नाटककारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है जो रंगमंच के लिए अच्छा संकेत है। वर्तमान में बंगाल में हिंदी रंगमंच के इतिहास में उमा झुनझुनवाला का नाम महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है।

समीक्षा वीणा जैन एक उत्सव एक महोत्सव

वीणा जैन के काव्य संग्रह 'एक उत्सव :एक महोत्सव' बावरे मन की ये ज़ुबानी चिट्ठी - - - - (समीक्षा) - डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता वीणा जैन कृत ‘एक उत्सव: एक महोत्सव’ कविता वीणा जैन का सातवाँ कविता संग्रह है। आख़िर माजरा क्या है?, तरणी तरणी आदि कई कविता संग्रहों की रचनाकार वीणा जैन जानी-पहचानी एक स्थापित कवयित्री हैं। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह चित्रकार भी हैं। तैलचित्रों में उन्हें महारत हासिल है। उनकी एकल प्रदर्शनी कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में लग चुकी हैं। एक उत्सव: एक महोत्सव अस्सी कविताओं का संग्रह है जो अक्टूबर 2022 में प्रकाशित हुई है। किताब के आवरण की सादगी कवयित्री की सहजता, सरलता और गहराई से रूबरू कराती है। आवरण कुंवर रवीन्द्र ने बनाया है जिसमें जीवन के खुरदरेपन का अहसास तो है ही लेकिन जीवन का महोत्सव भी समाया हुआ है। प्रत्येक कविता नए पृष्ठ से आरम्भ होती है। कविताओं में कवयित्री का चित्रकार मन अपनी तूलिका के रंग भी बिखेरती नजर आती है । 90 के दशक से कवयित्री की जो शब्दों की नाव चली वह आज भी सागर की मदमाती लहरों से अनादि काल से लड़ती हुई उस स्त्री की कथा को कहती चली जाती है जो सागर तट पर खड़ी किसी अप्रत्याशित विजय गाथा की कठिन भूमिका को लिखने का कार्य कर रही है। 'वो दीप जला कर बैठी थी,और तेल चुकने वाला था।' उम्र के इस पडा़व पर भी वह विचारशील और जीवंतता से परिपूर्ण है। पांच दशकों से कविता और चित्रकारी एक दूसरे के पूरक बन रहे हैं। 1946 में राजस्थान के सरदाशहर में जन्मी वीणा जैन सरस्वती की सच्ची साधक हैं जिन्होंने वाक् देवी की आराधना की और उन्हें शब्दों की भाव भूमि पर उतारा है । वीणा की कविताओं को पढ़ते हुए अनामिका की 'स्त्रियाँ' कविता स्मरण हो आईं हैं जिसमें अनामिका क्रियात्मक बोध के बरक्स स्त्री के वजूद को तलाशती हैं । इस कविता में पढ़ना, देखना और सुनना तीन क्रियाओं के प्रयोग द्वारा समाज की उस चेतना को परखा गया है जिसके माध्यम से वे स्त्री को पढ़ते, देखते और सुनते हैं और इतना ही नहीं, भोगने की व्यथा की कथा भी अनामिका लिखती हैं। वीणा जैन की 'औरत 'कविता में कवयित्री का मानना है कि कहीं यह बदले की भावना तो नहीं है, कहीं अतीत के इतिहास का रूपांतरण तो नहीं हो रहा है? ये पंक्तियाँ सचेत कराती हैं - - 'यह दारुण दौड़ किसलिए? वजूद को ही... नर्क की ओर ढकेलता ये मोड़ किसलिए? ... तुम तो खुद रोशनी हो... अपनी रोशनी को विस्तार दो... पुरुष!! सहयात्री है तुम्हारा तुम भी तो हमसफ़र हो... फिर ये कैसी प्रतिस्पर्धा है कैसा अंतर्द्वंद है?' (पृष्ठ 75 एक उत्सव :एक महोत्सव) विभिन्न अस्मिताओं के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करते-करते स्त्री के विभिन्न अहसास जिंदगी से पूछे अनगिनत सवालों के जवाब के रूप में कवयित्री' आहट' कविता में अपनी' भोली सी अनुभूतियाँ' महसूस करती है और उसे अच्छे दिनों की आहट समझती है। (पृष्ठ 39 एक उत्सव) 'एक अनूठा किस्सा हूँ मैं' कविता में कवयित्री मानती है कि इस कायनात में, चहल-पहल में, एक हलचल, बैचेनी एक तिश्नगी, भ्रांत, क्लांत वातावरण में कितने ही मुखौटे लगाए इस चहल-पहल का अहम हिस्सा है। स्त्री के अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम यादों और रंगों का शब्द चित्रण इस काव्य संग्रह के उत्सव और महोत्सव हैं। प्रथम कविता 'जब मैं मुझसे मिलती हूँ!!' में कवयित्री स्पष्टीकरण करती है। चिड़िया , नवल नवोढा़, नव प्रसूता, झुर्रियों के जंगलों से चुपचाप गुजरना, बचपन से आज तक की सारी यादों को बटोरती हुई वह ध्यान में चली जाती है और मोहबंध से मुक्त हो शून्य में समा जाना चाहती है। इस जीवन को ही' एक उत्सव एक महोत्सव 'के रूप में देखती है। जन्म को उत्सव और मृत्यु को महोत्सव में उसका जीवन पिरोया है। इस जीवन के लंबे सफ़र में पथरीले पत्थर, सुंदर घाटियां, समंदर, गीत गाती नदियां, कंटीले जंगल, लहलहाती हरियाली के साथ - साथ मृत्यु के महोत्सव का इंतज़ार है। कवयित्री अपनी आध्यात्मिक यात्रा में मृत्यु के महोत्सव के देखने की इच्छा व्यक्त करती है जो जादू है।( पृ 14) कवयित्री ध्यानस्थ हो कविता के शब्दों में जीवन के सभी पडा़व, सभी पहलुओं पर विचार रखती है। वीणा की कविताओं को तीन प्रकार से महसूस किया जा सकता है। अध्यात्म का प्रथम, द्वितीय और तृतीय सोपान जहांँ वह साधक के अंतिम पड़ाव को पार करती नजर आ रही है। कवयित्री की कविता सुलगते मरुस्थल से भी गुजरी है लेकिन अब उसकी कविता थक गई है वह परिंदों की मीठी बोलियाँ सुनने के लिए आतुर है। पृ 20 जीवन की अंतिम यात्रा में सत्य को जानने के लिए उत्सुक है कवयित्री कहती है कि 'कुछ ही दिन तो बचे हैं शेष.. 'पृ 23 वह स्त्री की तुलना उस नदी से करती है जो निरंतर बहती रहती है और वह थकती नहीं है। वह कहती है नदी भी तो स्त्री है मेरी तरह क्या स्त्री थकती नहीं पृष्ठ 48 । लोग मुझे कहते हैं कवि , मैं ठहरी हुई अनुभूति हूँ उड़ता पंछी कविता में कवयित्री कहती है ।मैं अंतर्मुखी कविता मेरी सखी जैसे पंक्तियाँ कवयित्री के साधक मन को व्यक्त करती हैं। बिंब प्रयोग भी अद्भुत हैं और स्त्री की उपमा नदी की मनःस्थिति और उसके भौतिक रूप के साथ समानता देखती है - - नदी की छरहरी काया, उसके तीखे कटी - कटाव, काजल घुले ज्यूं नयन कजरारे, दिपते - झिपते किनारे और अद्भुत न्यारे नज़ारे पृष्ठ 69 आदि के प्रयोग से कवयित्री एक कविता बना लेती है। छलक - छलक कर अंतर को छू लेती नदी कवयित्री को शीत की भोर, छितरे- छितरे श्यामघन से जोड़ते हैं तो केदारनाथ के आंसूं समंदर, प्रेम, कुछ दिन हुए, खुशी की गौरेया, रुक जाओ वसंत, यायावरी, इस पिघलती उम्र में आदि कविताओं में कवयित्री की अनुभूति के स्तर की ऊंँचाइयों को देखा जा सकता है। भूख से रोता बच्चा, दूर वहाँ परदेस में, जहाज की डेक पर खड़ी मैं और कोलकाता का रिक्शेवाला आदि कविताओं में कवयित्री की संवेदनशीलता का और सच्चे मानवीय भावों के चित्र मिलते हैं । 'औरत' कविता में कवयित्री अपनी कथा के क्लाईमेक्स को लाती है और अपनी इच्छाओं को जाहिर करती है - - छूना है आकाश /ढूंढने है अपने इंद्रधनुष /हाँ अब वक्त आ गया है/बेवजह कसी बेड़ियों को तोड़कर /अपने अद्भुत सपनों को सच करने का वक्त। पृष्ठ 75 औरत को समझाती हैं - तू औरत ही अच्छी है /औरत ही बनी रहना... पृष्ठ 76 ।उसे एक अदद नखलिस्तान की खोज है। पृष्ठ 114 अंतिम कविता 'तुम नहीं समझोगे' में ब्रह्मांड के लिए चिट्ठी है जिसमें कई अनछुई चाहतें लिख देती है। उसका बावरा मन है। वह जानती है कि ये जुबानी चिट्ठी है। पृष्ठ 128। 'एक उत्सव :एक महोत्सव' कविता संग्रह एक स्त्री के मन के भावों के विभिन्न चित्र बिंबों को उकेरती है। भाषा सरल और सहज है। कविताओं में ताल, छंद और लय की गति है जो सौंदर्य को बढ़ाता है। मन की उदासी और निराशा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती हैं ये कविताएँ। पठनीय हैं। किताब – एक उत्सव: एक महोत्सव विधा – कविता रचनाकार – वीणा जैन प्रकाशक – कलमकार मंच मूल्य- 170 रुपए पेज संख्या- 128 आवरण-कुंवर रवीन्द्र संस्करण वर्ष – 2022 कवयित्री सम्पर्क- veenajainvrinda@gmail.com

रिपोर्ट साहित्यिकी संस्था में रूपा गुप्ता की पुस्तक

जाति है कि जाती ही नहीं:डॉ रूपा गुप्ता 19वीं सदी का औपनिवेशिक भारत: नवजागरण और जाति प्रश्न पुस्तक पर साहित्यिकी संस्था ने की परिचर्चा : कोलकाता की सुपरिचित संस्था “साहित्यिकी”की फ़रवरी महीने की मासिक गोष्ठी में डॉ रूपा गुप्ता की शोधपरक पुस्तक ‘19वीं सदी का औपनिवेशिक भारत: नवजागरण और जाति प्रश्न ’ पर आयोजित परिचर्चा में पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए लेखिका ने कहा कि हालाँकि 19वीं सदी आधुनिक मूल्यबोध के विकास की सदी रही, लेकिन संस्कृतिकरण के नाम पर जातिप्रथा को मज़बूत करने की राजनीति में मनुष्यता बोध के पीछे छूट जाने से आधुनिकता खंडित हुई। जाति समाज को बाँटती ही नहीं है, प्रेमविहीन भी बनाती है और प्रेमविहीन समाज कुंठित समाज होता है।डॉ. रूपा ने बताया कि उक्त पुस्तक उनके 11 वर्ष की कठिन साधना का प्रतिफल है जिसमें उन्होंने हिंदी नवजागरण को भारतीय नवजागरण से जोड़ने तथा जाति के बदलते स्वरूप को तथ्यों की रोशनी में आज के संदर्भ से जोड़ने का चुनौतीपूर्ण प्रयास किया है। डॉ. पूनम दीक्षित ने डॉ. रूपा गुप्ता की कृति को प्रासंगिक बताया और कहा कि शोधार्थी एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्रों को इस पुस्तक से बहुत मदद मिलेगी और पुस्तक के कलेवर पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि यह हमें सोचने, जानने और समझने के लिए झकझोरती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पुस्तक के चुनिंदा विषयों पर कार्यशाला, विमर्श रखे जा सकते हैं। यह सत्यान्वेषण की दृष्टि देती हैं। विख्यात साहित्यकार डॉ. तनुजा मजूमदार ने डॉ. रूपा गुप्ता की इस अद्भुत कृति के विस्तृत फलक पर बात करते हुए कहा कि यह पुस्तक अंतर्विषयक साहित्य का उत्कृष्ट नमूना है जिसमें इतिहास,समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं अनेक प्राचीन पुस्तकों तथा ग्रंथों की सम्यक चर्चा हुई है। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक के शीर्षक में चार आयाम हैं-19 वीं सदी, औपनिवेशिक भारत, नवजागरण एवं जातीय प्रश्न। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, वाणिज्यवाद, तथा बाज़ारवाद की कड़ियों को जोड़ती है तथा उनका सटीक विश्लेषण करती है। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार ने वृहद अनुसंधान के पश्चात अपने हर तथ्य को प्रमाणित करने के लिए आंकड़े दिए हैं जो कि औपनिवेशिक भारत को समझने के लिए बहुत आवश्यक है और जिसे समझाने में वे सर्वथा सफल हुई हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षा डॉ. राजश्री शुक्ला जी ने महत्वपूर्ण, गंभीर परिचर्चा की केंद्र डॉ रूपा गुप्ता जी को उनकी इस अमूल्य रचना के लिये साधुवाद किया। सदस्य वक्ता डॉ.पूनम दीक्षित एवं अतिथि वक्ता प्रोफ़ेसर तनुजा मजूमदार को उनके विद्वतापूर्ण, सारगर्भित तथा विस्तृत विवेचन के लिए आभार प्रकट किया। आरंभ में साहित्यिकी की सचिव डॉ. मंजुरानी गुप्ता ने साहित्यिकी का संक्षिप्त परिचय देते हुए उपस्थित सुधीजनों का स्वागत किया। कार्यक्रम में विशिष्ट रूप से उपस्थित प्रो. शंभुनाथ साव, प्रो. हितेंद्र पटेल, राज मिठौलिया, प्रेम कपूर, प्रदीप जीवराजका, सुनीता गुप्ता, साहित्यिकी की अध्यक्ष विद्या भंडारी एवं सदस्याओं और अच्छी ख़ासी संख्या में उपस्थित शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं को कार्यक्रम की संचालिका रेवा जाजोदिया ने हार्दिक धन्यवाद दिया। रिपोर्ट प्रस्तुति कविता कोठारी की रही। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

रिपोर्ट भवानीपुर कॉलेज में क्रिकेट 24

भवानीपुर कॉलेज ने शिक्षकों और गैर-शिक्षण स्टाफ सदस्यों के बीच प्रथम बार क्रिकेट टूर्नामेंट --- भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने 17 और 18 फरवरी, 2024 को नॉर्दर्न पार्क में इंट्रा कॉलेज टीचर्स और नॉन-टीचिंग स्टाफ क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया। प्रथम बार इस तरह का टूर्नामेंट खेला गया जिसे आईपीएल प्रारूप के अनुसार अपनाया गया । इसमें लगभग 60 शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक स्टाफ सदस्यों ने 10 फरवरी, 2024 को कॉलेज के 6वीं मंजिल के कॉन्सेप्ट हॉल में आयोजित नीलामी में भाग लिया। नीलामी के दौरान, कॉलेज के विभिन्न विभागों से छह कप्तान नियुक्त किए गए। उन्हें 10 खिलाड़ियों वाली अपनी-अपनी टीमों के लिए खिलाड़ियों को खरीदने के लिए प्रत्येक को 5 लाख अंक वितरित करने का काम सौंपा गया था। नीलामी में शामिल सभी लोगों के लिए यह एक मनोरंजन और रुचि का एक बड़ा स्रोत साबित हुआ। यह मैच भवानीपुर के नार्दन पार्क में संपन्न हुआ। सुबह 8 बजे से शाम 4.30 बजे तक क्रिकेट खेला गया। जिसमें भागीदारों की कुल संख्या 60 रही और छह टीमों में विभाजित समूह अ में टाइगर्स सस्पो चक्रवर्ती कप्तान , रॉयल आर्किमन लाहिड़ी बी कॉम मॉर्निंग कप्तान, योद्धा बिजॉय सामंतों कप्तान, समूह - बी चैलेंजर्स चंदन कुमार झा बी कॉम मॉर्निंग, कप्तान, रेंजर्स निरभ्र बसु साइंस कप्तान, सैनिक सायन सरखेल आर्ट्स कप्तान। टाइगर्स, वॉरियर्स, रॉयल्स, सोल्जर्स, चैलेंजर्स और रेंजर्स में विभाजित टीमों के नाम हैं । तीन टीमों ने ग्रुप ए के भीतर लीग मैचों में प्रतिस्पर्धा की, जबकि शेष तीन टीमों ने 17 फरवरी 2024 को ग्रुप बी में खेला। लीग मैचों के बाद, प्रत्येक समूह से दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचीं, जिसका समापन 18 फरवरी, 2024 को आयोजित फाइनल मैच में हुआ। वॉरियर्स और टाइगर्स ने पहला सेमीफाइनल खेला और सोल्जर एंड चैलेंजेस ने दूसरा सेमीफाइनल खेला और फाइनलिस्ट टाइगर्स और वॉरियर्स थे, जिन्होंने रोमांचक फाइनल मुकाबले में अपने कौशल और खेल कौशल का प्रदर्शन किया और टाइगर्स टूर्नामेंट में चैंपियन बने। कॉलेज के खेल अधिकारी रूपेश गांधी ने बताया कि यह टूर्नामेंट एक शानदार सफलता थी, जिससे हमारे कॉलेज के शिक्षकों और गैर-शिक्षण स्टाफ सदस्यों के बीच सौहार्दपूर्ण और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

रिपोर्ट भवानीपुर पिकनिक

भवानीपुर कॉलेज ने मनाया विद्यार्थियों के साथ इबीजा फ़र्न रिज़ॉर्ट में पिकनिक--- भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने 200 छात्र छात्राओं के साथ 26 फरवरी 2024 को, 14 संकायों के साथ लगभग इबीसा फ़र्न रिज़ॉर्ट में पिकनिक मनाया गया जिसका उद्देश्य शिक्षक, शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों के साथ आपसी विश्वास को मजबूत करना था । भवानीपुर कॉलेज के परिसर से 4 बसों में विद्यार्थियों ने अपनी यात्रा शुरू की जिसमें विद्यार्थियों ने अपने स्पोर्ट्स गियर, म्यूजिक सिस्टम और चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान साथ लिए डेढ़ घंटे की लंबे सफर को तय किया। रास्ते में यात्रा को आनंददायक बनाने के लिए बीईएससी का नारा लगाते हुए गीत और नृत्य किए । भरपूर नाश्ते के बीच प्रकृति का अभिवादन और स्वागत किया गया, पिकनिक में ज्ञात और अज्ञात चेहरों से जुड़ने के कारण परिचय का दायरा भी बढ़ा। दिन भर में शामिल होने के लिए कई विकल्पों के साथ, रिज़ॉर्ट में जिप लाइन, बोटिंग, साइकिलिंग के साथ-साथ शतरंज, टेबल टेनिस, कैरम जैसे खेल भी उपलब्ध थे। दोपहर तक छात्र छात्राओं ने डिस्कोथेक की ओर गए और दोपहर के भोजन तक जमकर नृत्य किया। दोपहर का भोजन हो चुका था और सभी ने प्रकृति का आनंद लिया परिसर में आनंद और म्यूजिकल चेयर खेल जमकर खेला। शाम 4.00 बजे तक इबीज़ा रिज़ॉर्ट में दिन भर चले उत्सव को समाप्त करने के लिए चाय और नाश्ते की पेशकश की गई। 5.30 बजे तक छात्र पुराने और नए चेहरों के साथ दोस्ती के अपने बंधन को नवीनीकृत करते हुए शाम को कॉलेज लौट आए। कॉलेज की पिकनिक जीवन की मीठी यादों को संजोए रखती है। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

Monday, February 19, 2024

रिपोर्ट भवानीपुर कॉलेज ने बाघा जतिन को दी श्रद्धांजलि

स्वतंत्रता सेनानी जतींद्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) को दी गई श्रद्धांजलि - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने स्वतंत्रता सेनानी बाघा जतिन यानी जतींद्रनाथ मुखर्जी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित की। "अमरा मोरबो, जगत जगबे - हम देश को जगाने के लिए मरेंगे।"जतीन्द्रनाथ मुखर्जी ('बाघा जतिन')ने इस नारे के साथ देश को स्वतंत्र करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। गणतंत्र दिवस पर भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थियों, प्रबंधन के सदस्यों , शिक्षक और शिक्षिकाओं की उपस्थिति में पारंपरिक वेशभूषा में कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत दानी और उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, रेक्टर प्रो दिलीप शाह ने ध्वजारोहण किया और राष्ट्रगीत गा कर झंडे का सम्मान किया। इस अवसर पर भवानीपुर कॉलेज के एनसीसी की जल थल और वायु सेवा विंग और भवानीपुर आईएससी स्कूल के छात्रों ने बैंड के साथ मार्चपास्ट करते हुए राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी। कॉलेज के अध्यक्ष श्री रजनीकांत दानी ने सभी अतिथियों और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए 75वें गणतंत्र दिवस पर बधाई और शुभकामनाएँ दी । छात्र मामलों के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने भारत के संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया जिसमें सभी उपस्थित लोग शामिल हुए। कॉलेज के महानिदेशक डॉ. सुमन के मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपने वक्तव्य रखते हुए रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखे राष्ट्रगान का महत्व बताया और देशभक्ति का संदेश दिया। बाघा जतिन के जीवन पर कॉलेज के इन - एक्ट कलेक्टिव के एक साथी कलाकार ने उनके अपने जीवन को अभिनयात्मक रूप में दर्शाया जो बहुत ही प्रभावी रहा। इस प्रस्तुति में स्वतंत्रता सेनानी के जीवन के क्षण और उन्हें 'बाघा' जतिन की उपाधि कैसे मिली, इसकी कहानी शामिल रही। अंत में एक्ट टीम द्वारा सभी के साथ मिलकर प्रसिद्ध गीत "आरंभ है प्रचंड है" गीत को एक साथ गाया गया जिससे प्रत्येक भारतीय में राष्ट्रीयता के भाव प्रबल रूप से प्रकट हुए । राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर आईसीएसई और आईएससी स्कूल के छात्रों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम नृत्य, 80 और 90 के दशक के प्रसिद्ध जिंगल और नाट्य प्रस्तुतियां भी दीं गई जो बहुत पसंद की गईं। । बीईएससी की किकबॉक्सिंग टीम द्वारा आत्मरक्षा तकनीकों का प्रदर्शन किया गया । अन्य प्रदर्शनों के अलावा, भवानीपुर डिज़ाइन अकादमी के छात्र भी समारोह में शामिल हुए और देशभक्ति गीतों पर नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद क्रेस्केंडो कलेक्टिव द्वारा एक लाइव संगीत सत्र था जहां उन्होंने हमारे देश के रंगों के असंख्य गीतों की प्रस्तुति दी, फ्लेम्स कलेक्टिव फ्लेम ने पूर्वी और पश्चिमी नृत्य द्वारा एक पावर-पैक नृत्य का प्रदर्शन किया । गणतंत्र दिवस समारोह में सर्वश्रेष्ठ वेशभूषा पहनने वाले छात्र की घोषणा की गई जो बीईएससी के छात्र देवांग नागर और सानिया फहीम को दिया गया। वहीं शिक्षकों में सर्वश्रेष्ठ वेशभूषा के लिए शिक्षक का खिताब डॉ. सुचित्रा और डॉ वसुंधरा मिश्र को दिया गया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने संविधान से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। कार्यक्रम के अंत में, प्रो दिलीप शाह ने उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद दिया और दर्शकों से जलपान के लिए वालिया हॉल में जाने का अनुरोध किया। रिपोर्टर अनिकेत दासगुप्ता और फ़ोटोग्राफ़र अंकित माझी, सौरीश कुमार देब, अर्का मुखर्जी, प्रियांशु चटर्जी रहे। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

रिपोर्ट भवानीपुर कॉलेज द्वारा एन एस एच एम नोलेज कैम्पस में मनाया नैक ग्रेड ए प्राप्ति का समारोह 24

भवानीपुर कॉलेज द्वारा एन एस एच एम कैम्पस में मनाया नैक ग्रेड ए प्राप्ति पर सम्मान समारोह - - - भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज को यूजीसी नैक टीम द्वारा ए ग्रेड प्राप्त होने की खुशी में कॉलेज द्वारा सम्मान समारोह मनाया। संस्थान ने अपने पचास वर्षों के बाद प्रथम बार सबके साथ मिलकर इस प्रकार का समवेत रूप से उपस्थित होकर सभी पदाधिकारियों, शिक्षक, शिक्षिकाओं, गैर शैक्षणिक कर्मचारियों, सुरक्षाकर्मियों आदि के साथ खुशी व्यक्त की जिसमें सभी का सक्रिय रूप से योगदान रहा।प्रसन्नता की बात है कि दो फरवरी को सायं 6.30 बजे से 9 बजे तक हुए इस कार्यक्रम का आयोजन एन एस एच एम नोलेज कैम्पस में किया गया जो भवानीपुर कॉलेज द्वारा अधिग्रहित किया गया है। कॉलेज के चार सौ से अधिक सदस्यों को इस खुशी के अवसर पर सजे हुए एन एस एच एम नॉलेज कैम्पस में एक शानदार पार्टी की गई। नाश्ता और भोज का शानदार आयोजन किया गया। साथ ही नैक ए ग्रेड रैंकिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शिक्षक और शिक्षिकाओं को उत्तरीय और मोमेंटो देकर क्रमशः अध्यक्ष रजनीकांत दानी, उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और सेक्रेटरी प्रदीप सेठ ने सम्मानित किया । एन एस एच एम नोलेज कैम्पस के प्रमोटर सिसिल एन्थनी ने स्वागत वक्तव्य देकर सभी का हार्दिक अभिनन्दन किया। अध्यक्ष रजनीकांत दानी, उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, सेक्रेटरी प्रदीप सेठ, रेक्टर प्रो दिलीप शाह और कॉलेज के गणमान्य पदाधिकारियों की उपस्थिति में सुस्वाद भोज पार्टी की सुव्यवस्था की गई। कॉलेज से आने-जाने के लिए बसों इंतजाम रहा। कार्यक्रम का संचालन मधुर आवाज के जादूगर अन्त्याक्षरी विशेषज्ञ रजत वैद द्वारा हुआ। अन्त्याक्षरी में सभी शिक्षकों और अतिथियों ने भाग लिया और बहुत आनंद उठाया गया । मैनेजमेंट के प्रमुख पदाधिकारियों ने अपने अलग अलग गीतों को गाया। सभी शिक्षकों को अपने साथ जोड़ा और आभार प्रकट किया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

थियेटर में स्त्रियों की भूमिका

थिएटर में खम ठोंक रही है स्त्रियां समसामयिक विषयों पर हिंदी में बहुत से नाटक लिखे और खेले जा रहे हैं। इसमें अहम् भूमिका निभा रही हैं स्त्री नाटककार। वे न सिर्फ स्त्री प्रधान नाटकों में काम कर रही हैं, बल्कि नित नए प्रयोग भी कर रही हैं। निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल... इसका भावार्थ यह है कि अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नति का मूलाधार है। कोलकाता की प्रसिद्ध नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन की संस्थापक उमा झुनझुनवाला वर्तमान में ऐसा नाम है जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृति और संस्कार के रूप में हिंदी नाटकों के क्षेत्र में युवा पीढ़ी के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। भोजपुरी, मैथिली, अवधी, डोगरी, पंजाबी जैसी आंचलिक भाषाओं के नाटकों में भी स्त्री नाटककार काम कर रही हैं। कोई भी भाषा हो, केंद्र में स्त्री पात्र ही होती हैं। उमा झुनझुनवाला द्वारा आयोजित जश्न ए अज़हर लिटिल थेस्पियन थियेटर फेस्टिवल के रंग संवाद में मुझे भी स्त्री संवाद सत्र के अंतर्गत कोलकाता में स्त्री नाटककारों के तभी तो मंझी हुई थिएटर आर्टिस्ट असीमा भट्ट कहती हैं कि चाहे किसी भी भाषा के नाटक हों, यदि उनमें से स्त्री पात्रों और उनकी भूमिका को हटा लिया जाए तो समाज का स्वरूप किस तरह प्रतिबिंबित होगा? उनका महत्व पहले भी था और आज भी है। मोहन राकेश के नाटक ‘आधे-अधूरे’ में स्त्री, समाज और संबंधों को दिखाया गया है। बांग्ला, उड़िया, मलयाली भाषाओं के नाटकों में स्त्रियां काफी मुखर हैं। शरतचंद्र के ‘चरित्रहीन’ में स्त्रियों की दैहिक मांग को प्रस्तुत किया गया है। सआदत हसन मंटो ने स्त्री को केंद्र में रखकर जितने भी नाटक लिखे, वे आज भी प्रासंगिक हैं। भोजपुरी में स्त्री पात्र भोजपुरी में नाटक वर्षों से मंचित हो रहे हैं, लेकिन नाटककार भिखारी ठाकुर ने इसे बिल्कुल नए तरह से परिभाषित किया है। दरअसल, उन्होंने अपने ज्यादातर नाटकों में स्त्रियों की तत्कालीन परिस्थितियों, विषमताओं की ओर इंगित किया है। भाई-विरोध, कलयुग प्रेम, विधवा विलाप, द्रौपदी पुकार आदि में स्त्रियों की मन:स्थिति का उन्होंने बखूबी चित्रण किया है। उनका प्रयोग आज भी जारी है। लोकप्रिय भोजपुरी नाट्य मंच रंगश्री समय-समय पर सामाजिक संदर्भों पर आधारित नाटक खेलती है। ज्यादातर नाटकों में स्त्री पात्रों की प्रधानता होती है। रंगश्री के डायरेक्टर महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘स्त्रियों पर आधारित नाटकों के दर्शक बड़ी संख्या में मिलते हैं। दरअसल, आजादी मिलने के 60 दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज भी देहातों में स्त्रियों की स्थिति चिंतनीय है। इसलिए महान साहित्यकारों के लिखे नाटक (राहुल सांकृत्यायन के नाटक ‘मेहरारुन के दुर्दशा’) आज भी प्रासंगिक हैं। छोटी जगहों के साथ-साथ बड़े शहरों में भी स्त्रियों पर आधारित नाटक देखे जाते हैं, क्योंकि इससे उन्हें उनकी सही स्थिति का आकलन हो पाता है। यही वजह है कि ‘भ्रूण हत्या’, ‘हमार बिटिया’, ‘महिला प्रतीक्षालय’ नाटक लोकप्रिय हैं। भोजपुरी नाटकों में अभिनय करने वाली सुचित्रा सिंह कहती हैं कि बोल्ड और मजबूत भावनाओं को दिखाने वाले नाटक अधिक पसंद किए जाते हैं। महेंद्र आगे कहते हैं कि बांग्ला और मराठी के उलट पहले भोजपुरी भाषा में स्त्रियों के अभिनय करने की संस्कृति नहीं थी। उन्हें नचनिया और बजनिया कहा जाता था। अब ऐसा नहीं है। अभिनय में रुचि रखने वाली लड़कियों को परिवार और समाज से बढ़ावा मिल रहा है। रंगमंच का विस्तार हो रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, भोपाल, पटना जैसे बड़े केंद्रों के अलावा, बरेली, आजमगढ़, जयपुर, बेगूसराय, सहरसा, मंडी, जबलपुर, रायगढ़ जैसी छोटी जगहों पर भी सक्रिय रंगकर्म हो रहा है। अत्याधुनिक मैथिली नाटक मिथिलांचल के ग्राम्य जीवन, सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक आंदोलनों और सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति और मिथिला की स्त्रियों की दशा और दुर्दशा को महान साहित्यकार नागार्जुन ने अपने कथा साहित्य में बखूबी दर्शाया है। हाल की चर्चित प्रस्तुतियों, जैसे ‘जल डमरू बाजे’, ‘विलाप’, ‘मुक्तिपर्व’ में स्त्रियों के भाव और विचार प्रमुख हैं। ‘मैथिल नारी का रंग’ में मिथिलांचल की स्त्रियों की समस्याओं को दिखाया जा रहा है। दिल्ली में मैथिल लोकरंग (मैलोरंग) रेपर्टरी के निर्देशक प्रकाश कुमार झा कहते हैं, ‘भावनाएं जुड़ी होने के कारण स्त्रियों की स्थिति पर आधारित नाटक प्रधानता से बनते और पसंद किए जाते हैं। मैथिली रंगमंच को हिंदी नाटकों की अपेक्षा दर्शक भी अधिक मिलते हैं। दर्शकों को अपनी भाषा सुनकर नॉस्टेल्जिया का अनुभव होता है। इन नाटकों का उद्देश्य स्त्री विषमताओं को दिखाना होता है। दूसरी ओर हिंदी नाटकों के विषय भारी-भरकम होते हैं। दर्शकों को देखने और समझने के लिए अपना दिमाग लगाना पड़ता है। मैथिली के नाटकों में हिंदी नाटकों की तरह मॉडर्न टेक्नोलॉजी का प्रयोग होता है। लाइट और अत्याधुनिक साउंड की मदद से नाटकों में चार चांद लग जाता है। बिहार की कई जगहों, जैसे कि बेगूसराय, मुंगेर, भागलपुर आदि जगहों पर मैथिल नाटकों की परंपरा नहीं थी, लेकिन स्थानीय लोगों को जोड़ने का एक मजेदार तरीका ईजाद किया गया। नाटक मंचित होने के पहले उनके बीच इस बात की पब्लिसिटी की जाती है कि दिल्ली से आए हुए लोग मैथिली में नाटक खेल रहे हैं। इसका दूरगामी प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है। डोगरी में नए-नए प्रयोग ‘समाज के साथ-साथ रंगमंच में भी बहुत बदलाव आए हैं और नाटकों में स्त्रियों की भूमिकाओं में भी। पहले नायिकाएं सिर्फ सहायक रोल में हुआ करती थीं, लेकिन अब महिला केंद्रित नाटक अधिक पसंद किए जाते हैं।’ कहती हैं डोगरी और पंजाबी नाटकों में अपने बेमिसाल अभिनय के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री संतोष सांगड़ा। उन्होंने उस दौर में अभिनय शुरू किया, जब जम्मू की लड़कियां सिर ढककर मुबारक मंडी से निकला करती थीं। अपने समय से विद्रोह करते हुए उन्होंने रंगमंच पर कदम रखा। यह कदम इतना मजबूत और प्रभावशाली साबित हुआ कि बरसों बाद आज भी रंगमंच में उनकी तूती बोलती है। यह उनकी अदाकारी ही है कि स्थानीय लेखक-निर्देशक उन नाटकों का चयन करते हैं, जिनमें संतोष सांगड़ा से अभिनय करवाया जा सके। उनके लिए विशेष तौर पर भूमिकाएं लिखीं जाती हैं। संतोष कहती हैं, ‘खासतौर से डोगरी में उन नाटकों पर काम हो रहा है जिनमें हमारी संस्कृति और सामाजिक समस्याओं की झलक मिले।’ संतोष की तरह गुरमीत कौर के मंझे हुए निर्देशन और नि:शब्द कर देने वाले अभिनय जम्मू के दर्शकों को अपना मुरीद बना लेते हैं। उनके द्वारा निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘कोमल गंधार’ को नाट्य महोत्सव में बेस्ट डायरेक्शन और बेस्ट एक्टिंग का अवार्ड मिला है। गुरमीत कहती हैं, ‘नाटक के चयन में मेरी कोशिश होती है कि कुछ ‘टफ’ हो, जिस पर प्रयोग किए जा सकें और जिसे करने में मजा आए।’ उन्होंने ज्यादातर स्त्री केंद्रित हिंदी नाटकों में काम किया है, लेकिन इन दिनों वह अंग्रेजी नाटकों में भी खासी रुचि ले रही हैं। बदले हुए माहौल पर वह कटाक्ष करती हैं, ‘अब लड़कियां ज्यादा समझदार हो गई हैं। वे थिएटर में कम और सीरियल में ज्यादा समय देना चाहती हैं। समूह में आते ही उनका पहला सवाल होता है, इससे फायदा क्या होगा।’ ग्लैमर से जुड़े अवधी नाटक अचला बोस वर्षों से नाटकों में सक्रिय हैं। वह बहुत सारे नाटक, सीरियल भी कर चुकी हैं। वैसे तो अवधी में हर विषय पर नाटक बन रहे हैं, लेकिन महिला प्रधान नाटकों में काम करना उन्हें अधिक पसंद है। अवधी नाटकों में स्त्री भूमिकाओं में भी बदलाव आ चुका है। अब उन्हें ग्लैमराइज किया जा रहा है, ताकि ज्यादा संख्या में दर्शक जुड़ें। अचला मानती हैं कि अवधी भाषा की अपनी सीमाएं हैं, पर हिंदी, उर्दू और अन्य भाषाओं में नहीं हैं। इसीलिए दूसरी भाषाओं में अवधी की अपेक्षा काम ज्यादा है। अचला को अभिनय के अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग का भी शौक है और उन्होंने द्रोण पुत्र अश्वत्थामा, देवदास, कसौटी और अहसास नामक चार नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से ‘कसौटी’ अवधी में लिखा है। प्लेटफार्म बने पंजाबी नाटक 1966 में ‘मस्या दी रात’ पंजाबी नाटक मंचित हुआ था, जिसमें अभिनेत्री निर्मल ऋषि ने पहली बार अभिनय किया था। तब से लेकर आज तक वह 50 से अधिक नाटकों और फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं। इसके लिए राष्ट्रपति ने उन्हें संगीत नाटक एकेडमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। उनके द्वारा अभिनीत ‘हिंद की चादर’, ‘सरहिंद की दीवार’ जैसे नाटकों का मंचन लगातार महीनों तक किया गया। गुर्जर समुदाय पर आधारित ‘सावी’ को विधानसभा में भी मंचित किया गया। निर्मल कहती हैं, ‘आत्मिक शांति के लिए मैं थिएटर करती हूं। रंगमंच को आधी सदी से मैंने करीब से देखा है। लड़कियां इसे एक ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करती हैं। थिएटर में काम करने से अभिनय में संजीदगी आती है। जब उन्हें बढ़िया अवसर मिलता है तो वे फिल्मों या सीरियल की तरफ रुख कर लेती हैं, क्योंकि थियेटर में पैसा न के बराबर मिलता है।

उपन्यास अंत में वारिश

उपन्यास 'अंत में बारिश' लेखिका भगवंती सिंह को पढ़ते हुए - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 'अंत में बारिश' उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में प्रेम और विवाह के बीच होने वाली विभिन्न घटनाओं और सूत्रों को जोड़ने वाली बहुत ही संवेदनशील कथा है। एक ऐसे प्रेमी नायक की कहानी जिसकी उम्र उनतीस वर्ष की और प्रेमिका नायिका की उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की है यानि विवाह के लिए नाबालिग है। उम्र, जाति, नैतिक, अनैतिक वैचारिक द्वंद्वों के जद्दोजहद को पार कर विवाह और फिर अंत तक का सफ़र इस उपन्यास को नया और सकारात्मक आयाम देता है। सभी घटनाएँ पत्र शैली और डायरी शैली में उजागर होती हैं। घटनाक्रम फ्लैशबैक में क्रमशः आइने की तरह साफ होता जाता है। साठ के दशक में प्रेम होना और उसकी अभिव्यक्ति करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थितियाँ बयां करने वाली रही हैं। प्रेम की परिभाषा पीड़ा से होकर अपना आकार लेती है।कभी प्रेमी सफल तो कभी असफल। वैसे तो इस उपन्यास में प्रेमी अपने दृढ़ प्रेम और प्रेमिका अपनी समझदारी के कारण परिणाम अर्थात विवाह तक पहुंँचते हैं। 'अंत में बारिश' शीर्षक अपने आप में व्यक्त करने में सक्षम है। उपन्यास की लेखिका डॉ भगवती सिंह ने यह बात ' प्रतिशब्द' में स्वीकार करते हुए लिखा है कि उपन्यास के आरंभ में वर्षा की गति सुहावनी और तरल' रिमझिम होती है और अंत में घनघोर वर्षा होती है। इस बीच कई ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं। अंतिम बारिश में नायक की पलकें भींगती चली जाती हैं।और कथा समाप्त होती है।' (प्रतिशब्द) जीवन यात्रा में आई बारिश की निरंतरता इसी बात का संकेत है कि विभिन्न ऋतुओं की तरह हमारा जीवन भी कई उतार चढ़ाव से गुजरता है और हम सुख- दुख, मान - अपमान, लाभ- हानि आदि के तराजू में तुलते हुए जीवन को जीते चले जाते हैं। यही जीवन दर्शन है। प्रेम की परिणति और फिर गृहस्थ जीवन तक के विभिन्न रंगों के चित्रों को दर्शाता है ये उपन्यास। प्रमुखता से नायक-नायिका ही इस कथा के केन्द्रीय पात्र हैं। पत्र लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है। वर्तमान समय में अब वाट्सप, फेसबुक और सोशल मीडिया आदि के कारण पत्र लेखन की वैसी परंपरा समाप्तप्राय है। लेखिका का यह पहला उपन्यास है। लेखिका चाहती है कि पत्रों के लेखन में व्यक्ति के मन की बात अधिक संवेदनशील होती है। और प्रेम पत्र तो हृदय में ही समाहित होनेवाले होते हैं।प्रेम से लिखे एक एक शब्द मानो उसके अपनेपन का अहसास कराते हैं। पत्र शैली को इस उपन्यास में आधार बनाकर कथा को क्रमशः बढ़ाया गया है। डॉ. मुक्ता ने उपन्यास की भूमिका 'प्रेम के ताने-बाने में बुना मनोरम उपन्यास' में प्रेम को संबोधित करते हुए लिखा है - 'प्रेम के बीच रिश्तों के जुड़ने में टकराव और संघर्ष की स्थितियाँ बनती हैं। मूल में प्रेम है। मैं अपना कथन प्रेम के संदर्भ से ही शुरु कर रही हूँ। प्रेम का कोई वायवीय धरातल है या वह शक्ति जो बरबस ही हमें यात्रा में सहभागी बना देता है। प्रेम बाह्य संबंधों को लेकर नहीं वरन् उसकी अंतरंगता को लेकर निश्चित किया जाता है। ' मेरे विचार से उपन्यास' अंत में बारिश' में प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। आज जहाँ विवाह टूटने के कगार पर है, प्रेमी प्रेमिकाएंँ वाट्सप की डीपी देखकर और सोशल मीडिया पर प्रेम का इजहार कर रहे हैं और वहीं ब्रेकअप जैसी घटनाएँ भी लगातार घटित होती जा रही हैं।ऐसे में प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। लेखिका ने प्रेम के विशुद्ध रूप को कहीं भी अमर्यादित नहीं होने दिया है। वरन् वह नायिका और नायक की नैतिक जिम्मेदारी को बड़े ही अंतरंगता के साथ प्रेम को स्थापित करती है जहाँ ईमानदारी और विश्वास का दृढ़ संकल्प है। आसमान में घने काले बादल एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसे छाये थे मानों वे अभी अवनि तल पर उतर आयेगें। ऐसी जोरदार घनी बरसात के मौसम में प्रोफेसर संजय के मन मस्तिष्क में फ्लेश बैक की घटनाओं के साथ जया का पहली बार बारिश में रिक्शे पर आना जिसमें प्लास्टिक का पर्दा लगा होता है। संजय को याद आता है कि वह भीगते हुए उससे मिलने आई थी। संजय एमबीबीएस के प्रोफेसर है और अपने अड़ोस पड़ोस में प्रसिद्ध होने के कारण जया से मिलने नहीं जा सकता था। जया एक मासूम, नाजुक, दुबली - पतली, छरहरे बदन की, घुँघराले बालों वाली साँवलें रंग की अत्यंत खूबसूरत लड़की थी। संजय स्वयं स्वीकार करता है कि जया से पहला परिचय पटना में लगभग आठ महीने पूर्व होता है। दो मकानों में से एक मकान में संजय किरायेदार थे।वहीं मकान-मालिक यमुना प्रसाद जी की लड़की प्रभा अंकल संजय से अपनी सहेली जया का परिचय कराती है। जया के पिता बिजली विभाग में अस्सिटेंट इंजिनियर के पद पर कार्यरत थे। प्रभा के पिता उसी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। दोनों परिवारों के बीच एक पड़ोसी का रिश्ता था। संजय की बड़ी बहन विमला दीदी जो उम्र में काफी बड़ी थी, दोनों परिवारों और दोनों सहेलियों के बीच सेतु का काम करती थीं। जया और संजय के बीच उम्र का काफी फ़ासला होने पर भी संजय जया के प्रेम में धीरे - धीरे डूबता चला जाता है जबकि जया इस बात से बेखबर थी। लेकिन जब उसे संजय की गहरी अनुरक्ति का पता चलता है जहांँ जीवन और मृत्यु के बीच की दिवार भी ढहाई जा सकती है ऐसे में जया भी कालांतर में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। जया का प्रेम अद्भुत, सात्विक, दुराग्रहपूर्ण मानसिक और अंतर्मुखी था। प्रथम 28 दिसम्बर 1957 जब संजय ने अपने मित्र राजीव को अपने एकतरफा प्रेम के बारे में बताया था । नायक अपने नितांत व्यक्तिगत संघर्षों को झेलते हुए विगत पांँच छह महीनों में जया के काफी करीब आ जाता है और बाकी एक वर्ष का समय पंख पर सवार हो ऐसे बीतता जैसे आंँधी से वृक्ष के पत्ते उड़ जाते हैं। (पृ.6) डायरी में लिखे शब्दों से नायक की व्यथा, भावावेग और प्रेम के उत्कर्ष का पता चलता है। उपन्यास में डायरी में लिखी तारीख़ और सन् को इंगित किया गया है। जैसे 1 जनवरी सन् 1959 का नववर्ष जब संजय 29 वर्ष का होता है। जया की रेशमी फ्राक और उसका गुलाबी गुलाब की पंखुरी की तरह मासूम और आकर्षक लगना उसकी उम्र को दर्शाता है। कभी नीले लंबे कोट और इंद्रधनुषी मफलर और अपेक्षाकृत अनसँवरे बालों में पहाड़ी लड़की सी लगती। जया भी उसकी तरफ अनायास ही आकर्षित होती चली गई। जया के पिता से दोनों के विवाह की बात करना और संजय का आश्वासन देना कि मैं आपकी लड़की को खुश रक्खूंँगा।ये सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा सका। (पृ. 8) 4 जनवरी की शाम का वर्णन संजय अपनी डायरी में करता है। जया उससे 100 गज की ही दूरी पर रहती है लेकिन रिक्शे से आती है क्योंकि उसके पिता को उस पर शक है और वह नहीं चाहती कि उसके चरित्र पर कोई आक्षेप लगाए। वह अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकती है लेकिन पिता उसके प्रेमी का अपमान करे, नहीं सह सकती। छिप कर आना, अपनी व्यथा को बांँटना, नाराज और फिर खुश होना, खीझना, डांँटना, कॉलेज न जाना, शरीर और मन के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना, पीड़ित होना और पीड़ित करना आदि बहुत से सुंदर चित्र हैं जो जया के प्रेम को उदात्त रूप प्रदान करते हैं। प्रेम में बहुत अधिक निकटता से वह चौंक जाती है। वह आतंकित हो उठती है उसे लगता है शरीर के स्पर्श मात्र से कुछ हो जाता है उसके दिमाग में भरा हुआ है। (पृ. 15) इसी तरह 20.12.1960 के पत्र में संजय प्रिय जया को लिखता है कि तुम्हारे यहाँ अफवाह है कि "मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुल दस बीघे खेत हैं कौन कहता है जी? मैं गरीब अवश्य हूँ पर इतना भी नहीं।" वह अपनी हैसियत का प्रमाण देता है। वह अपने प्रेम को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।संजय पहले भी बंद कमरे में न जाने कितनी ही बार रो चुका है। जया को भूलना बहुत ही मुश्किल है। संजय को पटना के मेडिकल कॉलेज में अस्थाई नियुक्ति हुई थी अब भगवान की कृपा से दरभंगा के मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गया। दो वर्ष का प्रोबेशन के बाद वहीं परमानेंट हो जाएगा। और जया भी चाहती थी कि वह पीएचडी करे। और यहीं से पत्रों का सिलसिला शुरु होता है। संजय का पत्र 'दुविधा, भविष्य के लिए कुछ संकल्प,' दिनांक 5.02.1960, दिनांक 12.3.1960,भविष्य की योजना दिनांक 22.4.60, कुछ अंतराल के बाद, वही ऐतिहासिक जगह पटना - दिनांक 4.5.1960,फिर जया का एक संक्षिप्त पत्र, कुछ नोक झोंक, जया का पत्र संजय के नाम जिसमें जया की प्रेम वेदना मुखर हो उठती है - - वह लिखती है भ्रमित हूँ आज मैं, है चतुर्दिक जो अँधेरा बाँध लो नाँव मेरे ठाँव, न डरो कि छीन ले कोई पतवार उस पर सवार हो हम चले जहांँ हो स्वर्णिम उजाला। ले चलो तुम ज्योति मग में, धन्य हो मेरा सवेरा। 'पृ 67 आदि कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें संजय ने अपनी दादी बहन की बिमारी की बात लिखी है। संजय लिखता है कि' हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढे़गे पृ69.' नैराश्य भरे पत्र में संबोधन मेरी निराशा! से किया गया है। जया की माँ को भी पत्र लिखा है संजय ने जहांँ वह स्पष्ट लिखता है कि वह एक ईमानदार आदमी है, जिंदगी में अगर आवारागर्दी और मौज का खेल खेलना होता तोय इतनी ठोकरें नहीं खानी पडतीं। पृ 73। बिना संबंध के जया के नाम क्या लिख दूंँ? यदि आप तैयार हों तो आप जहांँ कहें मैं चलकर अपना सब कुछ लिख देने को तैयार हूँ। पृ 74। जया अपने निर्णय में लिखती है "मैं वहाँ तक आपका साथ दूंँगी जहाँ तक सत्य है, ईश्वर है, यह पृथ्वी है। क्या इससे भी अधिक प्रूफ की आवश्यकता है? - बहुत भावुक हो रही हूँ - बस आपकी जया। पृ 77 साथ ही प्रोफेसर संजय अपनी थीसिस के बाद की योजनाएं भी बनाता है और जया जो उसके जीवन की आधार है उसको आश्वस्त करता है कि जाति कुल की बातें करने वाला समाज पीड़ा ही देता है। वे ऊँचे कुल के राजपूत चंद्रवंशी या सूर्यवंशी की दुहाई देते हैं और बड़ी उम्र की। 21.9.1960 के इस पत्र में संजय ने जया को स्पष्ट लिखा है कि एक बार अंत में हमें किसी की खुशी, दम्भ, या झूठे अभिमान के लिए मरना नहीं है। हमें मारने वाले मार डालें तो ठीक है। दूसरी बात यह है कि यह लडाई संयोगवश पूरी की पूरी तुम्हारे हाथों में है। वे तुमसे ही हारेंगे। समय निरावधि है। हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढेंगे। 'पृष्ठ 69 संजय जानता है कि जया और उसका विवाह समाज में मान्य नहीं है। फिर भी वह और जया अपने निर्णय पर अडिग हैं। एक पत्र में जया को वह' भोली बाल सखी 'और' बालिका वधू 'से भी संबोधित किया है। संजय अपने को' एक एडल्ट पुरुष' मानते हैं।स्त्री ही अपमानित नहीं होती बल्कि पदस्थ, चर्चित, सम्मानित पुरुष को स्त्री से भी अधिक विवश किया जाता है। 5.12.1960 के पत्र से पता चलता है कि संजय की नियुक्ति फिर दरभंगा में एक वर्ष के प्रोवेशन पर हो गई है। जया हर हाल में उसका साथ ही देने का निर्णय करती है । अपना निर्णय देती है कि जहाँ सत्य है, ईश्वर है यह पृथ्वी है तब तक वह संजय की है। संजय पीएचडी भी पूरा कर लेना चाहता है। जया उसे बराबर पत्रों में आश्वस्त करती है कि यदि वह आपकी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी, वह पलायनवादी संस्कृति की नहीं है, वह उसी ठाकुर अजीत सिंह की बेटी है जो अपने निश्चयों पर अड़े हुए हैं। वह पत्थर से टकरा सकती है। पर उन पत्थरों की चोट संजय को न लगे। पृ83। पत्रों में संजय अंत में लिखता है तुम्हारा केवल तुम्हीं में खोया हुआ। पत्रों के सिलसिले चलते रहे। 4.4.1961 के पत्र के बाद से लगातार छ महीनों तक परिवार के रिश्तेदारों सगे-संबंधियों और कॉलेज के कुछ आत्मीय मित्रों ने मिलकर जया के पिता को मनाया। अन्ततः आकाश को धरित्रि पर झुकना ही पड़ा।जून 1961 में जया एडल्ट हो गई तब विवशतावश पिता ने धूमधाम से विवाह किया और विदाई हो गई। यहाँ भी मर्यादा का पालन करते हुए घूंँघट में जया की विदाई होती है। संजय अपने गांँव सुदामापुर ले गए जो गाजीपुर से गंगा के पार ताड़ी घाट से 7-8 किलोमीटर दूर था। जया के चेहरे को देख संजय ने कहा दो वर्ष बाद मिली हो। 'सिंदूर लिप्त मांग, ललाट पर बिंदी घूंँघट से अस्त व्यस्त होने के कारण काली घुँघराली लटें उसके चेहरे पर बिखरी हुई थीं और बनारसी साड़ी तथा आभूषणों से सुसज्जित उसका सौंदर्य अनिर्वचनीय था, मैं भाव विमुग्ध हो गया।' गाँव में संजय और जया का विधि विधान से मंगल गीतों की गूँज के साथ पुश्तैनी मकान में स्वागत हुआ। दो तीन दिन बाद ही दरभंगा मेडिकल कॉलेज से संजय को कॉलेज ज्वाइन करना पड़ा जो दोनों के लिए बहुत ही कष्टप्रद रहा। बहन और भुआ के पास नई नवेली दुल्हन जया को छोड़कर जाना संजय को दुखी कर रहा था क्योंकि जया इस तरह के पिछड़े गाँव में कभी रही न थी। जया की पढाई के लिए भी संजय प्रयास कर रहा है। फिर संजय के पत्रों से पता चलता है कि वह मकान की तलाश भी कर रहा है और शांतिनिकेतन की यात्रा के विषय में भी लिखता है। अब वह उसका पति है। जया भी साइंस में केमेस्ट्री से एम एस सी किया। संजय का भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और वहीं गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज में जया भी प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हो गईं।दो पुत्र मन्नू और टुन्नू भी हुए। संघर्षों के दिन समाप्त हुए, में छह वर्षों तक लखनऊ में रहे। संजय के पटना वाले पुराने मित्र राजीव रंजन भी आते हैं और 12 वर्ष के बीच कितना परिवर्तन हो गया इस पर दोनों बातचीत करते हुए खाना भी खाते हैं।राजीव हिन्दी के प्रोफेसर हैं लेकिन कुंवारे हैं। संजय अपनी रिसर्च स्कॉलर जो हार्ट पर रिसर्च कर रही है, उससे परिचय कराते हैं।हँसी मजाक में समय कट जाता है। संजय की शादी के 15 वर्ष बीत गए। जया भी घर की जिम्मेदारी निभाते हुए खुश है और चाहती है कि संजय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैंकुवर जाए और अपना शोध पत्र पढ़ें । 25 सितंबर 1978 में कनाडा जाते हैं जब तक संजय चार बच्चों के पिता बन चुके थे। ये सब सपने पूरे हो रहे थे लेकिन जया संजय का विछोह सहन नहीं कर पाती थी और जार बेजार रोती रहती थी । सेंट पाल्स हॉस्पिटल में कॉन्फ्रेंस की सभी बातों को संजय ने जया को टेलिफ़ोन पर बताया। एक पत्नी की तरह उसने भी यही कहा कि किसी विदेशिनी से दिल मत लगाना।फिर तो संजय मैक्सिको में डेढ़ महीने रहे। फिर लंदन, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर भी योग्यता के कारण जाना रहा। इसी बीच तबियत भी खराब हो जाती है। संजय उम्र के अंतिम पड़ाव की तरफ भी जा रहे थे लेकिन मन और मस्तिष्क की जिज्ञासाएं बराबर रहती थी। अपने फाइल में दबे जया को लिखी चिट्ठियों को भी पढ़ते जिसमें गाँव की पगडंडी से होते हुए शहर और विदेश यात्रा करने वाले एक व्यक्ति के प्रतिफल भोगे हुए क्षणों, मनोदशा और अपना देश, अपना शहर, अपना घर - परिवार के प्रति आकर्षण का यथार्थ चित्र भी ही जिन्हें मैं अपनी अपनी फाइल से प्रस्तुत कर रहा हूँ - मेक्सिको प्रवास से जया को प्रेषित पत्र के विषय में संजय जया के करीब ही रहता। पृष्ठ 118। विदेशों का वैभव पैसा रूपये सब देखने के बाद भी अमरीका यूरोप आदि से मन भर गया। बस अपने देश की ही याद आती रहती और अपने बच्चों को भी यही बताता कि गाँव की गरीबी पढ़ते समय देखी थी, यहाँ विदेश में आकर अमीरी देख ली। पृष्ठ 119। जया के बिना अब संजय एक पल भी कहीं नहीं रह पा रहे हैं। अपने 25 से उन्तीस पत्रों में मेक्सिको अमेरिका जापान आदि देशों के खान पान आदि विभिन्न विषयों पर भी उल्लेख किया है। मिस्टर सैमुएल, मिस जेसिका आदि के विषय में भी बातें लिखी। संजय विदेशों में भारतविद कहलाने लगे। योग और शरीर तंत्र पर विविध व्याख्यान देते रहे। फिल्म बनाने का निमंत्रण भी आने लगा।विदेश में बुखार, ब्लड प्रेशर, ब्लड सूगर आदि बिमारी भी हुई। सबसे बड़ी एक बात यह समझ में आई कि अध्ययन कर्म आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंँचा देता है। पर देश की गरीबी और गंदगी के बावजूद संजय देश की मिट्टी को नहीं भूल आते। मिस्टर सैमुएल की सेवा, प्रभा ठकराल की सेवा, शशि की सेवा को संजय अविस्मरणीय बताते हैं जिन्होंने मेक्सिको में उनका ध्यान रखा। घटनाक्रम धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव तक आता है और संजय उन घटनाओं को सहेज कर अपने अंतर्मन में संजो कर रखता चला जाता है। विदेश भ्रमण में बारह वर्ष बीत गए। जया भी 30 सितंबर 2003 में सेवानिवृत्त हो जाती है। संजय तो जया से 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। मन्नू टुन्नू और पम्मी ने जया के प्रथम सेवानिवृत्ति पूरी होने पर केक भी काटा। बड़े खुशी से जीवन बीत रहा था पर जया के सेवानिवृत्ति के दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि एक दिन आधी रात को उसके पेट में असह्य दर्द होता है जो गॉलब्लेडर में पथरी के कारण हुआ था। अॉपरेशन भी होता है फिर भी पेट का दर्द ठीक नहीं होता। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। संजय स्वयं उसका अॉपरेशन कर न सके। अपने मित्र द्वारा करवाया। अॉपरेशन हुआ लेकिन गॉलब्लेडर के बगल की एक नस में एक अत्यंत सूक्ष्म छिद्र हो गया था और मामला गंभीर हो चला था। आईसीयू में ले जाया गया लेकिन जया तीसरे दिन चल बसी। संजय ने अंतिम संस्कार किया। उसके जाने के पंद्रहवें दिन बाद भरे पूरे घर में संजय को अकेला पन काट रहा था वही शाम का वक्त बरामदे में बैठे हुए संजय को जया की वही छवि याद आ रही थी जब ऐसी ही घनघोर बरसात में विवाह के पूर्व प्लास्टिक का पर्दा लगे हुए रिक्शे में मिलने आती है। अगले ही पल जया की अंतिम यात्रा के समय की छवि संजय की पनियल आँखों में तैर जाती हैं। उपन्यास अंत में बारिश में घटनाएँ तीन भागों में बँटी हैं। पहली विवाह के पहले प्रेम को पाने की पीड़ा दूसरी विवाह के लिए कई संघर्षों का सामना और तीसरा विवाहोपरांत विदेश जाने की आकांक्षा में घर से दूर रहना। देखा जाए तो 1960 से लेकर 2003 तक के नायक और नायिका की प्रेम यात्रा को चिट्ठियों द्वारा एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। और अधिकतर चिट्ठियां संजय द्वारा लिखी गई हैं। पत्नी का कल्पित नाम जया है जिसे वह चिट्ठियों में प्रेम प्रदर्शित करने और अपने कार्योँ का ब्योरा देने के लिए लिखता रहता है। जबकि जया की ओर से जो लिखा गया वह बहुत कम है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसका प्रेम सिर्फ समर्पण है। प्रेम की पीड़ा, हर्ष, अपनापन, उदासी आदि भावनाएंँ हृदय में आत्मसात करती हैं जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रेम की प्राप्ति होने पर प्रिय के साथ दूरियांँ समाप्त हो जाती हैं। प्रेम से उम्र की संख्या भी कोई मायने नहीं रखती। प्रेम से हर दूरी घट जाती है। जया संजय मय हो जाती है। उसकी घुटन ऊब पीड़ा और पराजय का बोध भी ऊपर उठ कर ममता स्नेहिल भावों से परिपूर्ण हो जाता है। संजय कितनी ही विपरित स्थितियों से गुजरा लेकिन प्रिय जया के साथ उसमें नवीन उत्साह और आत्मविश्वास का संचार ही भरा रहा । यही मनुष्य को पौरूष प्रदान करता है और हर प्रकार की बाधाओं से जूझने की शक्ति देता है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी जया की प्रेम बारिश संजय को प्रेमासिक्त करती रही। घनघोर बारिश के पानी ने संजय के आँसुओं धो डाला और नाती- पोतों से भरा- पूरा एक परिवार छोड़ जाती है जो दोनों के प्रेम की निशानियाँ हैं। जीवन और मृत्यु मानव जीवन के चरम सत्य है परंतु उनके बीच का फासला नियती नहीं स्वयं प्रिय का है, प्रेम यही आत्मविश्वास जगाता है। उमड़ते घुमड़ते इस बारिश में भी संजय को काले बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की रोशनी में अपने बच्चों का हँसता मुस्कुराता चेहरा नजर आता है जो उसके बचे खुचे जीवन को आश्वस्त करता नजर आता है। संजय जया के प्रेम की कसक लिए सकारात्मक होने का निश्चय करता है जबकि वह सबके साथ रहते हुए भी अकेला ही है। लेखिका भगवंती सिंह का यह प्रथम उपन्यास है जो उनके जीवन के सत्तर दशक का परिणाम है। हिंदी साहित्यकार और कबीर मर्मज्ञ पति डॉ शुकदेव सिंह के गुजर जाने के बाद वे उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में लगी हैं।उनका लिखा कथा साहित्य यथार्थ जीवन का चित्र है। उन्होंने जीवन के बहुमूल्य अनुभवों को बहुत ही सहज बहते हुए झरने की तरह एक एक शब्द मोतियों को पिरोया है। इस उपन्यास में ऐसा लगता है कि मानो लेखिका के निजी जीवन की कहानियों की लड़ियों का गुच्छा पत्रों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल रहा हो। भाषा शैली बहुत ही सहज, सरल और चरित्र के अनुरूप है। बिना किसी अनावश्यक प्रयास के स्वतः स्फूर्त शब्दों ने उपन्यास का रूप ले लिया। कई घटनाओं का विन्यास और उनकी कथा तारतम्यता में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और माँ- पिता सभी के किरदार अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं। कहीं-कहीं उपन्यास की कसावट में आई खामियाँ खटकती हैं जो मूक ढंग से व्यक्त हो जाती हैं। विदेश जाने के दौरान लिखे पत्र कभी-कभी औपचारिकता निभाते हुए भी लगते हैं। समाज के झूठे दंभ को बेनकाब करने वाला यह उपन्यास अपने परिवार, बड़े कहलाने वाले तथाकथित दादा, अहंकारी लोगों की कलई खोलने वाला है। दो प्रेम करने वालों को एक नहीं होने देने के लिए कई दलीलें देता यह समाज अपनी दकियानूसी सडे़ गले विचारों में जीने वाले समय के साथ किस तरह धराशायी और अवसरवादी हो जाते हैं यह भी इस पूरे उपन्यास की पर्तें खोलते पत्र महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। एक अकेला व्यक्ति समाज की खोखली दिवारों से कब तक सिर फोड़ता रहेगा। संजय का लिखना 'जिन्हें शीशा समझकर हम टकरा गए वे पत्थर निकले। हमने सोचा था कुछ शीशा टूटेगा, सब कुछ हम जोड़ने की कोशिश करेंगे फिर जिंदगी सामने होगी। लेकिन हम टूट गए। पत्थर तो पत्थर ठहरा। - - - जो इतने भयानक और कठोर हैं अपने हों या पराये उनके प्रति कैसी श्रद्धा? कैसी ममता? पृ69। लेखिका ने पुरुष की संवेदनशीलता को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा है जो समाज के मूल्यों, आचार विचार को एक नये एंगल से देखने का आईना प्रदान करता है। प्रेम का सूत्र अंत तक अपने दामन से जुड़ा रहता है। बहुत कुछ छूट गया है। कुछ समझने का प्रयास किया है। अभी तो "अंत में बारिश" की गहराई में छिपी बहुत सी कहानियां हैं जिन्हें उजागर करना है। धन्यवाद @ डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता । दिनांक 17.10. 2021

नाटकों में नारी अस्मिता

नाटक और नारी अस्मिता नाटक साहित्य की अन्य विधाओं से भिन्न विधा है। नाटक की सार्थकता सामूहिक लेखन से नहीं बल्कि रंगमंच पर सफलतापूर्वक प्रस्तुत होकर अपनी कलात्मकता को साबित करने में है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले महिला रचनाकारों की उपस्थिति बहुत कम मिलती थी और जो मिलती थी वह भी पुरुष नाटककार द्वारा उनको अपनी रचना में स्थान देते थे। इस तरह नाट्य साहित्य और नाट्य रचना दोनों में महिलाएं हाशिए पर रही हैं। हिंदी नाटक के क्षेत्र में स्त्री की भूमिका को लेकर प्रसिद्ध महिला रंगकर्मी मोना झा का कहना है कि रंगमंच पर एक तो स्त्रियों को लेकर नाटक लिखे ही नहीं जा रहे हैं दूसरा जैसे और जगह पर स्त्री विमर्श हो रहा है वैसा विमर्श रंग जगत में हो इसके लिए रंगमंच अभी तैयार ही नहीं है । असम बंगाल उड़ीसा कर्नाटक केरल आदि क्षेत्रों की अपेक्षा हिंदी क्षेत्र के रंग मंच में स्त्रियों की उपस्थिति और जुड़ाव बहुत कम है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहले समाज का सामंती नजरिया और दूसरा हमारे रोज के जीवन में नाटक का नहीं शामिल होना। महिला कलाकारों की रंगमंच के क्षेत्र में निराशाजनक स्थिति के बारे कहा जा सकता है कि यदि स्त्रियों में वैचारिक क्रांति आई है और वह पुरुष के समान ही कई क्षेत्रों में बेहतर योगदान कर रही हैं।फिर भी अभी समाज का स्वरूप ऐसा नहीं बन पाया है कि रंगमंच में पुरुष के बराबर स्त्रियों का आना हो सके। आज हम देख रहे हैं कि अभिनय रंगकर्मी और नाटक रचना के क्षेत्र में महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर अपना योगदान प्रस्तुत कर रही हैं। हिंदी साहित्य में नाटक का प्रारंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु के समय समाज में नारी की दशा दीन ही थी। ऐसे में भारतेंदु ने नील देवी नाटक के माध्यम से नारी स्वतंत्रता का चित्रण प्रस्तुत किया। नील देवी उन राजपूत नारियों की तरह नहीं है जो विपत्ति के समय हाथ पर हाथ रखकर अक्रमण्य बनी रहे और पुरुषों के पराजित होने पर खुद को जौहर ज्वाला में भस्म कर लें। नील देवी अपने पति सूर्य देव के बलिदान का बदला लेकर जाति की स्वतंत्रता और अबालाओं के धर्म को बचाती है। इस तरह भारतेंदु ने नील देवी नाटक में नील देवी के माध्यम से धर्म नीति और राजनीति के संबंध पर बल देते हुए स्त्री की परंपरागत छवि को बदलने का प्रयास किया है। नवजागरणवादी विद्वानों ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय विभिन्न धार्मिक व सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के साथ नारी स्वतंत्रता के प्रश्न को भी उठाया। इस संदर्भ में जय देव तनेजा कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के मध्य भारत में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों ने महिलाओं को सक्षम बनाया है जिससे वे राष्ट्र और समाज निर्माण में अधिक सक्रिय और सार्थक भूमिका निभा सके। इससे साहित्य और नाटक में महिलाओं के चित्रण में कुछ बुनियादी बदलाव के लिए नेतृत्व किया। लेकिन इनका सामाजिक सुधार आंदोलन बाल विवाह विधवा विवाह व सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों तक ही सीमित था। इसी समय ध्रुवस्वामिनी नाटक के माध्यम से जयशंकर प्रसाद ने स्त्री की स्वाधीनता शोषण से मुक्त नारी अस्मिता एवं पहचान से जुड़े प्रश्नों को उठाया। इस नाटक में स्त्री की खोई हुई अस्मिता और गरिमा को पूर्ण प्रतिष्ठित करने का प्रयास करते हैं। प्रोफेसर रमेश गौतम लिखते हैं कि समाज के स्वस्थ विकास की कामना के साथ नारी अस्मिता को नई पहचान दी।नारी स्वतंत्रता से जुड़े जटिल एवं ज्वलंत प्रश्नों को प्रसाद जी ने समसामयिक संदर्भों के अनुरूप ध्रुवस्वामिनी नाटक में रुपायित किया है। ध्रुवस्वामिनी नाटक पुरुष के शोषण चक्र से नारी स्वतंत्रता के उद्घोष में आधुनिक चेतना का पर्याय है। यही आधुनिक चेतना ध्रुवस्वामिनी के इन विद्रोही शब्दों में सामने आती है। वह कहती है- मैं केवल यही कहना चाहती हूंँ कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु संपत्ति समझ कर उन पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है। वह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते हो। इस तरह पहली बार इस नाटक में ध्रुव स्वामिनी ने अपने अस्तित्व अस्मिता के प्रति सच्चाई दिखाई देती है। सदियों से पुरुष प्रधान समाज में कैद भारतीय नारी की मुक्ति का स्वर ध्रुवस्वामिनी के आक्रोश में नारी की स्वतंत्रता अस्मिता के रूप में व्यक्त होती है। वह अपने पति राम गुप्त द्वारा ठुकरा कर उपहार स्वरूप शकराज को दिए जाने पर विद्रोही रूप में रहती है ।ध्रुवस्वामिनी खड़ी होकर रोष से निर्लज्ज मद्यप क्लीव। मेरा कोई रक्षक नहीं। ठहर कर। नहीं, मैं अपनी रक्षा स्वयं करूंगी। मैं उपहार देने की वस्तु नहीं हूंँ। इस तरह ध्रुवस्वामिनी के ये शब्द नारी मुक्ति व उसके अस्तित्व की स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा करते हैं। ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद का अंतिम नाटक है। इसमें उनके अन्य नाटकों जैसी कविता की भावुकता और संवादों में वैसी दुरूहता नहीं है। अपने जीवंत संवादों और सुगठित कथावस्तु के कारण यह नाटक अत्यंत प्रभावशाली और मनोपयोगीहो गया है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी शक्ति प्रसाद जी के उस क्रांतिकारी दृष्टिकोण में निहित है जो इस नाटक के माध्यम से व्यक्त हुआ है और वह यह है कि नारी पुरुष की क्रीत दासी नहीं है। पुरुष यदि क्लीव (नपुंसक), कायर और व्यभिचारी है तो नारी न केवल उसके विरुद्ध विद्रोह ही कर सकती है, उसका परित्याग करके अपने प्रिय पुरुष का वरण कर उससे पुनर्विवाह भी कर सकती है। यह बात भारतीय समाज के लिए, खासतौर से उस समय जब यह नाटक लिखा गया था, कल्पना से भी परे थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में साहित्यकारों ने विभिन्न समस्याओं के साथ नारी स्वतंत्रता अस्मिता और विकास को ठोस धरातल प्रदान किया। लेकिन यह युग नारी की अस्मिता संबंधी विचारधारा या प्रश्न को उठाने का काल नहीं था। फिर भी हिंदी नाट्य साहित्य में नारी अस्मिता की दृष्टि से एक शुरुआत कही जा सकती है। स्वतंत्र उत्तर युग में आर्थिक बदलाव सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण बना। शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने नारी को एक नवीन चेतना दी। उसमें अपनी अस्मिता व अस्तित्व के प्रति जागृति आई। वह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में गौरव का अनुभव करने लगी। अब पुरुष उसके लिए देवता नहीं रहा और पति परमेश्वर ना होकर लाइफ पार्टनर बन गया जिसमें पति-पत्नी दोनों की सहभागिता दिखाई पड़ती है। आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की ओर नारी के बढ़ते कदम पुरुष को स्वीकार्य नहीं हुए फलस्वरुप दांपत्य जीवन में टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। नाटक कारों ने स्त्री पुरुष के बदलते संबंधों को अपने नाटकों का विषय बनाया। बदलती सामाजिक आर्थिक स्थितियों में नारी के चयन के अधिकार के प्रश्न को दुलारी बाई नाटक में उठाया गया है जो मणि मधुकर का नाटक है और पुराने संस्कारों अंधविश्वासों एवं रूढ़ियों पर करारी चोट करता है। साथ ही, नाटक नारी के विवाह दांपत्य जीवन को लेकर रोड मान्यताओं का भंडाफोड़ करता है जिसमें नारी को केवल सत्य ही और दिखावे की स्वतंत्रता दी गई है। महिला नाटक कारों में अग्रणी मृदुला गर्ग का नाटक एक और अजनबी बदलते सामाजिक आर्थिक संदर्भ में नारी की अस्मिता के प्रश्न को एक नया आयाम देता है।नाटक में स्त्री पात्र शनि एक तरफ प्रेमी द्वारा उपेक्षित है तो दूसरी तरफ अपनी पदोन्नति के लिए पति द्वारा उसकी कंपनी के मैनेजर के सामने दांव पर लगा दिया जाता है। पुरुष समाज के लिए स्त्री अपनी महत्वाकांक्षाओं व शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति का साधन रही है। इस नाटक में दो पुरुषों के बीच विभाजित एक स्त्री की त्रासदी को व्यक्त किया है जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मृदुला गर्ग का यह नाटक पति-पत्नी के संबंधों के माध्यम से पुरुष सत्ता के सवालों के कटघरे में खड़ा करता है। मोहन राकेश का प्रयोग धर्मी नाटक आधे अधूरे मध्यवर्गीय स्त्री पुरुष संबंधों की विडंबना विषमता और त्रासदी का विवेचन करता है। शारीरिक मानसिक और भावनात्मक प्रताड़ना को सहती सावित्री है। यहां सब लोग समझते क्या है मुझे एक मशीन ,जो कि सबके लिए पिसकर रात को दिन और दिन को रात करती रहती है। इस तरह एक स्त्री सावित्री आर्थिक दबाव के चलते पारिवारिक संबंधों के बीच अपने अस्तित्व व अस्मिता को खोजती नजर आती है। सुरेंद्र वर्मा का नाटक सूर्य की अंतिम किरण से पहली किरण तक नपुंसक पति ओक्काक और उसकी पत्नी शीलवती की कहानी को अत्यंत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। राज्य के उत्तराधिकारी के लिए शीलवती को नई प्रथा के तहत एक रात के लिए प्रदोष के पास भेजा जाता है। शीलवती को प्रदोष के साथ रात बिताने के बाद पहली बार स्त्री पुरुष संबंधों की पहचान होती है और वह नपुंसक पति औक्काक को अस्वीकार कर देती है। साहित्य जगत में प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी के बाद सुरेंद्र वर्मा की शीलवती ही ऐसी स्त्री पात्र है जो पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध अस्वीकार का साहस करती है। नारी का पहला रोल सृष्टि है वही सृष्टि का माध्यम है। नारी ही सारे दर्द महसूस करते हुए सृष्टि को आगे बढ़ाती है। पहले रंगमंच पर स्त्री का काम करना कठिन होता था। उसके सारे किरदार पुरुष निभाते थे। यह बात वरिष्ठ रंग कर्मी नागिन तनवीर ने कही। बिटिया उत्सव में स्त्री और रंग कर्मी विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर वरिष्ठ रंगकर्मी और गायक नगीन तनवीर ने कहा कि प्रभात पटनायक स्त्री खरीदार किरदार की अच्छी अदाकारी करते थे। पहले रंगमंच पर पुरुष स्त्री का रोल करते थे ।सब कहते हैं कि हमारी देवियां ही नारी शक्ति का प्रतीक है लेकिन अमल कोई नहीं करता है। पहले फिल्मों में नारी शक्ति को हाईलाइट करके दिखाया जाता था। नारी शक्ति और रंगमंच का मतलब नारी को और शक्तिशाली बनाना लेकिन उसमें कलात्मकता और संवेदना भी होनी चाहिए। रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि स्त्री एक प्रेरणा होती है ।आज औरत जिस प्रकार आधुनिकता में जी रही है उसके अंदर का औरतपन गायब हो रहा है। रंगमंच के क्षेत्र में बहुत शिष्यों ने मराठी रंगकर्मी में बाल गंधर्व से साड़ी बांधना मेकअप करना और भी बहुत कुछ सीखा।प्राचीन समय से ही स्त्रियों से भेदभाव होता रहा है लेकिन समय बदलता रहा और कई फिल्मों में भी अभिनेत्री ने अपने अभिनय से सबके दिलों में जगह बना ली। स्त्री मंच पर अपनी पीड़ा व्यक्त करती है। भारत में अभी भी महिला नाटककार बहुत कम है। ज्यादातर स्त्रियों पर नाटक पुरुषों ने ही लिखे हैं ।बेगम अख्तर की बायोग्राफी के एक चैप्टर से मेरी जिंदगी बदल गई जिसमें उन्होंने लिखा कि एकांत का उत्सव मनाओ। प्राचीन काल से ही भारतीय वंश पर महिला कलाकार रही होगी। हो सकता है महिला नाटक कर रही हूं लेकिन इन महिला अभिनेताओं को मंच पर विशेष रूप से महिला आवाज नहीं मिली ।वह कभी भी प्रदर्शनों की सूची पर हावी नहीं हुई और उनके योगदान को बड़े पैमाने पर इतिहास से बाहर लिखा गया है। कई लेखों और पुस्तकों ने महिलाओं द्वारा तैयारी और उत्पादन में अनुभव किए गए व्यवस्थित इंट्रो का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण प्रदान किया है ।जिसमें तकनीक में उनकी भारत मौलिक होने के अवसर और अभिव्यक्ति की उनकी उपलब्धि को प्रभावित किया है ।चार शताब्दी में भारतीय पश्चिमी कला जगत में लिंग के संचालन के विश्लेषण के माध्यम से नारीवादी प्रथाओं ने स्थापित किया है कि व्यक्तिगत कलाकार की सामाजिक सफलताओं के परवाह किए बिना कला भेदभावपूर्ण संस्कृत प्रथाओं को दर्ज करती है। उदाहरण के लिए लिंडा नच लेन ने अपने उत्तेजक निबंध क्यों कोई महान महिला कलाकार नहीं बनी। 1971 में सुझाव दिया कि आदर्शवाद को छोड़कर कला लिंग आधारित है। पूर्ण भारतीय नारीवादी रंगमंच का उदय हालांकि नहीं है।भारतीय महिलाओं के लिए नगर पालिका वोट 1855 में प्राप्त कर लिया गया था लेकिन शिक्षा की कमी आत्मविश्वास के अवसर में कमी सामाजिक समस्याओं में रुचि की कमी के कारण उन्होंने इसका उचित उपयोग नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम ने महिलाओं के लिए चूल्हे और चिमनी की सीढ़िया से निकलकर राष्ट्र के जीवन में आने की कोशिश की। गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने भारत में नारीवादी आंदोलन को एक नई दिशा आयाम दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति में निहित अर्धांगिनी की अवधारणा की सराहना की और इस तथ्य को स्वीकार किया कि पुरुष और महिलाएं एक दूसरे के पूरक हैंऔर कभी भी एक दूसरे के पूरक नहीं होते हैं। दूसरे के बिना उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथ दृष्टिकोण को स्वीकार किया जिसमें अर्धनारीश्वर की अवधारणा में प्रकृति और पुरुष को एक पुरुष और महिला को एक माना गया था। उन्होंने महसूस किया और विश्वास किया कि पुरुष और महिलाएं भागीदार थे ।सामाजिक जीवन में समान कर्तव्य और राजनीतिक क्षेत्र में समान अधिकारों को साझा करते थे। प्रयोगात्मक रंगमंच के स्वरूप और महिला आंदोलन के एजेंट ने नाटकों की सामग्री और विस्तार को आकार दिया ।महिलाओं के रूप में महिलाओं की चेतना द्वारा चित्र उत्पादन और उत्पाद कथा को ध्यान में रखा गया। महिलाओं की स्थिति से नाट्यशास्त्र कलाअविभाज्य है ।प्रदर्शन लिखित और अभिनय जो मतभेदों को तोड़ता है और इस प्रकार पितृसत्तात्म शक्ति को कमजोर करता है। पटकथा और उत्पादन जो विषय स्थित महिला पात्रों की पहचान और निर्माण के लिए संरचनात्मक और वैचारिक प्रतिस्थापन के रूप में परिवर्तन प्रस्तुत करता है। शुरुआत में नारीवादी रंगमंच भारत के शहरों में मुख्य रूप से गैर व्यावसायिक स्थान पर फला फूला। सफदर हाशमी के जन्नत मंच पीपल थिएटर फ्रंट 1973 में गठित ने एक एडिट प्राप्त कर्नाटक औरत महिला 1979 का प्रदर्शन किया जिसमें दुल्हन को जलाने दहेज़ और पत्नी को पीटने जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की ,यह रोमांचक था क्योंकि इसने महिलाओं के इतने विविध प्रतिनिधित्व और स्पष्टीकरण के साथ जनता के सामने आने का साहस किया। इसने थिएटर के लिए एक नया दर्शक वर्ग तैयार किया। 19वीं शताब्दी के दौरान कई महिलाओं ने कथा और कविता की शैली में महत्वपूर्ण स्थान बनाया ।मंच उनके लिए काफी हद तक बंद रहा।महिला निर्देशक जो पहले दुर्लभ थी सामने आई। लक्ष्मी चंद्र आहूजा सीता चंद्र उषा गांगुली नीलम मानसिंह चौधरी रानी बलवीर कौर शीला भाटिया बी जयश्री अरुंधति राज एस मल्टी सौम्या वर्मा गौरी दत्त नादिरा बब्बर जय शैलजा अनुराधा जैसे नाम कपूर अमल अलाना तुरंत दिमाग में आते हैं। महिला केंद्रित मुद्दों के नाटक की पहलू को एक बड़ा बढ़ावा 1943 से सक्रिय आईपीटीए इंडियन पीपल्स थिएटर मोमेंट का विकास था ।राष्ट्रीय महिला रंगमंच महोत्सव और एशिया में बहुत सारे महिला थिएटर उत्सव आदि आयोजित किए जाते हैं । भारती मां और मंच पर बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा लिखे गए नाटकों और विशेष रूप से 70 और 80 के दशक के दौरान समाज में एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नारीवाद के उपहार के बीच एक संबंध है ।कोयल सेन गुप्ता अंग्रेजी वर्षा आडलजा गुजराती मंजुला पदमनाभन अंग्रेजी त्रिपुरारी शर्मा अंग्रेजी और हिंदी डॉक्टर कुसुम कुमार हिंदी गीतांजलि श्री हिंदी रुपिंदर भाटिया हिंदी नेहा मानसिंह चौधरी पंजाबी विनोदिनी तेलुगू बिजयश्री कन्नड सनौली मित्र बंगाली उषा गांगुली हिंदी शांता गांधी गुजराती सुलभा देशपांडे मराठी वीणा पानी चावला मराठी कुदसिया जल्दी उर्दू आदि बहुत-से नाम है। संख्याओं के मामले में किसी भी किताब में एक प्रभावशाली रोल कॉल थिएटर इंडिया सीरियल थिएटर क्वार्टरली रंग प्रसंग भारत रंग नटरंग जैसी प्रमुख पत्रिकाएं अब नारीवादी थिएटर आलोचना इतिहास और सिद्धांत प्रकाशित करती हैं टुनटुन मुखर्जी ने महिला नाटक कारों का एक संकलन संपादित किया है जिसका शीर्षक है स्टेजिंग फेमिनिज्म प्लीज बाय वूमेन इन ट्रांसलेशन ऑक्सफोर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

भारतवर्ष में रंगमंच की प्राचीन रंपरा

भारतवर्ष में रंगमंच की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। भारतवर्ष में महाभारत में जिसे आज भी इतिहासकार 5000 वर्ष से अधिक पुराना बताते हैं नाटक की चर्चा है। हरिवंश पुराण में भी श्री कृष्ण के वंशधार यादवों द्वारा रंगमंच पर नाटक खेलने का विस्तृत उल्लेख है। संस्कृत भाषा में नाटक और रंगमंच की एक सुदृढ़ परंपरा दिखलाइए पड़ती है जिसमें कालिदास भास कालिदास भवभूति दंडी विशाखदत शूद्रक इत्यादि विश्व विख्यात रचनाकार हुए। यद्यपि नवी दसवीं शताब्दी के बाद भारत में शास्त्रीय नाटकों का अभाव दिखलाई पड़ता है परंतु ब्रिटिश आगमन के साथ ही आधुनिक काल में नाटक और रंगमंच की परंपरा एक बार फिर पुनर्जीवित हो जाती है और संपूर्ण भारत में विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रंगमंच को एक नया रूप देने का प्रयास किया गया। लेकिन प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के शुरुआती कुछ वर्षों तक स्त्रियों की भूमिका भी स्वयं पुरुष ही करते थे जबकि भारत देश में हमेशा से ही विदुषी महिलाएं होती रही हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही थी लेकिन यह विचारणीय प्रश्न है कि इतनी उन्नत परंपरा के रहते हुए भी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही क्यों करते थे। वैदिक काल से ही प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली स्त्रियों को मंचन के क्षेत्र में प्रवेश मिलने में इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा। आज रंगमंच के क्षेत्र में भारतीय स्त्रियों ने जो मुकाम हासिल किया है वह उसे एकाएक प्राप्त नहीं हुआ बल्कि या कई वर्षों के संघर्षों का परिणाम है। इतिहास गवाह है कि भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान हमेशा ही दोयम दर्जे का रहा है। उसे कदम-कदम पर अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं सुरक्षा हेतु संघर्ष करना पड़ा है। अतः जाहिर सी बात है कि पुरुषों के वर्चस्ववादी क्षेत्र में रंगमंच में उसे इतनी आसानी से प्रवेश कैसे मिल सकता था। विषय वस्तु की बात करें तो भारत में संस्कृत नाटकों की और रंगमंच की एक सुधीर्घ परंपरा है। उस दौर में नाटक एवं रंगमंच राज दरबार या कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। इस स्थिति में स्त्रियों का प्रवेश तो बहुत दूर की बात थी परंतु आश्चर्य की बात यह है कि आधुनिक दौर में जब 1846 से 1931 के मध्य में जीवन तरंग मंच का एक बेहतरीन वातावरण था तो उस दौर में भी स्त्रियों को रंगमंच में प्रवेश क्यों नहीं मिल पाया? जबकि इस दौर में अनेक नाटक थिएटर और रंग मंडलीय सक्रिय रूप से भारतीय रंगमंच को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे थे। फिर चाहे वहां 1846 ई जगन्नाथ शंकर सेठ के प्रयास द्वारा मुंबई में स्थापित बादशाही थिएटर हो या पिस्टन की धनजी भाई मास्टर द्वारा स्थापितपारसी नाटक मंडली नमक क्लब हो या फिर हिंदी क्षेत्र में भारतेंदु जी द्वारा काशी में स्थापित बनारस थिएटर हो यह सभी रंगमंच अपने स्तर पर मराठी गुजराती एवं हिंदी इत्यादि नाटकों का मंचन कर भारतीय रंगमंच को एक नया आयाम प्रदान करने का प्रयास कर रहे थे परंतु स्त्रियों को लेकर इन सभी थिएटर कंपनियों की एक ही सोच थी कि रंग मंच में सभ्य घरों की स्त्रियों का अभिनय करना बहुत ही अशुभनीय एवं गणित कार्य है। इससे स्त्रियों के भीतर नैतिक मूल्यों का ह्रास एवं घर के कार्यों के प्रति अवहेलना का भाव जागृत होता है। शायद यही कारण था कि उस समय स्त्रियों की भूमिका भी पुरुषों द्वारा ही की जाती थी। लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि यद्यपि उस दौर में गाना बजाना और अभिनय करना सभी घर की स्त्रियों के लिए अत्यंत घृणित कार्य माना जाता था परंतु उस समय भी कुछ स्त्रियां मजबूरी वश अपने जीवन यापन हेतु गाना बजाना एवं नृत्य करने जैसे कार्यों में संलग्न थी। जिसे हमारा समाज वैश्या की संज्ञा प्रदान करता है। फिर स्त्रियों को भी 19वीं शताब्दी तक रंगमंच में प्रवेश क्यों नहीं मिला जिनके लिए गाना बजाना या नृत्य करना अपने जीवन यापन का एक साधन था। इस प्रश्न के जवाब में यह कहा जा सकता है कि ऐसी स्त्रियां गाने बजाने में तो ठीक थी लेकिन अभिनय के क्षेत्र में दक्ष नहीं थी या फिर यह स्वयं को प्रसिद्धि से दूर रखना चाहती थीं । सभी जानते हैं कि वक्त और आवश्यकता लोगों की सोच को बदल देती है। शायद यही कारण था कि पारसी थिएटर अपनी व्यावसायिक आवश्यकता के कारण स्त्रियों के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए मजबूर हो गया। पारसी थिएटर एक व्यावसायिक थिएटर था जो अपने आर्थिक लाभ के लिए अधिक संख्या में दर्शन की आकांक्षा रखता था। शायद इसलिए वह अपने नाट्यमंचन को मंध्यवर्गीय जनता के मनोरंजन हेतु विस्तार देता है जो इसके पूर्व धनी लोगों तक ही सीमित था। जब मध्यवर्गी जनता पारसी थिएटर की दर्शक बनी तो उसमें लगातार महिला दर्शकों की बढ़ोतरी हो रही थी। जिसके नजर पारसी थिएटर स्त्री पात्रों की वेशभूषा तथा अन्य रंगमंच पहलुओं को भी स्त्री दर्शकों के नजरिए से भी देखने लगा। पारसी रंगमंच में पहली बार हलचल मच गई जब उसमें मेरी फैंटम नामक एक एंग्लो इंडियन अभिनेत्री को लाया गया। रंगमंच के क्षेत्र में एक महिला के प्रवेश को लेकर तमाम थिएटर मालिकों के मध्य एक युद्ध सा छीड़ गया। उस समय रंगमंच में इस प्रवेश को लेकर काफी विरोध का माहौल बना जिसकी झलक हमें सुनाई पड़ती है। केन कब्र पारसी समुदाय के एक समाज सुधारक होने के साथ-साथ नाटककार भी थे। इन्होंने गुजराती भाषा में कई नाटकों की रचना की तथा 1868 ईस्वी मेंएक नाटक क्लब की स्थापना की जो बाद में विक्टोरिया थीएट्रिकल कंपनी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन इन्होंने 1976 ईस्वी में सिर्फ इसलिए एक नाटक कंपनी की स्थापना की क्यों की विक्टोरिया थीएट्रिक्स अल कंपनी के मालिक दादी पटेल द्वारा इस कंपनी में स्त्रियों को अभिनय करने हेतु प्रवेश दे दिया गया। एक बार दादी पटेल को हैदराबाद में नाट्य मंचन हेतु आमंत्रित किया गया था। वहां से लौटते वक्त इन्होंने कई गाने वालों को अपने साथ ले आए और कंपनी में रख लिया जो की केन कब्र को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि रंगमंच की पवित्र दुनिया वेश्याओं के अभिनय से दूषित हो जाएगी। लेकिन रंगमंच के लिए या खुशी की बात थी कि पुरुष वर्चस्व की परंपरा को तोड़ते हुए पारसी थिएटर द्वारा इस क्षेत्र में स्त्रियों का प्रवेश प्रारंभ हो गया।। उन्हें लगता था कि स्त्री कलाकारों की सुरक्षा करना महंगा पड़ता है क्योंकि पारसी नाटक मंडली के एक महिला कलाकार के साथ कुछ ऐसी घटना घटित हो गई थी। 1872 ईस्वी में लतीफा बेगम नामक एक महिला के साथ इंद्रसभा नाटक का मंचन किया था महिला एक नृत्यांगना थी। इस नाटक में लतीफा बेगम ने परी की भूमिका निभाई थी। नाटक के समाप्त होने के बाद जब वह मंच से बाहर निकली तो किसी पुरुष द्वारा उसका अपहरण कर लिया गया। इस तरह किसी महिला कलाकार का अपहरण हो जाने से रंगमंच जगत में सनसनी फैल गई। इस तरह की घटनाएं छिटपुट थी। लेकिन पारसी रंगमंच ने स्त्रियों के लिए अभिनय का द्वार खोल दिया था जो की एक सराहनीय प्रयास था। पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर वहां के लोग कहीं ना कहीं दो गुट में बंट गए थे। 1873 ईस्वी में सरस चंद्र घोष तथा बिहारी लाल चट्टोपाध्याय ने परस्पर मिलकर बंगाल थिएटर नाम से एक कंपनी की स्थापना की और उसमें बंगाली थिएटर में स्त्रियों को भी प्रवेश दिया जाए ऐसा कहा गया। अनेक समाज सुधार द्वारा विभिन्न प्रकार के उस समय समाज सुधार कार्यक्रम चल रहे थे। इन दिनों में बंगाल में माइकल मधुसूदन दत्त और ईश्वर चंद्र विद्यासागर समाज सुधारक के रूप में कार्य कर रहे थे। रंगमंच में स्त्रियों को के प्रवेश को लेकर इन दोनों का मत बिल्कुल अलग-अलग था। मधुसूदन दत्त स्त्रियों के प्रवेश के पक्ष में थे वहीं ईश्वर चंद्र विद्यासागर इसके विरोध में थे। वे रंग मंच में वेश्याओं के प्रवेश के खिलाफ थे। इसी कारण उन्होंने उस समिति से त्यागपत्र दे दिया जिस समिति ने स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की। इसके बाद थिएटर में कोलकाता के रेड लाइट इलाकों से कई वेश्याओं को शामिल किया गया। इनमें से दो अभिनेत्री शर्मिष्ठा ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया और इस नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचा।इस नाटक की सफलता के बाद कई दिनों तक समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिखा जाता रहा। जनवरी 1874 ईस्वी में अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा कि बंगाल थिएटर सम्राट बंगाली समाज के लिए नई चीज है यह अत्यंत सुखद और खूबसूरत प्रयास है कि महिलाएं स्त्री पात्रों की भूमिका अदा करें पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश का कहीं ना कहीं विरोध हो रहा था स्त्री समर्थकों में एक नाम किरण चंद्र दत्त का है। यह बंगाल थिएटर के साथ नाटककार और निर्देशक के रूप में कार्य कर रहे थे इनका कहना था कि यूरोप में कई लोग ग्रहणी महिलाओं को अभिनय को एक पेशे के रूप में अपने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसलिए हमें भी अपनी महिलाओं को अभिनय हेतु स्वतंत्रता देनी चाहिए। हिंदी नाटक और रंगमंच के शुरुआती दिनों में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली नाटक की रचना कर स्वयं इसका मंचन करते थे परंतु स्त्रियों को लेकर उनके मन में वही भावना थी कि स्त्रियों को रंगमंच के क्षेत्र में कम नहीं रखना चाहिए। भारतेंदु युग के दौरान नाट्य मंचन की जो लहर चली थी उसमें भी स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे इसलिए इस दौर में भी किसी स्त्री का जिक्र नहीं होता।रंग वंश के क्षेत्र में स्त्रियों के साथ हो रहे इस भेदभाव के प्रश्न को सर्वप्रथम कुमारी सत्यवती ने अपने एक लेख के माध्यम से उठाया यह लेख माधुरी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और प्रश्न उठाया की हिंदी रंगमंच पर स्त्रियां क्यों नहीं इसके अतिरिक्त जिन्होंने पुरुषों द्वारा स्त्रियों की भूमिका निभाई जाने का भी विरोध किया इन्होंने अपने लेख में लिखा कि जिस प्रकार जीवन स्थिति एवं पुरुषोत्तम दो भागों में विभक्ति है तथा जीवन के हर कार्य में स्त्री तथा पुरुष दोनों को भाग लेना पड़ता है उसी प्रकार कल के अंग नाटक में भी जहां जीवन के सुख और दुख दोनों दिखाए जाते हैं स्त्री एवं पुरुष दोनों को भाग लेना चाहिए

बंगाल की प्रमुख हिंदी महिला रंगकर्मी

बंगाल की प्रमुख हिंदी महिला रंगकर्मी - - - - -डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है, यह सच है कि बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। भारत में उन्नत परंपरा और विदूषी महिलाओं के रहते हुए भी स्त्रियों को सदैव ही दोयम दर्जे पर रखा गया है। वैसे तो प्राचीन काल से ही नाटकों का जिक्र महाभारत और संस्कृत में प्रमुखता से मिलता है।कुछ काल तक नाटक और रंगमंच का अभाव रहा लेकिन ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ ही आधुनिक काल में नाटक और रंगमंच की परंपरा एक बार फिर पुनर्जीवित होती है। संपूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रंगमंच को एक नया रूप देने का प्रयास किया गया। स्त्रियों को कदम कदम पर अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं सुरक्षा हेतु संघर्ष करना पड़ा है। नाटक तो आरंभ से ही पुरुषों के अधिकार में रहा था। यहां तक कि स्त्री पात्र के चरित्र को भी पुरुष ही करते थे तो पुरुषों के वर्चस्ववादी क्षेत्र रंगमंच में स्त्रियों को आसानी से प्रवेश कैसे मिल सकता था? उस दौर में नाटक एवं रंगमंच राज दरबार या कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। स्त्री का नाचना - गाना नीचा और घृणित कार्य समझा जाता था। थियेटर आदि में कार्य करने वाली स्त्रियों को वेश्या तक की संज्ञा दी गई। बंगाल थियेटर और नाटकों के मंचन के क्षेत्र में सदैव आगे रहा है। बंगाल में हिंदी नाट्य कला को आगे बढ़ाने में प्रसिद्ध नाट्य कार अभिनेत्री ,निर्देशक,कवयित्री साहित्यकार प्रतिभा अग्रवाल, उषा गांगुली, उमा झुनझुनवाला तीनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिन्होंने रंगमंच के नए प्रयोग और प्रतिमान स्थापित किए। बांग्ला और हिंदी के रंगमंच में सेतु का काम किया। वर्तमान में स्त्रियों ने अपनी पहचान का आंकलन किया है और विषम चुनौतियों का सामना कर जीवन के हर क्षेत्र में उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। बंगाल के जिस पुरुष नाटककार के नाटक सबसे ज्यादा हिंदी में खेले गए उनका नाम बादल सरकार और श्यामानंद जालान है । आधुनिक युग 19-20वीं सदी से बंगाल में हिंदी के नाटकों का मंचन आरंभ हुआ जिसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। बादल सरकार जितने बड़े नाटककार थे उतने ही बड़े अभिनेता और निर्देशक भी। इसके लिए उन्होंने रंगमंच को विकसित किया। वे रंगमंच के सिध्दांतकार थे। उन्होंने तीसरे रंगमंच का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया और उसे बाकायदा मंच पर उतारा भी। भारतीय रंगमंच में तीसरे रंगमंच की मौलिक धारणा को बादल सरकार ने कई पड़ावों से गुजरते वर्षों रंगकर्म करते हुए एक नए रंगभाषा की खोज की। उस खोज के भी कई चरण रहे जिन्हें पार करते हुए ही अंततः तीसरे रंगमंच का सिद्धांत रच सकते थे। बादल सरकार ने नाटक जब हिंदी वह अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित होकर खेले तो उनकी जनप्रियता बंगाल के बाहर समूचे भारत वर्ष में फैली। यानी हिंदी में आने के बाद ही बादल दा पूरे भारत के नाटककार बने। आंगन मंच में उन्होंने अपने नाटक प्रस्तुत किए। इस शैली में शारीरिक अभिनय को विशेष महत्व दिया जाता है। 1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। घर-घर, गांव- गांव और शहरों में, आंगन में, छत पर नुक्कड़ और गांव में नाटकों को पहुंचाया। मराठी, हिंदी, पंजाबी, गुजराती, मलयाली, कन्नड़, ओड़िया आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक लोकप्रिय हुए। एक अलग किस्म के थिएटर के जनक जिसे साइको फिजिकल थिएटर के नाम से जाना गया। सन् 1965 में बादल दा ने दो नाटकों का निर्देशन किया जो एवं इंद्रजीत और बल्लभपुर की रूपकथा थी । बंगाल में रंगमंच पर स्त्री रंगकर्मियों की बात हो तो हिंदी में कम से कम तीन हिंदी भाषी रंगकर्मियों का जिक्र आवश्यक है। इस कड़ी में श्यामनंद जालान का प्रमुख नाम है जिन्होंने बंगाल में हिंदी रंगमंच को प्रसिद्धि दिलाई। प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली , उमा झुनझुनवाला इन तीनों रंग स्तंभों ने स्वतंत्र उत्तर काल में बंगाल तथा हिंदी रंगमंच के बीच महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण किया। इसके पहले नाटककार, निर्देशक और अभिनेता श्यामनंद जालान के नाट्य कला के कुछ बिंदुओं को भी समझने की आवश्यकता है। श्यामानंद जालान ने बंगाल की कई महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। जालान ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास पगला घोड़ा का हिंदी में नाटक रूपांतरण किया तो बादल सरकार के दो नाटकों एवं इंद्रजीत और पगला घोड़ा का भी हिंदी में नाट्य रूपांतरण कर मंचन किया। जालान ने ही समूची हिंदी पट्टी से बादल सरकार का परिचय कराया था। श्यामानंद जालान ने महाश्वेता देवी के उपन्यास 'हजार 84 की मॉं' का हिंदी में नाटक रूपांतरण का मंचन किया तो दिव्येंदु पालीत की कहानी मॉं का अभिनय कर हिंदी में पट कथा तैयार की और फिल्म भी बनाई जो जालान द्वारा निर्देशित यह एकमात्र फिल्म थी। जालान ने 1972 में पश्चिम बंगाल नाटक उन्नयन समिति के नाटक तुगलक में बंगाल के लोकप्रिय रंगकर्मी शंभू मित्र के साथ मंच पर अभिनय किया था। इस बांग्ला नाटक में देवव्रत और रूद्र प्रसाद सेनगुप्त ने भी अभिनय किया था। बांग्ला नाटकों के अलावा बांग्ला फिल्मों में भी अभिनय किया। बांग्ला फिल्म चोख में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें श्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। जालान ने रंगमंच साहित्य में ही अपने छह दशक से ज्यादा का जीवन लगा दिया। छात्र जीवन में ही रंगमंच उनकी पसंदीदा विधा बन गई थी। 15 साल की उम्र में उन्होंने 1949 में नया समाज नामक एक नाटक में अभिनय किया। तरुण संघ की तरफ से यह नाटक खेला गया और कोणार्क, चंद्रगुप्त जैसे बहुत से नाटकों का निर्देशन भी किया। 1955 में ही जालान ने अपनी नई रंगसंस्था 'अनामिका' की स्थापना की, बाद में पदातिक भी। तब तक अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में वे अपनी प्रतिभा का लोहा रंगकर्मी के रूप में मनवा चुके थे। प्रसिद्ध नाटककार साहित्यकार और स्त्री रंगकर्मी प्रतिभा अग्रवाल अनामिका से उसके स्थापना काल से जुड़ी रहीं। प्रतिभा अग्रवाल के मुताबिक उस समय किसी भी नाटक को मंचन करने का निर्णय करने पर उसके उपयुक्त साधनों को जुटाना बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती थी। कलाकारों, तकनीकी सहायकों को साथ लेना श्यामानंद का पहला काम होता। परिस्थितियों के आगे - पीछे, आजू-बाजू लड़ाई झगड़ा, मत विरोध व मनुष्य कारक वितरण जो भी चला रहा हो,उनका रिहर्सल आमतौर पर सुखद होता था। श्यामानंद जालान हमेशा बड़े रूप में चीजों की परिकल्पना करते। अनेक बार इतने बड़े रूप में कार्य करने के बाद कई तरह की उलझने खड़ी हो जाती। पर वे मानते थे कि बड़े रूप में सोचे बिना बड़ा काम नहीं किया जा सकता। इसी कारण अनामिका ने बहुत सी यादगार प्रस्तुतियाँ दी। अनामिका और श्यामानंद जालान जल्द ही एक दूसरे के पर्याय बन गए। स्त्री नाट्ककार प्रतिभा अग्रवाल एक प्रसिद्ध रंगकर्मी रही हैं जिनकी शुरुआत अनामिका नाट्य संस्था से हुई। सन् 1955 में भँवरमल सिंघी, सुशीला सिंघी, प्रतिभा अग्रवाल के साथ मिलकर ‘अनामिका’ की स्थापना हुई । संगीत नाटक एकेडमी एवार्ड 2005 से पुरस्कृत प्रतिभा अग्रवाल एक ऐसी प्रतिभा संपन्न महिला है जिन्होंने अपने नाम को सार्थक किया है। उनका जन्म 1930 में बनारस में एक ऐसे घराने में हुआ जिसने हिंदी भाषा और हिंदी नाटक को सशक्त बनाने में विशेष भूमिका निभाई।रंगमंच के प्रति प्रतिभा जी की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण मिलता है जो इस प्रकार है - सन् 1959 में उनके पिता मृत्यु शय्या पर थे। दिल्ली में नाटक नए हाथ का मंचन था। 12 अगस्त को पिता की इह जीवन लीला की समाप्ति हुई। प्रतिभा 18 को दिल्ली गईं 19 अगस्त को नाटक किया और 21 की सुबह लौटकर पिता के दशकर्म विधान में भाग लिया। रंगमंच से उनकी इस प्रतिबद्धता और समर्पण के पीछे अभिनय, संगीत और साहित्य के गहन संस्कार रहे हैं जो उन्हें विरासत में मिले। उनके पिता बाल कृष्ण दास बनारस में रंगमंच की मशहूर शख्सियत थे और दादा राय कृष्ण दास प्रसिद्ध लेखक थे। वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के सगे फुफेरे भाई थे। भारतेंदु के निवास स्थान भारतेंदु भवन में ही 10 अगस्त 1930 को प्रतिभा अग्रवाल का जन्म हुआ था। प्रतिभा का दाखिला वाराणसी के अग्रवाल कन्या पाठशाला में कराया गया, कक्षा तीन में सुशीला का इनाम मिला। स्कूल के वार्षिकोत्सव में नृत्य और गायन का बराबर मौका मिला और रंगमंच से जुड़ने की शुरुआत भी इस समय से हो गई थी। उनको छोटी उम्र में ही डेढ़ सौ कविताएं कंठस्थ थीं । पिता रोज कहीं - न - कहीं नाटक खेलने जाते। कभी-कभी बेटी को भी साथ ले जाते नाटक दिखाने। नाटक देख उनके भीतर भी रंगकर्म की प्रेरणा जागृत हुई और वह स्कूल के वार्षिकोत्सव में नाटकों में भाग लेने लगी। इसके अलावा काशी के महिला मंडल के वार्षिकोत्सव में राधा कृष्ण दास के 'महाराणा प्रताप' में प्रतिभा ने पहली बार मंच पर अभिनय किया। तब उनकी उम्र 13 वर्ष की थी। इस दौरान प्रतिभा को मदन मोहन अग्रवाल ने हनुमान भैया के यहाँ देखा। मदन बाबू को प्रतिभा का रूप रंग भा गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। बगैर दहेज के 15 फरवरी 1945 को विवाह हुआ। तब प्रतिभा की उम्र 15 वर्ष और मदन बाबू की 25 वर्ष थी। शादी के 15 दिन बाद ही प्रतिभा पति के साथ कोलकाता आ गईं। शादी के साल भर बाद ही इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए प्रतिभा को शांतिनिकेतन भेजा गया । वहाँ प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' का आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रूपांतरण किया जिसमें नवाब वाजिद अली शाह की भूमिका प्रतिभा ने निभाई। शांति निकेतन से तीन वर्ष बाद कोलकाता में प्रतिभा ने पहली बार दो अतिथि और कला और जीवन में अभिनय किया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। समस्या अलग-अलग रास्ते, चंद्रगुप्त और शाहजहां में अभिनय करने के बाद 1955 में प्रतिभा 'अनामिका' नाट्य संस्था से जुड़ गई। अनामिका की रंग प्रस्तुतियां नए हाथ, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, घर बाहर, छलावा, सुहाग के नूपुर और आधे अधूरे में उनके अभिनय की धूम मच गई। इसी तरह गोदान में धनिया के रूप में उनके अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं। 1981 में प्रतिभा अग्रवाल ने कोलकाता में नाट्य शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्थान भारत की हर भाषा से जुड़े थिएटर के ऐतिहासिक तत्वों का संग्रह है और इतिहास की मुकम्मल जानकारी प्रदान करता है। दुर्लभ नाट्य पांडुलिपियों, पोस्ट नाट्य समीक्षाएं, पत्र- पत्रिकाओं की कतरनी, पुस्तक ऑडियो वीडियो कैसेट, फिल्म, मॉडल, स्लाइड, तस्वीर, पोशाक आभूषण, ब्रोशर्स आदि का अनुपम संग्रह है। 1986 में मास्टर फिदा हुसैन पर प्रतिभा अग्रवाल की किताब से यह संस्थान काफी सक्रिय हुआ। उसके बाद उनकी किताब रंगकर्मी हबीब तनवीर एक रंगकर्मी पुस्तक भी आई । नाट्य संस्थान की स्थापना के बाद से प्रतिभा जी का अभिनय निर्देशन छूट गया लेकिन संस्थान के रंग संरक्षण का महत्वपूर्ण काम उन्होंने किया। वह लेखिका और अनुवादिका भी हैं। उन्होंने सृजन का सुख-दुख दस्तक जिंदगी की मोड जिंदगी का हिंदी में मौलिक कृतियांँ लिखीं। प्रतिभा जी उपन्यासकार भी हैं। प्यारे हरिश्चंद्र जू शीर्षक से उन्होंने जीवनी उपन्यास लिखा। उनका शोध प्रबंध हिंदी मुहावरे विश्लेषणात्मक विवेचन भी एक मूल्यवान कृति है। मौलिक लेखन के अलावा प्रतिभा जी ने 6 उपन्यासों के नाटक रूपांतरण किया। गोरे भाई (रवींद्रनाथ ठाकुर) , सुहाग के नूपुर (अमृतलाल नागर), गोदान, (प्रेमचंद), मैला आंचल ((रेनू) प्रतिभा अग्रवाल ने 40 से अधिक नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है जिसमें बंगाल और गुजराती नाटकों का विशेष रूप से अंग्रेजी से एप्सन ऑथर मिलर के नाटकों का हिंदी अनुवाद किया। कई पुस्तकों का संपादन भी किया जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है हिंदी रंग कोष और उन्होंने कई वर्षों तक कोलकाता साहित्य संकलन भी निकाला । नाट्यकार, साहित्यकार और शिक्षिका डॉ उषा गांगुली ने कोलकाता में हिंदी नाटक को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। बांग्ला नाटक रंगमंच के जरिए बांग्ला हिंदी सेतु बंधन में अहम भूमिका अदा करने वाली उषा गांगुली को जानने का अवसर उन्हीं की रंग प्रस्तुति 'अंतर्यात्रा' देती है। यह नाटक उनकी आत्मकथा है। उनके निजी और रंग जीवन में जो स्त्रियां आईं सभी इसमें है। दूर खड़ी एक स्त्री जो पुरुष के प्रेम के द्वंद में फंसी बीना । आत्म सम्मान से जीने के लिए घर से बाहर आई मुनिया राजनीतिक विप्लव की साकार छवि बन गई, गोर्की की मां। गाड़ी के बोझ को अकेले खींच रही हिम्मत में, साहसी सावित्री। रुदाली की शनिचरी जिसका पेशा है अमीरों के मुर्दे पर रो कर पैसा कमाना। उषा गांगुली निर्देशित अभिनीत अंतर्यात्रा सिर्फ नाटक नहीं, बाहर - भीतर के जंग से निरंतर जूझती स्त्री की संघर्ष गाथा है। इस नाटक में तीन ज्यामिति आकृतियाँ मंच सज्जा का जरूरी हिस्सा है। मंच सज्जा चौधरी की है और प्रकाश व्यवस्था तपन सेन की। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के धुरंधर हैं मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में जो अंतर्यात्रा में कथा की संप्रेषणीयता को कई गुना बढ़ा देती है। ढाक बजता है और उसी के साथ उषा मंच पर प्रकट होती हैं। ढाक की आवाज उषा को बचपन की याद दिलाती है और जब वह स्मृतियों में उतरती है तो उनके निजी जीवन और रंग जीवन में आई कई स्त्रियों की वेदना उनका संघर्ष उनकी आंखों के सामने दर्शाया जाता है। इस तरह उषा गांगुली के अंतर्यात्रा में कई कई स्त्रियों की अंतर्यात्राएँ जुड़ती जाती हैं और सभी मिलकर नाटक को स्त्री संघर्ष की महागाथा के रूप में परिणत कर देती है। उषा गांगुली इसमें हिंदी और बांग्ला में भी अपनी बात कहती हैं। उषा का संपूर्ण जीवन अनुभव व रंग अनुभव इस नाटक में तनाव और जीवंतता को बनाए रखता है। दृश्य श्रव्य के सहारे पूरे एक घंटे तक वह दर्शकों को खींचे रखती हैं। उनकी संवादमयी भंगिमा इतनी असरदार है कि दर्शक पूरी अंतर्यात्रा में शरीक होता चलता है और उनकी चिंताओं में भी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की हैसियत का बोध उषा को बचपन में ही हो जाता है। उनकी यह जिज्ञासा कि छोटे भाई की तरह मेरा जन्मदिन क्यों नहीं मनाया जाता, बहुत ही मार्मिक है। यह छोटा सा संवाद स्त्री-पुरुष समानता की पूरी कहानी खोल देता है। फिर शुरू हो जाती है एक-एक पात्र की दुख भरी कहानी बीना की याद आ रही है। बीना बस ड्राइवर की बेटी है। नौकरी करने दिल्ली जाती है।बुद्धिजीवी सुदीप के प्रेम में डूब जाती है। बीना परिवार के साथ सुदीप का इंतजार करती है, पर सुदीप नहीं आता है। आता है उसका एक खत जिसमें लिखा होता है कि उसने जो जो कहा सब झूठ है। पूरा घर बीना पर बरस पड़ता है। बहुत से ऐसे नाटक हैं जिसमें उषा ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है । अंतर्यात्रा नाटक मुनिया के सिंदूर प्रसंग को अनिमा दी के प्रसंग से जोड़ता है। हम सबके घर में अनिमाएं रहती हैं जो उप नगरों से आकर हमारे घरों को संभालती हैं। अनिमा दी अपने घर से निर्वासित होकर कोलकाता आई थी। उषा पूछती है कि सीता से जो निर्वासन शुरु हुआ उसका अंत कब होगा। अनिमा दी मांग में सिंदूर लगाती थी। वे अपना गांव मथुरापुर इसलिए छोड़ कर आई थी क्योंकि वहां उनकी सौत आ गई थी। अनिमा दी के बाद उषा गोर्की व ब्रेख्त की मां का स्मरण करती है। 1992 में मां का मंचन हुआ । किंतु वही एक संपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के प्रति मूर्ति होती है। सिमिलगीं को गोली लग जाती है। तब भी धीरे-धीरे जमीन पर झुकती है झंडा उठाती है। झंडा मैं उठाऊंगी इन सबको बदलना होगा बालासवा तुम्हारे बेटे को गोली मार दी गई है यह सुनकर मां बेटे के शोक में कमजोर नहीं होती बल्कि और मजबूत होकर सामने आती है।सुरक्षा के सवाल से रोज स्त्री को रूबरू होना पड़ता है। स्वयं उषा गांगुली को भी जूझना पड़ा है। अंतर्यात्रा में उषा का स्वयं का एक अनुभव है। वे नंदन सभागार में एक सेमिनार में बोलकर वापस आ रही थीं। सड़क पार कर टैक्सी के इंतजार में गोखले रोड के किनारे खड़ी हुई थी कि अचानक एक अनजान अपरिचित सामने आकर कहता है कि मेरे साथ कॉफी पीने जाएंगी! उस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने हजार हजार बाल्टी ठंडा पानी उषा पर डाल दिया हो। लगा उनकी शिक्षा उनका सम्मान उनका अध्यापन उनका सुंदर थिएटर सब कुछ खाक में मिल गया। वह सिर्फ एक नारी है इस तरह बहुत से कार्य उन्होंने किए। माधुरी रंगकर्मी की संस्थापक सदस्य थी। देखने पढ़ने में सुंदर थी, स्वर्ण पदक मिला था। वही माधुरी एक दिन दोपहर के वक्त दौड़ती आई, उसके पूरे शरीर से केरोसिन की गंध आ रही थी। बोली वह लोग मुझे मार डालेंगे। मेरे हाथ में माचिस की तिल्ली देकर चिल्लाने लगी आग लगा दो। 14 दिन कमांड अस्पताल में रहकर चल बसी। उसने लास्ट स्टेटमेंट दिया मेरी मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं। जीवन में मिली स्त्रियों की कथा व्यथा सुनाते हुए उषा बराबर स्त्री की अवस्था को व्यापक सामाजिक संदर्भों के बीच रखकर जांचने पररखने की कोशिश करती है। नाटक का एक संवाद है मीराबाई की जंजीर भी कम भारी नहीं थी।मेरा मन प्रभु चरणों में लगा ही रहा। इसमें जो होना हो सो हो। उषा आखिर में लिखती हैं कि मैं भी बचूंगी, मैं बच गई इस संवाद के साथ ही पर्दा गिरता है। कहना न होगा कि स्त्री का संघर्ष और उसका आत्म संघर्ष चलता रहता है। अभी भी चल रहा है, संघर्ष में ही निर्मित भी होती है और स्त्री विमर्श के नए गवाक्ष खोलते हैं।(डॉ कृपाशंकर चौबे के लेख बंगाल में रंगमंच का इतिहास और वर्तमान से) वर्जिनिया वूल्फ ने कहा है कि स्त्री का लेखन स्त्री का लेखन होता है, स्त्रीवादी होने से बच नहीं सकता। हिंदी महिला नाट्यकार उमा झुनझुनवाला लिटिल थेस्पियन थियेटर की संस्थापक हैं जिन्होंने अपने पति अज़हर आलम के सपनों को साकार करने में दिन-रात एक किया। उनकी नाट्य यात्रा तीन दशकों से अनवरत चल रही है जिसमें पति नाटककार अज़हर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं। कोरोना महामारी में अजहर के मरणोपरांत भी उमा ने रंगमंच की बागडोर को संभाले रखा और शो कभी बंद नहीं किया बल्कि एक नया मुकाम हासिल किया। औरत_की_एक_डायरी महज लेखिका की डायरी नहीं, बल्कि यह किसी भी स्त्री के विश्वास और उसके टूटने तथा उससे उपजी मनस्थितियों के आरोह-अवरोह, द्वंद्व, विषाद, दृश्य-अदृश्य की पीड़ा आदि का लेखाजोखा है, जहां एक औरत के भीतर जीती दो औरतें या फिर एक औरत के भीतर जीती कई-कई औरतें बड़बड़ाती-सी प्रतीत होती हैं। इसके पन्नों में दर्द की अपनी कहानी है, जो एक पात्र से निकल कर दूसरे से होते हुए कई जानी-अनजानी स्त्रियों को छूते हुए, उन्हें कुरेदते हुए पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ती है। इन पन्नों में औरतों के मनोभावों को समझने का प्रयास है और इसीलिए इस डायरी के पन्नों को न तो किसी तारीख में बांधा गया है और न ही दिन में। उन्होंने इसके कुछ पृष्ठों का मंचन भी किया है। तीन नाटक विसर्जन, भीगी औरतें, लम्हों की मुलाकात, लाल फूल का एक जोड़ा उमा झुनझुनवाला की नाट्य कला के महत्वपूर्ण नमूने हैं। उनके पात्रों में सीमा सिंह कोई मामूली लड़की नहीं थी। उसके व्यक्तित्व में एक ख़ास आकर्षण था। बातचीत का सलीका ऐसा कि सुनने वाला उसके असर से बंध जाए जबकि आवाज़ में कोई एक रेशा ऐसा भी मिश्रित रहता कि उससे बंध कर भी सुननेवाला नियंत्रण की हद में ही रहे और आँखे तो लगता है ईश्वर ने किसी ख़ास मकसद से ही बनाई थी, गज़ब का चुम्बकीय आकर्षण था। काजल लगी आँखें ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे समंदर में तिरती कोई नौका। शहर के प्रतिष्ठित आनन्द मोहन राय कॉलेज के फाइनल इयर की विख्यात छात्रा थी। रेंगती परछाई नाटक में एक बेवा और उसके तीन अधेड़ बेटियों की कहानी है ।घर के चप्पे-चप्पे पर रेंगती परछाई के इर्द-गिर्द घूमती है। जहां सभी को एक पुरुष की कमी खलती है। घर के सन्नाटे को दूर करने के लिए वे सभी बेटियां भोग विलास के लिए एक-एक करके मां के शौहर ऑफिज से रिश्ता बना लेती है।बाद में छोटी बेटी यह राज़ खोलती है। तुम्हे याद है न..कविता में उमा झुनझुनवाला की प्रत्येक कविताओं में सच्चे भोगे हुए शब्दों के भाव लहराते हुए प्रवाहित होते रहते हैं। जब नदी किनारे हम मिला करते थे तो नदी लहराती हुई हमारे क़दम चूमने आ जाती थी अब तो कई युग बीत गए। तुम्हें याद है न... हरी घास पर बैठे जब हम गिन रहे होते थे। रूमानी घड़ियाँ। हरी घास कैसे कैसे गुलाबी हो जाया .. कुछ इसी तरह की अन्य कविताओं में भी एक ऐसे लोक में ले जाती हैं जहां प्रेम की ऊंचाईयां हैं - - नदी में नौका चल रही थी माझी नदी का दिल गुनगुना रहा था कि औरत को बहता हुआ एक लाल फूल दिखा रोज दिखता है इसी वक्त कोई नहीं जानता रोज़ इसी वक्त नदी में यह लाल फूल कौन बहाता है कहीं यह भ्रम तो नहीं ------------- एक जोड़ी आँख दिख जाती है वह उस तरफ दौड़ कर जाती है चारों तरफ घूम घूम कर उस आँख को तलाशती है मगर वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता भीगी औरतें नाटक का निर्देशन किया जिसकी परिकल्पना और नाटक लेखन भी उमा झुनझुनवाला का रहा। भीगी औरतें नाटक अमृता प्रीतम की कहानियों और कविताओं की आग से उत्पन्न स्त्री कथा है। उमा का मानना है कि अमृता को पढ़ना एक स्त्री के तीव्र दर्द से गुजरने जैसा है। यह स्त्री की आस्था, टूटन और उसकी त्रासदी को दर्शाने वाली है। साथ ही स्त्री के विश्वास उसकी महानता और क्षमा करने और आगे बढ़ने की उदारता की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। वे मानती हैं कि नाटक में स्त्री कलाकार ही अपने रंगों को महसूस कर सकती है। यही इसे एक वास्तविकता को दर्शा सकता है। 21 वीं सदी में निर्देशक,अभिनेत्री के रूप में देश में प्रसिद्धि प्राप्त उमा झुनझुनवाला नाट्य गुरु के रूप में अपनी कला को विस्तार देने के लिए लगातार थियेटर को विकसित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। विभिन्न संभावनाओं को, प्रतिभाओं को उभारने का काम कर रही हैं।13 वर्षों से जश्न ए अज़हर राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन कर रही हैं जो छह दिनों तक चलता है।देश भर की नाट्य संस्थाएं आकर नाटकों का मंचन करती हैं। श्रव्य के अंतर्गत रंग संवाद का सत्र और फिर नाटक की प्रस्तुति इस नाट्य उत्सव की खासियत है।अज़हर आलम मेमोरियल सम्मान से भी नाटककारों को सम्मानित किया गया। इस वर्ष यह नाट्य उत्सव 19-24 जनवरी 2024 तक चला जिसमें कोलकाता के कॉलेज युवाओं को जोड़ा गया। सभी के खाने-पीने की सुचारू रूप से व्यवस्था रहीऔर विद्यार्थियों ने नाटक में भी भाग लिया। सच कहा गया है कि नाटक प्राण है तो रंगमंच शरीर है। अज़हर आलम और उमा झुनझुनवाला ने 1994 में भारतीय नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन की स्थापना की जो सांस्कृतिक तथा व्यवसायिक आधार पर रंगकर्म के लिए प्रतिबद्ध है। 29 वर्षों से इस संस्था ने 35 नाटक, 46 कहानियाँ,10 एकांकी और 100 से अधिक कहानियों और कविताओं का अभिनयात्मक किस्से ख्वानी के रंगमंच प्रदर्शन किए हैं जिन्हें बहुत सराहना मिली है। रंगमंच की पहली उर्दू मैग्ज़ीन रंगरस का प्रकाशन भी किया गया है। भीगी औरतें, परछाइयाँ, कोई और रास्ता, रेत और इंद्रधनुष, एंडगे, हजारों ख्वाहिशें, रूहें, बलकान की औरतें, धोखा, कबीरा खड़ा बाजार में, गैंडा, शुतुरमुर्ग, यादों के बुझे हुए सवेरे आदि कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तुतियां हैं।सभी में अज़हर और उमा दोनों का निर्देशन रहा है। पति अज़हर आलम को पश्चिम बंगाल की ओर से नमक की गुड़िया के लिए बेस्ट प्ले राइट तथा सवालिया निशान के लिए बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से सम्मानित किया गया था। नटरंग प्रतिष्ठान ने अज़हर आलम को उनके नाटक रूहें के लिए नेमिचंद्र जैन नाट्यालेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कोरोना काल में अज़हर का साथ छूट गया लेकिन उमा ने हौसला नहीं छोड़ा। नारी शक्ति और रंगमंच का मतलब नारी को और शक्तिशाली बनाना लेकिन उसमें कलात्मकता और संवेदना भी होनी चाहिए। रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है। बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। रंगमंच के क्षेत्र में अभी भी महिला नाटककारों की कमी है। 80 के दशक के बाद से हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी स्त्री नाटककारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है जो रंगमंच के लिए अच्छा संकेत है। वर्तमान में बंगाल में हिंदी रंगमंच के इतिहास में उमा झुनझुनवाला का नाम महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है।