Powered By Blogger

Friday, August 6, 2021

चंद्रशेखर आजाद

आजाद हूँ आजाद ही रहूंगा मेरा नाम चंद्रशेखर आजाद है। मातृभूमि का एक क्रांतिकारी वीर।मातृभूमि की आजादी के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ। जिंदगी अपनी राह खुद ब खुद बनाती है। मेरे पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगदानी देवी है।ईमानदार स्वाभिमान साहस और वचन में पक्के मेरे माता-पिता के संस्कार मेरे खून में दौड़ रहे थे। मेरा जन्म 23 जुलाई 1906 में बदरका वर्तमान उन्नाव जिला बैसवारा में हुआ बाद में मध्य प्रदेश के भाबरा गांव में बस गए। जहां मेरे बचपन के दिन बीते। आजकल उसका नाम आजाद नगर है। बचपन से ही आदिवासी भीलों के साथ रहकर धनुष बाण में निपुण हो गया था। बाद में मैंने पिस्तौल चलाना और गाड़ी चलाना भी सीख लिया था। 14 वर्ष की आयु में बनारस से संस्कृत की शिक्षा ली। वहीं से कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया। मन्मथनाथ और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में क्रांतिकारी दल का सदस्य बन गया। 1920 - 21 का समय जब मैं गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़ा। गिरफ्तार हुआ। जज के समक्ष पेश किया गया। मैंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया। फिर क्या था न्यायाधीश ने मुझ पर 15 कोडे़ बरसाने का आदेश दिया । मेरी चमड़ी उधेड़ दी गई। पर हर कोडे़ पर मैं वंदेमातरम और भारत माता ही चिल्लाता रहा। गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद करने के बाद मैंने अपनी विचारधारा को बदल लिया। मैं क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़ गया। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की सदस्यता स्वीकार कर ली। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त 1925 में काकोरी कांड किया जिसमें काकोरी जगह पर रेल से अंग्रेजों का धन खजाना लूट कर फरार हो गया। हमारे चार क्रांतिकारी साथियों को भी बलिदान देना पड़ा। हमने हार न मानी। उत्तर भारत की सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। भगतसिंह और राजगुरु के साथ लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेरकर 17 दिसंबर 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सांडर्स की हत्या करके लिया। उसके अंगरक्षक को मैंने गोलियों से भून डाला। असेम्बली बम कांड को भी अंजाम दिया। मेरे तीन साथियों भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। उन्होंने अपील भी करने से इंकार कर दिया। मैंने तीनों प्रमुख क्रांतिकारियों की सजा को कम करने के लिए काफी प्रयास किया। इसके लिए उत्तरप्रदेश में हरदोई जिला जाकर गणेशंकर विद्यार्थी से मिला। उनके सुझाव को मानकर इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू से आनंद भवन में मिला।उन्होंने भी कोई बचाव नहीं किया। बाद में गांधी जी से भी आग्रह किया कि लार्ड इरविन से इन तीनों की फांसी को उम्रकैद में बदलवाने के लिए जोर डालें परंतु कुछ न हो सका। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब मैं मित्र सुखदेव राज से मंत्रणा कर रहा था तभी वहां सीआईडी का एस एसपी नॉट बाबर जीप से आया और उसके साथ कर्नलगंज थाने से सैकड़ों की संख्या में पुलिस भी आ गई। अब तो दोनों ओर से बीस मिनट तक भयंकर गोलीबारी हुई। 1931 में इलाहाबाद के इसी अल्फ्रेड पार्क में मैंने रूस की बोल्शेविक क्रांति के तर्ज पर समाजवादी क्रान्ति का आह्वान किया। जीते जी मैंने संकल्प लिया था कि मैं अंग्रेजों के हाथ कभी नहीं पकड़ा जाऊंगा और न ही ब्रिटिश सरकार मुझे फांसी ही दे सकेगी। वैसा ही हुआ। 27 फरवरी 1931 को गोलीबारी में मैं वीरगति को प्राप्त हुआ। वह दिन मेरे जीवन का आखिरी दिन था। पुलिस ने सूचना तक नहीं दी और मेरा अंतिम संस्कार कर दिया। मेरे बलिदान की खबर सुनकर कमला नेहरू भी श्मशानघाट में मेरी अंत्येष्टि में शामिल हुई थीं । युवाओं की बड़ी संख्या ने मेरी अस्थियां चुनकर बहुत बड़ा जुलूस निकाला , सभा का नेतृत्व पुरुषोत्तम दास टंडन द्वारा किया गया। इस सभा में शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने कहा कि जैसे बंगाल के खुदीराम बोस के बलिदान के बाद उनकी राख लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आजाद को भी सम्मान मिलेगा। देश के प्रति मेरा यही लक्ष्य रहा "जीत या मौत" । मातृभूमि का इस सपूत आजाद को स्वतंत्रता सेनानी होने पर गर्व है। बिस्मिल जी की ये पंक्तियाँ सभी क्रांतिकारियों का मूलमंत्र रहीं - - - सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु - ए - क़ातिल में है! - - सिर्फ़ मिट जाने की हसरत अब दिल - ए- बिस्मिल में है। वंदेमातरम।

No comments:

Post a Comment