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Thursday, July 21, 2022

साहित्यिकी में अध्यक्षीय वक्तव्य

साहित्यिकी संस्था में अध्यक्षीय वक्तव्य - - - साहित्यिकी संस्था की मैं हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मुझे यह गुरुभार दिया। आदरणीय रेणु गौरीसरिया जी और प्रमिला धूपिया जी को प्रणाम करती हूँ जिन्होनें अपनी रचनात्मकता से हम सभी को समृद्ध किया। यह सच है कि किसी भी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को पूर्णतया समझना कठिन कार्य है। एक लेखक जिस समय जैसी रचना लिख जाता है बाद में पढ़कर स्वयं भी अपनी रचना को देख अचंभित हो जाता है कि क्या ये मैंने ही लिखा था। अभिव्यक्ति की इच्छा ने अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने तथा दूसरों तक पहुंचाने के माध्यम से भाषा को जन्म दिया। शब्द या वाणी बाह्य अभिव्यक्ति के कारण हैं। वाणी और मन दोनों की जोड़ी है। विचारकों ने इसे मनोमय जगत् कहा है। भारतीय चिंतन पद्धति वर्तमान जीवन को पूर्वजन्म के कर्मों की वासना का परिणाम मानती है। वासनाओं को संस्कार भी कहा गया है। तभी रचनाकार को मनीषी, स्वयंभू तक कहा जाता है। कालिदास ने भी कहा है कि - - - फलानुमेयाः प्रारंभाः संस्काराः प्राक्तना इव। डॉ नगेंद्र मानते हैं कि सर्जना के लिए पहली आवश्यकता है अनुभूति की भोगावस्था समाप्त हो संस्कार में परिणत होना। अज्ञेय ने जीवन द्वारा भोगी हुई अनुभूतियों को कच्चामाल कहा है जिसको सर्जक की प्रतिभा कूट पीस कर रचना का रूप दे देती है। यही आधुनिक युग में आभ्यंतरी करण प्रक्रिया कही गई है। राजशेखर ने प्रतिभा के दो रूप बताए हैं जो कारयित्री और भावयित्री है जो रचनाकार के रचनात्मक भावों को आकार देते हैं। सृजन प्रकिया अनुभवों के ग्रहण एवं संचयन से प्रारंभ होती है। हमारा अज्ञात मानस अनेक विचारों तथा अनुभवों से भरा है जो अनुकूल परिस्थितियाँ एवं प्रेरणा पाकर चेतन धरातल पर आते हैं। अचेतन मानस में स्थित भाव, विचार या अनुभव को जागृत करने के लिए संवेगात्मक परिस्थिति का होना अनिवार्य है। कालिदास का यह श्लोक इस विषय को उजागर करता है - - रम्याणी वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पर्यत्सुकी भवति यत्सुखिनो$पि जन्तुः । तच्चेतसा स्मरति नूनमबोध पूर्वं भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि ।(अभिज्ञान शाकुंतलम् 5/2) सृजनात्मक कार्य अचेतन की गहराइयों से उद्भूत होता है। रचनाकार का संबंध अनुभव, अनुभूति और अभिव्यक्ति के बीच अन्तर्केन्द्रित होता है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसी सत्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है - -' ये सभी आत्माभिव्यक्ति के माध्यम हैं चाहे वे शब्दों, स्वरों, रेखाओं और रंगों की भाषा द्वारा हो (आर्ट एंड एस्थेटिक, पृष्ठ 9)।' साहित्य का प्रयोजन आत्मानुभूति ही है और इसका प्रमुख श्रेय जाता है लेखक की वर्णन -क्षमता और साथ ही श्रोता या पाठक की ग्रहण शक्ति पर। रचनाकार या साहित्यकार जब तल्लीन होकर रचना करता है तो वह उसी तरह का भाव पाठकों के मन में भी उत्पन्न करता है। मुक्तिबोध लिखते हैं कि सत्य का प्रकाश सत्य से भिन्न है। साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश है किंतु हमें प्रकाशों में सत्य को ढूंँढना है। हम केवल साहित्य की दुनिया में नहीं, वास्तविक जीवन में रहते हैं। साहित्य के सहित अर्थ से संश्लिष्ट रह, साहित्यकार या लेखक जब अपनी कल्पनाशीलता का उच्छ्वास लेखनी के माध्यम से करता है तो अभिप्रयुक्त कौशल रचनाधर्मिता का विशेषण पाता है। आज हम जितने भी बड़े साहित्यकारों को जानते हैं, उनकी वाक् शक्ति के कारण ही जानते हैं। किसी भी रचनाकार की रचनाधर्मिता एक स्वच्छंद इकाई है जो पूर्णतः व्यष्टिगत होती है। यह लेखक के मानस की व्यापकता और भौतिक मानसिक परिवेश की उन सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंगों से जो चेतन - अचेतन मन को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। कहने का तात्पर्य है कि रचना धर्मिता और शिल्प सजगता दोनों पायदानों पर टिका होता है लेखक का साहित्यिक अवदान। सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास, संवेदन शून्यता, भौतिकवाद की अंधी दौड़, पर्यावरण आदि बहुत से ज्वलंत प्रश्न है जो समय और समाज से टकराते हैं। किसी भी साहित्यकार से उसकी रचना धर्मिता को सुनना उसके अनुभवों से रूबरू कराती है। इस तरह के संज्ञान से रचना के संप्रेषणीयता बढ़ती है। रचना के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है जिससे पाठक संसार में वृद्धि होती है। लेखिका शब्द साधक हैं। प्रभाव तभी पड़ता है, जब प्रभावशाली शब्द आयेंगे । महादेवी वर्मा ने 1956 में ' पथ के साथी' संस्मरण साहित्य में अपने समकालीन लेखकों का संस्मरणात्मक वर्णन किया है । डॉ नगेंद्र ने भी माना है कि साहित्य आत्मकथ्य भी होता है। पश्चिम की आंधी से जब हम संत्रस्त थे रवीन्द्र नाथ ने पश्चिम की इस हृदय हीन यांत्रिक सभ्यता, स्वेच्छाचारिता और साम्राज्य लिप्सा का घोर विरोध किया। रक्तकरबी की यक्ष पुरी का राजा भी शक्ति और सत्ता के मद में कहता है' या तो प्राप्त करूंगा नहीं, तो नष्ट हो जाऊंगा'। गुजराती कवि उमाशंकर जोशी कहते हैं, 'जो जन्महीन और भविष्य में दीन बनकर जिएंगे, उन सबके कलंक का अन्याय कर्ण अपने रक्त से धोता है। वस्तुतः कर्ण एक ऐसा अभागा व्यक्ति था जिसका जीवन उसकी माता ने नष्ट किया, जो सदैव पूर्णतः अलगाव की स्थिति में रहा। दुर्गा भागवत के शब्दों में,' प्रत्येक युग में, प्रत्येक व्यक्ति में, प्रत्येक दुख और निराशा के क्षण में, सुख की लालसा में, पराक्रम के दुर्दम्य आवेग में, स्नेह के अविष्करण में एक कर्ण स्थान - स्थान पर अवतीर्ण होता है, मात्र क्षणार्ध के लिए परंतु सब की वेदना को अपने अंदर लेता हुआ दिखाई पड़ता है। 19 वी सदी का इतिहास विश्व व भारतीय जन- जागरण का नवोत्थान था और बीसवीं सदी में अंतिम सांस ली और 21वीं सदी भी आ गई जो परिवर्तन की नई सदी है। एक ओर हमारे देश में महात्मा गांधी जैसे अवतारी पुरुष हुए तो दूसरी ओर मार्क्स और आइंस्टाइन जैसे चिंतक और मनोवैज्ञानिक भी हुए जिन्होंने मनुष्य के जीवन और उसकी पद्धति को नवीन आयाम दिए। 19 वीं सदी का युग मानववाद के विकास का युग था। मानववाद का ध्येय था मानव समाज की समान समस्या और समयानुसार चुनौतियों का सामना करना। 'कभी तो अनुभूति उमडेगी, प्लवन का सांद्र घन बन।' अतीत के धरातल पर ही वर्तमान फलता - फूलता है और भविष्य की ओर अभिमुख होता है। साहित्य के इतिहास में अतीत जड़ और अविस्मरणीय नहीं रहता। वह तो एक गवाक्ष है जिससे वर्तमान का क्षितिज स्पष्ट दिखाई देता है। वाक् की सिद्धि उन तपः पूत साधकों से ही होती है, समाज के नई चेतना को प्रमाणित करती है। महाश्वेता जी ने कहा था कि भारत की संस्कृति की वास्तविक परख और पहचान हम हिंदी साहित्य के माध्यम से ही कर सकते हैं। अर्नेस्ट फिशर के शब्दों में कलाकार अपने युग के विचारों, पूर्वाग्रहों, मूल्य बोध और वैचारिकता से अछूता और स्वाधीन नहीं रहता। उसका समय उसे गतिमान करता है, बनाता है और विकसित करता है। वह उपेक्षा को अपेक्षा समझता है। कला या सृजन समाज के ध्रुवकेंद्र का परिवेषण करती है। इनसे ही उन प्रत्ययों का समावेश होता है, जो उसके कृतित्व को स्वांतः सुखाय बनाता है तो परार्थ सुखाय भी। आदर्श समाज किसे कहेंगे? जहांँ संन्यासी भी गृहस्थ और गृहस्थ भी संन्यासी होंगे अथवा दोनों के बीच कोई भेद नहीं होगा। विवेकानंद, अरविंद, गांधी जिस ध्येय को लेकर चले उसका सामाजिक रूप यह है कि वहाँ धर्म को केवल चंदन, कंठी, माला, पूजा, होम और मंदिर तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि समग्र जीवन ही उसमें एक साधना की तरह है। अज्ञेय की पंक्तियाँ हैं - - 'कहा तो सहज पीछे लौट देखेंगे नहीं पर नकारों के सहारे कब चला जीवन? स्मरण को पाथेय बनने दो'

भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह को गुरुदक्षिणा पुरस्कार

नॉलेज कार्निवाल में प्रो दिलीप शाह को गुरुदक्षिणा पुरस्कार - - - भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह को शिक्षा के क्षेत्र में नॉलेज कार्निवाल में गुरुदक्षिणा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध समाचार पत्र टाइम्स अॉफ इंडिया ने उन्नीस जुलाई 2022 को, पहली बार कोलकाता के होटल हयात रीजेंसी में 'नॉलेज कार्निवल' का आयोजन किया गया । इस कार्निवल का फोकस 'ईस्ट इंडिया' था। इस नॉलेज कार्निवाल में स्टालों, स्टैंडियों और अन्य प्रचार सामग्री के माध्यम से कई संस्थानों का प्रतिनिधित्व रहा जो सभी छात्रों और शिक्षकों के गौरव के लिए एक हॉल में प्रदर्शित किए गए थे, जो शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोत्तम रूप को दर्शाता है। भवानीपुर कॉलेज के लगभग बीस विद्यार्थियों के साथ फैकल्टी प्रो. दिव्या पी उदेशी के साथ इस कार्यक्रम के लिए गए थे।इस कार्यक्रम के मुख्य कलाकार रहे देवांग नगर और देवेन खड़का। भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह को श्री शिरशेंदु मुखोपाध्याय (वयोवृद्ध लेखक) द्वारा 'गुरुदक्षिणा' पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर भवानीपुर कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ दी। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

साहित्यिकी संस्था ने लेखिका रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर की चर्चा

साहित्यिकी संस्था ने लेखिका रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर की चर्चा - - - साहित्यिकी संस्था द्वारा वर्चुअल गोष्ठी में संस्था की वरिष्ठ लेखिका रेणु गौरीसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर परिचर्चा का आयोजन किया गया ।दोनों का ही जन्म 1941 का है और दोनों ही बालिका शिक्षा सदन विद्यालय की छात्रा रही हैं। प्रमुख वक्ताओं में गीता दूबे और कुसुम जैन ने क्रमशः रेणु गौरिसरिया और प्रमिला धूपिया की साहित्यिक यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार व्यक्त किए । कथाकार और साहित्यकार रेणु गौरीसरिया के जीवन यात्रा पर गीता दूबे ने विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि रेणु जी बालिका शिक्षा सदन में प्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी की शिष्या और साहित्य मर्मज्ञ रहीं। साथ में एक लोकप्रिय शिक्षिका भी रहीं। उनके जीवन के संघर्षों और दुखों को कभी भी हाईलाइट न करते हुए सकारात्मक ऊर्जा सोच से अपने अस्सी वर्ष में आज भी ऊर्जा से भरी हुई हैं। बताया कि रेणु जी की हिंदी आत्मकथा 'जकारिया स्ट्रीट से मेफेयर तक' का अब द्वितीय संस्करण आ रहा है और बांग्ला में भी अनुवाद हो रहा है। रेणु जी के आलेख 'समस्या' को साहित्यिकी की वरिष्ठ सदस्या मीना चतुर्वेदी ने पढ़ा। रेणु गौरीसरिया ने अपने वक्तव्य में संस्था को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्हें जीवन के हर मोड़ पर प्रेम मिला। पुस्तकें पढ़ना, फिल्म, नाटक आदि देखना रुचि रही है और हंँसते रहना ही जीवन का मूलमंत्र माना है, रोना कोई नहीं सुनता। लेखिका प्रकृति से सौम्य हैं और जीवंतता इनके जीवन के महत्वपूर्ण अंग है। उनकी अनुभूतियों को उनकी रचनाओं में पढ़ा जा सकता है। बीस जुलाई 2022 को हुई इस गोष्ठी में मीना चतुर्वेदी ने रेणु के आलेख 'समस्या' का पाठ बहुत ही भावपूर्ण होकर किया जो बहुत ही सहज और प्रभावी रचना है। रेणु गौरीसरिया ने अपने वक्तव्य में अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया।स्कॉटिश चर्च कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष और साहित्यकार गीता दूबे ने रेणु गौरीसरिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करते हुए कहा कि वे एक शिक्षिका होने के साथ-साथ एक सफल लेखिका हैं। इस अवसर पर उषा श्राफ और पूनम पाठक ने प्रश्न भी किए जो रेणु जी के जीवन के दुखों और अच्छी शिक्षिका कैसे बनें से संबंधित रहे। साहित्यिकी की दूसरी वरिष्ठ सदस्या प्रमिला धूपिया रानी जीजी के रूप में लोकप्रिय हैं। जिनकी कविता 'स्वागत है स्वर्ग में तुम्हारा 'का पाठ बबीता माँधणा ने किया। माँधणा ने स्वरचित दोहे के साथ दोनों लेखिकाओं के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया। प्रमिला जी ने बताया कि संस्था की निदेशक कुसुम जैन की प्रेरणा से उन्होंने लिखना शुरू किया। विशारद प्रमिला जी भी बालिका शिक्षा सदन में मन्नू भंडारी जी की शिष्या रहीं और वहीं से पढ़ने-लिखने लिखने की रुचि विकसित हुई। कुसुम जैन ने प्रमिला धूपिया के साथ अपने पचास वर्षों की यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार की परंपरा और पुरुष प्रधान संस्कृति में एक सशक्त महिला के रूप में अपने को प्रतिष्ठित करते हुए प्रमिला यानी रानी जीजी को एक सशक्त व्यक्तित्व की मलिका बताया। समझौता और प्रतिरोध दोनों ही उनके व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलू हैं। उनके प्रगतिशील विचारों से भरे लेखन पर विस्तार से जानकारी दी। प्रमिला धूपिया ने कहा कि मेरे लेखन पर इस तरह की चर्चा करने के लिए संस्था को धन्यवाद देती हूँ अपने जीवन में आए अच्छे शिक्षकों मन्नू भंडारी और रमेश सर के संस्कार और पढ़ने की रुचि को महत्वपूर्ण बताया। अध्यक्षता करते हुए भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की हिंदी व्याख्याता डॉ वसुंधरा मिश्र ने वरिष्ठ लेखिकाओं की रचनाधर्मिता पर अपने महत्वपूर्ण विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान संदर्भ में रेणु गौरीसरिया और प्रमिला धूपिया के व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही प्रेरित करने वाले हैं। दोनों ही अपने - अपने जीवन में एक संपूर्ण महिला हैं । अस्सी की उम्र में रेणु जी का लेखन अभी भी अपनी ऊंँचाइयों को छू रहा है और प्रमिला धूपिया की जीवन शैली, अनुशासन, संकल्प और आदर्शों को लेकर परिवार, समाज और संस्कृति की विरासत के रूप में सभी को प्रेरित करता है। अनुभूति जब लेखन में उतरती है तो वह सृजन बन समष्टि से जुड़ जाती है। कार्यक्रम का संयोजन व संचालन वरिष्ठ सदस्या डॉ सुषमा हंस ने किया। संस्था की सचिव डॉ मंजु रानी गुप्ता ने कार्यक्रम के प्रारंभ में सभी का स्वागत करते हुए अपने विचार व्यक्त किए। अंत में, डॉ वसुंधरा मिश्र ने सभी सदस्याओं को धन्यवाद देते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम लेखन को बढ़ावा देते हैं और साहित्यिकी कई महत्वपूर्ण लेखिकाओं से समय-समय पर रूबरू कराती रहती है जिससे दूसरे लेखकों को प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार की साहित्यिक परिचर्चा से विचारों का आदान-प्रदान होने के साथ-साथ लेखन और पाठक समृद्ध होता है। तकनीकी सहयोग दिया नुपूर अशोक ने। कार्यक्रम में साहित्यिकी संस्था की सदस्याओं की अच्छी-खासी उपस्थिति रही।

Sunday, July 17, 2022

साहित्यिकी संस्था को प्रभात खबर में स्थान मिला दिनांक 17.07.2022

प्रतिस्पर्धा की दौड़ के बीच साहित्य के प्रति रुझान पैदा करती “साहित्यकी" वर्तमान समय की जरुरतों के बीच आज जब अधिकांश लोग आर्थिक व सामाजिक महत्वाकांक्षाअों को मन में पाले प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सिर्फ दौड़े जा रहे है. लोगों में संवेदनाअों का खास एहसास बनाये रखने के लिए साहित्यकी संस्था प्रतिबद्ध होकर कार्य करती आ रही है. यह संस्था महिलाअों को न सिर्फ लेखन विद्या में ही आगे तक जाने के लिए प्रेरित करती है बल्कि योग्य प्रतिभाअों का समय-समय पर उचित सम्मान भी करती है. लेखन कला में रुचि रखने वाली महिलाअों को यह संस्था एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करती है. एक एेसा मंच जहाँ योग्य प्रतिभा की कद्र है अौर संवेदनाअों- भावनाअों को समझने वाले लोग है. संस्था की अध्यक्ष विद्या भंडारी कहती है -आज के समय की जरुरतों ने लोगों के जीवन को एक दौड़ में बदल दिया हैं. मानवीय मूल्यों से संपृक्त लोगों में साहित्य के प्रति लगाव व अभिरुचि कमतर होती जा रही है. जबकि सत्य यह है कि साहित्य हर युग में प्रांसगिक है.यह जीवन को एक ध्येय प्रदान करने वाली विशेष आवश्यक विषयवस्तु है. साहित्य के बिना जीवन नीरस अौर अनुभव हीन है.यह भावनाअों की अभिव्यक्ति है तो इसमें संवेदनाअों का एहसास है. साहित्य का महत्व न कभी खत्म हुआ है अौर ना ही कभी खत्म हो सकता है. साहित्य ही मनुष्य को अपूर्णता से पूर्णता की अोर ले जा सकता है. साहित्य के इसी महत्व अौर उद्देश्य को महसूस करते हुए डॉ. सुकीर्ति गुप्ता ने 1998 में “साहित्यकी” संस्था की स्थापना की थी. उन्होंने साहित्य लेखन, पठन-पाठन में रुचि रखने वाली बौद्धिक विचारों की महिलाओं को इस संस्था के माध्यम से जोड़कर एक सुंदर लेखकीय मंच प्रदान किया. थोड़े ही समय में संस्था की लोकप्रियता बढ़ी अौर देखते ही देखते लेखन कला में रुचि रखने वाली कई महिलाएं संस्था से जुड़ती चली गई.अध्ययन- अध्यापन से जुड़ी महिलायें ही नहीं बल्कि साहित्य के प्रति रुचि रखनेवाली घरेलू शिक्षित महिलायें भी साहित्यिकी से जुड़ीं अौर अपनी लेखन कला को विस्तार रूप दिया. मंच के माध्यम से उन्हें काफी अच्छा प्रोत्साहन मिला. प्रतिभाएँ अौर निखरती चली गईं. सदस्याओं को लेखन कला को अौर अधिक विकसित करने और विस्तार रूप देने के लिए संस्था ने एक हस्तलिखित पत्रिका 'साहित्यिकी' का प्रकाशन भी आरम्भ किया. विद्या भंडारी ने बताया कि साहित्यिकी के तत्वावधान में प्रत्येक मास एक गोष्ठी का आयोजन भी नियमित रूप से किया जाता है जिसमें विभिन्न विषयों, पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित होती है. विद्या भंडारी संस्था की गतिशील यात्रा पर चर्चा करते हुए कहती है- 2013 में डॉ. सुकीर्ति गुप्ता का निधन हो गया. उनके निधन के पश्चात् कुसुम जैन, डॉ किरण सिपानी के सहयोग के साथ मुझे अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी मिली. हम सभी ने मिलकर कोशिश की कि संस्था गतिशील और सक्रिय बनी रहे. विद्या भंडारी कहती है कि किसी एक परिवार की तरह आप हमारी इस संस्था को समझ सकते है. हमारी इस संस्था में सभी सदस्याओं के बीच एक अपनापन और अनुराग भरा है. इसी की बदौलत वरिष्ठ व युवा सदस्याओं में एक सुंदर समन्वय दिखाई देता है. सभी सदस्याओं की सामूहिक साझेदारी के बल पर ही संस्था ने न सिर्फ कोलकाता बल्कि पूरे भारत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. हमें इस बात की खुशी है कि एक परिवार की तरह साहित्यिकी संस्था का सघन वृक्ष के रूप में निरंतर विस्तार हो रहा है. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था की सबसे विशेष बात यह है कि कोलकाता में कार्यरत हिन्दी की लगभग सभी प्राध्यापिकाएंँ एवं अध्यापिकाएँ इस संस्था की सक्रिय सदस्याएंँ हैं. सभी मार्गदर्शक के रूप में संस्था की प्रगति के लिए निरंतर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहीं हैं. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था 24 वर्षों से निरंतर साहित्यकारों और पुस्तकों पर चर्चा के कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है. विशिष्ट साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति का कार्यक्रम तो आकर्षक होता ही है. इसके अलावा हम समय-समय पर काव्य गोष्ठी का आयोजन करने के साथ प्रसिद्ध कवियों और साहित्यिकारों को आमंत्रित कर अपना ज्ञानवर्द्धन करते रहते है. विद्या भंडारी कहती हैं कि साहित्यकारों में भीष्म साहनी, केदारनाथ अग्रवाल, अमृत राय, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी इत्यादि सुप्रसिद्ध साहित्यकारों पर चर्चा होती रही है.आशुतोषजी, शंभूनाथजी, सुधा अरोड़ा ने इन चर्चाओें में भाग लेकर संस्था का गौरव बढ़ाया है. डॉ अजय राय ने अब तक प्रसाद,पंत,निराला,महादेवी इत्यादि कई साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति साहित्यिकी मंच के माध्यम से दी है. साहित्यिकी संस्था की मंत्री डॉ मंजुरानी गुप्ता ने जानकारी देते हुए कहा कि हमारी संस्था पुस्तकों ने महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया है. जैसे (प्रिय कोलकाता तोमाके भालो बाशि-संपादक सिद्धेशजी व विद्या भंडारी -काव्य संग्रह-बांग्ला अनुवाद सहित), ( दर्पण- लघुकथा संग्रह- संपादक-मंजुरानी गुप्ता व विद्या भंडारी), (विचार सरणी- संपादक-किरण सिपानी व विजय लक्ष्मी मिश्रा) (विसंगतियों के व्यूह में-मधुबाला रोहतगी, रेवा जाजोदिया एवं सरोजिनी शाह) , (यादों के झरोखे से-यात्रा संस्मरण-रेणु गौरिसरिया, विनोदिनी गोयनका व आशा जायसवाल), ( स्त्री लेखन-स्त्री दृष्टि-गीता दूबे-रेशमी पांडा मुखर्जी),( सद्य- पर्यावरण पर प्रकाशाधीन पुस्तक- जिसमें देश के कई लेखकों की रचनाएँ सम्मिलित हैं -गीता दूबे) के अलावा अध्यक्ष विद्या भंडारी की चार पुस्तकों का प्रकाशन भी साहित्यिकी प्रकाशन से ही हुआ है. इसके अलावा देश की एक मात्र हस्तलिखित पत्रिका के 30 अंकों का प्रकाशन भी संस्था अब तक कर चुकी है. विशेष जानकारी देते हुए पदाधिकारियों ने बताया कि हस्तलिखित इस पत्रिका के संपादक को सभी को अवसर देने के उद्देश्य से समय -समय पर बदला जाता है. वसुंधरा मिश्र, राज जैन, कमलेश जैन, सुनंदा रायचौधरी, गीता दूबे, मंजुरानी गुप्ता, सुषमा हंस, रेशमी पांडा मुखर्जी, कविता महरोत्रा, विद्या भंडारी आदि किरण सिपानी के सहयोग के साथ इस पत्रिका का संपादक बनने का सौभाग्य पा चुकी है.

Thursday, July 14, 2022

सुरंगों सावन - भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता

सुरंगों सावन - - भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता द्वारा सुरंगों सावन में मुझे का अवसर मिला उसके लिए मैं आभारी हूँ। मंच पर आसीन कोलकाता की प्रसिद्ध महिला शक्तियों को नमन। प्रो दीपाली सिंघी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में नया दृष्टिकोण दिया है और जे डी बिरला के विद्यार्थियों को ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य किया है। शिक्षण संस्थानों में जेडी बिड़ला महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हिंदी मीडिया हाउस छपते छपते हिंदी दैनिक और ताजा टीवी के नैपथ्य में काम करने में अमृता नेवर का महत्वपूर्ण योगदान है जिसके कारण हम रोज सुबह से लेकर रात तक दुनिया की सभी खबरों और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों को देखते और सुनते हैं। सुमधुर स्वरों की मलिका जैस्मीन जैसा नाम वैसा ही गुण है। महिला सशक्तिकरण में स्वयं को स्थापित करने में एक मिसाल कायम की है। भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता संस्था की मेरुदंड हैं अंजू सेठिया और सरोज भंसाली जी ।आप दोनों ने अपनी टीम का नेतृत्व किया और विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यों के प्रति अपने दायित्व का पालन किया। अंजू सेठिया एक सफल बिजनेस वोमन होने के साथ-साथ हैं साथ ही समाज सेवी कवयित्री और लेखन से भी जुडी हैं। संस्था के माध्यम से पिछले डेढ़ साल से बहुत सारे कार्यक्रम कर चुकी हैं। मैं उनकी संस्था को शुभकामनाएँ देती हूँ। महिलाओं पर समाज परिवार का दायित्व रहा है। बच्चों से लेकर परिवार, संस्कृति से लेकर संस्कार, शिक्षा से लेकर अच्छे नागरिक बनाने का कार्य सब कुछ महिलाओं पर होता है। तीज-त्यौहार रीति-रिवाज परंपराओं को महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं। वसंत के समान ही वर्षा भी भारतीय साहित्य में सम्मान और गौरव का स्थान पाती रही है।हर भाषा के लोक गीत हैं, वैदिक ऋषियों ने मेघों के शक्तिशाली रूप का यशोगान उल्लसित कंठ से किया है।इंद्र मेघों के शक्तिशाली अधिपति रहे। समय के साथ उनका प्रभाव असफल होता गया और इंद्र देवता की छवि में कमी आती गई और बाद में उपेंद्र देवता ने भारतवर्ष में धर्म साहित्य शिल्प संगीत और कला के क्षेत्र को छा लिया। घनों के राजा इंद्र रंगमंच से चुपचाप हट गए और घनश्याम वहाँ डट गए। हिंदू पुराणों के अनुसार यह घटना द्वापर युग में घटी थी। भागवत पुराण में इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पूजा करवाई। इंद्र ने भी बदला लेने के लिए मूसलाधार वर्षा करवाई जिससे द्युलोक से भूलोक तक जल ही जल हो गया। श्रावण का महीना उत्सव का महीना है। मानसूनी हवाएँ वारिश लाती हैं और तपती धरती को भीगो देती हैं। नागार्जुन की पंक्तियाँ हैं - बादल को घिरते देखा है कन्हैयालाल सेठिया जी की पंक्तियाँ नीर भरी नदियाँ लहराते /सागर उनमें प्यास बुझाते /किंतु गगन की एक बूंद हित /चातक के नयनों में जल है। वेदों से लेकर अभी तक न जाने कितने ही कवियों और साहित्यकारों और दार्शनिकों आदि ने वर्षा के प्रति अपने भावों को व्यक्त किया है। आषाढ़ से ही वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है। बंगाल में काल बैशाखी बैशाख से ही दस्तक देने लगता है। कालिदास ने मेघदूत की रचना ही कर डाली जो विश्व में एक अनूठी और अद्भुत रचना है। आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघमाश्लिष्ट सानु /वप्र क्रीडा परिणत गज प्रेक्षणियम ददर्श। प्रथम श्लोक से ही मेघों को अपना संदेशवाहक मानते हुए अभूतपूर्व वर्णन किया है। बादल वही हैं जो प्रकृति जड़ चेतन और पूरे ब्रह्माण्ड को अपनी शीतलता प्रदान करते हैं। सावन और संगीत का अटूट रिश्ता है। सुरंगो सावन पर मेरी कविता है - - - मन का सावन-- सावन मन में बरसता है। जब रस रंग और रास से मन पूर्ण होता है तो सावन होता है। निश्छल और उन्मुक्त हँसी से चेहरा भरा हो तो सावन है। चिंताओं की तमाम लकीरें जब पानी की तरह पारदर्शी हो जाए तो सावन है। होठ पर जब बचपन के गीत आने लगें तो सावन है। एक पैर से दूसरा पैर जब खेलने लगे तो सावन है। पेड़ों की पत्तियों से गिरती बूदें जब शरीर को भिगो दें तो सावन है। तन और मन के पोर पोर कुछ कहकर भी जब कुछ न कहें तो सावन है। आसमान में सात रंगों का इंद्रधनुष दिखाई दे तो सावन है। हमारे मन का मयूर जब नाचे तो सावन है। यूँ ही तो कोई सावन नहीं मनाता है। किसान अपनी लहलहाती फसलें देखकर झूम उठता है, तब सावन है भारत ऋतुओं से फलता-फूलता है, त्योहार मनाता है, खुशियाँ मनाता है। तब सावन है कोयल की कूंक जब सुनाई दे तो सावन है। हर बच्चा वृद्ध और स्त्री के चेहरे पर सुकून हो तो सावन है मजदूर जब त्योहार मनाए तो सावन है कृषि के साथ कृष्ण बांसुरी बजाएं तो सावन हैं क्रोधित वर्षा के नैनों की धारा जब बुझ जाएं तो सावन है बाढ़ के खतरे न आएं पशु-पक्षी और मानव के जीवन सुरक्षित हों तो सावन है। निराला कहते हैं - बादल गरजो घेर घेर घोर गगन धाराधर ओ ललित ललित काले घुंघराले बाल कल्पना के से पाले सूर तुलसी जायसी सभी ने पावस ऋतु का सुंदर सरस वर्णन किया है। महादेवी वर्मा जी ने - - नीर भरी दुख की बदली नागार्जुन - - मेघ बजे घन कुरंग बादल को घिरते देखा है। बूंदों की रिमझिम में संगीत का सरगम होता है। इस मौसम में हवा बादल पेड़ पपीहे सब झूमते गाते हुए से लगते हैं। भक्ति संगीत और कविताओं में वर्षा ऋतु प्रकृति की सहचरी है। वर्षा मानव मन की अनुभूतियों का यह उल्लास लोककंठ से बारहमासी कजरी झूलागीतों के रूपों में फूटता है। मेघ मल्हार का आदि राग कवि हृदय में भी गीत के रूप में उतरता है। सावन और संगीत का अटूट संबंध कई नवगीतों में मिलता है। बरसात का प्रेम से चिर संबंध है। इस ऋतु में प्रणय की पुरानी स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं। विरह की वेदना तीव्र हो जाती है और मिलन की आतुरता बढ़ जाती है। बादलों का अत्याचार बाढ़ के रूप में तबाही भी लाता है। बाढ़ की त्रासदी के कई वर्णन मिलते हैं। तुलसी के रामचरित मानस में सीता वियोग में राम को भी बादलों के गरजने से डर लगता है। घन घमंड नभ गरजत घोरा प्रिया हीन डरपत मन मोरा। सूर की गोपियां कृष्ण के वियोग में कहती हैं निस दिन बरसत नैन हमारे सदा रहत पावस ऋतु इन पे जब से स्याम सिधारे। कबीर की उलटवासी - बरसे कंबल भीजे पानी कबिरा बादल प्रेम का हम परि बरष्या आइ अंतरि भीगी आत्मां हरि भयी बनराई जायसी - - - नागमती की विरह पीड़ा - - चढा असाढ गगन घन बाजा साजा विरह दुंद दल बाजा -सावन बरस मेह अति पानी -भरनी परिहौं बिरह झुरानी वर्षा ऋतु सांस्कृतिक नवोन्मेष का बीजारोपण करता है।

Friday, July 1, 2022

नई पीढ़ी और एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट

शिक्षकों को समय के साथ अपडेट होना आवश्यक - डॉ सोमा बंदोपाध्याय - - भारतीय संस्कृति में शिक्षकों का दर्जा श्रेष्ठतम व अतुलनीय है और बात जब नई पीढ़ी के नव निर्माण की हो तो बिना शिक्षक के अधूरी है । इसी को मद्देनजर रखते हुए मंगलवार दिनांक 1 मार्च 2022 को नई पीढ़ी तथा राइटर्स एण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ( वाजा इंडिया) कोलकाता इकाई द्वारा "नई पीढ़ी के नव निर्माण में शिक्षकों की भूमिका" नामक ई -परिचर्चा का आयोजन हुआ। उपरोक्त परिचर्चा का संचालन डॉ वसुंधरा मिश्रा, अध्यक्ष वाजा इंडिया महिला शाखा ,कोलकाता इकाई ने किया साथ ही स्वागत ज्ञापन शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ,संस्थापक , 'नई पीढ़ी' तथा संस्थापक महासचिव, वाजा इंडिया द्वारा संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विषय प्रवेश देते हुए वाजा इंडिया, कोलकाता इकाई के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर (निदेशक ताजा टी.वी. व छपते-छपते) ने कहा कि आजादी के बाद शिक्षा में आए उतार-चढ़ाव के बीच आज शिक्षा की खिचड़ी बन गई है । उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी और वाजा इंडिया द्वारा संपन्न हो रही है यह ई-परिचर्चा हमारा ध्यान एक गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित करती है। मुख्य वक्ता के तौर पर मौजूद रही प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय का कहना था कि यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है, हमारे भारतीय परिवेश में माता-पिता के बाद शिक्षक व गुरु का ही महत्व होता है। मेरा मानना है कि शिक्षक को समय के साथ खुद को अपडेट रखना चाहिए और साथ ही यह एक गुरु का दायित्व है कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक दायित्व बोध के प्रति भी जागरूक करें । सुश्री सोमा ने आगे कहा कि आज नई पीढ़ी के पास ज्ञान व सूचना के साधन बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं तो यहां शिक्षकों के सामने नई पीढ़ी की बढ़ती आकांक्षाओं की पूर्ति भी बड़ी चुनौती हो जाती है । इस मौके पर सोमा बंदोपाध्याय ने शिक्षकों से अनुरोध किया है कि वह मानव रोबोट ना तैयार कर विद्यार्थियों को व्यवहारिक शिक्षा प्रदान करें। आपको बता दें कि प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय वर्तमान में पश्चिम बंगाल प्रशिक्षण शिक्षण योजना एवं प्रबंधन विश्वविद्यालय की साथ ही डायमंड हार्बर विश्वविद्यालय की कुलपति हैं तथा यह संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भी रह चुकी हैं। आमंत्रित वक्ता के रूप में अपना वक्तव्य रखते हुए शिक्षा सदन फॉर गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल ,हावड़ा, कोलकाता की पूर्व प्रधानाचार्य दुर्गा व्यास ने कहा कि भारतीय संस्कृति में शिक्षकों को विशेष सम्मान मिला है इसलिए एक शिक्षक का दायित्व है कि नई पीढ़ी का नव निर्माण करें । परिचर्चा के दौरान द बीएसएफ स्कूल कोलकाता की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रियंका मिश्रा ने कहा कि आज शिक्षा व शिक्षकों का व्यवसायीकरण हो रहा है । इसी तरह आमंत्रित वक्ता के तौर पर भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज पश्चिम बंगाल में कार्यरत डॉ.रेखा नारीवाल ने कहा कि आज हम वैल्यू और नैतिक मूल्यों पर समझौता कर रहे हैं। यह स्थिति घातक है । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कोलकाता के प्रतिष्ठित बिरला हाई स्कूल्स की डायरेक्टर मुक्ता नैन ने कहा कि पहले शिक्षक रोल मॉडल्स हुआ करते थे। पूर्व समय के शिक्षक स्कूल को एक जॉब नहीं बल्कि ज्ञान दान की भावना को अपना कर्तव्य समझते थे। कार्यक्रम की प्रायोजक बॉल पेन की निर्माता कंपनी ' Kolorite' रही जिसके डायरेक्टर अमित पॉल ने भी कार्यक्रम के अंत में अपने विचार व्यक्त किए। इस परिचर्चा में भारत के तमाम शहरों के शिक्षक ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। कोलकाता ईकाई में साहित्यकार रेणु गौरसरिया, साहित्य प्रेमी शशि कंकानी और बहुत संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। यह इ- परिचर्चा एक महत्वपूर्ण और गंभीर विषय को लेकर आयोजित हुई जिससे वर्तमान काल खंड में हमारा, देश, समाज व नई पीढ़ी उसमें अपना अक्स देख सके ।

लेख- ज्योत्सना मिलन

ज्योत्स्ना मिलन जानी मानी लेखिका ज्योत्स्ना मिलन का जन्म 19 जुलाई 1941 में मुंबई में हुआ था। 1965 में गुजराती साहित्य से एम.ए. तथा 1970 में अंग्रेजी साहित्य से एम.ए.किया। पिता श्री वीरेंद्र कुमार जैन भी कवि और साहित्यकार थे। घर में प्राचीन ग्रन्थ, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य सहज ही उन्हें उपलब्ध था। कई साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से घर में आतीं थीं। उस समय जो भी लिखा जा रहा था उससे रुबरु होने का भरपूर अवसर उन्हें प्राप्त हुआ। एक ओर पिता ने इनका पोषण किया तो माता ने पारंपरिक नीतियों से परिचय करवाया। वह उन्हें शिक्षा देतीं कि लड़की हो और तुम्हें वे सारे काम सीखने चाहिए जो घर चलाने के लिए जरूरी है। पिता लेखन और नौकरी में व्यस्त रहते और माँ चौदह सदस्य वाले परिवार को अकेली संभालने में । निःसंदेह इतने बड़े परिवार को अकेले संभालना संभव नहीं था, इसलिए बच्चों को भी अपनी अपनी भूमिका निभानी पड़ती थी। इनके पति- विख्यात लेखक पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह हैं। रचना-संसार : तीन उपन्यास, छह कहानी-संग्रह, दो कविता-संग्रह, ‘स्मृति होते होते’ (संस्मरण), ‘कहते-कहते बात को’ (साक्षात्कार) प्रकाशित। स्त्रियों के संगठन ‘सेवा’ के मासिक मुखपत्र ‘अनसूया’ का छब्बीस वर्ष तक निरंतर संपादन; इला भट्ट की स्त्री-चिंतन की पुस्तक ‘हम सविता’ का अनुवाद तथा संपादन; इला बहन के ही उपन्यास ‘लारीयुद्ध’ का अनुवाद। गुजराती से राजेंद्र शाह, निरंजन भगत, सुरेश जोशी, लाभशंकर ठाकर, गुलाम मोहम्मद शेख, प्रियकांत मणियार, पवनकुमार जैन की कविताओं एवं कहानियों का अनुवाद। रामानुजन तथा धारवाडकर द्वारा संपादित ‘दि ऑक्सफोर्ड एंथोलॉजी ऑफ इंडियन पोइट्री’, आरलिन जाइड द्वारा संपादित ‘इन देयर ओन वॉइस’, साहित्य अकादेमी की काव्यार्धशती, ल्यूसी रोजेंटाइन द्वारा संपादित ‘न्यू पोइट्री इन हिंदी’, सारा राय द्वारा संपादित हिंदी कहानी संकलन ‘हेंडपिक्ड हिंदी फिक्शन’, स्वीडिश में प्रकाशित भारतीय कविता संचयन में रचनाएँ संकलित। ‘घर नहीं’ (कविता-संग्रह): ‘अ अस्तु का’ (उपन्यास) और ‘खंडहर और अन्य कहानियां’ (कहानी - संग्रह) इत्यादि उनकी प्रमुख कृतियां हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से उनकी रचनाएं प्रकाशित व प्रशंसित हुई थीं । अपने इस बहु-आयामी लेखन कर्म में उन्होने दो कविता संग्रह – 'घर नहीं' और 'अपने आगे-आगे', दो उपन्यास – 'अपने साथ' और 'अ अस्तु का'. चार कहानी संग्रह – 'चीख़ के आर-पार', 'ख़ंडहर' तथा अन्य कहानियां, 'अंधेरे में इंतज़ार' और 'उम्मीद की दूसरी सूरत साथ हीं वे अनेक मानद सम्मानों से सम्मानित भी हुईं थीं । वर्ष 1985-86 के लिए म.प्र. सरकार की मुक्तिबोध फेलोशिप; वर्ष 1996 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप। वे स्त्रियों के संगठन 'सेवा' के मासिक मुखपत्र 'अनसूया' की संपादक भी थीं। उन्हें महिलाओं के उत्थान तथा उनसे जुड़े संवेदनशील मुददों को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त करने में महारत हासिल था। 1951-52 के मध्य ज्योत्स्ना मिलन ने पहली कविता लिखी, जो कि हिंदी में थी ।बाद में वह हिंदी और गुजराती दोनों में समान रूप से लिखती रहीं। एक साक्षात्कार में वे कहती हैं – हम लोग गुजरात और राजस्थान के सीमावर्ती इलाके-वागड़ के रहने वाले थे पहले वागड़ गुजरात में था, वर्तमान में राजस्थान में है ।लेकिन मज़े की बात यह है कि हम दोनों भाषाओं पर अपना हक मानते हैं। यों भी मेरी पूरी शिक्षा गुजराती माध्यम से हुई थी। बापूजी के कवि होने से हिंदी में भी मेरी सहज गति थी। कई सालों तक दोनों भाषाओं में लिखा था, अब सिर्फ हिंदी में लिखती हूँ, कभी-कभी अपनी हिंदी कहानियों का गुजराती में पुनर्लेखन करती हूँ। किसी भी कवि के लिए वह क्षण अलौकिक सा होता है जब उसे यह अनुभूति हो कि वह कवि हूँ। उनको कवि होने का एहसास तब हुआ जब एक शाम उनमें एक चकित सी करती हुई पंक्ति कौंधी, जो अन्य कविताओं से अलग थी। उनके जीवन में ‘कविता’ ने अपनी जगह तभी बना ली थी। जीवन के उतार-चढ़ाव में भी लेखन का साथ कभी नहीं छूटा।विख्यात लेखक रमेशचन्द्र शाह से विवाह के बाद उनकी कर्मभूमि भोपाल ही रही। वह अपने हर काम में ‘परफेक्शन’ को पसंद करतीं थीं, यहाँ तक कि विभिन्न दायित्यों के निर्वहन में भी। फलस्वरूप अन्य रचनाकारों के मुकाबले उनकी रचनाओं की संख्या कम ही रही। तमाम दायित्वों को सदैव पूर्णता के साथ ही निभाते हुए चलती रहीं और चलते-चलते 3 मई 2014 को इस दुनियांँ को ही छोड़कर चलीं गईं, हमेशा के लिए। हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका ज्योत्स्ना मिलन स्त्रीवादी लेखन के बरक्स ‘मात्र लेखक’ होना पसंद करती हैं। उनका मानना है सबसे पहले तो लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरूष या कोई भी वादी-नारीवादी, जनवादी, प्रगतिवादी, रूपवादी, दलितवादी आदि जो कुछ भी होता है वह बाद में होता है। कोई भी लेखक जब लिखता है तो वह यह याद रख कर नहीं लिखता कि मैं अमुकवादी हूं इसलिए मुझे इन इन चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए और इस तरह से लिखना चाहिए। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कवि शमशेर बहादुर सिंह। उनकी श्रेष्ठ कविताओं में उनकी विचारधारा या वाद का कोई अंतःसाक्ष्य नहीं मिलता। किसी भी रचना का रचना की कसौटी पर रचना के तौर पर खरा उतरना ज़रूरी है।इस अर्थ में किसी भी लेखन को लेखन और किसी भी लेखक को लेखक होना चाहिए स्त्री या पुरूष नहीं। यह नहीं कि स्त्री-पुरूष के लेखन में फर्क नहीं होता। चीज़ों को देखने का स्त्री का नज़रिया अलग होता है, उसके लेखन में इन्ट्यूशन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।बुद्धितत्व भी अक्सर इन्ट्यूशन के माध्यम से सक्रिय होता है।स्त्री - पुरुष के जटिल संबंध के बीहड़ में उतरने वाली ज्योत्स्ना मिलन की की कहानियां " बा''," धड़ बिना चेहरे का", और संभावित रुकना - - पढ़ने लायक हैं। उनका मानना है कि स्त्रीवादजैसी किसी चीज़ का अस्तित्व इस धरती पर है या नहीं, इसका कोई संबंध लेखन से है या नहीं, मालूम नहीं लेकिन इससे उनके लेखन में क्या छूटा क्या कमी रही, पता नहीं। बचपन से ही ज्योत्स्ना को घर में साहित्य का वातावरण मिला था, घर में तमाम तरह की पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं, बापूजी के छोटे से पुस्तकालय में हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगला की कई सारी पुस्तकें थीं। वैसे तो सभी लेखकों के यहाँ किताबों का भंडार होता है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि सभी रचनाकारों के बच्चे इसी वजह से लेखक बनते हों। यह ठीक है कि घर में अपने आसपास इन सब चीज़ों का होना और साहित्यिक वातावरण का मिलना भी एक अहम् तत्व है लेकिन उतना ही पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि उनका जन्म वीरेंद्रकुमार जैन के घर यों ही तो नहीं हुआ है। मुझे शब्द का वरदान मिला हुआ था. क्या वह वीरेंद्रकुमार जैन की देन थी या मेरी अपनी कमाई? या ऊर्जा का खेल भर था, पता नहीं. उनके मुताबिक शब्द की कला से ऊपर कुछ भी नहीं हो सकता ध्वनि का, अर्थ का, दृश्य का, खेल का सब कुछ का मज़ा एक साथ! स्त्री होने का अनुभव एक गहरा और संपूर्ण अनुभव मानती हैं, चाहे स्त्री का जीवन जितनी भी जहालतों से, ज़्यादतियों से घिरा क्यों न हो! स्त्री स्वयं प्रकृति है, इसलिए सृजन उसका स्वभाव धर्म है और उसका जीवन एक रचनारत जीवन है। सामाजिक अन्याय और अत्याचार को लेकर वे उत्तेजित हो जाती थीं लेकिन ख़ुद अपने लिए कुछ हासिल करने की तमन्ना या कुछ न मिल पाने का शिकवा उनके स्वभाव का हिस्सा कभी नहीं रहा। उनकी शख़्सियत की एक बेहद ख़ूबसूरत बात यह थी कि उम्र के सालों की गिनती उनके संदर्भ में बेहद बेमानी थी. हिंदी सहित्य के विराट रूप लेखक सचिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय या फ़िर निर्मल वर्मा के साथ बैठे बैठना और या फिर नवीन सागर, उदयन वाजपेयी, राम कुमार तिवारी जैसे साहित्यिक, ज्योत्सना जी दोनों ही बार सिर्फ एक दोस्त नज़र आती थीं। न वे किसी से बड़ी थीं और न किसी से छोटी। छोटे से क़द की यह औरत हर वक़्त तेज़ कदमों से आगे बढ़कर हर फ़ासले को छोटा बना देती थीं। चेहरे पर जब चश्मा लगा होता तो अकेले होंठ मुस्कराकर एक ख़ुशनुमा अहसास से भर देते थे। उनका घर अंदर से बहुत खुशनुमा और शांतिप्रिय था, वहाँ रिश्तों के बीच कोई फ़ासला न था. न मकानों का, और न हिजाबों का. उस एक घर के दरवाज़े के पीछे चार लोग होते थे – रमेश चन्द्र शाह, ज्योत्सना जी, शम्पा और राजुला. इनके परिवार की यह एक ख़ूबी रही है कि राजनैतिक और सामाजिक मसलों पर सहमति और असहमति पर एक दूसरे से खुलकर बात कर लेते मगर न कभी आवाज़ें ऊँची होतीं और न किसी चेहरे पर तनाव रह जाता। शाह साहब और ज्योत्सना जी के बीच ही नहीं बल्कि दोनों बेटियों के बीच भी एक अद्भुत सामंजस्य हमेशा बना रहा। इस सामंजस्य की तुला को हमेशा ज्योत्सना जी ही थामे हुए लगती थीं। ज्योत्सना मिलन की रचनाओं से - - - संस्मरण-- "है अभी कुछ और अज्ञेय" में अज्ञेय जी के विषय में व्यक्तिगत रूप से कुछ बातें जानना हो तो यह संस्मरण बहुत ही रुचिकर और प्रेरणादायक है। संस्मरण की कुछ पंक्तियां - - - - "अज्ञेय जी मानसिक थकान को उतारने के लिए वे कई तरह के शारीरिक काम करना पसंद करते - - जैसे मिट्टी की या चीनी मिट्टी की चीजें बनाते (पॉटरी) करते , जूते बनाते, बुनाई करते, बागवानी करते, फोटोग्राफी करते, अपने और इला के कपड़े डिजाइन करते, पकवान सहित सादा खाना भी कभी-कभी बनाते। " कहानी - -" ऊपर से यह भी" की कुछ पंक्तियां - " मैं उसे जानने लगी तब से यह पहला मौका था जब चुप्पी हमारे बीच आकर हनुमान जी की पूँछ की तरह बैठ गई थी कि हटा दो जिससे बने। वह हिलने का नाम नहीं ले रही थी। हालाँकि एक दूसरे को जानने का अभी एक छोटा-सा दौर ही गुजरा था हमारे बीच। बल्कि तो दौर कहलाने लंबा भी वह नहीं था। मुश्किल से दो - तीन दिन लंबा दौर। " कविता - -" औरत" की कुछ पंक्तियाँ - - 'प्यार के क्षणों में कभी-कभी ईश्वर की तरह लगता है मर्द औरत को ईश्वर - - ईश्वर की पुकार से दहकने लगता है उसका समूचा वजूद अचानक कहता है मर्द देखो मैं ईश्वर हूँ और औरत देखती है उसे और ईश्वर को खो देने की पीड़ा को बिलबिलाकर फेर लेती है - अपना मुँह'। ज्योत्सना की हर रचना एक भिन्न कथ्य, शिल्प, भाषा और स्वरूप में दिखाई पड़ती है जो उनकी विशिष्टता है। अपनी इसी बेहतरीन इंसानी सिफ़त के साथ ही साथ या फिर इसी सिफ़त की बदौलत ही एक बेहतरीन लेखिका और बेहद दिलकश कवयित्री के तौर पर कामयाब रही हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी रचनाएँ साहित्य जगत को प्रेरित करती रहेंगी । डॉ. वसुंधरा मिश्र, कोलकाता

लेख - देखो! ऋतुराज वसंत आ गया

देखो! ऋतुराज वसंत आ गया -- डॉ. वसुंधरा मिश्र न जाने अंतरिक्ष की लहरों में लहराता - बहता मादक, मधुर और मदिर मधुमास जीवन के उदास सूने वन खंड पर कब उतर आया! कामायनी में प्रसाद जी ने अंधकार को चीर कर आने वाले वसंत के प्रकाश की ऊर्जा को पहचाना है - - - "मधुमय वसंत जीवन - वन में बह अंतरिक्ष की लहरों में कब आए थे तुम चुपके से रजनी के पिछले प्रहरों में? " चारों ओर मस्ती और मादकता छा गई । प्रीत और गीत से , राग और अनुराग से, रंग और तरंग से, चंग और मृदंग से, गुंजार और झंकार से वन और जीवन भर गए हैं। प्रकृति सुंदरी अपनी अनुपम साज सज्जा से थिरक उठी है। चारों और हरित दुकूल बिछ गया है। "सुमन निकुंजन में" कुंजन के पुंजन में गुंजन मिलिंदन को वृंद मतवारो हैं "। बसंत के मादक वर्णन में कवियों की कल्पना भी झूम उठी। अनुराग के राग में रंग कर, प्यार में डूब कर नूतन झंकृति व वर्णन छटा लेकर थिरकती हुई आई - - - - " ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजित कुंज कुटीरे विहरति हरिरिह सरस वसंते नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरही जनस्य दुरंते।" ऐसा मदिर वातावरण, सरस वसंत और उसमें युवतियों के साथ नृत्य में निरत रसेश्वर हरि! मधु गंध लोभी मधुपों के भार से हिलती झूमती सहकार मंजरी! मैथिल कोकिल विद्यापति ने भी गाया है--- " नाचहु रे तरुणी तजहु लाज। आएल वसंत रितु बनिक राज।।" " अरी तरुणियों! नाचो, खूब नाचो , देखती नहीं वसंत आ गया! ना अब लाज नहीं! " साल भर जीवन की धारा बंधी हुई, घुटी हुई चलती है। वसंत में जीवन की धारा उफनती, कूलों को डुबोती, झूम कर बहती है, गाती हुई नाचती हुई । उन्मत्त और प्रमत्त! भौरों की गुंजार लगती है, घंटावली बज रही हो, रस की धारा मद जल सी झरती है, कुंजों से आती हुई धीमी - धीमी मादक समीर ऐसी लगती है मानो मदोन्मत्त झूमता हुआ गजराज हो। चारों ओर लताओं पर भौरों के झुंड के झुंड अंधे मतवाले हो टूटे पड़ते हैं। बिहारी ने बहुत ही सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है - - - "छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध। ठौर ठौर झौंरत झंँपत, भौंर भौंर मधु अंध।।" वसंत के त्योहार - - - "ऋतुनाम् कुसुमाकरः ।" भगवान कृष्ण ने भी ऋतुओं में अपने को "कुसुमाकर" बताया है। कुसुमाकर, सचमुच यह ऋतु कुसुमों का आकर है। पीले और लाल फूलों की बहार चारों ओर अनुराग को बिखेर देती है। हजारों वर्ष पूर्व वसंत के त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाये जाते थे। वसंत का अर्थ है" वसन्यत्र मदनोत्सव।" जिसमें मदनोत्सव बसता है, वह वसंत है। इसी के अन्य नामों में पिकानंद, माधव, पुष्प समय आदि है। वसंत ऋतु के प्रमुख त्योहार - - - - इस ऋतु में प्रमुख रूप से वसंतक, कंदर्प पूजा या मदन महोत्सव, पुष्पावचयिका, उदक - क्ष्वेडिका, शाल्मली विनोद, दोला , होली या होलिका, अग्नि उत्सव, ढौंढा, उद्यान यात्रा , सलिल क्रीड़ा आदि मनाए जाते हैं। वसंतक त्यौहार वसंत पंचमी का पुराना नाम है। यह वसंत की अगवानी करने का शुभ दिन है । इस ऋतु का सबसे मद भरा त्यौहार है मदनोत्सव। सारा संस्कृत वांग्मय इस त्यौहार के उन्मादक रस से आपूरित है। फूलों को चुनना भी सविधि संपन्न होता है । चैत्र के प्रारंभ में यह त्योहार राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है । "ओ कुण फुलडा़ बीने जी" कहकर हजारों कुमारियां आज भी राजस्थान में पुष्प चयन करती हुई या फूलों के अभाव के कारण पत्तों को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। अशोक इस ऋतु का प्रधान वृक्ष है जिसके नीचे मन्मथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती थी और जो साभरणा किसी सुंदरी के अलक्तक" रंजीत नुपूरों" से छम-छम की ध्वनि से ध्वनित वाम चरण के कोमल आघात को पाकर ऊपर से नीचे तक लाल लाल पुष्प स्तवकों से भर जाता था। इसी का नाम अशोक दोहद या अशोकोत्तंसिका है । बांस की नाली को रंगीन जल से भर दूसरों पर रंग डालना "उदक क्ष्वेडिका" कहलाती है। शाल्मली के नीचे लुकने - छपने की क्रीड़ा - शाल्मली मूल खेलन या शाल्मली विनोद है। दोला उत्सव ही आगे चलकर होली का त्योहार हो गया होगा। दोला उत्सव में होली का दहन प्रमुख है । इस प्रकार का अग्नि उत्सव संसार के अन्य देशों में भी प्रचलित रहा है। ढौंढा एक राक्षसी मानी गई है, जिसके दहन का वर्णन आता है। उद्यान क्रीड़ा व सलिल क्रीड़ा भी वसंत की मस्ती भरी उमंग का द्योतक है। हास परिहास के साथ मन की रुद्ध वासनाओं, अचेतन मानस की दमित इच्छाओं या कुंठाओं को भी बाहर निकालने का भी यह त्योहार है जिसमें अनजाने में अश्लील कथन की भी खुली छूट मिल गई है। यह अस्वस्थ चिंतन के प्रतिफल हैं । अबीर व गुलाल के स्थान पर राख व कीचड़ , प्रेम भरे गीतों के स्थान पर अश्लील रासक, चर्चरी चांचर या कबीरा का गायन - हमारी मानसिक रुग्णता का उद्घोष है, जिसको हम झांझ व झल्लरी के झनकारो, गंभीर घोषों वाद्यों के निर्घोषों और नृत्यों में बजते घुँघरू के स्वरों में छिपा नहीं सकते। मदन पूजा - - - वसंत ऋतु का प्राण स्वर है - - - मदन पूजा। मन को मथने वाला, मन में पैदा होने वाला, भगवान कन्दर्प की पूजा ही वसंत ऋतु का कामदेव है जो हमेशा ही देवता रहा है। मद से भरी आंखों वाला कंदर्प, इक्षुदंड जिसका धनुष, माला से गुंजरित प्रत्यंचा वाला, अरविंद, अशोक आम्र मल्लिका और नीलोत्पल के पांच बाण धारण करने वाला पंच शायक या उन्मादन, शोषण, स्तंभन, सम्मोहन और तापन के पांच बाणों वाला, हाथों में आम्र के नव पल्लवों में छिपकर अमोघ शर संधान करने वाला कामदेव ही है। रति प्रीति शक्ति और उज्ज्वला चार पत्नियों का स्वामी और अष्ट भुजाधारी है यह दर्प से भर देता है इसलिए कंदर्प। भगवान कृष्ण ने अपने को काम बताया है और काम को महिमामंडित किया है - - - "धर्माविरुद्धो लोकेस्मिन् कामोस्मि भरतर्षभ ।" 'हे भरत श्रेष्ठ! इस लोक में धर्म के अनुकूल काम मैं ही हूँ।' श्री हर्ष ने कुसुम आयुध पूजा की बहुत मनोरम दृश्य अपने ग्रंथ "रत्नावली" में किया है। जहां मकरंद से भरा उद्यान है, आम्रकानन है, कोयल की गूंज की झंकार है, भ्रमर पंक्ति से गुंजरित पागल सी बहने वाली मलय बयार के लिए झकोरे हैं। सुंदरियों के मदभरे नृत्य, नृत्य के वेग से केश पाश खुल रहे हैं और पुष्प स्रक बिखर कर नीचे गिर पड़े हैं। नर्तकी उन्मत्त हो, मदमस्त हो अपने स्तन भार से झुकी जा रही है, कंपायमान हो रही है। तभी तो विदूषक का भी मन नाचने और चर्चरी गाने को करने लगा है। वसंत में सभी बेठिकाने हो गए हैं। आज मदनोत्सव है न, कहीं गीतों का स्वर, कहीं नुपुरों की रुनझुन, वस्त्र स्खलित, अस्फुट वाणी - - - सभी तो क्षीबा हैं, किसी को होश नहीं रहता। "संदेश रासक" में भी चर्चरी, ताल, नाच, खेल, रुनझुन करने वाली किंकिणी से भरे वसंत का वर्णन है। यही वसंत ऋतु है जहां कुछ भी पुराना नहीं है, सभी नये होते हैं। विद्यापति ने कहा - - "नव वृन्दावन नव नव तरुगन नव नव विकसित फूल नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलिकूल ।" भारतीय संस्कृति में काम और वसंत त्यौहार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में भी प्रेम और काम का सूक्ष्म रूप वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही सृष्टि व्यापी हो चला है। अब काम देवता अपदेवता नहीं रहा, वह जीवन का देवता बन गया है। भारतीय मनीषा का निष्कर्ष था - - "काम मंगल से मंडित श्रेय"

कविता आओ देश से माफी मांगें

आओ देश से माफी मांगें भारत माता के सपूत हैं हमें माफ कर देना वेद, पुराण और संस्कृति को मन से कभी न माना आंख कान को बंद कर सबने बरसों व्यर्थ गंवाया भाषा के भावों को छोड़ा सरहद पार पहुंचाया आचार विचारों की सभ्यता का हर युग में मजाक उड़ाया शिक्षा की गुणवत्ता को हर युग में तोड़ा मोड़ा आजाद हुए इस भारत को फिर से गुलाम बनवाया करते हैं हम तो बस नाटक तिरंगे को एक दिन फहराने का फिर पूरे वर्ष भूल भारत को धर्म जाति भाषा में बंटकर मर्यादा को रखकर ताक पर अपने -अपने ही गीत अलापे किसको पढ़ना किसे पढ़ाना सब कुछ है बाहर से लाना घर के लोग तो रहे पराए आधुनिक बन चादर ओढ़े कल कारखाने और उद्योगों से बढ़ते हुए प्रदूषण में लगे पनपने तरह-तरह के किटाणु - विषाणु प्रकृति की हरियाली को ढांक दिया ईंटों से जंगल के जंगल ही काटे माना पर्यावरण को दुश्मन बन बैठे दावेदार प्रकृति के हा मनुज धिक्कार रहा जन्म लेना इस देश में बचा न सके संपदा अपनी और अपनी संस्कृति को खान पान वेशभूषा भी श्रेष्ठ और उत्तम है विश्व गुरु कहलाते थे सोने की चिड़िया थी भूल सुधार अभी भी कर लें देश माफ कर देगा आओ देश से माफी मांगें देश प्रेम की अलख जगा लें अपनी संस्कृति की रक्षा कर भारत को भारत दिखलाएं आओ गीता मानस में रमकर अपनी सोच से आगे बढ़ जाएं।