Sunday, July 30, 2023
कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त पर समीक्षा
कृपाशंकर चौबे - एक शिनाख़्त पुस्तक पढ़ते हुए - सृजन पथ के अथक पथिक - - - डॉ वसुंधरा मिश्र
स्वाधीनता की लड़ाई में जिस पत्रकारिता का स्वरूप था आज उसमें बहुत बदलाव आया है। आजादी की पत्रकारिता एक महत उद्देश्य, सिद्धांत, मूल्यों और आदर्शों पर टिकी हुई थी। स्वाधीनता प्राप्त करना और देश प्रेम को सर्वोपरि स्थान देना उस समय के साहित्यकारों, कलाप्रेमियों, चित्रकारों, पत्रकारों के लिए एक राष्ट्रीय धर्म था।उन्होंने जो भी किया, देश को केंद्र में रखकर किया।जरूरी नहीं है कि हर युग की विचारधारा एक हो। समय परिस्थितियों के *
कृपाशंकर चौबे की यात्रा की कहानी
बलिया इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से होते हुए बंगाल की धरती पर फलीभूत हुई। वे व्यष्टि से समष्टि को जोड़ने के सेतुबंध तो रहे ही साथ ही मनुष्यता की संवेदना को जोड़ना उनका प्रथम उद्देश्य रहा।
कृपाशंकर चौबे ने प्रतिबद्धता की संस्कृति को अपने जीवन की लड़ाई में चाहे वह साहित्य हो या पत्रकारिता, एक अहम भूमिका मानी। प्रो. चंद्रकला पांडेय जी के पहले काव्य संग्रह 'उत्सव नहीं है मेरे शब्द' की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं - -
मेरी कविता जुड़ी रहना
चाहती है
अपने देश से
देश से यानी दिल्ली मुंबई कोलकाता मद्रास जैसे महानगरों से नहीं
दूर सुदूर के अनाम गाँवों
आदिवासी बस्तियों
इतिहास से उन्मूलित किए जाते
कबीलों, जनजातियों
और मिटाई जाती लोक संस्कृतियों से(एक शिनाख़्त पृष्ठ 343)
कृपाशंकर के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व पर दृष्टि डाली जाए तो प्रतिबद्धता उनके विचारों और संवेदनाओं दोनों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
'कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त' में देश भर के विद्वानों, पत्रकारों और महत्वपूर्ण राजनीतिक साहित्यविदों के विचारों द्वारा कृपाशंकर चौबे के व्यक्तित्व और कृतित्व का निचोड़ निकाला गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका क्या स्थान है और समाज देश के प्रति उनका कितना सरोकार रहा इस पुस्तक में उनकी भूमिका की छानबीन की है।
किसी भी व्यक्ति के कार्य ही उसकी पहचान होती है फिर वह चाहे किसी भी क्षेत्र का हो। समाज के चार स्तंभों में पत्रकारिता अपना अहम स्थान रखती है जो समाज के अच्छे या बुरे को तौलती है। कृपाशंकर चौबे को हम एक पत्रकार और एक साहित्यकार दोनों रूपों में देख सकते हैं। उनकी शिनाख़्त बहुआयामी ढंग से की गई है जिसमें उनके जन्म से लेकर अब तक का ब्यौरा दिया गया है। कहावत है कि गाँव सराहता है तभी उसकी पूजा होती है। बलिया के चैनछरा गांव से आने वाले कृपाशंकर चौबे ने बंगाल की संवेदना के साथ मिलकर एक चमत्कार रचा आधुनिक युग में भी पत्रकारिता
महाश्वेता देवी ने उनके निबंध संग्रह 'समाज संस्कृति और समय' के बारे में लिखा है कि कृपाशंकर बंगाल के समाज और संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं।साहित्य समालोचक अमरनाथ का कहना है कि कृपाशंकर चौबे के लेखन की रफ्तार बहुत तेज है और उन्होंने हिंदी आलोचना जगत में आज अपनी खास पहचान बना ली है( पृष्ठ 5)।मदर टेरेसा के जीवन पर आधारित प्रोफेसर चौबे ने' करुणा मूर्ति मदर टेरेसा' और महाश्वेता देवी के जीवन और साहित्य पर केंद्रित 'महा अरण्य की मां' पुस्तक लिखी।
ज़मीनी हकीक़त से जुड़े डॉ कृपा शंकर चौबे ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पुस्तक लिख कर अपनी बात को जन-जन तक पहुंँचाने का कार्य किया। इसी प्रकार भारतीय कला सिनेमा में सत्यजीत रे के बाद चार्ली चैप्लिन एवं चलचित्र सिनेमा जैसी आधुनिकता से युक्त आदि पुस्तकें लिखीं। इसी प्रकार पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी 'राष्ट्र निर्माताओं की पत्रिकारिता' इन दिनों खास चर्चा में है। महात्मा गांँधी की पत्रकारिता, गांँधी के इंडियन ओपिनियन आदि के विषय में कृपाशंकर चौबे ने हिंदी बांग्ला दोनों को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्य किए। कृपाशंकर चौबे विविधता में एकता से पूर्ण साहित्य को महत्वपूर्ण मानते हैं। विविधतापूर्ण लेखन का मूल्यांकन इस पुस्तक में बहुत ही गंभीरता से हुआ है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विषयों के लेखक और लेखिकाओं का मूल्यांकन किया है। महाश्वेता देवी, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, केदारनाथ सिंह, हरिवंश, पवन करण, शेखर देशमुख, अभिषेक श्रीवास्तव, प्रभात ओझा, हीरालाल नागर, निर्मला गर्ग, मिथिलेश श्रीवास्तव, उमेश चतुर्वेदी, शर्मिष्ठा बाग, मृत्युंजय, वृषभ प्रसाद जैन, कृष्ण कुमार सिंह, अरुण होता, जय कौशल, सुरजीत कुमार सिंह, पलाश विश्वास, अग्नि शेखर, अरुण कुमार त्रिपाठी, विनय बिहारी सिंह ईश्वर मिश्र, विजय दत्त श्रीधर, बलदेव शर्मा, बलिराज पांडे, गिरीश पंकज, सिराज खान, राय बहादुर राय, राजेंद्र राव, राममोहन पाठक, तस्लीमा नसरीन,चंद्रकला पांडे आदि विभिन्न साहित्यकारों के साथ ही बुद्धिनाथ मिश्र, संजय द्विवेदी, गोपाल जी राय, अरविंद कुमार सिंह, अरविंद चतुर्वेदी, ओमप्रकाश अश्क, कौशल किशोर त्रिवेदी, संजीव भानावत, भवानी शंकर, संदीप कुमार दूबे, नंदनी सिन्हा आदि कृपाशंकर के व्यक्तित्व को जानते और समझते हैं। इसी प्रकार बहुत से विशिष्ट जनों ने कृपाशंकर चौबे के विषय पर बहुत कुछ लिखा जो उनकी विद्वत्ता उनकी तत्परता और उनके व्यक्तित्व को निर्धारित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनमें श्याम नारायण पांडे, अमरकांत, अमृतराय, नजीर बनारसी, विष्णुकांत शास्त्री, शिवप्रसाद सिंह, काशीनाथ सिंह, विद्यानिवास मिश्र, शिवमंगल सिंह सुमन, ठाकुर प्रसाद सिंह, कृष्ण बिहारी मिश्र, विवेकी राय, केदारनाथ सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, विश्वनाथ एन चंद्रशेखरन, नामवर सिंह, कल्याणमल लोढ़ा, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, जगदीश गुप्त, अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर और मदर टेरेसा आदि देश के सभी बड़े साहित्यकार, पत्रकार सभी शामिल हैं। कृपाशंकर चौबे के साथ रवि प्रकाश और हिमांशु बाजपेयी की भी बातचीत मिलती है जो इस पुस्तक को और भी गौरवपूर्ण बनाती है
461 पृष्ठों की इस पुस्तक में संपादकीय के साथ-साथ अवदान, मूल्यांकन, व्यक्तित्व विशिष्ट जनों के पत्र, कृपाशंकर चौबे की रचनाओं से चयन, आत्मकथ्य संवाद लेखक परिचय और परिशिष्ट में विभक्त कृपाशंकर चौबे की शिनाख्त को एक बहुत बड़ा आयाम दिया गया है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रामाणिकता का पूरा चित्र दिखाई पड़ता है।
पुस्तक के पहले अध्याय 'अवदान और मूल्यांकन' में साठ से अधिक लोगों ने कृपाशंकर चौबे को हिंदी का दीप, स्वदेश प्रेमी, बंगसेतु, वैदुष्यपूर्ण दृष्टि और तटस्थ और निरपेक्ष विवेचना करने वाला घोषित किया है। कृपाशंकर की पुस्तक'समाज संस्कृति और समय' को एक मील का पत्थर है जो वर्तमान पत्रकारिता को रेखांकित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। स्वयं महाश्वेता देवी ने कहा है कि कृपाशंकर चौबे एक हिंदी भाषी लेखक होते हुए भी उन्होंने अपनी रचनाओं से प्रमाणित कर दिया है कि भिन्न भाषी होते हुए भी जो जिस राज्य में रहता है वहांँ के समाज, संस्कृति, भाषा और साहित्य पर गंभीर अनुशीलन कर सकता है। मृणाल सेन की छाया लोक नजरबंद तस्लीमा, करुणामूर्ति मदर टेरेसा, पानी रे पानी और महाअरण्य की मांँ आदि बहुत ही अच्छी किताबें हैं। जो चौबे को ऊंँचाई पर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। संवाद चलता रहे, रंग, स्वर और शब्द पत्रकारिता के उत्तर आधुनिक चरण कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी संदर्भ ग्रंथ के रूप में सम्मिलित किए गए हैं। चौबे साहित्य अकादमी की जूनियर फैलोशिप समेत कई पुरस्कार से सम्मानित किए गए हैं। सुभाष मुखोपाध्याय ने
बांग्ला हिंदू सेतु शीर्षक से लिखा है कि मैं कृपाशंकर चौबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और उनकी पत्रकारिता गहरे सामाजिक अभिप्राय को लेकर चलती है। सामाजिक विषयों पर भी चोट करते हैं तो मनुष्य मनुष्य के संबंधों को और मानवी के लिए संघर्षशील दिखते हैं। सुनील गंगोपाध्याय जो बंगाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं उन्होंने हिंदी समाज में बांग्ला के दूत कहकर कृपाशंकर जी को सम्मानित किया है और लिखा है कि वह एक मौलिक लेखक है मैं अनेक समय हिंदी साहित्य जगत की खबरें उनसे प्राप्त करता हूँ और नए लेखों के बारे में भी उन्हीं से मुझे पता चलता है। उनके जैसा कोई लेखक किसी भी भाषा की संपदा के रूप में बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं की रानी है। केदारनाथ सिंह हिंदी के जाने-माने साहित्यकार हैं उन्होंने इंडिया टुडे में कृपाशंकर चौबे के सामाजिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व पर अपनी बात लिखते हुए कहा था कि कृपाशंकर चौबे बांग्ला भाषा और संस्कृति में गहरी पैठ रखने वाले हैं और उनकी कृति 'समाज संस्कृति और समय' विचार के कई स्तरों पर एक साथ सक्रिय दिखाई पड़ती है। हरिवंश जी ने कृपाशंकर चौबे की 9 पुस्तकें और पांच पुस्तकों के विषय में बताया कि वे बहुत पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं और प्रभात खबर के शुरुआती दिनों के संघर्ष के साथी हैं। आदरणीय कृष्ण बिहारी मिश्र जी शायद इसी प्रेम व यात्री के कारण कृपाशंकर को बलिया विभूति जी कहते हैं। देशकाल और परिस्थितियाँ कैसे हमारे आसपास या संसार को बदलते या प्रभावित कर रहे हैं यह समझना जानना आसान नहीं है। एक संवेदनशील समझदार या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा बसा मन है या पर पीड़ा समझ सकता है। बंगाल के दलित कोलकाता के चीनी मूल के बाशिंदे बाबा आमटे आनंदवन से लेकर अंडमान के लुप्त होते जा रहे आदिम जनजाति पर विषयों की विविधता से भरा खंड संस्कृति खंड में 65 रचनाएं हैं। कोलकाता के मशहूर पुस्तक मेला, मशहूर संस्थान नेशनल लाइब्रेरी, मशहूर कॉलेज स्ट्रीट के पुस्तक बाजार पर कृपा को पढ़ते हुए नई चीजें जानने की जिज्ञासा को देखते हुए प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी ने यह टिप्पणी की दी कि कृपाशंकर चौबे एक पत्रकार तथा संवेदना से भरा साहित्यकार हैं। पवन करण का मानना था की समय समाज और संस्कृति पुस्तक यदि आप पढ़े तो आपको गहरी बेचैनी से भरना शुरू कर देती है और आप इस पुस्तक का हिस्सा हो जाते हैं। आप सतर्कता और चौकन्ना से भर जाते हैं जिसमें तथ्य भी प्रामाणिक देते हैं। मुनमुन सरकार जैसी युवा विदुषी बांग्ला लेखिका, विद्रोही लेखिका तस्लीमा नसरीन की दुर्दशा और संघर्ष आदि लेखन अन्य भाषाओं के लेखकों और पाठकों को अपने संघर्ष और जद्दोजहद की तरह महसूस होने लगते हैं। इसी प्रकार सिंगूर आदि नए आंदोलन पर भी विशद चर्चा की है जिसने एक समय पूरे देश की नजर अपनी तरफ खींची थी। उसी प्रकार बंगाल की क्षेत्र वादी मार्क्सवादी दृष्टि से बाहर निकल कर देखना तथा भारत के मानस को सामने लाकर रखना बहुत महत्वपूर्ण है। बांग्ला के प्रमुख साहित्यकार बंकिम, शरद, ताराशंकर, बिभुतिभूषण, रवींद्नाथ, विमल मित्र, सत्यजीत राय, महाश्वेता देवी, नैना चक्रवर्ती, शंख घोष, सुनील गंगोपाध्याय, मंदाक्रांता सेन सहित हिंदी के निराला, प्रेमचंद, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह से राजेश जोशी तक पर लिखने के साथ-साथ बंगाल के कई सरकारों पर प्रमुखता और गंभीर समझ के साथ लिखने की वजह से कृपाशंकर चौबे को साहित्यकार तथा उनके लेखों को स्थान मिला। इसी प्रकार शेखर देशमुख ने लिखा कि कृपाशंकर चौबे को व्यक्तित्व चित्रण में महारत हासिल है क्योंकि उन्होंने बहुत सी ऐसी घटनाएँ और आम इंसान की संवेदना को दूसरों तक पहुंँचाया है , समय का अपना महत्व होता है समय के साथ चलने के लिए आसपास घट रही घटनाओं का सही अर्थ लगाना भी जरूरी होता है संवेदनशीलता के साथ-साथ दूसरों के प्रति सहानुभूति अगर हो, भावनाओं के आधार की क्षमता हो, दुनिया की तरफ देखने का नजरिया भी बदल जाता है। यही परिवेश चौबे जी के व्यक्तित्व को गढ़ रहा था चाहे वह पीड़ितों की मसीहा मदर टेरेसा हों या फिर विद्रोही साहित्यकार सुशील गुप्ता हों, चौबे जी में हर चीज के बारे में एक ही प्रकार का कौतूहल रहा। व्यक्ति हो या घटना वही गुण उन्हें रिश्ता कायम करने में मदद करता है। अभिषेक श्रीवास्तव लिखते हैं एक लेखक के रूप में महाश्वेता के सानिध्य में रहकर आदिवासियों को काफी करीब से देखा है और उनके मसलों से गहराई से जुड़े बर्बर सभ्यता के बीच पश्चिम बंगाल के लोधा और खेड़िया आदिवासियों पर सरकारी दमन की एक रिपोर्ट भी बनाई है। आदिवासियों के जीवन में लेखक की दिलचस्पी केवल बंगाल तक सीमित नहीं है उन्होंने अंडमान निकोबार के आदिवासियों पर भी है। इस खंड में दलितों और कोलकाता के असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों पर भी रिपोर्ट है और हाथ रिक्शा खींचने वालों की समस्याओं पर टिप्पणी है और पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था पर कुछ नोट्स हैं। संस्कृति की छाव शीर्षक में प्रभात ओझा ने लिखा है कि कृपाशंकर की पत्रकारिता की प्रारंभिक प्रतिज्ञाओं का स्मरण हमें विकारों से लड़ने की शक्ति देता है। मीडिया में जो विकार आ गए हैं उनमें कुछ स्वाभाविक है और उस परिस्थिति में जब मीडिया उद्योग है तो उद्योगों की जो विकृतियां है वे इसमें सामने ही आएंगे क्योंकि उद्योग का काम धन कमाना है और व्यापार बढ़ाना है। लेखक पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन की उन नीतियों की भी जमकर खिंचाई करते हैं जिस कारण एक तरफ तो विकास का ग्राफ पेपर बढ़ता दिखाई देता है दूसरी ओर फुटपाथ पर रहने वालों की संख्या भी बढ़ती है। फिर ऐसा होने के पीछे लेखक वामपंथियों की ईमानदारी पर शक नहीं करता। उत्तरी बंगाल के अलगाववादी आंदोलन को कुचलने के लिए वामपंथी सरकार के तरीकों को रेखांकित करने के अलावा वह उस जोशना सिंह से मिलता है जिसने यह मानते हुए विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी इससे वह अपना परिवार नहीं चला सकते। इसलिए जरूरी है कि नौकरी की जाए। कृपाशंकर चौबे कोलकाता में चीनी समुदाय पर लिख सकते हैं तो पड़ोसी बांग्लादेश में हो रही समस्याओं पर भी टिप्पणी करते हैं। साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ मैत्री को महाद्वीप में शांति के लिए यूं ही जरूरी नहीं समझते। उन्हें पता है कि इन दिनों दोनों देशों का जनमानस किस कदर एक दूसरे से संपृक्त है। इन गंभीर विश्व में खेल, फिल्म और रंगमंच के बहाने जब लिखो की श्रंखला शुरू होती है तो लेखक की इन विषयों पर पकड़ का भी सबूत मिलता है। राजेंद्र राव पत्रकारिता पर दस्तावेजी लेखन के रूप में मानते हैं। मीडिया समय और संस्कृति में अर्चना शर्मा ने कहा है कि वैसे तो हिंदी में बहुत से साहित्यकार हैं जिन्होंने पत्रकारिता के मानदंड स्थापित किए हैं प्रेमचंद से लेकर यह परंपरा रघुवीर सहाय आगे मनोहर श्याम जोशी से लेकर मंगलेश डबराल तक विस्तृत है, परंतु पत्रकारिता में ऐसे कम लोग हुए हैं जो साहित्य के प्रति अपने उल्लेखनीय जिम्मेदारी समझते हैं। पत्रकारिता की भारतीय अवधारणा इस पुस्तक के दूसरे खंड संस्कृति में अपने पूरे शबाब के साथ निखर कर आते हैं। साहित्य और संस्कृति के चिंतन के माध्यम से उन्होंने उत्तर भारतीय साहित्य की सच्ची तस्वीर सामने रखी है। मीडिया संस्कृति और समय में अर्चना शर्मा कहती हैं कि कविता के समकालीन परिदृश्य में उन्होंने कविता, गीत, गजल, दोहे, मुक्तक सब को शामिल कर लिया जो साहित्य के विद्यार्थियों या जिज्ञासाओं के लिए थोड़ी परेशानी और असमंजस पैदा कर सकता है। अरुण कमल, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी आदि के साथ जुड़ना कृपाशंकर की दृष्टि को व्यापक रूप देती है। लेखिका महाश्वेता देवी को वर्ष 1997 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था तो शायद देश की 8% आबादी वाले आदिवासी इलाके को भी सम्मानित किया जा रहा था जो बहुत बड़ी बात है कि आदिवासियों के बीच मांँ की तरह पूजा और आदरणीय महाश्वेतादेवी एक तरफ से बहुत ही अद्वितीय कर्म कर रही थीं। महाश्वेता देवी ने आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किए चिकित्सा, सिंचाई और स्वरोजगार योजनाओं का सूत्रपात कराकर महाश्वेता देवी ने आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई यह उन्होंने आजकल अक्टूबर 1998 में अपनी बात कही। विश्वंभर नेवर ने अनूठी और सार्थक पहल बताते हुए हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे के लिए कहा कि बड़ी लकीर खींच कर लेखन में बाजी मारते रहे। दलित साहित्य और बांग्ला साहित्य पर इनकी संभवत पहली पुस्तक जो दलितों और जनजातियों के साथ अन्याय हो रहा है आज के समय की बड़ी चुनौती पर उन्होंने लिखा है हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में कृपाशंकर चौबे का कार्य बहुत ही सराहनीय है।
कर्म के पीछे चलते शब्द
यह मृत्यु का नहीं है
मेरा देश मेरा देश
मैं खिलाऊंगा अपने देश को
सीने में छुपा लूंँगा।
कवि भट्टाचार्य की कविता की ये पंक्तियां हैं लेकिन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी कहती हैं कि मेरा देश एक ही है। हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहांँ शब्द के बीच गहरी खाई है। सच तो यह है शब्द की सामर्थ्य पर हमें भरोसा नहीं रहा।इसके कारण हम कभी उपभोक्तावाद में ढूंँढते हैं। सभी उत्तरआधुनिकता के ऐसे मॉडल में जहांँ हर चीज का अंत निश्चित है चाहे वह इतिहास, चाहे विचारधारा, चाहे साहित्य को चुनौती दी है, सतत कार्य महाश्वेता का परिचय देती है। कृपाशंकर चौबे की किताब महाश्वेता देवी हिंदी भाषा में रुदाली और हजार चौरासी की मांँ जैसी उनकी कथाओं पर हिंदी में फिल्में बन चुकी है। हिंदी में उनका साहित्य अनुदित हुआ है। पत्रकारिता साहित्य और संवाद के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय जीवन में आदिवासियों को सम्मानजनक स्थान और न्याय दिलाने के लिए उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया। भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान के लिए आदिवासियों के बीच उनके कार्य के लिए दिया। आदिवासियों की मांँ, आदिवासियों की बड़ी दीदी जैसे संबोधन से उन्हें संबोधित किया गया। कृपाशंकर समय-समय पर उनसे बातचीत करते हैं और उनके विचारों से हिंदी जगत को परिचित भी कराते रहे हैं। वहीं शर्मिष्ठा बाग ने कहा कि निर्वासन में भी तसलीमा का संघर्ष विषय पर जब अपनी बात कही तो यही सामने आता है कि निर्वासन में भी तस्लीमा को लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। नजरबंद तसलीमा कृपा शंकर जी की इस पुस्तक में उनके निर्वासन के संघर्ष देश से दूर देश के पास और नसरीना के निर्वासन में लेखिका के संघर्ष का विशद विवरण मिलता है। तस्लीमा लोकतंत्र मानवतावाद अभिव्यक्ति की आजादी और इससे मुक्त के पक्ष में लिखती हैं ।स्त्री को उसकी मुकम्मल आजादी देने के पक्ष में पाते हैं। पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व वाद की विरोधी हैं।कृपाशंकर ने लिखा कि तस्लीमा ऐसी लेखिका हैं जो अपने हृदय की बात सही सही लिखती हैं, इसकी परवाह किए बिना कि कुछ लोग नाराज होंगे।
जब भारतीय समाज में विचारों की लहर चल रही थी। 8 वर्ष की उम्र के बालक मृणाल सेन को स्वाधीनता संग्राम के बारे में एक राजनीतिक संस्था का बोध हो जाता है और वह वामपंथी दिशा की ओर मुड़ते हैं यह राजनीतिक चेतना उन्हें कैसे सिनेमा से जन तक ले आई इसकी कथा दिलचस्प भाषा में कृपाशंकर जी ने लिखी है। जिन्होंने अपनी टिप्पणी पर अद्भुत रचना कहते हैं। कृपाशंकर चौबे दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य की भूमिका में अपनी बात लिखी है कि वर्ण व्यवस्था बहुत पुरानी है। जातियाँ परवर्ती काल में बनीं जिसका आधार जन को माना गया। वहीं से जाति भेद और छुआछूत ने जन्म लिया इससे एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को आसान बनाने के भाव का जन्म जातियों के जन्म के साथ भारत में हुआ। महाभारत महाकाव्य के नायक कर्ण का उदाहरण दिया जो स्वयं वर्ण व्यवस्था के ऊँच नीच का शिकार हुआ था। कन्नड़ की प्रसिद्ध कवयित्री अक्कमहादेवी की कविता भी उन्होंने बताई जो दलित की भूख से उत्पन्न विषम परिस्थिति को दर्शाती है। कृष्ण कुमार सिंह ने परंपरा और आधुनिकता का संगत बोध के हवाले से कहा है कि इस पुस्तक में प्रतिष्ठित पत्रकार ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पर गहन अध्ययन चिंतन किया है। यही उसका ठोस प्रमाण है जिसमें बाबा साहब का मत अंतर धारा के रूप में विद्यमान है। मतवा धर्म की मान्यताओं की संक्षिप्त चर्चा भी की है जिसमें मतवा यानी जो मतवाले हैं, जो जाति, धर्म, वर्ण से ऊपर उठे हुए हैं। मध्यकाल में निर्गुण कबीर, रैदास, गुरु नानक, दादू दयाल आदि संत कवि एक तरह से मतवाले ही थे। जाति, धर्म की संकीर्णता को तोड़ने का साहस मतवाले कर सकते हैं। हरि रस पीकर मतवाले बने लोग भी ऐसी जगह से बाहर निकल सकते हैं।
तस्लीमा नसरीन ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि हिंदी जगत से मेरा परिचय कराने वाले कृपाशंकर को जानती हूंँ और वह मेरे घनिष्ट बंधुओं में से है। पता नहीं क्यों वह मुझे अपने छोटे भाई की तरह लगता है। एक कुशल पत्रकार है। लेखक है। और सबसे बड़ी बात है वह मेरा स्वजन है। मेरे अच्छे समय में जैसे वह मेरे पास रहा। हिंदी जगत के साथ मेरा परिचय कराने में कृपा को मैंने सदैव अपने पास पाया। कृपा ने मेरे संग अनेक लोगों से अधिक अंगीकार किया मेरे निर्वासन की यंत्रणा को लेकर मैंने कृपा को भावुक होते हुए भी देखा। अरुण होता ने साहित्य आलोचना इतिहास और पत्रकारिता का समन्वित रूप में प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे को एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न लेखक माना है। उन्होंने बताया कि निबंध, आलोचना और पत्रकारिता के क्षेत्र में कृपाशंकर जी एक चर्चित नाम है।इनका लेखन आस्था ,प्रतिबद्धता और विवेक का संतुलन है। जीवन और समाज में आस्था के साथ साथ लेखक के संसार में समाज के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता दिखाई है। दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए उनका अध्ययन क्षेत्र बंगला साहित्य में दलित चिंतन है। संजीव भानावत ने उनको प्रेरणादायी पत्रकार व शिक्षक माना है। मीडिया के साथ साथ साहित्यिक सांस्कृतिक और समीक्षात्मक दृष्टि रही है। पश्चिम बंगाल सरकार की विद्यालय स्तरीय पाठ्य पुस्तकों के संपादन में आपका विशिष्ट योगदान रहा है। शिष्य वत्सलता, शोधवृत्ति जानेवाले मार्गदर्शक, वर्धा के गांधीवाद और कोलकाता की बौद्धिकता का युग्म आदि कई विद्वानों ने अपने लिखित विचारों के द्वारा कृपाशंकर चौबे की शिनाख़्त की है।
विशिष्ट जनों के पत्र विभाग में श्यामनरायण पांडेय, अमरकांत का सन् 88 का पत्र, डॉ शिवमंगल सिंह सुमन, कृष्ण बिहारी मिश्र के 91के पत्र, नजीर बनारसी, राजेन्द्र यादव, केदारनाथ सिंह, शिवप्रसाद सिंह, नामवर सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह श्री विष्णु कांत शास्त्री, कल्याणमल लोढ़ा उपेन्द्रनाथ अश्क, मदर टेरेसा आदि के बहुमूल्य पत्र हैं जो कृपाशंकर के साथ उनका व्यक्तिगत संपर्क और उनलोगों का विश्वास स्पष्टतः परिलक्षित होता है। पुस्तक का विभाग 'कृपाशंकर चोबे की रचनाओं से एक चयन' की आठ रचनाएँ व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने वाली रचनाएँ हैं। हिंदी की समकालीन काव्य संवेदना, बांग्ला दलित आत्मकथा तसलीमा के संघर्ष और निर्वासन की कहानी ,सुशील गुप्ता के विद्रोही स्वभाव और कार्य शैली पर गंभीर और सुचिंतित शब्दों की यात्रा है। यही नहीं बंगाल के सिनेमा का इतिहास जो सत्यजीत रे से ऋतुपर्ण तक और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद की पत्रकारिता पर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय भी दिया।
कृपाशंकर चौबे ने आत्मकथ्य में शीर्षक' पार्टनर! मेरी पालिटिक्स यह है 'में अपने गाँव बलिया से बंगाल की भूमि तक का पूरा ब्यौरा दिया जो उनके माता-पिता, शिक्षा, विवाह, बच्चे, समाचार पत्रों में उपसंपादक संपादक और फिर मुख्य उपसंपादक आदि की यात्रा है।
संवाद विभाग में रवि प्रकाश और हिमांशु वाजपेयी का संवाद है जो दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ। बांग्ला के बड़े साहित्यकारों में महाश्वेता देवी, तसलीमा नसरीन सुनील गंगोपाध्याय आदि की टिप्पणियों ने कृपाशंकर को ऊंँचाइयों पर लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
अनय के लेख की ये पंक्तियाँ 'समाचार पत्र सामूहिकता की भावना से निकलता है। समाचार की स्वाधीनता बड़ा ही व्यापक और अनुशासित शब्द है। किसी की कलम की स्याही को फीकी समझने का किसी को अधिकार नहीं है।' (पृष्ठ 99)
युवा सोनम तोमर ने अपने संपादकीय में कृपाशंकर चौबे के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व की बहुत ही सुंदर प्रस्तुति पाठकों के समक्ष रखी है। यह पुस्तक एक दस्तावेज के रूप में विद्वानों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और साधारण पाठकों के लिए संग्रहणीय है। मैं उन्हें बधाई और शुभकामनाएँ देती हूँ।
प्रलेक प्रकाशन मुम्बई महाराष्ट्र से प्रकाशित कृपाशंकर चौबे - एक शिनाख़्त :सोनम तोमर और परिकल्पना :जितेन्द्र पात्रो ने किया। 2022 में प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 400 रूपये है।
-डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता
Wednesday, July 12, 2023
सृजन प्रतिष्ठान में सर्वश्रेष्ठ जीन कोक्ट्यू के जन्म उत्सव पर कविता पाठ
सृजन प्रतिष्ठान में सर्वश्रेष्ठ जीन कॉक्ट्यू के जन्म उत्सव पर कविता पाठ किया गया - -
सृजन प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित पोएट्री अड्डा में गत शनिवार आठ जुलाई को फ्रैंच के महान कवि जीन कॉक्ट्यू की कविता उत्सव पर विशद रूप से चर्चा की। जीन कोक्ट्यू का जन्म 5 जुलाई 1889 को फ्रांस में हुआ था और उनकी मृत्यु 74 वर्ष की आयु में मिलि- ए - फोरट फ्रांस में हुई थी।वे 20 वीं सदी के कवि, नाटककार, उपन्यासकार, कलाकार, फिल्म निर्माता, विजुअल आर्टिस्ट और आलोचक के रूप में असाधारण व्यक्तित्व के धनी रहे। सृजन द्वारा आयोजित इस कविता अड्डे में 35 से अधिक संख्या में विभिन्न साहित्य भाषा और संस्कृति के लोगों ने कविताओं का आनंद लिया। इस अवसर पर
सृजन की उपाध्यक्ष, प्रोफ़ेसर कृष्णा सेन और अंग्रेजी समन्वयक अंजना बसु दोनों की उपस्थिति रही। प्रो कृष्णा ने कविता अड्डे के सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और समापन पर धन्यवाद दिया।
पलाश भद्र ने अपनी विकलांग बीमारी से जूझने के बावज़ूद जीन कोक्ट्यू के अपने दो उत्कृष्ट बांग्ला अनुवाद भेजे जिन्हें बांग्ला समन्वयक दीपक लाहिड़ी ने बहुत ही शानदार ढंग से पढ़ा।
अड्डे की प्रमुख साहित्य चर्चा डॉ. मोहर दास चौधरी ने की जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के फ्रेंच विभाग की विभागाध्यक्ष हैं उन्होंने बहुत ही विस्तार से कविताओं की जानकारी दी और जीन कोक्ट्यू की कविताओं का पाठ अंग्रेजी और फ्रैंच दोनों ही भाषाओं में किया जिसे चिन्मय गुहा द्वारा दिया गया था। फ्रैंच और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में कॉक्ट्यू की कविताओं को उनके चित्रों के जरिए भी बताया। प्रो मोहर की कोमल और संवेदनशील आवाज़ में उत्कृष्ट प्रस्तुति सुनी गई। साथ ही वाणिज्य दूतावास की सुंदर फ्रांसीसी महिला, डॉ. सॉल्विग ओबेरसीथर भी देर से आईं, हालांकि वे अपनी कविताओं द्वारा कॉक्ट्यू को सृजन अड्डे में फ्रांसीसी स्वाद के साथ जोड़ने में कामयाब रहीं।
अंग्रेजी प्रोफेसर डॉ. अन्नपूर्णा पालित, जो भाषाओं की प्रेमी हैं, कविता अड्डे का सफल संचालन किया प। प्रत्येक कवि द्वारा सुंदर कविताएँ पढ़ी गईं जिनमें - फहद पाशा (उर्दू) , श्रीपर्णा गंगोपाध्याय ( बांग्ला) , अरुणांशु भट्टाचार्य और अंत में 50 वर्षों से लिख रहे कवि सुजीत सरकार...अमनिता सेन और अमित शंकर साहा द्वारा अंग्रेजी में कविताएं पढी़ गईं - ये दोनों वर्षों से सृजनवादी हैं।और अंत में, हमारी स्थापना के बाद से ही सृजन की प्रशंसक, डॉ वसुंधरा मिश्र द्वारा हिंदी कविताओं का पाठ किया गया । सृजन टीम के सदस्य पवन मस्कारा द्वारा याद की गई, विद्या भंडारी ने संपर्क किया और आमंत्रित किया , जो शुरुआत से ही सृजन में नियमित रूप से भाग ले रही थीं ।
सृजन की काव्य टीम के अन्य सदस्यों को भी अद्भुत कवियों को चुनने और उन्हें स्वीकार करने के लिए बधाई दी गई जिनमें सैयद कवसर जमाल और बांग्ला प्रमुख दीपक लाहिड़ी और उर्दू समन्वयक ज़रीना ज़रीन रहीं।
मंच से पढ़ने वाले कवि भी, जिसकी शुरुआत प्रिय नए कवि सुभाष सरकार और निलीन पुतातुंडा, सुमित लाई रॉय और यहां तक कि जरीना ने भी अपने बहुमूल्य दो शेर सुनाए। इसके अलावा कॉलेजों के दो युवा रचनाकारों दीपांजन छेत्री और अनन्या साहा ने अपनी रचनाएं सुनाई। इस अवसर पर डॉ वसुंधरा मिश्र ने साहित्यकार और भाषा प्रेमी वसंत रूंगटा से बातचीत की। सृजन प्रतिष्ठान सन् 2000 से पोएट्री अड्डे के लिए प्रसिद्ध है । सृजन प्रतिष्ठान के संस्थापक वसंत रूंगटा ने सृजन का परिचय दिया और बताया कि अब तक सृजन प्रतिष्ठान अड्डे में विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 कवियों की श्रृंखला पर महत्वपूर्ण चर्चा हो चुकी है जिसे पुस्तक रूप में भी करने का विचार है। सृजन अड्डे से हम विश्व के विभिन्न प्रसिद्ध साहित्य, संस्कृति, कला, फिल्म थियेटर आदि को सामने लाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने बताया कि यह एक ऐसा अड्डा है, जहां हमें इन तस्वीरों को पोस्ट करने में सबसे अधिक खुशी मिलती है, डॉ सुजाता दास द्वारा की गई फोटोग्राफी अड्डे का फ्रेम-दर-फ्रेम विवरण देती हैं। हमारे परिवार में हाल ही में शामिल हुई, अनुपमा मैत्रा जो एसोसिएटप्रोफेसर और अंग्रेजी की एचओडी हैं जिन्होंने पिछले महीने विक्रम सेठ पर अड्डा का कुशलतापूर्वक संचालन किया था। जैसा कि आप सृजन सभागार में इन तस्वीरों में देख सकते हैं। पंचायत चुनाव मतदान के बावजूद, हमारे पास यह सृजन अड्डा है जहां हम अपने को साहित्यिक माध्यम से समृद्ध कर सकते हैं । कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
मन का सावन कविता
मन का सावन--
सावन मन में बरसता है।
जब रस रंग और रास से मन पूर्ण होता है तो सावन होता है।
निश्छल और उन्मुक्त हँसी से चेहरा भरा हो तो सावन है।
चिंताओं की तमाम लकीरें जब पानी की तरह पारदर्शी हो जाए तो सावन है।
होठ पर जब बचपन के गीत आने लगें तो सावन है।
एक पैर से दूसरा पैर जब खेलने लगे तो सावन है।
पेड़ों की पत्तियों से गिरती बूदें जब शरीर को भिगो दें तो सावन है।
तन और मन के पोर पोर कुछ कहकर भी जब कुछ न कहें तो सावन है।
आसमान में सात रंगों का इंद्रधनुष दिखाई दे तो सावन है।
हमारे मन का मयूर जब नाचे तो सावन है।
यूँ ही तो कोई सावन नहीं मनाता है।
किसान अपनी लहलहाती फसलें देखकर झूम उठता है, तब सावन है
भारत ऋतुओं से फलता-फूलता है, त्योहार मनाता है, खुशियाँ मनाता है। तब सावन है
कोयल की कूंक जब सुनाई दे तो सावन है।
हर बच्चा वृद्ध और स्त्री के चेहरे पर सुकून हो तो सावन है
मजदूर जब त्योहार मनाए तो सावन है
कृषि के साथ कृष्ण बांसुरी बजाएं तो सावन हैं
क्रोधित वर्षा के नैनों की धारा जब बुझ जाएं तो सावन है
बाढ़ के खतरे न आएं पशु-पक्षी और मानव के जीवन सुरक्षित हों तो सावन है।
सांस्कृतिक नवोन्मेष का बीजारोपण करती है वर्षा ऋतु
महिलाओं पर समाज परिवार का दायित्व रहा है। बच्चों से लेकर परिवार, संस्कृति से लेकर संस्कार, शिक्षा से लेकर अच्छे नागरिक बनाने का कार्य सब कुछ महिलाओं पर होता है। तीज-त्यौहार रीति-रिवाज परंपराओं को महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं। वसंत के समान ही वर्षा भी भारतीय साहित्य में सम्मान और गौरव का स्थान पाती रही है।हर भाषा के लोक गीत हैं, वैदिक ऋषियों ने मेघों के शक्तिशाली रूप का यशोगान उल्लसित कंठ से किया है।इंद्र मेघों के शक्तिशाली अधिपति रहे। समय के साथ उनका प्रभाव असफल होता गया और इंद्र देवता की छवि में कमी आती गई और बाद में उपेंद्र देवता ने भारतवर्ष में धर्म साहित्य शिल्प संगीत और कला के क्षेत्र को छा लिया।
घनों के राजा इंद्र रंगमंच से चुपचाप हट गए और घनश्याम वहाँ डट गए।
हिंदू पुराणों के अनुसार यह घटना द्वापर युग में घटी थी। भागवत पुराण में इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पूजा करवाई। इंद्र ने भी बदला लेने के लिए मूसलाधार वर्षा करवाई जिससे द्युलोक से भूलोक तक जल ही जल हो गया।
श्रावण का महीना उत्सव का महीना है। मानसूनी हवाएँ वारिश लाती हैं और तपती धरती को भीगो देती हैं। नागार्जुन की पंक्तियाँ हैं - बादल को घिरते देखा है
कन्हैयालाल सेठिया जी की पंक्तियाँ नीर भरी नदियाँ लहराते /सागर उनमें प्यास बुझाते /किंतु गगन की एक बूंद हित /चातक के नयनों में जल है।
वेदों से लेकर अभी तक न जाने कितने ही कवियों और साहित्यकारों और दार्शनिकों आदि ने वर्षा के प्रति अपने भावों को व्यक्त किया है।
आषाढ़ से ही वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है। बंगाल में काल बैशाखी बैशाख से ही दस्तक देने लगता है। कालिदास ने मेघदूत की रचना ही कर डाली जो विश्व में एक अनूठी और अद्भुत रचना है। आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघमाश्लिष्ट सानु /वप्र क्रीडा परिणत गज प्रेक्षणियम ददर्श। प्रथम श्लोक से ही मेघों को अपना संदेशवाहक मानते हुए अभूतपूर्व वर्णन किया है। बादल वही हैं जो प्रकृति जड़ चेतन और पूरे ब्रह्माण्ड को अपनी शीतलता प्रदान करते हैं।
सावन और संगीत का अटूट रिश्ता है। सुरंगो सावन पर मेरी कविता है - - -
मन का सावन--
सावन मन में बरसता है।
जब रस रंग और रास से मन पूर्ण होता है तो सावन होता है।
निश्छल और उन्मुक्त हँसी से चेहरा भरा हो तो सावन है।
चिंताओं की तमाम लकीरें जब पानी की तरह पारदर्शी हो जाए तो सावन है।
होठ पर जब बचपन के गीत आने लगें तो सावन है।
एक पैर से दूसरा पैर जब खेलने लगे तो सावन है।
पेड़ों की पत्तियों से गिरती बूदें जब शरीर को भिगो दें तो सावन है।
तन और मन के पोर पोर कुछ कहकर भी जब कुछ न कहें तो सावन है।
आसमान में सात रंगों का इंद्रधनुष दिखाई दे तो सावन है।
हमारे मन का मयूर जब नाचे तो सावन है।
यूँ ही तो कोई सावन नहीं मनाता है।
किसान अपनी लहलहाती फसलें देखकर झूम उठता है, तब सावन है
भारत ऋतुओं से फलता-फूलता है, त्योहार मनाता है, खुशियाँ मनाता है। तब सावन है
कोयल की कूंक जब सुनाई दे तो सावन है।
हर बच्चा वृद्ध और स्त्री के चेहरे पर सुकून हो तो सावन है
मजदूर जब त्योहार मनाए तो सावन है
कृषि के साथ कृष्ण बांसुरी बजाएं तो सावन हैं
क्रोधित वर्षा के नैनों की धारा जब बुझ जाएं तो सावन है
बाढ़ के खतरे न आएं पशु-पक्षी और मानव के जीवन सुरक्षित हों तो सावन है।
निराला कहते हैं - बादल गरजो
घेर घेर घोर गगन धाराधर ओ
ललित ललित काले घुंघराले
बाल कल्पना के से पाले
सूर तुलसी जायसी सभी ने पावस ऋतु का सुंदर सरस वर्णन किया है।
महादेवी वर्मा जी ने - - नीर भरी दुख की बदली
नागार्जुन - - मेघ बजे घन कुरंग
बादल को घिरते देखा है।
बूंदों की रिमझिम में संगीत का सरगम होता है। इस मौसम में हवा बादल पेड़ पपीहे सब झूमते गाते हुए से लगते हैं।
भक्ति संगीत और कविताओं में वर्षा ऋतु प्रकृति की सहचरी है। वर्षा मानव मन की अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति है।
यह उल्लास लोककंठ से बारहमासी कजरी झूलागीतों के रूपों में फूटता है। मेघ मल्हार का आदि राग कवि हृदय में भी गीत के रूप में उतरता है। सावन और संगीत का अटूट संबंध कई नवगीतों में मिलता है।
बरसात का प्रेम से चिर संबंध है। इस ऋतु में प्रणय की पुरानी स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं। विरह की वेदना तीव्र हो जाती है और मिलन की आतुरता बढ़ जाती है। बादलों का अत्याचार बाढ़ के रूप में तबाही भी लाता है। बाढ़ की त्रासदी के कई वर्णन मिलते हैं।
तुलसी के रामचरित मानस में सीता वियोग में राम को भी बादलों के गरजने से डर लगता है।
घन घमंड नभ गरजत घोरा,
प्रिया हीन डरपत मन मोरा।
सूर की गोपियाँ कृष्ण के वियोग में कहती हैं - -
निस दिन बरसत नैन हमारे,
सदा रहत पावस ऋतु इन पे जब से स्याम सिधारे।
कबीर की उलटवासी देखें -
बरसे कंबल भीजे पानी
कबिरा बादल प्रेम का
हम परि बरष्या आइ
अंतरि भीगी आत्मां हरि भयी बनराई
जायसी ने महाकाव्य पद्मावत में - - - नागमती की विरह की पीड़ा को इस प्रकार व्यक्त किया है। - -
चढ़ा असाढ़ गगन घन बाजा
साजा विरह दुंद दल बाजा **
सावन बरस मेह अति पानी
भरनी परिहौं बिरह झुरानी
वर्षा ऋतु सांस्कृतिक नवोन्मेष का बीजारोपण करता है।
सावन की वो काली घटाएं
सावन की वो काली घटाएं जो विरह बढ़ा देती हैं...
घन और श्याम दोनों एक ही वर्ण के हैं। सावन का भी रंग श्याम ही होता है। यही वजह है कि काली घटाएं विरह बढ़ा देती हैं। बारिश की बूंदें यौवन को निखार देती हैं। ज़िंदगी में रस घोल कर मदहोश बना देती हैं। इस महीने की बारिश की फुहारों को निहारना जितना अच्छा लगता है, उससे भी अधिक खुशी भीगने में होती है। फूल-पत्तियों का निखरा हुआ रंग भला किसे नहीं सुहाता। वर्षा ऋतु में ऐसे ही सौंदर्य का वर्णन करती है ।
बादर गरज नभ घोर रे शोर पपीहरा अति करत है
धधकार सुन मंदिरन के मानो गुणिन लय सुर भरत है
अतही प्रबल सो तान बरसत बूंद जैसे परत है
डरपत है रिपुदल कटत सब हनुमंत जब हुंकरत है
यह नाद ही के समुद्र में गायक गुणी सब तड़त है
कहें रामदास गोविंद के पदकमल निशिदिन परत है...।
जब घनघोर बारिश होती है तब ताल-सुर की बारिश का अहसास एक सुर साधक के जेहन में होने लगता है। बारिश की फुहारों की स्तुति उस ईश्वर के पद कमल से की गई है, जो किसी नायिका के लिए परदेस गया होता है और वह उसका इंतज़ार कर रही होती है।
पं. देवाशीष दे की रचित कजरी से इस महीने की खूबियों में रंग भरती हैं-
मोतियन बूंद पड़े मोरे अंगना
भींजे अंग ना भींगे अंगना...
कारी बदरिया घिर घिर आई
बरसन लागी पिया मोरा संग ना
चातक मन की प्यास बुझाओ
अगन जिया की ताप बुझाओ
सूखे मन हरियाली लाओ
झिर झिर बरसे मोरे नैना...।
सावन की इस बिरह-व्यथा के भावों में नायिका के अंग नहीं भीगते आंगन भीगता है...। वह कजरी गाती हैं-
अइले सवनवा बरसे नयनवा झंकियन झकोरे बैरी पवनवां...
अमवा की डारी पे परल हिंडोलना
झूला झूले सखी संग ले सजना
झूलना हमार हो झुलावे पवनवा...।
वह झूला पर आलाप लेती हैं-
झुलनवा झूलें सखि सिया रघुबीर
सिया रघुबीर झूलें सरजू के तीर
श्यामल रंग के परल हिंडोलना श्यामल रंग की डोर...।
सावन में प्रियतम के इंतजार का जिक्र राग माज खमाज की ठुमरी में इस तरह करती हैं-
अबके सावन घर आ जा
दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया
आके गले से लगा जा...।
सावन को मीराबाई ने किस रूप में देखा है, इसकी भी बानगी वह देती हैं-
हे सावण दे रह्या गिरा रे के घर आयो जी श्याम मोरा
उमड़ घुमड़ चहुंदिश ते आए गरजत है घनघोरा...।
वह झूला के जरिए सावन की खुशी का इज़हार भी खूब करती हैं-
हरे राम लागो सावन को महीना झूला डारो रे हरी...
दादुर मोर पपीहरा बोले कि मोरे रामा मोहन की मुरली बाजे झूला डारो रे हरी...।
देखो ऋतुराज वसंत आ गया लेख
देखो! ऋतुराज वसंत आ गया -- डॉ. वसुंधरा मिश्र
न जाने अंतरिक्ष की लहरों में लहराता - बहता मादक, मधुर और मदिर मधुमास जीवन के उदास सूने वन खंड पर कब उतर आया! कामायनी में प्रसाद जी ने अंधकार को चीर कर आने वाले वसंत के प्रकाश की ऊर्जा को पहचाना है - - -
"मधुमय वसंत जीवन - वन में
बह अंतरिक्ष की लहरों में
कब आए थे तुम चुपके से
रजनी के पिछले प्रहरों में? "
चारों ओर मस्ती और मादकता छा गई । प्रीत और गीत से , राग और अनुराग से, रंग और तरंग से, चंग और मृदंग से, गुंजार और झंकार से वन और जीवन भर गए हैं। प्रकृति सुंदरी अपनी अनुपम साज सज्जा से थिरक उठी है। चारों और हरित दुकूल बिछ गया है। "सुमन निकुंजन में" कुंजन के पुंजन में गुंजन मिलिंदन को वृंद मतवारो हैं "।
बसंत के मादक वर्णन में कवियों की कल्पना भी झूम उठी। अनुराग के राग में रंग कर, प्यार में डूब कर नूतन झंकृति व वर्णन छटा लेकर थिरकती हुई आई - - - -
" ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे
मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजित कुंज कुटीरे
विहरति हरिरिह सरस वसंते
नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरही जनस्य दुरंते।"
ऐसा मदिर वातावरण, सरस वसंत और उसमें युवतियों के साथ नृत्य में निरत रसेश्वर हरि! मधु गंध लोभी मधुपों के भार से हिलती झूमती सहकार मंजरी!
मैथिल कोकिल विद्यापति ने भी गाया है---
" नाचहु रे तरुणी तजहु लाज।
आएल वसंत रितु बनिक राज।।"
" अरी तरुणियों! नाचो, खूब
नाचो , देखती नहीं वसंत आ गया! ना अब लाज नहीं! "
साल भर जीवन की धारा बंधी हुई, घुटी हुई चलती है। वसंत में जीवन की धारा उफनती, कूलों को डुबोती, झूम कर बहती है, गाती हुई नाचती हुई ।
उन्मत्त और प्रमत्त!
भौरों की गुंजार लगती है, घंटावली बज रही हो, रस की धारा मद जल सी झरती है, कुंजों से आती हुई धीमी - धीमी मादक समीर ऐसी लगती है मानो मदोन्मत्त झूमता हुआ गजराज हो।
चारों ओर लताओं पर भौरों के झुंड के झुंड अंधे मतवाले हो टूटे पड़ते हैं। बिहारी ने बहुत ही सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है - - -
"छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध।
ठौर ठौर झौंरत झंँपत, भौंर भौंर मधु अंध।।"
वसंत के त्योहार - - -
"ऋतुनाम् कुसुमाकरः ।" भगवान कृष्ण ने भी ऋतुओं में अपने को "कुसुमाकर" बताया है। कुसुमाकर, सचमुच यह ऋतु कुसुमों का आकर है। पीले और लाल फूलों की बहार चारों ओर अनुराग को बिखेर देती है।
हजारों वर्ष पूर्व वसंत के त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाये जाते थे।
वसंत का अर्थ है" वसन्यत्र मदनोत्सव।" जिसमें मदनोत्सव बसता है, वह वसंत है। इसी के अन्य नामों में पिकानंद, माधव, पुष्प समय आदि है।
वसंत ऋतु के प्रमुख त्योहार - - - -
इस ऋतु में प्रमुख रूप से वसंतक, कंदर्प पूजा या मदन महोत्सव, पुष्पावचयिका, उदक - क्ष्वेडिका, शाल्मली विनोद, दोला , होली या होलिका, अग्नि उत्सव, ढौंढा, उद्यान यात्रा , सलिल क्रीड़ा आदि मनाए जाते हैं। वसंतक त्यौहार वसंत पंचमी का पुराना नाम है। यह वसंत की अगवानी करने का शुभ दिन है । इस ऋतु का सबसे मद भरा त्यौहार है मदनोत्सव। सारा संस्कृत वांग्मय इस त्यौहार के उन्मादक रस से आपूरित है। फूलों को चुनना भी सविधि संपन्न होता है । चैत्र के प्रारंभ में यह त्योहार राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है । "ओ कुण फुलडा़ बीने जी" कहकर हजारों कुमारियां आज भी राजस्थान में पुष्प चयन करती हुई या फूलों के अभाव के कारण पत्तों को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। अशोक इस ऋतु का प्रधान वृक्ष है जिसके नीचे मन्मथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती थी और जो साभरणा किसी सुंदरी के अलक्तक" रंजीत नुपूरों" से छम-छम की ध्वनि से ध्वनित वाम चरण के कोमल आघात को पाकर ऊपर से नीचे तक लाल लाल पुष्प स्तवकों से भर जाता था। इसी का नाम अशोक दोहद या अशोकोत्तंसिका है । बांस की नाली को रंगीन जल से भर दूसरों पर रंग डालना "उदक क्ष्वेडिका" कहलाती है। शाल्मली के नीचे लुकने - छपने की क्रीड़ा - शाल्मली मूल खेलन या शाल्मली विनोद है। दोला उत्सव ही आगे चलकर होली का त्योहार हो गया होगा। दोला उत्सव में होली का दहन प्रमुख है । इस प्रकार का अग्नि उत्सव संसार के अन्य देशों में भी प्रचलित रहा है।
ढौंढा एक राक्षसी मानी गई है, जिसके दहन का वर्णन आता है। उद्यान क्रीड़ा व सलिल क्रीड़ा भी वसंत की मस्ती भरी उमंग का द्योतक है। हास परिहास के साथ मन की रुद्ध वासनाओं, अचेतन मानस की दमित इच्छाओं या कुंठाओं को भी बाहर निकालने का भी यह त्योहार है जिसमें अनजाने में अश्लील कथन की भी खुली छूट मिल गई है। यह अस्वस्थ चिंतन के प्रतिफल हैं । अबीर व गुलाल के स्थान पर राख व कीचड़ , प्रेम भरे गीतों के स्थान पर अश्लील रासक, चर्चरी चांचर या कबीरा का गायन - हमारी
मानसिक रुग्णता का उद्घोष है, जिसको हम झांझ व झल्लरी के झनकारो, गंभीर घोषों वाद्यों के निर्घोषों और नृत्यों में बजते घुँघरू के स्वरों में छिपा नहीं सकते।
मदन पूजा - - -
वसंत ऋतु का प्राण स्वर है - - - मदन पूजा। मन को मथने वाला, मन में पैदा होने वाला, भगवान कन्दर्प की पूजा ही वसंत ऋतु का कामदेव है जो हमेशा ही देवता रहा है। मद से भरी आंखों वाला कंदर्प, इक्षुदंड जिसका धनुष, माला से गुंजरित प्रत्यंचा वाला, अरविंद, अशोक आम्र मल्लिका और नीलोत्पल के पांच बाण धारण करने वाला पंच शायक या उन्मादन, शोषण, स्तंभन, सम्मोहन और तापन के पांच बाणों वाला, हाथों में आम्र के नव पल्लवों में छिपकर अमोघ शर संधान करने वाला कामदेव ही है। रति प्रीति शक्ति और उज्ज्वला चार पत्नियों का स्वामी और अष्ट भुजाधारी है
यह दर्प से भर देता है इसलिए कंदर्प। भगवान कृष्ण ने अपने को काम बताया है और काम को महिमामंडित किया है - - -
"धर्माविरुद्धो लोकेस्मिन् कामोस्मि भरतर्षभ ।"
'हे भरत श्रेष्ठ! इस लोक में धर्म के अनुकूल काम मैं ही हूँ।'
श्री हर्ष ने कुसुम आयुध पूजा की बहुत मनोरम दृश्य अपने ग्रंथ "रत्नावली" में किया है। जहां मकरंद से भरा उद्यान है, आम्रकानन है, कोयल की गूंज की झंकार है, भ्रमर पंक्ति से गुंजरित पागल सी बहने वाली मलय बयार के लिए झकोरे हैं।
सुंदरियों के मदभरे नृत्य, नृत्य के वेग से केश पाश खुल रहे हैं और पुष्प स्रक बिखर कर नीचे गिर पड़े हैं। नर्तकी उन्मत्त हो, मदमस्त हो अपने स्तन भार से झुकी जा रही है, कंपायमान हो रही है। तभी तो विदूषक का भी मन नाचने और चर्चरी गाने को करने लगा है। वसंत में सभी बेठिकाने हो गए हैं। आज मदनोत्सव है न, कहीं गीतों का स्वर, कहीं नुपुरों की रुनझुन, वस्त्र स्खलित, अस्फुट वाणी - - - सभी तो क्षीबा हैं, किसी को होश नहीं रहता।
"संदेश रासक" में भी चर्चरी, ताल, नाच, खेल, रुनझुन करने वाली किंकिणी से भरे वसंत का वर्णन है।
यही वसंत ऋतु है जहां कुछ भी पुराना नहीं है, सभी नये होते हैं। विद्यापति ने कहा - -
"नव वृन्दावन नव नव तरुगन
नव नव विकसित फूल
नवल वसंत नवल मलयानिल
मातल नव अलिकूल ।"
भारतीय संस्कृति में काम और वसंत त्यौहार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में भी प्रेम और काम का सूक्ष्म रूप वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही सृष्टि व्यापी हो चला है। अब काम देवता अपदेवता नहीं रहा, वह जीवन का देवता बन गया है। भारतीय मनीषा का निष्कर्ष था - - "काम मंगल से मंडित श्रेय"
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