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Thursday, June 30, 2022

मंदिर के बहाने 25जून 2022 यात्रा परिक्रमा

मंदिर के बहाने - --डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता बहुत हैरानी होती है जब भी हम स्त्रियाँ पिकनिक पर जातीं हैं तो हमेशा की तरह सब कुछ एक ही होता है लेकिन फिर भी अलग होता है । एक से भाव, एक से विचार, एक सी संस्कृति, एक से भगवान, एक से धर्म, एक से राम, और एक सी जाति। हर स्त्री की अपनी कहानी होती है और मजे की बात ये है कि फिर भी अपने आप को कभी भी दूसरों से अलग नहीं पाती। जब भी मैं अपने-आप को तौलती हूँ तो कहीं कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता। घुमा-फिराकर एक ही बात समझ में आती है। हमारी कहानियों में कोई अंतर ही नहीं होता। भले ही हम आज डिजिटल रूप से आगे बढ़ गए हों लेकिन उसके बावजूद भी समाज और परिवार की कहानियाँ एक ही जैसी ही हैं। हाँ! स्वरूप बदलता रहा है। स्त्री मित्रों के रिश्तों की अजब और गज़ब कहानियाँ होती हैं। मेरे काव्य संग्रह'हर दिन नया'की एक कविता' रिश्ते 'याद आ रही है जिसे मैं आप सभी मित्रों के साथ साझा कर रही हूँ- 'बर्फ से हैं ये मानवीय रिश्ते उन्हें चाहिए गर्म हवा का झोंका साफ़ करे जो जमी धूल को परत दर परत खोले जकड़न को जो तोड़े जड़ता को तभी तो हिय - हिमालय पर जमा ग्लेशियर प्रेम के झरने- सा बहने लगता है धरती के हरे-हरे आँचल पर।' हर घर के अंदर और बाहर की कहानी अलग है। पहले संयुक्त परिवार थे और अब एकल परिवार हैं। अब अकेलेपन और अपनी पहचान की कहानी है। अपने लिए समय चुराना और एक साथ पूरा दिन बिताना, रोज के अपने सभी कार्यों को छोड़कर घूमना - फिरना, खाना-पीना आनंद और ऊर्जा से भर देता है। शरीर और मन फिर नए सिरे से अपने काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं । जब भी हम वरिष्ठ स्त्रियाँ पिकनिक या गेटटुगेदर के लिए कहीं बाहर जाती हैं तो किसी मंदिर का सहारा लेना सबसे अधिक सुरक्षित होता है।घर वाले निश्चिंत हो जाते हैं कि चलो कोई गड़बड़ नहीं होगा। वहाँ स्त्री को जाने की खुली छूट होती है। मेरी मित्र ने कहा कि जब घर वालों को पता चला कि मंमी पिकनिक मनाने चिन्सुरा या चूँचूडा़ जा रही हैं तो सवाल उठा कि वहाँ ऐसा क्या है?उसने कहा, 'अरे भाई मंदिर है। सभी जा रही हैं। मित्रों के साथ, वह भी महिला मित्रों के साथ। ' तब ठीक है। हमारे बाल चाहे धूप में कितने ही पके हों, पति और बेटे-बेटियों के सामने हम भी बच्चे ही होते हैं।पहले हम उनके अभिभावक थे, अब वे हमारे अभिभावक बन जाते हैं। इतना ही नहीं, मंदिर का शुद्ध और पवित्र वातावरण हमारे चरित्र निर्माण में सहायक होता है। किसी बार, रेस्तरां, होटल या डिस्को पार्टी को कभी- भी अच्छा नहीं माना गया है । ख़ासकर साठ से ऊपर वाली उम्र की स्त्रियों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि उम्र के इस पड़ाव में उन्हें शांतिपूर्ण वातावरण और अच्छा व्यवहार मिल जाए तो उन्हें दुनिया मिल जाती है। उनका मन स्वस्थ हो जाता है। चलो मंदिर के बहाने कम से कम घूमना तो हो जाता है। इसीलिए आप देखेंगे कि स्त्रियाँ धर्म को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। स्त्रियाँ संस्कृति को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के साथ-साथ चलते हुए बाली में स्थित प्राचीन जटिया दिगंबर जैन मंदिर के दर्शन किए फिर आलम बाजार में स्थित श्री श्याम मंदिर जो सफेद संगमरमर का नक्काशीदार उत्कृष्ट और भव्य कला का नमूना है, वहाँ के भी दर्शन किए। श्री श्याम मंदिर हिंदू मंदिरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जिससे वे तीनों लोकों में विजयी बनने में समर्थ हुए थे।श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहा जाता है। आलम बाजार में स्थित संगमरमर पत्थर से बना ये श्री श्याम बाबा का मंदिर कोलकाता के मारवाड़ी समाज के लिए विरासत है।हमलोगों ने वहाँ पहले जोत के दर्शन किए और घी से आहूति दी। लगा कि हम राजस्थान में ही हैं।यह संयोग ही था कि हमने बच्छ बारस के दिन ही उनके दर्शन किए जो महत्वपूर्ण रहा। हर कहानी में एक और कहानी जुड़ी रहती है। खैर अधिक विस्तार में जानना है तो दूसरे स्त्रोतों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। फिर वहाँ से चिन्सुरा स्थित प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर क्षेत्रपाल भौमिया जी के मंदिर गए और वहीं पास में एक श्वेतांबर जैन मंदिर भी देखा। चार मंदिरों की इस परिक्रमा में हम बीस महिला मित्रों की टोली ने बहुत मजे किए। ये तो मंदिर का बहाना था जिसके कारण हमने ट्रैवेल मीनी बस जो बीस सीटर एसी गाड़ी थी, एक लंबा रास्ता तय किया और साथ का आनंद उठाया। अब अपनी कहानी शुरू होती है। सबसे पहले हम लोग श्री पार्श्वनाथ भगवान के प्राचीन जटिया मंदिर गए जो बाली ब्रिज से होते हुए बांयी ओर से जाने वाले रास्ते पर था। वहाँ साधु महाराज जी भी आए हुए थे। दिगंबर साधू थे जो नग्न रहते हुए अपनी साधना करते हैं। जैन धर्म के मुख्य रूप से दो संप्रदाय श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय हैं। छठीं शताब्दी में भारत के प्रमुख धर्मों में जैन और बौद्ध धर्म रहे हैं ।इन धर्मों ने सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दर्शन आदि की शिक्षा दी जिसमें ध्यान- समाधि- प्रज्ञा का विशेष महत्व दिया गया है। मनुष्य की शक्ति को उन्नत करने का प्रावधान इन धर्मों की विशेषता है। बुद्ध और महावीर की शिक्षाएंँ परिवार, समाज और देश के बौद्धिक निर्माण के साथ-साथ चरित्र, जीवन मूल्यों और आदर्श की धरातल को मजबूत करती हैं। व्यर्थ के आडंबरों और दिखावे से दूर कर स्वयं को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। समय के परिवर्तन के साथ इन धर्मों में भी मूर्ति पूजा और संप्रदायों ने स्थान ले लिया है । मेरी कुछ महिला मित्र जैन नहीं थी, वे हिन्दू धर्म को मानने वाली थीं, वे जैन धर्म में विश्वास नहीं करतीं और जो जैन धर्म को मानने वाली थीं, वे हिन्दू धर्म से परहेज करती हैं।ये भी देखने को मिला। जैन धर्म श्रमण संस्कृति को मान्यता देता है। दोनों तरह की ही महिला मित्रों ने अपने - अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि संभवतः आगे चलकर दिगंबर जैन साधुओं की परंपरा अधिक नहीं चलेगी क्योंकि ऐसे वीतरागी साधुओं की कमी आती जा रही है।यह बहुत ही कठिन साधना है। खैर, हम तो भाग्यशाली थे, जैन साधू के दर्शन भी किए। हिन्दू और जैन सभी मित्रों ने मिलकर भगवान पार्श्वनाथ जी के मंदिर में एकसाथ आरती और नमोंकार मंत्र का जप किया।ऐसा लग रहा था सच में, भारत सर्व - धर्म - समभाव की धरती है। इसमें तो कोई संदेह नहीं है कहा गया है कि अगुणहिं सगुणहिं नहिं कछु भेदा। उस समय सुबह के साढ़े नौ बजे थे। सभी नाश्ते की मांग कर रही थीं। मैं बता दूँ कि साढ़े आठ बजे के लगभग हम सभी हावड़ा आईडियल ग्रेंड से ट्रैवल बस में निकल पड़े थे। सभी मित्रों को रेणु ने रोली- टीका लगाया और मीठी सौंप की एक डिब्बी देकर स्वागत किया जो भारतीय संस्कृति की पहचान है और फिर गाड़ी में अपनी-अपनी सीट पर सभी बैठ गईं। लक्ष्मी कानोडिया के पति ने हम सभी के लिए गर्म - गर्म समोसे, गांठिया और पापड़ी के साथ आम, अमरूद के थैलै संभला दिए थे। लक्ष्मी ने नाश्ते के लिए ब्रेड - बटर के पैकेट, चटनी, नमक, काली मिर्च के डिब्बे और केले आदि सारे खाने-पीने के सामान संजोकर एक बास्केट में रखे थे। गर्म समोसे के मसाले की खुश्बू ने सबके मुंँह में पानी ला दिया था। गाड़ी ज्यों ही रवाना हुई , सबने कहा समोसे ठंडे हो जाएंगे, खा लेते हैं। सबने एक - एक समोसे चटनी के साथ खाए। खूब बढ़ाई मिली लक्ष्मी के पति कानोडिया भाईसाहब को । लक्ष्मी ने बताया कि दुकान वाले से उन्होंने कह दिया था कि सभी नाश्ता ताजा बना कर देना। वे स्वयं जाकर नाश्ता का सामान ले आए। महिलाओं को तो बातें बनाना आता ही है। सभी कहने लगीं कितने अच्छे पति हैं लक्ष्मी के। लक्ष्मी का हर आदेश सिर आँखों पर जो रखते हैं। वे दोनों मानो एक दूजे के लिए ही बने हैं। प्रशंसा करते- करते सारे समोसे चट कर दिए गए। प्रमुख रूप से हमारा प्रोग्राम भोमिया जी के दर्शन का ही था। आईडियल ग्रेंड की रेणु ने सारा इंतजाम अपने ऊपर लिया था । वह स्वयं जैनी है और यह जैन मंदिर उसके लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल भी है। सो ढाई से तीन घंटे के भीतर चिन्सुरा या चूँचूडा़ जो हुगली जिले में स्थित है, भोमिया जी के मंदिर में पहुंँचे। वे नगर रक्षक यानी क्षेत्रपाल हैं।इस मंदिर का नाम ही क्षेत्रपाल मंदिर है। हम जब वहाँ पहुँचे, उनका श्रृंगार हो रहा था। उनके प्रमुख चेहरे पर सिंदूरी रंग का लेप लगाया जा रहा था। सोने की मूँछ और आँखों में तेज झलक रहा था। प्रमुख चेहरे से बायीं ओर सटा एक और चेहरा है। इसकी भी कहानी है। भूमिया देवता को भूमि का रक्षक देवता माना जाता है, इसी वजह से इन्हें क्षेत्रपाल भी कहा जाता है।खेतों में बुवाई किए जाने से पहले पहाड़ी किसान बीज के कुछ दाने भूमिया देवता के मंदिर में बिखेर देते हैं। विभिन्न पर्व-उत्सवों के अलावा रबी व खरीफ की फसल पक जाने के बाद भी भूमिया देवता की पूजा अवश्य की जाती है। एक और प्रसंग आता है। गौरक्षा करते हुए, बिना सर के धड़ के सहारे रणभूमि में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने तथा एक रक्षक के रूप में अपनी रजपूती आन बान और शान प्रदर्शित करने के कारण सवाई सिंह भोमिया के रूप में पूजे जाने लगे। श्री दिगंबर जैन मंदिर क्षेत्रपाल भैरों जी के मंदिर का पुनर्निर्माण विक्रम संवत 1996 में किया गया इसकी गणना प्राचीन मंदिरों में होती है। यह मंदिर चिन्सुरा में श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर एक बैशाख लेन कलकत्ता - 700007 में स्थित है। मंदिर की दीवारों पर बाबा की आरती और बाबा की पूजा का विधान लिखा है। यहाँ तीन भवन बने हैं जिनके नाम सम्यक चारित्र्य, सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन हैं । हम लोग सम्यक चारित्र भवन में ठहरे । उसके बड़े अहाते में कुर्सियाँ लगा कर बैठे थे , उसी में हमलोगों के विश्राम करने के लिए दो कमरे खोल दिए गए थे । सभी मित्रों ने विश्राम कर तरोताजा होकर भोमिया जी का दर्शन किया। यहीं हमारे भोजन की व्यवस्था की गई थी जो बहुत ही अच्छी व्यवस्था थी। भोजन में गेहूंँ की रोटी, चावल, दाल, गट्टे की सब्जी, भरवाँ परवल, मिस्सी रोटी, सलाद खीरा टमाटर का, बूंदी रायता,कच्चे आम और हरी मिर्च की लूंजी, पापड़ आदि थे जो स्वच्छता से बनाए गए। स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन सभी ने मिलकर कुछ ज्यादा ही खाया। फिर नाश्ते में भी हमें चाय के साथ पकौड़े खाने को मिले। लक्ष्मी भी अपने साथ बहुत सारी खाने की चीजें लाई थी। मित्रों के साथ खाने में बहुत आनंद आया। भोजन तो घर में भी करते हैं परंतु घर में तो दो रोटियाँ भी रुचि से नहीं खाई जाती। सच है कि यहाँ सब मित्रों के साथ सभी ने बहुत ज्यादा खाया। भोजन के बाद बहुत सारे गेम खेलें, अंत्याक्षरी खेली, अपनी-अपनी राम कहानी सुनी और सुनाई। किसी ने पति की जम कर बुराई की क्योंकि वह पत्नी के साथ फोटो नहीं खिंचवाते, किसी का पति घर की बातें पूरी दुनिया को बता देतें है पत्नी को बाद में मालूम पड़ता है, किसी ने अपनी सुहागरात की बात बताई और अफसोस जताया कि हमारे समय में तो आज की तरह हनीमून पैकेज की व्यवस्था नहीं थी, ऐसे ही धर्मशाला में पहली रात मना ली , किसी को तो पता ही नहीं चला कि पहली रात उसके साथ क्या हुआ, सुबह सबकुछ अस्त व्यस्त देखा तो जाना, पत्नी को बताया गया कि तेरा पति बहुत अच्छा आदमी है, किसी ने कहा कि उसे तो सुहागरात के दूसरे दिन मेंस हो गया था, उस समय तो कपड़ा ही लगाया जाता था सो बहुत ही मुश्किल हुई। सभी मित्रों की उम्र 60से 70 के बीच में थी। 70 वाली सबसे अधिक चुस्त-दुरुस्त थीं। उनका दैनंदिन जीवन अनुशासन से पूर्ण है। समय पर उठना, खाना-पीना और सूरज ढलने से पहले भोजन कर लेना। शाकाहारी जैन भोजन खाने से व्यक्ति स्वस्थ और ऊर्जा से भरा रहता है, यह उनके चेहरे के तेज से ही पता चल रहा था। कई अनुभवों को साझा किया गया। उस समय की सास भी बहुत कठोर हुआ करती थी।उस जमाने में पति रात में सोते समय ही पत्नी के कमरे में आते थे । दिन में पति से बात भी कर लो तो बुरा माना जाता था। हमारी वरिष्ठ मित्र ने बताया कि कैसे दरवाजा को पीट - पीट कर रात में भी पति को अंदर कमरे में बुलाना पड़ता था क्योंकि वे तो अपने भाईयों और पिता के साथ बातें करने में लगे रहते थे। हम लोग तो घूंघट में रहते थे। परंतु आज सास की गिनती अच्छे रूप में की जाती है। वह भी समय के साथ स्वभाव को बदलने में कुछ हद तक कामयाब हुई है। अब उसे बहू के हिसाब से चलना पड़ता है और सास उसे बहू नहीं, बेटी की दृष्टि से देखती है। यह अभी भी अपवाद है लेकिन कोशिश चल रही है। भोमिया मंदिर के पास की गली में एक श्वेतांबर मंदिर भी है। खाना खाने के बाद हमलोग वहाँ भी गए। वहाँ पर बहुत सुंदर बगीचा था जिसे बहुत तरह-तरह के फूलों और पेड़ों से सजाया गया था। सभी मित्रों ने फोटो खिंचवाई और सेल्फी ली। अलग-अलग पोज देकर कभी पेड़ों के झुरमुट के पीछे तो कभी, फूलों को छूते हुए। यही तो जीवन के छोटे- छोटे क्षण हैं जिन्हें हम याद रखते हैं। रंगों से भरी मुस्कान लिए सभी की फोटो को व्हाट्सएप ग्रुप मस्ताना और फेसबुक में सब जगह लगाया गया। यह सब काम गाड़ी में जाते समय ही कर लिया गया। लौटते समय गाड़ी में राजस्थानी, अंग्रेजी और हिंदी फिल्मों के गीतों पर ठुमके लगाए। मस्ती भरे गाने गाए, अंत्याक्षरी गीत और डांस किए और अपने मन की भड़ास जो हम घर में नहीं निकाल पाते हैं, वह सभी ने जम कर निकाला। हम लोगों ने एक से एक बढ़कर गाने भी गाए, कुछ तो नॉनवेज गाने भी गाए गए। महिलाएँ अपने मन की बातों को एक दूसरे से बांँटकर खुश दिख रही थीं। घर के बंद तालों को मानो चाबी मिल जाती हैं। फिर तो बंद दरवाजे परत - दर परत एक के बाद एक खुलने लगते हैं। अपना पूरा निकाल कर सारी चीजें बोल देते हैं। आज से नहीं, प्राचीन काल से स्त्रियाँ अपने आप को अपनी ही संगत से अपने मित्रों के साथ बहुत प्रेम से हर बात को साझा करती आई हैं और संस्कृति को आगे बढ़ाने की सशक्त माध्यम हैं। बच्चों की देखरेख करना आदि विभिन्न कार्यों में अपना पूर्णरूपेण योगदान देती आईं हैं। भारतीय समाज की मजबूत स्तंभ ही स्त्री है। आधुनिक युग के बदलते परिवेश में व्यक्ति विशेष को अधिक महत्व दिया जाने लगा है जिसके कारण संवेदनाएँ भी संकुचित हुई हैं। रिश्तों को लेकर पारिवारिक सास- बहू के रिश्तों में बहुत ही उथल-पुथल की स्थिति आई है जिसको निभाने में दोनों ही पक्षों में खींचातानी चलती रहती है। इस यात्रा में बहुत कुछ सीखने और जानने का अवसर मिला। रिश्तों में मिठास रहे उसके लिए चुप रहना सबसे बड़ी दवाई है जो धीरे धीरे संबंधों को निभाने में मदद करती है। एक समय के बाद सास - बहू घर के वातावरण से सामंजस्य करती दिखाई पड़ती है क्योंकि दोनों का ही एक नए घर से सामना होता है। आज की युवा पीढ़ी का स्वभाव है तुरंत प्राप्ति। जिसके कारण आज की युवा पीढ़ी का जो तालमेल है वह नहीं बैठ पाता है और सास कहीं न कहीं अपने - आप को अकेला महसूस करती है, उसका आक्रोश तब बढ़ जाता है। वे कहती हैं कि मैंने इतना कुछ किया है और तब भी वही ढाक के तीन पात। अलग - अलग रहने के बाद भी आपस में नहीं बनती है जो कष्टकारी है। सास बनने के बाद माँ से बेटा बहू बात तक नहीं करते तो दुख दुगना हो जाता है। इसी ऊहापोह में जिंदगी के कुछ क्षण यदि सुकून के मिल जाएं तो फिर से ऊर्जा मिल जाती है। फिर से जिंदगी हसीन हो जाती है। हर व्यक्ति की अपनी खुशी होती है और रिश्ते मजबूत हों तो जिन्दगी बहुत आसानी से कटती है बिल्कुल रेशमी कपड़े की तरह फिसलती चली जाती है। शारदा जी ने पति-पत्नी और वो जैसे गेम में खिलाए। हमेशा की तरह लक्ष्मी ने कॉंच की गोलियों से शोले के गब्बर सिंह की स्टाइल में गेम खिलाया वहीं रेणु ने व्यवस्था में योगदान दिया। गेम में जीतने के बाद गीफ्ट भी सबके मनपसंद के थे। पुष्पा जी को लिपस्टिक मिली, प्रेम को नेलपालिश और फिर फोटो तो खिंचनी तो बनती ही थी। सच में, प्रेम से इस यात्रा की शुरुआत हुई और प्रेम से समाप्त हुई--मेरी कविता' गंगाजल' की ये पंक्तियाँ -' प्रेम छल छल कल कल करता उद्दाम वेग से /हिम शिखरों से पिघलता गंगा जल है '। हम मित्रों की टोली फिर किसी यात्रा पर है और आपसे अपनी कहानी साझा करने के लिए फिर मिलते हैं। धन्यवाद। डॉ वसुंधरा मिश्र का नमस्कार।

रिपोर्ट कोलकाता अनुभव और मिनिस्ट्री अॉफ कल्चर भारत सरकार द्वारा आयोजित रोटरी सदन में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन

कोलकाता अनुभव और मिनिस्ट्री अॉफ कल्चर भारत सरकार द्वारा आयोजित सांस्कृतिक संध्या - - कोलकाता अनुभव और मिनिस्ट्री अॉफ कल्चर, भारत सरकार के तत्वावधान में कोलकाता के रोटरी सदन आडिटेरियम में पच्चीस जून को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन और दीप प्रज्वलन किया प्रधान अतिथि नेपाल कौन्स्युलेट के कौंसिल जनरल एशर राज पौड़ेल ने। श्री पौडे़ल को सम्मानित किया कोलकाता अनुभव की संसथापिका और विख्यात अभिनेत्री कृष्णा दत्त ने ।इस अवसर पर मंच पर विशिष्ट वक्ता के रूप में दूरदर्शन के पूर्व प्रोड्यूसर कोलकाता के ध्रुव मित्र,वरिष्ठ पत्रकार नौशाद मल्लिक, आयुष्मी फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर प्रिंसिपल अभिजीत साँतरा, विश्वभारती शांतिनिकेतन के ड्रामा और थियेटर आर्ट्स संगीत भवन के पूर्व प्रो. तारक सेनगुप्त, कोलकाता अनुभव थियेटर की सेक्रेटरी, प्रतिपादक अभिनेत्री एवं मूक अभिनेत्री कृष्णा दत्त की गरिमामयी उपस्थिति रही । कार्यक्रम के प्रारंभ में संजीब घोष द्वारा उद्बोधन गीत की मधुर प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम में प्रमुख आकर्षण का केंद्र लघु नाटक 'टापूर टुपूर' रहा जिसकी प्रस्तुति प्रसिद्ध कलाकार अभिनेत्री विजया दत्त, सुब्रत बर्मन, सायन दत्त और मास्टर उद्भव दास मुन्सीयानार ने दी जिसे सभागार में उपस्थित दर्शकों ने सराहा। कोलकाता अनुभव की सेक्रेटरी और प्रतिनिधि विख्यात अभिनेत्री एवं मूक अभिनेत्री कृष्णा दत्त ने अपने मूक अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। मूक अभिनेता कलाकार वैद्यनाथ चक्रवर्ती, रनेण चक्रवर्ती, रतन चक्रवर्ती, दिलीप भट्टाचार्य और स्वदीप भट्टाचार्य को दर्शकों ने बहुत पसंद किया तथा संस्था की सदस्या प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया । अंत में,हास्य नाटक 'ग-ए-गंडगोल' जिसमें सविता घोष, शीला चटर्जी, मौसमी पाल के साथ पंचानन दलाल ने अभिनय किया जिसे दर्शकों ने बहुत सराहा। इस कार्यक्रम का संचालन किया सुदीप्त राय ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

अर्चना संस्था ने मनाया योग दिवस 2022

योग से न वियोग रख!योग है पूजा:अर्चना संस्था ने मनाया विश्व योग दिवस - - - - - - - योग दिवस पर अर्चना संस्था ने कविता, गीत, संगीत आदि के द्वारा विश्व योग दिवस पर समाज को अपना स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहने का संदेश दिया। योग की महत्ता को प्रेरक शब्दों द्वारा कवि और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम के आरंभ में इंदू चांडक द्वारा सरस्वती वंदना से हुई। अर्चना संस्था स्वरचित रचनाओं के लिए अपना विशिष्ट महत्व रखती है। सभी रचनाकारों ने स्वरचित रचनाएँ सुनाई। योग से संबंधित रचनाओं के साथ वर्षा की रचनाएं भी सुनाई गईं। बनेचंद मालू नेे ज़िन्दादिल रहिए /जब तक / ज़िन्दा हैं।, योग है स्वस्थ जीवन जीने / का सुयोग, संगीता चौधरी ने हाइकु_रोजाना योग/ सुबह-शाम सैर/भगाए रोग।, थोड़ा आराम/ उचित खानपान /रहेंगे स्वस्थ।, रसना सुख!/अकारण उदर/भोगता दुख।, भेद समाया/सोना जागना/जल्दी/कंचन काया और दोहे, निशा कोठारी ने भोगी उल्टी राह पर , झूठे सुख को भोग।/योगी पल पल कर रहा , सच्चे सुख का योग।।/स्वस्थ रहे तन मन सदा, जीवन रहे निरोग।/जीवनचर्या ही अगर , बन जाएगी योग।/योग महज कसरत नहीं,गहरा है विस्तार।/सादा सच्चा संतुलित , हो आहार विहार।।/नियमित योगा ध्यान से,दूर क्लेश अरु कष्ट।/झूठी दौलत के लिए, सच्ची करते नष्ट।। /आठ अंग हैं यम , नियम, आसन प्राणायाम।/प्रत्यहार अरु धारणा, ध्यान ,समाधि सुनाम।।भारती मेहता ने योग से न वियोग रख!/योग है पूजा, मिटती इससे भ्रांति/मिलती आत्मिक शांति /मुखमंडल पर आ जाती कांति।, हिम्मत चोरड़़िया ने गीत- सागर जिसके पाँव पखारे, सुरपति करे बखान।/गूँज उठे धरती पर फिर से, जय-जय हिन्दुस्तान।।, कुंडलियां, सुशीला चनानी ने हाइकु-/स्वस्थ रखते/योग और संगीत/बना लो मीत, क्षणिकाएँ - मेधा मिल सकती है विरासत में /श्रम से /चमकाना पडता है /जैसे दिया तेल बाती सब हो /माचिस से जलाना पडता है और वर्षा गीत, विद्या भंडारी - हाइकु --प्राणायाम से हो/ सकारात्मक सोच / जीवन शान्त, प्रसन्न चोपड़ा ने संतोष का पीयूष पीकर मैं तृप्ति पा सकूंँ द्वार भीतर का है खोला मैं अंदर जा सकूंँ /नहीं एक सा जीवन सबका नहीं एक सा मन है भांँति भांँति के लोग मिले हैं यह मनुष्य जीवन है, मीना दूगड़ ने -ज्येष्ठ आषाढ़ की चिलचिलाती धूप उस पर चलती लू भरी गर्म हवाएँ । / और सुनहरी सांँझ ढले,पथिक हमआगे बढ़ चले। नौरतनमल भंडारी ने औरत/औरों को खुशियांँ देती है/खुद छुप छुप रोती है /उदास चेहरे पे,हॅसी आ गई/आप क्याआये,जिन्दगीआ गई।मृदुला कोठारी ने चलो जरा टहल आए तुम थामो मेरा हाथ मैं पकड तुम्हारी अंगुली उम्र के पथ पर चलो थोड़ा घूम आए, वसुंधरा मिश्र ने वारिश की ऋतु आई/चमकीली लड़ियांँ छाईं गीत, सुनाए ।इंदू चांडक ने कार्यक्रम का आरंभ सरस्वती वंदना से कई और कुंडलियाँ उठकर प्रातः काल जो, करते योगाभ्यास।तन मन उसका स्वस्थ हो, रोग न फटके पास।। दुर्लभ मानव तन मिला, रखें हमेशा ध्यान योग निरोग रखे हमें,कहता अब विज्ञान।।और वर्षा गीत सुनाया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

कविता - छत दिखती नहीं

छत दिखती नहीं मेरी छत से अब तुम्हारी छत तक भी दिखती नहीं पास थे जब तुम कभी अब दूर से भी दिखते नहीं आँखों से आँखों का मिलना बन चुका है अब सपना दूर होकर भी तब हमारा सब कुछ था केवल अपना समय की लकीरों में धुंधले उभरते प्रेम चित्र सहसा ही उभर उभर छा जाते प्रेम के हिंडोले में पेंग भरते रहे सीढ़ियों पर पचासों बार उतरते और चढ़ते रहे पैरों में असंख्य बिजलियाँ मचल हंँस खेलती रहीं साइकिल की घंटियाँ धड़कनों को झंकृत करतीं रहीं भावों की तरंगें गिलहरी बन मचल मचल लिपटती रहीं हाथों को जब तुम लहराते अमलतास फूल लद जाते ताल छंद लय के न जाने कितने ही गीत मुखर हो जाते कागज के उन टुकड़ों को जब भी पढ़ती थी बार बार मीठी कसक लिए युवा ऊर्जा के कर जाती कई समंदर पार अब छत पर वह उन्मुक्त चंद्र किरणें नहीं दिखाई पड़तीं हर श्वास-प्रश्वास अब पदचाप की आहट को नहीं ढूंँढती समय के साथ वह दवा भी अब काम नहीं करती तुम्हारा आना जाना मुस्कुराना महज यादों में बसी रहीं सच में, इन प्राणों में गीत संगीत और नृत्य अब भी है जीवित तभी तो अभी भी मन भीतर ही भीतर खिलखिलाता और मुस्कुराता रहता है गतिशील और मूर्त बन जीवन को चलाता रहता है प्रेम मरता नहीं है जीने की प्रेरणा बन मृत्यु के द्वार को खटखटाता है। हर पल अमरता और प्रीत के गीत गुनगुनाता है। छत अब टूट कर आकाश को छूने लगी है अब तुम्हारे लहराते वे हाथ भी न जाने कब से खो चुके हैं फुर्सत और प्रेम की वे आँखें न जाने कब से बंद हो चुकी हैं फिर भी भावों की फुलवारी में फूल तो खिलते ही रहेंगे छत न सही एसी के बंद कमरों में सही सिकुड़े मानस में सही जमाने से प्रेम भले ही बदलते रहे हों, प्रेम संस्कृतियां जीतती रहेंगीं

Monday, June 6, 2022

कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त पुस्तक पढ़ते हुए

कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त पुस्तक पढ़ते हुए - सृजन पथ के अथक पथिक- - - डॉ वसुंधरा मिश्र स्वाधीनता की लड़ाई में जिस पत्रकारिता का स्वरूप था आज उसमें बहुत बदलाव आया है। आजादी की पत्रकारिता एक महत उद्देश्य, सिद्धांत, मूल्यों और आदर्शों पर टिकी हुई थी। स्वाधीनता प्राप्त करना और देश प्रेम को सर्वोपरि स्थान देना उस समय के साहित्यकारों, कलाप्रेमियों, चित्रकारों, पत्रकारों के लिए एक राष्ट्रीय धर्म था।उन्होंने जो भी किया, देश को केंद्र में रखकर किया।जरूरी नहीं है कि हर युग की विचारधारा एक हो। समय परिस्थितियों के * कृपाशंकर चौबे की यात्रा की कहानी बलिया इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से होते हुए बंगाल की धरती पर फलीभूत हुई। वे व्यष्टि से समष्टि को जोड़ने के सेतुबंध तो रहे ही साथ ही मनुष्यता की संवेदना को जोड़ना उनका प्रथम उद्देश्य रहा। कृपाशंकर चौबे ने प्रतिबद्धता की संस्कृति को अपने जीवन की लड़ाई में चाहे वह साहित्य हो या पत्रकारिता, एक अहम भूमिका मानी। प्रो. चंद्रकला पांडेय जी के पहले काव्य संग्रह 'उत्सव नहीं है मेरे शब्द' की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं - - मेरी कविता जुड़ी रहना चाहती है अपने देश से देश से यानी दिल्ली मुंबई कोलकाता मद्रास जैसे महानगरों से नहीं दूर सुदूर के अनाम गाँवों आदिवासी बस्तियों इतिहास से उन्मूलित किए जाते कबीलों, जनजातियों और मिटाई जाती लोक संस्कृतियों से(एक शिनाख़्त पृष्ठ 343) कृपाशंकर के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व पर दृष्टि डाली जाए तो प्रतिबद्धता उनके विचारों और संवेदनाओं दोनों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। 'कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त' में महाश्वेता देवी ने उनके निबंध संग्रह 'समाज संस्कृति और समय' के बारे में लिखा है कि कृपाशंकर बंगाल के समाज और संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं।साहित्य समालोचक अमरनाथ का कहना है कि कृपाशंकर चौबे के लेखन की रफ्तार बहुत तेज है और उन्होंने हिंदी आलोचना जगत में आज अपनी खास पहचान बना ली है( पृष्ठ 5)।मदर टेरेसा के जीवन पर आधारित प्रोफेसर चौबे ने' करुणा मूर्ति मदर टेरेसा' और महाश्वेता देवी के जीवन और साहित्य पर केंद्रित 'महा अरण्य की मां' पुस्तक लिखी। ज़मीनी हकीक़त से जुड़े डॉ कृपा शंकर चौबे ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पुस्तक लिख कर अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। इसी प्रकार भारतीय कला सिनेमा में सत्यजीत रे के बाद चार्ली चैप्लिन एवं चलचित्र सिनेमा जैसी आधुनिकता से युक्त आदि पुस्तकें लिखीं। इसी प्रकार पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी 'राष्ट्र निर्माताओं की पत्रिकारिता' इन दिनों खास चर्चा में है। महात्मा गांधी की पत्रकारिता, गांधी के इंडियन ओपिनियन आदि के विषय में कृपाशंकर चौबे ने हिंदी बांग्ला दोनों को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्य किए। कृपाशंकर चौबे विविधता में एकता से पूर्ण साहित्य को महत्वपूर्ण मानते हैं। विविधतापूर्ण लेखन का मूल्यांकन इस पुस्तक में बहुत ही गंभीरता से हुआ है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विषयों के लेखक और लेखिकाओं का मूल्यांकन किया है। महाश्वेता देवी, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, केदारनाथ सिंह, हरिवंश, पवन करण, शेखर देशमुख, अभिषेक श्रीवास्तव, प्रभात ओझा, हीरालाल नागर, निर्मला गर्ग, मिथिलेश श्रीवास्तव, उमेश चतुर्वेदी, शर्मिष्ठा बाग, मृत्युंजय, वृषभ प्रसाद जैन, कृष्ण कुमार सिंह, अरुण होता, जय कौशल, सुरजीत कुमार सिंह, पलाश विश्वास, अग्नि शेखर, अरुण कुमार त्रिपाठी, विनय बिहारी सिंह ईश्वर मिश्र, विजय दत्त श्रीधर, बलदेव शर्मा, बलिराज पांडे, गिरीश पंकज, सिराज खान, राय बहादुर राय, राजेंद्र राव, राममोहन पाठक, तस्लीमा नसरीन,चंद्रकला पांडे आदि विभिन्न साहित्यकारों के साथ ही बुद्धिनाथ मिश्र, संजय द्विवेदी, गोपाल जी राय, अरविंद कुमार सिंह, अरविंद चतुर्वेदी, ओमप्रकाश अश्क, कौशल किशोर त्रिवेदी, संजीव भानावत, भवानी शंकर, संदीप कुमार दूबे, नंदनी सिन्हा आदि कृपाशंकर के व्यक्तित्व को जानते और समझते हैं। इसी प्रकार बहुत से विशिष्ट जनों ने कृपाशंकर चौबे के विषय पर बहुत कुछ लिखा जो उनकी विद्वत्ता उनकी तत्परता और उनके व्यक्तित्व को निर्धारित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनमें श्याम नारायण पांडे, अमरकांत, अमृतराय, नजीर बनारसी, विष्णुकांत शास्त्री, शिवप्रसाद सिंह, काशीनाथ सिंह, विद्यानिवास मिश्र, शिवमंगल सिंह सुमन, ठाकुर प्रसाद सिंह, कृष्ण बिहारी मिश्र, विवेकी राय, केदारनाथ सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, विश्वनाथ एन चंद्रशेखरन, नामवर सिंह, कल्याणमल लोढ़ा, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, जगदीश गुप्त, अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर और मदर टेरेसा आदि देश के सभी बड़े साहित्यकार, पत्रकार सभी शामिल हैं। कृपाशंकर चौबे के साथ रवि प्रकाश और हिमांशु बाजपाई की भी बातचीत मिलती है जो इस पुस्तक को और भी गौरवपूर्ण बनाती है 461 पृष्ठों की इस पुस्तक में संपादकीय के साथ-साथ अवदान, मूल्यांकन, व्यक्तित्व विशिष्ट जनों के पत्र, कृपाशंकर चौबे की रचनाओं से चयन, आत्मकथ्य संवाद लेखक परिचय और परिशिष्ट में विभक्त कृपाशंकर चौबे की शिनाख्त को एक बहुत बड़ा आया दिया गया है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर पूर्णता प्रामाणिकता का पूरा चित्र दिखाई पड़ता है अवधान और मूल्यांकन का पहला जो अध्याय है उसी में उसी में शिक्षक हिंदी के एक लेखक की दृष्टि में बंगाल जो महाश्वेतादेवी का मूल्यांकन है लेखक कृपाशंकर के लिए समाज संस्कृति और समय एक ऐसी पुस्तक है जो हिंदी में लिखी गई है और उसके लेखक है कृपाशंकर चौबे स्वयं महाश्वेता देवी ने कहां है की कृपाशंकर चौबे एक हिंदी भाषी लेखक होते हुए भी उन्होंने अपनी रचनाओं से प्रमाणित कर दिया है कि भिन्न भाषी होते हुए भी जो जिस राज्य में रहता है वहां के समाज संस्कृति भाषा और साहित्य पर गंभीर अनुशीलन कर सकता है मृणाल सेन की छाया लोग नजरबंद तस्लीमा करुणामूर्ति मदर टेरेसा चलकर आए शब्द पानी रे पानी और महा अरुण की मां आदि बहुत ही अच्छी किताबें हैं उनकी लिखी हुई जी चौबे को ऊंचाई पर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण है संवाद चलता रहे रंग स्वर और शब्द पत्रकारिता के उत्तर आधुनिक चरण कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी संदर्भ ग्रंथ के रुप में सम्मिलित किए गए श्री चौबे साहित्य अकादमी की जूनियर फैलोशिप समेत कई पुरस्कार से सम्मानित किए गए हैं सुभाष मुखोपाध्याय बांग्ला हिंदू सेतु शीर्षक से लिखा है कि मैं कृपाशंकर चौबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और उनकी पत्रकारिता गहरे सामाजिक अभिप्राय को लेकर चलती है सामाजिक विषयों पर भी चोट करते हैं तो मनुष्य मनुष्य के संबंधों को और मानवी के लिए संघर्षशील दिखते हैं सुनील गंगोपाध्याय जो बंगाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं उन्होंने हिंदी समाज में बांग्ला के दूध कहकर कृपाशंकर जी को सम्मानित किया है और लिखा है कि वह एक मौलिक लेखक है मैं अनेक समय हिंदी साहित्य जगत की खबरें उनसे प्राप्त करता हूं और नए लेखों के बारे में भी उन्हीं से मुझे पता चलता है उनके जैसा कोई लेखक किसी भी भाषा की संपदा के रूप में है बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं की रानी है केदारनाथ सिंह हिंदी के जाने-माने साहित्यकार हैं उन्होंने 11 नवंबर दो हजार आठ 2008 के इंडिया टुडे में कृपाशंकर चौबे के सामाजिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व पर अपनी बात लिखते हुए कहा था कि कृपाशंकर चौबे बांग्ला भाषा और संस्कृति में गहरी पैठ रखने वाले हैं और उनकी कृति समाज संस्कृति और समय विचार के कई स्तरों पर एक साथ सक्रिय दिखाई पड़ती है हरिवंश जी ने कृपाशंकर चौबे की 9 पुस्तकें और पांच पुस्तकों के विषय में बताया कि वे बहुत पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं और प्रभात खबर के शुरुआती दिनों के संघर्ष के साथी हैं आदरणीय कृष्ण बिहारी मिश्र जी शायद इसी प्रेम व यात्री के कारण कृपाशंकर को बलिया विभूति जी कहते हैं देशकाल और परिस्थितियां कैसे हमारे आसपास या संसार को गण बदल या प्रभावित कर रहे हैं यह समझना जानना आसान नहीं है एक संवेदनशील समझदार या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा बसा मन है या पर पीड़ा समझ सकता है बंगाल के दलित कोलकाता के चीनी मूल के बाशिंदे बाबा आमटे आनंदवन से लेकर अंडमान के लुप्त होते जा रहा लुप्त होती आदिम जनजाति पर विषयों की विविधता से भरा खंड संस्कृति खंड में 65 रचनाएं हैं कोलकाता के मशहूर पुस्तक मेला जाने-माने संस्थान नेशनल लाइब्रेरी मशहूर कॉलेज स्ट्रीट के पुस्तक बाजार पर कृपा को पढ़ते हुए नई चीजें जने को मिले प्रभात खबर में हरिवंश जी ने यह टिप्पणी 14 दिसंबर 2006 में पवन करें कृपाशंकर चौबे को एक पत्रकार तथा संवेदना से भरा साहित्यकार बताएं इंडिया टुडे में अपनी बात सही है और कृपाशंकर चौबे को पवन करण का मानना था की समय समाज और संस्कृति पुस्तक यदि आप पढ़े तो आपको गहरी बेचैनी से भरना शुरू कर देती है और आप इस पुस्तक का हिस्सा हो जाते हैं आपने सतर्कता और चौकन्ना पर भर जाता है इसका तथ्य गत प्रामाणिक और घटना गत वर्ष की हो ना आपको लेख धरले कैरियर स्पष्ट इसे भरता है मुनमुन मुनमुन सरकार जैसी युवा विदुषी बांग्ला हिंदी अनुवाद इता की असमय मृत्यु को स्वीकारने के लेखक की व्यवस्था पाठक को अपनी व्यवस्था लगने लगती है कट्टरपंथियों के निरंतर प्रहार झेलते विद्रोही लेखिका तस्लीमा नसरीन की दुर्दशा और संघर्ष अन्य भाषाओं के लेखकों और पाठकों को अपना संघर्ष और जद्दोजहद की तरह महसूस होने लगते हैं इसी प्रकार सिंदूर मुद्दे पर चढ़े उस आंदोलन तक चलकर आती है जिसने एक समय पूरे देश की नजर अपनी तरफ खींची उसी प्रकार बंगाल की क्षेत्र वादी मार्क्सवादी दृष्टि से बाहर निकल कर देखना तथा तथा से भारत के मानस के सामने लाकर रखना बहुत महत्वपूर्ण है क्या बंगला के प्रमुख शास्त्र और उल्लेखनीय कार बंकिम शरद ताराशंकर बिभुतिभूषण रवींद्नाथ विमल मित्र सत्यजीत राय महाश्वेता देवी नैना चक्रवर्ती शंख घोष सुनील गंगोपाध्याय मंदाक्रांता सेन सहित हिंदी के निराला प्रेमचंद रघुवीर सहाय केदारनाथ सिंह से राजेश जोशी तक पर लिखने के साथ-साथ बंगाल के कई सरकारों पर प्रमुखता और गंभीर समझ के साथ लिखने की वजह से कृपाशंकर चौबे को साहित्यकार तथा उनके लेखों को कविताएं या कथा कहता हूं तो जवाब लगा हां में ही निकलता है इसी प्रकार शेखर देशमुख जिन्होंने कृपाशंकर चौबे के लिए व्यक्तित्व चित्रण में महारत क्योंकि उन्होंने बहुत सी ऐसी घटनाएं और आम इंसान की संवेदना को दूसरों तक पहुंचाया है समय का अपना महत्व होता है समय के साथ चलने के लिए आसपास घट रही घटनाओं का सही अर्थ लगाना भी जरूरी होता है संवेदनशीलता के साथ-साथ दूसरों के प्रति सहानुभूति अगर हो भावनाओं के आधार की क्षमता हो दुनिया की तरफ देखने का नजरिया भी बदल जाता है व्यक्तित्व चित्रण चौबे जी का गढ़ रहा है चाहे वह पीड़ितों की मसीहा मदर टेरेसा हो भी वादी शांति क्यों हो या फिर विद्रोही साहित्यकार सुशील गुप्ता हो चौबे जी हर चीज के बारे में एक ही प्रकार का कौतूहल है व्यक्ति हो या घटना वही गुण उन्हें सहायता से रिश्ता कायम करने में मदद करता है अभिषेक श्रीवास्तव एक पत्रकार की बंगाल जाएगी शिक्षक में लिखते हैं कि पुस्तक के सभी लेखों में सांस्कृतिक चेतना अंतर नहीं थे लेखक ने आज महाश्वेता के सानिध्य में आदिवासियों को काफी करीब से देखा है और उनके मसलों से गहरी जुड़े बर्बर सभ्यता के बीच पश्चिम बंगाल के लोधा और खेड़िया आदिवासियों पर सरकारी दमन की एक रिपोर्ट है आदिवासियों के जीवन में लेखक की दिलचस्पी से बंगाल तक सीमित नहीं है उन्होंने अंडमान निकोबार के आदिवासियों पर भी अगला ही लिख दे दिया है इस खंड में दलितों और कोलकाता के असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों पर भी रिपोर्ट है हा करो और हाथ रिक्शा खींचने वालों की समस्याओं पर टिप्पणी है और पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था पर कुछ नोट्स है संस्कृति की छाव शीर्षक में प्रभात ओझा ने लिखा है कि कृपाशंकर की पत्रकारिता की आप प्रारंभिक प्रणाम प्रयोजन पत्रिकाओं का प्रतिज्ञा ओं का स्मरण हमें विकारों से लड़ने की शक्ति देता है मीडिया में जो विकार आ गए हैं उनमें कुछ स्वाभाविक है और उस परिस्थिति जन जब मीडिया उद्योग है तो उद्योगों की जो विकृतियां है वे इसमें सामने ही आएंगे क्योंकि उद्योग का काम धन कमाना है और व्यापार बढ़ाना है लेखक पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन की उन नीतियों की भी जमकर खिंचाई करता है जिस कारण एक तरफ तो विकास का ग्राफ पेपर बढ़ता दिखाई देता है दूसरी ओर फुटपाथ पर रहने वालों की संख्या भी बढ़ती है फिर ऐसा होने के पीछे लेखक वामपंथियों की ईमानदारी पर शक नहीं करता उत्तरी बंगाल के अलगाववादी आंदोलन को कुचलने के लिए वामपंथी सरकार के तरीकों को रेखांकित करने के अलावा वह उस जोशना सिंह पर मिलता है जिसने यह मानते हुए विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी इससे वह अपना परिवार नहीं चला सकते इसलिए जरूरी है कि नौकरी की जाए कृपाशंकर चौबे कोलकाता में चीनी समुदाय पर लिख सकते हैं तो पड़ोसी बांग्लादेश से हो रही समस्याओं पर भी टिप्पणी करते हैं उनकी लेखनी लेखनी समझ बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ मैत्री को महाद्वीप में शांति के लिए यूं ही जरूरी नहीं समझते उन्हें पता है कि इन दिनों दोनों देशों का जनमानस किस कदर एक दूसरे से संपृक्त है इन गंभीर विश्व में खेल फिल्म और रंगमंच के बहाने जब लिखो की श्रंखला शुरू होती है तो लेखक को इन विषयों की पकड़ का भी सबूत मिलता है राजेंद्र राव पत्रकारिता पर दस्ता वाजिद दस्तावेजी लेखन के रूप में मानते हैं मीडिया समय और संस्कृति में अर्चना शर्मा ने कहा है कि वैसे तो हिंदी में बहुत से साहित्यकार हैं जिन्होंने पत्रकारिता के मानदंड स्थापित किए हैं प्रेमचंद से लेकर या परंपरा रघुवीर सहाय आगे मनोहर श्याम जोशी से लेकर मंगलेश डबराल तक विस्तृत है परंतु पत्रकारिता में ऐसे कम लोग हुए हैं जो साहित्य के प्रति अपने उल्लेखनीय जिम्मेदारी समझते हैं पत्रकारिता की 72 भारतीय अवधारणा इस पुस्तक के दूसरे खंड संस्कृति में अपने पूरे शबाब के साथ निखर कर आते हैं साहित्य और संस्कृति के चिंतन के माध्यम से उन्होंने उत्तर भारतीय साहित्य की सच्ची तस्वीर सामने रखी है मीडिया संस्कृति और समय मैं अर्चना शर्मा कहती है कि इस खंड में सबसे चकित करती है लेखक की साहित्य की समकालीन तक अबोध और संभालता से संबंधित इस पुस्तक में 4 लेख हैं दो लेख बांग्ला साहित्य समकालीन तक का जायजा लेते हैं तो 2 लेख हिंदी साहित्य में समकालीन परिदृश्य पर एक सूची ंतत टिप्पणी करते हैं जरूरी कविता के समकालीन परिदृश्य में उन्होंने कविता गीत गजल दोहे मुक्तक सब को शामिल कर लिया जो साहित्य के विद्यार्थियों या जिज्ञासाओं के लिए थोड़ी परेशानी और असमंजस पैदा कर सकता है अरुण कमल मंगलेश डबराल राजेश जोशी के साथ में श्रवण सकता है इसे इसी दृष्टि और व्यापक के साथ स्वीकार करना चाहिए वहां एक जरूरी पुस्तक के रूप में लिखा है कि लेखिका महाश्वेता देवी को वर्ष 1997 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था तो शायद देश की 8% आबादी वाले आदिवासी इलाके को भी सम्मानित किया जा रहा था तो बहुत बड़ी बात है कि आदिवासियों के बीच मां की तरह पूजा और आदरणीय महाश्वेतादेवी एक तरफ से बहुत ही अद्वितीय कर्म कर्म कर रही थी महाश्वेता देवी ने आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किए चिकित्सा सिंचाई और स्वरोजगार योजनाओं का सूत्रपात कराकर महाश्वेता देवी ने आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई यह उन्होंने आजकल अक्टूबर 1998 में अपनी बात कही विश्वंभर नेवर अनूठी और सार्थक पहल बताते हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे बड़ी लकीर खींच कर लेखन में बाजी मारते रहे और दलित साहित्य और बांग्ला साहित्य पर इनकी संभवत पहली पुस्तक जो दलितों और जनजातियों के साथ अन्याय हो रहा है आज के समय की बड़ी चुनौती पर उन्होंने लिखा है हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में कृपाशंकर चौबे का कार्य बहुत ही सराहनीय निर्मला गर्ग उन्होंने कर्म के पीछे चलते शब्द यह मृत्यु का नहीं है मेरा देश मेरा देश मैं खिलाऊंगा अपने देश को सीने में छुपा लूंगा को हाथ से भीगी का संध्या और विसर्जन बांग्ला कवि भट्टाचार्य की कविता की ये पंक्तियां हैं लेकिन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी कहती हैं कि यही है मेरा देश दोनों के एक एक ही बात हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां शब्द के बीच गहरी खाई सच तो यह है शब्द की सामर्थ पर हमें भरोसा नहीं रहा इसके कारण हम कभी उपभोक्तावाद में ढूंढते हैं सभी उत्तर आधुनिकता के ऐसे मॉडल में जहां हर चीज का अंत निश्चित है चाहे वह इतिहास चाहे विचारधारा चाहे साहित्य को चुनौती दी है सतत कार्य महाश्वेता का परिचय देती है कृपाशंकर चौबे की किताब महाश्वेता देवी हिंदी भाषा प्लान जानने हैं रुदाली और हजार चौरासी की मां जैसी उनकी कथाओं पर हिंदी में फिल्में बन चुकी है हिंदी में उनका साहित्य अनुचित हुआ है पत्रकारिता साहित्य और संवाद के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय जीवन में आदिवासियों को सम्मानजनक स्थान और न्याय दिलाने के लिए उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान के लिए आदिवासियों के बीच उनके कार्य के लिए दिया आदिवासियों की मां आदिवासियों की बड़ी दीदी जैसे संबोधन से उन्हें संबोधित किया गया मिथिलेश श्रीवास्तव ने अपने रचना शीलता के संघर्ष शिक्षक में कहा उमेश चतुर्वेदी उपेक्षित जनों की मां कहा कृपाशंकर समय-समय पर उनसे बातचीत करते हैं और उनके विचारों से हिंदी जगत को परिचित भी कराते रहे हैं वहीं शर्मिष्ठा बाग में निर्वासन में भी तसलीमा का संघर्ष विषय पर जब अपनी बात कही तो यही सामने आती है कि निर्वासन में भी तस्लीमा को लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है नजरबंद तसलीमा कृपा शंकर जी की इस पुस्तक में उनके निर्वासन के संघर्ष देश से दूर देश के पास और नसरीना का साहित्य शिक्षक इन अध्याय का महत्व है जिसमें निर्वासन में लेखिका के संघर्ष का विशद विवरण मिलता है तस्लीमा लोकतंत्र मानवतावाद अभिव्यक्ति की आजादी और इससे मुक्त के पक्ष में लिखती है मिस्त्री को उसके मुकम्मल आजादी देने के पक्ष पाते हैं मित्रता पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व वाद की विरोधी हैं वैसे लेखिका हैं जो अपने हृदय की बात सही सही लिखते हैं इसकी परवाह किए बिना ही कुछ लोग नाराज होंगे मृत्युंजय ने दिग्गज का लोक में कहां है इंडिया जो इंडिया टुडे 28 अगस्त 2002 में आता है कि कृपाशंकर इस पुस्तक की एक खूबी है कि वह पथ से शुरू होती है कहना नहीं होगा कि नेट में हमेशा विचार भी रास्ता है और सम्मुख में प्रतिपल खुशकिस्मत से मेनाल से उनकी पैदाइश तब की है जब भारतीय समाज में विचारों की लहर चल रही थी मैंने उनसे उन्हीं विचारों की लहरों से टकरा टकरा कर युवा हुए पुस्तक का पहला अध्याय दृश्य के पीछे का जीवन इसका बयान पड़ता है 8 वर्ष की उम्र में बालक मृणाल सेन ने स्वाधीनता संग्राम के बारे में एक राजनीतिक संस्था का बोध जाता है और वह वामपंथी दिशा की ओर मुड़ते हैं यह राजनीतिक चेतना उन्हें कैसे सिनेमा से जन तक ले आए इसकी कथा दिलचस्प भाषा में कृपाशंकर जी ने लिखी है जिन्होंने अपनी टिप्पणी पर अद्भुत रचना कहते हैं कि कृपाशंकर चौबे दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य की भूमिका में अपनी बात लिखी है कि वर्ण व्यवस्था बहुत पुराने हैं जातियां परवर्ती काल में बनी जिसका आधार जन को माना गया वहीं से जाति भेद और छुआछूत ने जन्म लिया इस पर एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को आसान बनाने के भाव का जन्म जातियों के जन्म के साथ भारत में हुआ कन्नड़ कन्नड़ के प्रथम कंपनी के महाभारत महाकाव्य के नायक कर्ण का उदाहरण दिया जो स्वयं वर्ण व्यवस्था के उच्च नीच का शिकार हुआ था कन्नड़ के प्रसिद्ध कवित्री अक्कमहादेवी की कविता भी उन्होंने बताएं जो दलित की भूख पर उत्पन्न विषम परिस्थिति को दर्शाती है यह कविता भी बहुत है जिसमें उन्होंने इस प्रकार है इतना लिखते हैं मछली पकड़ने वाले थे जन्म से ही चिंता मत करो जाति की वास्तव में थे और दुर्वासा घाट से जूता पंक्तियों में ही पैदा नहीं हुए इतिहास गवाह है कि दलितों के घरों में भी पैदा होते रहे दलितों की भूमिका पर आधारित है जिसमें आधुनिक साहित्य और पत्रकारिता के संदर्भ में बहुत अच्छी तरह उपयोग किया गया है कृष्ण कुमार सिंह ने परंपरा और आधुनिकता का संगत बोध के हवाले से कहा है कि इस पुस्तक में प्रतिष्ठित पत्रकार ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पर गहन अध्ययन चिंतन किया है यही उसका ठोस प्रमाण है जिसमें बाबा साहब का शो चिंतित मत अंतर धारा के रूप में विद्यमान है मतवा धर्म की मान्यताओं के संक्षिप्त चर्चा भी की है जिसमें मतवा यानी जो मतवाले हैं जो जाति धर्म वर्ण से ऊपर उठे हुए हैं मध्यकाल में निर्गुण मार दी कबीर रैदास गुरु नानक दादू दयाल आदि संत कवि एक तरफ से मत वाले ही थे जाति धर्म की संकीर्ण गिरे बंदी को तोड़ने का एहसास मत वाले कर सकते हैं हरि रस पीकर मतवाले बने लोग भी ऐसी जगह पंडित से बाहर निकाल सकते हैं कबीर के शब्दों में मैं ममता घूमर रे ना ही तन को साथ दलित आंदोलन का विकास और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक में होता है बंगाली समझा जा सकता है जहां तुम ने उन्हें अपने आया है जहां तुमने उन्हें अपने आसन से खेल गिराया है वही तुमने अवहेलना से अपनी शक्ति को निर्वाचित किया है पैरों से रोंदे जाकर में धूल में पड़े हुए हैं उसी ने चाय तक उतर आओ नहीं तो परेशान नहीं अपमान में उन सब के समान होना है समाज की शक्ति के रात के लिए जिम्मेदार है तथाकथित उच्च जातियां समाज के नियामक स्वयं को मानने वाले लोग तस्लीम तस्लीमा नसरीन ने अपनी टिप्पणी हिंदी जगत से मेरा परिचय कराने वाले पेपर कहां है कि मैं गत 4 वर्षों से कृपाशंकर को जानती हूं और वह मेरे घनिष्ट बंधुओं में से है पता नहीं क्यों वह मुझे अपने छोटे भाई की तरह लगता है एक कुशल पत्रकार है लेखक है और सबसे बड़ी बात है वह मेरा स्वजन है आदमी मेरे अच्छे समय में जैसे वह मेरे पास रहा उसी समय मेरे उसी तरह मेरे दोस्त समय में भी साकरा हिंदी जगत के साथ मेरा परिचय कराने में कृपा को मैंने सदैव अपने पास पाया कृपा ने मेरे संग संग राम को अनेक लोगों से अधिक अंगीकार किया मेरे निर्वासन की यंत्रणा को लेकर मैंने कृपा को भावुक होते हुए भी देखा वह बड़ा मनुष्य मेरे बहुत निकट का मनुष्य 2009 26 अगस्त हो या बात तस्लीमा नसरीन अरुण होता है साहित्य आलोचना इतिहास और पत्रकारिता का समन्वित रूप इसमें प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे को एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न लेखक माना है उन्होंने बताया कि निबंध आलोचना और पत्रकारिता के क्षेत्र में कृपाशंकर जी एक चर्चित नाम है इनका लेखन आस्था प्रतिबद्धता और विवेक का संतुलन आस्था से चौक में की जरूरत नहीं है इसका आशय यह नहीं है कि जो आज के संदर्भ में धार्मिक अंधी आस्था है बल्कि आस्था में विवेक संबंधित है आस्था विवेक विवेक विवेक होती है जीवन और समाज में आस्था के साथ साथ विवेक का जितना है उतना ही लेखक के संसार में लेखक ने हास्य के साथ समाज के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता दिखाई है दलित विमर्श के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में चौबे जी ने एक कविताओं की रचना की है दलित विमर्श के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए उनका अध्ययन क्षेत्र बंगला साहित्य में दलित चिंतन है इसलिए इन ग्रंथों का चयन करना सो उद्देश्य है श्री मोहन सेन की भारतवर्षीय जातिभेद स्वपन कुमार की भारतीय समाज एवं धारा डॉक्टर अंबेडकर का बौद्ध धर्म सिंधु हड़प्पा कालीन भारतीय धर्म तथा भारतवर्ष के मूल निवासियों और और चिंतन नकुल मलिक की भारत चिंता कपिल कृष्ण ठाकुर कीमत हुआ आंदोलन और बांग्ला नूतन समाज चित्र मंडल पर मंडल द्वारा संपादित बांग्ला दलित आंदोलन इस विश्वास के संपादक में प्रकाशित दलित साहित्य जैसे महत्वपूर्ण कृतियों से गुजर कर उन्होंने अपने दलित संबंधी संकल्पना स्वरूप विश्लेषण को पुख्ता बनाया है इसी प्रकार वेद पुराण मनुस्मृति आदमी भी भारतीय जीवन के आधार जाति समाज बनाम पक किए हैं