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Friday, March 11, 2022

जज़्बा-ए-दिल को पढ़ते हुए - डॉ वसुंधरा मिश्र

जज़्बा-ए-दिल को पढ़ते हुए - डॉ वसुंधरा मिश्र कोलकाता जज़्बा-ए-दिल कवयित्री दीपमाला माहेश्वरी का काव्य संग्रह उन अनकही बातों की शब्द-भावमाला है जिसमें रचनाएँ व्यष्टि से समष्टि से जुड़ने की चाह रखती हैं। शब्द जब किसी स्त्री के भावों को आकार देते हैं तो वे स्त्री सशक्तीकरण की ओर भी संकेत करते हैं। सत्तर कविताओं का यह काव्य संग्रह सरल, सहज और हृदयग्राही रचनाओं का संग्रह है।मनुष्य और मानवता के प्रति कवयित्री सहृदय है। अपने दिल- ए-जज़्बात की पूर्णता के साथ आगे बढ़ती है, उसका मानना है - 'मैं भी, तू भी तेरे अहसास भी मेरे हालात भी सबको पिरो दूँ आज एक धागे में, और बन जाए लिखावट मेरे दिल - ए - जज़्बात की ' कवयित्री जानती है - 'आँखों से अश्क जो बहा सकते नहीं पीकर गम जो घटा सकते नहीं खुद को उतार देते हैं, कागज पर वो बस फिर कुछ और वो करते नहीं' कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है। कविताओं में भाव तत्व की प्रधानता है। रस को कविता की आत्मा माना जाता है जो कविता के अवयवों में आज भी सबसे अहम है।कवयित्री शब्दों के द्वारा अपनी अनकही बातों को आकार देती है। इन कविताओं में एक लय है, भावों की लय, जो पाठक को बांँधे रखती हैं।एक और अंडर करेंट भी है जो देश, समाज और सत्ता में बैठे लोगों के लिए एक चेतावनी भी है। आधुनिकता की आँधी और तृष्णा की चाह में जो मनुष्य अपनी लालसाओं को पूरा करने में लगा हुआ है, इंसान से जानवर बन चुका है। ऐसे लोगों के पापों के सर्वनाश के लिए काल के अवतार का अवतरण होना निश्चित है। वह प्रकृति के इस नियम को जानती है कि काल के आगे बड़े -बड़े लोग धराशायी हुए हैं। 'माना करते हैं हम शायरी पर शायर कोई और होता है।' ( पृष्ठ 25) हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है। एक अनाम-सी व्यग्रता संपूर्ण व्यक्तित्व पर छा जाती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना आत्मा को झिंझोड़ती रहती है। ऐसी परिस्थिति में कितने ही लंबे समय का अंतराल हो, रचनाशीलता अवसर मिलते ही हृदय में एकत्रित समस्त भावनाओं , विचारों और संवेदनाओं को अपनी संपूर्णता से अभिव्यक्त होती हैं। सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर मिलना होता है, तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जिस अभिव्यक्ति का जन्म होता है, वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है। यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मी अभिव्यक्ति का संग्रह है, तभी तो कविता ' देर हो गई 'में कवयित्री कहती है--'जिंदगी तो चल रही थी अपने लिहाज से, न जाने कब से पर मुझे ही जीने में देर हो गई' (पृष्ठ 26) पहले और अब के जीवन के अंतर को समझाते हुए कवयित्री जीवंत शब्दों की यात्रा के द्वार खोलती दिखाई पड़ती है। संग्रह की सभी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ दिल को छूने वाली और संदेश देती हैं जैसे ' हरदम कोई आग सी जल रही है' (पृष्ठ 18)'एक वक्त था सब अपने थे /कोई पराया ना था (पृष्ठ 19) , तू बनकर दरिया बढ़ता चल /तू बनकर नीर बहता चल /रुकना तेरा कर्म नहीं /चलने में कोई शर्म नहीं (पृष्ठ 13) ,रोज यहाँ बदलते हैं रिश्ते (पृष्ठ 58),फेंक दो काटकर उन हाथों को /जो अंधेरों में आग उगलते हैं (पृष्ठ 64)। ' सूरज पिघल रहा है' कविता में कवयित्री देश के लिए, संसार के लिए चिंतित है। नीति में अनीति, धर्म में अधर्म, कर्मकांड, दान दक्षिणा, आदि सभी कर रहे हैं लेकिन मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? क्योंकि सभी ऐसे अहंकारी लोग सच्चे ज्ञान से अनभिज्ञ रहते हैं लोकतंत्र में नेताओं को, पुलिस को, नेताओं के झूठे वादे झूठे नारे को कोसते हुए कवयित्री दीपमाला माहेश्वरी कहती हैं कि ऐसा दिन भी आएगा जब बच्चा-बच्चा तलवार उठाएगा।( पृष्ठ 47) 'भ्रष्टाचार आतंकवाद कालेधन /का जो जाला था /छोटा हो या बड़ा, सभी ने उसको पाला था /पर उसका नेक इरादा था /अच्छे दिन का वादा था 'ये पंक्तियाँ नमो - मंत्र कविता की हैं जिसमें कवयित्री इसी मंत्र से पूरे देश की तस्वीर बदलेगी ऐसा विश्वास रखती है। कवयित्री की रचनाओं में जिंदगी, अहसास, रिश्ते, वक्त, ख्याल, मोहब्बत, ख्वाब, वादा, अफसाना, आशियाना, शायरी, राज, चाहत, इंतजार आदि विविध शब्दों द्वारा दिले - ए-जज्बात को व्यक्त किया है जो किसी भी दिल में अपनी जगह बनाने में समर्थ हैं। 'अपनी बात' में कवयित्री स्वीकार करती है कि 16 वर्ष की उम्र से ही उसने कलम को राज़दार बना लिया था। यह परिपक्वता हर रचना में दिखाई देती है। हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं पर कवयित्री अच्छी पकड़ रखती है। संवेदनशील और सशक्त रचनाएँ पाठक को पढ़ने के लिए उत्सुक करती हैं। कवयित्री मानवीय भावों पर निष्पक्ष होकर अपनी रचनाधर्मिता को उजागर करती है। अपनी भावनाओं को सबसे बाँटती है। भाषा शैली में सरलता और सहजता है। कवयित्री दीपमाला माहेश्वरी का काव्य संग्रह का शीर्षक जज़्बा-ए-दिल पाठकों को पहली ही नजर में आकृष्ट करने वाला है। जज़्बा-ए-दिल (काव्य संग्रह) कवयित्री :दीपमाला माहेश्वरी प्रकाशक :साहित्यागार धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर ISBN - 978-93-83468-98-0 मूल्य :200 रुपये