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Thursday, December 30, 2021

स्त्री अस्मिता और समकालीन महिला उपन्यास - नमिता जायसवाल

स्त्री अस्मिता और समकालीन महिला उपन्यास को पढ़ते हुए - - - डॉ नमिता जायसवाल की पुस्तक' स्त्री अस्मिता और समकालीन महिला उपन्यास' वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण मौलिक कृति है। भारत में स्त्री को अभी भी दोयम दर्जे का स्थान पर माना गया है। परिवर्तन के इस दौर में जो कामना स्त्री बिरादरी के लिए अपेक्षित था, वह अब भी दूर है। चित्रा मुद्गल जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि नमिता जायसवाल एक विचारशील शिक्षाविद् ही नहीं, बल्कि चैतन्य जूझारू स्त्री हैं जो हारना, हताश होना नहीं जानती, वह जानती हैं तो केवल जिजीविषा की उत्कटता को। इस पुस्तक में पितृसत्तात्मक समाज के उस चेहरे को बेनकाब किया है जो अब तक अदेखा और अचीन्हा है। शोषण के बहुआयामी पक्षों को बहुत ही गहनता से विश्लेषित किया गया है। स्त्री अस्मिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं को इतिहास के आईने में पढ़ते हुए लेखिका ने बेबाक होकर अपने विचारों को व्यक्त किया है। वह 'अपनी बात' में लिखती हैं कि नारी जागरण और प्रगति का जो आधार पिछली सदी में तैयार हुआ उस पर ही इस सदी का नया सामाजिक ढांँचा निर्मित किया जाना था, जो नहीं हो पाया। इन सब विषम परिस्थितियों के बीच में, सामाजिक रूप से अपनी पहचान बनाती चेतना संपन्न नारी की भागीदारी साहित्यिक क्षेत्र में बढ़ी तथा स्वीकृत हुई। समकालीन महिला लेखन नारी की वैयक्तिक सत्ता, उसकी अस्मिता तथा उसे मानवी रूप में स्वीकारे जाने की सशक्त दावेदारी के साथ स्त्री अस्मिता के प्रश्न को भी दृढ़ता के साथ उपस्थित करता है। लेखिका ने पुस्तक को सात अध्यायों में अपने विषय को समेटा है जो स्त्री मुक्ति आंदोलन, स्त्री अस्मिता के बदलते संदर्भों में आई चुनौतियांँ और रणनीतियांँ, हिंदी उपन्यास परंपरा तथा प्रारंभिक एवं समकालीन महिला उपन्यास लेखन की विशिष्टता और प्रमुख समकालीन महिला उपन्यासकारों कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, मंजुल भगत, सूर्य बाला, राजी सेठ, नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, गीतांजलि श्री जैसी प्रबुद्ध प्रतिभाओं के उपन्यासों में आईं स्त्री पात्रों के माध्यम से विभिन्न समस्याओं को पाठकों के समक्ष रखा है।वर्तमान समय में परिवार और समाज के बीच अवस्थित स्त्री की अस्मिता के स्वरूप को सामने रखा है। लेखिका बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध को स्त्री जागरण का युग मानती है। नवजागरण काल के बाद से जब स्त्रियाँ स्वयं नेतृत्व में भाग लेने लगीं। उनके अधिकार सोच और स्थिति में किंचित परिवर्तन आने लगे। समान अधिकार, पुरुष उत्पीड़न से सुरक्षा, पुरुष शासन से मुक्ति आदि ऐसी नई दृष्टि दिखाई पड़ी जिसकी नींव पर ही आज का स्त्री मुक्ति संघर्ष खड़ा है। लेखिका ने महिला आंदोलन की जड़ों तक इस विषय को खंगाला है। स्त्री मुक्ति का अर्थ है कि उसे एक मनुष्य की तरह आचरण मिले और उसे अपने निर्णय लेने का अधिकार हो। नारी मुक्ति आंदोलन महिला पुरुष के बीच की गैरबराबरी और उसके कारण महिलाओं पर हो रहे अन्याय व शोषण के विरुद्ध है, पुरुषों के विरुद्ध नहीं। पृष्ठ 17. महिला आंदोलन की जड़ें महिलाओं के रोजमर्रा जीवन से पनपी हैं, जहाँ स्त्री के अधिकार, जागरूकता, स्वतंत्रता, समानता, प्रगति, संघर्ष और विद्रोह जैसे अनगिनत सवाल हैं। इसमें सीमोन द बोउवार के 'सेकेंड सेक्स' की भी चर्चा हुई है'जहाँ स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है' । विवाह पूर्व और विवाहेत्तर यौन संबंध आदि के विषय में भी विस्तार से जानकारी दी है। 1970 के बाद स्त्री आंदोलन के रूप में आए परिवर्तन जहांँ स्त्री सामाजिक राजनीतिक समस्याओं पर पुरुषों के साथ नारी की हिस्सेदारी में विस्तार दिखाई देता है। श्रीमती मृणाल गोरे, प्रमिला दण्डवते, अहिल्या रांगणेकर आदि राजनीतिक आंदोलनों में आगे रहीं। मँहगाई, जमाखोरी, भ्रष्ट व्यापारियों से रक्षा करना आदि मुद्दों पर लड़ना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1975 का वर्ष सयुंक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया। पुस्तक में विभिन्न नए संगठनों की भूमिका पर भी विचार किया गया है जो 1970 - 2000 तक के हैं। समाज के महिला आंदोलन, बलात्कार, यौन उत्पीड़न जैसे तमाम मुद्दों पर चर्चा की गई है। बाजारवाद और उपभोक्ता वाद के रूप में विभिन्न प्रलोभनों के माध्यम से पुनः नारी को कमोडिटी अर्थात् वस्तु बना देने के पुरुष षड्यंत्र को समझाने की कोशिश की है और नारी को सुदृढ़ और अपनी सुरक्षा पर स्वयं रणनीति तय करनी होगी। अस्मिता का तात्पर्य 'आइडेंटिटी' से है जो व्यक्तित्व और अपनी पहचान से जुड़ा हुआ है। पहचान का तत्व मानव का प्रकृति प्रदत्त गुण है। जब व्यक्ति या समूह विशेष के मन बुद्धि को वर्षों उत्पीड़न, प्रतारणा और अन्यायपूर्ण वंचना मिलती है तो उस स्थिति में अपने को पहचानने की छटपटाहट पैदा करती है। डॉ शंभूनाथ लिखते हैं कि हर आदमी की अस्मिता होती है, जो वह परंपरा से अर्जित करता है। वैयक्तिक अस्मिता के साथ ही सामाजिक अस्मिता भी होती है। ये प्रतिरोध की प्रेरणा से परिचालित होती है। अस्मिता का स्वरूप भी सकारात्मक होना चाहिए तभी विकास और सर्जना संभव है। वर्तमान पूंँजीवादी दौर में नारी अस्मिता का सामंतीय रूप दमनशील है या विकासोन्मुख? इस पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। भारतीय समाज की संरचना और पाश्चात्य समाज दोनों को ध्यान में रखते हुए विवेचना की गई है। स्वतंत्रता के बाद सन् 1950 में भारतीय संविधान लागू होने पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार मिले। लेकिन विडंबना है कि वैधानिक संरक्षण और अधिकार मिलने पर स्त्री पहले से अधिक असुरक्षित हो गई हैं जिससे अलग समस्याओं का जन्म हुआ। गाँधी जी ने माना है कि जिस देश, जिस राष्ट्र में, नारी का सम्मान नहीं, वह कभी महान नहीं हो सकता। भारतीय परंपरा में माँ के स्थान और उसके बदलते स्वरूप की भी चर्चा की गई है। प्रेम नारी संरचना का मुख्य तत्व है जो अपनी ममता, स्नेह आदि गुणों के कारण समाज की श्रृंखला को जोड़ने वाला है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वह आनंदमय क्षणों के उपभोग के साधन के रूप में माना जाने लगा है जो निश्चित ही आयातित मानसिकता से आया है। आधुनिक युग में नई नई समस्याओं का उदय हुआ है जिसमें भ्रूण हत्या, अशिक्षा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, कुपोषण, अधिक मृत्युदर, हिंसा, आत्महत्या, विस्थापन, सांप्रदायिकता, पर्सनल ला जैसी अनेक भयानक स्थितियों और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मानवता का अपमान और मानवाधिकार की सीमाओं का अन्याय पूर्ण उल्लंघन है। पुस्तक में स्त्री उपन्यास लेखन का हिंदी इतिहास भी दिया गया है। बांग्ला के उपन्यास हिंदी में अनुदित हो रहे थे। महिला उपन्यास को लेखिका ने चार भागों में विभाजित किया है - प्रारंभिक काल - सन् 1890 - 1927, विकास काल - 1928 - 1947, उत्कर्ष काल - 1947-1970 और वर्तमान काल 1970 से अब तक। कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी सन् 1925 में पंजाब के उस भाग में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है शिमला, लाहौर, दिल्ली से शिक्षा प्राप्त जिंदगीनामा उपन्यास के लिए 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित की गईं। 'डार से बिछुड़ी' 1958 का उपन्यास है जिसमें 'पाशो' स्त्री पात्र की कहानी है जो पुरुष आश्रय में अपनी सुरक्षा तलाशती, भटकती, लुटती हुई क्षतविक्षत होती रहती है। छह प्रमुख उपन्यासों की स्त्री पात्रों पर लेखिका ने चर्चा की है। मृदुला गर्ग 25 अक्टूबर 1938 में कलकत्ता में एक अमीर परिवार में जन्म। 6 उपन्यासों की चर्चा इस पुस्तक में कई गई है। 'चित्तकोबरा' की स्त्री पात्र मनु में काम की चाहत है जिसकी तृप्ति स्काटलैंड के पादरी से मिलती है, उसके संवेदनहीन पति से नहीं मिलती। 'कठगुलाब' उपन्यास पुरुष वर्चस्व वाले समाज में नारी के दोहन शोषण की विश्वव्यापी स्थिति को दर्शाता है। मंजुल भगत के 'लेडिज क्लब 'में बंबई की संभ्रांत महिलाओं की खोखली जिंदगी और खोखले आदर्शों की कथा है। विस्थापन, निम्नवर्गीय स्वावलंबी स्त्री की कथा है। राजी सेठ का जन्म सन् 1935 में, प्रभा खेतान का जन्म 1942 में, मैत्रेयी पुष्पा का जन्म सन्1944 में, चित्रा मुद्गल का जन्म 1944, गीतांजलि श्री का 1957 में जन्म हुआ।लेखिका ने सभी महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में स्त्री- संवेदना को अपनी पुस्तक का विषय बनाया जो पुस्तक के केंद्र बिंदु है। समकालीन समालोचना हर युग की माँग है। आजकल साहित्य समीक्षा के नाम पर जो कुछ छ्प रहा है वह अपनी अपनी दृष्टि है। आज जीवन के हर क्षेत्र में मिलावट का बोलबाला है। फिर भी पाठक ईमानदार होता है। हांँ, साहित्य समालोचना के क्षेत्र में विशुद्धता मिलना कठिन है। स्त्री विमर्श, दलित साहित्य, आदि विषयों पर चर्चा आवश्यक है। लेखिका ने बहुत बड़े फलक का विषय लिया है जिस पर लगभग अलग - अलग तीस से अधिक पुस्तकें लिखी जा सकती हैं। कृष्णा सोबती जी की रचना संसार की नारियों का विरोध पुरुष से नहीं है बल्कि अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पुरुष की सामंती पूर्वाग्रही स्वार्थसिक्त एवं अन्यायपूर्ण नारी शोषण की नीतियों से है। नारी के परंपरागत रूप से लेकर आधुनिक युग में उनके बदलते स्वरूप को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा है। सोबती जी की स्त्री पात्र 'मित्रो' अपने को ढूंँढ लेती है। कमोवेश, सभी महिला उपन्यासकारों ने नारीवाद के चिंतन को समझने की भूमि तैयार की है, जहाँ विरोध और संघर्ष के पहले आत्मचिंतन और विश्लेषण को अवसर दिया गया है। स्त्री लेखन की बेबाकी ने कहीं भी सामाजिक श्रृंखला को तोड़ा नहीं है और न ही उपन्यास के स्त्री पात्रों ने भी, जो भी विद्रोह के स्वर हैं वह नारी चेतना के दीप प्रज्वलित करने की चाह है और पुरुष मानसिकता के शोषण प्रवृत्ति के उस चट्टानी स्वार्थ को गलाने की आकांक्षा है जो सदियों से नारी की वैयक्तिक सत्ता को नकारता आ रहा है। इस पुस्तक में जितनी भी महिला उपन्यासकार को लिया गया है उनकी भाषा, शिल्प और परिवेश उनके लेखन में कहीं न कहीं परिलक्षित हुआ है। एक अच्छी बात है कि सभी स्त्री पात्र ठोकर खाकर भी पुनः एक नई जीवनी शक्ति और जिजीविषा के साथ अपनी पहचान बनाने एवं अपना 'स्व' अर्जित करने के मार्ग पर अग्रसर होती हैं। समाज को स्त्री-पुरुष दोनों पक्षों की समान आवश्यकता है जो सामाजिक संगठन की एकता को मजबूत करते हैं। बाजारवाद और उपभोक्तावाद की संस्कृति नारी के लिए एक नई पुरुष प्रवृत्ति से सामना है। वैश्वीकरण, दूरसंचार माध्यम, प्रौद्योगिकी तकनीक के उन्नत सामाजिक परिवेश के लुभावने विषय की चुनौतियाँ भी सामने हैं, इस पर भी महिला उपन्यास हैं, जिनमें बहुत - सी समस्याओं को लिया गया है। वर्तमान समय में दैहिक बाध्यता, पर- पुरुष गामी, स्त्री का बहुपुरुषगामी होना, आत्महत्या, किराए की कोख, उपभोक्ता वाद के प्रलोभन में फंँसती स्त्री जैसी समस्याएंँ अपना फन उठा रही हैं। समकालीन महिला लेखन के विषय में लेखिका ममता जायसवाल ने यह स्थापित किया है कि भारतीय स्त्री अपनी अस्मिता गढ़ने में तभी सफल हो सकेगी, जब उसकी संघर्ष की नीति उच्छृंखल न होकर संतुलित तथा संयमित हो। अधिकांश महिला लेखिकाएंँ शहरी उच्च मध्य वर्ग से सम्बद्ध होने के कारण लेखन भी शहरी क्षेत्र और वर्ग की महिलाओं की स्थिति तक ही सीमित रहा है, जो गाँव से आने वाली स्त्री गंध लिए हुए हैं, जिसके केंद्र में सामग्रिक सामाजिक चेतना का लक्ष्य निहित है। पश्चिम बंगाल के हिंदी जगत् में परिचित नाम डॉ ममता जायसवाल स्वयं कई संस्थाओं में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।' ध्रुवस्वामिनी 'नाटक में शीर्षक अभिनयात्मक भूमिका को अभिनीत की हैं, साथ ही चित्रा मुद्गल के उपन्यास'आवां' का नाट्य सह रूपांतरण भी किया है। इस पुस्तक में पाठक स्त्री- विमर्श के विविध पक्षों को एक जगह पढ़ सकता है। 296 पृष्ठों की यह पुस्तक हिंदी शोधार्थियों और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक है। शुभकामनाएं। - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता ।

गीत समय किशन दाधीच

गीत - समय कविता संग्रह को पढ़ते हुए----डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता प्रसिद्ध गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह गीत समय को पढ़ते हुए भारत की काव्यात्मक यात्रा को समझने का मौका मिला। गत छह दशकों से लिख रहे किशन दाधीच ने वर्तमान समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की संवेदनशीलता को गहराई से महसूस किया है। यही कारण है कि गीत - समय में कविताओं की श्रृंखला पूरे चित्रों को पाठक के मन मस्तिष्क में अंकित कर देती हैं। लोककलाविद् साहित्यकार एवं उदयपुर लोककला मंडल के पूर्व निदेशक डॉ महेंद्र भानावत का कहना है कि किशन दाधीच ने अपना गेज नहीं बदला है। डॉ संगम मिश्र सेंट्रल अकादमी संस्थान उदयपुर में चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि स्वान्तः सुखाय जीने वाले किशन दाधीच उनके प्रिय कवि हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है। महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण के प्रति उनकी कविता 'तुम सती के आचमन' की ये पंक्तियाँ - - - आँधियों को स्वर दिया अभियान गीतों का तुम्हीं ने बिजलियों के पाँव बाँधे सृजन के घुंघुरुँ तुम्हीं ने। --- - - - - - तुम प्रणय के चिर क्षणों में अर्चना की इक घड़ी हो (पृष्ठ 95-96) कवि धरती पर निःसहाय लोगों के लिए गीत गाता है। उसका गीत जनयुद्ध है वह इसका स्वयं साक्षी है - - - मनुष्य के संघर्ष को काटने वाले सत्य का साक्षी रहूँगा मैं क्योंकि इस जनयुद्ध में संजय की भूमिका तुम्हारी नहीं मेरी है।( पृष्ठ 100) कवि भारत की धरती पर होने वाले मनुष्य और मानवता के संबंधों और उनके संघर्षों के साक्षी हैं। इतने लंबे समय को कवि ने स्वयं से साझा किया है। 'गीत - समय' का प्रकाशन कोरोना काल में आने के पीछे भी कवि की सकारात्मक सोच और भाव हैं। यह सच है कि नवगीत जिस पीढ़ी के हाथों निर्मित होने के उपक्रम में था, वह थी आजादी के बाद की पहली नौजवान पीढ़ी जो गाँव के नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों से हिम्मत और हौसला ही नहीं, मानवीयता की अटूट पहचान लेकर छोटे- बड़े शहरों में आई और आजाद देश की नयी संभावनाओं से अपनी परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को जोड़कर संघर्ष की धूप- धूल से लड़ती हुई जीने लगी। स्वभावतः और रहन- सहन के बदलाव की अनवरत लड़ाई में, कभी उस पीढ़ी का सदस्य शहरी एकांत में ग्रामीण नागर मानस का साक्षात्कार करता रहा। किशन दाधीच की काव्य यात्रा आत्मविश्वास से पूर्ण और अटूट हौसला देने वाली है। उनकी रचनाधर्मिता परंपरागत लीक से हटकर रचना कर्म करने की प्रक्रिया है। वीरेंद्र मिश्र, रामदरश मिश्र, रामनरेश पाठक, रवींद्र भ्रमर आदि गीतकार की लंबी श्रृंखला रही है। किशन दाधीच उसी श्रृंखला के फूल हैं जिनकी खुशबू समाज की दकियानूसी परंपराओं को नकारते हुए आती है। जनसंघर्ष की अनिवार्य परिस्थितियों और राजनीति की रणनीतियों के साक्षी रहे किशन जी ने अपने विचारों को कविता और गीतों के माध्यम से समाज के प्रति अपने दायित्व को सक्रिय रुप से शब्दों में पिरोया है। नवगीत का स्वभाव जनबोध से ही जुड़ा हुआ है।उनका मानना है कि गीत ही वह विधा है जो कवि और जन मानस के भाव, लय के आधार पर खड़ी होती है, विचारधाराओं के उत्साह मात्र के आधार पर नहीं। आम आदमी की मानसिकता को आंदोलन या नारे से भरे गीत नहीं बल्कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवहार के गीत ही बदल सकते हैं। कवि ने कविता मजदूरों के गीत कविता में , दर्द फिर जुलूस हो गया कविता में कवि का कहना है कि - - लोग फिर मारे गए हैं प्रार्थना करते हुए जो खबर के न हुए बहरे वातायन। प्रश्न वाचक हो गए चर्खियों की चाल पर आदि आदि कविताएँ आम आदमी के संत्रास की कथा ही कहती हैं। गा सकूँ मैं जिन्दगी को, मैंने बुना गीत का बाना, भोर की तलाश में आदि कविताएँ आशावादी हैं। बाहर भीतर का आदमी, सूर्य नगर का मौन, अध कतरा दिन आदि कविताओं में द्वंद्वात्मक चित्रों को उकेरनी वाली हैं। दबे पाँव चलता है सूरज, सूर्य मुखी का भोर पत्र कविता में आशा की किरणें हैं। डॉ लोहिया के प्रति कवि ने लिखा है - - - आहत है, कोई नायक जो समाज के उत्थान के लिए निरंतर कार्य करता रहा जो अधूरा रहा। अज्ञेय ने मानवीय व्यक्तित्व की व्याख्या में भाषा को अनिवार्य तत्व माना है। वे भाषा को माध्यम नहीं, अनुभूति मानते हैं। अच्छी भाषा वे उसे ही मानते हैं जो भाषा और अनुभूति के अद्वैत को स्थापित करे। कवि किशन की भाषा में अनुभूति का जबर्दस्त बंधन है जो आम आदमी से जुड़ा हुआ है। कवि उस दौर से भी गुजरे हैं जब नयी कविता और वामपंथी धारा की कविताएँ भी परिवर्तन की प्रक्रिया में थीं और जनवादी कविताओं में जनजीवन की विभिन्न परिस्थितियों और विषयों को शब्दबद्ध किया जा रहा था। वर्ग संघर्ष, वर्ग हितों की पड़ताल, चरित्रालोचन, व्यवस्था का पर्दाफाश और व्यापक तौर पर समाजवादी यथार्थवादी दृष्टि से जनसंघर्ष की वास्तविक अवस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़ी संरचनाएँ आ रही थीं। कवि मानते हैं कि गीत मनुष्य की संवेदना से जुड़ा उसके नैसर्गिक स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है जो हर युग में मनुष्य को सींचता रहता है। कवि किशन के गीत की भाषा नव आधुनिक और स्वयं विकसित शैली शिल्प की विविध लहरें हैं जिसमें उतार- चढा़व और सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं के सुदृढ़ तट भी हैं। वे स्वयं 'आत्मकथ्य 'में लिखते हैं - - गीत भारतीय काव्य की प्रमुख पहचान है। कवि की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज में संस्कारों की प्रतिष्ठा करे और निर्माण की प्रक्रिया को तेज करे। पृष्ठ 18 कविता उसके लिए 'महज एक शौक नहीं, अस्मिता की रक्षा करने के लिए वह वचनबद्ध है। इक्कीसवीं सदी में यंत्रवत होती जा रही जिन्दगी में रस को बचाए रखने की शक्ति केवल गीत में है। (पृष्ठ 20) । रचना के प्रति प्रतिबद्ध कवि अपनी चालीस कविताओं के संग्रह' गीत- समय' में सभी युवागीतकारों और कवियों को संदेश भी देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि आज भी हमारी लडा़ई जारी है। गीत - समय में तीन लंबी गीतात्मक स्वभाव की लंबी कविताएँ हैं जिसमें लड़ते हुए आदमी की छवि है जो लगातार लड़कर बुराई और अन्याय, अत्याचार का प्रतिकार करता आया है। यहीं से पाठक अंधकार और उजाले के साथ परिचय करता है और वर्तमान समय की सच्चाई को उजागर करता है। गीत- समय का कवि मूलतः प्रगतिशील विचारों से अनुप्रेरित रहा है। समाज के वर्ग, जाति और धर्मगत भेदों से ऊपर उठकर समानता का दम भरते रहे हैं। उनके गीत सामाजिक त्रास और विषमताओं के विरुध्द चेतावनी के गीत हैं, उन सारी शक्तियों के विरुध्द है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर 'फासीवाद 'का प्रचार करती हैं। (पृष्ठ 9) पहली कविता का शीर्षक 'प्रश्न - मयी दोपहरी' जीवन की इस लंबी यात्रा पर ही प्रश्न उठाती है - टंके हुए कितने भ्रम जिन्दगी मिली हमको यातना शिविर जैसी गूंगों का मुक्ति बोध शाही ख्ययाम नहीं। (पृष्ठ 26) कवि स्वयं नीलकंठ है, वह चुनौतियों का सामना करता है - हम नीलकंठ हैं गरल हमी से हारा है हमने छूकर पाषाणों को स्वप्न दिए हैं हम सागर की गहराई का राज लिए हैं फिर क्यों गुदले पानी में नावें छोड़ रहे हैं नई राह पर स्वर्ण पुरातन गवां दिया हमने।।( पृष्ठ 73) कवि के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह ने स्पष्ट लिखा है कि किशन दाधीच अपनी प्रतिबद्धता को नहीं छिपाते। उनका एक गीत 'गीत की गाँव तक पद यात्रा' यह पद यात्रा ही उनके साहित्यकार की प्रतिबद्धता है। - - जिस बूंदी से किशन दाधीच का रिश्ता पिछली सदी के आठवें दशक तक रहा जो उनकी पैतृक नगरी है और बूंदी एक कस्बा जैसा ही था। बूंदी साहित्यक ऊर्जा की धरती रही है जहांँ साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों का तीर्थ स्थल है। पत्रकार लज्जा राम मेहता,ऋषि दत्त मेहता, भाषाविद् डॉ भोलाशंकर व्यास,शहीद रामकल्याण आदि की कीर्ति गाथा अंकित है। उनकी संवेदनशीलता से भरे गीत बूंदी से होकर ही आते हैं ।कवि किशन दाधीच शहरी सदी को आंकड़े की सदी कहते हैं। - - - गीत के माध्यम से इस समाज के उबड़ खाबड़ यथार्थ को व्यक्त करना बहुत कठिन है लेकिन कवि ने गीत के माध्यम से यह काम बहुत सलीके से किया है।( पृष्ठ 15) मानवता के विकास और उन्नति के लिए कवि के लिए जो गीत रचनाएँ की हैं उसे मनुष्य का मन मस्तिष्क सहज ही अपना लेता है। गीत - समय काव्य संग्रह कवि का पहला काव्य संग्रह है। नई दिल्ली और हैदराबाद के प्रसिद्ध प्रकाशन नीलकमल पब्लिकेशन के सुरेशचंद्र शर्मा द्वारा प्रकाशित किया गया है । कीमत 300 रुपये हैं। प्रथम संस्करण है जो 2021 में आया है। पुस्तक का आवरण डॉ श्रीनिवास अय्यर द्वारा अंकित किया गया है जो कलम की कहानी में निहित रस- रंग और संगीत की स्वर लहरी का आह्वान करते हैं। अभी भी हम भरोसा कर सकते हैं कविताओं पर, साहित्य पर जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आशा की किरणें जगाती हैं।

Monday, December 27, 2021

राम धारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर जन्म --- रामधारी सिंह दिनकर' जी का जन्म 24 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया घाट में हुआ था। पारिवारिक परिचय --- माँ - मनरूप देवी, पिता - बाबू रवि सिंह, 13 वर्ष की आयु में सामवती देवी से विवाह तीन भाई - बसंत सिंह, रामधारी सिंह दिनकर, सत्यनारायण सिंह। दो बेटे - दो बेटियों का परिवार, बड़े बेटे का देहावसान पहले ही हो चुका था पुत्र केदारनाथ सिंह, पुत्रवधुएँ - हेमंत देवी, कल्पना सिंह, पौत्र अरविंद कुमार सिंह का परिवार है जो दिनकर की आत्मा के साथ मिलकर ही जी रहे हैं। शिक्षा --- दिनकर जी की प्रारंभिक शिक्षा सिमरिया बारो गाँव में राष्ट्रीय विद्यालय में हुई जहाँ वे 1921-1923 तक पढे़ जो गाँधी के असहयोग आंदोलन का समय था। बाद में 15 वर्ष की उम्र में मोकामो घाट के स्कूल में पढ़ने गए।जहाँ 1928 तक पढे़। पिता की मृत्यु हो चुकी थी, अतः बाद में नेनुआ की पढ़ाई की जिम्मेदारी भाई बसंत सिंह और सत्यनारायण सिंह ने उठाई। इसके लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। रामधारी सिंह को नेनुआ नाम से घर में पुकारा जाता था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बीए किया एवं संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक विद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्य किया। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से १९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। 1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचे। 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन् 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए। कृतियाँ - - - प्रबंध काव्य - कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, प्रणभंग, उर्वशी, बारदोली विजय, धूपछाँव, बापू, इतिहास के आँसू, मिर्च का मजा, दिल्ली मुक्तक - - - रेणुका, हुंँकार, रसवंती, इंद्रगीत, सामधेनी, धूप और धुआँ, नीम के पत्ते, नील कुसुम, सीपी और शंख, नये सुभाषित, चक्रवात, धार के उस पार, आत्मा की आँखें, हारे को हरि नाम प्रथम कविता संग्रह 'रेणुका' 1935 में छपी जिसमें देशभक्ति कूट कूट कर भरी है। गद्य ग्रंथ - - - मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, रेती के फूल, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, भारतीय संस्कृति की एकता पुरस्कार - - - 1959 - - साहित्य अकादमी पुरस्कार 1959 - - पद्मभूषण 1972 - - ज्ञानपीठ पुरस्कार विशेष ---- रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। दिनकर स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी रचनाओं 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' नामक कृतियों में मिलता है। उनकी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 'उर्वशी' के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे। द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य 'कुरुक्षेत्र' को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया। फिर तो ज्वार उमड़ा और रेणुका, हुँकार, रसवंती और द्वंद्वगीत रचे गए। रेणुका और हुँकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अग्रेज़ प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में 'रश्मिरथी' और 'परशुराम की प्रतीक्षा 'शामिल है। 'उर्वशी 'को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना 'उर्वशी' की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। 'उर्वशी 'स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, 'कुरुक्षेत्र', महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है। दिनकर जी ने छायावादी संस्कारों के साथ लिखना शुरू किया था। वे स्वयं कहते हैं कि छायावाद के रोष से बचना मुश्किल था। उनकी काव्य -दृष्टि पर उर्दू के इकबाल और बंगला के रवीन्द्र नाथ का गहरा योगदान रहा। वैचारिक स्तर पर कार्ल मार्क्स के साम्यवादी सिद्धांत से प्रभावित थे, और वहीं दूसरी ओर महात्मा गाँधी की करुणा से भरा हुआ मानवता वाद से भी आकर्षित रहे रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों की मुखालफत करने से वे नहीं चूके। 'देखने में देवता सदृश्य लगता है बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है। जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो समझो उसी ने हमें मारा है॥' 1962 में चीन से हार के बाद संसद में दिनकर ने इस कविता का पाठ किया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का सिर झुक गया था. यह घटना आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास की चुनिंदा क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है. हिंदी के अपमान को लेकर भी बहुत सख्त स्वर में उन्होंने संसद में अपनी बातें रखी थीं और हिंदी को सम्मान देने पर बल दिया था। वे कहते थे कि हिंदी की निंदा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहुंँचती है। रचना अंश --- ' सच है विपत्ति जब आती है ' बहुत ही प्रेरक पंक्तियाँ 'रश्मिरथी 'से -- ' सच है विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है। सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते. विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं. मुंँह से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण ना गहते हैं. जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग निरत- नीति रहते हैं शूलों का मूल नशाते हैं. बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं, है कौन विघ्न ऐसा जग में टिक सके आदमी के मग में. खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।' 'हिमालय' कविता की पंक्तियाँ - - 1933 में इस कविता ने धूम मचा दी थी -- ' मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!' प्रसिद्ध पंक्तियाँ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' जिनका उद्घोष लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में किया था जो तत्कालीन सरकार के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद था - - - ' सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही, जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली, जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली' देश को जागरूक करने वाली प्रेरणादायी पंक्तियाँ ---- ' वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है। थक कर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है। अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का‚ सारी रात चले तुम दुख – झेलते कुलिश निर्मल का‚ एक खेय है शेष किसी विध पार उसे कर जाओ‚ वह देखो उस पार चमकता है मंदिर प्रियतम का। आकर इतना पास फिरे‚ वह सच्चा शूर नहीं है। थक कर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।' दिनकर आज भी खेत, किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित और देश के रक्षकों के बीच उनकी आत्मा के शब्द बनकर सूर्य की तरह चमक रहे हैं। हिंदी के पक्षधर दिनकर जी को शत शत नमन। 🙏 🙏

किशन दाधीच

गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच से मिलना एक जीतीजागती संस्था से मिलना है। उनके घर की अलमारी में अभी भी 1980-81 - 82 की स्मृति स्वरूप साहित्यकारों के पत्र जो उनकी थाती है, भरे पड़े हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने बताया कि 100 केजी साहित्यिक रद्दी भी बेची है। मैंने पूछा कि आपने उसको छांटा कैसे? बताया कि उसमें साल से भी अधिक समय लगा। उन्हें ही बेचा गया है जिन किताबों पर उन्होंने लिख लिया और उन्हें पढा़ गया था। था तो बहुत परिश्रम का काम। खैर अभी भी अज्ञेय जी के साथ फोटो और पत्र, हाबडा़ के एक वरिष्ठ विद्वान शंभूनाथ श्रीवास्तव, भवानीप्रसाद मिश्र आदि तमाम बड़े बड़े साहित्यकारों के पत्रों को सहेज कर रखा है। उदयपुर की साहित्य संस्कृति और संस्कार को संस्कारित करने में किशन दाधीच सात-आठ दशकों से भी ज्यादा समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।राजस्थान की प्रसिद्ध पत्रिका 'मधुमति' के संयोजन से तीन साल जुड़े रहे।बहुत सी सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण और संवर्धित करने में तत्पर रहे। अपने गीतों से उदयपुर ही नहीं पूरे राजस्थान और देश के गौरव हैं। उनकी आत्मीयता और भाव में रस और स्वर लय और विचारों की गहराई है। को दाधीच जी ने कवि और साहित्यकार हरीश भदानी की कलकत्ता यात्रा पर संस्मरण सुनाया जो इतना मजेदार था कि हंसते हंसते बेहाल हो गई। जब उनकी सासंद बेटी सरला का विवाह भी नहीं हुआ था तब की बात है। कलकत्ता आते वक्त उनका बैग और रुपये सब चोरी हो गए। राजस्थान लौटने के लिए भी पैसे नहीं थे। अब एक सेठ से अनुरोध किया गया कि बड़े कवि हैं उनकी कविताओं को सुना जाय जिससे उन्हें सेठ जी तो कुछ दे ही देगें। सेठ जी तैयार हो गए लेकिन एन समय में उनका कुछ काम निकल आया तो सेठ जी ने कहा कि कोई बात नहीं आप आपनी कविताएं मेरे मुनीम को सुना दीजिएगा। मानो कविता न हो कोई वस्तु का सौदा हो रहा हो। हरीश जी ने कहा ठीक है। मरता क्या न करता। मुनीम जी और सेठ जी के घर की कुछ औरतों कविता सुनने बैठीं। कविता के बीच में एक पंक्ति आई'हथेली पर सरसों उगाई' मुनीम जी ने हरीश जी को बीच में टोक दिया और कहा कि आप ये बताएं कि आपके शहर में सरसों का क्या भाव है? मुनीम जी विशुद्ध व्यवसायिक वृत्ति के थे। कविता भला कौन सुने? खैर हरीश को उस जमाने में ग्यारह सौ रुपये मिले और तब वे रेलवे स्टेशन जा सके। किशन जी ने और भी अच्छे ढंग से इस घटना को सुनाया था। मैं जैसा बता सकी। कथाकार उपेंद्र नाथ अश्क जी की एक घटना बताई। बहुत मजा आया। शुरुआती दौर में उपेंद्र नाथ अश्क जी इलाहाबाद में चूना की दुकान करते थे। अब तो उनके बेटे और परिवार सब विदेशों में हैं संपन्न हैं। उनकी कहानियों का प्रकाशन उनके किसी मित्र ने करवाया। पहली कहानी की पुस्तक 'बैंगन का पौधा '। ये कहानी पुस्तक बहुत प्रसिद्ध हुई। उनकी आत्मकथा में उन्होंने स्वयं लिखा है। तो उनकी इस पुस्तक का क्या होगा। बिकी भी नहीं। तो उनके कोई परिचित की कृषि में जानपहचान थी सो वहां बैंगन का पौधा नाम होने के कारण यह हुआ कि बैंगन कृषि से संबंधित है सो लाइब्रेरी ने एक साथ सभी पुस्तकें खरीद ली। जब विभिन्न वाचनालयों में गई तो उसमें कहीं भी बैंगन के पौधे या खेती के शोध वगैरह की चर्चा ही नहीं थी। वहाँ के डिप्टी डायरेक्टर को पकड़ा गया। फिर इनक्वायरी कमेटी बैठी कि किसने ये पुस्तकें खरीदी है। केस वगैरह करने की बात चली। वो तो अच्छा हुआ कि कोई पहचान वाले ने केस को रफा-दफा करवा दिया नहीं तो डिप्टी डायरेक्टर पर आफत आ जाती। केवल शीर्षक देख कर पुस्तक न खरीदें। लेकिन बैंगन का पौधा बहुत प्रसिद्ध हो गई।सच तो यह है कि उस समय अश्क जी की धूम मच गई। किशन दाधीच जी ने 6 दिसंबर को ये किस्से सुनाए। आजकल साहित्यकार अपने में ही रहते हैं किसी के पास समय ही नहीं है कि इस तरह के किस्से सुनाएं। साहित्य आनंद की अनुभूति करवाता है। संगीत लय सुर और भाव से पूर्ण पूर्ण कर विचारों को समृद्ध करता है।🌹🌹🌹🌹🌹

Sunday, October 17, 2021

दस द्वारे का पिंजरा अनामिका के उपन्यास की समीक्षा

दस द्वारे का पिंजरा को पढ़ते हुए - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 'स्त्री की मुक्ति भी स्त्रीलिंग ही तो है! कभी अकेली नहीं मिलती! हरदम वह झुंड में ही हँसती - बोलती है। थेरियों का झुंड हो या जैन साध्वियों, चिड़ियों और स्त्रियों का यह बृहत्तर सखा- भाव रमाबाई को हमेशा ही आकर्षित करता!' भारत ही नहीं, विश्व में पितृसत्तात्मक प्रधान समाज रहा है। स्त्रियाँ को कभी भी समानता और अधिकार का स्थान अनायास ही नहीं मिला,उन्हें अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ी तभी उन्हें स्थान मिलता रहा, यह समाज में चलने वाली अनवरत प्रक्रिया है। स्त्री मुक्ति कब से माना जाए यह साहित्य और समाज दोनों की विडम्बना है। जब इस पर बात होती है तो स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर ज्योतिबा फूले, महादेव रानाडे, केशवचंद्र सेन, भिखारी ठाकुर आदि बहुतेरे समाज सुधारक जिन्होंने ने समाज की उपेक्षिता स्त्री वर्ग की समानता की ओर ध्यान खींचा। फ्रैंच लेखिका सीमन बोउवार ने 1949 में 'स्त्री उपेक्षिता' पुस्तक लिखकर स्त्री समाज की कड़वी सच्चाई को सामने लाने का कार्य किया। स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता को लेकर बहुत से कथाकार, साहित्यकार, लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से मुहिम चलाई है। अनामिका ऐसा ही सशक्त नाम है जिन्होंने एक ही समाज की दो प्रकार की स्त्रियों के चारित्रिक विवेक को जातीय और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपने उपन्यास 'दस द्वारे का पिंजरा' में विस्तार से चर्चा की है। वेद, उपनिषद, स्मृति, आदि से लेकर भारतीय संस्कृति और दर्शन के विभिन्न विषयों पर इस उपन्यास में चरित्र के अनुसार चर्चा हुई है जो लेखिका के गहन अध्ययन को दर्शाता है ।भारतीय समाज चार जांतियों में बंँटा हुआ है जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं लेकिन यह बंँटवारा यहीं तक सीमित नहीं है। पितृसत्तात्मक बहुल समाज में सभी जातियों की स्त्री के भी बराबर वही वर्ग रहे हैं। उच्च वर्ण और जाति व्यवस्था में स्त्री का स्थान भी उसी क्रम में मिलता है। उच्च वर्ण की स्त्रियों को समाज में ऊँचा और नीची जाति की स्त्रियों से निम्न श्रेणी का माना जाता था अभी भी इस सोच में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। बड़े-बड़े समाज सुधारक अपनी घर की स्त्रियों के साथ भी उपेक्षा के भाव रखते हैं क्योंकि वे स्त्री जाति की हैं, वह माँ, पत्नी आदि कई रूपों में प्रयुक्त होती रही है। एक रूप उसका सिर्फ देह का है जो समाज में उसके कुलीन और अकुलीन वर्ग को निर्धारित करता है। अनामिका का उपन्यास 'दस द्वारे का पिंजरा' उपन्यास का लेखन किस्सागोई की तर्ज पर एकत्रित की गई दो कथाओं का जोड़ है। 'आधारशिला' के अॉफिस में जहाँ बच्चों के लिए कथासत्रम् चलता है। बच्चों को महान प्राणियों के जीवन, भूत-प्रेत, पारलौकिक अनुभव से लेकर वैज्ञानिक आविष्कारों, मुकदमों और स्कैनडलों तक के किस्से सुनाए जाते हैं। मनोचिकित्सक डॉ स्पंदन आधारशिला के कथासत्रम् के सम्मानित अतिथि हैं। शीरीन पुणे संस्थान से दस साल पहले निर्देशन का कोर्स की थीं। यहांँ फिल्म पर भी काम कर रही हैं। फिलहाल दो फिल्में बनाने का प्रोजेक्ट है जिसे शीरीन को बनाना है। दो स्त्री चरित्र - एक पंडिता रमाबाई पर और दूसरी उनकी पट्टशिष्य ढेला बाई पर, जो स्त्री के संघर्षों के साथ ही नए मूल्यों को स्थापित करती है। प्रथम बार साहित्य अकादमी का पुरस्कार अनामिका को मिलना भी साहित्य क्षेत्र की प्रगतिशीलता का परिचायक है। उपन्यास दस द्वारे का पिंजरा 'सैल्वेशन' से लेकर 'लिबरेशन' तक स्त्री मुक्ति के कठिन रास्तों से गुजरती स्त्रियों की सजग दास्तान है। पुरानेपन के आवरणों में उघाड़ती ढकती स्त्री के विभिन्न रूपों को स्थापित करने की कथा इस उपन्यास में आरंभ से अंत तक दृष्टिगोचर होता है। एक फिल्म की रील यह कथा मुजफ्फरपुर में ढेलाबाई की 'जोगिनिया कोठी' ( पृष्ठ 14)से होकर निकलती जो उपन्यास की केन्द्रीय धूरी है जहांँ अब 'आधारशिला, का मुख्य दफ़्तर हो गया है। शीरीन का घर बिहार ही है। उसकी माँ काननदेवी का लिखा रेडियो नाटक रमाबाई वाली फिल्म की पटकथा के लिए उसके सामने पड़ा है। शीरीन के पति और बच्चों को डॉ स्पंदन की 'निःस्वार्थ सेवा' और' अहैतुक प्रेम' के कारण उनका आना अच्छा लगता था क्योंकि यही 'दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति' है। चकलेघर की ढेला बाई और एक आचार्य पंडिता स्त्री रमाबाई के जीवन भर के अनुभवों को अनामिका ने किस्सा के बहाने बहुत ही सूक्ष्म मानवीय दृष्टि से उकेरा है। प्रथम खंड में ही' चकलाघर की एक दुपहरिया' कविता में वे विवस्त्र स्त्री की बात करती हैं जो विद्याविनोदिनी संस्कृत पढ़ रही हैं। वह आम्रपाली की तरह है, विदूषी भी है - - - पर पाप होता है क्या? खुल जाती है ऋतु संभोग से बंदी शाला, छा जाता है अंधकार, सार्थवाह, लेकिन उस मेधायित अंधकार में भी कुछ द्युतियांँ तो होती ही हैं निराकार! ' उपन्यास में भारतीय समाज के एक ऐसे कालखंड को लिया गया है जब देश नवजागरण के दौर से गुजर रहा था और देशवासियों में देश के कुसंस्कारों और कुप्रथाओं से आजादी प्राप्त करने की मुहिम चल रही थी। ब्रह्म समाज अपने सनातन हिंदू धर्म की मूल भावना के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ था। उसी समय धर्मांतरण, जातिवाद, सती प्रथा, स्त्रियों का अपमान आदि अनेक समस्याओं के साथ अंग्रेजियत के भक्त,गांधी जी के अनुयायी, राजनीति, देशभक्ति, स्त्री दुर्दशा, जातिप्रथा, समाजसुधार आदि प्रमुख विषयों को केंद्र में रखकर समाज के विकास के लिए प्रयास किए जा रहे थे। प्राचीन और नवीन के सुंदर सामंजस्य पर लिखे नाटकों का मंचन किया जा रहा था जिनमें कहीं प्रेम का आदर्श था, कहीं देशदशा, कहीं देशी रजवाड़ों की कुचक्र पूर्ण परिस्थितियां या तत्कालीन पांखडमय धार्मिक और सामाजिक जीवन के विभिन्न रूपों को सुधिजन जागरूकता अभियान के तहत लिख रहे थे। इस उपन्यास में ज्योतिबा फूले के' सतसार 'नाटक का मंचन उपन्यास की नायिका 'पंडिता रमाबाई ' को केंद्र में रख कर किया गया है। रमा बाई ने इंग्लैंड में जाकर हिंदू धर्म और ईसाई धर्म का तुलनात्मक अध्ययन किया और पाया कि हिंदू धर्म का स्वरूप घमंडी और पक्षपातपूर्ण रहा इसी कारण उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया । रमा बाई की बेटी मनोरमा और उसका साथी गिरिधर दोनों ज्योतिबा - सावित्री के' सतयशोधक समाज' के कार्यकर्ता बन कर आते हैं।इस नाटक के माध्यम से' सत्यशोधक समाज' के एक अन्त्यज समाज के एक सदस्य और गृहस्थ ब्राह्मण के बीच बातचीत से आरंभ होती है। ब्रह्म समाज के ब्रह्म का मतलब जहां जातिभेद है ही नहीं। हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म में धर्मांतरण क्यों किया विदूषी रमा बाई ने। 'हिंदू धर्म के निर्माताओं ने नारी और शूद्रातिशूद्र जातियों पर किस - किस प्रकार की आग उगली है, उनपर कितने कठोर प्रतिबंध लगाए हैं, उनके संबंध में कितने प्रकार की जुल्मी बातें लिखकर रखी हैं, यह सब उस बेचारी भोलीभाली विदूषी रमाबाई को क्या मालूम था!'(दस द्वारे का पिंजरा, पृष्ठ 125) उपन्यास में विदूषी स्त्री रमाबाई बचपन से ही तर्कशील और बुद्धिमति रही हैं। यह उनके पिता पंडित अन्तशास्त्री डांगे द्वारा ही संभव हो सका जिन्होंने स्वयं आन्ध्र के गंगामूल आश्रम को पौराणिक अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित किया। वे अपनी पत्नी और पुत्रियों को भी शास्त्र पढ़ाते और गूढ़ विषयों पर विचार विमर्श करते।इसी कारण महाराष्ट्र के अपने ब्राह्मण समाज से जाति बहिष्कृत किए गए। तेरह वर्ष की उम्र में ही मदुरै मंदिर के प्रांगण में 'देवीसूक्त' रहस्य पर बड़े-बड़े पंडितों के सामने रत्नावली ने अपना विचार रखा, देवताओं के चाल-चलन पर भी सवाल उठाने का साहस किया जिसके कारण अनंतशास्त्री को सभी ने धिक्कारा। समाज में धर्म के सही रूप को समझना संकीर्णता और असहिष्णुता माना जाने लगा है। धर्म की बात जब आती है तो जिस देवता को हम गढ़ते हैं उसके संस्कारों को गढ़ने में हमारी ही भूमिका है। 'देवता भी मानवीय मूल्यों के वाहक हैं' एक स्त्री को पुरुषों के समाज में खुल कर बोलने की भी स्वतंत्रता नहीं है जबकि वाणी की अधिष्ठात्री देवी स्वयं भी तो स्त्री काया में हैं। रमा बाई पंडिता बन जाए यह पुरुष पंडित समाज कैसै स्वीकार करता। अनंतशास्त्री बाल विवाह के विरोधी थे इसलिए अभी अपनी पुत्री के विवाह के विषय में भी नहीं सोचते , उन्हें गैर ब्राह्मण जाति के सदाव्रत की बुद्धि से सरोकार था , उसकी जाति- कुल- गोत्र से नहीं। पिता रमा बाई और सदाव्रत दोनों बच्चों को आश्रम में एक साथ ही पढ़ाते।पिता का कहना था कि आगे चलकर यदि 'अस्तेय, अपरिग्रह, सत्य, मेधा और शील से पूर्ण सदाव्रत रमाबाई का हाथ मांगता है तो सहर्ष स्वीकार्य होगा। ये बात अलग है कि आगे चल कर रत्नावली की माँ ने ही सदाव्रत को हमेशा के लिए अपने परिवार और पुत्री से दूर कर दिया। अपने पुत्र श्रीधर , बड़े जामाता को ही प्रमुखता दी। जबकि पूरे परिवार के कष्टपूर्ण समय में सदाव्रत ने जी जान लगाकार सेवा धर्म निभाया। मॉं लक्षमी बाई समाज के कुसंस्कार और संकीर्णतावादी मानसिकता से उबर नहीं पाई।उन्होंने सदाव्रत को बहुत ही भारी मन से अपनी पुत्री से सदा के लिए दूर रहने के लिए वादा लिया। सदाव्रत घूरे पर पड़ा हुआ मुरुगन अप्पा को मिला था उसके कुल गोत्र का पता न था। सतमासा अनाथ बच्चा था जिसे अनंतशास्त्री ने पाला था। अप्पा कमिशनरानी मेमसाहब के साथ कुक बनकर ब्रिटेन चले गए। वहाँ उनका ईसाई धर्म में धर्मांतरण करवाया गया। बहुत सारी घटनाएं घटित होती हैं - बालसखा सदाव्रत का इंग्लैंड से बार ऐट लॉ बन कर लौटना(दृश्य 15), इंग्लैंड में भी धर्म की परिभाषा में बदलाव जहां 'मानवधर्म'भी गिरजाघरों और दूसरे दिव्य स्थानों की सीढ़ियां उतरता हुआ सेकुलर साहित्य की डॉरमेटरी में रहने लगा है (द्वारे. पृष्ठ 66), स्वामी दयानंद, केशव चंद्र सेन, जस्टिस रानाडे, सिस्टर गेरेल्डाइन, दादा साहेब, फैनी पॉवर्स आदि कई लोगों के विचारों को मेरी रत्नावली ने अपने दृष्टिकोण और विवेक से समझा। "मानव मात्र से प्रेम करने की कला है धर्म: मनुष्य काला हो या गोरा, पीला हो या लाल, श्वेत हो या गुलाबी - - आवरणों के पार देखना,देखकर पहचानना और सबके जलतत्व, अगनितत्व, पवनतत्व, आकाशतत्व,महीतत्व से एका बिठाना - - यही धर्म है। वेद, बाइबिल, कुराआन और दुनिया के और सभी महाग्रंथ जिन बातों पर सहमत हैं, वही धर्म है - - - प्रेम और सद्भाव, अहिंसा, सेवा और परदुखकातरता! - - - - वृहत्तर मानवता की सेवा हो - - - सहीधर्माचार यही है! मानवसेवा ही हरिसेवा है। मनुष्य की मूर्ती ही ईश्वर की मूर्ती है! '(पृष्ठ 63) रत्नावली के साथ प्रेम के प्रथम स्पर्श को महसूस करने पर सदाव्रत ने जीवन का यह रहस्य समझा कि' समाज एक ऐसा कटखना बाप है जिसे किसी की भलमनसाहत पर जल्दी भरोसा नहीं होता। संयम की कोमल लता को धीरज का कड़ा तना अवलंब के रूप में अँकवारना ही पड़ता है! इन कड़े सवालों का उत्तर समय देगा!' (पृष्ठ 31)स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए रमा बाई के माध्यम से अनामिका ने उपन्यास में एक आंदोलन की शुरूआत की है जहाँ स्त्री का अपना सम्मान होगा। इसलिए बेसहारा स्त्रियों की खातिर रमाबाई ने एक मुक्ति मिशन या सिस्टर्स होम की तर्ज पर पूणे में'शारदा सदन ' की स्थापना की जिसमें महात्मा ज्योतिबा फूले ने उसमें स्कूल चलाने की अनुमति दी। और विधवा के अधिकार विनियोजन के प्रश्न पर बड़े-बड़े पुरोधाओं से लोहा लेने में भी जुट गईं। (पृ109) सावित्रीबाई फूले 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' में बलात्कार की शिकार औरतों का साफ-सुथरा और सुरक्षित प्रसव का कार्य कर रही थीं। शारदा सदन में विधवा स्त्रियाँ अपने जीवन की तकलीफों को भूल मुक्त रूप से कार्य कर सकती थीं। , काश! पुरुषार्थ स्त्रियार्थ भी होते 'चार पुरुषार्थों की बात चलने पर मनोरमा रमाबाई की बेटी चुटकी लेती। (पृष्ठ 111)।रमाबाई अपने वैधव्य से भी संघर्ष करती है अपनी बेटी को इंग्लैंड में मिशनरी में शिक्षा दिलवाती है लेकिन साथ में भारतीय धर्म और समाज की कहाँनियों से समृद्ध भी करती है। यही कारण है कि मनोरमा उसकी माँ के सपने को पूरा करने में उसका साथ दे रही है। पिता सदाव्रत की मृत्यु का कारण भी ज्योतिबा फूले के विरोधी दल ही थे। रुकमाबाई वाला मुकदमा भी बंबई पूणे में हलचल मचा रखा था।डॉ. आनंदी बाई जोशी जैसी स्त्रियाँ कैसे डॉक्टर बनी। बहुत से ऐसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कथाकार ने भारतीय धर्म समाज की थोथी बातों को ध्यान में लाने की कोशिश की है जहां स्त्रियाँ अभी भी अंधेरे से बाहर निकल नहीं पाईं हैं। रमावती कथा की समाप्ति के साथ ही दूसरी प्रस्तावित फिल्म ढेलाबाई के लिए शीरीन कच्चा माल तैयार करने की खोजबीन शुरु कर देती है। बाबा लोहासिंह जो अपने जमाने के रेडियो नाटक आदि के कलाकार थे। उनके मुँह से उनके जमाने की कुछ सच्ची कहानियों के विषय में जानकारी ली गई है । बतकही शैली में पूरी कहानी चलती है। खुदीराम बोस की फांसी और अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'तिरहुत कैरियर' , साहित्य सम्मेलन हिंदी भाषा, प्रचारिणी सभा, नवयुवक समिति आदि के कई घटनाओं के बारे में बताते। बाबा जब आठ-नौ साल के थे तब की बातें हैं।उन्हें झनको हलवाइन की सुनहरी जलेबी याद आती हैं। रेडियो स्टेशन पटना से आने वाला नाटक 'लोहा सिंह नाटक' उनकी लोकप्रियता का कारण रहा। उसी समय जनकवि महेन्दर मिसिर की प्रिय शिष्या ढेलाबाई की माँ, अफसाना बाई से भी उनका याराना था। उनके दिवालिएपन में अफसाना बाई ने उनकी दो बीवियों के परिवार को भी चलाया। बातों ही बातों में न जाने कहाँ पहुँच जाते। आरा से आकर मुजफ्फरपुर रहने लगे लोहा सिंह क्योंकि उनके बाबू कुँवर सिंह का निधन हो गया था - दमनचक्र में सभी साथी पकड़े गए या इधर-उधर छिप गए। उनके दादा रामफल सिंह ने दूरस्थ रिश्तेदार रुद्र जी के यहाँ आश्रय लिया। (पृष्ठ 136-37)खुदी राम की फांसी का विराट दृश्य देखने वाली उन आंखों ने उस आजादी के दिवाने की उस पीड़ा को देखा जहाँ अपने प्राणों की चिंता नहीं थी बल्कि निर्दोष परिवार के छिन्न भिन्न होने का अफसोस था। बेरिस्टर कैनेडी अंग्रेज़ी का साप्ताहिक निकालते थे उन्ही की पत्नी और दो बेटियाँ खुदीराम बम कांड में अकारण मरी थीं। 'ऐसे लोगों की आंखों में क्या होता है जो अपनी जान हथेली पर लेकर निकलते हैं। बृहत्तर उद्देश्य की खातिर कुछ जाने चली भी गईं तो क्या... खेत तामते तामते कितने निरीह जीवजंतु बेवजह ही कुचले जाते हैं'। (पृष्ठ 138) इस बतकही में एक अद्भुत जोडी़ - महेन्दर मिसिर और ढेलाबाई की कथा सुनाते हैं जिसमें विस्फोट और आंदोलन दोनों ही हैं, वे जितने बाहर हैं उतने ही भीतर भी। 'कैनेडी साहब थियोसोफिकल लॉज में लेडबीटर साहब के साथ ही रहने लगे थे और वह स्थान भूत बँगले के नाम से प्रसिद्ध हो गया। वहाँ एनी बेसेंट, डिक क्लार्क, मास्टर मोर्या, मास्टर कुथोमी, मैडम ब्लावत्सकी और तिब्बत के महाप्राण बौद्ध संतों के अनगिनत महाग्रंथ पुस्तकालय के ढंग से सजाए गए थे' (पृष्ठ 139) यह वह समय था जब पूरे विश्व में भौतिक, आधिभौतिक क्रांति चल रही थी। व्यक्ति को अपने भीतर शांति, प्रेम और निःस्वार्थ अहिंसात्मक क्रांति के लिए संकल्प लेने की आवश्यकता थी। साथ ही रिटायर्ड फौजी लोहासिंह भी अपने भीतर ऐसी ही क्रांति का जज्बा रखने वाला था। उस समय हिंदी के सब जनपदों में नए युवक-युवतियों का मन नए नए सपनों और संकल्पों से भरा हुआ था। राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, बाबू शिवपूजन सहाय, श्री नलिन विलोचन शर्मा हिंदी का अलख जगाने का काम कर रहे थे। भोजपुरी मागधी अंगिका बज्जिका मैथिली आदि लोकभाषाओं के जनकवि जननाट्यकार लोगों को जागरुक कर रहे थे। लोहासिंह सूत्रधार है जो रेडियो स्टेशन के जाने-माने अभिनेता और निदेशक रहे और अब रिटायर्ड होकर जोगिनिया कोठी आ गए!( पृष्ठ 144) ।थोड़े से बावले और फकीर लाल बुझक्कड सी बातें करते लोहासिंह। कभी महेन्दर मिसिर, कहीं सत्याग्रही कहीं भिखारी ठाकुर के संवाद या फिर गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन और महेन्दर मिसिर बन जाते। 1942 में बाबू हलवन्त सहाय की कोठी पर लोहासिंह ने बारह वर्ष की अवस्था में ढेलाबाई को देखा। ढेलाबाई उस समय चालीस वर्ष की होंगी। लोहा सिंह की मौसी गंगा ढेलाबाई की खासमखास दाई थीं। 1917 में सोनपुर के मेले से महेन्दर मिसिर और उनके पहलवान साथी ढेलाबाई को उठा लाए थे-दोस्ती के तबोताब में! मुख्तार साहब का दिल ढेलाबाई पर था लेकिन ढेलाबाई महेन्दर मिसिर की दिवानी थी। महेन्दर मिसिर भोजपुरी के भारतेंदु कहलाते थे। मुक्ति मिशन से ढेलाबाई का जुड़ना, मुक्ति शब्द सैलल्वैशन और लिबरेशन दोनो अर्थों में कितना व्यापक है,कई आंदोलनों का जिक्र जैसे निलहा आंदोलन जिसमें लोहासिंह गांधी जी के अनन्य सहायक थे और उनके बाबा निलहा कोठी के मैनेजर थे। मुजफ्फरपुर स्थित जोगिनिया कोठी में ढेला स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय इस बात का द्योतक है कि कुछ था जो बहुत ही पुराना था और कुछ ऐसा जो बार बार ढह जाता था। (पृ 149)। उपन्यास में आई बहुत - सी घटनाओं का सम्मिलन ढेला बाई के चरित्र को उजागर करने में मदद तो देता ही है लेकिन एक कोठा वाली स्त्री का समूचा जीवन अंत तक अपने अस्तित्व की लड़ाई स्वाभिमान के साथ लड़ती वह उसकी विशिष्टता है। खदेरन को फादर, और वह प्रेताक्रांत थियोसॉफिकल लॉज, कच्ची पक्की, अथक्रांति कथा , ढेला स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, मुजफ्फरपुर, खैनी की चुटकी ले बाबा उवाच, ढेलाबाई (1900-1917),पहला किस्सा, पीरजी घसियारे का ठट्ठा, पीकी बोली न बोल,इस मुताल्लिक फरसिया हुक्के का बयान, महेन्दर मिसिर आम -महुआ संवाद, परेवा कुँवर - मेरा जिया जाने, जैसे उड़ि जहाज को पंछी, महेन्दर मिसिर :घर - घरौआ, ढेलाबाई, महेन्दर मिसिर, बाबू हलवंत सहाय, ढेलाबाई (1945-1950),द्वितीय खंड, अफसाना बाई आदि लगभग 29 भागों में कथा आगे कड़ी की तरह जुड़ती चली जाती है। तवायफो़ के जीवन संघर्ष की दास्तान है दस द्वारे का पिंजरा उपन्यास ।ढेलाबाई की नानी अफसाना बेगम एक बड़ी शख्सियत रही हैं। उनका कोठा सिर्फ देह धंधे की ही स्थली नहीं है बल्कि उनके जैसी कई और बदनसीब औरतों की मुक्ति का भी द्वार है। पंडिता रमाबाई द्वारा स्थापित' मुक्ति मिशन' तवायफो़ को अपने जीवन के मायने समझाने की पाठशाला है जहांँ वे अपनी शक्ति का उपयोग कर सकती हैं। तवायफो़ का गुप्त संगठन रात में देह धंधे से कमाये पैसों से क्रांतिकारियों की मदद करता है, समाज सेवा से जुड़ा संगठन है। ढेलाबाई की नन्ना यानी अफसाना बाई अपने घर में क्रांतिकारियों को आश्रय देती है। देश की आजादी के लिए देशव्यापी सत्याग्रह की लहर का असर चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधी जी लड़ाइयाँ लड़ चुके थे। अंग्रेज देश को स्वराज या उससे मिलते - जुलते कुछ अवसर जरूर देगें ऐसा मोंटेन और लॉर्ड चेम्सफोर्ड की समिति रिपोर्ट से लगा था लेकिन उसी समय रॉलेट कानून आया जिसने आम नागरिकों के भी अधिकार छीन लेने की तैयारी थी। (पृष्ठ 220)हिंद स्वराज और स्वराज प्रतिबंधित कर दी गईं लेकिन गाँधी जी खुद किताबें बेचकर कानून भंग कर रहेथे। कानून भंग के दूसरे दिन महादेव भाई के साथ गाँधी जी गिरफ्तार कर लिए गए। फिर जलियांवाला बाग हत्याकांड घटा। इसी तरह पूरे देश झुलस रहा था। मुजफ्फरपुर कीअपूर्व सुंदरी और मशहूर नृत्यांगना ढेलाबाई को बाबू हलुवंत सहाय की उपपत्नी का दर्जा दिलाने में महेन्दर मिसिर ने पूरा सहयोग किया। जनकवि सुदर्शन महेन्दर मिसिर छह फुट लंबे - तगड़े कसरती बदन वाले पहलवान थे। साथ ही संस्कृत काव्य की भक्ति और श्रृंगार से पूरा परिचय था।' हलुवंत सहाय की जमींदारी का कामकाज संभालते कोठी पर पूजापाठ और महफिल जमती तो उसमें चार चाँद लगाते। (पृष्ठ 155)रसिक हलुवंत सहाय का दिल ढेलाबाई पर था। महिन्दर मिसिर ने सोनपुर में लगने वाले सावन मेले से ढेलाबाई को अगवा कर ले आए। पर ढेलाबाई महेन्दर मिसिर पर मरती थीं। कथा के सूत्र मोड़ लेते हैं। बहुत कुछ घटता है। बीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में भोजपुरी अंचल की तत्कालीन परिस्थितियों में क्रांतिकारियों का बोलबाला था। 'राजकुमार सुकुल ब्रजकिशोर प्रसाद मौलाना मजहरूल हक बाबू राजेंद्र प्रसाद डॉ सैयद महमूद जयप्रकाश नारायण जगलाल चौधरी भोजपुरिए बाबा रामोदारदास उर्फ राहुल सांकृत्यायन के साथ गाँव - गाँव घूमकर अलख जगाने में व्यस्त थे - -' हमरा नीको ना लागे रामा, गोरन के करनी रुपिया ले ग इले, प इसा ले ग इले, ले ग इले सगरी गिन्नी ओकरा बदला में दे ग इले, ढलुई के दुअन्नी' (पृष्ठ 156)। महेन्दर मिसिर ने क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद की। जाली नोट छापे , जेल गए। स्वामी अभयानंद जी ने मिसिर को साहसी और देश के खातिर जान देने वाला समझ कर अपनी टोली में शामिल किया। महेन्दर मिसिर के गीत खत्म होते होते रोज रात अंग्रेजों पर धावा बोला जाता। बाद में उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने भी जाल बिछाया। पं. मिश्र की रिहाई के लिए अदालत में सैकड़ों वेश्याओं ने गहनों की पोटली और चांदी के सिक्कों के गट्ठर लेकर जज से गुहार लगाई। ढेलाबाई ने मशहूर बैरिस्टर हेमचंद्र बनर्जी को वकील नियुक्त किया।ढेलाबाई ने उनके लिए अपनी सारी संपत्ति लुटा दी। लेकिन मिश्र जी अपने अपराध से नहीं मुकरे और सात साल जेल में काटे। 25 अक्टूबर 1946 से फिर ढेलाजी के मंदिर में महफिल जमीं और उस जगह पर बैठे जहां बैठकर ढेलाबाई उनके गीत और भजन सुनती थी वहीं हारमोनियम पर शिव जी के भजन के समाप्त होते ही वे परलोक सिधार गए। ये ढेलाबाई के प्रति उनके प्रेम की पराकाष्ठा भी थी और पश्चात्ताप का प्रायश्चित था। ऐसा प्रेम प्रसंग संभवतः ही किसी उपन्यास में आया हो। ढेलाबाई को हलुवंत सहाय ने पत्नी का दर्जा नहीं दिया और ढेलाबाई भी साथ रहीं बेमन से। अंत में, उन्हें पत्नी का सम्मान मिला जो उनके जीवन की जीत बनकर उनके सामने आती है। ढेलाबाई और डॉ प्रबोध बोस की बेटी ठुमरी को वे उस मोहल्ले में भी ले जाने का साहस नहीं करतीं। ढेलाबाई की नन्ना तवायफों के गुप्त संगठन के लिए काम करती थी। नन्ना पंडिता रमाबाई से मिलने के लिए कहती है। नन्ना कहती हैं कि 'सब गृहलक्ष्मियां हमसे रश्क करतीं हैं कि उनके मर्दों को हमने भेड़ - बकरियांँ बना लिया है। आखिर कुछ तो ताकत होगी हमारी! (पृष्ठ 253)' सेज पर लेटी औरत भी कम ताक़तवर नहीं होती, उस समय उसके रोम रोम से कच्चे दूध के रंग का एक तेज फूटता है जो आदमी को कहीं से कहीं लिए जाय---उस तेज में नहाया हुआ आदमी उसका मुरीद तो होता ही है जिससे वह कुछ भी करवा सकती है - चाहे तो देव बना दे, चाहे उल्लू! - - - तुझे तो मैंने हिन्दू गुरुओं से भी संस्कृत पढवाई थी। याद है दुर्गा सप्तशती का वह हिस्सा :जब शुंभ निशुंभ किसी तरह नहीं मरते, अपनी जंघाओं के बीच दबाकर काली उनका वध करती है! (पृष्ठ 253)' जहां' आपका पूरा वजूद लोगों की खुजली मिटाने और गालियाँ खाने को ही समर्पित है-(पृष्ठ 253) ऐसे में नन्ना ने बाहर की दुनिया को भी अजमाने का प्रयास किया। नन्ही गौरैया को एक आकाश मिले। कुछ बड़ा करने की चाहत रखना ही सार्थक है। वह मिसिर जी से कहती है कि आपकी दृढ़ता और स्थिरता का सूत्र क्या था - खुद में गिरफ्तार आप कभी भी नहीं रहे - घुटता वही है जो खुद में ही गिरफ्तार रहता है - - अपना पिंजडा़ आप बन जाता है। '(पृष्ठ 254) नन्ना चाहती है कि सभी अकेली औरतों - वैश्याओं, विधवाओं और निचले तबकों में जन्मी दूसरी परेशान हाल औरतों के संगठन' मुक्ति मिशन 'जिसको रमाबाई ने बनाया है, दो चार साल बाद यहाँ का सब सँभाल कर पूरब में भी उसी तरह का आश्रम खोलना। औरतों में ये जोर पैदा करना है हमको! 'अब जब रमाबाई रही नहीं कितनी ही ढेलाबाई को नयी रमाबाई बनकर वहाँ जाना हैं।' (पृष्ठ 260) ढेलाबाई अब पुलिस को भी उन्हीं के हथकंडे से निपटना सीख गई थी। 'जीवन का बोझा उतारकर शारदा सदन आई ये औरतें किस कदर खुश रहती हैं, मजाक में ओल्ड गर्ल्स फन सेंटर(वृद्धा बालिका मस्ती केन्द्र) कहती थीं। अहो मैं मुक्त नारी /पहले मैं मूसल से धान कूटा करती थी, /आज उससे मुक्त हुई! ' भाषा, कथ्य, शिल्प और इतिहास, संस्कृति, जाति आंदोलन जैसे बहुत से विषयों को पढ़ना अभी बाकी है।

अंत में बारिश उपन्यास की समीक्षा

'अंत में बारिश' उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में प्रेम और विवाह के बीच होने वाली विभिन्न घटनाओं और सूत्रों को जोड़ने वाली बहुत ही संवेदनशील कथा है। एक ऐसे प्रेमी नायक की कहानी जिसकी उम्र उनतीस वर्ष की और प्रेमिका नायिका की उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की है यानि विवाह के लिए नाबालिग है। उम्र, जाति, नैतिक, अनैतिक वैचारिक द्वंद्वों के जद्दोजहद को पार कर विवाह और फिर अंत तक का सफ़र इस उपन्यास को नया और सकारात्मक आयाम देता है। सभी घटनाएँ पत्र शैली और डायरी शैली में उजागर होती हैं। घटनाक्रम फ्लैशबैक में क्रमशः आइने की तरह साफ होता जाता है। साठ के दशक में प्रेम होना और उसकी अभिव्यक्ति करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थितियाँ बयां करने वाली रही हैं। प्रेम की परिभाषा पीड़ा से होकर अपना आकार लेती है।कभी प्रेमी सफल तो कभी असफल। वैसे तो इस उपन्यास में प्रेमी अपने दृढ़ प्रेम और प्रेमिका अपनी समझदारी के कारण परिणाम अर्थात विवाह तक पहुंँचते हैं। 'अंत में बारिश' शीर्षक अपने आप में व्यक्त करने में सक्षम है। उपन्यास की लेखिका ने यह बात ' प्रतिशब्द' में स्वीकार करते हुए लिखा है कि उपन्यास के आरंभ में वर्षा की गति सुहावनी और तरल' रिमझिम होती है और अंत में घनघोर वर्षा होती है। इस बीच कई ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं। अंतिम बारिश में नायक की पलकें भींगती चली जाती हैं।और कथा समाप्त होती है।' (प्रतिशब्द) जीवन यात्रा में आई बारिश की निरंतरता इसी बात का संकेत है कि विभिन्न ऋतुओं की तरह हमारा जीवन भी कई उतार चढ़ाव से गुजरता है और हम सुख- दुख, मान - अपमान, लाभ- हानि आदि के तराजू में तुलते हुए जीवन को जीते चले जाते हैं। यही जीवन दर्शन है। प्रेम की परिणति और फिर गृहस्थ जीवन तक के विभिन्न रंगों के चित्रों को दर्शाता है ये उपन्यास। प्रमुखता से नायक-नायिका ही इस कथा के केन्द्रीय पात्र हैं। पत्र लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है। वर्तमान समय में अब वाट्सप, फेसबुक और सोशल मीडिया आदि के कारण पत्र लेखन की वैसी परंपरा समाप्तप्राय है। लेखिका का यह पहला उपन्यास है। लेखिका चाहती है कि पत्रों के लेखन में व्यक्ति के मन की बात अधिक संवेदनशील होती है। और प्रेम पत्र तो हृदय में ही समाहित होनेवाले होते हैं।प्रेम से लिखे एक एक शब्द मानो उसके अपनेपन का अहसास कराते हैं। पत्र शैली को इस उपन्यास में आधार बनाकर कथा को क्रमशः बढ़ाया गया है। डॉ. मुक्ता ने उपन्यास की भूमिका 'प्रेम के ताने-बाने में बुना मनोरम उपन्यास' में प्रेम को संबोधित करते हुए लिखा है - 'प्रेम के बीच रिश्तों के जुड़ने में टकराव और संघर्ष की स्थितियाँ बनती हैं। मूल में प्रेम है। मैं अपना कथन प्रेम के संदर्भ से ही शुरु कर रही हूँ। प्रेम का कोई वायवीय धरातल है या वह शक्ति जो बरबस ही हमें यात्रा में सहभागी बना देता है। प्रेम बाह्य संबंधों को लेकर नहीं वरन् उसकी अंतरंगता को लेकर निश्चित किया जाता है। ' मेरे विचार से उपन्यास' अंत में बारिश' में प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। आज जहाँ विवाह टूटने के कगार पर है, प्रेमी प्रेमिकाएंँ वाट्सप की डीपी देखकर और सोशल मीडिया पर प्रेम का इजहार कर रहे हैं और वहीं ब्रेकअप जैसी घटनाएँ भी लगातार घटित होती जा रही हैं।ऐसे में प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। लेखिका ने प्रेम के विशुद्ध रूप को कहीं भी अमर्यादित नहीं होने दिया है। वरन् वह नायिका और नायक की नैतिक जिम्मेदारी को बड़े ही अंतरंगता के साथ प्रेम को स्थापित करती है जहाँ ईमानदारी और विश्वास का दृढ़ संकल्प है। आसमान में घने काले बादल एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसे छाये थे मानों वे अभी अवनि तल पर उतर आयेगें। ऐसी जोरदार घनी बरसात के मौसम में प्रोफेसर संजय के मन मस्तिष्क में फ्लेश बैक की घटनाओं के साथ जया का पहली बार बारिश में रिक्शे पर आना जिसमें प्लास्टिक का पर्दा लगा होता है। संजय को याद आता है कि वह भीगते हुए उससे मिलने आई थी। संजय एमबीबीएस के प्रोफेसर है और अपने अड़ोस पड़ोस में प्रसिद्ध होने के कारण जया से मिलने नहीं जा सकता था। जया एक मासूम, नाजुक, दुबली - पतली, छरहरे बदन की, घुँघराले बालों वाली साँवलें रंग की अत्यंत खूबसूरत लड़की थी। संजय स्वयं स्वीकार करता है कि जया से पहला परिचय पटना में लगभग आठ महीने पूर्व होता है। दो मकानों में से एक मकान में संजय किरायेदार थे।वहीं मकान-मालिक यमुना प्रसाद जी की लड़की प्रभा अंकल संजय से अपनी सहेली जया का परिचय कराती है। जया के पिता बिजली विभाग में अस्सिटेंट इंजिनियर के पद पर कार्यरत थे। प्रभा के पिता उसी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। दोनों परिवारों के बीच एक पड़ोसी का रिश्ता था। संजय की बड़ी बहन विमला दीदी जो उम्र में काफी बड़ी थी, दोनों परिवारों और दोनों सहेलियों के बीच सेतु का काम करती थीं। जया और संजय के बीच उम्र का काफी फ़ासला होने पर भी संजय जया के प्रेम में धीरे - धीरे डूबता चला जाता है जबकि जया इस बात से बेखबर थी। लेकिन जब उसे संजय की गहरी अनुरक्ति का पता चलता है जहांँ जीवन और मृत्यु के बीच की दिवार भी ढहाई जा सकती है ऐसे में जया भी कालांतर में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। जया का प्रेम अद्भुत, सात्विक, दुराग्रहपूर्ण मानसिक और अंतर्मुखी था। प्रथम 28 दिसम्बर 1957 जब संजय ने अपने मित्र राजीव को अपने एकतरफा प्रेम के बारे में बताया था । नायक अपने नितांत व्यक्तिगत संघर्षों को झेलते हुए विगत पांँच छह महीनों में जया के काफी करीब आ जाता है और बाकी एक वर्ष का समय पंख पर सवार हो ऐसे बीतता जैसे आंँधी से वृक्ष के पत्ते उड़ जाते हैं। (पृ.6) डायरी में लिखे शब्दों से नायक की व्यथा, भावावेग और प्रेम के उत्कर्ष का पता चलता है। उपन्यास में डायरी में लिखी तारीख़ और सन् को इंगित किया गया है। जैसे 1 जनवरी सन् 1959 का नववर्ष जब संजय 29 वर्ष का होता है। जया की रेशमी फ्राक और उसका गुलाबी गुलाब की पंखुरी की तरह मासूम और आकर्षक लगना उसकी उम्र को दर्शाता है। कभी नीले लंबे कोट और इंद्रधनुषी मफलर और अपेक्षाकृत अनसँवरे बालों में पहाड़ी लड़की सी लगती। जया भी उसकी तरफ अनायास ही आकर्षित होती चली गई। जया के पिता से दोनों के विवाह की बात करना और संजय का आश्वासन देना कि मैं आपकी लड़की को खुश रक्खूंँगा।ये सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा सका। (पृ. 8) 4 जनवरी की शाम का वर्णन संजय अपनी डायरी में करता है। जया उससे 100 गज की ही दूरी पर रहती है लेकिन रिक्शे से आती है क्योंकि उसके पिता को उस पर शक है और वह नहीं चाहती कि उसके चरित्र पर कोई आक्षेप लगाए। वह अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकती है लेकिन पिता उसके प्रेमी का अपमान करे, नहीं सह सकती। छिप कर आना, अपनी व्यथा को बांँटना, नाराज और फिर खुश होना, खीझना, डांँटना, कॉलेज न जाना, शरीर और मन के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना, पीड़ित होना और पीड़ित करना आदि बहुत से सुंदर चित्र हैं जो जया के प्रेम को उदात्त रूप प्रदान करते हैं। प्रेम में बहुत अधिक निकटता से वह चौंक जाती है। वह आतंकित हो उठती है उसे लगता है शरीर के स्पर्श मात्र से कुछ हो जाता है उसके दिमाग में भरा हुआ है। (पृ. 15) इसी तरह 20.12.1960 के पत्र में संजय प्रिय जया को लिखता है कि तुम्हारे यहाँ अफवाह है कि "मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुल दस बीघे खेत हैं कौन कहता है जी? मैं गरीब अवश्य हूँ पर इतना भी नहीं।" वह अपनी हैसियत का प्रमाण देता है। वह अपने प्रेम को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।संजय पहले भी बंद कमरे में न जाने कितनी ही बार रो चुका है। जया को भूलना बहुत ही मुश्किल है। संजय को पटना के मेडिकल कॉलेज में अस्थाई नियुक्ति हुई थी अब भगवान की कृपा से दरभंगा के मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गया। दो वर्ष का प्रोबेशन के बाद वहीं परमानेंट हो जाएगा। और जया भी चाहती थी कि वह पीएचडी करे। और यहीं से पत्रों का सिलसिला शुरु होता है। संजय का पत्र 'दुविधा, भविष्य के लिए कुछ संकल्प,' दिनांक 5.02.1960, दिनांक 12.3.1960,भविष्य की योजना दिनांक 22.4.60, कुछ अंतराल के बाद, वही ऐतिहासिक जगह पटना - दिनांक 4.5.1960,फिर जया का एक संक्षिप्त पत्र, कुछ नोक झोंक, जया का पत्र संजय के नाम जिसमें जया की प्रेम वेदना मुखर हो उठती है - - वह लिखती है भ्रमित हूँ आज मैं, है चतुर्दिक जो अँधेरा बाँध लो नाँव मेरे ठाँव, न डरो कि छीन ले कोई पतवार उस पर सवार हो हम चले जहांँ हो स्वर्णिम उजाला। ले चलो तुम ज्योति मग में, धन्य हो मेरा सवेरा। 'पृ 67 आदि कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें संजय ने अपनी दादी बहन की बिमारी की बात लिखी है। संजय लिखता है कि' हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढे़गे पृ69.' नैराश्य भरे पत्र में संबोधन मेरी निराशा! से किया गया है। जया की माँ को भी पत्र लिखा है संजय ने जहांँ वह स्पष्ट लिखता है कि वह एक ईमानदार आदमी है, जिंदगी में अगर आवारागर्दी और मौज का खेल खेलना होता तोय इतनी ठोकरें नहीं खानी पडतीं। पृ 73। बिना संबंध के जया के नाम क्या लिख दूंँ? यदि आप तैयार हों तो आप जहांँ कहें मैं चलकर अपना सब कुछ लिख देने को तैयार हूँ। पृ 74। जया अपने निर्णय में लिखती है "मैं वहाँ तक आपका साथ दूंँगी जहाँ तक सत्य है, ईश्वर है, यह पृथ्वी है। क्या इससे भी अधिक प्रूफ की आवश्यकता है? - बहुत भावुक हो रही हूँ - बस आपकी जया। पृ 77 साथ ही प्रोफेसर संजय अपनी थीसिस के बाद की योजनाएं भी बनाता है और जया जो उसके जीवन की आधार है उसको आश्वस्त करता है कि जाति कुल की बातें करने वाला समाज पीड़ा ही देता है। वे ऊँचे कुल के राजपूत चंद्रवंशी या सूर्यवंशी की दुहाई देते हैं और बड़ी उम्र की। 21.9.1960 के इस पत्र में संजय ने जया को स्पष्ट लिखा है कि एक बार अंत में हमें किसी की खुशी, दम्भ, या झूठे अभिमान के लिए मरना नहीं है। हमें मारने वाले मार डालें तो ठीक है। दूसरी बात यह है कि यह लडाई संयोगवश पूरी की पूरी तुम्हारे हाथों में है। वे तुमसे ही हारेंगे। समय निरावधि है। हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढेंगे। 'पृष्ठ 69 संजय जानता है कि जया और उसका विवाह समाज में मान्य नहीं है। फिर भी वह और जया अपने निर्णय पर अडिग हैं। एक पत्र में जया को वह' भोली बाल सखी 'और' बालिका वधू 'से भी संबोधित किया है। संजय अपने को' एक एडल्ट पुरुष' मानते हैं।स्त्री ही अपमानित नहीं होती बल्कि पदस्थ, चर्चित, सम्मानित पुरुष को स्त्री से भी अधिक विवश किया जाता है। 5.12.1960 के पत्र से पता चलता है कि संजय की नियुक्ति फिर दरभंगा में एक वर्ष के प्रोवेशन पर हो गई है। जया हर हाल में उसका साथ ही देने का निर्णय करती है । अपना निर्णय देती है कि जहाँ सत्य है, ईश्वर है यह पृथ्वी है तब तक वह संजय की है। संजय पीएचडी भी पूरा कर लेना चाहता है। जया उसे बराबर पत्रों में आश्वस्त करती है कि यदि वह आपकी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी, वह पलायनवादी संस्कृति की नहीं है, वह उसी ठाकुर अजीत सिंह की बेटी है जो अपने निश्चयों पर अड़े हुए हैं। वह पत्थर से टकरा सकती है। पर उन पत्थरों की चोट संजय को न लगे। पृ83। पत्रों में संजय अंत में लिखता है तुम्हारा केवल तुम्हीं में खोया हुआ। पत्रों के सिलसिले चलते रहे। 4.4.1961 के पत्र के बाद से लगातार छ महीनों तक परिवार के रिश्तेदारों सगे-संबंधियों और कॉलेज के कुछ आत्मीय मित्रों ने मिलकर जया के पिता को मनाया। अन्ततः आकाश को धरित्रि पर झुकना ही पड़ा।जून 1961 में जया एडल्ट हो गई तब विवशतावश पिता ने धूमधाम से विवाह किया और विदाई हो गई। यहाँ भी मर्यादा का पालन करते हुए घूंँघट में जया की विदाई होती है। संजय अपने गांँव सुदामापुर ले गए जो गाजीपुर से गंगा के पार ताड़ी घाट से 7-8 किलोमीटर दूर था। जया के चेहरे को देख संजय ने कहा दो वर्ष बाद मिली हो। 'सिंदूर लिप्त मांग, ललाट पर बिंदी घूंँघट से अस्त व्यस्त होने के कारण काली घुँघराली लटें उसके चेहरे पर बिखरी हुई थीं और बनारसी साड़ी तथा आभूषणों से सुसज्जित उसका सौंदर्य अनिर्वचनीय था, मैं भाव विमुग्ध हो गया।' गाँव में संजय और जया का विधि विधान से मंगल गीतों की गूँज के साथ पुश्तैनी मकान में स्वागत हुआ। दो तीन दिन बाद ही दरभंगा मेडिकल कॉलेज से संजय को कॉलेज ज्वाइन करना पड़ा जो दोनों के लिए बहुत ही कष्टप्रद रहा। बहन और भुआ के पास नई नवेली दुल्हन जया को छोड़कर जाना संजय को दुखी कर रहा था क्योंकि जया इस तरह के पिछड़े गाँव में कभी रही न थी। जया की पढाई के लिए भी संजय प्रयास कर रहा है। फिर संजय के पत्रों से पता चलता है कि वह मकान की तलाश भी कर रहा है और शांतिनिकेतन की यात्रा के विषय में भी लिखता है। अब वह उसका पति है। जया भी साइंस में केमेस्ट्री से एम एस सी किया। संजय का भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और वहीं गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज में जया भी प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हो गईं।दो पुत्र मन्नू और टुन्नू भी हुए। संघर्षों के दिन समाप्त हुए, में छह वर्षों तक लखनऊ में रहे। संजय के पटना वाले पुराने मित्र राजीव रंजन भी आते हैं और 12 वर्ष के बीच कितना परिवर्तन हो गया इस पर दोनों बातचीत करते हुए खाना भी खाते हैं।राजीव हिन्दी के प्रोफेसर हैं लेकिन कुंवारे हैं। संजय अपनी रिसर्च स्कॉलर जो हार्ट पर रिसर्च कर रही है, उससे परिचय कराते हैं।हँसी मजाक में समय कट जाता है। संजय की शादी के 15 वर्ष बीत गए। जया भी घर की जिम्मेदारी निभाते हुए खुश है और चाहती है कि संजय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैंकुवर जाए और अपना शोध पत्र पढ़ें । 25 सितंबर 1978 में कनाडा जाते हैं जब तक संजय चार बच्चों के पिता बन चुके थे। ये सब सपने पूरे हो रहे थे लेकिन जया संजय का विछोह सहन नहीं कर पाती थी और जार बेजार रोती रहती थी । सेंट पाल्स हॉस्पिटल में कॉन्फ्रेंस की सभी बातों को संजय ने जया को टेलिफ़ोन पर बताया। एक पत्नी की तरह उसने भी यही कहा कि किसी विदेशिनी से दिल मत लगाना।फिर तो संजय मैक्सिको में डेढ़ महीने रहे। फिर लंदन, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर भी योग्यता के कारण जाना रहा। इसी बीच तबियत भी खराब हो जाती है। संजय उम्र के अंतिम पड़ाव की तरफ भी जा रहे थे लेकिन मन और मस्तिष्क की जिज्ञासाएं बराबर रहती थी। अपने फाइल में दबे जया को लिखी चिट्ठियों को भी पढ़ते जिसमें गाँव की पगडंडी से होते हुए शहर और विदेश यात्रा करने वाले एक व्यक्ति के प्रतिफल भोगे हुए क्षणों, मनोदशा और अपना देश, अपना शहर, अपना घर - परिवार के प्रति आकर्षण का यथार्थ चित्र भी ही जिन्हें मैं अपनी अपनी फाइल से प्रस्तुत कर रहा हूँ - मेक्सिको प्रवास से जया को प्रेषित पत्र के विषय में संजय जया के करीब ही रहता। पृष्ठ 118। विदेशों का वैभव पैसा रूपये सब देखने के बाद भी अमरीका यूरोप आदि से मन भर गया। बस अपने देश की ही याद आती रहती और अपने बच्चों को भी यही बताता कि गाँव की गरीबी पढ़ते समय देखी थी, यहाँ विदेश में आकर अमीरी देख ली। पृष्ठ 119। जया के बिना अब संजय एक पल भी कहीं नहीं रह पा रहे हैं। अपने 25 से उन्तीस पत्रों में मेक्सिको अमेरिका जापान आदि देशों के खान पान आदि विभिन्न विषयों पर भी उल्लेख किया है। मिस्टर सैमुएल, मिस जेसिका आदि के विषय में भी बातें लिखी। संजय विदेशों में भारतविद कहलाने लगे। योग और शरीर तंत्र पर विविध व्याख्यान देते रहे। फिल्म बनाने का निमंत्रण भी आने लगा।विदेश में बुखार, ब्लड प्रेशर, ब्लड सूगर आदि बिमारी भी हुई। सबसे बड़ी एक बात यह समझ में आई कि अध्ययन कर्म आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंँचा देता है। पर देश की गरीबी और गंदगी के बावजूद संजय देश की मिट्टी को नहीं भूल आते। मिस्टर सैमुएल की सेवा, प्रभा ठकराल की सेवा, शशि की सेवा को संजय अविस्मरणीय बताते हैं जिन्होंने मेक्सिको में उनका ध्यान रखा। घटनाक्रम धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव तक आता है और संजय उन घटनाओं को सहेज कर अपने अंतर्मन में संजो कर रखता चला जाता है। विदेश भ्रमण में बारह वर्ष बीत गए। जया भी 30 सितंबर 2003 में सेवानिवृत्त हो जाती है। संजय तो जया से 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। मन्नू टुन्नू और पम्मी ने जया के प्रथम सेवानिवृत्ति पूरी होने पर केक भी काटा। बड़े खुशी से जीवन बीत रहा था पर जया के सेवानिवृत्ति के दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि एक दिन आधी रात को उसके पेट में असह्य दर्द होता है जो गॉलब्लेडर में पथरी के कारण हुआ था। अॉपरेशन भी होता है फिर भी पेट का दर्द ठीक नहीं होता। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। संजय स्वयं उसका अॉपरेशन कर न सके। अपने मित्र द्वारा करवाया। अॉपरेशन हुआ लेकिन गॉलब्लेडर के बगल की एक नस में एक अत्यंत सूक्ष्म छिद्र हो गया था और मामला गंभीर हो चला था। आईसीयू में ले जाया गया लेकिन जया तीसरे दिन चल बसी। संजय ने अंतिम संस्कार किया। उसके जाने के पंद्रहवें दिन बाद भरे पूरे घर में संजय को अकेला पन काट रहा था वही शाम का वक्त बरामदे में बैठे हुए संजय को जया की वही छवि याद आ रही थी जब ऐसी ही घनघोर बरसात में विवाह के पूर्व प्लास्टिक का पर्दा लगे हुए रिक्शे में मिलने आती है। अगले ही पल जया की अंतिम यात्रा के समय की छवि संजय की पनियल आँखों में तैर जाती हैं। उपन्यास अंत में बारिश में घटनाएँ तीन भागों में बँटी हैं। पहली विवाह के पहले प्रेम को पाने की पीड़ा दूसरी विवाह के लिए कई संघर्षों का सामना और तीसरा विवाहोपरांत विदेश जाने की आकांक्षा में घर से दूर रहना। देखा जाए तो 1960 से लेकर 2003 तक के नायक और नायिका की प्रेम यात्रा को चिट्ठियों द्वारा एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। और अधिकतर चिट्ठियां संजय द्वारा लिखी गई हैं। पत्नी का कल्पित नाम जया है जिसे वह चिट्ठियों में प्रेम प्रदर्शित करने और अपने कार्योँ का ब्योरा देने के लिए लिखता रहता है। जबकि जया की ओर से जो लिखा गया वह बहुत कम है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसका प्रेम सिर्फ समर्पण है। प्रेम की पीड़ा, हर्ष, अपनापन, उदासी आदि भावनाएंँ हृदय में आत्मसात करती हैं जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रेम की प्राप्ति होने पर प्रिय के साथ दूरियांँ समाप्त हो जाती हैं। प्रेम से उम्र की संख्या भी कोई मायने नहीं रखती। प्रेम से हर दूरी घट जाती है। जया संजय मय हो जाती है। उसकी घुटन ऊब पीड़ा और पराजय का बोध भी ऊपर उठ कर ममता स्नेहिल भावों से परिपूर्ण हो जाता है। संजय कितनी ही विपरित स्थितियों से गुजरा लेकिन प्रिय जया के साथ उसमें नवीन उत्साह और आत्मविश्वास का संचार ही भरा रहा । यही मनुष्य को पौरूष प्रदान करता है और हर प्रकार की बाधाओं से जूझने की शक्ति देता है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी जया की प्रेम बारिश संजय को प्रेमासिक्त करती रही। घनघोर बारिश के पानी ने संजय के आँसुओं धो डाला और नाती- पोतों से भरा- पूरा एक परिवार छोड़ जाती है जो दोनों के प्रेम की निशानियाँ हैं। जीवन और मृत्यु मानव जीवन के चरम सत्य है परंतु उनके बीच का फासला नियती नहीं स्वयं प्रिय का है, प्रेम यही आत्मविश्वास जगाता है। उमड़ते घुमड़ते इस बारिश में भी संजय को काले बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की रोशनी में अपने बच्चों का हँसता मुस्कुराता चेहरा नजर आता है जो उसके बचे खुचे जीवन को आश्वस्त करता नजर आता है। संजय जया के प्रेम की कसक लिए सकारात्मक होने का निश्चय करता है जबकि वह सबके साथ रहते हुए भी अकेला ही है। लेखिका भगवंती सिंह का यह प्रथम उपन्यास है जो उनके जीवन के सत्तर दशक का परिणाम है। हिंदी साहित्यकार और कबीर मर्मज्ञ पति डॉ शुकदेव सिंह के गुजर जाने के बाद वे उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में लगी हैं।उनका लिखा कथा साहित्य यथार्थ जीवन का चित्र है। उन्होंने जीवन के बहुमूल्य अनुभवों को बहुत ही सहज बहते हुए झरने की तरह एक एक शब्द मोतियों को पिरोया है। इस उपन्यास में ऐसा लगता है कि मानो लेखिका के निजी जीवन की कहानियों की लड़ियों का गुच्छा पत्रों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल रहा हो। भाषा शैली बहुत ही सहज, सरल और चरित्र के अनुरूप है। बिना किसी अनावश्यक प्रयास के स्वतः स्फूर्त शब्दों ने उपन्यास का रूप ले लिया। कई घटनाओं का विन्यास और उनकी कथा तारतम्यता में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और माँ- पिता सभी के किरदार अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं। कहीं-कहीं उपन्यास की कसावट में आई खामियाँ खटकती हैं जो मूक ढंग से व्यक्त हो जाती हैं। विदेश जाने के दौरान लिखे पत्र कभी-कभी औपचारिकता निभाते हुए भी लगते हैं। समाज के झूठे दंभ को बेनकाब करने वाला यह उपन्यास अपने परिवार, बड़े कहलाने वाले तथाकथित दादा, अहंकारी लोगों की कलई खोलने वाला है। दो प्रेम करने वालों को एक नहीं होने देने के लिए कई दलीलें देता यह समाज अपनी दकियानूसी सडे़ गले विचारों में जीने वाले समय के साथ किस तरह धराशायी और अवसरवादी हो जाते हैं यह भी इस पूरे उपन्यास की पर्तें खोलते पत्र महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। एक अकेला व्यक्ति समाज की खोखली दिवारों से कब तक सिर फोड़ता रहेगा। संजय का लिखना 'जिन्हें शीशा समझकर हम टकरा गए वे पत्थर निकले। हमने सोचा था कुछ शीशा टूटेगा, सब कुछ हम जोड़ने की कोशिश करेंगे फिर जिंदगी सामने होगी। लेकिन हम टूट गए। पत्थर तो पत्थर ठहरा। - - - जो इतने भयानक और कठोर हैं अपने हों या पराये उनके प्रति कैसी श्रद्धा? कैसी ममता? पृ69। लेखिका ने पुरुष की संवेदनशीलता को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा है जो समाज के मूल्यों, आचार विचार को एक नये एंगल से देखने का आईना प्रदान करता है। प्रेम का सूत्र अंत तक अपने दामन से जुड़ा रहता है। बहुत कुछ छूट गया है। कुछ समझने का प्रयास किया है। अभी तो "अंत में बारिश" की गहराई में छिपी बहुत सी कहानियां हैं जिन्हें उजागर करना है। धन्यवाद @ डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता । दिनांक 17.10. 2021

Saturday, October 16, 2021

नवदुर्गा और प्रकृति

नवदुर्गा और प्रकृति शक्ति पूजा की यह परंपरा नवरात्र के रूप में पूरे देश में विभिन्न शैलियों में मनाया जाता है। अपनी अपनी आस्थाओं और पूजा पद्धतियों के अनुसार उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पश्चिम में राजस्थान सेे लेकर पुर्व में गौहाटी तक ग्रामों, प्रांतों, नगरों और महानगरों में लाखों दुर्गाओं की प्रतिमाएँ निर्मित की जाती हैं। "शक्ति संगम तंत्र" में नवरात्र को नव शक्तियों के सायुज्य का पर्व कहा गया है जिसकी एक- एक तिथि में एक - एक शक्ति प्रतिष्ठित रहती है-- "नवशक्तिभिः संयुक्तं नवरात्रा तदुच्यते।" मार्कण्डेय पुराण में प्रकृति शक्ति के नौ रूपों की पूजा का विधान है जिनके नाम इस प्रकार हैं - शैलपुत्री, ब्रहचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। देवी की नौ शक्तियाँ इस प्रकार हैं - ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐंद्री, शिवदूती और चामुण्डा। नवरात्र विशेष रूप से प्रकृति की मातृभाव से उपासना करना है जिसका उद्देश्य जनमानस तक पर्यावरण संतुलन का संदेश पहुंँचाना है आज मनुष्य के सामने जीवन रक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा संकट पर्यावरण प्रदूषण का है। जिस प्रकृति की गोद में मनुष्य ने "जीओ और जीने दो "की सभ्यता सीखी, आज वह अंध विकासवाद के धरातल पर उसी के संसाधन को लूट - खसोट रहा है। ग्लोबल इकनॉमि के महिषासुरी तेवरों से पर्यावरण विरोधी राष्ट्र राज्य आज पूरे विश्व के प्राकृतिक संसाधनों को बलपूर्वक हड़प लेना चाहते हैं, इसलिए पर्यावरण रक्षिका प्रकृति तनाव के दौर से गुजर रही है। अंधविकासवादी तेवर जब राज्य संस्था में घुसने लगते हैं तो एकसाथ कई प्रकार के शोषण का आरंभ हो जाता है। सर्वप्रथम प्रकृति रूपा प्रजा का शोषण होता है, प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाली स्त्री शक्ति यातनाएंँ झेलती हैं। तीसरे प्रकृति के उदर से पैदा प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट होती है और उस पर अर्थशास्त्र हावी होने लगता है। ग्लोबल इकॉनमी की वैचारिक पृष्ठभूमि भी प्रकृति की इसी उपभोक्तावादी सोच से जुड़ी है। इसीलिए नवदुर्गा से जुड़ा पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतन आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत एक प्रकृति पूजक देश रहा है जहाँ पर्यावरण के रक्षक वृक्षों और वनों का सफाया तो हो ही रहा है साथ ही भूजल स्तर भी नीचे जा रहा है। देवी के नौ रूप ही प्रकृति के मित्र हैं। हिमालय प्रकृति को शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी प्रकृति का सच्चिदानंदमय ब्रह्म स्वरूप है चंद्रघंटा मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का अर्द्ध चंद्र रूप है। चंद्रमा द्वारा पेड़ पौधों व वनस्पतियों को ऊर्जा प्राप्त होती है और उसकी चाँदनी से मनुष्य का मन और हृदय आनंदित होता है। कूष्मांडा नाम अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण है, इससे समस्त प्राणियों में ऊर्जा और तेज का संचार होता है। स्कंदमाता पर्यावरण विज्ञान के संदर्भ में है जो सभी प्राणियों को जन्म देती है, पालन - पोषण की व्यवस्था करती है इसलिए माता के समान वंदनीय है। कात्यायनी कात्यायन ऋषि की तपस्या का रूप है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का तेज है। कालरात्रि का रूप विध्वंसकारी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती है पर भक्तों को शुभ फल प्रदान करने वाली है। महागौरी आठवाँ रूप है जो लोककल्याणी और सात्विक प्रकृति की हैं । गौरी के शरीर के प्रकट सत्व 'प्रकृति' के संरक्षण से ही लोककल्याण संभव है। नौवां रूप सिद्धिदात्री है। विश्व के सभी कार्यों को साधने वाली सर्वार्थ साधिका प्रकृति के इस स्वरूप की देव ऋषि सिद्ध योगी साधक व भक्तजन मोक्ष प्राप्ति के लिए उपासना करते हैं। शारदीय नवरात्र पर्यावरण को संतुलित करने का ही एक सद्प्रयास है जो मनुष्य जाति के कल्याण के लिए उपासना और पूजा के माध्यम द्वारा आयोजित किया जाता रहा है। नवरात्र के देवशास्त्रीय रूप को धर्म और प्रकृति विज्ञान से जोड़कर ही व्यक्ति और राष्ट्र उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं। नवरात्र, दुर्गोत्सव और विजयादशमी की ढेर सारी शुभकामनाएँ --।🙏 🙏 🙏 वसुंधरा मिश्र

Sunday, September 26, 2021

पितर पक्ष

पितर पक्ष मृत्यु उपरांत का उत्सव है पितर पक्ष अंतर्मन की इंद्रियों की संवेदना है पीढ़ी से जुड़ी संस्कृति की सीढ़ी है माता - पिता से मिले संस्कार हैं पूर्वजों का आशीर्वाद है समय के पहिए में अटके दर्द भरे चित्रों की रील है घर के किसी भी सदस्य का मृत्यु की गोद में समा जाना आँखों का शाश्वत सत्य है हर व्यक्ति की मृत्यु तिथि है हर वर्ष करते हैं हम उन्हें याद घर से बिछुड़ी सभी पीढ़ियों का कर तर्पण पितरों की पूजा करते हैं जल और भोजन का भोग परोस सूक्ष्म आत्मा की शान्ति की करते हैं प्रार्थना दर्द के उन लम्हों में श्रद्धा और भक्ति से जुड़ते जाते गंगा जल की पावन लहरों में तिल - जल से संकल्पित हो उसे बहाते जाते पुनः स्मृति में लाकर मुक्ति कामना में रत हो जाते अपने राग - रंग- रस - गंध - मोह - तृष्णा को हर वर्ष हम तिरोहित करते जाते जीवन दर्शन और अध्यात्म की रस धारा में संस्कृति- संस्कारों की बहती नदिया में तन-मन की उलझनों को संतुलित करते जाते जीवन जीने की कला को निखारते जाते @वसुंधरा मिश्र, 25.9.21

Friday, September 17, 2021

कन्हैयालाल सेठिया और दीपकिरण

https://www.shubhjita.com/%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%a0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%95-2/कुछ बातें सेठियाजी की, कुछ रचनाएँ सेठिया जी की - - - - रेगिस्तानी धरती से निःसृत साहित्य सपूत, विधाता ने दिया वाक् शक्ति का मंगल वरदान, सुरभित है आपका संपूर्ण सृजन संसार, गूंँजे विश्व में आपका सदैव यश कीर्ति गान। बालू बाजरे की धरती की सोंधी खुशबू से निःसृत अमूल्य शब्द निधि के धनी कविर्मनीषी कन्हैयालाल सेठिया जी की 101 वीं जयंती पर मेरा शत शत नमन। मरुदेश संस्थान सुजानगढ़ चुरु राजस्थान की धरती को नमन। संस्थान के अध्यक्ष डॉ धनश्याम नाथ कच्छावा जी और संस्थान की आभारी हूँ जिन्होंने मुझे यह सुनहरा अवसर प्रदान किया कि, मै "कुछ बातें सेठियाजी की और कुछ रचनाएँ सेठिया जी की" विषय पर अपनी कुछ बातें रख सकूँ। सेठिया जी के पुत्र आदरणीय जय प्रकाश सेठिया जी और पौत्र सिद्धार्थ सेठिया जी के स्नेह के प्रति आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे साहित्यिक परिवार का एक सदस्य बनाया। बंगाल की धरती से मुझे भी जुड़ने का अवसर मिला और सेठिया जी का आशीर्वाद मिला, जिसे मैं अपना सौभाग्य समझती हूँ । राजस्थान मेरी जन्म स्थली, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय शिक्षा स्थली और बंगाल कार्य स्थली के रूप में तीन प्रदेशों की संस्कृति से जुड़ी । मातृभाषा हाड़ौती, सहयोगी हमजोली भाषा शेखावाटी, अन्य भाषाओं में भोजपुरी, बांग्ला एवं राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और संपर्क भाषा अंग्रेजी से मेरा गहरा संबंध है। बोलचाल और साहित्य में हिंदी भाषा रची बसी हुई है। सेठिया जी बराबर कहते थे मायण भाषा कदै नहीं छोड़नी चाए। आपणी भाषा में ही सो क्यूँ है? घर में ही बोलो। पर विडंबना ऐसी रही कि मैंने किसी को नहीं छोड़ा लेकिन हिंदी ने हमपर एकाधिकार जमा लिया। यह सच है कि मायण भाषा में बोलने वालों की कमी आती जा रही है और यही कारण है कि हम डरे हुए भी हैं कि धीरे-धीरे कहीं भाषा का भी वैश्वीकरण न हो जाए। बचाने की कोशिश तो चल रही है। माता- पिता ही हैं, जो ये काम आगे बढा़ सकते हैं। वैसे तो परिवार, धर्म, ईश्वर, पूजा- पाठ, रीति-रिवाज भी जन्म के अनुसार नहीं हो रहे हैं और न ही कर्म अनुसार ही। कलकत्ता में बांग्ला भाषा की स्थिति अच्छी थी। अब वह भी कोलकाता बनने में लगा हुआ है। बड़ा बाजार अभी भी मीनी राजस्थान के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। बहुत से परिवार कोलकाता के दूसरे अंचलों में बसते जा रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी के सोचने का तरीका और सोच में परिवर्तन इसका मुख्य कारण है। कन्हैयालाल सेठिया जी के जन्म की बात करें तो उनका जन्म सुजानगढ चुरु राजस्थान में 11 सितंबर 1919 में हुआ। पिता छगनलाल सेठिया और माँ मनोहारी देवी की संतान के रूप में सुपुत्र कन्हैयालाल ने अपने कुल का नाम रौशन किया। 1937 में धापू देवी के साथ विवाह बंधन में बंधे। मात्र 19 वर्ष की आयु में ही विवाह हुआ। एक युवा का उत्साह और सपने लिए सेठिया जी उसी राजस्थान की मिट्टी के सपूत थे जिस मिट्टी में महाराणा प्रताप के आत्म गौरव और देशभक्ति के मंत्रों की ध्वनि की टंकार गूंजती रहती है। महाकवि सेठियाजी उसी राजस्थान की धरती से जन्मे वे रत्न हैं जिनकी ये पंक्तियाँ महाराणा प्रताप के मातृभूमि प्रेम की तरह ही अजर-अमर हैं - - धरती धोरां री आ तो सुरगां न सरमावे इ पर देव रमण न आवे इरा जस नर नारी गावे धरती धोरां री। इस गीत में पूरा राजस्थान समाया हुआ है जो अद्भुत है। महाकवि सेठियाजी कलम के सिपाही थे जिन्होंने राजस्थान में सामंतवाद को समाप्त करने के लिए जबर्दस्त मुहिम चलाई और पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार से सम्मानित सेठिया जी की कलम की ताकत किसी देशप्रेमी रण बांकुरे से कम नहीं थी। उनकी रचना' जागो जीवन के अभिमानी' की ये पंक्तियाँ - - लील रहा मधु ऋतु को पतझर मरण आ रहा आज चरण धर कुचल रहा कलि कुसुम कर रहा अपनी ही मनमानी जागो जीवन के अभिमानी देश वासियों को जागरूक करने का ही आह्वान इन पंक्तियों में मिलता है। 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान सेठिया जी करांची में थे। सन् 1943 में कवि महान नेताओं जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के संपर्क में भी रहे। सुदूर पश्चिम से आकर बंगाल की धरती के प्रति भी सेठिया जी की सहृदयता और संवेदनशीलता एक बच्चे का अपनी माँ के प्रति जुड़ाव की तरह ही था। दोनों ही प्रदेशों की सांस्कृतिक और भाषिक धरातल से जुड़े रहे। जिस समय सेठिया जी का रचना कर्म अपने सृजन के परवान चढ़ रहा था उस समय नवजागरण काल विकास की सीढ़ियों पर कुलांचे भर रहा था। वैसे तो अपने लंबे सृजनात्मक अनुभवों को सेठिया जी ने अपने बहुविध काव्य संसार में समेटा है।आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक भारतेंदू हरिश्चंद्र ने भाषा की परिवर्तन शीलता को बहुत पहले ही भांप लिया था जिसका परिणाम हम देख रहे हैं - - निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल। इसकी स्थापना तो हो रही थी। हिंदी मुख्य धारा में प्रवेश करने लगी थी। निज भाषा अर्थात् मायण भाषा को सेठिया जी ने प्रमुखता से अपने जीवन में धारण किया। भाषा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। सेठिया जी अंत तक अपनी भाषा के गौरव के लिए तत्पर रहे। इसी कारण आज भी हम उनको पढ़ रहे हैं। कविर्मनीषी सेठिया जी एक सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, सुधारक परोपकारी और पर्यावरणविद भी रहे। वे स्वयं मानते हैं कि केवल रचना करके कवि अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता, उसका संदेश पूरे विश्व से जुड़े तभी उसकी सार्थकता है। सेठिया जी समाज के साथ चलने वाले व्यक्ति रहे हैं। खादी वस्त्र धारण करना, दलित उद्धार में लगना, राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत रचनाएँ लिखना उनके लेखन के अंग रहे हैं। मुक्तिबोध की "चकमक की चिंगारियां" की ये पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगी - - - - नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नहीं होती कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है व मैं उसका नहीं है कर्ता, पिता धाता कि वह अभी दुहिता नहीं होती परम स्वाधीन है, वह विश्व शास्त्री है। (चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृष्ठ. 155) 1942 में गाँधी जी ने' करो या मरो' का आह्वान किया। उस समय सेठियाजी का काव्य संग्रह 'अग्नि वीणा' प्रकाशित हुई। बीकानेर में इस पर राजद्रोह का मुकदमा चला। बाद में तो राजस्थान सरकार ने इन्हें स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान प्रदान किया। ऐसे साहित्य सेवी और देश भक्त कवि की काव्य यात्रा को दो काल- खंडों में देखा जा सकता है - सन् 1936-1975 प्रथम और द्वितीय सन् 1976 - 2005 की रचनाधर्मिता। 14 राजस्थानी, 20 हिंदी, 2 उर्दू में रचनात्मक साहित्य के रचयिता कविर्मनीषी को सन् 1976 से जो पुरस्कार मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह सन् 2005 तक मिलता चला गया ।साहित्य अकादमी, डॉ तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक, साहित्य मनीषी, मूर्ति देवी पुरस्कार, सूर्य मल्ल मिश्रण शिखा पुरस्कार, टांटिया पुरस्कार, पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार और अनगिनत पुरस्कार। मिले। 2004 में पद्मश्री से सम्मानित हुए। कवि के रचना संसार पर दृष्टि डालें तो जिन देश काल की परिस्थितियों से भी गुजरना होगा। देश की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य धारा जो प्रमुख धारा रही, सेठिया जी को वहाँ से जोड़ कर देखा जा सकता । यह धारा सन् 1857 की क्रांति के बाद से ही शुरू हो गई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हलचलों ने भी राष्ट्रीयता को प्रभावित किया। भारतेंदु युग में जहाँ औपनिवेशिक सत्ता के लूट को उजागर किया जा रहा था, वहीं द्विवेदी युग में राष्ट्र वाद को प्रतिष्ठा दी जा रही थी। गाँधी के आगमन के बाद भारतीय राजनीति में नरमदल का प्रभाव बढा़ और कविता भी आत्मपीड़न को नरमी के साथ अभिव्यक्त करने लगी। लेकिन भारतीय राजनीति में गरम दल के प्रभाव, रूस की क्रांति की सफलता, भारत में वामपंथ की स्थापना आदि के बाद कविता ओजपूर्ण और बुलंद स्वर के साथ राष्ट्र मुक्ति में भागीदारी निभाने लगी। रामधारी सिंह 'दिनकर ', गोपाल सिंह नेपाली सोहनलाल द्विवेदी आदि की राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कविताएँ आ रही थीं। 1930-35 से लेकर 1947-48 और उससे आगे सन् 1962 तक देश के विभिन्न भूखंडों और जनवृत्तों में तरह-तरह की घटनाएँ घटीं। बंगाल में अकाल, द्वितीय महा युद्ध का प्रभाव, नौ सेना विद्रोह आदि बहुत सी घटनाएँ घटीं। फिर 1942 की शहादत, देश का आजाद होना विभाजन दंगे अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त हुए लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री का राजनीतिक मोहभंग आदि घटनाओं की निरंतरता। स्वदेशी शासन व्यवस्था में जिस तरह की कामना लेकर उस समय कवि बढे़ थे, उनकी कामनाओं और सपनों पर तुषारापात हो गया। मगर प्रतिबद्ध रचनाकार विचलित नहीं हुए, डटे रहे। मैत्री का समझौता कर लेने के बावजूद सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और लद्दाख में 15-20 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया। 'इस धोखे का नाम दोस्ती है और इस दोस्ती को हम चीन कहते हैं।' ऐसी ही कविता हर देश भक्त कवि की लेखनी से निकल रही थी। सेठिया जी ने अपने जीवन काल में आजादी से पहले, आजादी के बाद और आजाद भारत में आधुनिक भारत के बनने की प्रक्रिया को भी देखा।उनके काव्य में गाँव, प्रकृति, समाज, राष्ट्र, अनिष्ट से लड़ना वर्तमान को सुधारना, वर्ग संघर्ष, मातृभूमि के प्रति प्रेम आदि के साथ धर्म, दर्शन और अध्यात्म का सुंदर समायोजन मिलता है। कहीं कोई दुराव छिपाव नहीं है। प्रेम और उदारता का नाटक नहीं है। यही निश्छलता सेठिया जी के रचना संसार को दीर्घकालिक बनाती है। पहला काव्य संग्रह दीपकिरण 1954 में आता है। 1947- 1967 के बीस वर्षों की नीति देखकर तैयार हुई इस नयी पीढ़ी का रोष पूर्ववर्ती की तुलना में थोड़ा तल्ख लेकिन विचार पद्धति सुदृढ़ और सुविचारित हुई। यहाँ तक आते आते कविता की भाषा में प्रहार बढ़ गया। धूमिल, रघुवीर सहाय आदि की कविताओं में वे कहते हैं - न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का मेरे अंदर एक कायर टूटेगा टूट मेरे मन टूट मत झूठ मूठ ऊब मत रूठ आस्था का लौट आना, मन के भीतर बैठे कायर को टूटने की आज्ञा देना उस समय की बड़ी घटना थी। कविता में कवि का यही आत्म संकल्प हिंदी को प्रगतिशील जनवाद से आगे फिर समकालीन कविता से जोड़ता है। प्रगति चेतना लोकमंगल की भावना और मानव प्रेम की यह धारा नयी पीढ़ी भी बनी और अपनी नयी चिंतन पद्धति का उत्तरदायित्व का सौंप गए। सेठिया जी की कविताओं में परंपरागत और आधुनिकता के बीच द्वंद्व समय परिवेश की समस्याएँ चिंता संघर्ष आदि बहुत विषयों का विस्तार है।

Wednesday, September 15, 2021

नहीं देख सकती हिंदी की आंखों में पानी

नहीं देख सकती जब तब हिंदी की आंखों में पानी आन बान शान और गौरव है वह भारत की सहती प्रहार प्रतिपल अपने ही घर के आंगन में सौतेलेपन की पीड़ा से स्वयं को बचाती रहती हिंदी की सत्ता जब दौड़ अपना रंग दिखाती गलियारों में हलचल भर देती सभी बोलियों की हमजोली सबकी झोली भर देती हिंदी है हमारी संस्कृति और संस्कार प्रतिभा है, सब बोलियों - उपबोलियों की मुट्ठी है तो एका है नहीं तो ताश के पत्तों सी बिखर, न जाने कैसा वक्त दिखाएगी भाषा तो बहती नदी है बहना उसे भाता है सदियों से पत्थरों को चिकना करती आईं हैं मनुष्यता के पदचाप की आवाजें गतिशील भाषा बनाती रही है अपने सशक्त पथ हिंदी, समाज का ध्रुव सत्य है अटल है, हमारे रगों में बहती आत्मा है हिंदी से ही हमारी है पहचान देश भक्ति आस्था और श्रद्धा का प्रतीक हिंदी एक देव अवतार है सागर मंथन की एक मणि है वह श्रृंगार नहीं है, सादगी से पूर्ण सबके हृदय की लाडली है भौगोलिक सीमाओं में नहीं, वह तो संस्कृति का महाद्वार है मंदिर के भगवान सी नहीं, वह तो सबकी वाणी की अधिष्ठात्री है नहीं देख सकती जब तब हिंदी की आंखों में पानी वेदों और संस्कृत की गोद में जो खेली निश्चित ही वह स्वतंत्रता की देवी है अभिव्यक्ति की आजादी है हिंदी की शान हमारा गौरव हिंदी है तो हम हैं भाषा ही हमें मान सम्मान दिलाती आओ आगे बढ़कर हिंदी से साहित्य कला संगीत के घर घर में की प्रीत बनाए। @वसुंधरा मिश्र

Sunday, August 22, 2021

रक्षा बंधन में रेशमी डोरी

रक्षा बंधन पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं - - - रेशम की डोरी है में बंधे रिश्ते समय पाकर फिसल भी जाते हैं। लगता है रेशम का प्रयोग इसी लिए किया गया है। कीड़ों को मारकर उनके कपड़े बनाना और उनकी सुंदर डोरी को भाई बहन के रिश्तों से जोड़ने में संवेदना को रखने का आवरण लग रहा है। वहाँ झूठे प्रेम को थोपना लग रहा है। रेशम का स्वभाव है फिसलन। मनुष्य स्वभाव में भी तो चंचलता है, स्थिरता नहीं। रक्षा बंधन रक्षा से जुड़ा है। एक भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। जैसे एक पिता अपनी माँ, पुत्री, पत्नी और दादी-नानी की रक्षा करता है। पुरुषों के लिए सामाजिक दबाव है कि वे अपने परिवार की रक्षा स्वयं करें। नवजागरण की लहर से ही समाज परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है और पुरुषत्व और स्त्रीत्व में भी परिवर्तन हुआ है। उत्तर आधुनिकता के इस युग में बहुत कुछ बदलाव देखने में आ रहे हैं। स्त्रियों की अपनेअस्तित्व, अपनी निजता, अपना पैसा, अपना परिवार और अपने ही स्वार्थ के लिए चिंता है जो समाज के मानसिक बंधन के आंकड़ों को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विदेशों में ये निजीकरण बहुत पहले से ही चल रहा है। भावनात्मक जुड़ाव अर्थ पर निर्भर करता है। अर्थपरक सोच ने भारत के मनुष्यों के भावों मूल्यों और आदर्शों पर गहरी चोट की है। भाई बहन के रिश्तों में मधुरता बनी रहे। रिश्तों में मिठास रहे आज इस बात की आवश्यकता है। मेरी यह कविता इसी भाव को व्यक्त करती है - -

Monday, August 16, 2021

विज्ञान पर अंधविश्वास कैसे भारी?

विज्ञान पर भारी अंधविश्वास कैसे हो कोरोना वैरियर्स पर विश्वास चिंतन पढ़कर एकबार फिर पुराने दकियानूसी भारत की ओर ध्यान चला गया। झाड़ फूंक, नीम हकीम, जादू-टोना और चमत्कारों से बीमारियों को भगाने का चलन अशिक्षित और निरक्षर लोगों में आदि काल से चला आ रहा है जो शिक्षितों और पढ़े-लिखे को भी आकर्षित करने लगा। विज्ञान लोगों की बुद्धि और तर्क से जुड़ा है जबकि अंधविश्वास तो श्रद्धा और आस्था से जुड़ा है। आस्था की ताकत विज्ञान को नकारती है। निराशा की चरम परिणति ही तंत्र मंत्र जप उपवास पूजा-अर्चना होम यज्ञ आदि विभिन्न राहों को जन्म देते हैं। कोरोना महामारी में फिर एक बार निराशा के भाव अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है। कोरोना का रोगी दहशत में जी रहा है, जहां उसे सिर्फ मृत्यु के खुले दरवाजे ही दिखाई दे रहे हैं। विज्ञान वहां लोगों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। दवाईयां नहीं है। सरकारी व्यवस्था लचर पचर है। स्वास्थ्य व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। कोई अस्पताल नहीं जाना चाहता क्योंकि वहां तो संक्रमण फैला हुआ है तो कोरोना ठीक कैसे होगा। लाखों का बिल बनाया जा रहा है। झाड़ फूंक में पैसा कम लगता है। एक-दो ठीक हो गए तो बस लोगों की भीड़ उधर ही हो लेती है। पढे़ लिखे भी इंसान हैं। उन्हें लगता है कि लोग गलत नहीं है, फायदा हुआ है, तभी लोग जाते हैं। मनुष्य स्वभाव को चमत्कार अधिक आकर्षित करते हैं। कोरोना की आरती, कोरोना के लिए यज्ञ, कोरोना माई की कहानी आदि होने लगे हैं। कार्टून और कविताएं भी बन रही हैं। समाज के दो पहलू हैं विज्ञान और अंधविश्वास। दोनों में ही समाज जीना सीखने लगता है। - डॉ वसुंधरा मिश्र

पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का हिंदी सरोकार

 पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का हिंदी सरोकार - - - डॉ. वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात आते ही आंँखों के समक्ष एक विशाल कैनवास उभर कर आता है, जहाँ उत्तर प्रदेश और बंगाल की समवेत छवि तो उभरती ही है साथ ही एक मेधावी छात्र, सुसंस्कृत पुत्र,पांडित्य के गुणों से भरपूर एक संवेदनशील और सजग चेहरा उपस्थित हो जाता है। साहित्य लेखक की कलम से निकले शब्दों का वह संदेश है जो व्यष्टिगत होकर समष्टिगत रूप ले लेता है। उसकी सृजनशीलता नये प्रतिमानों को स्थापित करने और नये युग के लिए नये आयाम रचता है। 

2018 में भारत सरकार द्वारा हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र को 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। मूर्ति देवी पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ, महात्मा गांधी सम्मान, विद्या निवास मिश्र सम्मान, साहित्य भूषण से सम्मानित डॉ. मिश्र का लेखन बलिया का मिजाज, पृष्ठभूमि, गांँवों के स्वाभिमान, मूल्यों और मानस को निकट से समझने वाला है।  

हिंदी के शिक्षक, साहित्यकार और समीक्षक डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र का जन्म सन् 1936 को बलिहार, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ। निबंध, पत्रकारिता जीवनी संस्मरण संपादन अनुवाद आदि विविध विधाओं में लिखा। 

हिंदी भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम साहित्य का वह स्वर्णाक्षर पृष्ठ है जिनके लिए शब्दकोश के सारे विशेषण भी कम है।संवेदनशील, मूल्य परक और सर्जनात्मक ऊँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरागत 'मनीषा' के संवाहक डॉ. मिश्र सबसे पहले एक बड़े इंसान हैं। कलकत्ता के बंगवासी कॉलेज में अध्यापक रहे उनके साहित्यिक अवदान की महत्ता और गुणवत्ता हिंदी शिक्षा जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। उम्र के अंतिम पड़ाव की अवस्था में भी साहित्य और समाज के लिए जो व्यक्ति सोचता है कि वह निश्चित ही अपनी माटी को प्रेम करने वाला है।

मैंने जब उनसे पूछा कि आपकी तबियत कैसी है? तो कहने लगे 'अब तो बूढ़ा हो गया हूँ।' सच है कि शरीर से तो बुढ़ापा है लेकिन आंँखों की चमक अभी भी गंँवई खुश्बू से ओतप्रोत है। साहित्यकार की सृजनात्मक शक्ति जब तक सक्रिय है, वह युवा ऊर्जा से भरपूर है। तभी तो एक और नयी पुस्तक 'सांँझ की जम्हाई और सर्जनशील उजास' जिसका प्रकाशन लेखक के जन्मदिन के दिन (5,नवंबर, 2017) पर हुआ, मुझे देते हुए बहुत ही उत्साहित लगे। वही पान की लाली से लसित दोनों ओष्ठ और मुढ्ढे पर आराम से बैठ कर फोन की घंटी उठाना। कहीं कोई शिथिलता नहीं,लगा उस छोटे- से कमरे से पूरे देश का संबंध है, भारतीय संस्कृति की गूँज सुनाई पड़ रही थीं।

मैंने कहा कि कलकत्ता में तो कोई भी ऐसी साहित्यिक संस्था नहीं है जिसने आपको नहीं बुलाया होगा। ख़ास कर भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद, अपनी भाषा, कुमार सभा पुस्तकालय, मित्र परिषद्,बांधाघाट हनुमान पुस्तकालय, हिंदी बंग परिषद्, राम मंदिर आदि असंख्य गैर सरकारी संस्थाओं और सरकारी संस्थाओं के साथ- साथ सरकारी बैंकों में आपको बड़े ही सम्मान के साथ विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित करते रहे हैं।

मूर्ति देवी पुरस्कार से सम्मानित विद्या संस्कारी और विद्वता के पथ पर चलने वाले  हिंदी जगत में आपकी परंपरा के विद्वानों में आपका विशिष्ट स्थान है। 

केवल एक संस्था 'साउथ बेलेघाटा वेलफेयर सोसायटी' के संस्थापक अध्यक्ष रहे। जिस समय देश में बावरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी और उस समय बंगाल में हिंदू - मुस्लिम दोनों ही शरणार्थी बड़ी संख्या में बंगाल में शरण के लिए आए, उस दुख की घड़ी में डॉ मिश्र ने दोनों के लिए ही शिविर का आयोजन किया।'जनसत्ता' ने 'घायल संवेदना का दर्द' शीर्षक से पूरे पृष्ठ का कवरेज दिया जिसे कवर करने के लिए 'जनसत्ता' की पूरी टीम आई थी जो बहुत बड़ी बात थी । 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि डॉ. मिश्र समाज और समाज की भाषा से सरोकार रखने वाले लेखक रहे हैं। वे रिक्शे वाले से लेकर भंगी और एक जून रोटी खाने वाले सभी से बात करते हैं, जाड़े में ठिठुरने वालों के लिए सोचते हैं। कोलकाता के धनाढ्य लोगों से कहकर उनके लिए कंबल आदि का इंतजाम भी करवाते हैं। साथ ही पढ़ने के लिए, नौकरी के लिए लोगों की यथासंभव मदद भी करते हैं। आज भी हनुमान पुस्तकालय की असंख्य मूल्यवान पुस्तकों के पुनरुद्धार लिए आपके मन को मैंने उद्वेलित होते हुए देखा। इस पुरानी संस्था को बचाने के लिए आपने तुलाराम जालान जी को भी पत्र लिखा था। शिक्षा और साहित्य को समृद्ध करने के साथ - साथ आप अपने जीवन में सदैव ईमानदारी और न्याय का ही पक्ष लेते रहे। आप किसी भी संस्था या संगठन के विचारों से प्रभावित नहीं रहे बल्कि जिस किसी भी मंच ने आपको आमंत्रित किया, वहाँ अपने विचारों और सिद्धातों पर ही अडिग रहे। 

हिंदी की विशिष्ट संस्था भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से लेखक का जुड़ाव तब से था जब उसकी शुरुआत केमक स्ट्रीट में स्थित एक भाड़े के घर से हुई थी। सीताराम सेकसरिया जी  ने अपने स्नेही विद्वान कृष्ण बिहारी मिश्र जी को बुलाया और परिषद् के साथ जुड़ने का वचन लिया। सीताराम सेकसरिया जी और  भागीरथ कानोड़िया जी इस संस्थान के कर्णधार रहे और दोनों के ही भरोसे पर खरे उतरे डॉ मिश्र। लेखक के गुरु आचार्य डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी सीताराम सेकसरिया जी के प्रति आदर भाव रखते थे। भारतीय भाषा परिषद्(1975 में स्थापित) से लेखक का आदिकाल से नाता रहा और सभी प्रमुख साहित्यिक आयोजनों में बतौर विशिष्ट अतिथि या अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित भी होते रहे। बीच में संबंध टूटे भी लेकिन सीताराम सेकसरिया के ज्येष्ठ पुत्र अशोक सेकसरिया के कारण फिर जुड़े।यहाँ तक कि डॉ. मिश्र ने इसी संस्था के कर्मचारियों के साथ होने वाली अनीति और दुर्निती के लिए आंदोलन में भी योगदान दिया। वे सहृदयता की मूर्ति हैं उन्होंने कर्मचारियों के हितों के पक्ष में फैसला करवाया। इसी तरह कहीं भी दुर्निती दिखाई पड़ने पर विरोध प्रकट करने में भी पीछे नहीं हटते।

मंच चाहे किसी भी विचारधारा का हो, जलेस या राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कोई भी संस्था यदि आमंत्रित करती है तो डॉ. मिश्र पूरी निष्ठा के साथ जाते हैं और अपनी बात रखते हैं। वे साहित्यकार के रूप में अपनी बात कहते हैं।

पत्रकारिता पर उनका शोध ग्रंथ 'हिंदी पत्रकारिता:जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि' हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में इस पुस्तक का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में होता रहा है। इसके अतिरिक्त' पत्रकारिता :इतिहास और प्रश्न ',' गणेश शंकर विद्यार्थी', ललित निबंध संग्रह 'बेहया का जंगल' , 'मकान उठ रहे हैं' , 'आंगन की तलाश' , 'अराजक उल्लास' , 'नेह के नाते अनेक' ,' हिंदी साहित्य: बंगीय भूमिका' आदि विशिष्ट पुस्तकें लेखक की हिंदी सेवा का प्रमाण है। 

एक और कालजयी ग्रंथ 'कल्पतरु की उत्सव लीला 'की रचना लेखक की अमूल्य देन है जो समाज की नब्ज को समझते हुए साहित्य में एक नया अध्याय है। हिंदी साहित्य में रामकृष्ण परमहंस के विचारों और चिंतन की आवश्यकता को समय की मांग समझते हुए लेखक ने बंगाल में रहकर परमहंस पर लिखने का साहस किया। यह खतरा एक संवेदनशील और सजग साहित्यकार ही उठा सकता है। आधुनिकता की आंँधी में भारत की युवा पीढ़ी के समक्ष परमहंस के अध्यात्म को प्रतिष्ठित कर समाज को अपनी संस्कृति और अध्यात्म के संरक्षण के लिए संदेश दिया है। इसी ग्रंथ को भारतीय ज्ञानपीठ ने सर्वोच्च पुरस्कार 'मूर्ति देवी' से सम्मानित किया। पुरस्कार समारोह का आयोजन भारतीय भाषा परिषद् के सभागार में हुआ जो लेखक के चाहने वालों से भरा हुआ था।

हरिवंश जी (सांसद) प्रमुख संपादक प्रभात खबर ने अपने लेख में लिखा था , 'डॉ. मिश्र से उनका परिचय उनके ललित निबंध संग्रह 'बेहया का जंगल' के माध्यम से हुआ जो सर्जनात्मक ऊंँचाई और भारत की सर्वश्रेष्ठ परंपरा गत मनीषा की झलक है। हिंदी पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा, मूल्य, त्याग और तेज को सामने लाने का काम जिस तरह से कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने किया और कर रहे हैं, वैसा कोई दूसरा नाम हिंदी विद्वानों में दिखाई नहीं देता, पर उनके इस योगदान का महत्व तो बाद में जाना, समझा या आत्मसात कर पाया। '

हिंदी से संबंधित किसी भी विषय पर आपका वक्तव्य हिंदी के प्रकांड विद्वानों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, आचार्य चंद्र बलि पांडेय, डॉ. विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों के सूत्रों को जोड़ता हुआ लगता है। आचार्य डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य भला पीछे कैसे रह सकते हैं? डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ मूल्यों, आदर्शों और सत्यों पर टिका है, यही कारण है कि जब वे किसी संस्थान में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हैं तो उसमें लेखक का गंभीर अध्ययन , चिंतन झलकता है।

भारतीय संस्कृति संसद संस्था, कोलकाता ने' कल्पतरु की उत्सव लीला' ग्रंथ पर 'मेरी सृष्टि मेरी दृष्टि' कार्यक्रम का आयोजन किया जो उनकी रचनाशीलता और चिंतन पर आधारित था। लगभग दो घंटे तक आपका वक्तव्य लोग सुनते रहे। तन और मन से संवेदनशील लेखक का व्यक्तित्व एक अभिभावक जैसा है।उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान का हिंदी साहित्य जगत और समाज डॉ. मिश्र को अपने ही परिवार का समझता है और उनके पास उनके घर में मिल कर अपना सौभाग्य समझते हैं। एक बार कवि और लेखक अशोक वाजपेयी जी की पत्नी कोलकाता आईं और आपसे मिल कर गईं तो अपने छोटे घर के प्रति कहीं-न-कहीं आपको लगा कि उन्हें कष्ट होगा, परंतु यह लेखक का सदा से भ्रम रहा है कि मेरा छोटा कमरा कहीं किसी को परेशान न करे।परंतु आज जिन्होंने भी डॉ. मिश्र के साहित्यिक कृतित्व और व्यक्तित्व से सरोकार रखा है, उन्हें इस बात का पता है कि यह छोटा - सा कमरा उनके जीवन में क्या महत्व रखता है। यह लेखक के लिए विद्या मंदिर है, आपके गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी भी इस कमरे में रहे हैं, अज्ञेय जी, ब.व.कारंत आदि विद्वानों का आगमन होता रहा है।इस कमरे का वातावरण विशुद्ध साहित्यिक और अध्यात्म की सुरभि से सुरभित है। भारतीय मनीषा रचनाकारों को "कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू" मानती है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही है। रचनाकार ऋषि-मुनियों मुनियों की परंपरा का निर्वहन करने वाला स्वयंभू सदृश होता है। 


साहित्य सेवी भाषाई संस्कारों से युक्त डॉ. मिश्र गुरु परंपरा को निभाने वाले अपने विद्या कर्म के लिए समर्पित हैं। एसी रूम में गांँव की सोंधी खुश्बू नहीं आती, महानगर में रहकर गांँव को सहेजने का दुष्कर कार्य बहुत कम लोग ही कर पाते हैं, डॉ मिश्र ने इसका पुरजोर प्रयास किया।


कोलकाता में भोजपुरी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में राजनेता और गायक मनोज तिवारी के आगमन पर आपकी उपस्थिति उस कार्यक्रम की शोभा बनी। मुझे स्मरण आता है राजस्थान ब्राह्मण संघ के कार्यक्रम' परंपराओं में आस्था' में डॉ. मिश्र मेरे कहने से आए थे और वह आशीर्वाद ही था।आपके कर - कमलों से लोकार्पण करवाने के लिए  संस्था अपने को गौरवान्वित समझती है। 'परंपराओं में आस्था' पुस्तक मेरे और परम विदूषी दुर्गा व्यास के संपादन में लिखी गई थी, समाज का बड़ा कार्यक्रम था आपकी उपस्थिति मात्र से ही कोलकाता का हिंदी समाज स्वयं को भाग्यशाली मानता है।

यह भी सच्चाई है कि डॉ. मिश्र बड़े ही नाजुक प्रकृति के भी हैं, जब तक तबियत ठीक नहीं समझते, संस्था के आमंत्रण को स्वीकृति नहीं देते।

कोलकाता के हिंदी साहित्य जगत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रबुद्ध विद्वानों में आचार्य कल्याण मल लोढा और डॉ विष्णुकांत शास्त्री जैसे प्रकांड पंडितों का भरपूर हाथ रहा है, लेकिन डॉ. मिश्र एक कॉलेज में अध्यापन करते हुए भी साहित्य साधना में एक साधक की तरह रत रहे। साहित्यिक यात्राओं से भी कतराते रहे, कोलकाता के सेठ- साहूकारों से भी दूर रहे। यह अलग बात है कि आपकी विद्वता और ईमानदारी ने कोलकाता के गरीब से लेकर अमीर तक के लोगों के दिल जीते हैं। उसी का परिणाम है कि आपको सभी हिंदी संस्थाएँ आमंत्रित करने में अपना सौभाग्य समझती हैं। कोलकाता का हिंदी जगत डॉ. मिश्र के साहित्यिक व्यक्तित्व से लाभान्वित है। हिंदी के विद्यार्थियों को कभी भी हिंदी उच्च शिक्षा या पीएचडी में कोई असुविधा होती है तो वे सलाह लेते हैं, काम रुकता नहीं है।

  भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता की हिंदी की एक और संस्था है जो भारतीय संस्कृति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने तथा साहित्य -संगीत - कला की त्रिवेणी को विकसित करने के लिए अनवरत सक्रिय कार्य कर रही है। इसका प्रमुख कारण है कि यहाँ विगत साठ वर्षों से मूर्धन्य साहित्यकारों, कला,  संगीत और संस्कृति के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता रहा है। 8 मई, 1955 में इस संस्था की स्थापना स्वनामधन्य श्री माधोदासजी, श्री रामनिवास ढंढारिया, श्री हरि प्रसाद माहेश्वरी, श्री गोकुल दासजी जैसे महापुरुषों के सद्प्रयास से हुआ। बंगाल के विश्रुत विद्वान एवं मूर्धन्य इतिहास विद् डॉ. कालीदास जी नाग संस्था के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। देश के वरिष्ठ एवं विशिष्ट साहित्यकार, विचारक, समीक्षक, कवि सभी भारतीय संस्कृति संसद के आमंत्रण को सहर्ष एवं सोत्साह स्वीकार करते थे। डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने संसद के आमंत्रण पर लिखा था कि मेरी नई उपलब्धि का सम्मान जहाँ होना चाहिए था, वहाँ तो मुझे अँगूठा दिखाया जा रहा था और कलकत्ता में हिंदी की एक साहित्यिक संस्था मेरा सम्मान करना चाहती थी।धर्म तल्ला में स्थित यह संस्था  काव्य - कथा - कला - संगीत-संस्कृति आदि के महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित करती रही है। 

  वर्तमान समय में इस संस्था का संरक्षण डॉ. विट्ठल दास मूँधड़ा जी कर रहे हैं। पं. जसराज जी और डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र जी का सम्मान एक साथ इसी संस्था ने किया।भारत का कोई भी ऐसा विद्वान नहीं है जिसे संसद ने आमंत्रित न किया हो। हिंदी के प्रचार - प्रसार के लिए संसद निरंतर कार्य शील है। डॉ. मिश्र कोलकाता के वरिष्ठ साहित्यकार हैं जिनका रचना - संसार बड़ा फलक लिए हुए है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र की हार्दिक इच्छा थी कि डॉ. मिश्र रामकृष्ण परमहंस पर कुछ लिखें। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने यह इच्छा उस समय व्यक्त की जब कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ वे माँ के दर्शन के लिए दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के उसी प्रांगण में थे, जहांँ माँ भवतारिणी का विशाल परिसर था। संभवतः डॉ. विद्यनिवास मिश्र माध्यम बने थे। डॉ. मिश्र ने बंगाल के परमहंस की बतकही शैली को बंगाल की संस्कृति के रंग में नहाये बलिया की माटी से बने अपनी बोली और भाषा को बचाने का भगीरथ प्रयास 'कल्पतरु की उत्सव लीला' के बहाने किया जो आपके वृद्धावस्था की ऊर्जा का द्योतक है।

डॉ. मिश्र से मैंने कहा आपने जो लिखा वह अवकाश प्राप्ति के पश्चात लिखा, पहले लिखते तो आपकी पुस्तकों की संख्या बढ़ जाती। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि  समझती हो न वसुंधरा, ठाकुर की कृपा हुई है उसी माँ ने आदेश दिया है, तभी लिखा गया। जो लिख गया उसी माँ की कृपा है ...... वही लिखवाती है। एक जगह वे कहते हैं, 'कोयल अपनी बोली नहीं भूलती चाहे वह महानगर में ही क्यों न रहती हो।' मुझे लगता है कि डॉ. मिश्र की यही गंँवई संवेदना आधुनिक युग जीवन जीने वालों के लिए ऐसी सीख  है जो हमें मनुष्य बनाने की ओर ले जाती है।पद्मश्री से सम्मानित  डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र आज भी हिंदी भाषा की संवेदना के प्रति संकल्पबद्ध हैं। 

रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल - श्रृंखला

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा हैकविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है। । कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाता है। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं - - - कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है। फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं।रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका वर्णन आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है - - 'अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन' अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे 'आलोकपियासी '(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं। अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत - प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं। प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है। अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा? राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है - - 'वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि' राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है। रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है - - -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5)