Powered By Blogger

Monday, February 19, 2024

नाटकों में नारी अस्मिता

नाटक और नारी अस्मिता नाटक साहित्य की अन्य विधाओं से भिन्न विधा है। नाटक की सार्थकता सामूहिक लेखन से नहीं बल्कि रंगमंच पर सफलतापूर्वक प्रस्तुत होकर अपनी कलात्मकता को साबित करने में है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले महिला रचनाकारों की उपस्थिति बहुत कम मिलती थी और जो मिलती थी वह भी पुरुष नाटककार द्वारा उनको अपनी रचना में स्थान देते थे। इस तरह नाट्य साहित्य और नाट्य रचना दोनों में महिलाएं हाशिए पर रही हैं। हिंदी नाटक के क्षेत्र में स्त्री की भूमिका को लेकर प्रसिद्ध महिला रंगकर्मी मोना झा का कहना है कि रंगमंच पर एक तो स्त्रियों को लेकर नाटक लिखे ही नहीं जा रहे हैं दूसरा जैसे और जगह पर स्त्री विमर्श हो रहा है वैसा विमर्श रंग जगत में हो इसके लिए रंगमंच अभी तैयार ही नहीं है । असम बंगाल उड़ीसा कर्नाटक केरल आदि क्षेत्रों की अपेक्षा हिंदी क्षेत्र के रंग मंच में स्त्रियों की उपस्थिति और जुड़ाव बहुत कम है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहले समाज का सामंती नजरिया और दूसरा हमारे रोज के जीवन में नाटक का नहीं शामिल होना। महिला कलाकारों की रंगमंच के क्षेत्र में निराशाजनक स्थिति के बारे कहा जा सकता है कि यदि स्त्रियों में वैचारिक क्रांति आई है और वह पुरुष के समान ही कई क्षेत्रों में बेहतर योगदान कर रही हैं।फिर भी अभी समाज का स्वरूप ऐसा नहीं बन पाया है कि रंगमंच में पुरुष के बराबर स्त्रियों का आना हो सके। आज हम देख रहे हैं कि अभिनय रंगकर्मी और नाटक रचना के क्षेत्र में महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर अपना योगदान प्रस्तुत कर रही हैं। हिंदी साहित्य में नाटक का प्रारंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु के समय समाज में नारी की दशा दीन ही थी। ऐसे में भारतेंदु ने नील देवी नाटक के माध्यम से नारी स्वतंत्रता का चित्रण प्रस्तुत किया। नील देवी उन राजपूत नारियों की तरह नहीं है जो विपत्ति के समय हाथ पर हाथ रखकर अक्रमण्य बनी रहे और पुरुषों के पराजित होने पर खुद को जौहर ज्वाला में भस्म कर लें। नील देवी अपने पति सूर्य देव के बलिदान का बदला लेकर जाति की स्वतंत्रता और अबालाओं के धर्म को बचाती है। इस तरह भारतेंदु ने नील देवी नाटक में नील देवी के माध्यम से धर्म नीति और राजनीति के संबंध पर बल देते हुए स्त्री की परंपरागत छवि को बदलने का प्रयास किया है। नवजागरणवादी विद्वानों ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय विभिन्न धार्मिक व सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के साथ नारी स्वतंत्रता के प्रश्न को भी उठाया। इस संदर्भ में जय देव तनेजा कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के मध्य भारत में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों ने महिलाओं को सक्षम बनाया है जिससे वे राष्ट्र और समाज निर्माण में अधिक सक्रिय और सार्थक भूमिका निभा सके। इससे साहित्य और नाटक में महिलाओं के चित्रण में कुछ बुनियादी बदलाव के लिए नेतृत्व किया। लेकिन इनका सामाजिक सुधार आंदोलन बाल विवाह विधवा विवाह व सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों तक ही सीमित था। इसी समय ध्रुवस्वामिनी नाटक के माध्यम से जयशंकर प्रसाद ने स्त्री की स्वाधीनता शोषण से मुक्त नारी अस्मिता एवं पहचान से जुड़े प्रश्नों को उठाया। इस नाटक में स्त्री की खोई हुई अस्मिता और गरिमा को पूर्ण प्रतिष्ठित करने का प्रयास करते हैं। प्रोफेसर रमेश गौतम लिखते हैं कि समाज के स्वस्थ विकास की कामना के साथ नारी अस्मिता को नई पहचान दी।नारी स्वतंत्रता से जुड़े जटिल एवं ज्वलंत प्रश्नों को प्रसाद जी ने समसामयिक संदर्भों के अनुरूप ध्रुवस्वामिनी नाटक में रुपायित किया है। ध्रुवस्वामिनी नाटक पुरुष के शोषण चक्र से नारी स्वतंत्रता के उद्घोष में आधुनिक चेतना का पर्याय है। यही आधुनिक चेतना ध्रुवस्वामिनी के इन विद्रोही शब्दों में सामने आती है। वह कहती है- मैं केवल यही कहना चाहती हूंँ कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु संपत्ति समझ कर उन पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है। वह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते हो। इस तरह पहली बार इस नाटक में ध्रुव स्वामिनी ने अपने अस्तित्व अस्मिता के प्रति सच्चाई दिखाई देती है। सदियों से पुरुष प्रधान समाज में कैद भारतीय नारी की मुक्ति का स्वर ध्रुवस्वामिनी के आक्रोश में नारी की स्वतंत्रता अस्मिता के रूप में व्यक्त होती है। वह अपने पति राम गुप्त द्वारा ठुकरा कर उपहार स्वरूप शकराज को दिए जाने पर विद्रोही रूप में रहती है ।ध्रुवस्वामिनी खड़ी होकर रोष से निर्लज्ज मद्यप क्लीव। मेरा कोई रक्षक नहीं। ठहर कर। नहीं, मैं अपनी रक्षा स्वयं करूंगी। मैं उपहार देने की वस्तु नहीं हूंँ। इस तरह ध्रुवस्वामिनी के ये शब्द नारी मुक्ति व उसके अस्तित्व की स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा करते हैं। ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद का अंतिम नाटक है। इसमें उनके अन्य नाटकों जैसी कविता की भावुकता और संवादों में वैसी दुरूहता नहीं है। अपने जीवंत संवादों और सुगठित कथावस्तु के कारण यह नाटक अत्यंत प्रभावशाली और मनोपयोगीहो गया है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी शक्ति प्रसाद जी के उस क्रांतिकारी दृष्टिकोण में निहित है जो इस नाटक के माध्यम से व्यक्त हुआ है और वह यह है कि नारी पुरुष की क्रीत दासी नहीं है। पुरुष यदि क्लीव (नपुंसक), कायर और व्यभिचारी है तो नारी न केवल उसके विरुद्ध विद्रोह ही कर सकती है, उसका परित्याग करके अपने प्रिय पुरुष का वरण कर उससे पुनर्विवाह भी कर सकती है। यह बात भारतीय समाज के लिए, खासतौर से उस समय जब यह नाटक लिखा गया था, कल्पना से भी परे थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में साहित्यकारों ने विभिन्न समस्याओं के साथ नारी स्वतंत्रता अस्मिता और विकास को ठोस धरातल प्रदान किया। लेकिन यह युग नारी की अस्मिता संबंधी विचारधारा या प्रश्न को उठाने का काल नहीं था। फिर भी हिंदी नाट्य साहित्य में नारी अस्मिता की दृष्टि से एक शुरुआत कही जा सकती है। स्वतंत्र उत्तर युग में आर्थिक बदलाव सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण बना। शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने नारी को एक नवीन चेतना दी। उसमें अपनी अस्मिता व अस्तित्व के प्रति जागृति आई। वह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में गौरव का अनुभव करने लगी। अब पुरुष उसके लिए देवता नहीं रहा और पति परमेश्वर ना होकर लाइफ पार्टनर बन गया जिसमें पति-पत्नी दोनों की सहभागिता दिखाई पड़ती है। आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की ओर नारी के बढ़ते कदम पुरुष को स्वीकार्य नहीं हुए फलस्वरुप दांपत्य जीवन में टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। नाटक कारों ने स्त्री पुरुष के बदलते संबंधों को अपने नाटकों का विषय बनाया। बदलती सामाजिक आर्थिक स्थितियों में नारी के चयन के अधिकार के प्रश्न को दुलारी बाई नाटक में उठाया गया है जो मणि मधुकर का नाटक है और पुराने संस्कारों अंधविश्वासों एवं रूढ़ियों पर करारी चोट करता है। साथ ही, नाटक नारी के विवाह दांपत्य जीवन को लेकर रोड मान्यताओं का भंडाफोड़ करता है जिसमें नारी को केवल सत्य ही और दिखावे की स्वतंत्रता दी गई है। महिला नाटक कारों में अग्रणी मृदुला गर्ग का नाटक एक और अजनबी बदलते सामाजिक आर्थिक संदर्भ में नारी की अस्मिता के प्रश्न को एक नया आयाम देता है।नाटक में स्त्री पात्र शनि एक तरफ प्रेमी द्वारा उपेक्षित है तो दूसरी तरफ अपनी पदोन्नति के लिए पति द्वारा उसकी कंपनी के मैनेजर के सामने दांव पर लगा दिया जाता है। पुरुष समाज के लिए स्त्री अपनी महत्वाकांक्षाओं व शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति का साधन रही है। इस नाटक में दो पुरुषों के बीच विभाजित एक स्त्री की त्रासदी को व्यक्त किया है जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मृदुला गर्ग का यह नाटक पति-पत्नी के संबंधों के माध्यम से पुरुष सत्ता के सवालों के कटघरे में खड़ा करता है। मोहन राकेश का प्रयोग धर्मी नाटक आधे अधूरे मध्यवर्गीय स्त्री पुरुष संबंधों की विडंबना विषमता और त्रासदी का विवेचन करता है। शारीरिक मानसिक और भावनात्मक प्रताड़ना को सहती सावित्री है। यहां सब लोग समझते क्या है मुझे एक मशीन ,जो कि सबके लिए पिसकर रात को दिन और दिन को रात करती रहती है। इस तरह एक स्त्री सावित्री आर्थिक दबाव के चलते पारिवारिक संबंधों के बीच अपने अस्तित्व व अस्मिता को खोजती नजर आती है। सुरेंद्र वर्मा का नाटक सूर्य की अंतिम किरण से पहली किरण तक नपुंसक पति ओक्काक और उसकी पत्नी शीलवती की कहानी को अत्यंत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। राज्य के उत्तराधिकारी के लिए शीलवती को नई प्रथा के तहत एक रात के लिए प्रदोष के पास भेजा जाता है। शीलवती को प्रदोष के साथ रात बिताने के बाद पहली बार स्त्री पुरुष संबंधों की पहचान होती है और वह नपुंसक पति औक्काक को अस्वीकार कर देती है। साहित्य जगत में प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी के बाद सुरेंद्र वर्मा की शीलवती ही ऐसी स्त्री पात्र है जो पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध अस्वीकार का साहस करती है। नारी का पहला रोल सृष्टि है वही सृष्टि का माध्यम है। नारी ही सारे दर्द महसूस करते हुए सृष्टि को आगे बढ़ाती है। पहले रंगमंच पर स्त्री का काम करना कठिन होता था। उसके सारे किरदार पुरुष निभाते थे। यह बात वरिष्ठ रंग कर्मी नागिन तनवीर ने कही। बिटिया उत्सव में स्त्री और रंग कर्मी विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर वरिष्ठ रंगकर्मी और गायक नगीन तनवीर ने कहा कि प्रभात पटनायक स्त्री खरीदार किरदार की अच्छी अदाकारी करते थे। पहले रंगमंच पर पुरुष स्त्री का रोल करते थे ।सब कहते हैं कि हमारी देवियां ही नारी शक्ति का प्रतीक है लेकिन अमल कोई नहीं करता है। पहले फिल्मों में नारी शक्ति को हाईलाइट करके दिखाया जाता था। नारी शक्ति और रंगमंच का मतलब नारी को और शक्तिशाली बनाना लेकिन उसमें कलात्मकता और संवेदना भी होनी चाहिए। रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि स्त्री एक प्रेरणा होती है ।आज औरत जिस प्रकार आधुनिकता में जी रही है उसके अंदर का औरतपन गायब हो रहा है। रंगमंच के क्षेत्र में बहुत शिष्यों ने मराठी रंगकर्मी में बाल गंधर्व से साड़ी बांधना मेकअप करना और भी बहुत कुछ सीखा।प्राचीन समय से ही स्त्रियों से भेदभाव होता रहा है लेकिन समय बदलता रहा और कई फिल्मों में भी अभिनेत्री ने अपने अभिनय से सबके दिलों में जगह बना ली। स्त्री मंच पर अपनी पीड़ा व्यक्त करती है। भारत में अभी भी महिला नाटककार बहुत कम है। ज्यादातर स्त्रियों पर नाटक पुरुषों ने ही लिखे हैं ।बेगम अख्तर की बायोग्राफी के एक चैप्टर से मेरी जिंदगी बदल गई जिसमें उन्होंने लिखा कि एकांत का उत्सव मनाओ। प्राचीन काल से ही भारतीय वंश पर महिला कलाकार रही होगी। हो सकता है महिला नाटक कर रही हूं लेकिन इन महिला अभिनेताओं को मंच पर विशेष रूप से महिला आवाज नहीं मिली ।वह कभी भी प्रदर्शनों की सूची पर हावी नहीं हुई और उनके योगदान को बड़े पैमाने पर इतिहास से बाहर लिखा गया है। कई लेखों और पुस्तकों ने महिलाओं द्वारा तैयारी और उत्पादन में अनुभव किए गए व्यवस्थित इंट्रो का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण प्रदान किया है ।जिसमें तकनीक में उनकी भारत मौलिक होने के अवसर और अभिव्यक्ति की उनकी उपलब्धि को प्रभावित किया है ।चार शताब्दी में भारतीय पश्चिमी कला जगत में लिंग के संचालन के विश्लेषण के माध्यम से नारीवादी प्रथाओं ने स्थापित किया है कि व्यक्तिगत कलाकार की सामाजिक सफलताओं के परवाह किए बिना कला भेदभावपूर्ण संस्कृत प्रथाओं को दर्ज करती है। उदाहरण के लिए लिंडा नच लेन ने अपने उत्तेजक निबंध क्यों कोई महान महिला कलाकार नहीं बनी। 1971 में सुझाव दिया कि आदर्शवाद को छोड़कर कला लिंग आधारित है। पूर्ण भारतीय नारीवादी रंगमंच का उदय हालांकि नहीं है।भारतीय महिलाओं के लिए नगर पालिका वोट 1855 में प्राप्त कर लिया गया था लेकिन शिक्षा की कमी आत्मविश्वास के अवसर में कमी सामाजिक समस्याओं में रुचि की कमी के कारण उन्होंने इसका उचित उपयोग नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम ने महिलाओं के लिए चूल्हे और चिमनी की सीढ़िया से निकलकर राष्ट्र के जीवन में आने की कोशिश की। गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने भारत में नारीवादी आंदोलन को एक नई दिशा आयाम दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति में निहित अर्धांगिनी की अवधारणा की सराहना की और इस तथ्य को स्वीकार किया कि पुरुष और महिलाएं एक दूसरे के पूरक हैंऔर कभी भी एक दूसरे के पूरक नहीं होते हैं। दूसरे के बिना उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथ दृष्टिकोण को स्वीकार किया जिसमें अर्धनारीश्वर की अवधारणा में प्रकृति और पुरुष को एक पुरुष और महिला को एक माना गया था। उन्होंने महसूस किया और विश्वास किया कि पुरुष और महिलाएं भागीदार थे ।सामाजिक जीवन में समान कर्तव्य और राजनीतिक क्षेत्र में समान अधिकारों को साझा करते थे। प्रयोगात्मक रंगमंच के स्वरूप और महिला आंदोलन के एजेंट ने नाटकों की सामग्री और विस्तार को आकार दिया ।महिलाओं के रूप में महिलाओं की चेतना द्वारा चित्र उत्पादन और उत्पाद कथा को ध्यान में रखा गया। महिलाओं की स्थिति से नाट्यशास्त्र कलाअविभाज्य है ।प्रदर्शन लिखित और अभिनय जो मतभेदों को तोड़ता है और इस प्रकार पितृसत्तात्म शक्ति को कमजोर करता है। पटकथा और उत्पादन जो विषय स्थित महिला पात्रों की पहचान और निर्माण के लिए संरचनात्मक और वैचारिक प्रतिस्थापन के रूप में परिवर्तन प्रस्तुत करता है। शुरुआत में नारीवादी रंगमंच भारत के शहरों में मुख्य रूप से गैर व्यावसायिक स्थान पर फला फूला। सफदर हाशमी के जन्नत मंच पीपल थिएटर फ्रंट 1973 में गठित ने एक एडिट प्राप्त कर्नाटक औरत महिला 1979 का प्रदर्शन किया जिसमें दुल्हन को जलाने दहेज़ और पत्नी को पीटने जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की ,यह रोमांचक था क्योंकि इसने महिलाओं के इतने विविध प्रतिनिधित्व और स्पष्टीकरण के साथ जनता के सामने आने का साहस किया। इसने थिएटर के लिए एक नया दर्शक वर्ग तैयार किया। 19वीं शताब्दी के दौरान कई महिलाओं ने कथा और कविता की शैली में महत्वपूर्ण स्थान बनाया ।मंच उनके लिए काफी हद तक बंद रहा।महिला निर्देशक जो पहले दुर्लभ थी सामने आई। लक्ष्मी चंद्र आहूजा सीता चंद्र उषा गांगुली नीलम मानसिंह चौधरी रानी बलवीर कौर शीला भाटिया बी जयश्री अरुंधति राज एस मल्टी सौम्या वर्मा गौरी दत्त नादिरा बब्बर जय शैलजा अनुराधा जैसे नाम कपूर अमल अलाना तुरंत दिमाग में आते हैं। महिला केंद्रित मुद्दों के नाटक की पहलू को एक बड़ा बढ़ावा 1943 से सक्रिय आईपीटीए इंडियन पीपल्स थिएटर मोमेंट का विकास था ।राष्ट्रीय महिला रंगमंच महोत्सव और एशिया में बहुत सारे महिला थिएटर उत्सव आदि आयोजित किए जाते हैं । भारती मां और मंच पर बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा लिखे गए नाटकों और विशेष रूप से 70 और 80 के दशक के दौरान समाज में एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नारीवाद के उपहार के बीच एक संबंध है ।कोयल सेन गुप्ता अंग्रेजी वर्षा आडलजा गुजराती मंजुला पदमनाभन अंग्रेजी त्रिपुरारी शर्मा अंग्रेजी और हिंदी डॉक्टर कुसुम कुमार हिंदी गीतांजलि श्री हिंदी रुपिंदर भाटिया हिंदी नेहा मानसिंह चौधरी पंजाबी विनोदिनी तेलुगू बिजयश्री कन्नड सनौली मित्र बंगाली उषा गांगुली हिंदी शांता गांधी गुजराती सुलभा देशपांडे मराठी वीणा पानी चावला मराठी कुदसिया जल्दी उर्दू आदि बहुत-से नाम है। संख्याओं के मामले में किसी भी किताब में एक प्रभावशाली रोल कॉल थिएटर इंडिया सीरियल थिएटर क्वार्टरली रंग प्रसंग भारत रंग नटरंग जैसी प्रमुख पत्रिकाएं अब नारीवादी थिएटर आलोचना इतिहास और सिद्धांत प्रकाशित करती हैं टुनटुन मुखर्जी ने महिला नाटक कारों का एक संकलन संपादित किया है जिसका शीर्षक है स्टेजिंग फेमिनिज्म प्लीज बाय वूमेन इन ट्रांसलेशन ऑक्सफोर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

No comments:

Post a Comment