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Sunday, October 17, 2021

दस द्वारे का पिंजरा अनामिका के उपन्यास की समीक्षा

दस द्वारे का पिंजरा को पढ़ते हुए - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता 'स्त्री की मुक्ति भी स्त्रीलिंग ही तो है! कभी अकेली नहीं मिलती! हरदम वह झुंड में ही हँसती - बोलती है। थेरियों का झुंड हो या जैन साध्वियों, चिड़ियों और स्त्रियों का यह बृहत्तर सखा- भाव रमाबाई को हमेशा ही आकर्षित करता!' भारत ही नहीं, विश्व में पितृसत्तात्मक प्रधान समाज रहा है। स्त्रियाँ को कभी भी समानता और अधिकार का स्थान अनायास ही नहीं मिला,उन्हें अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ी तभी उन्हें स्थान मिलता रहा, यह समाज में चलने वाली अनवरत प्रक्रिया है। स्त्री मुक्ति कब से माना जाए यह साहित्य और समाज दोनों की विडम्बना है। जब इस पर बात होती है तो स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर ज्योतिबा फूले, महादेव रानाडे, केशवचंद्र सेन, भिखारी ठाकुर आदि बहुतेरे समाज सुधारक जिन्होंने ने समाज की उपेक्षिता स्त्री वर्ग की समानता की ओर ध्यान खींचा। फ्रैंच लेखिका सीमन बोउवार ने 1949 में 'स्त्री उपेक्षिता' पुस्तक लिखकर स्त्री समाज की कड़वी सच्चाई को सामने लाने का कार्य किया। स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता को लेकर बहुत से कथाकार, साहित्यकार, लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से मुहिम चलाई है। अनामिका ऐसा ही सशक्त नाम है जिन्होंने एक ही समाज की दो प्रकार की स्त्रियों के चारित्रिक विवेक को जातीय और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपने उपन्यास 'दस द्वारे का पिंजरा' में विस्तार से चर्चा की है। वेद, उपनिषद, स्मृति, आदि से लेकर भारतीय संस्कृति और दर्शन के विभिन्न विषयों पर इस उपन्यास में चरित्र के अनुसार चर्चा हुई है जो लेखिका के गहन अध्ययन को दर्शाता है ।भारतीय समाज चार जांतियों में बंँटा हुआ है जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं लेकिन यह बंँटवारा यहीं तक सीमित नहीं है। पितृसत्तात्मक बहुल समाज में सभी जातियों की स्त्री के भी बराबर वही वर्ग रहे हैं। उच्च वर्ण और जाति व्यवस्था में स्त्री का स्थान भी उसी क्रम में मिलता है। उच्च वर्ण की स्त्रियों को समाज में ऊँचा और नीची जाति की स्त्रियों से निम्न श्रेणी का माना जाता था अभी भी इस सोच में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। बड़े-बड़े समाज सुधारक अपनी घर की स्त्रियों के साथ भी उपेक्षा के भाव रखते हैं क्योंकि वे स्त्री जाति की हैं, वह माँ, पत्नी आदि कई रूपों में प्रयुक्त होती रही है। एक रूप उसका सिर्फ देह का है जो समाज में उसके कुलीन और अकुलीन वर्ग को निर्धारित करता है। अनामिका का उपन्यास 'दस द्वारे का पिंजरा' उपन्यास का लेखन किस्सागोई की तर्ज पर एकत्रित की गई दो कथाओं का जोड़ है। 'आधारशिला' के अॉफिस में जहाँ बच्चों के लिए कथासत्रम् चलता है। बच्चों को महान प्राणियों के जीवन, भूत-प्रेत, पारलौकिक अनुभव से लेकर वैज्ञानिक आविष्कारों, मुकदमों और स्कैनडलों तक के किस्से सुनाए जाते हैं। मनोचिकित्सक डॉ स्पंदन आधारशिला के कथासत्रम् के सम्मानित अतिथि हैं। शीरीन पुणे संस्थान से दस साल पहले निर्देशन का कोर्स की थीं। यहांँ फिल्म पर भी काम कर रही हैं। फिलहाल दो फिल्में बनाने का प्रोजेक्ट है जिसे शीरीन को बनाना है। दो स्त्री चरित्र - एक पंडिता रमाबाई पर और दूसरी उनकी पट्टशिष्य ढेला बाई पर, जो स्त्री के संघर्षों के साथ ही नए मूल्यों को स्थापित करती है। प्रथम बार साहित्य अकादमी का पुरस्कार अनामिका को मिलना भी साहित्य क्षेत्र की प्रगतिशीलता का परिचायक है। उपन्यास दस द्वारे का पिंजरा 'सैल्वेशन' से लेकर 'लिबरेशन' तक स्त्री मुक्ति के कठिन रास्तों से गुजरती स्त्रियों की सजग दास्तान है। पुरानेपन के आवरणों में उघाड़ती ढकती स्त्री के विभिन्न रूपों को स्थापित करने की कथा इस उपन्यास में आरंभ से अंत तक दृष्टिगोचर होता है। एक फिल्म की रील यह कथा मुजफ्फरपुर में ढेलाबाई की 'जोगिनिया कोठी' ( पृष्ठ 14)से होकर निकलती जो उपन्यास की केन्द्रीय धूरी है जहांँ अब 'आधारशिला, का मुख्य दफ़्तर हो गया है। शीरीन का घर बिहार ही है। उसकी माँ काननदेवी का लिखा रेडियो नाटक रमाबाई वाली फिल्म की पटकथा के लिए उसके सामने पड़ा है। शीरीन के पति और बच्चों को डॉ स्पंदन की 'निःस्वार्थ सेवा' और' अहैतुक प्रेम' के कारण उनका आना अच्छा लगता था क्योंकि यही 'दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति' है। चकलेघर की ढेला बाई और एक आचार्य पंडिता स्त्री रमाबाई के जीवन भर के अनुभवों को अनामिका ने किस्सा के बहाने बहुत ही सूक्ष्म मानवीय दृष्टि से उकेरा है। प्रथम खंड में ही' चकलाघर की एक दुपहरिया' कविता में वे विवस्त्र स्त्री की बात करती हैं जो विद्याविनोदिनी संस्कृत पढ़ रही हैं। वह आम्रपाली की तरह है, विदूषी भी है - - - पर पाप होता है क्या? खुल जाती है ऋतु संभोग से बंदी शाला, छा जाता है अंधकार, सार्थवाह, लेकिन उस मेधायित अंधकार में भी कुछ द्युतियांँ तो होती ही हैं निराकार! ' उपन्यास में भारतीय समाज के एक ऐसे कालखंड को लिया गया है जब देश नवजागरण के दौर से गुजर रहा था और देशवासियों में देश के कुसंस्कारों और कुप्रथाओं से आजादी प्राप्त करने की मुहिम चल रही थी। ब्रह्म समाज अपने सनातन हिंदू धर्म की मूल भावना के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ था। उसी समय धर्मांतरण, जातिवाद, सती प्रथा, स्त्रियों का अपमान आदि अनेक समस्याओं के साथ अंग्रेजियत के भक्त,गांधी जी के अनुयायी, राजनीति, देशभक्ति, स्त्री दुर्दशा, जातिप्रथा, समाजसुधार आदि प्रमुख विषयों को केंद्र में रखकर समाज के विकास के लिए प्रयास किए जा रहे थे। प्राचीन और नवीन के सुंदर सामंजस्य पर लिखे नाटकों का मंचन किया जा रहा था जिनमें कहीं प्रेम का आदर्श था, कहीं देशदशा, कहीं देशी रजवाड़ों की कुचक्र पूर्ण परिस्थितियां या तत्कालीन पांखडमय धार्मिक और सामाजिक जीवन के विभिन्न रूपों को सुधिजन जागरूकता अभियान के तहत लिख रहे थे। इस उपन्यास में ज्योतिबा फूले के' सतसार 'नाटक का मंचन उपन्यास की नायिका 'पंडिता रमाबाई ' को केंद्र में रख कर किया गया है। रमा बाई ने इंग्लैंड में जाकर हिंदू धर्म और ईसाई धर्म का तुलनात्मक अध्ययन किया और पाया कि हिंदू धर्म का स्वरूप घमंडी और पक्षपातपूर्ण रहा इसी कारण उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया । रमा बाई की बेटी मनोरमा और उसका साथी गिरिधर दोनों ज्योतिबा - सावित्री के' सतयशोधक समाज' के कार्यकर्ता बन कर आते हैं।इस नाटक के माध्यम से' सत्यशोधक समाज' के एक अन्त्यज समाज के एक सदस्य और गृहस्थ ब्राह्मण के बीच बातचीत से आरंभ होती है। ब्रह्म समाज के ब्रह्म का मतलब जहां जातिभेद है ही नहीं। हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म में धर्मांतरण क्यों किया विदूषी रमा बाई ने। 'हिंदू धर्म के निर्माताओं ने नारी और शूद्रातिशूद्र जातियों पर किस - किस प्रकार की आग उगली है, उनपर कितने कठोर प्रतिबंध लगाए हैं, उनके संबंध में कितने प्रकार की जुल्मी बातें लिखकर रखी हैं, यह सब उस बेचारी भोलीभाली विदूषी रमाबाई को क्या मालूम था!'(दस द्वारे का पिंजरा, पृष्ठ 125) उपन्यास में विदूषी स्त्री रमाबाई बचपन से ही तर्कशील और बुद्धिमति रही हैं। यह उनके पिता पंडित अन्तशास्त्री डांगे द्वारा ही संभव हो सका जिन्होंने स्वयं आन्ध्र के गंगामूल आश्रम को पौराणिक अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित किया। वे अपनी पत्नी और पुत्रियों को भी शास्त्र पढ़ाते और गूढ़ विषयों पर विचार विमर्श करते।इसी कारण महाराष्ट्र के अपने ब्राह्मण समाज से जाति बहिष्कृत किए गए। तेरह वर्ष की उम्र में ही मदुरै मंदिर के प्रांगण में 'देवीसूक्त' रहस्य पर बड़े-बड़े पंडितों के सामने रत्नावली ने अपना विचार रखा, देवताओं के चाल-चलन पर भी सवाल उठाने का साहस किया जिसके कारण अनंतशास्त्री को सभी ने धिक्कारा। समाज में धर्म के सही रूप को समझना संकीर्णता और असहिष्णुता माना जाने लगा है। धर्म की बात जब आती है तो जिस देवता को हम गढ़ते हैं उसके संस्कारों को गढ़ने में हमारी ही भूमिका है। 'देवता भी मानवीय मूल्यों के वाहक हैं' एक स्त्री को पुरुषों के समाज में खुल कर बोलने की भी स्वतंत्रता नहीं है जबकि वाणी की अधिष्ठात्री देवी स्वयं भी तो स्त्री काया में हैं। रमा बाई पंडिता बन जाए यह पुरुष पंडित समाज कैसै स्वीकार करता। अनंतशास्त्री बाल विवाह के विरोधी थे इसलिए अभी अपनी पुत्री के विवाह के विषय में भी नहीं सोचते , उन्हें गैर ब्राह्मण जाति के सदाव्रत की बुद्धि से सरोकार था , उसकी जाति- कुल- गोत्र से नहीं। पिता रमा बाई और सदाव्रत दोनों बच्चों को आश्रम में एक साथ ही पढ़ाते।पिता का कहना था कि आगे चलकर यदि 'अस्तेय, अपरिग्रह, सत्य, मेधा और शील से पूर्ण सदाव्रत रमाबाई का हाथ मांगता है तो सहर्ष स्वीकार्य होगा। ये बात अलग है कि आगे चल कर रत्नावली की माँ ने ही सदाव्रत को हमेशा के लिए अपने परिवार और पुत्री से दूर कर दिया। अपने पुत्र श्रीधर , बड़े जामाता को ही प्रमुखता दी। जबकि पूरे परिवार के कष्टपूर्ण समय में सदाव्रत ने जी जान लगाकार सेवा धर्म निभाया। मॉं लक्षमी बाई समाज के कुसंस्कार और संकीर्णतावादी मानसिकता से उबर नहीं पाई।उन्होंने सदाव्रत को बहुत ही भारी मन से अपनी पुत्री से सदा के लिए दूर रहने के लिए वादा लिया। सदाव्रत घूरे पर पड़ा हुआ मुरुगन अप्पा को मिला था उसके कुल गोत्र का पता न था। सतमासा अनाथ बच्चा था जिसे अनंतशास्त्री ने पाला था। अप्पा कमिशनरानी मेमसाहब के साथ कुक बनकर ब्रिटेन चले गए। वहाँ उनका ईसाई धर्म में धर्मांतरण करवाया गया। बहुत सारी घटनाएं घटित होती हैं - बालसखा सदाव्रत का इंग्लैंड से बार ऐट लॉ बन कर लौटना(दृश्य 15), इंग्लैंड में भी धर्म की परिभाषा में बदलाव जहां 'मानवधर्म'भी गिरजाघरों और दूसरे दिव्य स्थानों की सीढ़ियां उतरता हुआ सेकुलर साहित्य की डॉरमेटरी में रहने लगा है (द्वारे. पृष्ठ 66), स्वामी दयानंद, केशव चंद्र सेन, जस्टिस रानाडे, सिस्टर गेरेल्डाइन, दादा साहेब, फैनी पॉवर्स आदि कई लोगों के विचारों को मेरी रत्नावली ने अपने दृष्टिकोण और विवेक से समझा। "मानव मात्र से प्रेम करने की कला है धर्म: मनुष्य काला हो या गोरा, पीला हो या लाल, श्वेत हो या गुलाबी - - आवरणों के पार देखना,देखकर पहचानना और सबके जलतत्व, अगनितत्व, पवनतत्व, आकाशतत्व,महीतत्व से एका बिठाना - - यही धर्म है। वेद, बाइबिल, कुराआन और दुनिया के और सभी महाग्रंथ जिन बातों पर सहमत हैं, वही धर्म है - - - प्रेम और सद्भाव, अहिंसा, सेवा और परदुखकातरता! - - - - वृहत्तर मानवता की सेवा हो - - - सहीधर्माचार यही है! मानवसेवा ही हरिसेवा है। मनुष्य की मूर्ती ही ईश्वर की मूर्ती है! '(पृष्ठ 63) रत्नावली के साथ प्रेम के प्रथम स्पर्श को महसूस करने पर सदाव्रत ने जीवन का यह रहस्य समझा कि' समाज एक ऐसा कटखना बाप है जिसे किसी की भलमनसाहत पर जल्दी भरोसा नहीं होता। संयम की कोमल लता को धीरज का कड़ा तना अवलंब के रूप में अँकवारना ही पड़ता है! इन कड़े सवालों का उत्तर समय देगा!' (पृष्ठ 31)स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए रमा बाई के माध्यम से अनामिका ने उपन्यास में एक आंदोलन की शुरूआत की है जहाँ स्त्री का अपना सम्मान होगा। इसलिए बेसहारा स्त्रियों की खातिर रमाबाई ने एक मुक्ति मिशन या सिस्टर्स होम की तर्ज पर पूणे में'शारदा सदन ' की स्थापना की जिसमें महात्मा ज्योतिबा फूले ने उसमें स्कूल चलाने की अनुमति दी। और विधवा के अधिकार विनियोजन के प्रश्न पर बड़े-बड़े पुरोधाओं से लोहा लेने में भी जुट गईं। (पृ109) सावित्रीबाई फूले 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' में बलात्कार की शिकार औरतों का साफ-सुथरा और सुरक्षित प्रसव का कार्य कर रही थीं। शारदा सदन में विधवा स्त्रियाँ अपने जीवन की तकलीफों को भूल मुक्त रूप से कार्य कर सकती थीं। , काश! पुरुषार्थ स्त्रियार्थ भी होते 'चार पुरुषार्थों की बात चलने पर मनोरमा रमाबाई की बेटी चुटकी लेती। (पृष्ठ 111)।रमाबाई अपने वैधव्य से भी संघर्ष करती है अपनी बेटी को इंग्लैंड में मिशनरी में शिक्षा दिलवाती है लेकिन साथ में भारतीय धर्म और समाज की कहाँनियों से समृद्ध भी करती है। यही कारण है कि मनोरमा उसकी माँ के सपने को पूरा करने में उसका साथ दे रही है। पिता सदाव्रत की मृत्यु का कारण भी ज्योतिबा फूले के विरोधी दल ही थे। रुकमाबाई वाला मुकदमा भी बंबई पूणे में हलचल मचा रखा था।डॉ. आनंदी बाई जोशी जैसी स्त्रियाँ कैसे डॉक्टर बनी। बहुत से ऐसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कथाकार ने भारतीय धर्म समाज की थोथी बातों को ध्यान में लाने की कोशिश की है जहां स्त्रियाँ अभी भी अंधेरे से बाहर निकल नहीं पाईं हैं। रमावती कथा की समाप्ति के साथ ही दूसरी प्रस्तावित फिल्म ढेलाबाई के लिए शीरीन कच्चा माल तैयार करने की खोजबीन शुरु कर देती है। बाबा लोहासिंह जो अपने जमाने के रेडियो नाटक आदि के कलाकार थे। उनके मुँह से उनके जमाने की कुछ सच्ची कहानियों के विषय में जानकारी ली गई है । बतकही शैली में पूरी कहानी चलती है। खुदीराम बोस की फांसी और अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'तिरहुत कैरियर' , साहित्य सम्मेलन हिंदी भाषा, प्रचारिणी सभा, नवयुवक समिति आदि के कई घटनाओं के बारे में बताते। बाबा जब आठ-नौ साल के थे तब की बातें हैं।उन्हें झनको हलवाइन की सुनहरी जलेबी याद आती हैं। रेडियो स्टेशन पटना से आने वाला नाटक 'लोहा सिंह नाटक' उनकी लोकप्रियता का कारण रहा। उसी समय जनकवि महेन्दर मिसिर की प्रिय शिष्या ढेलाबाई की माँ, अफसाना बाई से भी उनका याराना था। उनके दिवालिएपन में अफसाना बाई ने उनकी दो बीवियों के परिवार को भी चलाया। बातों ही बातों में न जाने कहाँ पहुँच जाते। आरा से आकर मुजफ्फरपुर रहने लगे लोहा सिंह क्योंकि उनके बाबू कुँवर सिंह का निधन हो गया था - दमनचक्र में सभी साथी पकड़े गए या इधर-उधर छिप गए। उनके दादा रामफल सिंह ने दूरस्थ रिश्तेदार रुद्र जी के यहाँ आश्रय लिया। (पृष्ठ 136-37)खुदी राम की फांसी का विराट दृश्य देखने वाली उन आंखों ने उस आजादी के दिवाने की उस पीड़ा को देखा जहाँ अपने प्राणों की चिंता नहीं थी बल्कि निर्दोष परिवार के छिन्न भिन्न होने का अफसोस था। बेरिस्टर कैनेडी अंग्रेज़ी का साप्ताहिक निकालते थे उन्ही की पत्नी और दो बेटियाँ खुदीराम बम कांड में अकारण मरी थीं। 'ऐसे लोगों की आंखों में क्या होता है जो अपनी जान हथेली पर लेकर निकलते हैं। बृहत्तर उद्देश्य की खातिर कुछ जाने चली भी गईं तो क्या... खेत तामते तामते कितने निरीह जीवजंतु बेवजह ही कुचले जाते हैं'। (पृष्ठ 138) इस बतकही में एक अद्भुत जोडी़ - महेन्दर मिसिर और ढेलाबाई की कथा सुनाते हैं जिसमें विस्फोट और आंदोलन दोनों ही हैं, वे जितने बाहर हैं उतने ही भीतर भी। 'कैनेडी साहब थियोसोफिकल लॉज में लेडबीटर साहब के साथ ही रहने लगे थे और वह स्थान भूत बँगले के नाम से प्रसिद्ध हो गया। वहाँ एनी बेसेंट, डिक क्लार्क, मास्टर मोर्या, मास्टर कुथोमी, मैडम ब्लावत्सकी और तिब्बत के महाप्राण बौद्ध संतों के अनगिनत महाग्रंथ पुस्तकालय के ढंग से सजाए गए थे' (पृष्ठ 139) यह वह समय था जब पूरे विश्व में भौतिक, आधिभौतिक क्रांति चल रही थी। व्यक्ति को अपने भीतर शांति, प्रेम और निःस्वार्थ अहिंसात्मक क्रांति के लिए संकल्प लेने की आवश्यकता थी। साथ ही रिटायर्ड फौजी लोहासिंह भी अपने भीतर ऐसी ही क्रांति का जज्बा रखने वाला था। उस समय हिंदी के सब जनपदों में नए युवक-युवतियों का मन नए नए सपनों और संकल्पों से भरा हुआ था। राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, बाबू शिवपूजन सहाय, श्री नलिन विलोचन शर्मा हिंदी का अलख जगाने का काम कर रहे थे। भोजपुरी मागधी अंगिका बज्जिका मैथिली आदि लोकभाषाओं के जनकवि जननाट्यकार लोगों को जागरुक कर रहे थे। लोहासिंह सूत्रधार है जो रेडियो स्टेशन के जाने-माने अभिनेता और निदेशक रहे और अब रिटायर्ड होकर जोगिनिया कोठी आ गए!( पृष्ठ 144) ।थोड़े से बावले और फकीर लाल बुझक्कड सी बातें करते लोहासिंह। कभी महेन्दर मिसिर, कहीं सत्याग्रही कहीं भिखारी ठाकुर के संवाद या फिर गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन और महेन्दर मिसिर बन जाते। 1942 में बाबू हलवन्त सहाय की कोठी पर लोहासिंह ने बारह वर्ष की अवस्था में ढेलाबाई को देखा। ढेलाबाई उस समय चालीस वर्ष की होंगी। लोहा सिंह की मौसी गंगा ढेलाबाई की खासमखास दाई थीं। 1917 में सोनपुर के मेले से महेन्दर मिसिर और उनके पहलवान साथी ढेलाबाई को उठा लाए थे-दोस्ती के तबोताब में! मुख्तार साहब का दिल ढेलाबाई पर था लेकिन ढेलाबाई महेन्दर मिसिर की दिवानी थी। महेन्दर मिसिर भोजपुरी के भारतेंदु कहलाते थे। मुक्ति मिशन से ढेलाबाई का जुड़ना, मुक्ति शब्द सैलल्वैशन और लिबरेशन दोनो अर्थों में कितना व्यापक है,कई आंदोलनों का जिक्र जैसे निलहा आंदोलन जिसमें लोहासिंह गांधी जी के अनन्य सहायक थे और उनके बाबा निलहा कोठी के मैनेजर थे। मुजफ्फरपुर स्थित जोगिनिया कोठी में ढेला स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय इस बात का द्योतक है कि कुछ था जो बहुत ही पुराना था और कुछ ऐसा जो बार बार ढह जाता था। (पृ 149)। उपन्यास में आई बहुत - सी घटनाओं का सम्मिलन ढेला बाई के चरित्र को उजागर करने में मदद तो देता ही है लेकिन एक कोठा वाली स्त्री का समूचा जीवन अंत तक अपने अस्तित्व की लड़ाई स्वाभिमान के साथ लड़ती वह उसकी विशिष्टता है। खदेरन को फादर, और वह प्रेताक्रांत थियोसॉफिकल लॉज, कच्ची पक्की, अथक्रांति कथा , ढेला स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, मुजफ्फरपुर, खैनी की चुटकी ले बाबा उवाच, ढेलाबाई (1900-1917),पहला किस्सा, पीरजी घसियारे का ठट्ठा, पीकी बोली न बोल,इस मुताल्लिक फरसिया हुक्के का बयान, महेन्दर मिसिर आम -महुआ संवाद, परेवा कुँवर - मेरा जिया जाने, जैसे उड़ि जहाज को पंछी, महेन्दर मिसिर :घर - घरौआ, ढेलाबाई, महेन्दर मिसिर, बाबू हलवंत सहाय, ढेलाबाई (1945-1950),द्वितीय खंड, अफसाना बाई आदि लगभग 29 भागों में कथा आगे कड़ी की तरह जुड़ती चली जाती है। तवायफो़ के जीवन संघर्ष की दास्तान है दस द्वारे का पिंजरा उपन्यास ।ढेलाबाई की नानी अफसाना बेगम एक बड़ी शख्सियत रही हैं। उनका कोठा सिर्फ देह धंधे की ही स्थली नहीं है बल्कि उनके जैसी कई और बदनसीब औरतों की मुक्ति का भी द्वार है। पंडिता रमाबाई द्वारा स्थापित' मुक्ति मिशन' तवायफो़ को अपने जीवन के मायने समझाने की पाठशाला है जहांँ वे अपनी शक्ति का उपयोग कर सकती हैं। तवायफो़ का गुप्त संगठन रात में देह धंधे से कमाये पैसों से क्रांतिकारियों की मदद करता है, समाज सेवा से जुड़ा संगठन है। ढेलाबाई की नन्ना यानी अफसाना बाई अपने घर में क्रांतिकारियों को आश्रय देती है। देश की आजादी के लिए देशव्यापी सत्याग्रह की लहर का असर चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधी जी लड़ाइयाँ लड़ चुके थे। अंग्रेज देश को स्वराज या उससे मिलते - जुलते कुछ अवसर जरूर देगें ऐसा मोंटेन और लॉर्ड चेम्सफोर्ड की समिति रिपोर्ट से लगा था लेकिन उसी समय रॉलेट कानून आया जिसने आम नागरिकों के भी अधिकार छीन लेने की तैयारी थी। (पृष्ठ 220)हिंद स्वराज और स्वराज प्रतिबंधित कर दी गईं लेकिन गाँधी जी खुद किताबें बेचकर कानून भंग कर रहेथे। कानून भंग के दूसरे दिन महादेव भाई के साथ गाँधी जी गिरफ्तार कर लिए गए। फिर जलियांवाला बाग हत्याकांड घटा। इसी तरह पूरे देश झुलस रहा था। मुजफ्फरपुर कीअपूर्व सुंदरी और मशहूर नृत्यांगना ढेलाबाई को बाबू हलुवंत सहाय की उपपत्नी का दर्जा दिलाने में महेन्दर मिसिर ने पूरा सहयोग किया। जनकवि सुदर्शन महेन्दर मिसिर छह फुट लंबे - तगड़े कसरती बदन वाले पहलवान थे। साथ ही संस्कृत काव्य की भक्ति और श्रृंगार से पूरा परिचय था।' हलुवंत सहाय की जमींदारी का कामकाज संभालते कोठी पर पूजापाठ और महफिल जमती तो उसमें चार चाँद लगाते। (पृष्ठ 155)रसिक हलुवंत सहाय का दिल ढेलाबाई पर था। महिन्दर मिसिर ने सोनपुर में लगने वाले सावन मेले से ढेलाबाई को अगवा कर ले आए। पर ढेलाबाई महेन्दर मिसिर पर मरती थीं। कथा के सूत्र मोड़ लेते हैं। बहुत कुछ घटता है। बीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में भोजपुरी अंचल की तत्कालीन परिस्थितियों में क्रांतिकारियों का बोलबाला था। 'राजकुमार सुकुल ब्रजकिशोर प्रसाद मौलाना मजहरूल हक बाबू राजेंद्र प्रसाद डॉ सैयद महमूद जयप्रकाश नारायण जगलाल चौधरी भोजपुरिए बाबा रामोदारदास उर्फ राहुल सांकृत्यायन के साथ गाँव - गाँव घूमकर अलख जगाने में व्यस्त थे - -' हमरा नीको ना लागे रामा, गोरन के करनी रुपिया ले ग इले, प इसा ले ग इले, ले ग इले सगरी गिन्नी ओकरा बदला में दे ग इले, ढलुई के दुअन्नी' (पृष्ठ 156)। महेन्दर मिसिर ने क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद की। जाली नोट छापे , जेल गए। स्वामी अभयानंद जी ने मिसिर को साहसी और देश के खातिर जान देने वाला समझ कर अपनी टोली में शामिल किया। महेन्दर मिसिर के गीत खत्म होते होते रोज रात अंग्रेजों पर धावा बोला जाता। बाद में उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने भी जाल बिछाया। पं. मिश्र की रिहाई के लिए अदालत में सैकड़ों वेश्याओं ने गहनों की पोटली और चांदी के सिक्कों के गट्ठर लेकर जज से गुहार लगाई। ढेलाबाई ने मशहूर बैरिस्टर हेमचंद्र बनर्जी को वकील नियुक्त किया।ढेलाबाई ने उनके लिए अपनी सारी संपत्ति लुटा दी। लेकिन मिश्र जी अपने अपराध से नहीं मुकरे और सात साल जेल में काटे। 25 अक्टूबर 1946 से फिर ढेलाजी के मंदिर में महफिल जमीं और उस जगह पर बैठे जहां बैठकर ढेलाबाई उनके गीत और भजन सुनती थी वहीं हारमोनियम पर शिव जी के भजन के समाप्त होते ही वे परलोक सिधार गए। ये ढेलाबाई के प्रति उनके प्रेम की पराकाष्ठा भी थी और पश्चात्ताप का प्रायश्चित था। ऐसा प्रेम प्रसंग संभवतः ही किसी उपन्यास में आया हो। ढेलाबाई को हलुवंत सहाय ने पत्नी का दर्जा नहीं दिया और ढेलाबाई भी साथ रहीं बेमन से। अंत में, उन्हें पत्नी का सम्मान मिला जो उनके जीवन की जीत बनकर उनके सामने आती है। ढेलाबाई और डॉ प्रबोध बोस की बेटी ठुमरी को वे उस मोहल्ले में भी ले जाने का साहस नहीं करतीं। ढेलाबाई की नन्ना तवायफों के गुप्त संगठन के लिए काम करती थी। नन्ना पंडिता रमाबाई से मिलने के लिए कहती है। नन्ना कहती हैं कि 'सब गृहलक्ष्मियां हमसे रश्क करतीं हैं कि उनके मर्दों को हमने भेड़ - बकरियांँ बना लिया है। आखिर कुछ तो ताकत होगी हमारी! (पृष्ठ 253)' सेज पर लेटी औरत भी कम ताक़तवर नहीं होती, उस समय उसके रोम रोम से कच्चे दूध के रंग का एक तेज फूटता है जो आदमी को कहीं से कहीं लिए जाय---उस तेज में नहाया हुआ आदमी उसका मुरीद तो होता ही है जिससे वह कुछ भी करवा सकती है - चाहे तो देव बना दे, चाहे उल्लू! - - - तुझे तो मैंने हिन्दू गुरुओं से भी संस्कृत पढवाई थी। याद है दुर्गा सप्तशती का वह हिस्सा :जब शुंभ निशुंभ किसी तरह नहीं मरते, अपनी जंघाओं के बीच दबाकर काली उनका वध करती है! (पृष्ठ 253)' जहां' आपका पूरा वजूद लोगों की खुजली मिटाने और गालियाँ खाने को ही समर्पित है-(पृष्ठ 253) ऐसे में नन्ना ने बाहर की दुनिया को भी अजमाने का प्रयास किया। नन्ही गौरैया को एक आकाश मिले। कुछ बड़ा करने की चाहत रखना ही सार्थक है। वह मिसिर जी से कहती है कि आपकी दृढ़ता और स्थिरता का सूत्र क्या था - खुद में गिरफ्तार आप कभी भी नहीं रहे - घुटता वही है जो खुद में ही गिरफ्तार रहता है - - अपना पिंजडा़ आप बन जाता है। '(पृष्ठ 254) नन्ना चाहती है कि सभी अकेली औरतों - वैश्याओं, विधवाओं और निचले तबकों में जन्मी दूसरी परेशान हाल औरतों के संगठन' मुक्ति मिशन 'जिसको रमाबाई ने बनाया है, दो चार साल बाद यहाँ का सब सँभाल कर पूरब में भी उसी तरह का आश्रम खोलना। औरतों में ये जोर पैदा करना है हमको! 'अब जब रमाबाई रही नहीं कितनी ही ढेलाबाई को नयी रमाबाई बनकर वहाँ जाना हैं।' (पृष्ठ 260) ढेलाबाई अब पुलिस को भी उन्हीं के हथकंडे से निपटना सीख गई थी। 'जीवन का बोझा उतारकर शारदा सदन आई ये औरतें किस कदर खुश रहती हैं, मजाक में ओल्ड गर्ल्स फन सेंटर(वृद्धा बालिका मस्ती केन्द्र) कहती थीं। अहो मैं मुक्त नारी /पहले मैं मूसल से धान कूटा करती थी, /आज उससे मुक्त हुई! ' भाषा, कथ्य, शिल्प और इतिहास, संस्कृति, जाति आंदोलन जैसे बहुत से विषयों को पढ़ना अभी बाकी है।

अंत में बारिश उपन्यास की समीक्षा

'अंत में बारिश' उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में प्रेम और विवाह के बीच होने वाली विभिन्न घटनाओं और सूत्रों को जोड़ने वाली बहुत ही संवेदनशील कथा है। एक ऐसे प्रेमी नायक की कहानी जिसकी उम्र उनतीस वर्ष की और प्रेमिका नायिका की उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की है यानि विवाह के लिए नाबालिग है। उम्र, जाति, नैतिक, अनैतिक वैचारिक द्वंद्वों के जद्दोजहद को पार कर विवाह और फिर अंत तक का सफ़र इस उपन्यास को नया और सकारात्मक आयाम देता है। सभी घटनाएँ पत्र शैली और डायरी शैली में उजागर होती हैं। घटनाक्रम फ्लैशबैक में क्रमशः आइने की तरह साफ होता जाता है। साठ के दशक में प्रेम होना और उसकी अभिव्यक्ति करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थितियाँ बयां करने वाली रही हैं। प्रेम की परिभाषा पीड़ा से होकर अपना आकार लेती है।कभी प्रेमी सफल तो कभी असफल। वैसे तो इस उपन्यास में प्रेमी अपने दृढ़ प्रेम और प्रेमिका अपनी समझदारी के कारण परिणाम अर्थात विवाह तक पहुंँचते हैं। 'अंत में बारिश' शीर्षक अपने आप में व्यक्त करने में सक्षम है। उपन्यास की लेखिका ने यह बात ' प्रतिशब्द' में स्वीकार करते हुए लिखा है कि उपन्यास के आरंभ में वर्षा की गति सुहावनी और तरल' रिमझिम होती है और अंत में घनघोर वर्षा होती है। इस बीच कई ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं। अंतिम बारिश में नायक की पलकें भींगती चली जाती हैं।और कथा समाप्त होती है।' (प्रतिशब्द) जीवन यात्रा में आई बारिश की निरंतरता इसी बात का संकेत है कि विभिन्न ऋतुओं की तरह हमारा जीवन भी कई उतार चढ़ाव से गुजरता है और हम सुख- दुख, मान - अपमान, लाभ- हानि आदि के तराजू में तुलते हुए जीवन को जीते चले जाते हैं। यही जीवन दर्शन है। प्रेम की परिणति और फिर गृहस्थ जीवन तक के विभिन्न रंगों के चित्रों को दर्शाता है ये उपन्यास। प्रमुखता से नायक-नायिका ही इस कथा के केन्द्रीय पात्र हैं। पत्र लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है। वर्तमान समय में अब वाट्सप, फेसबुक और सोशल मीडिया आदि के कारण पत्र लेखन की वैसी परंपरा समाप्तप्राय है। लेखिका का यह पहला उपन्यास है। लेखिका चाहती है कि पत्रों के लेखन में व्यक्ति के मन की बात अधिक संवेदनशील होती है। और प्रेम पत्र तो हृदय में ही समाहित होनेवाले होते हैं।प्रेम से लिखे एक एक शब्द मानो उसके अपनेपन का अहसास कराते हैं। पत्र शैली को इस उपन्यास में आधार बनाकर कथा को क्रमशः बढ़ाया गया है। डॉ. मुक्ता ने उपन्यास की भूमिका 'प्रेम के ताने-बाने में बुना मनोरम उपन्यास' में प्रेम को संबोधित करते हुए लिखा है - 'प्रेम के बीच रिश्तों के जुड़ने में टकराव और संघर्ष की स्थितियाँ बनती हैं। मूल में प्रेम है। मैं अपना कथन प्रेम के संदर्भ से ही शुरु कर रही हूँ। प्रेम का कोई वायवीय धरातल है या वह शक्ति जो बरबस ही हमें यात्रा में सहभागी बना देता है। प्रेम बाह्य संबंधों को लेकर नहीं वरन् उसकी अंतरंगता को लेकर निश्चित किया जाता है। ' मेरे विचार से उपन्यास' अंत में बारिश' में प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। आज जहाँ विवाह टूटने के कगार पर है, प्रेमी प्रेमिकाएंँ वाट्सप की डीपी देखकर और सोशल मीडिया पर प्रेम का इजहार कर रहे हैं और वहीं ब्रेकअप जैसी घटनाएँ भी लगातार घटित होती जा रही हैं।ऐसे में प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। लेखिका ने प्रेम के विशुद्ध रूप को कहीं भी अमर्यादित नहीं होने दिया है। वरन् वह नायिका और नायक की नैतिक जिम्मेदारी को बड़े ही अंतरंगता के साथ प्रेम को स्थापित करती है जहाँ ईमानदारी और विश्वास का दृढ़ संकल्प है। आसमान में घने काले बादल एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसे छाये थे मानों वे अभी अवनि तल पर उतर आयेगें। ऐसी जोरदार घनी बरसात के मौसम में प्रोफेसर संजय के मन मस्तिष्क में फ्लेश बैक की घटनाओं के साथ जया का पहली बार बारिश में रिक्शे पर आना जिसमें प्लास्टिक का पर्दा लगा होता है। संजय को याद आता है कि वह भीगते हुए उससे मिलने आई थी। संजय एमबीबीएस के प्रोफेसर है और अपने अड़ोस पड़ोस में प्रसिद्ध होने के कारण जया से मिलने नहीं जा सकता था। जया एक मासूम, नाजुक, दुबली - पतली, छरहरे बदन की, घुँघराले बालों वाली साँवलें रंग की अत्यंत खूबसूरत लड़की थी। संजय स्वयं स्वीकार करता है कि जया से पहला परिचय पटना में लगभग आठ महीने पूर्व होता है। दो मकानों में से एक मकान में संजय किरायेदार थे।वहीं मकान-मालिक यमुना प्रसाद जी की लड़की प्रभा अंकल संजय से अपनी सहेली जया का परिचय कराती है। जया के पिता बिजली विभाग में अस्सिटेंट इंजिनियर के पद पर कार्यरत थे। प्रभा के पिता उसी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। दोनों परिवारों के बीच एक पड़ोसी का रिश्ता था। संजय की बड़ी बहन विमला दीदी जो उम्र में काफी बड़ी थी, दोनों परिवारों और दोनों सहेलियों के बीच सेतु का काम करती थीं। जया और संजय के बीच उम्र का काफी फ़ासला होने पर भी संजय जया के प्रेम में धीरे - धीरे डूबता चला जाता है जबकि जया इस बात से बेखबर थी। लेकिन जब उसे संजय की गहरी अनुरक्ति का पता चलता है जहांँ जीवन और मृत्यु के बीच की दिवार भी ढहाई जा सकती है ऐसे में जया भी कालांतर में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। जया का प्रेम अद्भुत, सात्विक, दुराग्रहपूर्ण मानसिक और अंतर्मुखी था। प्रथम 28 दिसम्बर 1957 जब संजय ने अपने मित्र राजीव को अपने एकतरफा प्रेम के बारे में बताया था । नायक अपने नितांत व्यक्तिगत संघर्षों को झेलते हुए विगत पांँच छह महीनों में जया के काफी करीब आ जाता है और बाकी एक वर्ष का समय पंख पर सवार हो ऐसे बीतता जैसे आंँधी से वृक्ष के पत्ते उड़ जाते हैं। (पृ.6) डायरी में लिखे शब्दों से नायक की व्यथा, भावावेग और प्रेम के उत्कर्ष का पता चलता है। उपन्यास में डायरी में लिखी तारीख़ और सन् को इंगित किया गया है। जैसे 1 जनवरी सन् 1959 का नववर्ष जब संजय 29 वर्ष का होता है। जया की रेशमी फ्राक और उसका गुलाबी गुलाब की पंखुरी की तरह मासूम और आकर्षक लगना उसकी उम्र को दर्शाता है। कभी नीले लंबे कोट और इंद्रधनुषी मफलर और अपेक्षाकृत अनसँवरे बालों में पहाड़ी लड़की सी लगती। जया भी उसकी तरफ अनायास ही आकर्षित होती चली गई। जया के पिता से दोनों के विवाह की बात करना और संजय का आश्वासन देना कि मैं आपकी लड़की को खुश रक्खूंँगा।ये सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा सका। (पृ. 8) 4 जनवरी की शाम का वर्णन संजय अपनी डायरी में करता है। जया उससे 100 गज की ही दूरी पर रहती है लेकिन रिक्शे से आती है क्योंकि उसके पिता को उस पर शक है और वह नहीं चाहती कि उसके चरित्र पर कोई आक्षेप लगाए। वह अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकती है लेकिन पिता उसके प्रेमी का अपमान करे, नहीं सह सकती। छिप कर आना, अपनी व्यथा को बांँटना, नाराज और फिर खुश होना, खीझना, डांँटना, कॉलेज न जाना, शरीर और मन के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना, पीड़ित होना और पीड़ित करना आदि बहुत से सुंदर चित्र हैं जो जया के प्रेम को उदात्त रूप प्रदान करते हैं। प्रेम में बहुत अधिक निकटता से वह चौंक जाती है। वह आतंकित हो उठती है उसे लगता है शरीर के स्पर्श मात्र से कुछ हो जाता है उसके दिमाग में भरा हुआ है। (पृ. 15) इसी तरह 20.12.1960 के पत्र में संजय प्रिय जया को लिखता है कि तुम्हारे यहाँ अफवाह है कि "मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुल दस बीघे खेत हैं कौन कहता है जी? मैं गरीब अवश्य हूँ पर इतना भी नहीं।" वह अपनी हैसियत का प्रमाण देता है। वह अपने प्रेम को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।संजय पहले भी बंद कमरे में न जाने कितनी ही बार रो चुका है। जया को भूलना बहुत ही मुश्किल है। संजय को पटना के मेडिकल कॉलेज में अस्थाई नियुक्ति हुई थी अब भगवान की कृपा से दरभंगा के मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गया। दो वर्ष का प्रोबेशन के बाद वहीं परमानेंट हो जाएगा। और जया भी चाहती थी कि वह पीएचडी करे। और यहीं से पत्रों का सिलसिला शुरु होता है। संजय का पत्र 'दुविधा, भविष्य के लिए कुछ संकल्प,' दिनांक 5.02.1960, दिनांक 12.3.1960,भविष्य की योजना दिनांक 22.4.60, कुछ अंतराल के बाद, वही ऐतिहासिक जगह पटना - दिनांक 4.5.1960,फिर जया का एक संक्षिप्त पत्र, कुछ नोक झोंक, जया का पत्र संजय के नाम जिसमें जया की प्रेम वेदना मुखर हो उठती है - - वह लिखती है भ्रमित हूँ आज मैं, है चतुर्दिक जो अँधेरा बाँध लो नाँव मेरे ठाँव, न डरो कि छीन ले कोई पतवार उस पर सवार हो हम चले जहांँ हो स्वर्णिम उजाला। ले चलो तुम ज्योति मग में, धन्य हो मेरा सवेरा। 'पृ 67 आदि कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें संजय ने अपनी दादी बहन की बिमारी की बात लिखी है। संजय लिखता है कि' हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढे़गे पृ69.' नैराश्य भरे पत्र में संबोधन मेरी निराशा! से किया गया है। जया की माँ को भी पत्र लिखा है संजय ने जहांँ वह स्पष्ट लिखता है कि वह एक ईमानदार आदमी है, जिंदगी में अगर आवारागर्दी और मौज का खेल खेलना होता तोय इतनी ठोकरें नहीं खानी पडतीं। पृ 73। बिना संबंध के जया के नाम क्या लिख दूंँ? यदि आप तैयार हों तो आप जहांँ कहें मैं चलकर अपना सब कुछ लिख देने को तैयार हूँ। पृ 74। जया अपने निर्णय में लिखती है "मैं वहाँ तक आपका साथ दूंँगी जहाँ तक सत्य है, ईश्वर है, यह पृथ्वी है। क्या इससे भी अधिक प्रूफ की आवश्यकता है? - बहुत भावुक हो रही हूँ - बस आपकी जया। पृ 77 साथ ही प्रोफेसर संजय अपनी थीसिस के बाद की योजनाएं भी बनाता है और जया जो उसके जीवन की आधार है उसको आश्वस्त करता है कि जाति कुल की बातें करने वाला समाज पीड़ा ही देता है। वे ऊँचे कुल के राजपूत चंद्रवंशी या सूर्यवंशी की दुहाई देते हैं और बड़ी उम्र की। 21.9.1960 के इस पत्र में संजय ने जया को स्पष्ट लिखा है कि एक बार अंत में हमें किसी की खुशी, दम्भ, या झूठे अभिमान के लिए मरना नहीं है। हमें मारने वाले मार डालें तो ठीक है। दूसरी बात यह है कि यह लडाई संयोगवश पूरी की पूरी तुम्हारे हाथों में है। वे तुमसे ही हारेंगे। समय निरावधि है। हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढेंगे। 'पृष्ठ 69 संजय जानता है कि जया और उसका विवाह समाज में मान्य नहीं है। फिर भी वह और जया अपने निर्णय पर अडिग हैं। एक पत्र में जया को वह' भोली बाल सखी 'और' बालिका वधू 'से भी संबोधित किया है। संजय अपने को' एक एडल्ट पुरुष' मानते हैं।स्त्री ही अपमानित नहीं होती बल्कि पदस्थ, चर्चित, सम्मानित पुरुष को स्त्री से भी अधिक विवश किया जाता है। 5.12.1960 के पत्र से पता चलता है कि संजय की नियुक्ति फिर दरभंगा में एक वर्ष के प्रोवेशन पर हो गई है। जया हर हाल में उसका साथ ही देने का निर्णय करती है । अपना निर्णय देती है कि जहाँ सत्य है, ईश्वर है यह पृथ्वी है तब तक वह संजय की है। संजय पीएचडी भी पूरा कर लेना चाहता है। जया उसे बराबर पत्रों में आश्वस्त करती है कि यदि वह आपकी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी, वह पलायनवादी संस्कृति की नहीं है, वह उसी ठाकुर अजीत सिंह की बेटी है जो अपने निश्चयों पर अड़े हुए हैं। वह पत्थर से टकरा सकती है। पर उन पत्थरों की चोट संजय को न लगे। पृ83। पत्रों में संजय अंत में लिखता है तुम्हारा केवल तुम्हीं में खोया हुआ। पत्रों के सिलसिले चलते रहे। 4.4.1961 के पत्र के बाद से लगातार छ महीनों तक परिवार के रिश्तेदारों सगे-संबंधियों और कॉलेज के कुछ आत्मीय मित्रों ने मिलकर जया के पिता को मनाया। अन्ततः आकाश को धरित्रि पर झुकना ही पड़ा।जून 1961 में जया एडल्ट हो गई तब विवशतावश पिता ने धूमधाम से विवाह किया और विदाई हो गई। यहाँ भी मर्यादा का पालन करते हुए घूंँघट में जया की विदाई होती है। संजय अपने गांँव सुदामापुर ले गए जो गाजीपुर से गंगा के पार ताड़ी घाट से 7-8 किलोमीटर दूर था। जया के चेहरे को देख संजय ने कहा दो वर्ष बाद मिली हो। 'सिंदूर लिप्त मांग, ललाट पर बिंदी घूंँघट से अस्त व्यस्त होने के कारण काली घुँघराली लटें उसके चेहरे पर बिखरी हुई थीं और बनारसी साड़ी तथा आभूषणों से सुसज्जित उसका सौंदर्य अनिर्वचनीय था, मैं भाव विमुग्ध हो गया।' गाँव में संजय और जया का विधि विधान से मंगल गीतों की गूँज के साथ पुश्तैनी मकान में स्वागत हुआ। दो तीन दिन बाद ही दरभंगा मेडिकल कॉलेज से संजय को कॉलेज ज्वाइन करना पड़ा जो दोनों के लिए बहुत ही कष्टप्रद रहा। बहन और भुआ के पास नई नवेली दुल्हन जया को छोड़कर जाना संजय को दुखी कर रहा था क्योंकि जया इस तरह के पिछड़े गाँव में कभी रही न थी। जया की पढाई के लिए भी संजय प्रयास कर रहा है। फिर संजय के पत्रों से पता चलता है कि वह मकान की तलाश भी कर रहा है और शांतिनिकेतन की यात्रा के विषय में भी लिखता है। अब वह उसका पति है। जया भी साइंस में केमेस्ट्री से एम एस सी किया। संजय का भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और वहीं गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज में जया भी प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हो गईं।दो पुत्र मन्नू और टुन्नू भी हुए। संघर्षों के दिन समाप्त हुए, में छह वर्षों तक लखनऊ में रहे। संजय के पटना वाले पुराने मित्र राजीव रंजन भी आते हैं और 12 वर्ष के बीच कितना परिवर्तन हो गया इस पर दोनों बातचीत करते हुए खाना भी खाते हैं।राजीव हिन्दी के प्रोफेसर हैं लेकिन कुंवारे हैं। संजय अपनी रिसर्च स्कॉलर जो हार्ट पर रिसर्च कर रही है, उससे परिचय कराते हैं।हँसी मजाक में समय कट जाता है। संजय की शादी के 15 वर्ष बीत गए। जया भी घर की जिम्मेदारी निभाते हुए खुश है और चाहती है कि संजय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैंकुवर जाए और अपना शोध पत्र पढ़ें । 25 सितंबर 1978 में कनाडा जाते हैं जब तक संजय चार बच्चों के पिता बन चुके थे। ये सब सपने पूरे हो रहे थे लेकिन जया संजय का विछोह सहन नहीं कर पाती थी और जार बेजार रोती रहती थी । सेंट पाल्स हॉस्पिटल में कॉन्फ्रेंस की सभी बातों को संजय ने जया को टेलिफ़ोन पर बताया। एक पत्नी की तरह उसने भी यही कहा कि किसी विदेशिनी से दिल मत लगाना।फिर तो संजय मैक्सिको में डेढ़ महीने रहे। फिर लंदन, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर भी योग्यता के कारण जाना रहा। इसी बीच तबियत भी खराब हो जाती है। संजय उम्र के अंतिम पड़ाव की तरफ भी जा रहे थे लेकिन मन और मस्तिष्क की जिज्ञासाएं बराबर रहती थी। अपने फाइल में दबे जया को लिखी चिट्ठियों को भी पढ़ते जिसमें गाँव की पगडंडी से होते हुए शहर और विदेश यात्रा करने वाले एक व्यक्ति के प्रतिफल भोगे हुए क्षणों, मनोदशा और अपना देश, अपना शहर, अपना घर - परिवार के प्रति आकर्षण का यथार्थ चित्र भी ही जिन्हें मैं अपनी अपनी फाइल से प्रस्तुत कर रहा हूँ - मेक्सिको प्रवास से जया को प्रेषित पत्र के विषय में संजय जया के करीब ही रहता। पृष्ठ 118। विदेशों का वैभव पैसा रूपये सब देखने के बाद भी अमरीका यूरोप आदि से मन भर गया। बस अपने देश की ही याद आती रहती और अपने बच्चों को भी यही बताता कि गाँव की गरीबी पढ़ते समय देखी थी, यहाँ विदेश में आकर अमीरी देख ली। पृष्ठ 119। जया के बिना अब संजय एक पल भी कहीं नहीं रह पा रहे हैं। अपने 25 से उन्तीस पत्रों में मेक्सिको अमेरिका जापान आदि देशों के खान पान आदि विभिन्न विषयों पर भी उल्लेख किया है। मिस्टर सैमुएल, मिस जेसिका आदि के विषय में भी बातें लिखी। संजय विदेशों में भारतविद कहलाने लगे। योग और शरीर तंत्र पर विविध व्याख्यान देते रहे। फिल्म बनाने का निमंत्रण भी आने लगा।विदेश में बुखार, ब्लड प्रेशर, ब्लड सूगर आदि बिमारी भी हुई। सबसे बड़ी एक बात यह समझ में आई कि अध्ययन कर्म आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंँचा देता है। पर देश की गरीबी और गंदगी के बावजूद संजय देश की मिट्टी को नहीं भूल आते। मिस्टर सैमुएल की सेवा, प्रभा ठकराल की सेवा, शशि की सेवा को संजय अविस्मरणीय बताते हैं जिन्होंने मेक्सिको में उनका ध्यान रखा। घटनाक्रम धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव तक आता है और संजय उन घटनाओं को सहेज कर अपने अंतर्मन में संजो कर रखता चला जाता है। विदेश भ्रमण में बारह वर्ष बीत गए। जया भी 30 सितंबर 2003 में सेवानिवृत्त हो जाती है। संजय तो जया से 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। मन्नू टुन्नू और पम्मी ने जया के प्रथम सेवानिवृत्ति पूरी होने पर केक भी काटा। बड़े खुशी से जीवन बीत रहा था पर जया के सेवानिवृत्ति के दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि एक दिन आधी रात को उसके पेट में असह्य दर्द होता है जो गॉलब्लेडर में पथरी के कारण हुआ था। अॉपरेशन भी होता है फिर भी पेट का दर्द ठीक नहीं होता। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। संजय स्वयं उसका अॉपरेशन कर न सके। अपने मित्र द्वारा करवाया। अॉपरेशन हुआ लेकिन गॉलब्लेडर के बगल की एक नस में एक अत्यंत सूक्ष्म छिद्र हो गया था और मामला गंभीर हो चला था। आईसीयू में ले जाया गया लेकिन जया तीसरे दिन चल बसी। संजय ने अंतिम संस्कार किया। उसके जाने के पंद्रहवें दिन बाद भरे पूरे घर में संजय को अकेला पन काट रहा था वही शाम का वक्त बरामदे में बैठे हुए संजय को जया की वही छवि याद आ रही थी जब ऐसी ही घनघोर बरसात में विवाह के पूर्व प्लास्टिक का पर्दा लगे हुए रिक्शे में मिलने आती है। अगले ही पल जया की अंतिम यात्रा के समय की छवि संजय की पनियल आँखों में तैर जाती हैं। उपन्यास अंत में बारिश में घटनाएँ तीन भागों में बँटी हैं। पहली विवाह के पहले प्रेम को पाने की पीड़ा दूसरी विवाह के लिए कई संघर्षों का सामना और तीसरा विवाहोपरांत विदेश जाने की आकांक्षा में घर से दूर रहना। देखा जाए तो 1960 से लेकर 2003 तक के नायक और नायिका की प्रेम यात्रा को चिट्ठियों द्वारा एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। और अधिकतर चिट्ठियां संजय द्वारा लिखी गई हैं। पत्नी का कल्पित नाम जया है जिसे वह चिट्ठियों में प्रेम प्रदर्शित करने और अपने कार्योँ का ब्योरा देने के लिए लिखता रहता है। जबकि जया की ओर से जो लिखा गया वह बहुत कम है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसका प्रेम सिर्फ समर्पण है। प्रेम की पीड़ा, हर्ष, अपनापन, उदासी आदि भावनाएंँ हृदय में आत्मसात करती हैं जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रेम की प्राप्ति होने पर प्रिय के साथ दूरियांँ समाप्त हो जाती हैं। प्रेम से उम्र की संख्या भी कोई मायने नहीं रखती। प्रेम से हर दूरी घट जाती है। जया संजय मय हो जाती है। उसकी घुटन ऊब पीड़ा और पराजय का बोध भी ऊपर उठ कर ममता स्नेहिल भावों से परिपूर्ण हो जाता है। संजय कितनी ही विपरित स्थितियों से गुजरा लेकिन प्रिय जया के साथ उसमें नवीन उत्साह और आत्मविश्वास का संचार ही भरा रहा । यही मनुष्य को पौरूष प्रदान करता है और हर प्रकार की बाधाओं से जूझने की शक्ति देता है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी जया की प्रेम बारिश संजय को प्रेमासिक्त करती रही। घनघोर बारिश के पानी ने संजय के आँसुओं धो डाला और नाती- पोतों से भरा- पूरा एक परिवार छोड़ जाती है जो दोनों के प्रेम की निशानियाँ हैं। जीवन और मृत्यु मानव जीवन के चरम सत्य है परंतु उनके बीच का फासला नियती नहीं स्वयं प्रिय का है, प्रेम यही आत्मविश्वास जगाता है। उमड़ते घुमड़ते इस बारिश में भी संजय को काले बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की रोशनी में अपने बच्चों का हँसता मुस्कुराता चेहरा नजर आता है जो उसके बचे खुचे जीवन को आश्वस्त करता नजर आता है। संजय जया के प्रेम की कसक लिए सकारात्मक होने का निश्चय करता है जबकि वह सबके साथ रहते हुए भी अकेला ही है। लेखिका भगवंती सिंह का यह प्रथम उपन्यास है जो उनके जीवन के सत्तर दशक का परिणाम है। हिंदी साहित्यकार और कबीर मर्मज्ञ पति डॉ शुकदेव सिंह के गुजर जाने के बाद वे उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में लगी हैं।उनका लिखा कथा साहित्य यथार्थ जीवन का चित्र है। उन्होंने जीवन के बहुमूल्य अनुभवों को बहुत ही सहज बहते हुए झरने की तरह एक एक शब्द मोतियों को पिरोया है। इस उपन्यास में ऐसा लगता है कि मानो लेखिका के निजी जीवन की कहानियों की लड़ियों का गुच्छा पत्रों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल रहा हो। भाषा शैली बहुत ही सहज, सरल और चरित्र के अनुरूप है। बिना किसी अनावश्यक प्रयास के स्वतः स्फूर्त शब्दों ने उपन्यास का रूप ले लिया। कई घटनाओं का विन्यास और उनकी कथा तारतम्यता में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और माँ- पिता सभी के किरदार अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं। कहीं-कहीं उपन्यास की कसावट में आई खामियाँ खटकती हैं जो मूक ढंग से व्यक्त हो जाती हैं। विदेश जाने के दौरान लिखे पत्र कभी-कभी औपचारिकता निभाते हुए भी लगते हैं। समाज के झूठे दंभ को बेनकाब करने वाला यह उपन्यास अपने परिवार, बड़े कहलाने वाले तथाकथित दादा, अहंकारी लोगों की कलई खोलने वाला है। दो प्रेम करने वालों को एक नहीं होने देने के लिए कई दलीलें देता यह समाज अपनी दकियानूसी सडे़ गले विचारों में जीने वाले समय के साथ किस तरह धराशायी और अवसरवादी हो जाते हैं यह भी इस पूरे उपन्यास की पर्तें खोलते पत्र महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। एक अकेला व्यक्ति समाज की खोखली दिवारों से कब तक सिर फोड़ता रहेगा। संजय का लिखना 'जिन्हें शीशा समझकर हम टकरा गए वे पत्थर निकले। हमने सोचा था कुछ शीशा टूटेगा, सब कुछ हम जोड़ने की कोशिश करेंगे फिर जिंदगी सामने होगी। लेकिन हम टूट गए। पत्थर तो पत्थर ठहरा। - - - जो इतने भयानक और कठोर हैं अपने हों या पराये उनके प्रति कैसी श्रद्धा? कैसी ममता? पृ69। लेखिका ने पुरुष की संवेदनशीलता को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा है जो समाज के मूल्यों, आचार विचार को एक नये एंगल से देखने का आईना प्रदान करता है। प्रेम का सूत्र अंत तक अपने दामन से जुड़ा रहता है। बहुत कुछ छूट गया है। कुछ समझने का प्रयास किया है। अभी तो "अंत में बारिश" की गहराई में छिपी बहुत सी कहानियां हैं जिन्हें उजागर करना है। धन्यवाद @ डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता । दिनांक 17.10. 2021

Saturday, October 16, 2021

नवदुर्गा और प्रकृति

नवदुर्गा और प्रकृति शक्ति पूजा की यह परंपरा नवरात्र के रूप में पूरे देश में विभिन्न शैलियों में मनाया जाता है। अपनी अपनी आस्थाओं और पूजा पद्धतियों के अनुसार उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पश्चिम में राजस्थान सेे लेकर पुर्व में गौहाटी तक ग्रामों, प्रांतों, नगरों और महानगरों में लाखों दुर्गाओं की प्रतिमाएँ निर्मित की जाती हैं। "शक्ति संगम तंत्र" में नवरात्र को नव शक्तियों के सायुज्य का पर्व कहा गया है जिसकी एक- एक तिथि में एक - एक शक्ति प्रतिष्ठित रहती है-- "नवशक्तिभिः संयुक्तं नवरात्रा तदुच्यते।" मार्कण्डेय पुराण में प्रकृति शक्ति के नौ रूपों की पूजा का विधान है जिनके नाम इस प्रकार हैं - शैलपुत्री, ब्रहचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। देवी की नौ शक्तियाँ इस प्रकार हैं - ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐंद्री, शिवदूती और चामुण्डा। नवरात्र विशेष रूप से प्रकृति की मातृभाव से उपासना करना है जिसका उद्देश्य जनमानस तक पर्यावरण संतुलन का संदेश पहुंँचाना है आज मनुष्य के सामने जीवन रक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा संकट पर्यावरण प्रदूषण का है। जिस प्रकृति की गोद में मनुष्य ने "जीओ और जीने दो "की सभ्यता सीखी, आज वह अंध विकासवाद के धरातल पर उसी के संसाधन को लूट - खसोट रहा है। ग्लोबल इकनॉमि के महिषासुरी तेवरों से पर्यावरण विरोधी राष्ट्र राज्य आज पूरे विश्व के प्राकृतिक संसाधनों को बलपूर्वक हड़प लेना चाहते हैं, इसलिए पर्यावरण रक्षिका प्रकृति तनाव के दौर से गुजर रही है। अंधविकासवादी तेवर जब राज्य संस्था में घुसने लगते हैं तो एकसाथ कई प्रकार के शोषण का आरंभ हो जाता है। सर्वप्रथम प्रकृति रूपा प्रजा का शोषण होता है, प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाली स्त्री शक्ति यातनाएंँ झेलती हैं। तीसरे प्रकृति के उदर से पैदा प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट होती है और उस पर अर्थशास्त्र हावी होने लगता है। ग्लोबल इकॉनमी की वैचारिक पृष्ठभूमि भी प्रकृति की इसी उपभोक्तावादी सोच से जुड़ी है। इसीलिए नवदुर्गा से जुड़ा पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतन आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत एक प्रकृति पूजक देश रहा है जहाँ पर्यावरण के रक्षक वृक्षों और वनों का सफाया तो हो ही रहा है साथ ही भूजल स्तर भी नीचे जा रहा है। देवी के नौ रूप ही प्रकृति के मित्र हैं। हिमालय प्रकृति को शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी प्रकृति का सच्चिदानंदमय ब्रह्म स्वरूप है चंद्रघंटा मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का अर्द्ध चंद्र रूप है। चंद्रमा द्वारा पेड़ पौधों व वनस्पतियों को ऊर्जा प्राप्त होती है और उसकी चाँदनी से मनुष्य का मन और हृदय आनंदित होता है। कूष्मांडा नाम अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण है, इससे समस्त प्राणियों में ऊर्जा और तेज का संचार होता है। स्कंदमाता पर्यावरण विज्ञान के संदर्भ में है जो सभी प्राणियों को जन्म देती है, पालन - पोषण की व्यवस्था करती है इसलिए माता के समान वंदनीय है। कात्यायनी कात्यायन ऋषि की तपस्या का रूप है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का तेज है। कालरात्रि का रूप विध्वंसकारी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती है पर भक्तों को शुभ फल प्रदान करने वाली है। महागौरी आठवाँ रूप है जो लोककल्याणी और सात्विक प्रकृति की हैं । गौरी के शरीर के प्रकट सत्व 'प्रकृति' के संरक्षण से ही लोककल्याण संभव है। नौवां रूप सिद्धिदात्री है। विश्व के सभी कार्यों को साधने वाली सर्वार्थ साधिका प्रकृति के इस स्वरूप की देव ऋषि सिद्ध योगी साधक व भक्तजन मोक्ष प्राप्ति के लिए उपासना करते हैं। शारदीय नवरात्र पर्यावरण को संतुलित करने का ही एक सद्प्रयास है जो मनुष्य जाति के कल्याण के लिए उपासना और पूजा के माध्यम द्वारा आयोजित किया जाता रहा है। नवरात्र के देवशास्त्रीय रूप को धर्म और प्रकृति विज्ञान से जोड़कर ही व्यक्ति और राष्ट्र उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं। नवरात्र, दुर्गोत्सव और विजयादशमी की ढेर सारी शुभकामनाएँ --।🙏 🙏 🙏 वसुंधरा मिश्र