Monday, December 27, 2021
राम धारी सिंह दिनकर
रामधारी सिंह दिनकर
जन्म ---
रामधारी सिंह दिनकर' जी का जन्म 24 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया घाट में हुआ था।
पारिवारिक परिचय ---
माँ - मनरूप देवी, पिता - बाबू रवि सिंह, 13 वर्ष की आयु में सामवती देवी से विवाह
तीन भाई - बसंत सिंह, रामधारी सिंह दिनकर, सत्यनारायण सिंह।
दो बेटे - दो बेटियों का परिवार, बड़े बेटे का देहावसान पहले ही हो चुका था
पुत्र केदारनाथ सिंह, पुत्रवधुएँ - हेमंत देवी, कल्पना सिंह,
पौत्र अरविंद कुमार सिंह का परिवार है जो दिनकर की आत्मा के साथ मिलकर ही जी रहे हैं।
शिक्षा ---
दिनकर जी की प्रारंभिक शिक्षा सिमरिया बारो गाँव में राष्ट्रीय विद्यालय में हुई जहाँ वे 1921-1923 तक पढे़ जो गाँधी के असहयोग आंदोलन का समय था। बाद में 15 वर्ष की उम्र में मोकामो घाट के स्कूल में पढ़ने गए।जहाँ 1928 तक पढे़। पिता की मृत्यु हो चुकी थी, अतः बाद में नेनुआ की पढ़ाई की जिम्मेदारी भाई बसंत सिंह और सत्यनारायण सिंह ने उठाई। इसके लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
रामधारी सिंह को नेनुआ नाम से घर में पुकारा जाता था।
उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बीए किया एवं संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक विद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्य किया।
१९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया।
१९५० से १९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।
1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचे।
1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए।
दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन् 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया।
लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए।
कृतियाँ - - -
प्रबंध काव्य - कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, प्रणभंग, उर्वशी, बारदोली विजय, धूपछाँव, बापू, इतिहास के आँसू, मिर्च का मजा, दिल्ली
मुक्तक - - -
रेणुका, हुंँकार, रसवंती, इंद्रगीत, सामधेनी, धूप और धुआँ, नीम के पत्ते, नील कुसुम, सीपी और शंख, नये सुभाषित, चक्रवात, धार के उस पार, आत्मा की आँखें, हारे को हरि
नाम
प्रथम कविता संग्रह 'रेणुका' 1935 में छपी जिसमें देशभक्ति कूट कूट कर भरी है।
गद्य ग्रंथ - - -
मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, रेती के फूल, भारतीय संस्कृति
के चार अध्याय, भारतीय संस्कृति की एकता
पुरस्कार - - -
1959 - - साहित्य अकादमी पुरस्कार
1959 - - पद्मभूषण
1972 - - ज्ञानपीठ पुरस्कार
विशेष ----
रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। दिनकर स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी रचनाओं 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' नामक कृतियों में मिलता है। उनकी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 'उर्वशी' के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।
द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य 'कुरुक्षेत्र' को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया।
फिर तो ज्वार उमड़ा और रेणुका, हुँकार, रसवंती और द्वंद्वगीत रचे गए। रेणुका और हुँकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अग्रेज़ प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया।
उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में 'रश्मिरथी' और 'परशुराम की प्रतीक्षा 'शामिल है। 'उर्वशी 'को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।
ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना 'उर्वशी' की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। 'उर्वशी 'स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, 'कुरुक्षेत्र', महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है।
दिनकर जी ने छायावादी संस्कारों के साथ लिखना शुरू किया था। वे स्वयं कहते हैं कि छायावाद के रोष से बचना मुश्किल था। उनकी काव्य -दृष्टि पर उर्दू के इकबाल और बंगला के रवीन्द्र नाथ का गहरा योगदान रहा। वैचारिक स्तर पर कार्ल मार्क्स के साम्यवादी सिद्धांत से प्रभावित थे, और वहीं दूसरी ओर महात्मा गाँधी की करुणा से भरा हुआ मानवता वाद से भी आकर्षित रहे
रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे।
राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों की मुखालफत करने से वे नहीं चूके।
'देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है॥'
1962 में चीन से हार के बाद संसद में दिनकर ने इस कविता का पाठ किया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का सिर झुक गया था. यह घटना आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास की चुनिंदा क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है.
हिंदी के अपमान को लेकर भी बहुत सख्त स्वर में उन्होंने संसद में अपनी बातें रखी थीं और हिंदी को सम्मान देने पर बल दिया था। वे कहते थे कि हिंदी की निंदा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहुंँचती है।
रचना अंश ---
' सच है विपत्ति जब आती है ' बहुत ही प्रेरक पंक्तियाँ 'रश्मिरथी 'से --
' सच है विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है।
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते.
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं.
मुंँह से न कभी उफ़ कहते हैं,
संकट का चरण ना गहते हैं.
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग निरत- नीति रहते हैं शूलों का मूल नशाते हैं.
बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं,
है कौन विघ्न ऐसा जग में टिक सके आदमी के मग में.
खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पांँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।'
'हिमालय' कविता की पंक्तियाँ - - 1933 में इस कविता ने धूम मचा दी थी --
' मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!'
प्रसिद्ध पंक्तियाँ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' जिनका उद्घोष लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में किया था जो तत्कालीन सरकार के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद था - - -
' सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।
जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली'
देश को जागरूक करने वाली प्रेरणादायी पंक्तियाँ ----
' वह प्रदीप जो दीख रहा है
झिलमिल दूर नहीं है।
थक कर बैठ गये क्या भाई!
मंजिल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से
हृदय चीरते तम का‚
सारी रात चले तुम दुख –
झेलते कुलिश निर्मल का‚
एक खेय है शेष
किसी विध पार उसे कर जाओ‚
वह देखो उस पार चमकता है
मंदिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे‚
वह सच्चा शूर नहीं है।
थक कर बैठ गये क्या भाई!
मंजिल दूर नहीं है।'
दिनकर आज भी खेत, किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित और देश के रक्षकों के बीच उनकी आत्मा के शब्द बनकर सूर्य की तरह चमक रहे हैं। हिंदी के पक्षधर दिनकर जी को शत शत नमन। 🙏 🙏
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