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Thursday, July 19, 2018

अच्छा लगा था

बहुत अच्छा लगा था बहुत अच्छा लगा था जब तुमने मेरी पुकार "जरा सा ठहर जाओ" सुना था मुझे लगा तुम बात सुन सकते हो बहुत सालों से मिट्टी की गंध और दीमक की गति ने मेरी आत्मा को सूना कर रखा था तुमने मुझे सुना और दो पल पास बैठे मुझे सुकून मिला अनदेखे थे फिर भी देखते हुए मैंने तुम्हें महसूस किया मेरी आत्मा ने तुम्हें छुआ लगा तुम मेरी ही तरह सबके साथ रहते हुए भी अकेले ही थे सालों से मैं अकेले थी न जाने अपनों का साथ कब छूटा मुझे तारीख और समय भी याद नहीं

माँ तुम उदास क्यों हो

माँ माँ तुम इतनी उदास क्यों हो क्या तुम्हारे बच्चे तुम्हें नहीं पहचानते क्या तुम्हें भरपेट खाना नहीं मिलता क्या तुम्हें पहनने के कपड़े नहीं मिलते क्या तुम्हारे कमरे की छत से पानी टपकता है क्या तुम्हारी झोली में पैसे भी नहीं हैं क्या तुम्हारे चेहरे की चमक खो गई है क्या तुम शरीर से लाचार हो क्या तुम्हें अब बच्चों तक पहुंचने में झिझक होती है वे बड़े हो गए हैं तुम्हारे दिए संस्कार न जाने क्यों पुराने लगते हैं नहीं, है तो मेरे ही गर्भ की संतानें पर न जाने क्यों इनका बचपन कहीं खो गया सा लगता है कुछ भूल गए हैं लगता है बच्चे जब माँ कहकर पुकारते हैं तो भूल जाती हूँ जीवन के बहुत से अनचाहे सवालों को ईश्वर से प्रार्थना कर सिर्फ उनके लिए खुशियाँ मांगती हूँ सिर्फ खुशियाँ, मैं माँ हूँ।

प्रेम के रंग

प्रेम के रंग चाँदनी कहती है हँस लो सूरज कहता है उठ जाओ हाथों ने मिलकर सलाह की एक दूसरे को रगड़कर एक साथ रहकर गीत गाओ रोम रोम में प्रेम सिहर उठा हर धड़कन में धड़कने लगा अँगड़ाई लेता हर युवा के दिल में जगह बना लेता यौवन का वसंत लहलहाने और बहने लगा प्रेम उमड़ने - घुमड़ने लगा प्रेम में मनुष्य, मनुष्य लगने लगा द्वेष की भयावह आँधी प्रेम से जलने लगी प्रेम खोने लगा संवेदना तड़पने लगी घुट घुट कर मनुष्यों के बीच दम तोड़ने लगी बम विस्फोटों के आतंक ने क्षत विक्षत कर दिया उसे प्रेम कराहने लगा नहीं है कोई छत, जहाँ रह सके, प्रेम जिंदा सड़क पर पल रहे मैले कुचैले बच्चे की माँ में प्रेम जीवित था सिर्फ बच्चे से बड़े होने तक ही उसका समय था प्रेम की यही है पराकाष्ठा भविष्य श्वास ले रहा था

माँ के चरणों में नमन

माँ के चरणों में नमन मां तुम कभी भी उदास न थी जब मैं तुम्हारी गोद में थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी रवींद्र गीतों को लोरी में गाती रहती मां तुम्हारे हाथ का खाना भी कितना मीठा जन्मदिन पर पायस खजूर के गुड़ की और संदेश प्यार से खूब खिलाती तुम आधे पेट ही रहती पर हमें भरपूर सबकुछ दे डालती तुम हमेशा मुस्कुराती रहती सरल और सहज भाव से पूरा जीवन जिया कितने ही वर्षों तक भूल घरबार और बच्चों को चुपचाप स्थिर आंखों से देखा हम बच्चों को जिम्मेदार बनाया आज अश्रु पूरित आंखों से भावभीनी श्रद्धांजलि देते देखो चल रहे हैं उन्हीं राह पर जिन पर तुम और पिता चलते थे मृत्यु शय्या पर भी शांत मुद्रा में ध्यान मग्न साधक सी सोती सारे दुखों को अन्तर्मन में रखी सी अपने दुखों को विस्मृत कर हमें सुखी बनाया करती तुम्हें शत शत प्रणाम @वसुंधरा मिश्र

लू

लू एक लू बाहर चल रही थी और एक लू भीतर सबको और खुद को ख़त्म करने के लिए काफी था न कोई धर्म, न कोई जाति, न कोई लिंग थे वहां मनुष्यता भी नहीं थी शर्मसार असुरों की आंधी थी विध्वंस के ज्वालामुखी थे मन में भरे थे परमाणु बम किसी और दुनिया के थे वे लोग झुलस रहे थे समाज - संस्कृति और नस्लें लू के थपेड़े बढ़ रहे थे,जल रहे थे लोग विश्वास और ईश्वर की हत्या हो चुकी थी वहां लू बढ़ रही थी

यूँ भी तो आराम बहुत है

यूँ भी तो आराम बहुत है माँ के आँचल की छाया में यूँ भी तो आराम बहुत है काम काज कुछ भी न करना दिनभर पतंग उड़ाना माँ जब समझाती तब कहते हम सब कुछ जाने बैठे हैं माँ का राज था सबसे अच्छा मेरी जिद के आगे माँ बाबा दोनों ही झुक जाते डांट फटकार यूँ ही हवा में उड़ जाते अच्छा बुरा शुभ अशुभ सभी समझाते,समाज में जीना सिखाते, भले बुरे में अंतर बतलाते आज पैरों पर खड़े हुए हैं हम भी बड़े हुए हैं हँसते हँसते हाल बेहाल हैं जब स्मृति में बचपन की वे याद कौंधती जब यूँ ही कह देते अनजाने में मुझ को मत समझाओ

Friday, June 29, 2018

उनका आना हो या न हो

उनका आना हो या न हो दिलों को जोड़ते चलो कुछ तो बात है उनकी नजरों में जो वेअपने बने लोग कहते हैं कि वे अपने उसूलों के पक्के है तो क्या कोई तो समझ ले उन्हें करीब से रखें हैं जिसने जो पत्थर नींव के उनके जज्बे को सलाम करते चलो न जाने उन कांटो पर कितने ही लोग चले लहूलुहान हो राह पर डटे रहे ऐ मेरे दोस्त उनकी बेवफाई को भूलते चलो

Wednesday, June 27, 2018

आंधी फिल्म के गीत के बोल की तरह

तुम आ गए हो नूर आ गया है नहीं तो जिंदगी व्यर्थ ही गुजर रही थी सिखाया तुमने ही प्रेम दीपक जलाना नहीं तो बस यूँ ही बीत रही थी जिंदगी न जाने किस ओर से चले जमाने से भी अनजान चले कहाँ मैं और तुम भी बेखबर धागे में पिरोये मोती न मिले कबूल कर लिया ऊपर वाले ने जब से यूं लगा फिर से जिंदगी मिल रही है चलते चलते इसी राह से गुजरते हुए किया था सपनों को साकार मूंद कर पलकों में तुम दिखाई देती रही थी तुम्हारा होना ही मेरे होने का अहसास बना प्रेम की गंगा बहती लगी जिंदगी खुश ग्वार लगी तुम आ गये तो सच में नूर गालों पर मचलने लगा

मौत को भूल चुका हूं

मैं मौत को भूल चुका हूं मौत शब्द मेरी स्मृति में नहीं है मेरे अपने रोते हैं मुझे वह भी पता नहीं वे मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं वह भी पता नहीं मैं जी रहा हूँ और जीवंत हूँ मुझे पता नहीं मेरा खाना पच रहा है मुझे पता नहीं चलता फिरता लाश हूँ पता नहीं मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है यह भी पता नहीं मैं देख रहा हूँ चल रहा हूँ

Tuesday, June 26, 2018

नदी का किनारा

नदी का वो किनारा भी खो गया था बस एक तू न मिला नाव भी वहीं पर है, पतवार न दिखा। ख़ामोश हवाओं ने धीरे से कुछ कहा है पर सुना न गया उस मौन ने सब कुछ समझाया, मगर उदासी को छू, हिल गया कण-कण में तेरे होने का अहसास है तू कहीं नहीं फिर भी मेरे पास है तू यहीं कहीं है अनजानी मैं, जान न पाई पहचान न पाई न कहीं कोई गिला ओ शिकवा है, न कोई अरमान है बाकी सिर्फ रंजो ए गम में तस्वीर है तेरी रूह से कोई कह दो, यकीं है, वो मेरे इर्दगिर्द ही है। @वसुंधरा मिश्र

Wednesday, June 20, 2018

लहरों पर चलती जिंदगी

लहरों पर चलती जिंदगी लहरों में ही खो जाती ये बलखाती इठलाती हैं कभी मुस्कान छोड़ फिर चिडाती कभी देख कर अनदेखा करती है ये जिंदगी कब कौन सी करवट लेगी ये जिंदगी फिर कब खिलखिलाकर पास बुलाएगी एक बार जब बचपन आया था कितनी निश्छल थी जिंदगी मां की वाणी में लोरी सुनाई पड़ती थी पिता के कंधों पर पूरा भार दे मचलती थी जिंदगी मां के हाथ का खाना अमृत लगता न जाने कौन सा प्यार उसकी अंगुलियों में था अच्छे बुरे का पता ही नहीं था ना नुकूर न करती तब जिंदगी कब बड़ी हुई जिंदगी वह लड़की बनी ऐसा मत करो वैसा मत करो लड़कियां गुड़ियों से खेलती हैं सिलाई कढ़ाई बुनाई सीखना है खाना बनाना और खिलाना सीखना है पढा़ई में भी होशियार बनना है मां भी डांटती पिता भी सख्ती बरतते लगता कि यहीं से कोई जिंदगी नाम की शुरुआत हुई होगी फिर तो और बड़ी हुई कितनी कहानियाँ आईं ऊर्जा से भरपूर यौवन की ड्योढ़ी पर कदम लड़खड़ाए फूंक फूंक कर चला रही थी जिंदगी संभली और आगे बढ़ रही थी जीवन की डोर खेल कूद से दूर मां बाप की लाडली अब समाज और संस्कृति को बचाने वाली बनी पुरुषों की दुनिया में समझदारी का पाठ पढ़ाने लगी थी जिंदगी जिम्मेदारियों ने ढक लिया था अपनी मशरूमी छतरियों से तट से दूर फेंकती जा रही थीं समुद्री लहरें

पिता

पिता पिता के विषय में कभी सोचा ही नहीं पिता दिवस होगा कभी सोचा ही नहीं मां की तरह पिता याद नहीं आते घर पिता से है माँ बाहर से आई है यही समझती रही वह पिता के घर का एक हिस्सा है ऎसा ही माना गया पर मेरा होना ही पिता का होना है वे मेरे पिता हैं मेरे अंदर हैं मेरी आत्मा हैं संरक्षक और पालन पोषण करने वाला समाज में सम्मान दिलाने वाला समाज में स्थान दिलाने वाला वह पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला भी है स्त्री को आधार देने वाला सत्ता का अधिकारी है मेरा पिता भी है जब मैं उसकी पत्नी की गोद में आई वह पितृत्व के भावों से भर गया वात्सल्य से भर उठा मां का एक अंग बना मुझे गोद में लेकर चुप कराने लगा प्यार से दुलराने लगा झूले में झूलाने लगा चलना सिखाया घोड़ा बन सैर कराने लगा मैं उसकी प्यारी बिटिया जो हूँ मां ने परिचय कराया उस पिता से जिसकी मैं अंश हूँ पिता परमेश्वर है सृष्टि की रचना है पिता की छाया में सीखा जीवन का अनुशासन ऊंची नीची सभी राह पर चलने की कला सिखाई पितृ कवच के घेरे में कहीं कोई दर्द नहीं होता है आत्मविश्वास और आत्मसम्मान सिखाया बड़े बड़े खतरों को चुटकी में हल करना सिखाया पिता के गुणों को लेकर मैंने अपना एक मुकाम बनाया कोई कहता नाक तुम्हारी पिता सी है सच में नाक पिता सी है और पिता की नाक भी मैं हूँ हूँ न प्यारी बिटिया