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Wednesday, June 20, 2018

लहरों पर चलती जिंदगी

लहरों पर चलती जिंदगी लहरों में ही खो जाती ये बलखाती इठलाती हैं कभी मुस्कान छोड़ फिर चिडाती कभी देख कर अनदेखा करती है ये जिंदगी कब कौन सी करवट लेगी ये जिंदगी फिर कब खिलखिलाकर पास बुलाएगी एक बार जब बचपन आया था कितनी निश्छल थी जिंदगी मां की वाणी में लोरी सुनाई पड़ती थी पिता के कंधों पर पूरा भार दे मचलती थी जिंदगी मां के हाथ का खाना अमृत लगता न जाने कौन सा प्यार उसकी अंगुलियों में था अच्छे बुरे का पता ही नहीं था ना नुकूर न करती तब जिंदगी कब बड़ी हुई जिंदगी वह लड़की बनी ऐसा मत करो वैसा मत करो लड़कियां गुड़ियों से खेलती हैं सिलाई कढ़ाई बुनाई सीखना है खाना बनाना और खिलाना सीखना है पढा़ई में भी होशियार बनना है मां भी डांटती पिता भी सख्ती बरतते लगता कि यहीं से कोई जिंदगी नाम की शुरुआत हुई होगी फिर तो और बड़ी हुई कितनी कहानियाँ आईं ऊर्जा से भरपूर यौवन की ड्योढ़ी पर कदम लड़खड़ाए फूंक फूंक कर चला रही थी जिंदगी संभली और आगे बढ़ रही थी जीवन की डोर खेल कूद से दूर मां बाप की लाडली अब समाज और संस्कृति को बचाने वाली बनी पुरुषों की दुनिया में समझदारी का पाठ पढ़ाने लगी थी जिंदगी जिम्मेदारियों ने ढक लिया था अपनी मशरूमी छतरियों से तट से दूर फेंकती जा रही थीं समुद्री लहरें

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