Thursday, July 21, 2022
साहित्यिकी में अध्यक्षीय वक्तव्य
साहित्यिकी संस्था में अध्यक्षीय वक्तव्य - - -
साहित्यिकी संस्था की मैं हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मुझे यह गुरुभार दिया। आदरणीय रेणु गौरीसरिया जी और प्रमिला धूपिया जी को प्रणाम करती हूँ जिन्होनें अपनी रचनात्मकता से हम सभी को समृद्ध किया। यह सच है कि किसी भी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को पूर्णतया समझना कठिन कार्य है। एक लेखक जिस समय जैसी रचना लिख जाता है बाद में पढ़कर स्वयं भी अपनी रचना को देख अचंभित हो जाता है कि क्या ये मैंने ही लिखा था। अभिव्यक्ति की इच्छा ने अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने तथा दूसरों तक पहुंचाने के माध्यम से भाषा को जन्म दिया। शब्द या वाणी बाह्य अभिव्यक्ति के कारण हैं। वाणी और मन दोनों की जोड़ी है। विचारकों ने इसे मनोमय जगत् कहा है। भारतीय चिंतन पद्धति वर्तमान जीवन को पूर्वजन्म के कर्मों की वासना का परिणाम मानती है। वासनाओं को संस्कार भी कहा गया है। तभी रचनाकार को मनीषी, स्वयंभू तक कहा जाता है।
कालिदास ने भी कहा है कि - - -
फलानुमेयाः प्रारंभाः संस्काराः प्राक्तना इव।
डॉ नगेंद्र मानते हैं कि सर्जना के लिए पहली आवश्यकता है अनुभूति की भोगावस्था समाप्त हो संस्कार में परिणत होना।
अज्ञेय ने जीवन द्वारा भोगी हुई अनुभूतियों को कच्चामाल कहा है जिसको सर्जक की प्रतिभा कूट पीस कर रचना का रूप दे देती है। यही आधुनिक युग में आभ्यंतरी करण प्रक्रिया कही गई है। राजशेखर ने प्रतिभा के दो रूप बताए हैं जो कारयित्री और भावयित्री है जो रचनाकार के रचनात्मक भावों को आकार देते हैं।
सृजन प्रकिया अनुभवों के ग्रहण एवं संचयन से प्रारंभ होती है। हमारा अज्ञात मानस अनेक विचारों तथा अनुभवों से भरा है जो अनुकूल परिस्थितियाँ एवं प्रेरणा पाकर चेतन धरातल पर आते हैं। अचेतन मानस में स्थित भाव, विचार या अनुभव को जागृत करने के लिए संवेगात्मक परिस्थिति का होना अनिवार्य है। कालिदास का यह श्लोक इस विषय को उजागर करता है - -
रम्याणी वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्
पर्यत्सुकी भवति यत्सुखिनो$पि जन्तुः ।
तच्चेतसा स्मरति नूनमबोध पूर्वं
भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि ।(अभिज्ञान शाकुंतलम् 5/2)
सृजनात्मक कार्य अचेतन की गहराइयों से उद्भूत होता है। रचनाकार का संबंध अनुभव, अनुभूति और अभिव्यक्ति के बीच अन्तर्केन्द्रित होता है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसी सत्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है - -' ये सभी आत्माभिव्यक्ति के माध्यम हैं चाहे वे शब्दों, स्वरों, रेखाओं और रंगों की भाषा द्वारा हो (आर्ट एंड एस्थेटिक, पृष्ठ 9)।'
साहित्य का प्रयोजन आत्मानुभूति ही है और इसका प्रमुख श्रेय जाता है लेखक की वर्णन -क्षमता और साथ ही श्रोता या पाठक की ग्रहण शक्ति पर। रचनाकार या साहित्यकार जब तल्लीन होकर रचना करता है तो वह उसी तरह का भाव पाठकों के मन में भी उत्पन्न करता है।
मुक्तिबोध लिखते हैं कि सत्य का प्रकाश सत्य से भिन्न है। साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश है किंतु हमें प्रकाशों में सत्य को ढूंँढना है। हम केवल साहित्य की दुनिया में नहीं, वास्तविक जीवन में रहते हैं।
साहित्य के सहित अर्थ से संश्लिष्ट रह, साहित्यकार या लेखक जब अपनी कल्पनाशीलता का उच्छ्वास लेखनी के माध्यम से करता है तो अभिप्रयुक्त कौशल रचनाधर्मिता का विशेषण पाता है।
आज हम जितने भी बड़े साहित्यकारों को जानते हैं, उनकी वाक् शक्ति के कारण ही जानते हैं। किसी भी रचनाकार की रचनाधर्मिता एक स्वच्छंद इकाई है जो पूर्णतः व्यष्टिगत होती है। यह लेखक के मानस की व्यापकता और भौतिक मानसिक परिवेश की उन सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंगों से जो चेतन - अचेतन मन को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
कहने का तात्पर्य है कि रचना धर्मिता और शिल्प सजगता दोनों पायदानों पर टिका होता है लेखक का साहित्यिक अवदान।
सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास, संवेदन शून्यता, भौतिकवाद की अंधी दौड़, पर्यावरण आदि बहुत से ज्वलंत प्रश्न है जो समय और समाज से टकराते हैं।
किसी भी साहित्यकार से उसकी रचना धर्मिता को सुनना उसके अनुभवों से रूबरू कराती है। इस तरह के संज्ञान से रचना के संप्रेषणीयता बढ़ती है।
रचना के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है जिससे पाठक संसार में वृद्धि होती है।
लेखिका शब्द साधक हैं। प्रभाव तभी पड़ता है, जब प्रभावशाली शब्द आयेंगे । महादेवी वर्मा ने 1956 में ' पथ के साथी' संस्मरण साहित्य में अपने समकालीन लेखकों का संस्मरणात्मक वर्णन किया है ।
डॉ नगेंद्र ने भी माना है कि साहित्य आत्मकथ्य भी होता है।
पश्चिम की आंधी से जब हम संत्रस्त थे रवीन्द्र नाथ ने पश्चिम की इस हृदय हीन यांत्रिक सभ्यता, स्वेच्छाचारिता और साम्राज्य लिप्सा का घोर विरोध किया।
रक्तकरबी की यक्ष पुरी का राजा भी शक्ति और सत्ता के मद में कहता है' या तो प्राप्त करूंगा नहीं, तो नष्ट हो जाऊंगा'।
गुजराती कवि उमाशंकर जोशी कहते हैं, 'जो जन्महीन और भविष्य में दीन बनकर जिएंगे, उन सबके कलंक का अन्याय कर्ण अपने रक्त से धोता है। वस्तुतः कर्ण एक ऐसा अभागा व्यक्ति था जिसका जीवन उसकी माता ने नष्ट किया, जो सदैव पूर्णतः अलगाव की स्थिति में रहा।
दुर्गा भागवत के शब्दों में,' प्रत्येक युग में, प्रत्येक व्यक्ति में, प्रत्येक दुख और निराशा के क्षण में, सुख की लालसा में, पराक्रम के दुर्दम्य आवेग में, स्नेह के अविष्करण में एक कर्ण स्थान - स्थान पर अवतीर्ण होता है, मात्र क्षणार्ध के लिए परंतु सब की वेदना को अपने अंदर लेता हुआ दिखाई पड़ता है।
19 वी सदी का इतिहास विश्व व भारतीय जन- जागरण का नवोत्थान था और बीसवीं सदी में अंतिम सांस ली और 21वीं सदी भी आ गई जो परिवर्तन की नई सदी है।
एक ओर हमारे देश में महात्मा गांधी जैसे अवतारी पुरुष हुए तो दूसरी ओर मार्क्स और आइंस्टाइन जैसे चिंतक और मनोवैज्ञानिक भी हुए जिन्होंने मनुष्य के जीवन और उसकी पद्धति को नवीन आयाम दिए।
19 वीं सदी का युग मानववाद के विकास का युग था। मानववाद का ध्येय था मानव समाज की समान समस्या और समयानुसार चुनौतियों का सामना करना।
'कभी तो अनुभूति उमडेगी, प्लवन का सांद्र घन बन।'
अतीत के धरातल पर ही वर्तमान फलता - फूलता है और भविष्य की ओर अभिमुख होता है।
साहित्य के इतिहास में अतीत जड़ और अविस्मरणीय नहीं रहता। वह तो एक गवाक्ष है जिससे वर्तमान का क्षितिज स्पष्ट दिखाई देता है। वाक् की सिद्धि उन तपः पूत साधकों से ही होती है, समाज के नई चेतना को प्रमाणित करती है।
महाश्वेता जी ने कहा था कि भारत की संस्कृति की वास्तविक परख और पहचान हम हिंदी साहित्य के माध्यम से ही कर सकते हैं।
अर्नेस्ट फिशर के शब्दों में कलाकार अपने युग के विचारों, पूर्वाग्रहों, मूल्य बोध और वैचारिकता से अछूता और स्वाधीन नहीं रहता।
उसका समय उसे गतिमान करता है, बनाता है और विकसित करता है। वह उपेक्षा को अपेक्षा समझता है।
कला या सृजन समाज के ध्रुवकेंद्र का परिवेषण करती है।
इनसे ही उन प्रत्ययों का समावेश होता है, जो उसके कृतित्व को स्वांतः सुखाय बनाता है तो परार्थ सुखाय भी।
आदर्श समाज किसे कहेंगे? जहांँ संन्यासी भी गृहस्थ और गृहस्थ भी संन्यासी होंगे अथवा दोनों के बीच कोई भेद नहीं होगा।
विवेकानंद, अरविंद, गांधी जिस ध्येय को लेकर चले उसका सामाजिक रूप यह है कि वहाँ धर्म को केवल चंदन, कंठी, माला, पूजा, होम और मंदिर तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि समग्र जीवन ही उसमें एक साधना की तरह है।
अज्ञेय की पंक्तियाँ हैं - -
'कहा तो सहज पीछे लौट देखेंगे नहीं
पर नकारों के सहारे कब चला जीवन?
स्मरण को पाथेय बनने दो'
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