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Monday, February 19, 2024

थियेटर में स्त्रियों की भूमिका

थिएटर में खम ठोंक रही है स्त्रियां समसामयिक विषयों पर हिंदी में बहुत से नाटक लिखे और खेले जा रहे हैं। इसमें अहम् भूमिका निभा रही हैं स्त्री नाटककार। वे न सिर्फ स्त्री प्रधान नाटकों में काम कर रही हैं, बल्कि नित नए प्रयोग भी कर रही हैं। निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल... इसका भावार्थ यह है कि अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नति का मूलाधार है। कोलकाता की प्रसिद्ध नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन की संस्थापक उमा झुनझुनवाला वर्तमान में ऐसा नाम है जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृति और संस्कार के रूप में हिंदी नाटकों के क्षेत्र में युवा पीढ़ी के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। भोजपुरी, मैथिली, अवधी, डोगरी, पंजाबी जैसी आंचलिक भाषाओं के नाटकों में भी स्त्री नाटककार काम कर रही हैं। कोई भी भाषा हो, केंद्र में स्त्री पात्र ही होती हैं। उमा झुनझुनवाला द्वारा आयोजित जश्न ए अज़हर लिटिल थेस्पियन थियेटर फेस्टिवल के रंग संवाद में मुझे भी स्त्री संवाद सत्र के अंतर्गत कोलकाता में स्त्री नाटककारों के तभी तो मंझी हुई थिएटर आर्टिस्ट असीमा भट्ट कहती हैं कि चाहे किसी भी भाषा के नाटक हों, यदि उनमें से स्त्री पात्रों और उनकी भूमिका को हटा लिया जाए तो समाज का स्वरूप किस तरह प्रतिबिंबित होगा? उनका महत्व पहले भी था और आज भी है। मोहन राकेश के नाटक ‘आधे-अधूरे’ में स्त्री, समाज और संबंधों को दिखाया गया है। बांग्ला, उड़िया, मलयाली भाषाओं के नाटकों में स्त्रियां काफी मुखर हैं। शरतचंद्र के ‘चरित्रहीन’ में स्त्रियों की दैहिक मांग को प्रस्तुत किया गया है। सआदत हसन मंटो ने स्त्री को केंद्र में रखकर जितने भी नाटक लिखे, वे आज भी प्रासंगिक हैं। भोजपुरी में स्त्री पात्र भोजपुरी में नाटक वर्षों से मंचित हो रहे हैं, लेकिन नाटककार भिखारी ठाकुर ने इसे बिल्कुल नए तरह से परिभाषित किया है। दरअसल, उन्होंने अपने ज्यादातर नाटकों में स्त्रियों की तत्कालीन परिस्थितियों, विषमताओं की ओर इंगित किया है। भाई-विरोध, कलयुग प्रेम, विधवा विलाप, द्रौपदी पुकार आदि में स्त्रियों की मन:स्थिति का उन्होंने बखूबी चित्रण किया है। उनका प्रयोग आज भी जारी है। लोकप्रिय भोजपुरी नाट्य मंच रंगश्री समय-समय पर सामाजिक संदर्भों पर आधारित नाटक खेलती है। ज्यादातर नाटकों में स्त्री पात्रों की प्रधानता होती है। रंगश्री के डायरेक्टर महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘स्त्रियों पर आधारित नाटकों के दर्शक बड़ी संख्या में मिलते हैं। दरअसल, आजादी मिलने के 60 दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज भी देहातों में स्त्रियों की स्थिति चिंतनीय है। इसलिए महान साहित्यकारों के लिखे नाटक (राहुल सांकृत्यायन के नाटक ‘मेहरारुन के दुर्दशा’) आज भी प्रासंगिक हैं। छोटी जगहों के साथ-साथ बड़े शहरों में भी स्त्रियों पर आधारित नाटक देखे जाते हैं, क्योंकि इससे उन्हें उनकी सही स्थिति का आकलन हो पाता है। यही वजह है कि ‘भ्रूण हत्या’, ‘हमार बिटिया’, ‘महिला प्रतीक्षालय’ नाटक लोकप्रिय हैं। भोजपुरी नाटकों में अभिनय करने वाली सुचित्रा सिंह कहती हैं कि बोल्ड और मजबूत भावनाओं को दिखाने वाले नाटक अधिक पसंद किए जाते हैं। महेंद्र आगे कहते हैं कि बांग्ला और मराठी के उलट पहले भोजपुरी भाषा में स्त्रियों के अभिनय करने की संस्कृति नहीं थी। उन्हें नचनिया और बजनिया कहा जाता था। अब ऐसा नहीं है। अभिनय में रुचि रखने वाली लड़कियों को परिवार और समाज से बढ़ावा मिल रहा है। रंगमंच का विस्तार हो रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, भोपाल, पटना जैसे बड़े केंद्रों के अलावा, बरेली, आजमगढ़, जयपुर, बेगूसराय, सहरसा, मंडी, जबलपुर, रायगढ़ जैसी छोटी जगहों पर भी सक्रिय रंगकर्म हो रहा है। अत्याधुनिक मैथिली नाटक मिथिलांचल के ग्राम्य जीवन, सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक आंदोलनों और सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति और मिथिला की स्त्रियों की दशा और दुर्दशा को महान साहित्यकार नागार्जुन ने अपने कथा साहित्य में बखूबी दर्शाया है। हाल की चर्चित प्रस्तुतियों, जैसे ‘जल डमरू बाजे’, ‘विलाप’, ‘मुक्तिपर्व’ में स्त्रियों के भाव और विचार प्रमुख हैं। ‘मैथिल नारी का रंग’ में मिथिलांचल की स्त्रियों की समस्याओं को दिखाया जा रहा है। दिल्ली में मैथिल लोकरंग (मैलोरंग) रेपर्टरी के निर्देशक प्रकाश कुमार झा कहते हैं, ‘भावनाएं जुड़ी होने के कारण स्त्रियों की स्थिति पर आधारित नाटक प्रधानता से बनते और पसंद किए जाते हैं। मैथिली रंगमंच को हिंदी नाटकों की अपेक्षा दर्शक भी अधिक मिलते हैं। दर्शकों को अपनी भाषा सुनकर नॉस्टेल्जिया का अनुभव होता है। इन नाटकों का उद्देश्य स्त्री विषमताओं को दिखाना होता है। दूसरी ओर हिंदी नाटकों के विषय भारी-भरकम होते हैं। दर्शकों को देखने और समझने के लिए अपना दिमाग लगाना पड़ता है। मैथिली के नाटकों में हिंदी नाटकों की तरह मॉडर्न टेक्नोलॉजी का प्रयोग होता है। लाइट और अत्याधुनिक साउंड की मदद से नाटकों में चार चांद लग जाता है। बिहार की कई जगहों, जैसे कि बेगूसराय, मुंगेर, भागलपुर आदि जगहों पर मैथिल नाटकों की परंपरा नहीं थी, लेकिन स्थानीय लोगों को जोड़ने का एक मजेदार तरीका ईजाद किया गया। नाटक मंचित होने के पहले उनके बीच इस बात की पब्लिसिटी की जाती है कि दिल्ली से आए हुए लोग मैथिली में नाटक खेल रहे हैं। इसका दूरगामी प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है। डोगरी में नए-नए प्रयोग ‘समाज के साथ-साथ रंगमंच में भी बहुत बदलाव आए हैं और नाटकों में स्त्रियों की भूमिकाओं में भी। पहले नायिकाएं सिर्फ सहायक रोल में हुआ करती थीं, लेकिन अब महिला केंद्रित नाटक अधिक पसंद किए जाते हैं।’ कहती हैं डोगरी और पंजाबी नाटकों में अपने बेमिसाल अभिनय के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री संतोष सांगड़ा। उन्होंने उस दौर में अभिनय शुरू किया, जब जम्मू की लड़कियां सिर ढककर मुबारक मंडी से निकला करती थीं। अपने समय से विद्रोह करते हुए उन्होंने रंगमंच पर कदम रखा। यह कदम इतना मजबूत और प्रभावशाली साबित हुआ कि बरसों बाद आज भी रंगमंच में उनकी तूती बोलती है। यह उनकी अदाकारी ही है कि स्थानीय लेखक-निर्देशक उन नाटकों का चयन करते हैं, जिनमें संतोष सांगड़ा से अभिनय करवाया जा सके। उनके लिए विशेष तौर पर भूमिकाएं लिखीं जाती हैं। संतोष कहती हैं, ‘खासतौर से डोगरी में उन नाटकों पर काम हो रहा है जिनमें हमारी संस्कृति और सामाजिक समस्याओं की झलक मिले।’ संतोष की तरह गुरमीत कौर के मंझे हुए निर्देशन और नि:शब्द कर देने वाले अभिनय जम्मू के दर्शकों को अपना मुरीद बना लेते हैं। उनके द्वारा निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘कोमल गंधार’ को नाट्य महोत्सव में बेस्ट डायरेक्शन और बेस्ट एक्टिंग का अवार्ड मिला है। गुरमीत कहती हैं, ‘नाटक के चयन में मेरी कोशिश होती है कि कुछ ‘टफ’ हो, जिस पर प्रयोग किए जा सकें और जिसे करने में मजा आए।’ उन्होंने ज्यादातर स्त्री केंद्रित हिंदी नाटकों में काम किया है, लेकिन इन दिनों वह अंग्रेजी नाटकों में भी खासी रुचि ले रही हैं। बदले हुए माहौल पर वह कटाक्ष करती हैं, ‘अब लड़कियां ज्यादा समझदार हो गई हैं। वे थिएटर में कम और सीरियल में ज्यादा समय देना चाहती हैं। समूह में आते ही उनका पहला सवाल होता है, इससे फायदा क्या होगा।’ ग्लैमर से जुड़े अवधी नाटक अचला बोस वर्षों से नाटकों में सक्रिय हैं। वह बहुत सारे नाटक, सीरियल भी कर चुकी हैं। वैसे तो अवधी में हर विषय पर नाटक बन रहे हैं, लेकिन महिला प्रधान नाटकों में काम करना उन्हें अधिक पसंद है। अवधी नाटकों में स्त्री भूमिकाओं में भी बदलाव आ चुका है। अब उन्हें ग्लैमराइज किया जा रहा है, ताकि ज्यादा संख्या में दर्शक जुड़ें। अचला मानती हैं कि अवधी भाषा की अपनी सीमाएं हैं, पर हिंदी, उर्दू और अन्य भाषाओं में नहीं हैं। इसीलिए दूसरी भाषाओं में अवधी की अपेक्षा काम ज्यादा है। अचला को अभिनय के अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग का भी शौक है और उन्होंने द्रोण पुत्र अश्वत्थामा, देवदास, कसौटी और अहसास नामक चार नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से ‘कसौटी’ अवधी में लिखा है। प्लेटफार्म बने पंजाबी नाटक 1966 में ‘मस्या दी रात’ पंजाबी नाटक मंचित हुआ था, जिसमें अभिनेत्री निर्मल ऋषि ने पहली बार अभिनय किया था। तब से लेकर आज तक वह 50 से अधिक नाटकों और फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं। इसके लिए राष्ट्रपति ने उन्हें संगीत नाटक एकेडमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। उनके द्वारा अभिनीत ‘हिंद की चादर’, ‘सरहिंद की दीवार’ जैसे नाटकों का मंचन लगातार महीनों तक किया गया। गुर्जर समुदाय पर आधारित ‘सावी’ को विधानसभा में भी मंचित किया गया। निर्मल कहती हैं, ‘आत्मिक शांति के लिए मैं थिएटर करती हूं। रंगमंच को आधी सदी से मैंने करीब से देखा है। लड़कियां इसे एक ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करती हैं। थिएटर में काम करने से अभिनय में संजीदगी आती है। जब उन्हें बढ़िया अवसर मिलता है तो वे फिल्मों या सीरियल की तरफ रुख कर लेती हैं, क्योंकि थियेटर में पैसा न के बराबर मिलता है।

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