Friday, June 29, 2018
उनका आना हो या न हो
उनका आना हो या न हो दिलों को जोड़ते चलो
कुछ तो बात है उनकी नजरों में जो वेअपने बने
लोग कहते हैं कि वे अपने उसूलों के पक्के है
तो क्या
कोई तो समझ ले उन्हें करीब से
रखें हैं जिसने जो पत्थर नींव के
उनके जज्बे को सलाम करते चलो
न जाने उन कांटो पर कितने ही लोग चले
लहूलुहान हो राह पर डटे रहे
ऐ मेरे दोस्त उनकी बेवफाई को भूलते चलो
Wednesday, June 27, 2018
आंधी फिल्म के गीत के बोल की तरह
तुम आ गए हो नूर आ गया है
नहीं तो जिंदगी व्यर्थ ही गुजर रही थी
सिखाया तुमने ही प्रेम दीपक जलाना
नहीं तो बस यूँ ही बीत रही थी जिंदगी
न जाने किस ओर से चले
जमाने से भी अनजान चले
कहाँ मैं और तुम भी बेखबर
धागे में पिरोये मोती न मिले
कबूल कर लिया ऊपर वाले ने जब से
यूं लगा फिर से जिंदगी मिल रही है
चलते चलते इसी राह से गुजरते हुए
किया था सपनों को साकार
मूंद कर पलकों में तुम दिखाई देती रही थी
तुम्हारा होना ही मेरे होने का अहसास बना
प्रेम की गंगा बहती लगी जिंदगी खुश ग्वार लगी
तुम आ गये तो सच में नूर गालों पर मचलने लगा
मौत को भूल चुका हूं
मैं मौत को भूल चुका हूं
मौत शब्द मेरी स्मृति में नहीं है
मेरे अपने रोते हैं
मुझे वह भी पता नहीं
वे मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं वह भी पता नहीं
मैं जी रहा हूँ और जीवंत हूँ
मुझे पता नहीं
मेरा खाना पच रहा है
मुझे पता नहीं
चलता फिरता लाश हूँ
पता नहीं
मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है
यह भी पता नहीं
मैं देख रहा हूँ
चल रहा हूँ
Tuesday, June 26, 2018
नदी का किनारा
नदी का वो किनारा भी खो गया था बस एक तू न मिला
नाव भी वहीं पर है, पतवार न दिखा। ख़ामोश हवाओं ने धीरे से कुछ कहा है पर सुना न गया
उस मौन ने सब कुछ समझाया, मगर उदासी को छू, हिल गया
कण-कण में तेरे होने का अहसास है
तू कहीं नहीं फिर भी मेरे पास है
तू यहीं कहीं है अनजानी मैं, जान न पाई पहचान न पाई
न कहीं कोई गिला ओ शिकवा है, न कोई अरमान है बाकी
सिर्फ रंजो ए गम में तस्वीर है तेरी
रूह से कोई कह दो, यकीं है, वो मेरे इर्दगिर्द ही है।
@वसुंधरा मिश्र
Wednesday, June 20, 2018
लहरों पर चलती जिंदगी
लहरों पर चलती जिंदगी लहरों में ही खो जाती
ये बलखाती इठलाती हैं कभी मुस्कान छोड़
फिर चिडाती
कभी देख कर अनदेखा करती है ये जिंदगी
कब कौन सी करवट लेगी ये जिंदगी फिर कब खिलखिलाकर पास बुलाएगी
एक बार जब बचपन आया था कितनी निश्छल थी जिंदगी
मां की वाणी में लोरी सुनाई पड़ती थी
पिता के कंधों पर पूरा भार दे मचलती थी जिंदगी
मां के हाथ का खाना अमृत लगता
न जाने कौन सा प्यार उसकी अंगुलियों में था
अच्छे बुरे का पता ही नहीं था
ना नुकूर न करती तब जिंदगी
कब बड़ी हुई जिंदगी वह लड़की बनी
ऐसा मत करो वैसा मत करो
लड़कियां गुड़ियों से खेलती हैं
सिलाई कढ़ाई बुनाई सीखना है
खाना बनाना और खिलाना सीखना है
पढा़ई में भी होशियार बनना है
मां भी डांटती पिता भी सख्ती बरतते
लगता कि यहीं से कोई जिंदगी नाम की शुरुआत हुई होगी
फिर तो और बड़ी हुई
कितनी कहानियाँ आईं
ऊर्जा से भरपूर यौवन की ड्योढ़ी पर कदम लड़खड़ाए फूंक फूंक कर चला रही थी जिंदगी
संभली और आगे बढ़ रही थी जीवन की डोर
खेल कूद से दूर मां बाप की लाडली
अब समाज और संस्कृति को बचाने वाली बनी पुरुषों की दुनिया में
समझदारी का पाठ पढ़ाने लगी थी जिंदगी
जिम्मेदारियों ने ढक लिया था अपनी मशरूमी छतरियों से
तट से दूर फेंकती जा रही थीं समुद्री लहरें
पिता
पिता
पिता के विषय में कभी सोचा ही नहीं
पिता दिवस होगा कभी सोचा ही नहीं
मां की तरह पिता याद नहीं आते
घर पिता से है माँ बाहर से आई है
यही समझती रही
वह पिता के घर का एक हिस्सा है ऎसा ही माना गया
पर मेरा होना ही पिता का होना है
वे मेरे पिता हैं मेरे अंदर हैं
मेरी आत्मा हैं
संरक्षक और पालन पोषण करने वाला
समाज में सम्मान दिलाने वाला
समाज में स्थान दिलाने वाला
वह पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला भी है
स्त्री को आधार देने वाला
सत्ता का अधिकारी है
मेरा पिता भी है
जब मैं उसकी पत्नी की गोद में आई
वह पितृत्व के भावों से भर गया
वात्सल्य से भर उठा
मां का एक अंग बना
मुझे गोद में लेकर चुप कराने लगा
प्यार से दुलराने लगा
झूले में झूलाने लगा
चलना सिखाया
घोड़ा बन सैर कराने लगा
मैं उसकी प्यारी बिटिया जो हूँ
मां ने परिचय कराया उस पिता से जिसकी मैं अंश हूँ
पिता परमेश्वर है
सृष्टि की रचना है
पिता की छाया में सीखा जीवन का अनुशासन
ऊंची नीची सभी राह पर चलने की कला सिखाई
पितृ कवच के घेरे में कहीं कोई दर्द नहीं होता है
आत्मविश्वास और आत्मसम्मान सिखाया
बड़े बड़े खतरों को चुटकी में हल करना सिखाया
पिता के गुणों को लेकर मैंने अपना एक मुकाम बनाया
कोई कहता नाक तुम्हारी पिता सी है
सच में नाक पिता सी है और
पिता की नाक भी मैं हूँ
हूँ न प्यारी बिटिया
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