Friday, August 6, 2021
साहित्य और आधुनिकता
सहित्य दृष्टि ही नहीं द्रष्टा भी - - -डॉ.वसुंधरा मिश्र ("आधुनिकता के पहलू "पुस्तक जिसके लेखक विपिन कुमार अग्रवाल हैं। आधुनिकता पर लेखक के विचारों की सहमति मेरी भी बन गई है।)
सामान्य प्रयोग में आधुनिक शब्द को बहुत दूर तक समय सापेक्ष मान लिया जाता है जैसे प्राचीन काल मध्यकाल और आधुनिक काल। परंतु आधुनिक शब्द का सुविधा संपन्न और लचीला अर्थ है। हर अगला काल अपने पूर्ववर्ती की अपेक्षा आधुनिक या अधिक आधुनिक होता है। विशिष्ट रूप में आधुनिक का अर्थ इससे भिन्न है। आधुनिकता की पहली और अनिवार्य शर्त स्वचेतनता है। स्वचेतन वृत्ति के कारण आधुनिकता की प्रमुख चिंतना के माध्यम से ही आधुनिक व्यक्ति भविष्य को रूपायित करना चाहता है। भविष्य का नियमन और नियोजन अतीत के आधार पर ही होता है क्योंकि सीधा तर्क है कि यदि बाण को धनुष पर चढ़ाकर जितना ही पीछे खिंचा जाएगा उतना ही वह आगे जाएगा। वर्तमान के अप्रिय से बचने के लिए व्यक्ति भविष्य में चला जाता है और वहां से इस वर्तमान को रंगीन अतीत के रूप में देखना चाहता है। आधुनिकता सबसे अधिक महत्व वर्तमान को देती है। वर्तमान से व्यक्ति जब क्षुब्ध और असंतुष्ट होता है तभी अतीत के प्रति सम्मोहित होता है। वर्तमान में संघर्ष करता है विद्रोह करता है लेकिन अतीत के भार से आक्रांत या विवश होकर नहीं बल्कि वह भी उसके जीवन का एक अंग रहा था।
जयशंकर प्रसाद ने कहा है - -
रोकर बीते सब वर्तमान क्षण
सुंदर सपना हो अतीत।
अपने वर्तमान के प्रति तीव्रतम सजगता आधुनिकता का केंद्रीय तत्व है। इस संचरण के क्रम परिवर्तन विकास और आधुनिकता के चक्र में होता रहता है। वर्तमान युग की स्वचेतनता ही मानवीय व्यक्तित्व की चरम परिणति कही जा सकती है। बहुमुखी भौतिक विकास के बावजूद मानवीय मूल्यों को उत्तरोत्तर गिरते हुए स्तरों का बोध मानो फिर से हमें उस अतीत में प्रक्षिप्त कर देता है जो अब हमें गौरवमय और वर्तमान की तुलना में श्रेष्ठतर लगने लगा है। इस दृष्टि से अतीत का सही-सही उपयोग करने का प्रश्न एक बड़ी चुनौती के रूप में आता है। आधुनिक साहित्यकार को इस समस्या से गहरे स्तर पर जूझना पड़ता है।
साहित्य युवाओं को समृद्ध करता है , वृद्धों का मनोरंजन करता है, उन्नति को समुन्नत करता है, मुसीबतों में धैर्य प्रदान करता है, घर को प्रसन्नता से भरता है और बाहर विनम्र बनाता है।कलात्मक सृजनात्मकता सहजता और स्वचेतनता के मिश्रित योग से निर्मित होती है कि नहीं, इस पर खोज करने की आवश्यकता है।
आधुनिक साहित्य काव्यशास्त्र से मुक्त हो रहा है। उसे किसी वाद- विवाद से बांधना कहाँ तक उचित है? वाद मुक्त साहित्य उच्छृंखल या स्वछंद की श्रेणी में तो नहीं होगा
मूल्यों के लिए लिखा गया साहित्य भी मूल्य से अलग होगा। इस प्रकार के साहित्य को आदर्शवादी कहते हैं।
मूल्यों पर जीने वाला व्यक्ति या समाज जब मूल्यवान नहीं तो साहित्य को भी नहीं होना चाहिए। साहित्य व्यक्ति और समाज का प्रतिबिंब है जो समय के अनुरूप बदलता है। साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं है बल्कि वह छाप भी अंकित करता है। साहित्य केवल दृष्टि नहीं, द्रष्टा भी है।
वाद परक साहित्य गुरु नहीं, बल्कि तानाशाही करने लगता है। साहित्य को रंजक मान सकते हैं पर नट नहीं, दर्शक मान सकते हैं पर पिता नहीं, प्रदर्शक मान सकते हैं पर गुरु नहीं।
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