Powered By Blogger

Sunday, July 17, 2022

साहित्यिकी संस्था को प्रभात खबर में स्थान मिला दिनांक 17.07.2022

प्रतिस्पर्धा की दौड़ के बीच साहित्य के प्रति रुझान पैदा करती “साहित्यकी" वर्तमान समय की जरुरतों के बीच आज जब अधिकांश लोग आर्थिक व सामाजिक महत्वाकांक्षाअों को मन में पाले प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सिर्फ दौड़े जा रहे है. लोगों में संवेदनाअों का खास एहसास बनाये रखने के लिए साहित्यकी संस्था प्रतिबद्ध होकर कार्य करती आ रही है. यह संस्था महिलाअों को न सिर्फ लेखन विद्या में ही आगे तक जाने के लिए प्रेरित करती है बल्कि योग्य प्रतिभाअों का समय-समय पर उचित सम्मान भी करती है. लेखन कला में रुचि रखने वाली महिलाअों को यह संस्था एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करती है. एक एेसा मंच जहाँ योग्य प्रतिभा की कद्र है अौर संवेदनाअों- भावनाअों को समझने वाले लोग है. संस्था की अध्यक्ष विद्या भंडारी कहती है -आज के समय की जरुरतों ने लोगों के जीवन को एक दौड़ में बदल दिया हैं. मानवीय मूल्यों से संपृक्त लोगों में साहित्य के प्रति लगाव व अभिरुचि कमतर होती जा रही है. जबकि सत्य यह है कि साहित्य हर युग में प्रांसगिक है.यह जीवन को एक ध्येय प्रदान करने वाली विशेष आवश्यक विषयवस्तु है. साहित्य के बिना जीवन नीरस अौर अनुभव हीन है.यह भावनाअों की अभिव्यक्ति है तो इसमें संवेदनाअों का एहसास है. साहित्य का महत्व न कभी खत्म हुआ है अौर ना ही कभी खत्म हो सकता है. साहित्य ही मनुष्य को अपूर्णता से पूर्णता की अोर ले जा सकता है. साहित्य के इसी महत्व अौर उद्देश्य को महसूस करते हुए डॉ. सुकीर्ति गुप्ता ने 1998 में “साहित्यकी” संस्था की स्थापना की थी. उन्होंने साहित्य लेखन, पठन-पाठन में रुचि रखने वाली बौद्धिक विचारों की महिलाओं को इस संस्था के माध्यम से जोड़कर एक सुंदर लेखकीय मंच प्रदान किया. थोड़े ही समय में संस्था की लोकप्रियता बढ़ी अौर देखते ही देखते लेखन कला में रुचि रखने वाली कई महिलाएं संस्था से जुड़ती चली गई.अध्ययन- अध्यापन से जुड़ी महिलायें ही नहीं बल्कि साहित्य के प्रति रुचि रखनेवाली घरेलू शिक्षित महिलायें भी साहित्यिकी से जुड़ीं अौर अपनी लेखन कला को विस्तार रूप दिया. मंच के माध्यम से उन्हें काफी अच्छा प्रोत्साहन मिला. प्रतिभाएँ अौर निखरती चली गईं. सदस्याओं को लेखन कला को अौर अधिक विकसित करने और विस्तार रूप देने के लिए संस्था ने एक हस्तलिखित पत्रिका 'साहित्यिकी' का प्रकाशन भी आरम्भ किया. विद्या भंडारी ने बताया कि साहित्यिकी के तत्वावधान में प्रत्येक मास एक गोष्ठी का आयोजन भी नियमित रूप से किया जाता है जिसमें विभिन्न विषयों, पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित होती है. विद्या भंडारी संस्था की गतिशील यात्रा पर चर्चा करते हुए कहती है- 2013 में डॉ. सुकीर्ति गुप्ता का निधन हो गया. उनके निधन के पश्चात् कुसुम जैन, डॉ किरण सिपानी के सहयोग के साथ मुझे अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी मिली. हम सभी ने मिलकर कोशिश की कि संस्था गतिशील और सक्रिय बनी रहे. विद्या भंडारी कहती है कि किसी एक परिवार की तरह आप हमारी इस संस्था को समझ सकते है. हमारी इस संस्था में सभी सदस्याओं के बीच एक अपनापन और अनुराग भरा है. इसी की बदौलत वरिष्ठ व युवा सदस्याओं में एक सुंदर समन्वय दिखाई देता है. सभी सदस्याओं की सामूहिक साझेदारी के बल पर ही संस्था ने न सिर्फ कोलकाता बल्कि पूरे भारत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. हमें इस बात की खुशी है कि एक परिवार की तरह साहित्यिकी संस्था का सघन वृक्ष के रूप में निरंतर विस्तार हो रहा है. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था की सबसे विशेष बात यह है कि कोलकाता में कार्यरत हिन्दी की लगभग सभी प्राध्यापिकाएंँ एवं अध्यापिकाएँ इस संस्था की सक्रिय सदस्याएंँ हैं. सभी मार्गदर्शक के रूप में संस्था की प्रगति के लिए निरंतर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहीं हैं. विद्या भंडारी कहती हैं कि संस्था 24 वर्षों से निरंतर साहित्यकारों और पुस्तकों पर चर्चा के कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है. विशिष्ट साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति का कार्यक्रम तो आकर्षक होता ही है. इसके अलावा हम समय-समय पर काव्य गोष्ठी का आयोजन करने के साथ प्रसिद्ध कवियों और साहित्यिकारों को आमंत्रित कर अपना ज्ञानवर्द्धन करते रहते है. विद्या भंडारी कहती हैं कि साहित्यकारों में भीष्म साहनी, केदारनाथ अग्रवाल, अमृत राय, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी इत्यादि सुप्रसिद्ध साहित्यकारों पर चर्चा होती रही है.आशुतोषजी, शंभूनाथजी, सुधा अरोड़ा ने इन चर्चाओें में भाग लेकर संस्था का गौरव बढ़ाया है. डॉ अजय राय ने अब तक प्रसाद,पंत,निराला,महादेवी इत्यादि कई साहित्यकारों की कविताओं की संगीतबद्ध प्रस्तुति साहित्यिकी मंच के माध्यम से दी है. साहित्यिकी संस्था की मंत्री डॉ मंजुरानी गुप्ता ने जानकारी देते हुए कहा कि हमारी संस्था पुस्तकों ने महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन भी किया है. जैसे (प्रिय कोलकाता तोमाके भालो बाशि-संपादक सिद्धेशजी व विद्या भंडारी -काव्य संग्रह-बांग्ला अनुवाद सहित), ( दर्पण- लघुकथा संग्रह- संपादक-मंजुरानी गुप्ता व विद्या भंडारी), (विचार सरणी- संपादक-किरण सिपानी व विजय लक्ष्मी मिश्रा) (विसंगतियों के व्यूह में-मधुबाला रोहतगी, रेवा जाजोदिया एवं सरोजिनी शाह) , (यादों के झरोखे से-यात्रा संस्मरण-रेणु गौरिसरिया, विनोदिनी गोयनका व आशा जायसवाल), ( स्त्री लेखन-स्त्री दृष्टि-गीता दूबे-रेशमी पांडा मुखर्जी),( सद्य- पर्यावरण पर प्रकाशाधीन पुस्तक- जिसमें देश के कई लेखकों की रचनाएँ सम्मिलित हैं -गीता दूबे) के अलावा अध्यक्ष विद्या भंडारी की चार पुस्तकों का प्रकाशन भी साहित्यिकी प्रकाशन से ही हुआ है. इसके अलावा देश की एक मात्र हस्तलिखित पत्रिका के 30 अंकों का प्रकाशन भी संस्था अब तक कर चुकी है. विशेष जानकारी देते हुए पदाधिकारियों ने बताया कि हस्तलिखित इस पत्रिका के संपादक को सभी को अवसर देने के उद्देश्य से समय -समय पर बदला जाता है. वसुंधरा मिश्र, राज जैन, कमलेश जैन, सुनंदा रायचौधरी, गीता दूबे, मंजुरानी गुप्ता, सुषमा हंस, रेशमी पांडा मुखर्जी, कविता महरोत्रा, विद्या भंडारी आदि किरण सिपानी के सहयोग के साथ इस पत्रिका का संपादक बनने का सौभाग्य पा चुकी है.

No comments:

Post a Comment