Monday, June 19, 2023
अधूरी कहानी - रागिनी शर्मा उदयपुर को पढ़ते हुए
अधूरी कहानी - - प्रस्तावना
अधूरी कहानी रागिनी प्रसाद का लघुकथा संग्रह है जिसमें कभी समाप्त न होनेवाली जीवन की सच्ची कहानियाँ हैं। पेशे से वकील होने के साथ ही वे पहले एक स्त्री हैं। कचहरी में रोजमर्रा आने वाले केस दर्ज होते रहते हैं। हर केस अपनी कहानियों को सच करना चाहती हैं परन्तु क्या यह हो पाता है? कभी होता भी है तो कई बार सच साबित करने के लिए हजारों सबूत और तारीखों का सामना करना पड़ता है। ऐसा भी होता है कि कहानी को सच का जामा पहनाते पहनाते जीवन भी समाप्त हो जाता है। कुछ भी कहिए कहानियाँ कब पूरी हुई हैं? वे तो साहित्य के माध्यम से बस अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती हैं।
रागिनी प्रसाद की लघुकथा 'अधूरी कहानी 'एक ही श्वास में पढ़ने वाली कहानियाँ हैं। वर्तमान समय लघुकथाओं का है। यह मैक्रो से माइक्रो तक जाने की यात्रा है, जैसे "सारांश का सारांश"। फिर भी यह कहानी का सार या संक्षेप नहीं है। इस लघुता में भी कहानी के तत्वों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है।
यह हिंदी साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है। आज भागदौड़ की जिंदगी में इंसान के पास समय कम है, वह कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक को सोचना, समझना और जानना चाहता है इसलिए आधुनिक युग में लघुकथा का विकास कथा या स्टोरी से ही हुआ है।जीवन के एक छोटे- से हिस्से का अनुभव लघुकथा हो सकता है।
लेखिका ने अपने अनुभवों के साथ पाठकों को बहुत ही सहजता से जोड़ा हैऔर कम शब्दों में अपनी बात रखी है। अधूरी कहानी में आह से वाह तो है ही, साथ में आधुनिकतम जीवन के तमाम संत्रास भी हैं। रिश्ते - नाते , सोच , ढोंग, बनावटीपन, भ्रष्टाचार के नए रूप, अत्याचार, स्त्री की अस्मिता, पुरुषों का वर्चस्व आदि जीवन में रोज घटने वाली घटनाओं को लघु रूप में लिखना बहुत ही कठिन होता है। विस्तार में लिखना सहज होता है लेकिन लघु और सारगर्भित कथा लिखना सहज नहीं होता। वह दृष्टि होनी आवश्यक है जिसमें एक पूर्ण कथा के गुण हों।
रागिनी एक संवेदनशील लेखिका हैं। अपने पेशे की व्यस्ततम स्थितियों में भी उनकी पैनी दृष्टि समाज के विभिन्न तबकों में होने वाली घटनाओं को अपनी लेखनी से उतारने में देर नहीं करती ।
नया आयाम, क्वेरेंटाइन, चार या चालीस, तलाक, स्टाम्प, अनाज का कट्टा , अजीब प्रेम प्रसंग, होम लोन, सुकून जैसी लघु कथाएँ सोचने के लिए विवश कर देती हैं कि अभी भी हमारा देश कितने पिछड़ेपन में जी रहा है। ये लघु कथाएँ समाज का वह आईना है जिसमें हर चित्र स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। होम लोन आजकल बहुत ही सहजता से उपलब्ध है लेकिन उसे चुकाने में घर के वृद्ध पिता की जिंदगी घिस जाती है।होम लोन लघु कथा की ये पंक्तियाँ --'अरे तुम्हारे चेहरे पर क्या हुआ? सहसा उसकी नजर पति के चेहरे पर उठ रही गांठ पर पड़ी। ***बेटे का होम लोन उतर जाने दो। फिर नौकरी छोड़ दूंँगा। जाते जाते पति फुसफुसाया । ***हर महीने बिखर जाता था होमलोन की डेट से दो तीन दिन पहले। ' बासठ साल की उम्र का पिता बेटे के लिए गए लोन को चुकाने के लिए नौकरी पर जा रहे हैं। बहू - बेटे का रवैया बहुत ही सामान्य है। उन्हें लगता है कि यह होम लोन चुकाना उनकी ही जिम्मेदारी और कर्तव्य है। सास- ससुर बेटे और बहू के अधीन हैं और वे बाध्य होकर अपना कार्य कर रहे हैं। वे खुल कर अपनी बात तक नहीं कर सकते। वर्तमान समय में मध्य वर्गीय परिवार की सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों को बहुत ही सहजता और सरलता से इस कहानी में चित्रित किया गया है।
पति-पत्नी के रिश्तों की मिठास और कड़वाहट कैसे अपने सम्बंधों को रेखांकित करती है, इस कहानी में बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से व्यक्त हुआ है। इसी तरह कोरोना महामारी के दौरान मनुष्यता की धज्जियाँ उड़ती दिखाई पड़ती है। क्वेरेंटाइन की पंक्तियाँ - - 'कहाँ जा रहे हो? वो पिताजी का देहावसान हो गया है। अस्थियांँ लेने जा रहा हूँ। तेरा नाम क्या है - उसने कड़क आवाज में पूछा। मैं योगेश हूँ सर। मैंने मुंडन करा लिया है। और सफेद धोती-कुर्ता पहना हूँ। आप पहचान नहीं पा रहे हैं। न्यूज पत्रकार हूँ। 'बड़ा अधिकारी ने भी नहीं पहचाना। पिता की अस्थियांँ भी कोई अर्थ नहीं रखतीं। जन्म से मृत्यु तक रुपये की ही पूछ है।
गागर में सागर की तरह अधूरी कहानी की सभी कथाएँ हैं जो वर्तमान युग की सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों की कड़वी सच्चाई को सामने रखती हैं। यह भी सच्चाई है कि एक लघुकथा में अन्य साहित्यिक विधाओं (जैसे, उदाहरण के लिए, उपन्यास) की तुलना में पर्यावरण के विवरणों को विकसित करने के लिए समान स्थान नहीं है। पात्रों को गहराई से पेश करने के लिए कोई जगह नहीं है और उनकी प्रेरणाओं को प्रतिबिंबित करने का समय नहीं है। उसकी मुख्य विशेषताएँ हैं- संकेतात्मकता, वेधकता और अतिकल्पना. लघुकथा का कथानक अत्यंत सूक्ष्म होता है. चूंकि ऐतिहासिक-सामाजिक अंतर्वस्तु कथानक की रीढ़ होती है, इसलिए लघुकथा में इसका प्रवेश सूक्ष्मतम विधानों में ही होता है. उसका आदि, मध्य या फिर अंत अच्छा होता है। शब्दों के प्रयोग में काफी सक्रिय एवं सतर्क प्रतीत होती हैं। यही कारण है कि इन लघुकथाओं में इस दृष्टि से कोई फालतूपन नहीं आ पाया है।
उपयुक्त शिल्प के अनुसार भाषा का सटीक प्रयोग हुआ है। शब्द प्रबंध ऐसा है कि पाठक पढ़ते हुए भाषा के प्रवाह में बहने लगता है और रचना पाठक से सीधा सरोकार स्थापित करके उसके हृदय में स्थान बनाने में सक्षम हो जाती है
रागिनी की लघुकथाएँ अत्यंत लघुकथाएँ हैं जिसमें उपयुक्त विषय वस्तु की कोई सीमा नहीं है। वह काल्पनिक कहानियों से लेकर विचारोत्तेजक या असामान्य प्रकृति के ग्रंथों तक होती है। संग्रह की सूक्ष्म कहानियाँ अलौकिक मुद्दों या एक प्रभावशाली वास्तविकता के विवरण को रेखांकित करती हैं।
रागिनी की लघुकथाओं में किसी एक विषय को संबोधित किया गया है। वैसे उपयुक्त विषय वस्तु की कोई सीमा नहीं होती है और जो काल्पनिक कहानियों से लेकर विचारोत्तेजक या असामान्य प्रकृति के ग्रंथों तक जाती है।
'अधूरी कहानी' के पात्र हमारे आस-पास के ही हैं। उनसे हम रोज मिलते हैं, बात करते हैं और उनकी समस्याओं से रूबरू होते हैं। हम अपनी घटनाओं को उनके साथ साझा करते हैं। रागिनी प्रसाद की लघुकथा हमें रास्ता सुझाती है और समसामयिक विषयों के प्रति जागरूक करती है।
मुझ पर रागिनी दी का स्नेह बना रहे। जीवन की गुणवत्ता को सीखने के लिए स्त्री की अस्मिता और उसके अनुभवों से साहित्य सदैव लाभान्वित होता रहा है। आशा है पाठकों को 'अधूरी कहानी 'की मौलिकता और संक्षिप्तता से युक्त सभी कथाएँ अपने अनुभवों से बात करती लगेंगी।
बधाई और शुभकामनाएँ।
डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
बुद्ध पूर्णिमा
Friday, June 9, 2023
प्रेम शर्मा दी की पुस्तक पर चर्चा
कविता सृजन से मुझे ऊर्जा मिलती है: प्रो प्रेम शर्मा को पढ़ते हुए - -डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, हिंदी विभाग, कोलकाता
"एक दीप जलाकर तो देखो" प्रो प्रेम शर्मा का सद्य प्रकाशित कविता संग्रह है।भाषा नहीं, भाव ही कविता को संप्रेषित करते हैं। 50 से अधिक कविताओं में से किसी भी कविता को पढ़ते हुए पाठक समाज कल्याण की ही भावना को महसूस करता है। एक आदर्श समाज कैसे निर्मित हो? कैसे देश का गौरव बढ़ाया जा सकता है? कैसे बच्चों में अच्छे चरित्र का निर्माण किया जा सकता है? आधुनिक अपसंस्कृति की आंधी से दूर भारतीय संस्कृति को कैसे रोपित किया जाए? आदि द्वन्द्वों से गुजरती हुई कवयित्री प्रेम शर्मा विविध भावों को शब्दों में उतारती है। अपने आशावादी विचारों से अनुप्रेरित कवयित्री ने अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति में एक आदर्श परिवार समाज और देश की कल्पना की है।
कवयित्री जानती है -
'आँखों से अश्क जो बहा सकते नहीं
पीकर गम जो घटा सकते नहीं
खुद को उतार देते हैं, कागज पर वो
बस फिर कुछ और वो करते नहीं'
कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है। कविताओं में भाव तत्व की प्रधानता है। रस को कविता की आत्मा माना जाता है जो कविता के अवयवों में आज भी सबसे अहम है।कवयित्री शब्दों के द्वारा अपनी अनकही बातों को आकार देती है।
इन कविताओं में एक लय है, भावों की लय, जो पाठक को बांँधे रखती हैं।एक और अंडर करेंट भी है जो देश, समाज और सत्ता में बैठे लोगों के लिए एक चेतावनी भी है। आधुनिकता की आँधी और तृष्णा की चाह में जो मनुष्य अपनी लालसाओं को पूरा करने में लगा हुआ है, इंसान से जानवर बन चुका है। ऐसे लोगों के पापों के सर्वनाश के लिए काल के अवतार का अवतरण होना निश्चित है। वह प्रकृति के इस नियम को जानती है कि काल के आगे बड़े -बड़े लोग धराशायी हुए हैं।
हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है। एक अनाम-सी व्यग्रता संपूर्ण व्यक्तित्व पर छा जाती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना आत्मा को झिंझोड़ती रहती है। ऐसी परिस्थिति में कितने ही लंबे समय का अंतराल हो, रचनाशीलता अवसर मिलते ही हृदय में एकत्रित समस्त भावनाओं , विचारों और संवेदनाओं को अपनी संपूर्णता से अभिव्यक्त होती हैं। सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर मिलना होता है, तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जिस अभिव्यक्ति का जन्म होता है, वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है। यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मी अभिव्यक्ति का संग्रह है।
Monday, June 5, 2023
मैं छोटा सा दीप कविता
मैं छोटा सा दीप हूँ
मिल जाऊंगा फिर मिट्टी में।
पर उजाला करके
अंधेरों को खाक करके
इश्क की चाहत में
मैने तुमको चाहा था
नफरत की आंँधी को
स्नेह से जलाया था
मैं छोटा सा दीप हूँ
पानी की बूंँद सा
समंदर की थाह सा
मैं मिट्टी का छोटा सा दीप हूँ
आंँधी ने मुझको छुआ था कभी
घबरा कर मेरी लौ बुझने लगी
हिम्मत न हारी जलता रहा
हिलता रहा ललकारता रहा
हवाओं से मैं लड़ता रहा
अपना बचाव करता रहा
मैं मिट्टी का छोटा-सा दीप हूँ
मेरा तन मन भरा हुआ था
बाती मुझको छू रही थी
एक दूजे में थे लिपटे
मालूम नहीं था कब तक जीते
पर जब तक हम हैं साथ तेरे
साथ जिएंँगे साथ मरेंगे
छोटा हूँ पर बड़ों - बडों को देता हूँ मैं सीख
विश्वास करो अपने ऊपर
काम बड़े बस करते जाओ
फूलों की खुशबू से
जग सुरभित हो जाता है
फूल सभी मिट्टी बन जाते
मैं मिट्टी से बनता हूँ
अग्नि मेरी हमजोली-सी
काली रातों की सहेली-सी
साथ निभाती वह भी तब तक
जब तक रहता जीवन उसमें
भारत की संस्कृति के प्रहरी हैं
नहीं कोई बदले की चाहत
बस देते ही जाना है
भले ही हो थोड़ा ही प्रकाश
धरती का ही वंशज हूँ
धन्य हमारी जाति है
हम अभिमानी और दानी
नहीं कोई हमारा है सानी
पांचों तत्व ही मुझमें रचते - बसते हैं
' वसुधैव कुटुम्बकम' की इस धरती का कण - कण भरा हुआ है मुझमें
छोटा- सा हूँ पर, जीने का उद्देश्य बड़ा है
मानव, दानव, पशु - पक्षी सब मिट्टी से ही बनते हैं
और उसमें ही मिट जाते हैं
समझाते जीवन दर्शन को
मिट्टी से बनते हैं और फिर मिट्टी में मिल जाते
ज्योत से ज्योत जलाता हूँ
छोटा - सा दीप हूँ, हांँ छोटा- सा दीप हूँ
पर अंधकार के बादल को भी चीर कर रख देती है
मेरी दुर्बल और चमकती लौ
दिखा देती है मेरे अस्तित्व का आईना
बिना डरे बिना झुके
राह दिखाता स्वाभिमान से
मैं छोटा - सा नन्हा दीप
आशा और उम्मीद की लौ किरणों को फैलाता
जीवन के संघर्षों से लड़ने की रीति सिखाता
आस्था और विश्वास की सीढ़ी पर चलते रहने की
ऊर्जा को प्रतिपल प्रज्वलित रखता
मैं छोटा - सा दीप हूँ
झिलमिल झिलमिल कर
सबके मन को भाता हूँ
तीज-त्यौहार बिना मेरे लगते सभी अधूरे से
देवों का मंदिर भी करता प्यार मुझे जी भरकर के
स्नेह और भाव के अर्घ्य चढा़ता हरदम
जगमग जगमग करता जगमग जगमग करता
मैं छोटा सा दीप मैं नन्हा - सा दीप
@वसुंधरा मिश्र
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