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Sunday, August 22, 2021

रक्षा बंधन में रेशमी डोरी

रक्षा बंधन पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं - - - रेशम की डोरी है में बंधे रिश्ते समय पाकर फिसल भी जाते हैं। लगता है रेशम का प्रयोग इसी लिए किया गया है। कीड़ों को मारकर उनके कपड़े बनाना और उनकी सुंदर डोरी को भाई बहन के रिश्तों से जोड़ने में संवेदना को रखने का आवरण लग रहा है। वहाँ झूठे प्रेम को थोपना लग रहा है। रेशम का स्वभाव है फिसलन। मनुष्य स्वभाव में भी तो चंचलता है, स्थिरता नहीं। रक्षा बंधन रक्षा से जुड़ा है। एक भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। जैसे एक पिता अपनी माँ, पुत्री, पत्नी और दादी-नानी की रक्षा करता है। पुरुषों के लिए सामाजिक दबाव है कि वे अपने परिवार की रक्षा स्वयं करें। नवजागरण की लहर से ही समाज परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है और पुरुषत्व और स्त्रीत्व में भी परिवर्तन हुआ है। उत्तर आधुनिकता के इस युग में बहुत कुछ बदलाव देखने में आ रहे हैं। स्त्रियों की अपनेअस्तित्व, अपनी निजता, अपना पैसा, अपना परिवार और अपने ही स्वार्थ के लिए चिंता है जो समाज के मानसिक बंधन के आंकड़ों को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विदेशों में ये निजीकरण बहुत पहले से ही चल रहा है। भावनात्मक जुड़ाव अर्थ पर निर्भर करता है। अर्थपरक सोच ने भारत के मनुष्यों के भावों मूल्यों और आदर्शों पर गहरी चोट की है। भाई बहन के रिश्तों में मधुरता बनी रहे। रिश्तों में मिठास रहे आज इस बात की आवश्यकता है। मेरी यह कविता इसी भाव को व्यक्त करती है - -

Monday, August 16, 2021

विज्ञान पर अंधविश्वास कैसे भारी?

विज्ञान पर भारी अंधविश्वास कैसे हो कोरोना वैरियर्स पर विश्वास चिंतन पढ़कर एकबार फिर पुराने दकियानूसी भारत की ओर ध्यान चला गया। झाड़ फूंक, नीम हकीम, जादू-टोना और चमत्कारों से बीमारियों को भगाने का चलन अशिक्षित और निरक्षर लोगों में आदि काल से चला आ रहा है जो शिक्षितों और पढ़े-लिखे को भी आकर्षित करने लगा। विज्ञान लोगों की बुद्धि और तर्क से जुड़ा है जबकि अंधविश्वास तो श्रद्धा और आस्था से जुड़ा है। आस्था की ताकत विज्ञान को नकारती है। निराशा की चरम परिणति ही तंत्र मंत्र जप उपवास पूजा-अर्चना होम यज्ञ आदि विभिन्न राहों को जन्म देते हैं। कोरोना महामारी में फिर एक बार निराशा के भाव अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है। कोरोना का रोगी दहशत में जी रहा है, जहां उसे सिर्फ मृत्यु के खुले दरवाजे ही दिखाई दे रहे हैं। विज्ञान वहां लोगों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। दवाईयां नहीं है। सरकारी व्यवस्था लचर पचर है। स्वास्थ्य व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। कोई अस्पताल नहीं जाना चाहता क्योंकि वहां तो संक्रमण फैला हुआ है तो कोरोना ठीक कैसे होगा। लाखों का बिल बनाया जा रहा है। झाड़ फूंक में पैसा कम लगता है। एक-दो ठीक हो गए तो बस लोगों की भीड़ उधर ही हो लेती है। पढे़ लिखे भी इंसान हैं। उन्हें लगता है कि लोग गलत नहीं है, फायदा हुआ है, तभी लोग जाते हैं। मनुष्य स्वभाव को चमत्कार अधिक आकर्षित करते हैं। कोरोना की आरती, कोरोना के लिए यज्ञ, कोरोना माई की कहानी आदि होने लगे हैं। कार्टून और कविताएं भी बन रही हैं। समाज के दो पहलू हैं विज्ञान और अंधविश्वास। दोनों में ही समाज जीना सीखने लगता है। - डॉ वसुंधरा मिश्र

पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का हिंदी सरोकार

 पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का हिंदी सरोकार - - - डॉ. वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात आते ही आंँखों के समक्ष एक विशाल कैनवास उभर कर आता है, जहाँ उत्तर प्रदेश और बंगाल की समवेत छवि तो उभरती ही है साथ ही एक मेधावी छात्र, सुसंस्कृत पुत्र,पांडित्य के गुणों से भरपूर एक संवेदनशील और सजग चेहरा उपस्थित हो जाता है। साहित्य लेखक की कलम से निकले शब्दों का वह संदेश है जो व्यष्टिगत होकर समष्टिगत रूप ले लेता है। उसकी सृजनशीलता नये प्रतिमानों को स्थापित करने और नये युग के लिए नये आयाम रचता है। 

2018 में भारत सरकार द्वारा हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र को 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। मूर्ति देवी पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ, महात्मा गांधी सम्मान, विद्या निवास मिश्र सम्मान, साहित्य भूषण से सम्मानित डॉ. मिश्र का लेखन बलिया का मिजाज, पृष्ठभूमि, गांँवों के स्वाभिमान, मूल्यों और मानस को निकट से समझने वाला है।  

हिंदी के शिक्षक, साहित्यकार और समीक्षक डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र का जन्म सन् 1936 को बलिहार, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ। निबंध, पत्रकारिता जीवनी संस्मरण संपादन अनुवाद आदि विविध विधाओं में लिखा। 

हिंदी भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम साहित्य का वह स्वर्णाक्षर पृष्ठ है जिनके लिए शब्दकोश के सारे विशेषण भी कम है।संवेदनशील, मूल्य परक और सर्जनात्मक ऊँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरागत 'मनीषा' के संवाहक डॉ. मिश्र सबसे पहले एक बड़े इंसान हैं। कलकत्ता के बंगवासी कॉलेज में अध्यापक रहे उनके साहित्यिक अवदान की महत्ता और गुणवत्ता हिंदी शिक्षा जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। उम्र के अंतिम पड़ाव की अवस्था में भी साहित्य और समाज के लिए जो व्यक्ति सोचता है कि वह निश्चित ही अपनी माटी को प्रेम करने वाला है।

मैंने जब उनसे पूछा कि आपकी तबियत कैसी है? तो कहने लगे 'अब तो बूढ़ा हो गया हूँ।' सच है कि शरीर से तो बुढ़ापा है लेकिन आंँखों की चमक अभी भी गंँवई खुश्बू से ओतप्रोत है। साहित्यकार की सृजनात्मक शक्ति जब तक सक्रिय है, वह युवा ऊर्जा से भरपूर है। तभी तो एक और नयी पुस्तक 'सांँझ की जम्हाई और सर्जनशील उजास' जिसका प्रकाशन लेखक के जन्मदिन के दिन (5,नवंबर, 2017) पर हुआ, मुझे देते हुए बहुत ही उत्साहित लगे। वही पान की लाली से लसित दोनों ओष्ठ और मुढ्ढे पर आराम से बैठ कर फोन की घंटी उठाना। कहीं कोई शिथिलता नहीं,लगा उस छोटे- से कमरे से पूरे देश का संबंध है, भारतीय संस्कृति की गूँज सुनाई पड़ रही थीं।

मैंने कहा कि कलकत्ता में तो कोई भी ऐसी साहित्यिक संस्था नहीं है जिसने आपको नहीं बुलाया होगा। ख़ास कर भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद, अपनी भाषा, कुमार सभा पुस्तकालय, मित्र परिषद्,बांधाघाट हनुमान पुस्तकालय, हिंदी बंग परिषद्, राम मंदिर आदि असंख्य गैर सरकारी संस्थाओं और सरकारी संस्थाओं के साथ- साथ सरकारी बैंकों में आपको बड़े ही सम्मान के साथ विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित करते रहे हैं।

मूर्ति देवी पुरस्कार से सम्मानित विद्या संस्कारी और विद्वता के पथ पर चलने वाले  हिंदी जगत में आपकी परंपरा के विद्वानों में आपका विशिष्ट स्थान है। 

केवल एक संस्था 'साउथ बेलेघाटा वेलफेयर सोसायटी' के संस्थापक अध्यक्ष रहे। जिस समय देश में बावरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी और उस समय बंगाल में हिंदू - मुस्लिम दोनों ही शरणार्थी बड़ी संख्या में बंगाल में शरण के लिए आए, उस दुख की घड़ी में डॉ मिश्र ने दोनों के लिए ही शिविर का आयोजन किया।'जनसत्ता' ने 'घायल संवेदना का दर्द' शीर्षक से पूरे पृष्ठ का कवरेज दिया जिसे कवर करने के लिए 'जनसत्ता' की पूरी टीम आई थी जो बहुत बड़ी बात थी । 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि डॉ. मिश्र समाज और समाज की भाषा से सरोकार रखने वाले लेखक रहे हैं। वे रिक्शे वाले से लेकर भंगी और एक जून रोटी खाने वाले सभी से बात करते हैं, जाड़े में ठिठुरने वालों के लिए सोचते हैं। कोलकाता के धनाढ्य लोगों से कहकर उनके लिए कंबल आदि का इंतजाम भी करवाते हैं। साथ ही पढ़ने के लिए, नौकरी के लिए लोगों की यथासंभव मदद भी करते हैं। आज भी हनुमान पुस्तकालय की असंख्य मूल्यवान पुस्तकों के पुनरुद्धार लिए आपके मन को मैंने उद्वेलित होते हुए देखा। इस पुरानी संस्था को बचाने के लिए आपने तुलाराम जालान जी को भी पत्र लिखा था। शिक्षा और साहित्य को समृद्ध करने के साथ - साथ आप अपने जीवन में सदैव ईमानदारी और न्याय का ही पक्ष लेते रहे। आप किसी भी संस्था या संगठन के विचारों से प्रभावित नहीं रहे बल्कि जिस किसी भी मंच ने आपको आमंत्रित किया, वहाँ अपने विचारों और सिद्धातों पर ही अडिग रहे। 

हिंदी की विशिष्ट संस्था भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से लेखक का जुड़ाव तब से था जब उसकी शुरुआत केमक स्ट्रीट में स्थित एक भाड़े के घर से हुई थी। सीताराम सेकसरिया जी  ने अपने स्नेही विद्वान कृष्ण बिहारी मिश्र जी को बुलाया और परिषद् के साथ जुड़ने का वचन लिया। सीताराम सेकसरिया जी और  भागीरथ कानोड़िया जी इस संस्थान के कर्णधार रहे और दोनों के ही भरोसे पर खरे उतरे डॉ मिश्र। लेखक के गुरु आचार्य डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी सीताराम सेकसरिया जी के प्रति आदर भाव रखते थे। भारतीय भाषा परिषद्(1975 में स्थापित) से लेखक का आदिकाल से नाता रहा और सभी प्रमुख साहित्यिक आयोजनों में बतौर विशिष्ट अतिथि या अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित भी होते रहे। बीच में संबंध टूटे भी लेकिन सीताराम सेकसरिया के ज्येष्ठ पुत्र अशोक सेकसरिया के कारण फिर जुड़े।यहाँ तक कि डॉ. मिश्र ने इसी संस्था के कर्मचारियों के साथ होने वाली अनीति और दुर्निती के लिए आंदोलन में भी योगदान दिया। वे सहृदयता की मूर्ति हैं उन्होंने कर्मचारियों के हितों के पक्ष में फैसला करवाया। इसी तरह कहीं भी दुर्निती दिखाई पड़ने पर विरोध प्रकट करने में भी पीछे नहीं हटते।

मंच चाहे किसी भी विचारधारा का हो, जलेस या राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कोई भी संस्था यदि आमंत्रित करती है तो डॉ. मिश्र पूरी निष्ठा के साथ जाते हैं और अपनी बात रखते हैं। वे साहित्यकार के रूप में अपनी बात कहते हैं।

पत्रकारिता पर उनका शोध ग्रंथ 'हिंदी पत्रकारिता:जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि' हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में इस पुस्तक का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में होता रहा है। इसके अतिरिक्त' पत्रकारिता :इतिहास और प्रश्न ',' गणेश शंकर विद्यार्थी', ललित निबंध संग्रह 'बेहया का जंगल' , 'मकान उठ रहे हैं' , 'आंगन की तलाश' , 'अराजक उल्लास' , 'नेह के नाते अनेक' ,' हिंदी साहित्य: बंगीय भूमिका' आदि विशिष्ट पुस्तकें लेखक की हिंदी सेवा का प्रमाण है। 

एक और कालजयी ग्रंथ 'कल्पतरु की उत्सव लीला 'की रचना लेखक की अमूल्य देन है जो समाज की नब्ज को समझते हुए साहित्य में एक नया अध्याय है। हिंदी साहित्य में रामकृष्ण परमहंस के विचारों और चिंतन की आवश्यकता को समय की मांग समझते हुए लेखक ने बंगाल में रहकर परमहंस पर लिखने का साहस किया। यह खतरा एक संवेदनशील और सजग साहित्यकार ही उठा सकता है। आधुनिकता की आंँधी में भारत की युवा पीढ़ी के समक्ष परमहंस के अध्यात्म को प्रतिष्ठित कर समाज को अपनी संस्कृति और अध्यात्म के संरक्षण के लिए संदेश दिया है। इसी ग्रंथ को भारतीय ज्ञानपीठ ने सर्वोच्च पुरस्कार 'मूर्ति देवी' से सम्मानित किया। पुरस्कार समारोह का आयोजन भारतीय भाषा परिषद् के सभागार में हुआ जो लेखक के चाहने वालों से भरा हुआ था।

हरिवंश जी (सांसद) प्रमुख संपादक प्रभात खबर ने अपने लेख में लिखा था , 'डॉ. मिश्र से उनका परिचय उनके ललित निबंध संग्रह 'बेहया का जंगल' के माध्यम से हुआ जो सर्जनात्मक ऊंँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरा गत मनीषा की झलक है। हिंदी पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा, मूल्य, त्याग और तेज को सामने लाने का काम जिस तरह से कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने किया और कर रहे हैं, वैसा कोई दूसरा नाम हिंदी विद्वानों में दिखाई नहीं देता, पर उनके इस योगदान का महत्व तो बाद में जाना, समझा या आत्मसात कर पाया। '

हिंदी से संबंधित किसी भी विषय पर आपका वक्तव्य हिंदी के प्रकांड विद्वानों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, आचार्य चंद्र बलि पांडेय, डॉ. विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों के सूत्रों को जोड़ता हुआ लगता है। आचार्य डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य भला पीछे कैसे रह सकते हैं? डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ मूल्यों, आदर्शों और सत्यों पर टिका है, यही कारण है कि जब वे किसी संस्थान में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हैं तो उसमें लेखक का गंभीर अध्ययन , चिंतन झलकता है।

भारतीय संस्कृति संसद संस्था, कोलकाता ने' कल्पतरु की उत्सव लीला' ग्रंथ पर 'मेरी सृष्टि मेरी दृष्टि' कार्यक्रम का आयोजन किया जो उनकी रचनाशीलता और चिंतन पर आधारित था। लगभग दो घंटे तक आपका वक्तव्य लोग सुनते रहे। तन और मन से संवेदनशील लेखक का व्यक्तित्व एक अभिभावक जैसा है।उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान का हिंदी साहित्य जगत और समाज डॉ. मिश्र को अपने ही परिवार का समझता है और उनके पास उनके घर में मिल कर अपना सौभाग्य समझते हैं। एक बार कवि और लेखक अशोक वाजपेयी जी की पत्नी कोलकाता आईं और आपसे मिल कर गईं तो अपने छोटे घर के प्रति कहीं-न-कहीं आपको लगा कि उन्हें कष्ट होगा, परंतु यह लेखक का सदा से भ्रम रहा है कि मेरा छोटा कमरा कहीं किसी को परेशान न करे।परंतु आज जिन्होंने भी डॉ. मिश्र के साहित्यिक कृतित्व और व्यक्तित्व से सरोकार रखा है, उन्हें इस बात का पता है कि यह छोटा - सा कमरा उनके जीवन में क्या महत्व रखता है। यह लेखक के लिए विद्या मंदिर है, आपके गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी भी इस कमरे में रहे हैं, अज्ञेय जी, ब.व.कारंत आदि विद्वानों का आगमन होता रहा है।इस कमरे का वातावरण विशुद्ध साहित्यिक और अध्यात्म की सुरभि से सुरभित है। भारतीय मनीषा रचनाकारों को "कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू" मानती है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही है। रचनाकार ऋषि-मुनियों मुनियों की परंपरा का निर्वहन करने वाला स्वयंभू सदृश होता है। 


साहित्य सेवी भाषाई संस्कारों से युक्त डॉ. मिश्र गुरु परंपरा को निभाने वाले अपने विद्या कर्म के लिए समर्पित हैं। एसी रूम में गांँव की सोंधी खुश्बू नहीं आती, महानगर में रहकर गांँव को सहेजने का दुष्कर कार्य बहुत कम लोग ही कर पाते हैं, डॉ मिश्र ने इसका पुरजोर प्रयास किया।


कोलकाता में भोजपुरी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में राजनेता और गायक मनोज तिवारी के आगमन पर आपकी उपस्थिति उस कार्यक्रम की शोभा बनी। मुझे स्मरण आता है राजस्थान ब्राह्मण संघ के कार्यक्रम' परंपराओं में आस्था' में डॉ. मिश्र मेरे कहने से आए थे और वह आशीर्वाद ही था।आपके कर - कमलों से लोकार्पण करवाने के लिए  संस्था अपने को गौरवान्वित समझती है। 'परंपराओं में आस्था' पुस्तक मेरे और परम विदूषी दुर्गा व्यास के संपादन में लिखी गई थी, समाज का बड़ा कार्यक्रम था आपकी उपस्थिति मात्र से ही कोलकाता का हिंदी समाज स्वयं को भाग्यशाली मानता है।

यह भी सच्चाई है कि डॉ. मिश्र बड़े ही नाजुक प्रकृति के भी हैं, जब तक तबियत ठीक नहीं समझते, संस्था के आमंत्रण को स्वीकृति नहीं देते।

कोलकाता के हिंदी साहित्य जगत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रबुद्ध विद्वानों में आचार्य कल्याण मल लोढा और डॉ विष्णुकांत शास्त्री जैसे प्रकांड पंडितों का भरपूर हाथ रहा है, लेकिन डॉ. मिश्र एक कॉलेज में अध्यापन करते हुए भी साहित्य साधना में एक साधक की तरह रत रहे। साहित्यिक यात्राओं से भी कतराते रहे, कोलकाता के सेठ- साहूकारों से भी दूर रहे। यह अलग बात है कि आपकी विद्वता और ईमानदारी ने कोलकाता के गरीब से लेकर अमीर तक के लोगों के दिल जीते हैं। उसी का परिणाम है कि आपको सभी हिंदी संस्थाएँ आमंत्रित करने में अपना सौभाग्य समझती हैं। कोलकाता का हिंदी जगत डॉ. मिश्र के साहित्यिक व्यक्तित्व से लाभान्वित है। हिंदी के विद्यार्थियों को कभी भी हिंदी उच्च शिक्षा या पीएचडी में कोई असुविधा होती है तो वे सलाह लेते हैं, काम रुकता नहीं है।

  भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता की हिंदी की एक और संस्था है जो भारतीय संस्कृति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने तथा साहित्य -संगीत - कला की त्रिवेणी को विकसित करने के लिए अनवरत सक्रिय कार्य कर रही है। इसका प्रमुख कारण है कि यहाँ विगत साठ वर्षों से मूर्धन्य साहित्यकारों, कला,  संगीत और संस्कृति के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता रहा है। 8 मई, 1955 में इस संस्था की स्थापना स्वनामधन्य श्री माधोदासजी, श्री रामनिवास ढंढारिया, श्री हरि प्रसाद माहेश्वरी, श्री गोकुल दासजी जैसे महापुरुषों के सद्प्रयास से हुआ। बंगाल के विश्रुत विद्वान एवं मूर्धन्य इतिहास विद् डॉ. कालीदास जी नाग संस्था के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। देश के वरिष्ठ एवं विशिष्ट साहित्यकार, विचारक, समीक्षक, कवि सभी भारतीय संस्कृति संसद के आमंत्रण को सहर्ष एवं सोत्साह स्वीकार करते थे। डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने संसद के आमंत्रण पर लिखा था कि मेरी नई उपलब्धि का सम्मान जहाँ होना चाहिए था, वहाँ तो मुझे अँगूठा दिखाया जा रहा था और कलकत्ता में हिंदी की एक साहित्यिक संस्था मेरा सम्मान करना चाहती थी।धर्म तल्ला में स्थित यह संस्था  काव्य - कथा - कला - संगीत-संस्कृति आदि के महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित करती रही है। 

  वर्तमान समय में इस संस्था का संरक्षण डॉ. विट्ठल दास मूँधड़ा जी कर रहे हैं। पं. जसराज जी और डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र जी का सम्मान एक साथ इसी संस्था ने किया।भारत का कोई भी ऐसा विद्वान नहीं है जिसे संसद ने आमंत्रित न किया हो। हिंदी के प्रचार - प्रसार के लिए संसद निरंतर कार्य शील है। डॉ. मिश्र कोलकाता के वरिष्ठ साहित्यकार हैं जिनका रचना - संसार बड़ा फलक लिए हुए है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र की हार्दिक इच्छा थी कि डॉ. मिश्र रामकृष्ण परमहंस पर कुछ लिखें। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने यह इच्छा उस समय व्यक्त की जब कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ वे माँ के दर्शन के लिए दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के उसी प्रांगण में थे, जहांँ माँ भवतारिणी का विशाल परिसर था। संभवतः डॉ. विद्यनिवास मिश्र माध्यम बने थे। डॉ. मिश्र ने बंगाल के परमहंस की बतकही शैली को बंगाल की संस्कृति के रंग में नहाये बलिया की माटी से बने अपनी बोली और भाषा को बचाने का भगीरथ प्रयास 'कल्पतरु की उत्सव लीला' के बहाने किया जो आपके वृद्धावस्था की ऊर्जा का द्योतक है।

डॉ. मिश्र से मैंने कहा आपने जो लिखा वह अवकाश प्राप्ति के पश्चात लिखा, पहले लिखते तो आपकी पुस्तकों की संख्या बढ़ जाती। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि  समझती हो न वसुंधरा, ठाकुर की कृपा हुई है उसी माँ ने आदेश दिया है, तभी लिखा गया। जो लिख गया उसी माँ की कृपा है ...... वही लिखवाती है। एक जगह वे कहते हैं, 'कोयल अपनी बोली नहीं भूलती चाहे वह महानगर में ही क्यों न रहती हो।' मुझे लगता है कि डॉ. मिश्र की यही गंँवई संवेदना आधुनिक युग जीवन जीने वालों के लिए ऐसी सीख  है जो हमें मनुष्य बनाने की ओर ले जाती है।पद्मश्री से सम्मानित  डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र आज भी हिंदी भाषा की संवेदना के प्रति संकल्पबद्ध हैं। 

रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल - श्रृंखला

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा हैकविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है। । कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाता है। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं - - - कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है। फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं।रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका वर्णन आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है - - 'अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन' अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे 'आलोकपियासी '(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं। अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत - प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं। प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है। अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा? राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है - - 'वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि' राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है। रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है - - -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5)

Monday, August 9, 2021

रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूलों की श्रृंखला - -

रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूलों की श्रृंखला - - - प्रकृति हमें विभिन्न रंगों के फल - फूल, वनस्पतियाँ, लता और गुल्म देती है जिससे मनुष्य का मन प्रफुल्लित होता है। तरह तरह के रूप, वर्ण, गंध का जो वैचित्र्य मिलता है उनमें फूलों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। इसी कारण सभी कवियों या गीतकारों ने अपने काव्य और गीतों में फूलों का प्रयोग किया है। कल्पना के पंखों पर सवार कवि के भावों में प्रकृति किसी - न- किसी रूप में विद्यमान रहती है। कहा गया है - जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। कवि को खेतों में सरसों के फूल नीले दिगंत में अग्नि की तरह दिखते हैं, वही फूल अचानक आते हैं और समस्त खेत को भर देते हैं। उनका उज्जवल पीत वर्ण वसंत के सौरभ की ज्वाला को जगाता है, नीले आकाश में फूलों की अग्नि लगने का अहसास देती है। इस प्रकार की उपमा कवि तभी दे सकता है, जब वह सरसों के फूलों के विषय में विज्ञान, भाषा और धर्म आदि से संबंधित समस्त जानकारी रखता हो। बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध नोबल पुरस्कार से सम्मानित रवीन्द्र नाथ टैगोर बहुविध प्रतिभाओं से सुशोभित थे।उनके अढ़ाई हजार गीतों में लगभग सरसठ प्रकार के विभिन्न उद्भिदों और फूलों का उल्लेख छ सौ सत्तासी बार हुआ है। इनमें सुंदर, सुगंधित, सदाबहार फूल तो हैं ही, साथ ही अवहेलित ग्रामीण फूल भी हैं। अर्वी या कचालू के फूल भी उनके साहित्य के विषय हैं। वे वाल्मीकि प्रतिभा के चतुर्थ दृश्य में कहते हैं - - 'चुप करके इस कचुवन में छिपे रहना।' सहिजन, वनमल्लिका, कलूद, ताड़, दूब, घास, वनजुँइ भी उनके लिए प्रिय हैं, विदेशी फूलों को कवि ने देशी नाम दिया, वहीं कुछ फूलों का नामकरण भी किया जैसे मधुमंजरी, नीलमणि, हिमझुरी, ताराझरा, सौरभी, वासंती, वनपुलक आदि। रवीन्द्र नाथ के गानों में साधारण फूलों के विषय में ही बार बार वर्णन आया है। मौलसिरी 69 बार, कमल 62, मालती 38 बार, हरसिंगार 32 बार, माधवी और कुसुम 31 बार, जूही 28 बार, कदम्ब 25 बार, अशोक, किंशुक 22 बार प्रयोग किए गए हैं, जो हमें विस्मित कर देते हैं। कवि रवीन्द्रनाथ का पुष्प प्रेम का जन्म निश्चित रूप से उनके बाल्यावस्था से ही रहा है। शांतिनिकेतन के निर्माण के दौरान अपने हाथों से पुष्प लगाना उनका फूलों के प्रति अगाध प्रेम का ही परिचायक है। इसका प्रमाण उनकी पुत्रवधू प्रतिमा देवी ने शांतिनिकेतन, उत्तरायण में लिखा है कि उन्हें पेड़ - पौधे अत्यंत प्रिय थे। बगीचे में कौन - सा पौधा कहाँ लगाना है और उसे किस प्रकार यत्न से बढ़ाना है, उस पेड़ पर कौन-सी लता सुशोभित होगी, वे बताते थे। कवि अनुसंधित्सु मन लेकर पुष्प ऐश्वर्य को जानने के लिए उत्सुक है और वे पुष्प परिवार के साथ परिचय करते हैं - - 'ऐ मालती लता दोले पियाल तरुर कोले पूब हाओयाते ।' अर्थात पूर्वी हवा से वृक्ष की गोद में मालती की लता हिलडुल रही है। फूलों से उनका यही घनिष्ठ संबंध उनके द्वारा दी गई फूलों की उपमाएंँ, चित्र कल्पों की जो गंभीरता मिलती है, वैसा अन्यत्र विरल है। रवीन्द्र नाथ का पुष्प प्रेम वास्तव में उनकी सचेतनता का प्रकृष्ट प्रमाण है क्योंकि उनके पुत्र रथींद्र नाथ को कृषिविज्ञान की विशेष शिक्षा के लिए उस समय अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र भेजा गया था। 1921-22 में पिता के निर्देशानुसार उन्होंने शांतिनिकेतन - श्रीनिकेतन का कार्य आरंभ किया। उस समय वह स्थान वृक्ष और फूलों से रहित था। कवि रवीन्द्रनाथ अंत तक बगीचे की चिंता करते थे। कवि फूल के धर्म को जानते थे। तभी कहते हैं 'बादल दिनेर प्रथम कदम फुल 'क्योंकि आज जैसे वह चकित चमक का प्रकाश लिए है, हो सकता है कल अचानक ही एक साथ विदाई ले ले। वर्षा काल के दिनों का प्रथम कदंब फूल है, आज मिल गया क्या पता कल दे पाओगे कि नहीं /क्या पता कहीं तुम्हारी फूलों की डाल रिक्त न हो जाए। छातिम यानी सात्विन पेड़ ( Devil' s tree) तो शांतिनिकेतन के प्राण केंद्र का स्पंदन है। बहुत से ऐसे ही उद्भिद और फूलों की गाथा इस श्रृंखला में आप पढ़ सकेंगे। इसका श्रेय पुस्तक 'रवीन्द्र संगीते उद्भिद ओ फूल' बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक डॉ. देवीप्रसाद मुखोपाध्याय को जाता है जिन्होंने मुझे हिंदी अनुवाद करने के लिए सुअवसर दिया। 207 पृष्ठों पुस्तक के कुछ हिस्सों को आप पाठकों के सम्मुख रखने का प्रयास करूँगी - - - श्रृंखला 1-कनकचंपा रवीन्द्र नाथ का एक बहुत ही प्रचलित गीत - - - ' तुमि आमाय डेकेछिले छुटिर निमंत्रणे' (प्रेम - 288) इस गीत के अंतरे में है - - - 'चाइल रवि शेष चाओया तार कनकचांँपार वने ' कनक चंपा पेड़ को देखने से पता चलता है कि इसके ऊँचे कद और प्रशस्त पत्तों में सूर्य किरणों की रश्मियाँ बहुत देर तक रह जाती हैं।

Sunday, August 8, 2021

टिप्पणी :सावन में शिव को दूध चढ़ाना

गौ हत्या पाप है तो गाय का दूध का नाली में जाना महापाप है विषय पर वरिष्ठ संपादक विश्वंभर नेवर ने समाज की झूठी धार्मिक मान्यताओं पर बहुत अच्छा सवाल उठाया है। शिव जी पर दूध चढ़ाना अच्छा है लेकिन प्रतीकात्मक रूप से चढ़ाया जाए और दूध के पैकेट वहाँ गरीब बच्चों को बाँट दिया जाय तो मुझे लगता है इसके लिए कोई आपत्ति नहीं है। दूध का अधिकाधिक प्रयोग समाज का उच्च वर्ग ही करता है। मैंने तो कभी नहीं सुना कि मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग ने मनो दूध चढ़ाया हो। उच्च वर्ग की नकल में सब बर्बाद हो रहे हैं। वहाँ धर्म नहीं, कर्म और कर्मकांड का बोलबाला है। आपने श्रावन के महीने में बहुत ही सही विषय चुना इसके लिए बधाई और शुभकामनाएं 🙏 डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता ।

मंदिर जाने के बहाने

मंदिर जाने के बहाने-डॉ वसुंधरा मिश्र सच में, आप सभी बहनों के साथ आईडियल ग्रेंड की महिलाओं के साथ इस छोटे से ट्रिप में दिनांक 5.2.21 को बहुत आनंद आया। सुबह-सुबह सभी उत्साह में भरे हुए थे । चेहरे से खुशी झलक रही थी। सुबह के साथ ही सूर्य किरणों की प्रखरता भी बढ़ रही थी। अरे 9.30 बज रहे हैं अभी तक ड्राइवर नहीं आया, प्रेम बोली अरे लक्ष्मी फोन करो। किया है मेरे पति वहीं गेट पर ही खड़े हैं। उनकी बात हुई है वह फोरशोर रोड पर पेट्रोल भरवा रहा है। सब धीरे-धीरे वहाँ रखी कुर्सियों में धस कर बैठ गई। ललिता जी के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। जैन मंदिर में डेढ़ बजे भोजन का बोला हुआ है। फोटो सेशन शुरू हो गया। बड़ा मजा आ रहा था सबके सामान एक कुर्सी पर और सब एक फ्रेम में घुसने की कोशिश में। मैंने और लक्ष्मी ने एक सेल्फी ले ही ली। सबके साथ भी एक फोटो। मुस्कान तो हरेक के चेहरे पर जमी हुई थी। इंतजार - - - - तभी 10.15 पर लक्ष्मी ने कहा कि मेरे साजन गेट पर ड्राइवर की राह देख रहे हैं और अभी फोन आया है कि पेट्रोल पंप पर आज बहुत लंबी लाइन है। खैर इंतजार खत्म हुआ। एक लंबी सी 17 सीटर ट्रेवलर हाजिर। उसके दरवाजे खुलते ही साठ साल की नवयुवतियों की धक्का मुक्की। कुछ मनचले पतियों का भी मन डोलने लगा। पर हाय ये पिकनिक तो केवल गृहस्वामिनी के लिए थी। सुलोचना की जिद थी कि वो युवा ड्राइवर के पीछेवाली सीट पर सुरक्षित रहेगी। लक्ष्मी के पास तो पूरी लक्ष्मी और 17 देवियों को ले जाने की जिम्मेदारी थी। वो एक बड़ा स्टूल भी लेकर गई थी । तीन चार बड़े झोले जिनमें नमकीन आदि खाने के सामान भरे हुए थे, कुछ शॉल आदि भी। किसी को अगर अधिक ठंड लग गई तो? लक्ष्मी तो व्यवस्थापक थी। ड्रेस भी पुरुषों की पहनी थी। सिर पर हैट और पैर में जूते। आखिर एक पुरुष का अहसास तो हो। चलो अच्छा हुआ कि 20 की जगह 17 ही आईं नहीं तो पुष्पा जी सोती कैसे? नहीं तो आते-जाते तीन सीटों को कैसे हथियातीं। आखिर मात्र 65-70 के बीच की हैं। अच्छा ही हुआ। मजा आया जब न्यू अलिपुर में गुप्ता ब्रदर्स ढूंढने निकले। पतियों के साथ जाने का मजा ही कुछ और है। वे जब घूमाने ले जाते हैं तो प्यारी सजनियां के पैरों को जमीन पर भी उतारने नहीं देते। दौड़ दौड़ कर सब कुछ गाड़ी की सीट पर ही ला कर देते हैं। कितना सुख। अलादीन के चिराग की तरह पति के गालों को रगड़ते ही सब कुछ हाजिर। एक गुप्ता ब्रदर्स खोजने में बीस मिनट लगे । फिर चलते चलते सांस फूल गई। रास्ते के उस पार - - चलो दोसा इडली पाव भाजी और मजेदार चाय ने सारी बातों को भुला दिया।साथ में कचौडियां और गुलाब पंखुड़ियों वाले संदेश भी सबके लिए बांध लिए गए। महिलाएं खाएं चाहे न खाएं, सब कुछ रहना चाहिए। धीरे धीरे मंजु व्यास , पुष्पा राठी, फोगला, पुष्पा बोथरा, राधा, शारदा, ललिता जी, सुलोचना, प्रेम गुप्ता, प्रेम सेठिया, वीणा, पुष्पा जैन, राजकुमारी, और मैं यानि वसुंधरा मिश्र, सभी ने अपने-अपने गीत संगीत चालू कर दिए। गणेशजी की स्तुति से लेकर णमोकार मंत्र आदि सभी देवी-देवताओं को याद किया। स्त्रियाँ सच में संस्कृति की विरासत होती हैं। अपनी भाषा के द्वारा वे पूरे विश्व से जुड़ जाती हैं। भारतीय स्त्री के संस्कार उसकी नस नस में घुलेमिले रहते हैं। और हम सभी तो दादी-नानी वर्ग के थे, सास बहू पोते-पोतियों से भरे घर को संवारने वालीं। परिवार की बागडोर संभालने वालीं। सच में जिम्मेदारियों को संभालते संभालते अब थोड़ी छुट्टी मिली। सभी घूमने निकल पड़ीं। वहां भी हिसाब-किताब करते हुए। यह भी एक व्यवस्थित तरीके से जीना और जीने की कला है। एक बहुत मजे की बात है कि भारतीय स्त्रियों को खुशी बहुत ही कम बजट और कम से कम सुविधाओं में भी अधिक से अधिक मिल जाती है। हमारे मंदिर और उनमें विराजमान कोई भी देवी देवता सबके होते हैं क्योंकि उनमें भी रिश्तेदारी होती है। जिस प्रकार हमारा देश अनेकता में एकता का संदेश देता है वैसे ही हमारे देवी-देवताओं में भी एकता है। हम अलग अलग धर्म और परंपराओं को मानने वाले थे लेकिन दिगंबर जैन मंदिर नमिनाथ जी के मंदिर में जा कर सबने पूजा अर्चना की। जैन धर्म और बौद्ध धर्म भारत की श्रमण संस्कृतियों का ही एक रूप है। सनातन धर्म के गर्भ से ही उत्पन्न हुए हैं। यह जोका में शारदा गार्डन में स्थित है। जैन धर्म में णमोकार मंत्र का जप करना महत्वपूर्ण है। गुरु की महिमा का जितना बखान किया जाय हमारे लिए कम है। कबीर तुलसी मीरा रैदास जायसी आदि संतों का देश है - - गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पाय बलिहारी गुरु आपणे गोविंद दिओ बताय। स्वामीनाथ जी का मंदिर तो दर्शनीय स्थलों में से एक है। स्वामीनाथ महाराज और अखंडानंद महाराज के अनुयायियों का यह मंदिर अक्षर धाम के नाम से जाना जाता है। यह सत्मार्ग का पथ है। गुजरात से संत स्वामीनाथ ने परोपकार और अध्यात्म को पूरे विश्व में प्रसारित किया। राजप्रासाद की तरह भव्य मंदिर और उसकी नक्काशी ने मन को मोहित कर दिया। ऐसे ही देश और विदेशों में 1150 मंदिर बनाए जा चुके हैं। ये मंदिर स्थापत्य कला और संस्कृति के अनूठे नमूने हैं। यह कोलकाता शहर से बाहर डायमंड हार्बर जोका में स्थित है। हमलोगों ने बहुत सारे गेम खेले। बुढापा और जवानी वाले गेम में खूब मज़ा आया। कोई सिर पर रखी थाली में से गोटियाँ चुन रही थीं जिसका भाग्य अच्छा था वे प्रथम द्वितीय तृतीय आईं और मजे की बात है बिना किसी प्राइज़ के। हां हमलोग इतने खुश थे कि हमारी एक बहन ने वहां की एक टूटी कुर्सी को पहचान लिया। अच्छा हुआ वे बच गईं और दूसरे को बचने में मदद कीं। फोगला ने तो इतने फोटो लिए कि कुछ बहनों के कुछ पोज़ तो रह ही गए। भोजन का जिक्र न जाने क्यों छूट रहा है। वैसे तो हम सभी को मंदिर के भोजनालय को अपना समझ बैठे थे। शुद्ध- दाल- चावल - हरी मटर की सब्जी - गट्टे - चटनी - पापड़- सलाद और फलके- मेथी पराठें----!और जलेबी भी। और जलेबी के लिए विशेष धन्यवाद तो ललिता जी को ही है। क्या कहने रेनु के? उसने तो संयुक्त परिवार की बड़ी बहू बनने का ठेका ही ले लिया था। प्यारी और चुलबुली रेनु सबको परोसने में ही लगी रही। हम सभी को बहुत दिनों बाद खाने का आनंद आया। उसको लास्ट में हम सबने परोसा। परिवार को एकजुट होना सिखाया तो हम बहनों ने ही। ठीक ही कहा गया है - - - जैसा हो मन वैसा ही अन्न। अरे! शारदा जी ने सभी का आईक्यू टेस्ट कर लिया। इतने जनरल नॉलेज के प्रश्न पूछे कि सबकी बुद्धि खुल गई। पिकनिक कहॉं थी ये तो समझ में आ ही गया होगा। जोका में जैन मंदिर, अक्षर धाम मंदिर और मनोरंजन बस। शाम कैसे बीत गई पता ही नहीं चला। बहुत सी बातें छूट गईं। लक्ष्मी ने मोर्चा अच्छी तरह संभाला। बाकी सभी बहनों का सैल्यूट। फिर एक मंदिर की तलाश। 🙏 🙏 🙏

Friday, August 6, 2021

साहित्य और आधुनिकता

सहित्य दृष्टि ही नहीं द्रष्टा भी - - -डॉ.वसुंधरा मिश्र ("आधुनिकता के पहलू "पुस्तक जिसके लेखक विपिन कुमार अग्रवाल हैं। आधुनिकता पर लेखक के विचारों की सहमति मेरी भी बन गई है।) सामान्य प्रयोग में आधुनिक शब्द को बहुत दूर तक समय सापेक्ष मान लिया जाता है जैसे प्राचीन काल मध्यकाल और आधुनिक काल। परंतु आधुनिक शब्द का सुविधा संपन्न और लचीला अर्थ है। हर अगला काल अपने पूर्ववर्ती की अपेक्षा आधुनिक या अधिक आधुनिक होता है। विशिष्ट रूप में आधुनिक का अर्थ इससे भिन्न है। आधुनिकता की पहली और अनिवार्य शर्त स्वचेतनता है। स्वचेतन वृत्ति के कारण आधुनिकता की प्रमुख चिंतना के माध्यम से ही आधुनिक व्यक्ति भविष्य को रूपायित करना चाहता है। भविष्य का नियमन और नियोजन अतीत के आधार पर ही होता है क्योंकि सीधा तर्क है कि यदि बाण को धनुष पर चढ़ाकर जितना ही पीछे खिंचा जाएगा उतना ही वह आगे जाएगा। वर्तमान के अप्रिय से बचने के लिए व्यक्ति भविष्य में चला जाता है और वहां से इस वर्तमान को रंगीन अतीत के रूप में देखना चाहता है। आधुनिकता सबसे अधिक महत्व वर्तमान को देती है। वर्तमान से व्यक्ति जब क्षुब्ध और असंतुष्ट होता है तभी अतीत के प्रति सम्मोहित होता है। वर्तमान में संघर्ष करता है विद्रोह करता है लेकिन अतीत के भार से आक्रांत या विवश होकर नहीं बल्कि वह भी उसके जीवन का एक अंग रहा था। जयशंकर प्रसाद ने कहा है - - रोकर बीते सब वर्तमान क्षण सुंदर सपना हो अतीत। अपने वर्तमान के प्रति तीव्रतम सजगता आधुनिकता का केंद्रीय तत्व है। इस संचरण के क्रम परिवर्तन विकास और आधुनिकता के चक्र में होता रहता है। वर्तमान युग की स्वचेतनता ही मानवीय व्यक्तित्व की चरम परिणति कही जा सकती है। बहुमुखी भौतिक विकास के बावजूद मानवीय मूल्यों को उत्तरोत्तर गिरते हुए स्तरों का बोध मानो फिर से हमें उस अतीत में प्रक्षिप्त कर देता है जो अब हमें गौरवमय और वर्तमान की तुलना में श्रेष्ठतर लगने लगा है। इस दृष्टि से अतीत का सही-सही उपयोग करने का प्रश्न एक बड़ी चुनौती के रूप में आता है। आधुनिक साहित्यकार को इस समस्या से गहरे स्तर पर जूझना पड़ता है। साहित्य युवाओं को समृद्ध करता है , वृद्धों का मनोरंजन करता है, उन्नति को समुन्नत करता है, मुसीबतों में धैर्य प्रदान करता है, घर को प्रसन्नता से भरता है और बाहर विनम्र बनाता है।कलात्मक सृजनात्मकता सहजता और स्वचेतनता के मिश्रित योग से निर्मित होती है कि नहीं, इस पर खोज करने की आवश्यकता है। आधुनिक साहित्य काव्यशास्त्र से मुक्त हो रहा है। उसे किसी वाद- विवाद से बांधना कहाँ तक उचित है? वाद मुक्त साहित्य उच्छृंखल या स्वछंद की श्रेणी में तो नहीं होगा मूल्यों के लिए लिखा गया साहित्य भी मूल्य से अलग होगा। इस प्रकार के साहित्य को आदर्शवादी कहते हैं। मूल्यों पर जीने वाला व्यक्ति या समाज जब मूल्यवान नहीं तो साहित्य को भी नहीं होना चाहिए। साहित्य व्यक्ति और समाज का प्रतिबिंब है जो समय के अनुरूप बदलता है। साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं है बल्कि वह छाप भी अंकित करता है। साहित्य केवल दृष्टि नहीं, द्रष्टा भी है। वाद परक साहित्य गुरु नहीं, बल्कि तानाशाही करने लगता है। साहित्य को रंजक मान सकते हैं पर नट नहीं, दर्शक मान सकते हैं पर पिता नहीं, प्रदर्शक मान सकते हैं पर गुरु नहीं।

चंद्रशेखर आजाद

आजाद हूँ आजाद ही रहूंगा मेरा नाम चंद्रशेखर आजाद है। मातृभूमि का एक क्रांतिकारी वीर।मातृभूमि की आजादी के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ। जिंदगी अपनी राह खुद ब खुद बनाती है। मेरे पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगदानी देवी है।ईमानदार स्वाभिमान साहस और वचन में पक्के मेरे माता-पिता के संस्कार मेरे खून में दौड़ रहे थे। मेरा जन्म 23 जुलाई 1906 में बदरका वर्तमान उन्नाव जिला बैसवारा में हुआ बाद में मध्य प्रदेश के भाबरा गांव में बस गए। जहां मेरे बचपन के दिन बीते। आजकल उसका नाम आजाद नगर है। बचपन से ही आदिवासी भीलों के साथ रहकर धनुष बाण में निपुण हो गया था। बाद में मैंने पिस्तौल चलाना और गाड़ी चलाना भी सीख लिया था। 14 वर्ष की आयु में बनारस से संस्कृत की शिक्षा ली। वहीं से कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया। मन्मथनाथ और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में क्रांतिकारी दल का सदस्य बन गया। 1920 - 21 का समय जब मैं गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़ा। गिरफ्तार हुआ। जज के समक्ष पेश किया गया। मैंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया। फिर क्या था न्यायाधीश ने मुझ पर 15 कोडे़ बरसाने का आदेश दिया । मेरी चमड़ी उधेड़ दी गई। पर हर कोडे़ पर मैं वंदेमातरम और भारत माता ही चिल्लाता रहा। गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद करने के बाद मैंने अपनी विचारधारा को बदल लिया। मैं क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़ गया। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की सदस्यता स्वीकार कर ली। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त 1925 में काकोरी कांड किया जिसमें काकोरी जगह पर रेल से अंग्रेजों का धन खजाना लूट कर फरार हो गया। हमारे चार क्रांतिकारी साथियों को भी बलिदान देना पड़ा। हमने हार न मानी। उत्तर भारत की सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। भगतसिंह और राजगुरु के साथ लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेरकर 17 दिसंबर 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सांडर्स की हत्या करके लिया। उसके अंगरक्षक को मैंने गोलियों से भून डाला। असेम्बली बम कांड को भी अंजाम दिया। मेरे तीन साथियों भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। उन्होंने अपील भी करने से इंकार कर दिया। मैंने तीनों प्रमुख क्रांतिकारियों की सजा को कम करने के लिए काफी प्रयास किया। इसके लिए उत्तरप्रदेश में हरदोई जिला जाकर गणेशंकर विद्यार्थी से मिला। उनके सुझाव को मानकर इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू से आनंद भवन में मिला।उन्होंने भी कोई बचाव नहीं किया। बाद में गांधी जी से भी आग्रह किया कि लार्ड इरविन से इन तीनों की फांसी को उम्रकैद में बदलवाने के लिए जोर डालें परंतु कुछ न हो सका। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब मैं मित्र सुखदेव राज से मंत्रणा कर रहा था तभी वहां सीआईडी का एस एसपी नॉट बाबर जीप से आया और उसके साथ कर्नलगंज थाने से सैकड़ों की संख्या में पुलिस भी आ गई। अब तो दोनों ओर से बीस मिनट तक भयंकर गोलीबारी हुई। 1931 में इलाहाबाद के इसी अल्फ्रेड पार्क में मैंने रूस की बोल्शेविक क्रांति के तर्ज पर समाजवादी क्रान्ति का आह्वान किया। जीते जी मैंने संकल्प लिया था कि मैं अंग्रेजों के हाथ कभी नहीं पकड़ा जाऊंगा और न ही ब्रिटिश सरकार मुझे फांसी ही दे सकेगी। वैसा ही हुआ। 27 फरवरी 1931 को गोलीबारी में मैं वीरगति को प्राप्त हुआ। वह दिन मेरे जीवन का आखिरी दिन था। पुलिस ने सूचना तक नहीं दी और मेरा अंतिम संस्कार कर दिया। मेरे बलिदान की खबर सुनकर कमला नेहरू भी श्मशानघाट में मेरी अंत्येष्टि में शामिल हुई थीं । युवाओं की बड़ी संख्या ने मेरी अस्थियां चुनकर बहुत बड़ा जुलूस निकाला , सभा का नेतृत्व पुरुषोत्तम दास टंडन द्वारा किया गया। इस सभा में शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने कहा कि जैसे बंगाल के खुदीराम बोस के बलिदान के बाद उनकी राख लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आजाद को भी सम्मान मिलेगा। देश के प्रति मेरा यही लक्ष्य रहा "जीत या मौत" । मातृभूमि का इस सपूत आजाद को स्वतंत्रता सेनानी होने पर गर्व है। बिस्मिल जी की ये पंक्तियाँ सभी क्रांतिकारियों का मूलमंत्र रहीं - - - सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु - ए - क़ातिल में है! - - सिर्फ़ मिट जाने की हसरत अब दिल - ए- बिस्मिल में है। वंदेमातरम।

बॉम्बे जहांगीर आर्ट गैलरी में "पक्षियों और प्रकृति विषयक श्रृंखला प्रदर्शनी भवन

बाम्बे जहांगीर आर्ट गैलरी में "पक्षियों और प्रकृति" विषयक श्रृंखला प्रदर्शनी : "भवरें और लहरें " उदासीनता की भावना सकारात्मक आनंद प्रदान करती है बशर्ते वह किसी अतीत या किसी स्थान से जुड़ी हो। रतिलाल कंसोदरिया सौराष्ट्र के एक सूखे क्षेत्र से आते हैं, जहां पानी और हरियाली दोनों की ही बहुत कमी थी। लेकिन वहां चलने वाली मंद बयार के प्रति उनका बहुत ही सुखद अनुभव था। इस जबर्दस्त प्रभाव का अनुभव उन्हें उस समय से ही हो गया था जब वे गाँव के आसपास के इलाकों में साईकिल चलाने का खेल खेलते , आसपास पक्षियों की उड़ान या आकाश में कोई हवाई जहाज की उड़ान देखते थे। उनकी मूर्तिकला दो प्रकार के भावों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रथम यह है कि वे अपने आसपास के जीवन और वस्तुओं से आनंदित होने के भाव हैं। द्वितीय है पानी की कमी और निकासी के भावों की कल्पना के माध्यम से उसके महत्व को व्यक्त किया है। इस श्रृंखला में पक्षियों की आकृतियां उनकी मूर्तियों के अभिन्न अंग रहे है। उनकी मूर्ति कला में पक्षियों की दो श्रेणियों का चित्रण मिलता है। उन मूर्तियों में पक्षियों के एक वर्ग में उन पक्षियों का वर्णन है जो वास्तविक रूप में उनके अस्तित्व को दर्शाता है। उनकी मूर्तिकला में से एक "टॉय हाउस" है जिसमें बच्चे के घर के विषय में दर्शाया गया है जहां एक युवा लड़का पक्षियों को अपने झोपड़ी के अंदर कैद करने की कोशिश करता है ताकि वह उन्हें अपने खेल का साथी बना सके। इस प्रकार की झोपड़ी कपड़े, कढ़ाई या पेंट से बनी हुई प्रतीत होती है जो बांस या प्लास्टिक की ट्यूब के सहारे चित्रित की गईं हैं। घर का आकार एक बच्चे के बैठने और खेलने के लिए पर्याप्त बना है। दूसरी मूर्तिकला में "स्टोरी ऑफ दि चेयर" है जिसमें एक कुर्सी और उसके दिन प्रतिदिन के जीवन में उसकी उपयोगिता को दर्शाया गया है। जब कुर्सी काफी पुरानी हो जाती है तो वह पक्षियों के लिए एक जीवंत कोना बन जाती है। कुर्सी की सीट उन्हें शिकारियों के आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती हैं, रसोई बागवानी की लताओं के लिए सहारा देने के काम आती हैं। उसके पीछे वाली जगह अनचाही वस्तुओं को छिपाने के काम आती हैं। ऐसी मूर्तियां जो अनुभवों और वास्तविक वस्तुओं के निरीक्षण से बनती हैं वे कलाकार के कार्यों और विचारों को समझने के लिए बहुत ही मूर्त रूप प्रदान करती हैं। पक्षियों की दूसरी श्रेणी में उन पक्षियों के विषय में है जो मानव विचारों की तरह है। वे बिना किसी बाधा के उड़ते हुए किसी भी दूरी तक चले जाते हैं । उन्हें स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए अन्यथा मानव मस्तिष्क उनकी कल्पना में स्वयं एक पक्षी के पिंजरे के रूप में कार्य करने लगता है । जब विचारों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है तो अकेले ही एक रूप बनाने की प्रक्रिया में लग सकते हैं । अपने बचपन में उन्होंने पक्षियों को बहुत ही पास से निरीक्षण किया है । उन्होंने अपने दिन की शुरुआत पक्षियों का निरीक्षण करते हुए किया और गोधूलि बेला में एक साथ समूह में आने वाले पक्षियों के घर लौटने के आनंद को भी महसूस किया है। वहां बच्चों को बचपन से ही बड़ों द्वारा पक्षियों को दाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था । वे कहते थे कि यदि बसंत पंचमी पर पक्षियों को यथा संभव दाना खिलाया जाए तो बच्चे अपनी शिक्षा में अधिक सफलता प्राप्त करेंगे । देवी सरस्वती की पूजा बसंत पंचमी के अवसर पर की जाती है जो फरवरी महीने की शुरुआत में आती है। मुझे लगता है कि त्योहार के रूप में मनाने से यह बहुत ही सार्थक है क्योंकि बच्चों की आवश्यकता और उनकी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने के लिए बहुत ही सूक्ष्म तरीका है। जिस क्षेत्र से वे आते हैं वह सूखा क्षेत्र है , जहां पक्षियों और जानवरों को खाना देना एक अनिवार्य आवश्यकता है । पक्षियों के साथ रहने और उनके साथ समय बिताने के कारण उन्होंने अपने अतीत को उन पक्षियों के माध्यम से पहचाना । उन्होंने पक्षियों की खुशी और दर्द की ध्वनियों के माध्यम से उन्हें समझना शुरू कर दिया । संभवत उनके साथ संबंध बनाना शुरू कर दिया जैसे कि वह एक पक्षी की तरह स्वयं को व्यक्त करना चाहते हैं ,जैसे वह पक्षियों की तरह उड़ना चाहते हैं और आसपास की प्रकृति के साथ एक संबंध विकसित करना चाहते हैं , जैसे पक्षी करते हैं। एक बार उन्होंने एक मोती का सीप खोलकर देखा ,उसने उन्हें मोहित कर लिया और उन्होंने पक्षियों की एक ऐसी दुनिया की कल्पना की जिसमें अलौकिक शक्ति के साथ साथ उन पक्षियों की दुनिया में कीमती पक्षियों की भी देखभाल की जाती है । अपनी दूसरी मूर्ति "फ्रॉम द बूम ऑफ सेल " में जब पक्षी शाम की सुनहरी रोशनी के नीचे भोजन संग्रह का काम करने के बाद वे अपने घोसलों में लौटते हैं तो उनकी थकान का आनंद भी ले लेते हैं । उनकी दूसरी अन्य अभिव्यक्ति का रूप "वाटर्स " है । वे बताते हैं, मैं जहां गया था वहां मैंने एक ही स्थान पर बादलों को बहुतायत में देखा था, मेरी तीव्र इच्छा थी कि मैं उन्हें एक चक्र में रख दूं जो मेरे गांव की ओर घूमता हो क्योंकि वहां पर बादल दुर्लभ आगंतुक के रूप में आते हैं । मुझे अपने लोगों को इस तरह के उपहार देने की इच्छा थी। वे चाहते हैं कि पक्षियों को मुक्त रखा जाए और बादलों को वे पकड़ना चाहते हैं जो अपने आसपास जमा करने के लिए अन्य स्थानों से पानी लाते हैं । उनकी मूर्तियों की भिन्नता इसलिए भी है कि हवा का निरीक्षण करते हुए वास्तविक रूप में पानी के विषय को मूर्ति रूप में चित्रित किया गया है । इसकी अभिव्यक्तियों को कल्पनात्मक रूपों में ढाला गया है । कई बार इस तरह की मूर्तियां उनकी कल्पनाओं से उभर कर आई हैं जो हमें भगवान शिव, छोटे-छोटे देवी-देवताओं, "गंधर्व" और "किन्नर" या एंजेल्स की कल्पना की दंत कथाओं की याद दिलाते हैं जिनमें कुछ डरावने राक्षसों की आकृतियां भी हैं । कहीं-कहीं कल्पना का क्रम विस्मृत सा लगता है जबकि उसका मिलाजुला अर्थ निकलता है और कल्पनाओं के रूपों में है। दर्शकों को झटका भी लगेगा यदि " जिग सॉ " जैसे पज़ल गेम को गलत तरीके से मिलाया जाय भले ही वह सिंगल ब्लॉक में ही क्यों ना हो । उन्होंने पानी की जीवनी शक्ति को एक पात्र के माध्यम से अभिव्यक्त किया है और पक्षियों के भोजन खिलाने की प्रक्रिया को एक कटोरे की रचना के माध्यम से अभिव्यक्त किया है जिसे उनके कंपोजीशन में कई बार दोहराया गया है । उनकी कुछ रचनाएं निश्चित ही विपरीत बल को भी प्रस्तुत करती हैं जो कंपोजीशन को संतुलित करती है । जब चिड़ियों की उड़ान ऊपर की ओर होती है और तो नीचे के बल का संतुलन टहनियों, चिपचिपेपन और हाथों से होता है। मानव शरीर कई बार विचारोत्तेजक होता है और पूर्ण रूप का प्रतिनिधित्व नहीं करता , हाथ पैर के असामान्य खिंचाव बड़े माप की तुलना अपेक्षित शरीर के बड़े माप के साथ करते हैं। यह रचना को पूरा करने और उसके अर्थ को संप्रेषित करने के लिए किया जाता है। उनकी तकनीकी पूर्णता उल्लेखनीय है क्योंकि उनके रंगों की पॉलिशिंग या पतिना कसकुट रंगों के प्रकार और छाया, लंबा और शंकु के रूप, पतला पानी, महीन धूल जैसा दिखाई देना, पक्षियों और बादलों की गति, घोसलों की बुनावट और ऐसे ही इस प्रकार के बहुत से विस्तृत विवरण हैं जो इनकी मूर्तिकला की भाषा को संप्रेषित करती है। धातु को अनुकूल बनाने के लिए सावधानी लेनी पड़ती है। मैंने उनसे पूछा कि कैसे उन्होंने एक मध्यस्थ के रूप में कठोर धातु का उपयोग पानी की लहरों या हवा की लहरों जैसी संवेदनशील भावनाओं को ढालने में किया। उनका मानना है कि वे उन कोमल रूपों को कठोर वस्तुओं में स्थाई रूप से कैद कर देना चाहते हैं । - - - बालमनि एम प्रफुल्लित भावों के रूप - - - रतीलाल कंसोदरिया एक कुशल मूर्तिकार हैं जो जीवन की अनंत तरलता को धातुओं में ढाल लेते हैं। उन्होंने अपनी समग्रता में जीवन का आनंद लिया है और फिर अपनी मूर्तियों के माध्यम से उसे समझा है। यकीनन इसमें हृदय, मस्तिष्क और हाथों का एक अनूठा संयोजन मिलता है। उनके विषयों का दायरा बहुत विशाल है :बचपन की स्मृतियां, प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव, अद्भुत संसार के पक्षियों और जानवरों के दैनिक जीवन का सौंदर्य आदि । उनकी मूर्तियां सांस्कृतिक परंपरा की समकालीन हैं और वे धड़कते ग्रामीण जीवन के मनोरम दृश्यों और वर्तमान काल के विहंगम दृश्यों को प्रस्तुत करती हैं।जबकि उनकी कला किसी भी प्रकार की संकीर्णता से बिल्कुल ही परे है। वे दिव्य दृष्टि और एक संवेदनशील हृदय के मालिक हैं। इसलिए उनकी भावना एक विशेष अर्थ और असाधारण सुंदरता लिए हुए है जो उनकी कला की विशिष्टता है। इस अर्थ में यह कहना ठीक न होगा कि उनकी मूर्तियां "अतीत का मोह" या नोस्टेलजिया से या "जड़वत् क्षणों" से ग्रसित हैं । धातु में स्पंदित सर्वोच्च जीवनी शक्ति को बारहमासी रूपों में चित्रित किया गया है। मूर्तियों में यह रूप ठहराव नहीं लाते बल्कि निरंतर सभी के लिए विस्तृत रूप से बिखरे हुए हैं। कहा जा सकता है कि मूर्ति में जीवन की धड़कन है और ये मूर्ति स्वयं जीवंतता बनाए रखने की प्रेरणा प्रदान करती हैं । रतीलाल का जन्म सौराष्ट्र में एक किसान परिवार में विजातीय संस्कृति के साथ हुआ था। बचपन से ही वे बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने अपनी पंचेन्द्रियों सहित बचपन के सभी खेलों का आनंद लिया है । वे बहुत तेज दौड़ सकते थे। पक्षी उनके सबसे अच्छे मित्र थे। वे उनके कंधों पर बसेरा करते और उनके हाथों से दाना खाते विशेषकर तोते जो पालतू नहीं थे लेकिन फिर भी वे उनके साथ खेलते थे। गिलहरियां उनके पैरों के इर्द-गिर्द लोटती रहती थीं । इस बच्चे ने बहुत से खेल खेले और बड़ी उत्सुकता से आकाश के रंगावलियों का आनंद लिया। इस बच्चे के व्यक्तित्व के ऐसे असाधारण लक्षणों पर ध्यान देते हुए लोगों ने कहा था कि वह एक उत्कृष्ट कलाकार बनेगा। उनकी भविष्यवाणी सही निकली। शुरुआत में मेडिकल करियर के लिए जब वे तैयारी करने के लिए वडोदरा में गए, वहां फाइन आर्ट्स फैकल्टी से जुड़े और होनहार मूर्तिकार बने। रतीलाल कंसोदरिया की पहचान उनकी बहुत ही प्राचीन और कठिन मूर्ति पद्धति लोस्ट वैक्स के कारण है। यह पद्धति ग्यारह स्तरों से होकर गुजरती है, इसकी एक छोटी सी गलती भी पूरी मूर्ति को बिगाड़ने के लिए बहुत मायने रखती है। इसलिए इस कार्य के लिए गहन धैर्य, कठिन परिश्रम और कौशल की आवश्यकता होती है। वर्तमान में कंसोदरिया का नाम इस प्रकार की मूर्ति पद्धति में काम करने वाले लोगों में महत्वपूर्ण माना जाता है। धातु की मूर्ति कला के अलावा उन्होंने पत्थर और लकड़ी जैसे मीडिया में भी अपना आउटलेट प्राप्त किया है। उनकी श्रृंखला में पत्थरों पर पानी के अद्भुत रूप की छवि प्रदर्शित की गई है। एक नई और चुनौतीपूर्ण माध्यम के रूप में उन्होंने फटे हुए टायरों का प्रयोग किया। जो टायर हर व्यक्ति को गतिशील रखते हैं, अंततः जब वे नष्ट हो जाते हैं तो वही प्रकृति पर कहर ढाते हैं। कंसोदरिया ने इसके सृजनात्मकता पक्ष को देखा। विभिन्न आकारों में कटने और उस को व्यवस्थित करने के बाद वे इसे अनूठे फंतासी से संपन्न करते हैं। इस प्रकार गतिहीन टायर नई गति और नया जीवन प्राप्त करते हैं। कंसोदरिया की मूर्ति कला की एक विशिष्ट विशेषता यह है जो जीवन की अद्भुत अभिव्यक्ति प्रदान करती है। दर्द या पीड़ा का कोई भी चिह्न उनकी मूर्तियों में नहीं मिलता है । जीवन को पूर्णता में जीने की खुशी और उत्साह, धैर्य, गतिशीलता, आत्मसम्मान जैसी धमनियों का प्रवाह उनकी मूर्तियों में प्रवाहित होती रहती हैं। उनके मनुष्य चरित्र की शाखाएं धनी परिवारों से नहीं आते। उनके जीवन में आराम की कमी है लेकिन वे अपने वर्तमान आनंद को क्षति नहीं पहुंचने देते हैं। लेकिन वे सीमित चीजों में अपना असीमित आनंद खोज लेते हैं। इस प्रकार जीवन को सौंदर्यमय अवतार में निर्मित करते हैं। कंसोदरिया की उपलब्धि उनकी कलात्मकता के माध्यम से इस तरह जबरदस्त तथ्यों को उद्घाटित करती है। जब पक्षी हमारे चारों ओर फड़फड़ाते हैं तो गांव के लड़के ऐसे कटोरा लेकर बैठते हैं मानो भेंट दे रहे हो। इन हवाई प्राणियों का स्थान और स्थिति फोटोग्राफिक क्षणों के लिए इतनी प्रभावशाली है जो रतीलाल के विन्यास की उपलब्धियां हैं । इस प्रकार के नाटकीय क्षणों में चोर का पीछा करने का एक प्रमुख गुण है जिसमें पक्षी सरपट दौड़ते कुत्ते का पीछा कर रहे हैं क्योंकि वह अपने कैनिंग दांतो के बीच एक अन्य पक्षी को दृढ़ता से दबोच कर भाग जाता है। "द गेम ऑफ द गेट" में भी इसी प्रकार के क्षणों की विशिष्टता दिखाई पड़ती है जिसमें कुत्ते एक गोलाकार प्रेम के माध्यम से कूदने का कार्य करने वाले हैं, जो ग्रामीण मनोरंजन का ही एक रूप है। "आदमी- पक्षी" और "आदमी- जानवर" का एकीकरण के साथ-साथ पक्षी फार्म में एक साथ भूलभुलैया की तरह लिपटे हुए परिणाम हैं। पूर्व में दो पुरुषों और पक्षियों को एक गोलाकार रूप में इस तरह रखा गया है कि वह आंशिक रूप से इसके अंदर और बाहर दिखाई देते हैं। दूसरी मूर्ति में उसकी पीठ पर पड़ा है और कुत्ता उसके हाथ के नीचे से धक्का देते हुए उससे खेलते हुए उसकी टांगों को खींच रहा है, जबकि डरी हुई बिल्ली शीर्ष पर है, लड़के के हवा में ऊंचे किए पैर उस फ्रेम में सर्वोच्च बिंदु प्रदान करता है। यह चंचलता भी देखने वालों के लिए हास्य के पक्ष को उकसाने को दर्शाता है। रतीलाल वास्तव में जीवन की भावना और ग्रामीण सेटिंग में मनुष्य- पशु- पक्षी- पर्यावरण के बीच प्राकृतिक संबंधों के साथ शामिल रहे हैं । मूर्ति के विभिन्न जटिल रूपों की एकदम सटीक एक बार की कॉस्टिंग के लिए एक विशेष विशेषज्ञता का होना आवश्यक होता है, जब पिघली हुई धातु का प्रवाह प्रत्येक प्रकार के विस्तार, फैलाव और जनता के लिए होता है।रतिलाल कंसोदरिया ने इसमें बहुत ही उत्तम रूप में उपलब्धि प्राप्त की है जो दोषरहित और बड़े ही करीने से की गई है। आज भारत में कांन्स्य माध्यम से मूर्ति बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ युवा मूर्तिकार रतीलाल कंसोदरिया का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। - - - द्वारा प्रो. रतन परिमू "रतिराम कंसोदरिया का ग्रामीण जीवन जगत" सन् 1983-90 में बड़ौदा से मूर्ति कला का प्रशिक्षण पूर्ण करने के पश्चात कंसोदरिया बहुत वर्षों तक अपने आप को लकड़ी की खुदाई के काम से जुड़ा रखा। उन्होंने उसको सभी आकारों और चौड़ाई, लंबे और छोटे चौड़े झलाई और शाखाओं से चिपके हुए सभी आकारों और चौड़ाई में बनाया। वह बहुत ही कम क्यूबिकल ब्लॉक जैसे ठोस रूप की तरह एक घनाकार लॉक का चयन करते हैं जो विस्तार को सीमित कर देता है या सीमा को घेरने के लिए अपरिहार्य के रूप में सेवा करता है। इसके बजाय वे अनियमित आकार के वृक्ष के तने शाखाओं सहित जो अपने खड़ी और परिधि से परे है, उसे चुनते हैं। वह इस प्रकार स्वतंत्र होकर आवश्यक रूप से अलंकारिक संरचना में लकड़ी के माध्यम से काम करने में सक्षम थे इसलिए सक्षम थे, इसलिए अनिवार्य रूप से सार और तात्विक रूपों के विपरीत लकड़ी का उपयोग करने वाले कई मूर्तिकारों ने दर्शकों को अपनी तरह की एकमात्र संभावनाओं के रूप में उपयोग किया था। कंसोदरिया शायद इस तरह के प्रतिबंधों से ध्यान हटाकर उन्होंने अपने अजीबोगरीब रूप संवेदना की खोज कर ली थी। इस रूप संवेदना में मूर्तिकला की कोई सीमा नहीं दिखाई देती, जिसके आगे की दिशा में कल्पनिकता नहीं है, लेकिन इसमें कोई बदलाव नहीं होता है, लेकिन सभी दिशाओं में लगातार प्यास बढ़ती है जिससे मूर्तिकला का वजन घटता है और सभी दिशाओं में वह निरंतरता गतिशील होकर चलती रहती है। चूंकि पूर्ण विस्तार में सभी विवरण और न्यूनतम रूप प्रमुख ब्लॉक में खोदे जा सकें, पूर्ण रूप से कई छोटे या बड़े असंख्य संगुटिका या एकत्रीकरण के रूप में दिखाई पड़ते हैं, इन रूपों के लिए निरंतर गति और एक आकर्षक इच्छा का सुझाव देना, बिना रुके अंतरिक्ष में सभी दिशाओं में घूमने वाले पक्षियों के झुंड की तरह मूर्तिकला का यह रूप जो उभरकर आता है वह अंतरिक्ष की तरह ही अनंत है, जो बंधन मुक्त है। इस तरह के चरित्र का रूप आमतौर पर एक सजावटी जुड़े हुए की टुकड़ी के रूप में देखा जा सकता है या फिर आभूषण या सजावटी डिजाइनों के मैच, जो किसी एकल वस्तु को प्रभावित कर सकती है। लेकिन रतीलाल की मूर्तियां ना तो सजावटी हैं ना ही सजावटी विवरण से समझौता करती हैं बल्कि असीम गुड सर्वाधिक यूरोपीय रूपों को आभूषण की तरह है जिनमें से एक स्रोत चिनॉइसरी है लेकिन उसका भी प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं है कोई यह दावा कर सकता है कि यह गुण उसके लिए एक व्यक्ति के रूप में अजीब है जो विशेष रूप से लकड़ी के साथ काम करते हुए उभरा है। जब उनकी कांस्य मूर्तियों की बात होती है, जिसके साथ वह मुख्य रूप से वर्तमान में काम कर रहे हैं। कोई आश्चर्य की बात नहीं है इस माध्यम में उनकी मूर्तियों की प्रदर्शनी का होना, एक वरिष्ठ आलोचक भी इसे कांस्य समझने की गलतियां कर सकता है जबकि वह लकड़ी के रूप में है। रतीलाल पहले से ही अपनी शाखा के लिए गर्म रेडिश पतिना की चमकदार पॉलिश को पसंद करते हैं जो इस तरह के भ्रम को संभव बनाता है। जिस रूप में वह लकड़ी द्वारा काम करना पसंद कर रहे थे, वे इस प्रकार के रूप की संरचना और घटकों को कांस्य में चित्रित करने की ओर ले जाते हैं जहां उनको उर्ध्वाधर या क्षितिज अभिविन्यास पर जोर देने के विशिष्ट गुरुत्व के विषय में सोचना नहीं पड़ता है। कांस्य में भी न केवल रूप निरंतर प्रवाह में होते हैं, बल्कि उर्ध्वाधर रेखा और सीधी समान उड़ान भरते प्रतीत होते हैं। वास्तव में उनमें से कुछ सचमुच पक्षी हैं जो हमेशा उड़ान में होते हैं और वहां एक कहानी बन कर लटक जाती है। रतीलाल क्यों ऐसे रूप या रूप घटकों को चुनते हैं जिस प्रकार वे अपनी कांस्य मूर्तियों में करते हैं? सबसे दिलचस्प घटना यह है कि उनके बचपन के अनुभवों के कई पहलुओं का सचेतन या अचेतन में उनके चरित्रों में वे विशेषताएं परिलक्षित होती हैं जो उनकी मूर्तिकला के कामों में उभर कर आता है। गांव में जन्म लेने वाला बच्चा होने के कारण उनको गांव के बड़े और लकड़ी की खुदाई द्वारा उत्पन्न कौशल और कार्यो ने आकर्षित किया था। उन्होंने सजावटी डिजाइन के साथ कृषि से संबंधित अपने सगे भाइयों के जुनून द्वारा उपकरणों को सजाने का काम निरीक्षण द्वारा सीखा। वे बहुत ही गर्व के साथ अपनी मां के कढ़ाई कार्य में उनकी विशिष्टता को भी याद करते हैं। इन अनुभवों में मूर्तिकार बनने की बचपन की महत्वाकांक्षा शामिल है और साथ ही साथ शुरुआत में वे लगातार लकड़ी की खुदाई का काम को करते रहे । गांव के जीवन की गतिविधियों और वातावरण के बारे में उनके बचपन के अनुभवों ने उनकी नवीनतम स्मृति में पूरी तरह से गति ला दी थी तभी उभरती हुई मूर्तिकला रूप का गठन एक कथा के साथ-साथ परिदृश्य उठा । यही कारण है कि एक हद तक उनके आकार क्षैतिज रूप से फैलते हैं जबकि जानवरों और पक्षियों को मानव आकृतियों के साथ साथ जोड़ा जाता है। मूर्तिकला स्वाभाविक रूप से एक परिदृश्य अंतरिक्ष में बदल जाता है जिसके भीतर नाटक होता है। इस प्रकार मूर्तिकला के भीतर जगह में अंतरिक्ष के चरित्र को लेते हैं, इसके बाहर एक अजीबोगरीब निरंतरता उभरती है और वास्तुकला के लिए पेंटिंग के साथ जुड़ी मूर्तिकला की समानता में अंतरिक्ष और अंतरिक्ष के बीच में उभरती है। वेअपनी वर्तमान पृष्ठभूमि के कारण पल और बल में अपनी रुचि की व्याख्या करते है जिसमें अपने शरीर के साथ बहुत सारी शारीरिक गतिविधियां शामिल होती हैं, जबकि अंग, आसन और मांसपेशियों का खिंचाव वाले दृश्य अवलोकन के लिए आकर्षक साईट्स हैं। ये ग्रामीण लोगों के बीच जीवन के लिए उत्साह है मात्र खिलौने और यात्रा नहीं हैं, जिसके लिए रतीलाल जवाबदेही भी हैं। यहां पर मैं सजावटी संबंधी प्रश्नों पर अपनी एक टिप्पणी दे सकता हूँ जो मानव शरीर के चिलमन, जानवरों के अंगों और पक्षियों के पंखों की निश्चित शैली का पूंजीभूत प्रभाव का परिणाम है। मैं, इसलिए कंसोदरिया के काम को पसंद करना चाहूंगा क्योंकि यह केवल हैंडीक्राफ्ट विषयक ही उन्मुख नहीं है और सजावट दृष्टिकोण के रूप में भी नहीं है बल्कि वे स्वाभाविक रूप से अर्थ पूर्ण है। मनुष्य और जानवरों दोनों के अंगों में एक निश्चित वृद्धि होने के परिणामस्वरूप ही पतलापन है लेकिन अव्यक्त ऊर्जा और रूपों के ताने में भी योगदान देता है। काफ़ी हद तक उनका दावा है कि सादगी के लिए तथाकथित प्राथमिकता वास्तव में कलाकार की सीमाओं के कारण हो सकती है। अंत में, हम कुछ कांस्य ले सकते हैं उदाहरणार्थ किनारी बुनी हुई खड़ी की गई खाट की मूर्ति और शीर्षक "विलेज सीन" या गांव का दृश्य जिसमें ठेठ भारतीय गृहस्थी के उद्देश्यों को मनुष्य आकृति, बिल्ली, गिलहरी और चिड़ियों को लिया गया है। यह भी विश्वास किया जाता है की नई बनी हुई खाट को तुरंत ही सोने के लिए उपयोग में नहीं लेना चाहिए, जब तक यह सुनिश्चित न हो जाए कि वहां" यम"(मृत्यु देव) नहीं आने वाला है। खाट मोटिफ को लेकर अन्य मान्यताएं भी हैं जैसे कि एक मामले में कुछ कुत्ते उसके चारों ओर दो लड़कों के साथ खेल रहे हों। उनका मूर्ति ग्रुप वास्तविक जीवन के मूल रूप से जुड़ा हुआ खड़ा है और इस प्रकार के एक ऐसे स्थान से घिरा है जहां दर्शकों के लिए भी स्थान है। अनुवादक : डॉ वसुंधरा मिश्र हिंदी प्रवक्ता, दि भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता ईमेल :mishrakolkata@gmail.com मो. 9874977382

Thursday, August 5, 2021

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है ग़ालिब उर्दू भाषा के एकमात्र शायर और साहित्यकार हैं जिनके व्यक्तित्व और साहित्य पर सबसे अधिक लेख गए हैं। दीवान के तो इतने संस्करण हो गए हैं कि उनकी गणना भी संभव नहीं है। मिर्ज़ा असद उल्ला खां 'गालिब' - पहले असद और फिर ग़ालिब उपनाम से प्रसिद्ध हुए। इनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। ये बहादुर शाह जफर के जमाने में पैदा हुए थे। 1857 का गदर उन्होंने देखा था। अव्यवस्था और निराशा के उस जमाने में मानव प्रेम और दार्शनिक दृष्टि से साहित्य में आए। शुरू में तो उनकी मौलिकता की हंसी उड़ाई गई लेकिन बाद में इतना बढ़ावा मिला कि शायरी की दुनिया का नजारा ही बदल गया। पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या। गालिब उर्दू साहित्य के अपने युग के 'अदबी बली' मतलब साहित्यिक अवतार थे और आधुनिक युग के भी। गालिब परंपराओं से विद्रोह और उस डगर से हटकर अपनी बात करते इसी कारण संसार ने वही व्यवहार किया जो हर वली मतलब अवतार से किया जाता रहा है। गालिब ने दर्शन सिद्ध अवतार मद्यप माशूक आदि को नए आयाम दिए। सनम सुनते हैं तेरी भी कमर है कहां है? किस तरफ़ है? औ किधर है? सितारे जो समझते हैं गलतफहमी है ये उनकी। फ़लक पर (आकाश) आह पंहुची है मेरी चिनगरियां होकर।। वे नाजुक ख्याली और शायरी का शिखर मान रहे थे, गालिब ने लिखा - दाम हर मौज में है हल्का - ए-सदकामे नहंग। देखें क्या गु़ज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक जब उन्होंने नींद के मातों और माशूक की कमर की तलाश करने वाले कवियों को ललकारा तो लोग आश्चर्य में पड़ गए कि यह नया कौन कवि पैदा हुआ है। वे विरोधों को हंस हंस कर सहते रहे - कोई उन्हें मुश्किल पसंद (जटिल भाषा लिखने वाला) कोई मोह-मल-गो (अर्थ हीन शेर कहने वाला) और किसी ने सिरे से सौदाई ही कह डाला। गालिब पर किसी का प्रभाव न पड़ा। वे कहते हैं - नमाज़ काबे की ओर मुंह करके पढ़ी जाती है पर काबा तो केवल कम्पास की सुई मात्र है जो रास्ता दिखाती है। सिजदे का वास्तविक स्थान समझ से बहुत परे है। गजल की तंग गली (संकुचित क्षेत्र) गालिब को शेर कहने के के शौक के अनुकूल सामर्थ्य नहीं रखती, उनके बयान के लिए विशाल क्षेत्र की आवश्यकता है। न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना न सिले (पुरस्कार) की परवा। अंदाज़े - बयां (वर्णन शैली) से हटकर उन्होंने वास्तविक जीवन के रंगों को पकड़ा। 25 वर्ष की आयु में 2000 शेर 'बेदिल' के रंग में कह डाले जिस पर उर्दू के प्रसिद्ध शायर और उस्ताद मीर तकी मीर ने भविष्यवाणी की थी कि 'अगर इस लड़के को कोई अच्छा उस्ताद मिल गया तो वह इसे रास्ते पर डाल देगा, यह लाजवाब शायर बनेगा वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा।' 'ग़र नहीं है मेरे अश आ़र में माने न सही।' कहते हुए जीवन के गीत गाते रहे गालिब उनके कलम की आवाज दैवीय आवाज है जो हमारे कानों में गूंजकर हृदय में उतरकर उद्भावनाओं के नये नये मार्ग सुझा रही है। खगोल, ज्योतिष, तर्क, दर्शन पदार्थ विज्ञान, संगीत तसव्वुफ सभी उनकी रचनाओं में मिलता है। तेरह वर्ष में उमराव बेगम से विवाह किया। बीबी को वे पांवों की बेड़ी कहते हैं। दिल्ली में आकर उनकी शायरी और भी रंग लाई। उनका मानना था कि हर पुरानी लकीर सिराते - मुस्तकीम (सीधा मार्ग) नहीं है और पूर्वज जो कह गए हैं वह पूरी तरह सनद (प्रामाणिक) नहीं हो सकती। @वसुंधरा मिश्र

देखो! ऋतुराज वसंत आ गया - लेख

देखो! ऋतुराज वसंत आ गया -- डॉ. वसुंधरा मिश्र न जाने अंतरिक्ष की लहरों में लहराता - बहता मादक, मधुर और मदिर मधुमास जीवन के उदास सूने वन खंड पर कब उतर आया! कामायनी में प्रसाद जी ने अंधकार को चीर कर आने वाले वसंत के प्रकाश की ऊर्जा को पहचाना है - - - "मधुमय वसंत जीवन - वन में बह अंतरिक्ष की लहरों में कब आए थे तुम चुपके से रजनी के पिछले प्रहरों में? " चारों ओर मस्ती और मादकता छा गई । प्रीत और गीत से , राग और अनुराग से, रंग और तरंग से, चंग और मृदंग से, गुंजार और झंकार से वन और जीवन भर गए हैं। प्रकृति सुंदरी अपनी अनुपम साज सज्जा से थिरक उठी है। चारों और हरित दुकूल बिछ गया है। "सुमन निकुंजन में" कुंजन के पुंजन में गुंजन मिलिंदन को वृंद मतवारो हैं "। बसंत के मादक वर्णन में कवियों की कल्पना भी झूम उठी। अनुराग के राग में रंग कर, प्यार में डूब कर नूतन झंकृति व वर्णन छटा लेकर थिरकती हुई आई - - - - " ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजित कुंज कुटीरे विहरति हरिरिह सरस वसंते नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरही जनस्य दुरंते।" ऐसा मदिर वातावरण, सरस वसंत और उसमें युवतियों के साथ नृत्य में निरत रसेश्वर हरि! मधु गंध लोभी मधुपों के भार से हिलती झूमती सहकार मंजरी! मैथिल कोकिल विद्यापति ने भी गाया है--- " नाचहु रे तरुणी तजहु लाज। आएल वसंत रितु बनिक राज।।" " अरी तरुणियों! नाचो, खूब नाचो , देखती नहीं वसंत आ गया! ना अब लाज नहीं! " साल भर जीवन की धारा बंधी हुई, घुटी हुई चलती है। वसंत में जीवन की धारा उफनती, कूलों को डुबोती, झूम कर बहती है, गाती हुई नाचती हुई । उन्मत्त और प्रमत्त! भौरों की गुंजार लगती है, घंटावली बज रही हो, रस की धारा मद जल सी झरती है, कुंजों से आती हुई धीमी - धीमी मादक समीर ऐसी लगती है मानो मदोन्मत्त झूमता हुआ गजराज हो। चारों ओर लताओं पर भौरों के झुंड के झुंड अंधे मतवाले हो टूटे पड़ते हैं। बिहारी ने बहुत ही सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है - - - "छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध। ठौर ठौर झौंरत झंँपत, भौंर भौंर मधु अंध।।" वसंत के त्योहार - - - "ऋतुनाम् कुसुमाकरः ।" भगवान कृष्ण ने भी ऋतुओं में अपने को "कुसुमाकर" बताया है। कुसुमाकर, सचमुच यह ऋतु कुसुमों का आकर है। पीले और लाल फूलों की बहार चारों ओर अनुराग को बिखेर देती है। हजारों वर्ष पूर्व वसंत के त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाये जाते थे। वसंत का अर्थ है" वसन्यत्र मदनोत्सव।" जिसमें मदनोत्सव बसता है, वह वसंत है। इसी के अन्य नामों में पिकानंद, माधव, पुष्प समय आदि है। वसंत ऋतु के प्रमुख त्योहार - - - - इस ऋतु में प्रमुख रूप से वसंतक, कंदर्प पूजा या मदन महोत्सव, पुष्पावचयिका, उदक - क्ष्वेडिका, शाल्मली विनोद, दोला , होली या होलिका, अग्नि उत्सव, ढौंढा, उद्यान यात्रा , सलिल क्रीड़ा आदि मनाए जाते हैं। वसंतक त्यौहार वसंत पंचमी का पुराना नाम है। यह वसंत की अगवानी करने का शुभ दिन है । इस ऋतु का सबसे मद भरा त्यौहार है मदनोत्सव। सारा संस्कृत वांग्मय इस त्यौहार के उन्मादक रस से आपूरित है। फूलों को चुनना भी सविधि संपन्न होता है । चैत्र के प्रारंभ में यह त्योहार राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है । "ओ कुण फुलडा़ बीने जी" कहकर हजारों कुमारियां आज भी राजस्थान में पुष्प चयन करती हुई या फूलों के अभाव के कारण पत्तों को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। अशोक इस ऋतु का प्रधान वृक्ष है जिसके नीचे मन्मथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती थी और जो साभरणा किसी सुंदरी के अलक्तक" रंजीत नुपूरों" से छम-छम की ध्वनि से ध्वनित वाम चरण के कोमल आघात को पाकर ऊपर से नीचे तक लाल लाल पुष्प स्तवकों से भर जाता था। इसी का नाम अशोक दोहद या अशोकोत्तंसिका है । बांस की नाली को रंगीन जल से भर दूसरों पर रंग डालना "उदक क्ष्वेडिका" कहलाती है। शाल्मली के नीचे लुकने - छपने की क्रीड़ा - शाल्मली मूल खेलन या शाल्मली विनोद है। दोला उत्सव ही आगे चलकर होली का त्योहार हो गया होगा। दोला उत्सव में होली का दहन प्रमुख है । इस प्रकार का अग्नि उत्सव संसार के अन्य देशों में भी प्रचलित रहा है। ढौंढा एक राक्षसी मानी गई है, जिसके दहन का वर्णन आता है। उद्यान क्रीड़ा व सलिल क्रीड़ा भी वसंत की मस्ती भरी उमंग का द्योतक है। हास परिहास के साथ मन की रुद्ध वासनाओं, अचेतन मानस की दमित इच्छाओं या कुंठाओं को भी बाहर निकालने का भी यह त्योहार है जिसमें अनजाने में अश्लील कथन की भी खुली छूट मिल गई है। यह अस्वस्थ चिंतन के प्रतिफल हैं । अबीर व गुलाल के स्थान पर राख व कीचड़ , प्रेम भरे गीतों के स्थान पर अश्लील रासक, चर्चरी चांचर या कबीरा का गायन - हमारी मानसिक रुग्णता का उद्घोष है, जिसको हम झांझ व झल्लरी के झनकारो, गंभीर घोषों वाद्यों के निर्घोषों और नृत्यों में बजते घुँघरू के स्वरों में छिपा नहीं सकते। मदन पूजा - - - वसंत ऋतु का प्राण स्वर है - - - मदन पूजा। मन को मथने वाला, मन में पैदा होने वाला, भगवान कन्दर्प की पूजा ही वसंत ऋतु का कामदेव है जो हमेशा ही देवता रहा है। मद से भरी आंखों वाला कंदर्प, इक्षुदंड जिसका धनुष, माला से गुंजरित प्रत्यंचा वाला, अरविंद, अशोक आम्र मल्लिका और नीलोत्पल के पांच बाण धारण करने वाला पंच शायक या उन्मादन, शोषण, स्तंभन, सम्मोहन और तापन के पांच बाणों वाला, हाथों में आम्र के नव पल्लवों में छिपकर अमोघ शर संधान करने वाला कामदेव ही है। रति प्रीति शक्ति और उज्ज्वला चार पत्नियों का स्वामी और अष्ट भुजाधारी है यह दर्प से भर देता है इसलिए कंदर्प। भगवान कृष्ण ने अपने को काम बताया है और काम को महिमामंडित किया है - - - "धर्माविरुद्धो लोकेस्मिन् कामोस्मि भरतर्षभ ।" 'हे भरत श्रेष्ठ! इस लोक में धर्म के अनुकूल काम मैं ही हूँ।' श्री हर्ष ने कुसुम आयुध पूजा की बहुत मनोरम दृश्य अपने ग्रंथ "रत्नावली" में किया है। जहां मकरंद से भरा उद्यान है, आम्रकानन है, कोयल की गूंज की झंकार है, भ्रमर पंक्ति से गुंजरित पागल सी बहने वाली मलय बयार के लिए झकोरे हैं। सुंदरियों के मदभरे नृत्य, नृत्य के वेग से केश पाश खुल रहे हैं और पुष्प स्रक बिखर कर नीचे गिर पड़े हैं। नर्तकी उन्मत्त हो, मदमस्त हो अपने स्तन भार से झुकी जा रही है, कंपायमान हो रही है। तभी तो विदूषक का भी मन नाचने और चर्चरी गाने को करने लगा है। वसंत में सभी बेठिकाने हो गए हैं। आज मदनोत्सव है न, कहीं गीतों का स्वर, कहीं नुपुरों की रुनझुन, वस्त्र स्खलित, अस्फुट वाणी - - - सभी तो क्षीबा हैं, किसी को होश नहीं रहता। "संदेश रासक" में भी चर्चरी, ताल, नाच, खेल, रुनझुन करने वाली किंकिणी से भरे वसंत का वर्णन है। यही वसंत ऋतु है जहां कुछ भी पुराना नहीं है, सभी नये होते हैं। विद्यापति ने कहा - - "नव वृन्दावन नव नव तरुगन नव नव विकसित फूल नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलिकूल ।" भारतीय संस्कृति में काम और वसंत त्यौहार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में भी प्रेम और काम का सूक्ष्म रूप वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही सृष्टि व्यापी हो चला है। अब काम देवता अपदेवता नहीं रहा, वह जीवन का देवता बन गया है। भारतीय मनीषा का निष्कर्ष था - - "काम मंगल से मंडित श्रेय"

डॉ अल्पना मिश्र

लेखन उड़ने के लिए नहीं है - - - हिंदी कथा जगत की प्रमुख हस्ताक्षर अल्पना मिश्र का जन्म 18 मई को 1969 आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ। हिंदी के मनीषी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के परिवार में जन्म होना आपका सौभाग्य रहा जहां आंखें खुलते ही किताबों में घिरी रहीं । यही कारण रहा कि परिवेश, अनुशासन, तर्क - बहस और सीखने की बैचेनी मिली। प्रतिभा की धनी कथाकार डॉ अल्पना मिश्र ने महज कम उम्र में ही कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में हिंदी कथा साहित्य को नये आयाम दिए। हिंदी में आपको "अनकन्वेंशनल राईटर" माना गया। गोरखपुर विश्विद्यालय से हिंदी में एम. ए., बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पी-एच. डी की शिक्षा प्राप्त डॉ मिश्र कई बड़े साहित्यकारों की छाया में पलीं। भाषा की ताजगी, विलक्षणता और लेखन में लोकरंग की उपस्थिति उनके लेखन को अलग पहचान देते हैं। 'भीतर का वक्त' ,'छावनी में बेघर' , 'कब्र भी कैद और जंजीर भी' और 'स्याही में सुरखाब के पंख' जैसे 6 कहानी संकलनों में आपने समाज के भीतर व्याप्त सच्चाई को शब्दों का उचित कैनवास दिया है। इन कहानियों के माध्यम से साहित्य जगत में एक विशेष स्थान बनाया है। समाज की जिन कुरूपताओं को कहा नहीं जा सकता, उसे उनकी कहानियों के किरदारों ने बखूबी कहा है। "हंस" पत्रिका में आपकी पहली कहानी "ऐ अहिल्या" छपी। वैसे वे स्वयं बताती हैं कि जब उन्हें कुछ समझ आई थी, संभवतः 11 वर्ष की आयु में अन्याय के विरोध में एक कविता लिखी थी जिसके शब्दों में सबकी आवाज प्रतिध्वनित हुई थी।लेखक की आवाज सबकी आवाज बने तभी वह सार्थक है। आपकी बहुत- सी कविताओं को मदनमोहन ने" नई रचना" पत्रिका में प्रकाशित कीं जिससे उत्साह वर्धन मिला। वे मानती हैं लेखक बनना बहुत ही जिम्मेदारी का कार्य है। यह बात उन्हें तब समझ में आई थी जब 2001 में कथादेश के अंक में "मुक्ति प्रसंग" कहानी छपी और वे खुशी के मारे उड़ने लगी थीं । उस समय ढेर सारे पत्र आए थे जिनमें प्रशंसा से लेकर मिलेजुले विचारों की प्रतिक्रिया वाले पत्र थे। ऋषिकेश में पढ़ाने के दौरान बस- यात्रा में साधारण लोगों की समस्याओं और उनके अनुभवों, मानसिकता आदि से गुजरने का अवसर मिला। उन्हीं अनुभवों के फलस्वरूप इस कहानी को इतनी प्रशंसा मिली। लेकिन जिनसे प्रेरणा और अनुभवों को प्राप्त करके लिखी वे लोग संतुष्ट नहीं हुए क्योंकि सबकी बातें और उनकी समस्याएं तो छूट ही गईं थीं, उस एक कहानी में सबकी बात आनी संभव नहीं थी। कहाँ तो वे आकाश में उड़ रही थीं और उनकी अनगिनत समस्याओं ने उनकी उड़ान पर मानो रोक लगा दी और धड़ाम से वे धरातल पर आ खड़ी हुईं। लेखन उड़ने के लिए नहीं है। हम तो खूब छ्प रहे हैं और पुरस्कार मिल रहे हैं, मैं हीरो बन गई या खुशियां मिल गईं। नहीं, उनका मानना है कि लेखन जिम्मेदारी और गंभीरता का विषय है।अपनी जमीन न छोड़ने वाली अल्पना मिश्र ने उपन्यास का सहारा लिया जहाँ वे बहुत से लोगों की बात को कह सकती हैं। छपने और प्रकाशित होने के बाद भी वे वहीं रहती हैं। दुष्यंत कुमार की पंक्ति का हवाला देते हुए उनका कहना है - "मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूँ।" अपनी बैचेनी को सबसे जोड़ना ही सबकी आवाज है। उपन्यास 'अन्हियारे तलछट में चमका ' के प्रथम पृष्ठ के कुछ अंश पढ़ने से ही उत्सुकता जगती है - - "मैं अपने-आप से लड़ रही थी। यह आसान नहीं था। आदमी लहूलुहान हो जाता था और बाहर से दिखता भी नहीं था। दुनिया चोट के निशान को प्रत्यक्ष प्रमाण मांगती थी। प्रमाण नहीं होने पर सिरे से खारिज कर दिया जाता था। इसके बावजूद भीतर की लड़ाई जारी रहती थी। बड़ा भीषण था युद्ध का भीतर होना, बड़ा भीषण था कि शत्रु अपने ही भीतर छिपा बैठा था। अपने ही भीतर कायरता का अगाध समुद्र लहरा रहा था। रोकता, डराता, विचलित करता जहाँ सबसे ज्यादा गहरा था, वहीं से उतरा कर निकलना था। * * * अलग दिखना और अलग होने में फर्क होता है। जीवन बहता रहता था। बहते हुए को साफ दिख जाता था, कुछ बहकर आगे निकल जाता था। हमारी पकड़ से बाहर, हमारी नींद से भी बाहर, हमारे स्वप्न से भी बाहर, हमारी पहचान से भी बाहर रहता था।इसी फर्क में जीवन बहता रहता था। " यह उपन्यास बनारस की पृष्ठभूमि पर लिखा हुआ है। " अस्थि फूल" सामाजिक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आंदोलनों की साझेदारी है जो झारखंड - हरियाणा से होता हुआ दिल्ली तक फैला हुआ है। जहां स्त्री और पृथ्वी उपस्थित है। तीन आलोचना की पुस्तकें" स्त्री कथा के पांच स्वर", "सहस्त्रों विखंडित आईने में आदमकद" , "स्वतंत्रोतर कविता "ने लेखन जगत में खूब धाक जमाई। मध्यवर्गीय स्त्रियों के साथ साथ निम्न वर्ग की स्त्रियां भी इनके लेखन का विषय रहीं। "भीतर का वक्त" कहानी में आज की स्त्री के मन में हो रहे परिवर्तन की ओर तथा अपनी लैंगिक वर्जनाओं की सीमा को लांघकर अपने व्यक्तित्व की खोज कर रही स्त्री की अन्तर्गाथा है। पंजाबी, बांग्ला, कन्नड़, अंग्रेजी, मलयालम, जापानी, रूसी भाषाओं में आपकी कहानियों का अनुवाद हुआ है। कुनूर विश्विद्यालय, केरल, केरल विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, अवध और फैजाबाद विश्वविद्यालयों में बीए तथा एम ए के पाठ्यक्रमों में आपकी कहानियां शामिल की गई हैं। शैलेश मटियानी स्मृति कथा सम्मान(2006) और परिवेश सम्मान, राष्ट्रीय रचनाकार सम्मान, शक्ति सम्मान, प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता (2008) सम्मान से सम्मानित की गई। उनका मानना है कि पुरस्कार लेखन के प्रति और जिम्मेदारी बनाते हैं। नवाचार के विषय में उनका कहना है कि निरी कल्पना नहीं, ट्रीटमेंट नया होना आवश्यक है। नये यथार्थ को लाने के साथ-साथ नई दृष्टि लाने की आवश्यकता है। सच्चाई की मूल समस्याओं पर जाना चाहिए।हर क्षेत्र में स्पेस देने की आवश्यकता है। कोई भी साहित्य तभी नया होता है जब समाज में संवाद हो, बहस हो, तर्क हो तभी नई नई शाखाएं बनती हैं। परिवेश के साथ वैयक्तिक अनुभव, अध्ययन और परिश्रम से प्रतिभा का विकास होता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का कहना है कि" प्रतिभा किसी के कुल की विरासत नहीं है।" अल्पना मिश्र किसी भी बड़े साहित्यकार की रचना को उनके मापदंडों के अनुसार ही आंकती हैं न कि किसी और से समानता के आधार पर। 2018 नवंबर में जापान सरकार ने किसी हिंदी रचनाकार पर फोकस कर 15 दिनों तक कार्य किया जो हिंदी जगत के लिए गौरव की बात है। जहां जापान की प्रसिद्ध कवि योको तवाडा़ और अस्सी की दशक की मशहूर कथाकार हिरोमी इटो जी से आपका अविस्मरणीय संवाद हुआ। उस यात्रा का संस्मरण भी आपने लिखा है। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी की ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं। अभी भी उनका काम जारी है - 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कोरोना का अंधविश्वास

विज्ञान पर भारी अंधविश्वास कैसे हो कोरोना वैरियर्स पर विश्वास चिंतन पढ़कर एकबार फिर पुराने दकियानूसी भारत की ओर ध्यान चला गया। झाड़ फूंक, नीम हकीम, जादू-टोना और चमत्कारों से बीमारियों को भगाने का चलन अशिक्षित और निरक्षर लोगों में आदि काल से चला आ रहा है जो शिक्षितों और पढ़े-लिखे को भी आकर्षित करने लगा। विज्ञान लोगों की बुद्धि और तर्क से जुड़ा है जबकि अंधविश्वास तो श्रद्धा और आस्था से जुड़ा है। आस्था की ताकत विज्ञान को नकारती है। निराशा की चरम परिणति ही तंत्र मंत्र जप उपवास पूजा-अर्चना होम यज्ञ आदि विभिन्न राहों को जन्म देते हैं। कोरोना महामारी में फिर एक बार निराशा के भाव अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है। कोरोना का रोगी दहशत में जी रहा है, जहां उसे सिर्फ मृत्यु के खुले दरवाजे ही दिखाई दे रहे हैं। विज्ञान वहां लोगों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। दवाईयां नहीं है। सरकारी व्यवस्था लचर पचर है। स्वास्थ्य व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। कोई अस्पताल नहीं जाना चाहता क्योंकि वहां तो संक्रमण फैला हुआ है तो कोरोना ठीक कैसे होगा। लाखों का बिल बनाया जा रहा है। झाड़ फूंक में पैसा कम लगता है। एक-दो ठीक हो गए तो बस लोगों की भीड़ उधर ही हो लेती है। पढे़ लिखे भी इंसान हैं। उन्हें लगता है कि लोग गलत नहीं है, फायदा हुआ है, तभी लोग जाते हैं। मनुष्य स्वभाव को चमत्कार अधिक आकर्षित करते हैं। कोरोना की आरती, कोरोना के लिए यज्ञ, कोरोना माई की कहानी आदि होने लगे हैं। कार्टून और कविताएं भी बन रही हैं। समाज के दो पहलू हैं विज्ञान और अंधविश्वास। दोनों में ही समाज जीना सीखने लगता है। - डॉ वसुंधरा मिश्र

चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूंथा जाऊँ-माखनलाल चतुर्वेदी

सन् 1938 तक पहुंचते पहुंचते कुछ ऐसी कविताएं लिखी जा रही थीं जो प्रारंभिक दौर में तो छायावादी थीं परंतु बाद में कविताओं के रूप स्वरूप में बदलाव आने लगा। छायावाद और प्रगतिवाद के मध्य दो प्रकार की कविताएं सामने आईं - - एक तो राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता और छायावादोतर गीति कविता या प्रणयमूलक वैयक्तिक कविता। आधुनिक कविता में देशभक्ति और राष्ट्रीयता के भावों का गहरा प्रसार दिखाई देता है। इन कविताओं में अंग्रेजी के दमन चक्र के कारण देशवासी पिस रहे थे और अंग्रेज समृद्ध होते जा रहे थे। इसी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ छायावादी संस्कारों के कवियों के हृदय में विद्रोह की आग भड़क उठी। आग की लपटें जैसे जैसे तेज होती गईं, वैसे वैसे कवियों का संवेदनशील हृदय आक्रोश से भरता चला गया। ऐसे ही कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी जी का नाम आता है। इनके समय रामधारी सिंह दिनकर, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान आदि कवियों की रचनाएं भारतवासियों को देशप्रेम से ओतप्रोत कर रही थीं। इस समय की रचनाएं गांधी वादी सौंदर्य चिंतन के साथ साथ भावात्मक और क्रियात्मक रूप से अधिक प्रभावित करने वाली थीं। माखनलाल चतुर्वेदी जी का जन्म 4 अप्रैल सन् 1889 को होशंगाबाद से 14 मील दूर "बाबई" गांव में हुआ था। इनके पिता श्री नंदलाल चतुर्वेदी एक साहसी और संस्कारों से युक्त प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक थे। उनकी असमय मृत्यु के पश्चात वे " सिमरनी" कस्बे में अपनी बुआ के यहाँ भेज दिए गए जहां उन्होंने दस वर्षों तक शिक्षा प्राप्त की। आरंभ से ही तुकबन्दी में रुचि रखने वाले माखनलाल चतुर्वेदी जी ने संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में साहित्य का उच्च कोटि का ज्ञान भी प्राप्त किया । सन् 1904 में उनका विवाह ग्यारसी बाई से हुआ। सन् 1905 में बंबई के पास एक गांव "मसन" में अध्यापक की नौकरी की जो बाद में स्वदेश प्रेम के कारण स्वेच्छापूर्वक त्याग दी। देश की मिट्टी से इनका बचपन से ही अनन्य प्रेम था इसी कारण वे घर पर भी पूरा ध्यान नहीं दे पाए थे। इनकी पत्नी भी राज्यक्षमा रोग से पीड़ित थीं और जल्द ही चल बसीं थीं। माखनलाल चतुर्वेदी जी "भारतीय आत्मा" के नाम से विख्यात राष्ट्रीय जागरण के अमर गायक रहे हैं। उन्होंने अपने आपको कवि कर्म तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय सेनानी का दायित्व निभाने में भी आगे रहे। गांधी जी के असहयोग आंदोलन में इनकी क्रांतिकारी भूमिका रही। इन्हें कारागार का दण्ड भी भोगना पड़ा जहां "कैदी और कविता "रचना लिखी। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध में इनकी कविताओं में क्रांति के स्वर की प्रमुखता रही। हिम किरीटनी, माता, हिम तंरगिणी, युग चरण, समर्पण, वेणु लो गूंजें धरा आदि इनके प्रमुख काव्य - संग्रह हैं। तिलक, महात्मा गांधी, रोलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, गणेश शंकर विद्यार्थी, हिन्दू - मुस्लिम एकता आदि इनकी कविताओं के प्रमुख विषय रहे हैं। इनकी कविताओं में कहीं-कहीं आध्यात्मिकता भी दिखाई देती है। चतुर्वेदी जी के काव्य में प्रेम और भक्ति की धारा राष्ट्रीय चेतना से युक्त होकर सामने आयी है।राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानने वाले चतुर्वेदी जी ने भारतवासियों को सदैव उनके दायित्वबोध से परिचित कराने का सफल प्रयत्न किया है। राष्ट्रीय चेतना के कवियों में चतुर्वेदी जी का शीर्ष स्थान है। भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय जागरण त्याग बलिदान एवं सांस्कृतिक गौरव अभिमान की दृष्टि से चार गीत विशेष महत्व रखते हैं। वे हैं - - राष्ट्रगान (जन मन गन), वंदेमातरम्, सारे जहाँ से अच्छा तथा पुष्प की अभिलाषा। संसार के किसी अन्य कवि ने स्वदेशी स्वतंत्रता के लिए आत्मबलिदान की ऐसी कामना नहीं की है 💐💐💐💐---- चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ भाग्य पर इठलाऊं मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक वे एक सिपाही के रूप में सदैव राष्ट्र मुक्ति के युद्ध में सन्नद्ध खड़े अपने सेनापति के आदेश की प्रतिक्षा करते हैं 💐💐💐💐----- बोल अरे सेनापति मेरे मन की घुंडी खोल, जल-थल- नभ, हिलडुल जाने दे, तू किंचित मत डोल। दे हथियार या कि मत दे तू पर तू ही कर हूंकार। ज्ञातों को मत, अज्ञातों को तू इस बार पुकार। वे सिर पर प्रलय लिए और नेत्रों में मस्ती भरे एक वीर सिपाही के रूप में सदैव राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में लक्ष्य प्राप्ति हेतु अटल खड़े हैं 💐💐💐💐---- सिर पर प्रलय नेत्र में मस्ती मुट्ठी में मनचाही लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है मैं हूँ एक सिपाही। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के सिपाही माखनलाल चतुर्वेदी जी सेनानी से अपनी बलि देने की आज्ञा मांगते हुए कहते हैं 💐💐💐💐---- खिलने के पहले टूटेगीं, तोड़, बता मत भेद वनमाली अनुशासन की सूची से अंतर छेद श्रम- सीकर, प्रहार से जीकर, बना लक्ष्य अराध्य मैं हूँ एक सिपाही, बलि है मेरा अंतिम साध्य। सैनिक केवल लड़ना जानता है। जीवन से उसे मोह कैसा। मृत्यु से उसे भय कैसा। वह तो इतना ही जानता है कि 💐💐💐💐------- मरण के बीच विश्राम कहाँ वे कहते हैं 💐💐💐💐--- धीरज रोग प्रतीक्षा चिंता सपने बने तबाही ऐ दिलदार द्वार खुलने दे, मैं हूँ एक सिपाही। **** * *** *** खून हो जाए न तेरा देख पानी मरण का त्योहार, जीवन की जवानी। मरण का त्योहार मनाने का यह दिव्य स्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। तभी तो देश की स्वतंत्रता के लिए जेल यात्रा और हथकड़ियां उनके लिए गौरव यात्रा और ब्रिटिश राज के गहने थे 💐💐💐💐------ क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना। हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना। जो कवि स्वयं बलिदान की भावना को लेकर मृत्यु का जयगान कर रहा हो, वह राष्ट्रीय पथ का सच्चा पथिक ही हो सकता है। ऐसे कवि की ओजस्विता का क्या कहना। बलिपंथी कारागार को कृष्ण मंदिर, हथकड़ी को माता, पृथ्वी को शैय्या और आकाश को आच्छादन मानकर अपने नाम के संकेत पर सुरपुर तक को ठुकरा कर राष्ट्र के लिए समर्पित हैं। मानव-जीवन की अनुभूति को ओजस्वी स्वर दिया जिसके कारण राष्ट्र जाग उठता है।" अमर राष्ट्र " कविता में वे कहते हैं 💐💐💐💐💐--- मैं यह चला पत्थरों पर चढ़, मेरा दिलवर यहीं मिलेगा। फूंक जला दें सोना चांदी तभी क्रांति का सुमन खिलेगा। युग कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी ने अपने युग की आत्मा को पहचान कर उसे वाणी के स्वर दिए 💐💐💐💐- - - मातृभूमि है उसकी, जिसको उठ जीना आता है, दहन भूमि है उसकी, जो क्षण क्षण गिरता जाता है। बापू के प्रति उनके उद्गार 💐💐💐💐----- युग तुम में, तुम युग में कैसे झांक रहे हो बोलो। उथल-पुथल तब हो कि समय में जब तुम जीवन घोलो। ******* कंठ भले हों कोटि-कोटि तेरा स्वर उनमें गूंजा। हथकड़ियों को पहन राष्ट्र ने पढ़ी क्रांति की पूजा। राष्ट्रीय धारा के सशक्त कवि माखनलाल चतुर्वेदी वास्तव में "भारतीय आत्मा" के प्रतीक हैं जिनके हर शब्द, हर भाव और हर कार्य में राष्ट्रीय अनुगूंज होती है। देश प्रेम और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले भारत के परंपरागत आदर्श, त्याग, बलिदान और गांधीवाद के विचारों को बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया। राष्ट्रीय वेदना, शौर्य और उदात्त भारतीय संस्कृति की आंतरिक चेतना वाले महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की पुण्य तिथि पर शत शत नमन ।🙏 🙏 🙏 - - डॉ वसुंधरा मिश्र

पत्रकार पं. झाबरमल शर्मा :राजस्थानी मानस और जाति स्वाभिमान के पुरोधा

पत्रकार पं. झाबरमल शर्मा :राजस्थानी मानस और जातीय स्वाभिमान के पुरोधा लोकमान्य तिलक के संस्कार - गोत्र पत्रकार एवं संपादक पं. झाबरमल शर्मा गांधी युग की धारा की ऊर्जा के साथ देश- हित और जातीय चेतना के निमित्त अपने धर्म धरातल को सक्रियता से निभा रहे थे।। महात्मा गांधी, हीरालाल शास्त्री, हरिभाऊ उपाध्याय, जयनारायण व्यास, रुद्रदत्त शर्मा, अमृतलाल चक्रवर्ती, दुर्गा प्रसाद मिश्र, सत्यदेव विद्यालंकार, रामनाथ सुमन, शिवपूजन सहाय जैसे कृति संपादक और गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, चंद्रधर शर्मा गुलेरी जैसे मनीषी उस युग के देश पुत्र थे। पं. झाबरमल शर्मा ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जो राजस्थान के साथ साथ बंगाल के लिए भी गौरव का विषय है। इन सभी का लक्ष्य एक ही था जातीय चेतना का बहुमुखी विकास और देश का समग्र अभ्युत्थान। पं. जी की कर्मस्थली कलकत्ता ही रही । हिंदी पत्रकारिता की प्रवास कर रहे जन्मभूमि कलकत्ता से उस समय राजा राममोहन राय ने बंगदूत पत्र निकाला जो बंगला, फारसी, अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं में निकला। केशवचंद्र सेन, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, सर आशुतोष मुखोपाध्याय अपनी भाषा, जाति, धर्म तथा संपूर्ण समाज के हित के लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं निकाल रहे थे। राजस्थान और दूसरे प्रदेशों में व्यवसायिक प्रयोजनों से प्रवास कर रहे राजस्थानियों के उद्योग से कई पत्र-पत्रिकाएँ निकाल रहे थे। पं. झाबरमल शर्मा ने सन् 1914 में अपने संपादन में चीनी पट्टी से "कलकत्ता समाचार" निकाला जिसका जिक्र पं. झाबरमल शर्मा अभिनंदन ग्रंथ (राजस्थान मंच द्वारा 1977 में प्रकाशित) में श्री हरिलाल ठाकोर ने किया है। साहित्यकार पद्मश्री से सम्मानित डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने हिंदी "पत्रकारिता :राजस्थानी आयोजन की कृति भूमिका "ग्रंथ के पृष्ठ सैंतालीस में लिखा है कि पं झाबरमल शर्मा ने ज्ञानोदय के प्रकाशन के विषय में बताया था कि बाबू तेजपाल इसको प्रकाशित करते थे जो उनके पिताजी के मित्रों में से एक थे। पं. शर्मा रौलट एक्ट के विरुद्ध" कलकत्ता समाचार" ने जो आवाज बुलंद की थी, उसी का परिणाम था कि उन्हें गवर्नर से धमकी मिली और उन्होंने "गवर्नर का गुस्सा" लेख लिखा। जिसके बाद तो पत्र ही बंद ही करना पड़ा। वे उस दमन के युग में भी निर्भीक संपादक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त थे। दिल्ली से हिंदू संसार नामक दैनिक पत्र निकाला। मारवाड़ी नामक मासिक पत्रिकाओं का संपादन पंडित जी की पत्रकारिता जगत को महत्वपूर्ण देन थी। राजस्थान की राजनीति, धर्म, संस्कृति, सभ्यता पर सीकर और खेतड़ी का इतिहास विवेकानंद पर दो खंड आदि दस से अधिक ग्रंथ तथा छह ग्रंथों का संपादन जिसमें माधव मिश्र निबंध माला, गुप्त निबंधावली, बालमुकुंद गुप्त स्मारक ग्रंथ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। नागरीप्रचारिणी सभा से गुलेरी गरिमा ग्रंथ प्रकाशित हुआ। अस्सी वर्षों तक शर्मा जी ने हिंदी साहित्य व पत्रकारिता की दुनिया सेवा की। 4 जनवरी 1983 ईस्वी को जयपुर राजस्थान में आपका देहावसान हुआ। पं. झाबरमल शर्मा द्विवेदी युग के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं तिलक युग के संस्कारों से युक्त राजस्थान एवं बंगाल की विरासत हैं जिनका नाम सदैव सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा। 1982 ईस्वी में पद्मभूषण सम्मान से विभूषित पं शर्मा को महाराणा मेवाड़ सम्मान प्राप्त हुआ। राजस्थान पत्रिका और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सहयोग से जयपुर में पं झाबरमल शर्मा पर मेमोरियल लेक्चर का आयोजन भी होता है। यह झाबरमल शर्मा म्यूजियम और पत्रकारिता शोध केंद्र जयपुर में संपन्न होता है। राजस्थान ब्राह्मण संघ, आर्ष भारती पं झाबरमल शर्मा साहित्य सम्मान भारत के प्रतिष्ठित और विशिष्ट साहित्य सेवियों और पत्रकारों को देता है जो राजस्थान प्रदेश की जातीय संवेदना से जुड़े हैं। राजस्थान प्रदेश की जातीय संवेदना हीरक जयंती 2014 के अवसर पर यह सम्मान बीकानेर निवासी आईआईआईटी हैदराबाद में विशिष्ट प्रोफेसर पद पर कार्यरत साहित्य साधक और गांधीवादी डॉ नंदकिशोर आचार्य को प्रदान किया गया। पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पं. झाबरमल शर्मा जी को शत शत नमन। - - डॉ. वसुंधरा मिश्र, कोलकाता

मेरा जीवन मेरा संदेश है-कस्तूरबा

मेरा जीवन मेरा संदेश है-कस्तूरबा - - आप मुझे जानते हैं। मैं हूं आपकी बा, मोहनदास कर्म चंद गांधी की धर्मपत्नी। मेरा जन्म 11 अप्रेल सन् 1869 में गुजरात के पोरबंदर जिले के छोटे से गांव में पिता गोकुलदास मकनजी और माँ ब्रजकुंवर बा कपाड़िया के यहाँ हुआ। मैं उनकी तीसरी संतान थी। मेरा विवाह सन् 1883 में मेरे पिता के मित्र के बेटे मोहन के साथ 7 साल की अवस्था में कर दिया गया था । मोहन भी उस समय 13 वर्ष के थे। उस समय बाल विवाह होता था। मेरा शुरुआती जीवन कष्ट से भरा रहा। मेरा जीवन देश और पति के लिए ही समर्पित रहा। दूसरी स्त्रियों की तरह मेरी निरक्षरता के लिए बापू मुझसे अप्रसन्न रहते थे। मेरा सजना,संवरना और घर से बाहर निकलना उन्हें पसंद न था, मुझ पर अंकुश लगाते लेकिन बापू के सभी प्रयास असफल रहे। बाद में तो मैं उनके हर कदम पर साथ रही। निरक्षर होने के बावजूद मुझमें अच्छे- बुरे को पहचानने का विवेक था। मैंने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया। 1906 में उनके साथ अफ्रीका गई और उसी दौरान मैंने उनके साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपने जीवन का सबसे पहला सत्याग्रह किया जिसमें मुझे तीन महीने की जेल हुई।अंत में, जीत हम स्त्रियों की हुई। बापू के स्वाधीनता संग्राम के बड़े लक्ष्य के पीछे मैंने सदैव उनके कदम से कदम मिलाया। कई बातों पर हमारी नोक-झोंक भी होती। 1928 में ब्रिटिश हुकूमत ने लगान बढ़ा दिया तब सरदार वल्लभभाई पटेल के सहयोग से मैंने इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को एकजुट किया। इतिहास में पहली बार इतना बड़ा महिलाओं को आंदोलन हुआ। मेरे इस प्रस्ताव को अद्भुत सफलता मिली। इसके बाद सन् 1930 में डांडी यात्रा में बापू के साथ रही। इस दौरान सूरत में शराबबंदी के लिए भी सभी महिलाओं को मैंने एकत्र किया और धरने पर बैठ गई। नतीजा यह हुआ कि सूरत की सारी शराब की दुकानें बंद हो गई। मेरी इस सफलता का यह प्रभाव यह पड़ा कि मैं अंग्रेजी हुकूमत की आँखों में चुभने लगी। 1932-33 का ज्यादातर समय जेल की सलाखों के पीछे ही गुजरा। मुझे बिजलपुर जलकपुर के अध्यक्ष पद के लिए भी शामिल किया गया। मेरा मानना है - - - 'खुशी तब होती है जब आप क्या सोचते हैं, आप क्या कहते हैं और आप क्या करते हैं, सद्भाव में है।' गांव गांव में जाकर सफाई अनुशासन पढ़ाई आदि का महत्व बताती थी, दवाइयों का वितरण भी करती। बापू के अधिकतर उपवासों में उनके खाने पीने का ध्यान रखती। 1942 की बात है जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बापू गिरफ्तार कर लिए गए तो मैंने मुंबई के शिवाजी पार्क में भाषण देने का निश्चय भी किया लेकिन मुझे भी गिरफ्तार कर लिया गया और पूणे के आगा खाँ महल में रखा गया।बापू भी वहीं थे। 1944 में दो बार मुझे हृदय का दौरा पड़ा। सरकार ने आयुर्वेद डॉक्टरों का प्रबंध भी किया लेकिन 22 फरवरी 1944 को बड़ा दिल का दौरा पड़ा और मैं भारत की आज़ादी का स्वप्न लिए ही चल बसी। जहां प्यार है, वहाँ जीवन है। मेरा परिवार, मेरे चार पुत्र हरिलाल, देवदास, मनिलाल और रामदास गांधी अवश्य ही स्वतंत्र भारत में तिरंगा फहराएंगे। बापू की तपस्या विफल नहीं जाएगी। वंदेमातरम।

आयुर्वेद और एलोपैथी किधर जाएं - किसे अपनाएं

आयुर्वेद और ऐलोपैथी : किधर जाएं - किसे अपनाएं ----- आज मनुष्य उत्तर-आधुनिक युग में जी रहा है जहां परंपरा, प्रकृति, पर्यावरण और विज्ञान को मानो उसने अपनी मुट्ठी में रख लिया है। आदर्श, मूल्य और चरित्र में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं।विज्ञान के नये- नये आविष्कार हुए जिनमें चिकित्सा के क्षेत्र में एलोपैथी यानी आधुनिक चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ और दूसरी चिकित्सा पद्धतियाँ जैसे आयुर्विज्ञान, होम्योपैथिक, नेचरोपैथ आदि विकसित हुए। आयुर्विज्ञान, विज्ञान अर्थात (आयु +र् + विज्ञान ) आयु का विज्ञान है। यह वह विज्ञान व कला है जिसका संबंध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु (निरोगी जीवन) बढ़ाने से है। प्राचीन सभ्यताएं मनुष्य में होने वाले रोगों के निदान की कोशिश करती रही हैं। इससे कई चिकित्सा (आयुर्विज्ञान) पद्धतियाँ विकसित हुई। इसी प्रकार भारत में भी आयुर्विज्ञान का विकास हुआ जिसमें आयुर्वेद पद्धति सबसे ज्यादा जानी जाती है अन्य पद्धतियाँ जैसे कि सिद्ध वैद्य, नेचरोपैथ, योग प्रणाली, होम्योपैथी और एलोपैथी भी भारत में विकसित हुई। प्रारम्भिक समय में आयुर्विज्ञान का अध्ययन जीव विज्ञान की एक शाखा के समान ही किया गया था, बाद में 'शरीर रचना' तथा 'शरीर क्रिया विज्ञान' आदि को इसका आधार बनाया गया। पाश्चात्य सभ्यता में औद्योगीकरण के समय जैसे अन्य विज्ञानों का आविष्कार व उद्धरण हुआ उसी प्रकार आधुनिक आयुर्विज्ञान एलोपैथी का भी विकास हुआ जो कि तथ्य आधारित चिकित्सा पद्धति के रूप में उभरी। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति आधुनिक चिकित्सा पद्धति है जिसकी दवाइयां बहुत जल्दी असर दिखाती हैं। एलो का अर्थ है अन्य और पैथी का अर्थ है पद्धति या विधि। इसका नाम होम्योपैथी के जन्मदाता जर्मन चिकित्सक सैमुअल हैनिमैन ने सन् 1810 में दिया था। होम्योपैथी में सही लक्षणों से सटीक इलाज होता है बशर्ते रोग की सही पहचान हो। स्वतंत्रता के पहले आयुर्वेद उपेक्षित तो था ही किंतु स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक आयुर्वेद की उपेक्षा होती रही। स्वतंत्रता के बाद आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ही मानी गई। कोलकाता, बनारस, हरिद्वार, इंदौर, पूना, बंबई, केरल, गुजरात आदि क्षेत्रों में आयुर्विज्ञान के संस्थान बने। वेदों में ऋग्वेद में च्यवन ऋषि को पुनः युवा करने का कथानक आता है और रोगों का निवारण जल, वायु, सौर, मानस आदि चिकित्सा पद्धति से किया जाने का विधान है। यजुर्वेद में औषधि सूक्त, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का वर्णन है। अथर्ववेद के प्रथम मंत्र में ही आयुर्वेद के सिद्धांत का परिचय मिलता है जो कि त्रिदोष सिद्धांत एवं सप्तधातु सिद्धांत है। तीन दोष वात पित्त और कफ़ तथा सात धातुएं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि तथा शुक्र आदि है। ऋषि कहते हैं - - - ये त्रिषप्ताःपरियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे।। अर्थात तीन और सात का यह संयोग या समुच्चय विश्व के समस्त रूपों को धारण करता हुआ गतिशील है, वाणी का पति सोम या इन्द्र उनके बलों को हमें प्राप्त कराएं। अथर्ववेद को क्षत्रवेद और भैषज्य वेद भी कहते हैं, इसमें औषधि रोग चिकित्सक एवं चिकित्सा का ज्ञान है। वेदों में बहुत ही विस्तार से शल्य, गर्भाधान, बाजीकर, विष आदि प्रकरणों का विश्लेषण मिलता है। वेदों में शरीर को ब्रह्मपुरी कहा गया है। रोग निवारण के लिए सूर्य, अग्नि, जल, विद्युत, वायु आदि का सहयोग होता है। वेदों में एक रोग के लिए एक औषधि का वर्णन मिलता है। एलोपैथी में बीमारी के लक्षण उभर नहीं पाते और धीरे-धीरे ठीक होता है। डॉक्टर नर्स फार्मासिस्ट हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री और डिप्लोमा लेते हैं। इनको प्रेक्टिस करने के लिए लाइसेंस मिलता है। इसमें दवाएँ, सर्जरी रेडियेशन कई थैरेपी शामिल हैं। एलोपैथी में दवाओं के अलावा प्रिवेंटिव मेडिसिन भी मिलती है जैसे वैक्सीन जो बीमारी होने से रोकती है। साथ ही कोई दवा देने से पहले क्लिनिकल रिसर्च और फिर ह्युमन ट्रायल होता है। कोरोना वैक्सीन आ गई हैं और सभी को दी जा रही है। अभी भारत कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है। संभवतः अब महामारी अपनी ढलान की ओर है। दूसरी लहर खतरनाक रही जिसने बहुत से परिवारों को मृत्यु की ओर ढकेल दिया। तब वैक्सीन भी नहीं लग सकी थी। एलोपैथी चिकित्सा बहुत वर्षों से आधुनिक समाज में लागू होने के कारण हम उसे ही प्रमुखता देते आए हैं। इसका कारण है हमें रोग से तुरंत आराम चाहिए। दर्द, पीड़ा और वेदना सहने की सहनशक्ति अब हमारे भीतर नहीं है। रोग से लड़ने की शक्ति तो बिल्कुल ही नहीं है यह बात अलग है कि शरीर में अपनी प्रतिरोधक क्षमता होती है जो छोटी-मोटी और साधारण मौसमी बिमारी जुकाम, सर्दी, खांसी आदि अपने आप तीन - चार दिनों में ठीक हो जाती है लेकिन हम अपने इन रोगों की एलोपैथी दवाई लेकर तुरंत ठीक होने पर तत्काल आराम पाते हैं जो मनुष्य स्वभाव का परिचायक है । एलोपैथी में एंटी बैक्टीरिया होते हैं जो इंफेक्शन को तुरंत समाप्त कर देते हैं। इससे एक समस्या का निदान होता है तो दूसरी समस्या या अधिक समस्याओं का जन्म भी हो सकता है। एलोपैथी में कैंसर जैसे रोगों तक का इलाज है। आयुर्वेद में भी कैंसर का इलाज है लेकिन उसमें बहुत लंबा समय लगता है और उतनी सहनशक्ति किसी भी रोगी में नहीं होती। आयुर्वेदिक दवा खाने से कभी भी नुकसान नहीं होता। यह बिमारी को जड़ से खत्म करती है। आयुर्वेद हजारों वर्षों से स्वस्थ जीवन का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह प्राचीन विज्ञान है जिसे सिस्टर सांइस के नाम से भी जाना जाता है। पांच हजार वर्षों से आयुर्वेद का मुख्य फोकस जीवन के भावनात्मक और भौतिक रूप को पहचान कर उसे जड़ से दूर करना है। इससे शरीर का शुद्धिकरण, स्वस्थ वजन, त्वचा बाल का रखरखाव, तनाव से बचाना, जलन सूजन को दूर करना, निम्न रक्तचाप, कोलेस्ट्राल और बहुत सी बीमारी का उपचार संभव है। आयुर्वेद सात्विक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाता है। यह जीवन का भौतिक, मौलिक तथा आत्मिक ज्ञान का नाम है। आयुर्वेद का उपचार मानव शरीर और मस्तिष्क को प्राकृतिक रूप से ठीक करता है। आयुर्वेद के प्रति यह भ्रामक धारणा प्रचलित है कि यह केवल जप, योग, पिसे हुए पदार्थ, तेल की मालिश आदि तक ही सीमित है। संस्कृत के शब्द अयुर यानी विज्ञान और वेद का यानी ज्ञान इन दोनों से आयुर्वेद नाम आया जो वेद पुराणों में मिलता है। भारत में ही इसका उद्गम हुआ है।आयुर्वेद प्रमुख रूप से शरीर को पंचतत्वों जल पृथ्वी आकाश अग्नि वायु से निर्मित मानता है जो विज्ञान पर आधारित है। आयुर्वेद में तीन चीजों पर अधिक ध्यान दिया जाता है--वात पित्त और कफ़। इन तीनों के संतुलन से शरीर मन चेतना ठीक रहते हैं।वात पित्त और कफ़ में परिवर्तन से शरीर में विकार आते हैं। वात शरीर की गति से जुड़ी सूक्ष्म ऊर्जा है जो अंतरिक्ष और वायु से बनी है। यह श्वास निमिष मांसपेशियों ऊतक आंदोलन हृदय की धड़कन और साइटोप्लाज्म और कोशिका झिल्ली में होने वाले सभी आंदोलनों को नियंत्रित करता है। वात संतुलित न होने पर भय चिंता पैदा होती है। पित्त शरीर के पाचन अवशोषण आत्मसात पोषण चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। पित्त आग और पानी की से बना है। कफ़ वह ऊर्जा है जो शरीर की संरचना हड्डियों मांसपेशियों का निर्माण करती है। कोशिकाओं को जोड़ने का काम करता है। यह पृथ्वी और जल से बनता है। यह जोड़ों में चिकनाई देता है त्वचा को नमी देता है प्रतिरक्षा को बनाए रखता है। अतः शरीर में सब घटकों को संतुलित करने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा का महत्व है। कोरोना महामारी के दौरान आयुर्वेद के प्रति लोगों का रुझान बढा़ है क्योंकि कोरोना महामारी के इलाज की खोज एलोपैथी में अभी तक नहीं हो पाई है। इस महामारी की वैक्सीन आ गई है लेकिन दोनों डोज़ लगने के बाद भी देखा गया कि वह व्यक्ति कोरोना ग्रसित हो गया। कोरोना का निदान एकांत वास, योग, आहार-विहार, प्राणायाम, स्वच्छ वातावरण, घर में बना स्वच्छ और हल्का सुपाच्य भोजन करना आदि सब आयुर्वेद से संबंधित इलाज पर केंद्रित है। जब घर के अंदर इसका इलाज हो सकता है तो ऐसे में एलोपैथी की बड़ी - बड़ी कंपनियों का मुंह लटक गया। उनकी मोनोपोली कहीं समाप्त न हो जाए और अरबों का घाटा कहीं उनकी दुकानदारी को खत्म न कर दे। इस लोकतंत्र में वैसे तो सभी को अपनी सेवाएं देने का अधिकार है। चिकित्सा पद्धति वही अच्छी और कारगर है जो रोगी के प्राण बचाए और स्वस्थ करे। कोरोना का प्रामाणिक इलाज तो आयुर्वेद या एलोपैथी दोनों के ही पास अभी नहीं है लेकिन भारत सरकार द्वारा दी गई सावधानियों और सुझाव जैसे मास्क लगाना, सेनेटाइजर, से हाथों को बार बार साफ करना, दो गज की दूरी बनाए रखना, छींक, जुकाम खांसी को दूरी से करना संक्रमण को दूर करने में सहायक है। आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों ही भारत में फले फूले, साधारण आदमी का यही मानना है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन एफडीए आदि वैश्विक संस्थाएं एलोपैथी पर नजर रखती हैं। आयुर्वेद का सरकारी बजट भी नाममात्र का है लेकिन एलोपैथी पर सरकारी बजट लगभग 90% से भी ज्यादा है। भारत की चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। जब अथर्ववेद का मंत्र कहता है कि " विश्वा रूपाणी विभ्रतः" तब आशय समस्त प्राणियों के शरीर से है चाहे वे मनुष्य हो अथवा पशु हो अथवा पादप स्थावर आदि। भारतीय का मंत्र "वसुधैव कुटुम्बकम" में निहित है।

गीतांजलि श्री

गीतांजलि श्री के कृतित्व की एक झलक - - - गीतांजलि श्री का मानना है कि साहित्य तो है ही व्यंजना और लक्षणा का खेल। जानी-मानी कथाकार और उपन्यासकार गीतांजलि श्री केअब तक पांच उपन्यास और पांच कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं;उनकी कृतियों के जर्मन,फ्रेंच और अंग्रेजी भाषाओं मेंअनुवाद हुए हैं तो कई कृतियों पर इतालवी,कोरियन और रसियन भाषाओंमें काम हुआ है। हाल ही में प्रकाशित ‘रेत समाधि’को सब बंधन तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। फ़्रेंच में अनुदित किताब अलग जीवन शैली व संस्कृति वाले लोग पढ़ेंगे और उनकी सोच व समझ कृति में नए आयाम खोलेगी। कृति नए सिरे से जीवन पाएगी। ये लेखिका उपलब्धि मानती हैं । ख़ास अच्छा तब लगता है जब विदेशी पाठक अपनी संस्कृति से भिन्न जीवन में वह पाते हैं जो अलग दिखता है पर उनके अनुभव का हिस्सा भी है, यानी वे बातें जो विशेष होकर भी सार्वजनिक हैं और महज़ इंसानी। पराया भी अपना है! इसके पहले मेरे दो और उपन्यास फ़्रांसीसी में आ चुके हैं और मैं ख़ुशक़िस्मत हूं कि दोनों अनुवादकों से मेरा अच्छा सम्बंध बन गया है। एक हैं जानी मानी हिंदी की विदुषी प्रोफ़ेसर आनी मौंतो जो पेरिस में हैं, और दूसरे हिंदी पढ़ाते हैं स्विटज़रलैंड में, निकोला पोत्ज़ा। दोनों हिंदी साहित्य और हिंदुस्तान से ख़ूब परिचित हैं और कुछ हद तक भारतीय बन चुके हैं मेरी पुस्तक ‘सांस लेती अपनी दुनिया’ में भी ‘वास्तविक जीवन’ की हार्दिक ही बात है। सर्जन क्रिया में कल्पना और वास्तविक जीवन का विचित्र खेल चलता है और अगर एकदम सपाट साधारण लेखन की बात छोड़ दें तो ऐसा नहीं होता कि बस जीवन से सीधे सीधे चरित्र उठाया और साहित्य में बैठा दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत से तत्व मिलते हैं और साहित्य और उसमें आते चरित्र, घटनाएं, इत्यादि जन्मते हैं। अक्सर वास्तविक जीवन के अनेक चरित्र मिलके एक चरित्र निर्मित हो जाता है। सर्जक की कल्पना वहां काम करती है। असल बात यह है कि साहित्यकार अपने आसपास के जीवन से लेते हैं पर उसका अतिक्रमण भी करते हैं और उनकी कल्पना इस मिश्रण को जीवंत कर देती है और असल का विस्तार करती है। यह भी कहूंगी कि साहित्यकार को जीवन की सम्भावनाएं, जो हो सकता है अभी हासिल में नहीं आयी हों, भी प्रेरित करती हैं। ये सम्भावनाएं अच्छाई की भी हो सकती हैं और बुराई की भी। साहित्यकार उत्साहित भी कर सकती है, चेतावनी भी दे सकती है। यही कारण है कि भविष्य अक्सर साहित्य में प्रतिध्वनित होने लगता है। जॉर्ज ओरवेल का साहित्य हो या हमारे यहां टैगोर का गोरा । हिंदू समाज को अभी तक उसका गोरा नहीं मिला है, पर है वह कितना परिष्कृत, परतदार, गहरा चरित्र, और कितना ज़रूरी हमारे उद्धार के लिए। रेत समाधि में आप एक जगह लिखती हैं कि- “बेटियां हवा से बनती हैं। निस्पंद पलों में दिखाईं नहीं पड़ती और बेहद बारीक एहसास कर पाने वाले ही उनकी भनक पाते हैं।” गीतांजलि श्री के लेखन में ढेरों गूंज अनुगूंज हैं। एक बात यह कि बेटियों/औरतों को पुरुष-प्रधान समाज में अनदेखा किया जाता है या ख़ास ‘नज़र’ से देखा जाता है, उस नज़र से नहीं जो स्त्रियां चाहती हैं और जिसकी वे हक़दार हैं। उनका मानना है कि नयी नज़र हो,लड़की पहचानी जाए, उसकी बारीकी दिखे। महिलाएं पुरुष से अलग हैं, कितने अलग, किन बातों में अलग, इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है और वो निर्णायक बात से ज़्यादा एक चर्चा और बहुतेरे आयाम खोलने की बात है। समाज और संस्कृति ने किस तरह उन्हें अलग अलग जीव और पहचान बनाया है, वह चर्चा भी होनी होगी। उसकी जगह यहां नहीं है। अभी नहीं। वे अलग हैं, किन मायनों में हैं, किन मायनों में नहीं, इससे बराबरी की मांग पर फ़र्क़ नहीं ज़रूरी। मैं अलग हूं तो भी बराबरी मांगूंगी। बराबरी यह नहीं कि औरत के भी शिश्न हो और पुरुष के भी स्तन। बल्कि यह कि किसी भी सूरत में दोनों के समान अधिकार हों, समान विकल्प हों, चुनाव की एक-सी आज़ादी हो। हिंदी साहित्य में किसी नए क्राफ्ट,नए शिल्प या बुनाई के प्रयोग कम ही होते हैं। लेकिन रेत समाधि में आपने सब बंधन को तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। आपका मानना है कि रचना तब सशक्त होती है जब वह अपना विशिष्ट स्वर पा लेती है,अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है,अपनी चाल निर्धारित कर लेती है। रचनाकार को अपने को निमित्त बनने देना पड़ता है। ख़ुद को स्वतंत्र छोड़ने का उपक्रम करती हैं और कृति कोख रस्ते, भाषा, शिल्प-शैली चुनने देती हैं। मगर यह किसी अराजकता का पालन करना नहीं है। आपका अंतर्मन, लेखक-मन, चेतन-अवचेतन, संवेदना, सूझबूझ, कल्पना-शक्ति, प्रज्ञा, यह सब रचना शक्ति को तराशते रहते हैं और अभी भी तराश रहे हैं। आपका अंतर्मन अनजाने उन्हें गाइड करता है। अराजक होने से रोकता  है, साहस करने को उकसाता है, जोखिम लेने को भी, मगर धराशायी होने के प्रति चेताता भी है, पांसा ग़लत भी पड़ सकता है, पर वह सृजनधर्म में निहित है। और चैलेंज वही है कि संतुलन मिले पर ऊबा हुआ, रगड़ खाया, सपाट घिसा पिटा अन्दाज़ और ढब न बने। आपको रामानुजन का यह कथन बेहद प्रिय है कि-कि मैं कविता का पीछा नहीं करता,अपने को ऐसे ‘माहौल’ या ‘जगह’ में स्थित कर देता हूँ कि कविता मुझे ढूंढ़ लेती है। जैसा उस्ताद अली अकबर ख़ां ने कहा है – शुरू करता हूं तब सरोद मैं बजाता हूं, फिर सरोद मुझे बजाने लगता है। जहां उपन्यास रेत समाधि ने बंधन तोड़े हैं तो वह उसका अपना तलाशा और पाया हुआ सत्य है। अगर वह विश्वसनीय, ज़ोरदार बन गया, अपना व्यक्तित्व पा गया। सात साल बाद रेत समाधि राजकमल से प्रकाशित हुआ जो 'डूबना’ डुबा नहीं गया, कोई ‘मोती’ तल से भंवरता आख़िरकार ऊपर आया और हाथ लगा। शायद पाठकों के भी।

उषा किरण खान

कथाकार उषा किरण खान - किरण और मिन्नी के नाम से भी परिचित हैं । वे अपना परिचय महादेवी वर्मा की इन पंक्तियों से देती हैं - 'परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी, बह आज चली' इनका जन्म 7 जुलाई 1945 में लहेरिया सराय, पकड़िया गांँव, जिला दरभंगा के कोसी क्षेत्र बिहार राज्य में हुआ। पिता का नाम जगदीश चौधरी, माता का नाम शकुंतला चौधरी पांँच भाईयों - सुवेश, अखिलेश, विश्वेश, चंद्रेश और राकेश के बीच अकेली बहन पति बालसखा रामचंद्र खान भारतीय पुलिस सेवा में 1968 से 2003 तक रहे। चार बच्चों से भरपूरा परिवार, अनेक पौत्र - पौत्रियाँ। पौत्री लखिमा शंकर खान भी कला, शायरी और लोककला के प्रति संवेदनशील हैं।आद्या पंडित तीसरी पीढ़ी के बच्चों में सबसे छोटी ननिहाल की परंपरा की वाहक है। वैसे तो पूरा परिवार ही साहित्यिक संस्कारों से अनुप्राणित हैं। उषा जी की प्रारंभिक शिक्षा एंगल गर्ल्स स्कूल, पटना में हुई, बाद में लेडी रदरफोर्ड, दरभंगा में हुई, जहाँ इनके लिए हॉस्टल बनाया गया। हिंदी और मैथिली दोनों भाषाओं की लेखिका उषा जी बाबा नागार्जुन से प्रभावित रही हैं। इनके पिता सर्वप्रथम लोकमान्य तिलक और बाद में महात्मा गाँधी के सहयोगी रहे। वर्षों तक जेल में भी रहे। हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, गंगा शरण सिंह, नागार्जुन आदि साहित्यकारों का आरंभ से ही सानिध्य मिला। बाद में, नागार्जुन उनके अभिभावक रहे। यात्री काका (नागार्जुन) के साथ कविता भी पढ़ी, फिर कहानी और उपन्यास लेखन में आगे बढ़ती चली गईं। धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव आदि ने इनकी कहानियों का खूब स्वागत और प्रकाशित किया। ये कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। भाषा सौन्दर्य और लेखन शैली पर नागार्जुन का प्रभाव पड़ने का प्रमुख कारण यही रहा कि उषा किरण खान ने नागार्जुन को पिता की तरह माना और उनके साहित्यिक संस्कारों से प्रभावित रहीं जो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है। इनकी मॉं का पुनर्विवाह हुआ था जिसके कारण उन्हें सामाजिक तिरस्कार का दंश भी भोगना पड़ा।उषा किरण की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इन्होंने अपनी भाषा और क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ा। उषा किरण अवकाश प्राप्त इतिहास शिक्षाविद् रही हैं। अतः सामाजिक, ऐतिहासिक,पुरातत्व शोध से आपका गहरा संबंध रहा है। मिथिलांचल की आदिवासी धरती से जुड़ी दलित और आदिवासी महिलाओं पर उन्होंने विशेष रूप से लिखा है। सीता की धरती मिथिलांचल से जुड़ी होने के कारण आपने मैथिली लोककथाओं में रच - बस कर मैथिली के साथ - साथ हिंदी साहित्य को भी समृद्ध किया है। 16 उपन्यास, 150 हिंदी, मैथिली में कहानी, 2 मैथिली नाटक, 2 हिंदी नाटक लिखे । गाँव और महानगर समाज की स्त्रियों को अपने साहित्य में बराबर स्थान दिया। बेमेल विवाह आदि बहुत सी सामाजिक बुराइयों को भी दूर करने में अपना योगदान दिया। 'एक है जानकी' जैसी कहानियों ने स्त्री संसार को नए दृष्टि कोण से देखने का नजरिया दिया। उपन्यास - गई झूलनी टूट, पानी पर लकीर, फागुन के बाद, सीमांत कथा, रतनारे नयन (हिंदी), अनुत्तरित प्रश्न, हसीना मंजिल(12 भाषाओं में अनुदित) , भामती, सिरजनहार (मैथिली), अगन हिंडोला (ऐतिहासिक) आदि। कहानी संग्रह - गीली पॉक, कासवन, दूब धान, विवश विक्रमादित्य, जन्म अवधि, घर से घर तक (हिंदी), कांचहि बांस (मैथिली) आदि। नाटक - कहाँ गए मेरे उगना, हीरा डोम (हिंदी), फागुन, एक सारि ठाढ़, मुसकौल बला (मैथिली) कौस्तुभ स्तंभ, जवाहर लाल बाल नाटक - डैडी बदल गए हैं, नानी की कहानी, सात भाई और चंपा, चिड़िया चुग गई खेत (हिंदी), घंटी से बान्हल राजू, बिरड़ो आबिगेल (मैथिली) बाल उपन्यास - लड़ाकू जनमेजय। स्त्री मन की कहानियाँ-डॉ कुमार वरुण(संपादक), उषा किरण खान का कथा लोक - सोनी पांडेय( संपादक) शोधपरक ग्रंथ हैं। 2015 में साहित्य और शिक्षा के लिए पद्मश्री से सम्मानित उषा किरण खान को कई महत्वपूर्ण पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। 2019 में भारत भारती पुरस्कार, 2011 में साहित्य अकादमी अवार्ड उपन्यास भामती:एक अविस्मरणीय प्रेम कथा (मैथिली)के लिए। हिंदी सेवी सम्मान (राजभाषा विभाग बिहार सरकार), महादेवी वर्मा सम्मान (बिहार राजभाषा विभाग), दिनकर राष्ट्रीय पुरस्कार,बृजकिशोर मिश्र सम्मान। कुसुमांजली साहित्य उपन्यास 'सिरजनहार' पर इंडियन कौन्सिल फॉर कल्चरल रिलेशन्स द्वारा ढाई लाख रुपये का पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार, 2020 में प्रबोध साहित्य सम्मान - (आजीवन योगदान के लिए) साहित्य से जुड़ने के साथ साथ उषा किरण खान सामाजिक क्रियाकलापों में भी बेहद सक्रिय रहीं। पटना की महिला चर्खा समिति की अध्यक्षा हैं। इनका मानना है कि साहित्य में विचारधारा हावी हो, यह सही नहीं है क्योंकि लेखक को समदर्शी होना चाहिए। इन्होंने'आयाम' नामक संस्था की स्थापना की जो साहित्य का स्त्री स्वर है जिसका उद्देश्य ही है समाज की स्त्रियों के स्वर को प्रोत्साहित करना, घरों में बैठी संकोच में डूबी कवि लेखक स्त्रियों की पहचान कराना और स्त्री लेखन का सूचीकरण इत्यादि कार्यों को आगे बढ़ाना।इनके साहित्य में चूड़ीहारिन से लेकर महानगर की स्त्रियों को पढ़ा जा सकता है। 'गई झुलनी टूट' उपन्यास जल्द ही 'पॉडकास्ट' पर भी आने वाला है जिसकी प्रस्तुति 'आयाम' की युवा लेखिकाओं /कवयित्रियों द्वारा किया गया है। एक मजेदार किस्सा - - उनकी सास गंगा देवी जिनका पुकार नाम बुच्ची दाई था, इनका बहुत ही अंतरंग रिश्ता था। वे उन्हें चाची कहतीं जिनका साथ 1995 तक ही रहा। उनका बनाया सुस्वाद मैथिली भोजन आज भी उनको स्मरण हो आता है। उषा किरण जी के ही शब्दों में - - 'सौम्य शिष्ट और परम सुंदरी गंगा देवी 14 की थीं, जब दबंग सास की बहू हुईं। खाना बनाना ससुराल में ही सीखा होगा। वह बड़ी आनंदी स्वभाव की थीं। गीत का संचयन बहुत था। लेकिन यदि दोपहर और शाम में प्राती गाने की धुन पूछियेगा तो वो नहीं बतातीं बल्कि एक कहावत सुनातीं - - साँझ पराती, भोर बसंत तखनहिं बूझू गीतक अंत हास्य कथाओं की भंडार थीं, अभिनय करके कथा सुनातीं। सौन्दर्य, अभिनय कला और पाक कला उनकी सात पौत्रियों में उनसे ही आया है, पर गंगा देवी एक बड़े पंडित की बेटी तथा बड़े पंडित की पत्नी होती हुई निरक्षर थीं। मैंने जिन गांँव की कहानियों का जिक्र किया है सब उनसे ही सुना जिसे मैं हिंदी में अनुदित कर पटल पर रखूंँगी। अति परिश्रमी घोर दुःख सहकर भी आनंदी स्वभाव वाली गंगा देवी मेरी सास, मेरी सदा सहेली रहीं। ' सास बहू का रिश्ता सिर्फ रिश्ता ही नहीं है बल्कि उषा जी ने इसे पूरे घर, समाज, देश और राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर से जोड़ा है। चालीस साल पहले की लिखी कहानी 'अड़हुल की वापसी' का एक छोटा- सा अंश--- यह ठेठ कोसी क्षेत्र के गाँव की कहानी है। अड़हुल और ओवरसीयर साहब की कहानी, एकतरफ़ा उद्दाम प्रेम और नदी के वेग सा टीस उठता मन में। दशकों बाद फिर वह बेला आती है जब फिर दोनों आमने-सामने होते हैं। देखें क्या होता है - - अड़हुल - - घर पहुंँचते पहुंँचते मेरे अंदर सालों पहले की अड़हुल जाग कर बैठ गई। मेरा रोयांँ इस उमर में भी खड़ा होने लगा। कलेजा धक - धक करने लगा। यह क्या हो रहा है। साहेब के बगल में बैठी तीन घंटे से मैं नया जनम नहीं पुनरजनम लेने गई हाय राम! जब उन्होंने कहा कि वे लौट जाना चाहते हैं तो राहत की सांस ली लेकिन ये बच्चे भी न, अंकल - अंकल कहकर उन्हें रोक दिया। आगत स्वागत किया है सो ठीक पर मेरा मन चंचल हो रहा था। मेरा भोला भाला बेटा उनसे यहाँ रहने की, केंद्र खोलने की सिफारिश कर रहा है। मैं तो पागल हो जाऊंँगी। साहब की मंशा क्या है नहीं मालूम। वे भी केंद्र खोलने की बात पर हामी भर रहे हैं। उनके लोग बहुत दिन से आवाजाही करते रहे हैं। अब ये रहकर इलाके का हेतु देखेंगे। अपने मन में सोच रही हूँ कि अगर ये रहने को तैयार होंगे या जादे आवाजाही करेंगे तो हम पुरैनिया दूसरे बेटे के पास चले जाएंँगे। काहे तो मन घबड़ा रहा है। साहेब गाड़ी पर बैठ गया, भर नजर हमारी ओर देखा, हाथ उठाकर बोला - "अच्छा अड़हुल हम जाते हैं, तुम्हारा गाँव घर बच्चे सब याद रहेंगे। जल्दी ही लोग आएंँगे केंद्र खोलने। मुझे बच्चों के पास विदेस जाना है।" अपने आदत के अनुसार हमने आँचल से मुंँह ढक लिया - जानते हैं क्यों, इस हमारे गांँव में बाल बुतरू के सामने नाम धरके पुकारे इसीलिए, यह मेरा नैहर थोड़े न है। लेकिन जी हल्का हो गया। गाड़ी नजर से दूर चली गई। यह कहानी उस अड़हुल और ओवरसियर साहेब की है जिनकी आशनाई चालीस साल पहले कोशी के बीच पनपी थी और दफन हो गई थी। समय कैसे कैसे किसे उखाड़ लाता है देखिए गुनिए। उषा किरण खान के साहित्य संसार को मैंने छोटी सी खिड़की से केवल झाँका भर ही है, पूरे दरवाजे के पार जाना संभवतः स्त्री के पूरे तंत्रों - मंत्रों को समझना है जो प्याज की परतों की तरह उतराते- गहराते हैं, जहांँ खट्टे - मीठे - तीखे - कड़वे - कसैले विभिन्न स्त्री संवेदनाओं और भावों के विभिन्न रंगों और भावों का एकीकरण मिलता है। जहाँ संस्कार है, संस्कृति की धरोहर है और स्त्री सशक्तीकरण है, अपने अधिकारों के प्रति सजग स्त्री मन है। वरिष्ठ कथाकार के कहानी संसार का वैविध्य विस्मित करता है। उनकी कहानियाँ स्त्री जीवन के विविध रूपों का दस्तावेज़ है।लेखन में गतिशीलता जारी है। जन्मदिन पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं । -डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता