Monday, December 27, 2021
किशन दाधीच
गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच से मिलना एक जीतीजागती संस्था से मिलना है। उनके घर की अलमारी में अभी भी 1980-81 - 82 की स्मृति स्वरूप साहित्यकारों के पत्र जो उनकी थाती है, भरे पड़े हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने बताया कि 100 केजी साहित्यिक रद्दी भी बेची है। मैंने पूछा कि आपने उसको छांटा कैसे? बताया कि उसमें साल से भी अधिक समय लगा। उन्हें ही बेचा गया है जिन किताबों पर उन्होंने लिख लिया और उन्हें पढा़ गया था। था तो बहुत परिश्रम का काम। खैर अभी भी अज्ञेय जी के साथ फोटो और पत्र, हाबडा़ के एक वरिष्ठ विद्वान शंभूनाथ श्रीवास्तव, भवानीप्रसाद मिश्र आदि तमाम बड़े बड़े साहित्यकारों के पत्रों को सहेज कर रखा है।
उदयपुर की साहित्य संस्कृति और संस्कार को संस्कारित करने में किशन दाधीच सात-आठ दशकों से भी ज्यादा समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।राजस्थान की प्रसिद्ध पत्रिका 'मधुमति' के संयोजन से तीन साल जुड़े रहे।बहुत सी सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण और संवर्धित करने में तत्पर रहे। अपने गीतों से उदयपुर ही नहीं पूरे राजस्थान और देश के गौरव हैं। उनकी आत्मीयता और भाव में रस और स्वर लय और विचारों की गहराई है।
को दाधीच जी ने कवि और साहित्यकार हरीश भदानी की कलकत्ता यात्रा पर संस्मरण सुनाया जो इतना मजेदार था कि हंसते हंसते बेहाल हो गई। जब उनकी सासंद बेटी सरला का विवाह भी नहीं हुआ था तब की बात है। कलकत्ता आते वक्त उनका बैग और रुपये सब चोरी हो गए। राजस्थान लौटने के लिए भी पैसे नहीं थे। अब एक सेठ से अनुरोध किया गया कि बड़े कवि हैं उनकी कविताओं को सुना जाय जिससे उन्हें सेठ जी तो कुछ दे ही देगें। सेठ जी तैयार हो गए लेकिन एन समय में उनका कुछ काम निकल आया तो सेठ जी ने कहा कि कोई बात नहीं आप आपनी कविताएं मेरे मुनीम को सुना दीजिएगा। मानो कविता न हो कोई वस्तु का सौदा हो रहा हो। हरीश जी ने कहा ठीक है। मरता क्या न करता। मुनीम जी और सेठ जी के घर की कुछ औरतों कविता सुनने बैठीं। कविता के बीच में एक पंक्ति आई'हथेली पर सरसों उगाई' मुनीम जी ने हरीश जी को बीच में टोक दिया और कहा कि आप ये बताएं कि आपके शहर में सरसों का क्या भाव है? मुनीम जी विशुद्ध व्यवसायिक वृत्ति के थे। कविता भला कौन सुने? खैर हरीश को उस जमाने में ग्यारह सौ रुपये मिले और तब वे रेलवे स्टेशन जा सके।
किशन जी ने और भी अच्छे ढंग से इस घटना को सुनाया था। मैं जैसा बता सकी।
कथाकार उपेंद्र नाथ अश्क जी की एक घटना बताई। बहुत मजा आया। शुरुआती दौर में उपेंद्र नाथ अश्क जी इलाहाबाद में चूना की दुकान करते थे। अब तो उनके बेटे और परिवार सब विदेशों में हैं संपन्न हैं। उनकी कहानियों का प्रकाशन उनके किसी मित्र ने करवाया। पहली कहानी की पुस्तक 'बैंगन का पौधा '। ये कहानी पुस्तक बहुत प्रसिद्ध हुई। उनकी आत्मकथा में उन्होंने स्वयं लिखा है। तो उनकी इस पुस्तक का क्या होगा। बिकी भी नहीं। तो उनके कोई परिचित की कृषि में जानपहचान थी सो वहां बैंगन का पौधा नाम होने के कारण यह हुआ कि बैंगन कृषि से संबंधित है सो लाइब्रेरी ने एक साथ सभी पुस्तकें खरीद ली। जब विभिन्न वाचनालयों में गई तो उसमें कहीं भी बैंगन के पौधे या खेती के शोध वगैरह की चर्चा ही नहीं थी। वहाँ के डिप्टी डायरेक्टर को पकड़ा गया। फिर इनक्वायरी कमेटी बैठी कि किसने ये पुस्तकें खरीदी है। केस वगैरह करने की बात चली। वो तो अच्छा हुआ कि कोई पहचान वाले ने केस को रफा-दफा करवा दिया नहीं तो डिप्टी डायरेक्टर पर आफत आ जाती। केवल शीर्षक देख कर पुस्तक न खरीदें। लेकिन बैंगन का पौधा बहुत प्रसिद्ध हो गई।सच तो यह है कि उस समय अश्क जी की धूम मच गई।
किशन दाधीच जी ने 6 दिसंबर को ये किस्से सुनाए। आजकल साहित्यकार अपने में ही रहते हैं किसी के पास समय ही नहीं है कि इस तरह के किस्से सुनाएं। साहित्य आनंद की अनुभूति करवाता है। संगीत लय सुर और भाव से पूर्ण पूर्ण कर विचारों को समृद्ध करता है।🌹🌹🌹🌹🌹
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