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Saturday, October 16, 2021

नवदुर्गा और प्रकृति

नवदुर्गा और प्रकृति शक्ति पूजा की यह परंपरा नवरात्र के रूप में पूरे देश में विभिन्न शैलियों में मनाया जाता है। अपनी अपनी आस्थाओं और पूजा पद्धतियों के अनुसार उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पश्चिम में राजस्थान सेे लेकर पुर्व में गौहाटी तक ग्रामों, प्रांतों, नगरों और महानगरों में लाखों दुर्गाओं की प्रतिमाएँ निर्मित की जाती हैं। "शक्ति संगम तंत्र" में नवरात्र को नव शक्तियों के सायुज्य का पर्व कहा गया है जिसकी एक- एक तिथि में एक - एक शक्ति प्रतिष्ठित रहती है-- "नवशक्तिभिः संयुक्तं नवरात्रा तदुच्यते।" मार्कण्डेय पुराण में प्रकृति शक्ति के नौ रूपों की पूजा का विधान है जिनके नाम इस प्रकार हैं - शैलपुत्री, ब्रहचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। देवी की नौ शक्तियाँ इस प्रकार हैं - ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐंद्री, शिवदूती और चामुण्डा। नवरात्र विशेष रूप से प्रकृति की मातृभाव से उपासना करना है जिसका उद्देश्य जनमानस तक पर्यावरण संतुलन का संदेश पहुंँचाना है आज मनुष्य के सामने जीवन रक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा संकट पर्यावरण प्रदूषण का है। जिस प्रकृति की गोद में मनुष्य ने "जीओ और जीने दो "की सभ्यता सीखी, आज वह अंध विकासवाद के धरातल पर उसी के संसाधन को लूट - खसोट रहा है। ग्लोबल इकनॉमि के महिषासुरी तेवरों से पर्यावरण विरोधी राष्ट्र राज्य आज पूरे विश्व के प्राकृतिक संसाधनों को बलपूर्वक हड़प लेना चाहते हैं, इसलिए पर्यावरण रक्षिका प्रकृति तनाव के दौर से गुजर रही है। अंधविकासवादी तेवर जब राज्य संस्था में घुसने लगते हैं तो एकसाथ कई प्रकार के शोषण का आरंभ हो जाता है। सर्वप्रथम प्रकृति रूपा प्रजा का शोषण होता है, प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाली स्त्री शक्ति यातनाएंँ झेलती हैं। तीसरे प्रकृति के उदर से पैदा प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट होती है और उस पर अर्थशास्त्र हावी होने लगता है। ग्लोबल इकॉनमी की वैचारिक पृष्ठभूमि भी प्रकृति की इसी उपभोक्तावादी सोच से जुड़ी है। इसीलिए नवदुर्गा से जुड़ा पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतन आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत एक प्रकृति पूजक देश रहा है जहाँ पर्यावरण के रक्षक वृक्षों और वनों का सफाया तो हो ही रहा है साथ ही भूजल स्तर भी नीचे जा रहा है। देवी के नौ रूप ही प्रकृति के मित्र हैं। हिमालय प्रकृति को शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी प्रकृति का सच्चिदानंदमय ब्रह्म स्वरूप है चंद्रघंटा मस्तक पर स्थित घंटे के आकार का अर्द्ध चंद्र रूप है। चंद्रमा द्वारा पेड़ पौधों व वनस्पतियों को ऊर्जा प्राप्त होती है और उसकी चाँदनी से मनुष्य का मन और हृदय आनंदित होता है। कूष्मांडा नाम अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण है, इससे समस्त प्राणियों में ऊर्जा और तेज का संचार होता है। स्कंदमाता पर्यावरण विज्ञान के संदर्भ में है जो सभी प्राणियों को जन्म देती है, पालन - पोषण की व्यवस्था करती है इसलिए माता के समान वंदनीय है। कात्यायनी कात्यायन ऋषि की तपस्या का रूप है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का तेज है। कालरात्रि का रूप विध्वंसकारी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती है पर भक्तों को शुभ फल प्रदान करने वाली है। महागौरी आठवाँ रूप है जो लोककल्याणी और सात्विक प्रकृति की हैं । गौरी के शरीर के प्रकट सत्व 'प्रकृति' के संरक्षण से ही लोककल्याण संभव है। नौवां रूप सिद्धिदात्री है। विश्व के सभी कार्यों को साधने वाली सर्वार्थ साधिका प्रकृति के इस स्वरूप की देव ऋषि सिद्ध योगी साधक व भक्तजन मोक्ष प्राप्ति के लिए उपासना करते हैं। शारदीय नवरात्र पर्यावरण को संतुलित करने का ही एक सद्प्रयास है जो मनुष्य जाति के कल्याण के लिए उपासना और पूजा के माध्यम द्वारा आयोजित किया जाता रहा है। नवरात्र के देवशास्त्रीय रूप को धर्म और प्रकृति विज्ञान से जोड़कर ही व्यक्ति और राष्ट्र उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं। नवरात्र, दुर्गोत्सव और विजयादशमी की ढेर सारी शुभकामनाएँ --।🙏 🙏 🙏 वसुंधरा मिश्र

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