Saturday, May 21, 2022
पूर्णमिदम् उपन्यास को पढ़ते हुए
पूर्णमिदम् उपन्यास को पढ़ते हुए - - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
सरोज कौशिक का उपन्यास 'पूर्णमिदम्' एक ऐसी प्रेम कथा है जहाँ आनंदमयी धारा का अनवरत प्रवाह है जो निरंतर छलछलाता रहता है। ऋचा और वीरेश्वर के प्रेम की परिभाषा पूर्णमिदम् की अंतरात्मा है जिसके फलस्वरूप 'एकांत और पवित्रता भरा पथ, रथ और साथ प्राप्त होता है। पूर्णमिदम् की सुगंध सा साथ। यह सच पूर्ण है, साथ पवित्र है, शेष असत्य है'। (पृष्ठ 77) ईशोपनिषद् के प्रथम श्लोक 'ओम् पूर्णमिदम् पूर्णमदः पूर्णात 'से प्रेरित शीर्षक उपन्यास की कथा अपनी शीर्ष ऊंँचाइयों को छूती है।
प्रेक्षा, तितिक्षा और मुमुक्षा तीन खंडों में विभाजित उपन्यास की कथा आकार लेती है। विरेश्वर के साथ ऋचा संसार के अच्छे बुरे को , द्वंदों को सहने की शक्ति को और मोक्ष की कामना को, जीवन के तीन पड़ावों की यात्रा करती है तभी तो उसे अपने मित्र वीरू में 'एक गहरी आश्वस्ति एक पूरे विश्वास यात्रा की पूर्णता का पूर्ण सामर्थ्य मिला है पूर्णमिदम् की यात्रा'में। (पृष्ठ 106)
मानवीय आत्मा की गहराइयों में एक जैसी वस्तु रहती है जिसे हम सत्य की खोज, न्याय की मांग और सत्याचरण की उत्कंठा कह सकते हैं। जीवन के प्रति निष्ठा और वफ़ादारी का तकाज़ा है कि हम अपनी सृजनकारी रहस्यमय शक्ति को जानें और उसके अनुसार अपने जीवन को श्रीमंडित करें। भौतिक प्राणी होते हुए भी इस उपन्यास की प्रमुख नायिका ऋचा अपनी मानवीय भावनाओं को आध्यात्मिक प्राणी के रूप में उच्चतम उपलब्धि को प्राप्त करने में सफल होती है। डॉ. राधाकृष्णन का मानना है कि हर स्तर पर अनुभव अपने उच्चतम स्तर पर पहुंँच जाए तभी जीवन की पूर्णता है। यह तो प्रकृति से ही सबको प्राप्त है। जिस आत्मा ने अपने को पा लिया है वह जगत के सभी लोगों के साथ एकता का अनुभव करने लगती है। इसे कह सकते हैं कि 'तू मुझमें है और मैं तुझमें' ।
उपन्यास समन्वयवादी दृष्टिकोण से मानवीय होने की यात्रा को विश्लेषित करती है। साथ में, भारत में व्याप्त जातिगत भेद-भाव और उसकी कलुषित भावना को पूर्ण रूप से पवित्रता की ओर ले जाने का सद्प्रयास इस उपन्यास में हर स्थान पर दिखता है साथ ही रिश्तों और संबंधों की प्रगाढ़ता और नैतिक मूल्यों-मान्यताओं और आदर्शों को स्थापित किया गया है। ऋचा ने अपने पिता के आत्म-सम्मान को कभी ठेस नहीं पहुंँचाई। 'आत्मग्लानि और आत्मदया से बड़ा और कोई पाप नहीं होता' यह उसके पिता द्वारा दिए गए मंत्र थे जिसका उसने जीवन पर्यंत पालन किया।
लेखिका सरोज कौशिक का बंगाल से गहरा रिश्ता रहा है जो उपन्यास में स्थान - स्थान पर कला, साहित्य, संगीत और दर्शन के वाक्यों के माध्यम से व्यक्त होते रहते हैं। फिरोजपुर पंजाब में जन्मी लेखिका ने अपने आठ वसंत के प्रेम अनुभवों का निचोड़ इस उपन्यास में उड़ेल दिया है।
कथा की शुरुआत ही बंगाल की धरती से होती है।
बंगाल के गांव त्रिवेणी के बड़े जमींदार सेठ रामदास का घराना कथा के सूत्रों को अंत तक जोड़ता चला जाता है जो एक उपन्यास की विशेषता होती है। अंग्रेजों के जाने के बाद सारी जमींदारी सरकार की जेब में चली गई फिर भी सेठ को कलकत्ता में कई मकान, एक पुश्तैनी राजबाडी़ तो विरासत में मिल ही गए थे। (पृष्ठ 11)सेठ जी की इकलौती बेटी गौरा जब मात्र डेढ़ साल की थी, सेठ जी की पत्नी परलोक सिधार गईं। मारवाड़ी सेठ 'पैसा फेंक, तमाशा देख' को महत्व देते हैं और वे मदारी समाज के सदस्य भी थे । उनके दोस्त मिस्टर अग्रवाल का कलकत्ता के प्रसिद्ध करनानी मेंशन में पुराना फ्लेट था जिसमें रात को महिलाओं के साथ खेल खेला जाता था। सेठजी को बुर्जुआ मारवाड़ी समाज का कोई भय नहीं था क्योंकि उन्होंने इन सबकी सभ्यता की धोती को यहाँ खुलते हुए देखा था। वे मारवाड़ी समाज की वास्तविकता से पूर्ण परिचित थे।
यहीं से कथा मोड़ लेती है। सेठ जी की एक बेटी गौरा के लिए 'दैया' रख देने भर से उनके पितृऋण की जिम्मेदारी पूरी हो रही थी और जब सब कुछ रुपये फेंकने से मिलता है तो वे भला दूसरा विवाह क्यों करें? उनकी जवानी को लुभाने वाली बहुत - सी वस्तुएँ उपलब्ध थीं। छुट्टियों में गौरा भी पिता के साथ गांँव जाती जहाँ हवेली में पंडित नवलकिशोर जी गौरा को हिंदी, संस्कृत की शिक्षा देते और साथ में उसका सखा वीरेश्वर बैठता। पंडित जी की बेटी ऋचा भी उसकी सखी थी लेकिन वह वीरेश्वर के पास बैठना पसंद करती।पंडित जी विद्या को माँ सरस्वती मानते थे और माँ को बेचना तो उनके आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाता था अतः 'जहाँ सरस्वती होती है वहाँ लक्ष्मी की कृपणता तो स्वभाविक है।' (पृष्ठ 11) सेठ रामदास वेणीमाधव शिव मंदिर के पास मठ के स्वामी स्वरूपानंदजी के साथ ज्ञान की चर्चा जरूर करने जाते थे।
वीरेश्वर कुम्हार का बेटा जो ऋचा का नित्य साथी था। वीरेश्वर बारह वर्ष का और ऋचा नौ वर्ष की। गांँव के अन्य बच्चों में टुकटुकी, वासु, वीरेश्वर, संध्या, मदन इन सभी से ऋचा की दोस्ती थी लेकिन ऋचा वीरू यानी वीरेश्वर की बंसी की धुन पर नाचने वाली राधा थी। बचपन का साथी वीरू उसके मन- मस्तिष्क में बसा उसका मनमोहन था जिसने हर कदम पर उसका साथ दिया।
ऐसे ही समय फिसलता चला गया और युवा होती बेटी ऋचा के गरीब और कमजोर पिता नवल पंडित अपनी बिमारी से चिंतित हो गए , उनके दिमाग में एक अजीब - सी सुगबुगाहट थी और उन्होंने निश्चय किया कि वे अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उसे गोपीवल्लभ मंदिर के अधीन रख निश्चिंत हो जाएंगे ।यह जानते हुए भी कि वह देवदासी के समान रहेगी। ऋचा भी तो अपने बापू की बेटी थी और माँ भी। सेठ जी ने समझाया भी कि अपने पिता जी की भावुकता में अपने जीवन को व्यर्थ न करे। लेकिन उसे पिता की कातर दृष्टि के आगे अपना वर्तमान भविष्य सब महत्वहीन लग रहे थे। उसे लगा पितृ ऋण एक त्याग मांग रहा है। पंडित जी ने उसे वैदिक ऋचाओं, गीता के श्लोक, संस्कृत साहित्य और रामायण का पूर्ण ज्ञान दिया था। उसका कंठ भी मधुर था, जब वह मंदिर में 'श्रीराम चंद्र कृपालु भज मन' गाती तो मंदिर का वातावरण भक्ति की संगीत लहरी से गूंँज उठता। (पृष्ठ 12) ऋचा की माँ भी तो घर की गरीबी से ऊब कर अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी।
ऋचा संकल्प लेती है और वह स्वयं मठ में गोपीवल्लभ को समर्पित हो जाती है ।
वीरू ने जब ये सब सुना तो उसने अपनी बंसी को तालाब में फेंक दिया क्योंकि अब ऋचा के बिना उसके लिए बंसी, तालाब, वट-वृक्ष और वह खुद सब कुछ अर्थहीन हो गए।
पंद्रह दिन के अंदर ही ऋचा के पिता भी चल बसे। उसकी सहेली टुकटुकी से सूचना मिली। वह कमजोर पड़ने लगी थी लेकिन फिर उसे पिता की कातर भरी आँखों का स्मरण हो आता है।
मठ के स्वामी स्वरूपानंद ने उसे समझाते हुए कहा था कि देख बिटिया वासनाएंँ और मोह को त्यागने से ही सच्ची दृढ़ शक्ति प्राप्त होती है। पितृ- परितोष नचिकेता ने यम से पहला वर यही मांगा था। पिता की शांति को ही अभीष्ट मान कर चलो और स्वामी जी जो उसके बाबा थे, उन्होंने जीवन जीने का महत्वपूर्ण अजपाजप मंत्र
'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शांतिः शान्तिः शान्तिः' जपने का आदेश दिया। दुख, सुख, क्लांति, शांति, अँधेरे, उजाले में रोज जपते रहना।
'भवतु सर्व मंगलम् 'का आशीर्वाद दिया। ऋचा को इस शून्यपथ की सूक्ष्मता का तनिक भी भान नहीं था। स्वामी जी ने इसकी गतिमति को पढ़ लिया था तभी तो उन्होंने एक दिन रामदास से कहा था कि ऋचा को देखकर उन्हें अश्वपति की कन्या 'सावित्री' का ध्यान आता है। श्री अरविंद द्वारा रचित' सावित्री' महाकाव्य की सावित्री सी नवलवधू, शिखाजात, सुगंधित, एक अनुपम और आत्मा की चौंध सी ऋचा का सुंदर और उन्नत भविष्य देख रहे थे। रामदास ने कहा कि यह असंभव है। बाबा ने कहा था यह 'विधि का रहस्य है। रहस्य के उस पार मैं देख पाता हूँ रामदास। प्रकाश में चढ़ने हेतु अँधेरे की गुहार ने इसे यहाँ ला छोड़ा है।' (पृष्ठ 16) यही फेट, डेस्टिनी, और विधि - भवितव्यता है।
सभी कलाओं में पारंगत अतिमानसिक सृष्टि के स्वामी जी ने ऋचा को मृदंग की ताल पर नृत्य, संगीत, शास्त्रीय संगीत, बाउल गीत, कालिदास, गीत गोविंद, ध्रुपद, ख्याल, चैती, कजरी, ठुमरी, दादरा सभी सिखा दिया। इसी वीणा की झंकार के साथ नुपूर की रुनझुन में खोने लगी बंसी की धुन। रवीन्द्रनाथ से प्रेरित होती। संपूर्ण समर्पण की भावना से आगे बढ़ने का संकल्प लेती।
मठ ही अंतिम सच नहीं है यह सोचती है। 'आत्मान् सतत रक्षते 'अपनी रक्षा हर सच के सामने करते रहना होगा।( पृष्ठ 17)
बाबा भी चल बसे अचानक ऋचा का फिर सबकुछ ठिठक कर रह गया। उधर वीरू भी गौरा का पता लेकर कलकत्ता भाग आता है। ट्रेन में मिली एडिटर इति भार्गव उसकी नौकरी लगवाती है जहाँ वह अखबार की सर्वेसर्वा बड़ी साहित्यकार विभा जी के काले कारनामों से वाकिफ हो जाता है और नौकरी त्याग देता है। सौगत दा के यहाँ उसकी मुलाकात गौरा से हो जाती है। सौगत वीरू की प्रतिभा को समझते हैं और गौरा को आश्वस्त करते हैं कि दलित की माटी - शहर के कीचड़ में मिलने को तैयार नहीं है, वह अपना प्रकाशन हाउस बना लेगा। वह शूकरवृत्ति वाला यानी जो नाक की सीध में चले, वैसा है।
टुकटुकी के कारण वीरू के साथ ऋचा का फिर मिलन होता है। वीरू शहर जरूर गया था लेकिन उसकी आत्मा गांव में ही थी।
गाँव की रामलीला में जब सीता हरण चल रहा था उस समय ऋचा के कमरे में शराब पीकर महंत आते हैं और कहते हैं कि टुकटुकी या दलित वीरू की मुझे परवाह नहीं है। रामलीला में सीताहरण और मठ में शीलहरण का दृश्य चल रहा था।
मठ महंत अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और उसके साथ दुष्कर्म होता है। सखी टुकटुकी रामलीला जाने के लिए ऋचा का इंतज़ार कर रही थी।वह मठ की ओर दौड़ पड़ती है और चीख निकल जाती है 'कि शर्बनाश' और संज्ञाशून्य ऋचा को हौसला देती है और गाँव छोड़ कर कलकत्ता चलने के लिए कहती है। टुकटुकी और वासु (ऋचा की बालटोली से)
ऋचा अपने डूबते हुए जीवन से फिर एक बार हार नहीं मानी है और स्वयं को मृत्यु को समर्पित नहीं करती। ऋचा को बारिश के पानी में खिड़की के कोने पर अटकी चींटी में अपने अस्तित्व को देखती है और निर्णय लेती है।
कलकत्ता में वीरू को जब इस हादसे का पता चलता है तो वह हतप्रभ सा हो गया और इति को सभी घटनाओं से अवगत कराता है। इसमें इति उसकी सहायता करती है क्योंकि वह वीरू के स्वाभिमान और ईमानदारी और उसके संकल्पबद्धता से परिचित है। वह मन और वचन के संकल्पोट पको लेकर उतना ही गंभीर और भरोसेमंद है। दलित जाति के मूल्य और आदर्श किसी भी सवर्ण विचार वालों से किसी भी मायने में कम नहीं है।
यह सच है कि गाँव से शहर की यात्रा भी लोक लाज, ताने- व्यंग्य, निन्दा आदि से दूर नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि भारत भले ही पाश्चात्य रंग में कितना ही रंगा हो, अपनी संस्कृति और संस्कारों के बीज किसी न किसी में इतनी गहराई से व्याप्त होते हैं कि उस चकाचौंध का खात्मा होकर ही रहता है और भारतीय मूल्यों की स्थापना होती है । उपन्यास में ऋचा और वीरेश्वर के प्रेम की कहानी स्त्री जीवन के साथ साथ स्त्री पुरुष संबंधों के बारे में एक नई दृष्टि देती है। (पुस्तक से)
उपन्यास की नायिका ऋचा का बिन ब्याही माँ बनना, पार्टियों और समाज में निंदा होना और दलित कुम्हार के बेटे वीरू के साथ केवल प्रेम के सहारे विश्वास से पूरा जीवन बिताना। यहाँ तक कि बेटी प्रज्ञा को भी बाद में पता चलता है कि वीरू ही उसके पिता हैं।
ऋचा एक बड़ी लेखिका के रूप में उभरती है। प्राची कहती है कि "ऋचा में जो रचनात्मक आवेग है, अभिव्यक्ति की ऐसी निस्सर्ग ऊर्जा का आधार है। ऐसा आधार जिसके लिए व्यक्ति सारी उम्र पत्थरों पर सिर पीटता रह जाए और वह उपलब्ध नहीं होता। इसमें वह उद्गम पूरा है, स्वयंभू - स्वतः सम्पूर्ण"। स्मृतिचरण ऋचा की अॉटोबायोग्राफी है जिसमें अस्मिता शब्द को अन्तरात्मा के रूप में ही लिखा है। आध्यात्मिक अभीप्सा का विकास है। उसकी दृष्टि में रचनाकार को सत्यनिष्ठ, धर्म का गंभीर ज्ञान और कला से युक्त होना चाहिए। ऋचा स्वयं को दलित वीरेश्वर के ज्ञान की छाया मानती है और स्थापित करती है कि वह किसी झूठ के सहारे न वह ऊंँचा उठा है और न ही उसने किसी को नीचा दिखाने की कोशिश की है। गौरा के मुँख से उपन्यासकार ने कहलवा कर और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि ऋचा और वीरू को अलग करके देखने में आत्मा के दो खंडित टुकड़े नजर आएंगे। (पृष्ठ 51) प्रेम की पराकाष्ठा का ऐसा अनोखा चरित्र अन्यत्र दुर्लभ है।
इस उपन्यास ने क्रांतिकारी आतंकवाद, माओवादी और तस्करी का बहुत ही सजीव और मार्मिक वर्णन है। वहाँ भी अच्छाई को प्रतिष्ठित किया गया है।
रामदास बाबूसा को ऋचा की उन्नति और दृढ़ता के कायल हो गए थे। उनको स्वरूपानंद की बातें याद हो आई। रामदास का पूर्ण विश्वास था कि ऋचा के "घर में अभी त्रेतायुग का दर्शन हो रहा है, सतयुग इनके जीवन के बाहर खड़ा है "(पृष्ठ 59) ।
एक चायनीज कहावत है कि तुम दुःख के पक्षियों को अपने ऊपर उड़ने से रोक नहीं सकते हो, लेकिन अपने सिर पर घोंसला बनाने से जरूर रोक सकते हो, अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए विवाह जैसे अटूट संबंध को भी हटा देना बुद्धिमानी और सही कदम है। पिता के नाम के बिना बच्चों के साथ माँ को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता।उसका और प्रज्ञा बेटी का अस्तित्व सुरक्षित रहे क्योंकि ये युद्ध तो उसका अपना है। समाज और धर्म के साथ युद्ध। अन्ततः वीरू के साथ उसका सच्चा और पवित्र रिश्ता ही जुड़ा रहा जो जिंदगी के इतिवृत्त के साथ हमेशा जुड़ा है। प्रज्ञा और मिन्नी की मित्रता और प्रज्ञा और अपूर्व का रिश्ता सब 'मोनेर मानुष' (पृष्ठ 89)बंगाल के शांतिनिकेतन का वातावरण और रवीन्द्र नाथ टैगोर का दर्शन, बाउल की पंक्तियाँ उपन्यास को समृद्धशाली बनाती हैं।
ऋचा को लंदन में दर्शनशास्त्र और धर्म के कल्चरल कॉन्फ्रेंस में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया जिसमें उसे विचारों का संपर्क, जीवन मूल्यों का विकास और नेचर अॉफ एरर पर अपने दार्शनिक विचार रखेगी।( पृष्ठ 101) पहचान संस्था भी एनजीओ बन गई।
उपन्यास में पत्र शैली का भी उपयोग किया गया है।लंदन से ऋचा के पत्र बराबर विदेशी धरती के संस्कार और संस्कृति को भी उजागर करते हैं।
विधि का विधान होकर ही रहता है। विदेश की धरती पर रहते हुए भी ऋचा की भावना देशी है।उसके रिश्तों में कटाव नहीं है क्योंकि उसे कुछ भी देखने की अभीप्सा नहीं है।( पृष्ठ 109) उपन्यास मुमुक्षा की ओर ले जाता है जहाँ शुद्ध अंतःकरण, शुद्ध विवेक, जाग्रत चेतना है। ऋचा वीरू को लिखती है कि जीवन में दो ही चीज रीयल होती है फ्रीडम अॉफ थॉट एंड द फिलिंग अॉफ रेस्पोंसिबलिटी फॉर वन सेल्फ।
गीता में आए कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग सभी को क्रमशः इस उपन्यास में पिरोया गया है। वेद की प्रतिष्ठा की गई है। 'अकर्मण्यता नहीं, कर्म में शरणागति' इस उपन्यास की नाभिकीय संरचना है। ये उपन्यास भविष्य में लोक शिक्षा जिंदा रहेगी ऐसी घोषणा भी करता है।
ऋचा और वीरेश्वर, प्रज्ञा और अपूर्व, गौरा -
इति - राशिद, टुकटुकी मौसी और वासु - शंकर बहुत से प्रेम के विभिन्न रूप हैं जिनमें सत्य को ही स्थान मिला है।
वीरू उपन्यास का वह स्तंभ है जो उपन्यास के सभी पात्रों को आधार प्रदान करता है। वह दृढ़ संकल्प के साथ हर कदम पर एक स्वस्थ समाज और व्यक्तित्व का साझेदार है। पत्र की ये पंक्तियाँ अकेलेपन को रेखांकित करती हैं - हमारा जीवन भी बबूल का पेड़ है सशक्त और सच्चा। आओ हम एक होकर अपने व्यक्तित्व को निस्सीमता में शामिल करें, अपने आदर्शों को ऊँचा उठाएँ।(पृष्ठ 125)
बेटी प्रज्ञा अपने बाबूम वीरू के इस अकेलेपन का हिसाब भी अपनी माँ से मांगती है और उनके सपनों को भी साकार करना चाहती है।
क्या कुछ लोग समाज में केवल आदर्श मिसाल बन कर रह जाते हैं? क्या उनका प्रेम सिर्फ लोगों के लिए होता है? विधि का विधान क्या है? क्यों विचार नहीं मिलते? क्यों प्रेम किसी विशेष से ही होता है? निराकार प्रेम क्योंकर जिंदा रहता है? जाति धर्म और समाज के रिश्ते इतने आक्रामक क्यों है? बहुत से प्रश्नों का उत्तर अनुत्तरित क्यों रह जाता है?
उपन्यास 'पूर्णमिदम्' पूर्ण होकर भी अपूर्ण आंकड़ों की तरह रहस्यमय लगता है। कुछ और छूटी हुई आकांक्षाओं का घटनाक्रम लगता है।
उपन्यास की भाषा हिंदी संस्कृत बांग्ला और देशज आदि शब्दों का शांत लहरिया सागर है। खुलापन और मुक्त अभिव्यक्ति है, कहीं कोई लाग लपेट नहीं। सीधे, सपाट और सरल भाषा में जीवन की कठिनतम यात्रा है।
रिश्तों से जन्मी प्रेम से निःसृत बेटी प्रज्ञा पुनः समाज की रूढ़ियों और स्वयं एक मानक के रूप में बनकर सामने आती है जो साहित्य की सफलता है। 127 पृष्ठों का उपन्यास 'पूर्णमिदम् का पहला संस्करण 2019 में राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड से प्रकाशित है। मूल्य 29 5 रुपये।
Friday, May 20, 2022
अर्चना संस्था द्वारा स्वरचित काव्यांजली मई 2022
अर्चना संस्था द्वारा स्वरचित काव्यांजली - -
अर्चना संस्था की सदस्याओं ने काव्यांजली कार्यक्रम में अॉन-लाइन स्वरचित रचनाओं और गीतों का पाठ किया।सर्वप्रथम इंदू चांडक ने सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। कवयित्री मृदुला कोठारी ने सूर्य से संवाद,अरुणिमा आभा लिए साथ में, जब नभ पर आ जाते हो, स्वर्ण कलश तव लिए हाथ में, दिन भर तुम छिड़का ते हो,सुशीला चनानी - कवितायें, क्षणिकायें ( विभिन्न विषय आधारित, भोर की सुरभित बेला में जब चिडिया चहचहाती हैं, ऐसा लगता है जैसे वे, प्रभु को भजन सुनाती हैं, आती है अक्ल, प्रेम विवाह के बाद, प्रेम उड़ जाता परफ्यूम सा,बचा रहता है पतली दाल का स्वाद और सरसी छन्द-चमचमचमके बिजली नभ में, नेताजी तो मिलने आते,पांच साल के बाद, छन्द मुक्त कविता-लावारिसकुत्तों का अधिकार, हिम्मत चोरड़़िया ने दोहे- कीड़ा जो संदेह का,अपनी क्षमता पर कभी, जगह जगह धोखा मिला, पाना चाहो जीत तो, गीत- वंदन ले लो माते मेरा, गजल- चीर दे तूफान को तू हौसलों की धार से, मीना दूगड़ ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बखियां उधेड़ते, कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते ये बहुरूपिया दिवस, उषा श्राफ ने कोरोना का बादल छाया था, इंदू चांडक ने शब्दों केमोती पिरोकर, गूँथती हूँ मैं गीत माला, अहर्निश जिनको है मैंने,भावों के साँचे में ढाला, संगीता चौधरी ने बहे गुरु ज्ञान रसधार, जब भी देखती हूं आईना, सरसी छंद -दीन सुदामा विनय करे है ,अरजी बारम्बार, वसुंधरा मिश्र ने कविता युद्ध और शांति में पिसती कलम सुनाई, शशि कंकानी ने राजस्थान की महिमा-मायड पूत सपूत है जाया।, रण में शीश दान दे आया।, हँस हँस काम देश रे आया।, इण पर वारी जावाॅ।।, कब से दे रही थी चेतावनी,लेकिन तुमने नहीं मानी, बस करते रहे अपनी मनमानी सुनाई। भारती मेहता ने साहित्य ! बड़े चर्चे हैं तुम्हारे, तुम हो सुन्दर, गूढ़ - गम्भीर, दार्शनिक- प्रतिभावान !तुम से मिलने की आरजू दीवानी हुई...देश, भाषा, प्रकृति, सभ्यता और संस्कृति, युद्ध और शांति, शब्दों के मोती, गीत वंदना और छंद लय ताल से युक्त विषयों पर स्वरचित कविताएं सुनाई गईं ।
राजस्थानी लोक गीत में महिलाओं का योगदान और श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस समारोह
भारत जैन महामंडल लेडिज विंग कोलकाता और भारतीय भाषा परिषद में राजस्थानी लोक गीत में महिलाओं के योगदान विषय पर आयोजन -एवं श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस समारोह मनाया गया----
आज भारतीय भाषा परिषद और भारत जैन महामंडल लेडिज विंग संयुक्त तत्वावधान में श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस समारोह राजस्थानी लोकगीत में महिलाओं का योगदान विषय पर मनाया गया। आयोजन के विशेष अतिथि थे श्रीमती कुसुम जी खेमानी, श्री विशम्बर जी नेवर, डाक्टर वसुंधरा जी मिश्र और श्रीमती सुशीला पुगलिया । कार्यक्रम का उद्घाटन किया डॉ कुसुम जी खेमानी ने दीप प्रज्वलित करके की। सभी विशेष अतिथियों ने राजस्थानी लोकगीत मे महिलाओं के योगदान पर बोलते हुए श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस पर सबको शुभकामनाएं दी। सभी बहनों ने गीतो,कविताओं , स्पीच और यादों के माध्यम से गांव की धरती पर बेनजीर प्रस्तुति दी। जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी प्यारी होती है। एक दो महिलाएं प्रथम बार मंच पर बोलने की हिम्मत की। लहरियां साडीयो में सजी धजी महिलाओं के समुह ने सचमुच कोलकाता पर राजस्थान को उतार दिया था। श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस १४१ वर्ष अद्भुत और अनुपम अंदाज में मनाया गया और महिलाओं ने प्रथम बार गांव का स्थापना दिवस समारोह मना कर इतिहास रच दिया। कोलकाता में विराजित आचार्य महासमण जी की विदुषी शिष्या साध्वी श्री स्वर्ण रेखा जी ठाणा जो कि श्री डूंगरगढ़ से है उन्होंने संदेश भेजकर कार्यक्रम में सोने पर सुहागा कहावत को चरितार्थ कर दिया।सभी हमारे विशेष अतिथि वक्ताओं सारगर्भित जानकारी महिलाओं के योगदान पर दी। साथ में सभी बहनों ने केसरिया चाय और लजीज हाई टी का लुत्फ उठाया। श्री डूंगरगढ़ की सभी बहनों को उपहार देकर सम्मानित किया गया। अंजू सेठिया, सरोज भंसाली की कड़ी मेहनत और शुशीला पुगलिया का सहयोग ने कार्यक्रम को जोरदार सफल बना गया। भारतीय भाषा परिषद के मंत्री डॉ केयुर मजमूदार ने धन्यवाद दिया। इस कार्यक्रम का कुशलतापूर्वक संचालन श्रीमती अंजू सेठिया ने किया।भाई विनोद बिनानी सूरत से सभी बहनों को साड़ी देने का ऐलान किया । यह संस्कृति की अनुठी मिसाल है।
Monday, May 16, 2022
अधूरी कहानी - रागिनी प्रसाद, समीक्षा /प्रस्ताव
अधूरी कहानी - - प्रस्तावना
अधूरी कहानी रागिनी प्रसाद का लघुकथा संग्रह है जिसमें कभी समाप्त न होनेवाली जीवन की सच्ची कहानियाँ हैं। पेशे से वकील होने के साथ ही वे पहले एक स्त्री हैं। कचहरी में रोजमर्रा आने वाले केस दर्ज होते रहते हैं। हर केस अपनी कहानियों को सच करना चाहती हैं परन्तु क्या यह हो पाता है? कभी होता भी है तो कई बार सच साबित करने के लिए हजारों सबूत और तारीखों का सामना करना पड़ता है। ऐसा भी होता है कि कहानी को सच का जामा पहनाते पहनाते जीवन भी समाप्त हो जाता है। कुछ भी कहिए कहानियाँ कब पूरी हुई हैं? वे तो साहित्य के माध्यम से बस अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती हैं।
रागिनी प्रसाद की लघुकथा 'अधूरी कहानी 'एक ही श्वास में पढ़ने वाली कहानियाँ हैं। वर्तमान समय लघुकथाओं का है। यह मैक्रो से माइक्रो तक जाने की यात्रा है, जैसे "सारांश का सारांश"। फिर भी यह कहानी का सार या संक्षेप नहीं है। इस लघुता में भी कहानी के तत्वों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है।
यह हिंदी साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है। आज भागदौड़ की जिंदगी में इंसान के पास समय कम है, वह कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक को सोचना, समझना और जानना चाहता है इसलिए आधुनिक युग में लघुकथा का विकास कथा या स्टोरी से ही हुआ है।जीवन के एक छोटे- से हिस्से का अनुभव लघुकथा हो सकता है।
लेखिका ने अपने अनुभवों के साथ पाठकों को बहुत ही सहजता से जोड़ा हैऔर कम शब्दों में अपनी बात रखी है। अधूरी कहानी में आह से वाह तो है ही, साथ में आधुनिकतम जीवन के तमाम संत्रास भी हैं। रिश्ते - नाते , सोच , ढोंग, बनावटीपन, भ्रष्टाचार के नए रूप, अत्याचार, स्त्री की अस्मिता, पुरुषों का वर्चस्व आदि जीवन में रोज घटने वाली घटनाओं को लघु रूप में लिखना बहुत ही कठिन होता है। विस्तार में लिखना सहज होता है लेकिन लघु और सारगर्भित कथा लिखना सहज नहीं होता। वह दृष्टि होनी आवश्यक है जिसमें एक पूर्ण कथा के गुण हों।
रागिनी एक संवेदनशील लेखिका हैं। अपने पेशे की व्यस्ततम स्थितियों में भी उनकी पैनी दृष्टि समाज के विभिन्न तबकों में होने वाली घटनाओं को अपनी लेखनी से उतारने में देर नहीं करती ।
नया आयाम, क्वेरेंटाइन, चार या चालीस, तलाक, स्टाम्प, अनाज का कट्टा , अजीब प्रेम प्रसंग, होम लोन, सुकून जैसी लघु कथाएँ सोचने के लिए विवश कर देती हैं कि अभी भी हमारा देश कितने पिछड़ेपन में जी रहा है। ये लघु कथाएँ समाज का वह आईना है जिसमें हर चित्र स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। होम लोन आजकल बहुत ही सहजता से उपलब्ध है लेकिन उसे चुकाने में घर के वृद्ध पिता की जिंदगी घिस जाती है।होम लोन लघु कथा की ये पंक्तियाँ --'अरे तुम्हारे चेहरे पर क्या हुआ? सहसा उसकी नजर पति के चेहरे पर उठ रही गांठ पर पड़ी। ***बेटे का होम लोन उतर जाने दो। फिर नौकरी छोड़ दूंँगा। जाते जाते पति फुसफुसाया । ***हर महीने बिखर जाता था होमलोन की डेट से दो तीन दिन पहले। ' बासठ साल की उम्र का पिता बेटे के लिए गए लोन को चुकाने के लिए नौकरी पर जा रहे हैं। बहू - बेटे का रवैया बहुत ही सामान्य है। उन्हें लगता है कि यह होम लोन चुकाना उनकी ही जिम्मेदारी और कर्तव्य है। सास- ससुर बेटे और बहू के अधीन हैं और वे बाध्य होकर अपना कार्य कर रहे हैं। वे खुल कर अपनी बात तक नहीं कर सकते। वर्तमान समय में मध्य वर्गीय परिवार की सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों को बहुत ही सहजता और सरलता से इस कहानी में चित्रित किया गया है।
पति-पत्नी के रिश्तों की मिठास और कड़वाहट कैसे अपने सम्बंधों को रेखांकित करती है, इस कहानी में बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से व्यक्त हुआ है। इसी तरह कोरोना महामारी के दौरान मनुष्यता की धज्जियाँ उड़ती दिखाई पड़ती है। क्वेरेंटाइन की पंक्तियाँ - - 'कहाँ जा रहे हो? वो पिताजी का देहावसान हो गया है। अस्थियांँ लेने जा रहा हूँ। तेरा नाम क्या है - उसने कड़क आवाज में पूछा। मैं योगेश हूँ सर। मैंने मुंडन करा लिया है। और सफेद धोती-कुर्ता पहना हूँ। आप पहचान नहीं पा रहे हैं। न्यूज पत्रकार हूँ। 'बड़ा अधिकारी ने भी नहीं पहचाना। पिता की अस्थियांँ भी कोई अर्थ नहीं रखतीं। जन्म से मृत्यु तक रुपये की ही पूछ है।
गागर में सागर की तरह अधूरी कहानी की सभी कथाएँ हैं जो वर्तमान युग की सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों की कड़वी सच्चाई को सामने रखती हैं। यह भी सच्चाई है कि एक लघुकथा में अन्य साहित्यिक विधाओं (जैसे, उदाहरण के लिए, उपन्यास) की तुलना में पर्यावरण के विवरणों को विकसित करने के लिए समान स्थान नहीं है। पात्रों को गहराई से पेश करने के लिए कोई जगह नहीं है और उनकी प्रेरणाओं को प्रतिबिंबित करने का समय नहीं है। उसकी मुख्य विशेषताएँ हैं- संकेतात्मकता, वेधकता और अतिकल्पना. लघुकथा का कथानक अत्यंत सूक्ष्म होता है. चूंकि ऐतिहासिक-सामाजिक अंतर्वस्तु कथानक की रीढ़ होती है, इसलिए लघुकथा में इसका प्रवेश सूक्ष्मतम विधानों में ही होता है. उसका आदि, मध्य या फिर अंत अच्छा होता है। शब्दों के प्रयोग में काफी सक्रिय एवं सतर्क प्रतीत होती हैं। यही कारण है कि इन लघुकथाओं में इस दृष्टि से कोई फालतूपन नहीं आ पाया है।
उपयुक्त शिल्प के अनुसार भाषा का सटीक प्रयोग हुआ है। शब्द प्रबंध ऐसा है कि पाठक पढ़ते हुए भाषा के प्रवाह में बहने लगता है और रचना पाठक से सीधा सरोकार स्थापित करके उसके हृदय में स्थान बनाने में सक्षम हो जाती है
रागिनी की लघुकथाएँ अत्यंत लघुकथाएँ हैं जिसमें उपयुक्त विषय वस्तु की कोई सीमा नहीं है। वह काल्पनिक कहानियों से लेकर विचारोत्तेजक या असामान्य प्रकृति के ग्रंथों तक होती है। संग्रह की सूक्ष्म कहानियाँ अलौकिक मुद्दों या एक प्रभावशाली वास्तविकता के विवरण को रेखांकित करती हैं।
रागिनी की लघुकथाओं में किसी एक विषय को संबोधित किया गया है। वैसे उपयुक्त विषय वस्तु की कोई सीमा नहीं होती है और जो काल्पनिक कहानियों से लेकर विचारोत्तेजक या असामान्य प्रकृति के ग्रंथों तक जाती है।
'अधूरी कहानी' के पात्र हमारे आस-पास के ही हैं। उनसे हम रोज मिलते हैं, बात करते हैं और उनकी समस्याओं से रूबरू होते हैं। हम अपनी घटनाओं को उनके साथ साझा करते हैं। रागिनी प्रसाद की लघुकथा हमें रास्ता सुझाती है और समसामयिक विषयों के प्रति जागरूक करती है।
मुझ पर रागिनी दी का स्नेह बना रहे। जीवन की गुणवत्ता को सीखने के लिए स्त्री की अस्मिता और उसके अनुभवों से साहित्य सदैव लाभान्वित होता रहा है। आशा है पाठकों को 'अधूरी कहानी 'की मौलिकता और संक्षिप्तता से युक्त सभी कथाएँ अपने अनुभवों से बात करती लगेंगी।
बधाई और शुभकामनाएँ।
डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
बुद्ध पूर्णिमा
दिनांक 18.05.2022
Saturday, May 14, 2022
सांप सीढ़ी - कविता
सांप- सीढ़ी
बहुत याद आती है बचपने की
खेलते-खेलते नींद आ जाना
खाते-खाते सो जाना
डांट-फटकार खा खर्राटे भरना
चाबी के खिलौनों को पाने के लिए
बड़ी बड़ी आंखें फाड़कर देखना
लकड़ी के घोड़े पर बैठना
गुल्ली डंडा और साईकिल चलाना
आईस पाईस में मारपीट और बिना बात हंसाना
लूडो और कैरम बस जीतने के लिए ही खेलना
पतंग उड़ाने के लिए जिद करना
कुत्ता पालने के लिए जोर देना
अक्कड़ बक्कड़ खेलते रहना
किसी चीज के लिए मना करने पर
मुंह फुलाना फिर मुंह बिचकाना
माँ समझाते समझाते मारती रहती
संस्कारों को दिमाग में ठूंसती रहती
लिखने -पढ़ने में लगाए रखती
ऐसे मत करो वैसे मत करो
और बचपन दूर भागता गया
हमारी गिनती समझदारों में होने लगी
बहुत अच्छी है का ठप्पा लगने लगा
कुछ गलत कर ही नहीं सकते
करे तो मरे
चोरी की आदत से लाचार हुए
छिप कर खाने का स्वाद लेने लगे
सामने अच्छे भले लगने लगे
बच निकलने वाली गली में रहने लगे
सब अपने-अपने रास्ते छिपाने लगे
संवाद की भाषा बदलने लगी
बड़े-बड़े सपनों के जाल बुनने लगे
बड़ी बड़ी नौकरी के सपने देखने लगे
दुनिया से अंजान माँ के आंचल से दूर
बहुत ऊपर पहुंच गए
बीच-बीच में फिसल कर जमीन भी छू लेते
फिर ऊपर उठ जाते
पासा खेल खिलाता रहता
जब हकीकत से हुआ सामना
तब सचमुच बडप्पन का अहसास हुआ
फिर हमने अपने बच्चों को समझाया
और फिर वही चक्कर लगवा दिया
जिससे हम निकल कर आए थे।
हमें तब तक सभी रास्तों का पता हो चला था
जीरो से सौ पर आए थे।
@ वसुंधरा मिश्र, 5.6.21
Friday, May 13, 2022
त्वचा का प्रत्यारोपण - संदेश
काश! जली हुई पार्वती का त्वचा प्रत्यारोपण करा पाते---
शहर से दूर नई कॉलोनी में बैंक के मैनेजर अवधेश सिंह ने जमीन लेकर घर बनवाया जो हमारे घर से चार कदम बाद ही था। उनके तीन लड़के और तीन ही लडकियां थीं। हमलोग दो बहनें और एक भाई थे। कॉलोनी में अभी घर बन ही रहे थे।कुल मिलाकर रहने वाले चार - पांच ही परिवार थे। बच्चों में हम लोगों में अधिक अंतर न था कोई दो तीन साल छोटे- बड़े। वे दिन बहुत सुंदर थे। कोई चिंता नहीं थी। हमलोग साथ में खेलते - कूदते कब बड़े हो गए, पता नहीं चला।अवधेश सिंह की एक बीच वाली लड़की पार्वती पढ़ने में पीछे ही रह गई लेकिन दूसरी दोनों बहनों में सबसे सुंदर थी। बड़ी बहन अनिता का विवाह हो गया अब पार्वती के विवाह की बात उठने लगी और वह भी एक सुंदर और पैसे वाले पति के सपने देखने लगी। उसकी मां ने उसके लिए दहेज भी अच्छा खासा इकट्ठा कर दिया था। हम लोगों के लिए तो बहुत खुशी की बात थी। उसका पति भी बैंक में ही नौकरी करता था। पार्वती अपने पति पर जान छिड़कती थी। लड़का होने के बाद जब पहली बार अपने मायके आई तो वह कुछ उदास सी लगी। उसके आने के बाद उसके पति ने उसे फोन तक नहीं किया। दो महीने, फिर चार महीने, दिन बीत रहे थे। एक दिन उसका पति आया और अपने बेटे को लेकर चला गया। पार्वती कहती थी कि पति अपनी बड़ी भाभी का ही अधिक सुनता है। वह अपने आपको कोसती रहती। पति उसे पसंद नहीं करता था। बेटा भी उससे दूर हो गया। पार्वती धीरे-धीरे मानसिक अवसाद से ग्रस्त होती चली गई। मेरी बड़ी बहन कविता से हर बात शेयर करती। पार्वती सीधी-सादी और सरल लड़की थी। चालाकी तो जानती ही नहीं थी। अचानक एक दिन नहाने के लिए बाथरूम में गई और पानी की जगह किरासन तेल से नहा लेती है और फिर माचिस की तीली। धू धू कर पार्वती जलने लगी। उसकी मां धुंआ देख चिल्लाने लगी। दोपहर के समय उस समय कोई पुरुष या बड़ा कोई न था।किस्मत से उस काले दिन मेरी बड़ी बहन कविता थी। मेरी मां ने उसे भेजा कि देख कर आओ क्या हो गया?
कविता ने देखा पार्वती काली हो गई है और उसके बाल और छाती कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं।केवल आंखों से देख रही थी। किसी तरह आनन फानन में कविता ने हिम्मत कर उसकी मां को साथ लेकर उसे अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि बहुत अधिक जल गई है। बचने का चांस नहीं है।
किसी ने इस अनहोनी के बारे में नहीं सोचा था। पुलिस ने उसका बयान लिया। उसका पति भी आया। बचाने की कोशिश की लेकिन पार्वती नहीं बची।
आज से पचीस तीस साल पहले तो त्वचा प्रत्यारोपण के बारे में जानकारी ही नहीं थी। बहुत जला हो तो फर्स्ट डिग्री बर्न कहलाता है । सेकेंड और थर्ड डिग्री तक जला हो तो अस्पताल ले जाना जरूरी होता है है। घाव अगर 3 इंच से बड़ा हो तो इसे डॉक्टर ही बता सकेगा। समान्य घाव भरने में तीन से छ दिन लगते हैं। जेनोड्राफ्ट यानि सुअर की त्वचा या बायोसिंथेटिक स्किन कृत्रिम त्वचा मंहगी होने के कारण बहुत कम उपयोग में लाते हैं।
जेनोग्राफ्ट सिर्फ मानव ही दान में दे सकता है। ये जानकारी किसे रहती है? हमारे देश में जनसाधारण बहुत सी बातें जानते ही नहीं हैं क्योंकि स्वास्थ्य, शिक्षा और नेत्र दान, अंग दान आदि के विषयों में जागरूकता कम है। महिलाओं को अभी तक अपने अधिकारों का ही ज्ञान नहीं है। भारत के शहर, गांव और कस्बों और कबीलों की संस्कृति और सोच में लाख हाथ का अंतर है।
वैसे तो भारत में त्वचा प्रत्यारोपण के प्रयोग की बात प्राचीन काल में सुश्रुत संहिता में 3000 ईसा पूर्व नाक को ठीक करने की कला राइनोप्लासटिक प्रचलित थी। विश्व युद्ध में अंग- भंग के कारण प्लास्टिक सर्जरी की बहुत सी चुनौतियां थीं।
त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है जो भीतर के अंगों का आवरण है। स्पर्श की संवेदना से युक्त है। पार्वती की सुंदरता और संवेदनशीलता की जब याद आती है तो उसका बेवस चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमने लगता है। आज तक न जाने कितनी ही पार्वती जली हैं या अधजली घूम रही हैं या फिर चोटें लगी होगीं। मन की वेदना भरे न भरे, तन को तो दूसरे की त्वचा काआवरण दिया जा सकता है, यह भी आज के युग में बहुत बड़ी बात है।
आज त्वचा दान देकर समाज के कल्याण के लिए बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। व्यक्ति के मरने के छः घंटे बाद भीतरी त्वचा निकाली जा सकती है। 0.3 मिमि मोटाई के साथ जांघ, पैर और पीठ से एपीडर्मी और डर्मी (त्वचा की पर्तें) के कुछ हिस्से को निकाला जाता है। मृत व्यक्ति के चेहरे, छाती या शरीर के ऊपरी हिस्सों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है। मृत व्यक्ति के पास डोनर कार्ड न होने के बावजूद परिजन ही त्वचा दान करने का निर्णय लेते हैं। एड्स, एच. आई वी, हेपटाइटिस, टी.बी, स्किन कैंसर आदि से पीड़ित व्यक्ति दान नहीं कर सकते।
आज सुंदरता के लिए प्लास्टिक सर्जरी बहुत होने लगी है। मुबंई के सायन अस्पताल में सन् 2000 में शल्यक्रिया की विभागाध्यक्ष डॉ माधुरी गोरे ने स्किन बैंक खोला जो सच में चुनौतीपूर्ण था।
आज भी कोई अंगदान या शरीर दान देने में उत्सुकता नहीं दिखाता है जबकि किसी को किडनी, लीवर आदि की आवश्यकता पड़ती रहती है जो जीवित व्यक्ति दान देते हैं। त्वचा दान बहुत ही सरलता से दिया जा सकता है क्योंकि यह मरने के बाद दिया जाता है।किसी न किसी दुर्घटना में सत्तर प्रतिशत महिलाएं जलती हैं और एक्सीडेंट में कितने ही लोगों का अंग- भंग हो जाता है। यदि दान करने की इच्छा बने तो रुपया पैसा तो लोग बहुत करते हैं लेकिन अपने पास इतना है जिससे हम किसी की मदद कर सकते हैं। ऊतक दान प्रपत्र फार्म भरना पड़ता है जो टीएच ओए के अनुसार दिल्ली में स्थित राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण की वेबसाइट पर भरना पड़ता है।
काश! मरने के बाद हम अपनी त्वचा दान देकर न जाने कितनी ही पार्वतियों को बचा पाते। उनकी आंखों की चमक लौटा पाते।
नाम- Dr. Vasundhara Mishra, kolkata
Tuesday, May 10, 2022
विश्व प्रसिद्ध गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर 2022
विश्व प्रसिद्ध गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
एक महान कवि और साहित्यकार के साथ-साथ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर एक उत्कृष्ट संगीतकार और पेंटर भी थे। उन्होंने लगभग 2230 गीत लिखे – इन गीतों को रवीन्द्र संगीत कहा जाता है। यह बंगाली संस्कृति के अभिन्न अंग हैं । भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगीत, जो रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए थे, भी इसी रवीन्द्र संगीत का हिस्सा हैं।
उनकी रचनाओं में, उपन्यास: गोरा, घरे बाइरे, चोखेर बाली, नष्टनीड़, योगायोग; कहानी संग्रह: गल्पगुच्छ; संस्मरण: जीवनस्मृति, छेलेबेला, रूस के पत्र; कविता : गीतांजलि, सोनार तरी, भानुसिंह ठाकुरेर पदावली, मानसी, गीतिमाल्य, वलाका; नाटक: रक्तकरवी, विसर्जन, डाकघर, राजा, वाल्मीकि प्रतिभा, अचलायतन, मुक्तधारा, शामिल हैं। वह पहले ग़ैर-यूरोपीय थे जिनको 1913 में साहित्य के लिए गीतांजलि रचना पर नोबल पुरस्कार दिया गया। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला’ उनकी ही रचनाएँ हैं।
रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल - श्रृंखला के अंतर्गत आइए जानते हैं कि रवीन्द्र के गीतों में ऐसा क्या है कि वह विश्व प्रसिद्ध है।
कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है। । कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाता है। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं - - - कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है। फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं।रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका वर्णन आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है - - 'अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन' अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे 'आलोकपियासी '(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं। अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत - प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं। प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है। अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा? राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है - - 'वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि' राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है। रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है - - -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5, हिंदी अनुवाद, डॉ वसुंधरा मिश्र )
रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल - श्रृंखला के अंतर्गत आइए जानते हैं कि रवीन्द्र के गीतों में ऐसा क्या है कि वह विश्व प्रसिद्ध है।
कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा - निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है। । कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाता है। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं - - - कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है। फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं।रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका असंख्य आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है - - 'अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन' अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे 'आलोकपियासी '(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं। अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत - प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं। प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है। अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा? राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है - - 'वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि' राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है। रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है - - -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5, हिंदी अनुवाद, डॉ वसुंधरा मिश्र) गुरुदेव
रवीन्द्र नाथ टैगोर बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे। भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ रूप से पश्चिमी देशों का परिचय और पश्चिमी देशों की संस्कृति से भारत का परिचय कराने में टैगोर की बड़ी भूमिका रही तथा आमतौर पर उन्हें आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना गया है।
श्रीदेव सुमन की पुण्यतिथि पर
29 साल की आयु में जिसने किया 84 दिन का अनशन और दी शहादत, गढ़वाल के ‘भगत सिंह’ श्रीदेव सुमन को नमन!
आशीष नौटियाल | 25 July, 2019
रियासत के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करने वाले श्रीदेव सुमन की पुण्यतिथि आज
यूँ तो देश का एक बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीति से त्रस्त था ही, लेकिन देशी रियासतों के नवाबों और राजाओं ने भी जनता पर दमन और शोषण का कहर ढा रखा था। जब युद्ध के बहाने भारत देश की अभावग्रस्त प्रजा को लूटा जा रहा था, ऐसे समय में उत्तराखंड राज्य में जन्म लिया था बालक श्री दत्त ने, जो बाद में श्री देव सुमन के नाम से जाने गए। श्रीदेव सुमन (मूल नाम श्रीदत्त बडोनी) को टिहरी रियासत और अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ जनक्रान्ति कर अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए याद किया जाता है। आज उन्हीं श्री देवसुमन की पुण्यतिथि है। उनके बलिदान दिवस को उत्तराखंड राज्य में ‘सुमन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
ब्रिटिश हुकूमत और टिहरी की अलोकतांत्रिक राजशाही के खिलाफ लगातार आन्दोलन कर रहे श्रीदेव सुमन को दिसंबर, 1943 को टिहरी की जेल में नारकीय जीवन भोगने के लिए डाल दिया गया था। झूठे गवाहों के जरिए उन पर मुकदमा चलाया गया। इसी दौरान मुक़दमे की पैरवी करते हुए श्रीदेव सुमन ने कहा था- “हाँ, मैंने प्रजा के खिलाफ लागू काले कानूनों और नीतियों का हमेशा विरोध किया है। मैं इसे प्रजा का जन्मसिद्ध अधिकार मानता हूँ।”
देश का एक वर्ग शायद ही श्री देव सुमन के बलिदान से परिचित हो। लेकिन देश सरदार भगत सिंह के नाम को जरूर जानता है। मात्र 29 की अवस्था में ही जनता के लिए प्रजामण्डल की स्थापना की माँग करने के कारण अपनी ही रियासत के राजाओं द्वारा प्रताड़ना और क्रूरतापूर्ण शोषण के बाद प्राण त्यागने वाले श्रीदेव सुमन की कहानी सरदार भगत सिंह के बलिदान से कम नहीं है।
श्रीदेव सुमन: 25 मई, 1916 – 25 जुलाई, 1944
श्रीदेव सुमन का जन्म उत्तराखंड के टिहरी राज्य में हुआ था। ये वही टिहरी है, जहाँ पर आज एशिया का सबसे ऊँचा बाँध स्थित है। इस विशाल जलाशय को इन्हीं श्रीदेव सुमन के नाम पर ‘श्रीदेव सुमन सागर’ के नाम से भी जाना जाता है।
श्रीदेव सुमन का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब जनता राजशाही को ही आखिरी फरमान समझती थी। यूरोप प्रवास पर होते थे, तब प्रशासन के अधिकारी ही जनता पर मनमर्जी थोपते थे और राजा के लौटने पर उनके कान भरते थे। 25 मई, 1915 को श्रीदेव सुमन ने टिहरी के ही जौल गाँव में जन्म लिया था। हालाँकि, टिहरी रियासत को अंग्रेज कभी भी अपना गुलाम नहीं बना पाए थे, लेकिन यहाँ की हर कार्यवाही में उनका खुला हस्तक्षेप था। जैसा कि कुछ इतिहासकार भी लिखते हैं; राजपरिवार अंग्रेजों के एहसानों तले इस कदर डूबा हुआ था कि 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों को छुपने के लिए अपने राजमहल ले द्वार खोल दिए और खुद लोगों के घरों और जंगलों में दिन गुजारते गए। बदले में अंग्रेजों ने भी खूब कृपा बरसाई।
30 दिसम्बर, 1943 से 25 जुलाई, 1944 तक 209 दिन सुमन ने टिहरी की नारकीय जेल में बिताए। इस दौरान इन पर कई प्रकार से अत्याचार होते रहे, झूठे गवाहों के आधार पर जब इन पर मुकदमा दायर किया गया तो इन्होंने अपनी पैरवी स्वयं की और लिखित बयान देते हुए कहा-
“मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं जहाँ अपने भारत देश के लिये पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय में विश्वास करता हूँ वहीं, टिहरी राज्य में मेरा और प्रजामंडल का उद्देश्य वैध व शांतिपूर्ण उपायों से श्री महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन प्राप्त करना और सेवा के साधन द्वारा राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा सब प्रकार की उन्नति करना है। हाँ, मैंने प्रजा की भावना के विरुद्ध काले कानूनों और कार्यों की अवश्य आलोचना की है और मैं इसे प्रजा का जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूँ।”
लेकिन, इस सबके बावजूद झूठे मुकदमे और फर्जी गवाहों के आधार पर 31 जनवरी, 1944 को दो साल का कारावास और 200 रुपया जुर्माना लगाकर इन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। इस दुर्व्यवहार के विरोध में सुमन ने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ कर दिया, जिससे जेल के कर्मचारी कुछ झुके, लेकिन उनकी बात महाराजा से नहीं करवाई गई। श्रीदेव सुमन लगातार माँग करते रहे कि उनकी बातें राजा तक पहुँचाई जाएँ, लेकिन बदले में उन्हें कठोर दंड और यातनाएँ दी गईं।
84 दिन तक जेल में प्रताड़ना और ऐतिहासिक अनशन
शासन की ओर से किसी प्रकार का उत्तर न मिलने पर श्रीदेव सुमन ने विरोध स्वरुप 3 मई, 1944 से अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस बीच उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन पर कई क्रूर अत्याचार किए गए, लेकिन सुमन अडिग रहे। प्रशासन को यह डर था कि श्रीदेव सुमन की जेल में यदि मृत्यु हो गई तो जनता राजशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ देगी। सुमन के इस ऐतिहासिक अनशन का समाचार जब टिहरी की जनता तक पहुँचा, तो रियासत ने यह अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन समाप्त कर दिया है और 4 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।
अनशन ख़त्म करने की शर्त पर यह प्रस्ताव सुमन जी को भी दिया गया। लेकिन श्रीदेव सुमन का जवाब था-
“क्या मैंने अपनी रिहाई के लिए यह कदम उठाया है? ऐसा मायाजाल डालकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते। अगर प्रजामण्डल को रजिस्टर्ड किए बिना मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं फिर भी अपना अनशन जारी रखूँगा।”
यह प्रस्ताव ठुकराने के बाद सुमन को जेल के अधिकारियों द्वारा काँच मिली रोटियाँ खाने को दी गईं। प्रताड़ना और अनशन से उनकी हालत बिगड़ती गई। जेलकर्मियों ने लोगों के बीच यह खबर फैला दी कि सुमन को न्यूमोनिया हो गया है, जबकि उन्हें जेल में कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन लगाए गए।
कम्बल में लपेट बोरी के अन्दर सिल दिया मृत शरीर
इन इंजेक्शंस के कारण वो डिहाइड्रेशन से जूझने पर पानी के लिए चिल्लाते, लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया जाता था। 20 जुलाई की रात से ही उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई, 1944 को शाम करीब चार बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश और अपने सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी अन्धेरी रात में सुमन की लाश उन्हीं के नीचे बिछे कम्बल में लपेट कर एक बोरी के अन्दर सिल दी गई। फिर एक वार्डन और एक कैदी उस बोझे को लेकर चुपके से जेल के फाटक से बाहर निकले और मृत शरीर को भागीरथी और भिलंगना के संगम से नीचे तेज प्रवाह में फेंक दिया। यह काम जनता से छुपकर किया गया क्योंकि उन्हें सुमन पर किए गए अत्याचारों से हुई इस मृत्यु से जनता द्वारा बगावत किए जाने का भय था।
बलिदान के बाद प्रजामंडल की स्थापना
लेकिन, श्रीदेव सुमन के बलिदान का जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और लोगों ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। सुमन के बलिदान के बाद जनता के आन्दोलन ने टिहरी रियासत को प्रजामण्डल को वैधानिक करार देने पर मजबूर कर दिया। वर्ष 1948 में जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामण्डल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ। टिहरी गढ़वाल के भारतीय गणराज्य में शामिल हो जाने तक यह आन्दोलन चलता रहा। इसके बाद 1 अगस्त, 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत गणराज्य में विलीनीकरण हो गया। यही वो समय था, जब वल्लभभाई पटेल हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर और भोपाल जैसी तमाम देशी रियासतों का भारत संघ में मिलाने के प्रयत्न कर रहे थे।
साहित्य से राजनीति तक सुमन का सफर
श्रीदेव सुमन के व्यक्तित्व में कई महापुरुषों की झलक थी। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। रियासत के खिलाफ श्रीदेव सुमन के विरोध में यदि भगत सिंह का जूनून नजर आता था, तो दूसरी ओर वे महात्मा गाँधी के विचारों से भी प्रभावित थे। सुमन एक श्रेष्ठ लेखक और साहित्यकार भी थे। उन्होंने पंजाब विश्विद्यालय से रत्न भूषण, प्रभाकर और बाद में विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षाएँ पास कीं थी। सुमन ने दिल्ली में देवनागिरी महाविद्यालय की स्थापना की और कविताएँ भी लिखने लगे। वर्ष 1937 में ‘सुमन सौरभ’ नाम से अपनी कविताएँ भी प्रकाशित करवाईं। इसी दौरान वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे।
टिहरी के ही गाँव चम्बाखाल में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने टिहरी से मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। विद्यार्थी जीवन के दौरान ही 1930 में देहरादून में सत्याग्रही आन्दोलन में शिरकत करने के कारण उन्हें 15 दिन की जेल और बैंतों से पीटे जाने की सजा मिली थी। इस सबके बीच उनका अध्ययन भी जारी रहा।
लोकतंत्र के शिल्पकार थे सुमन
पत्रकारिता और साहित्य के बाद जनता के लिए प्रतिबद्धता ने श्रीदेव सुमन को गढ़देश सेवा संघ की स्थापना के लिए विवश किया जिसे बाद में हिमालय सेवा संघ के नाम से जाना गया। वे जल्द ही पूरी तरह सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए। उन्होंने राजशाही के खिलाफ जनता को जागरूक करने की शुरुआत की। 23 जनवरी को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामण्डल की स्थापना के मौके पर इन्हें संयोजक मंत्री चुना गया।
श्रीदेव सुमन हिमालयी रियासतों में जनता को जागरूक करने के साथ ही उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम भी करते रहे। यहीं से श्रीदेव सुमन रियासत के अधिकारियों की नजर में आ गए और रियासत द्वारा इनके भाषण देने और सभा करने पर रोक लगा दी गई। रियासत के अधिकारियों ने इन्हें नौकरी और लाभ का भी लालच दिया, लेकिन उनके झाँसे में न आने पर सुमन को रियासत से निर्वासित कर दिया गया। श्रीदेव सुमन का प्रभाव जनता पर इतना ज्यादा था कि टिहरी रियासत द्वारा उनके भाषण देने पर रोक लगा दी गई, उन्हें इसके लिए जेल जाना पड़ा। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वे गिरफ्तार किए गए और एक साल तक देश की विभिन्न जेलों में रखे गए।
टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में इस दौरान जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि टिहरी राज्य के कैदखाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती। श्रीदेव सुमन ने टिहरी की जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलन्द करते हुए कहा था- “मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूँगा, लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूँगा।”
अपने शरीर के कण-कण के नष्ट हो जाने पर भी टिहरी के नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने का दम भरने वाले श्रीदेव सुमन ने अपने इस संकल्प को निभाया भी। उत्तराखंड के निर्माण में श्रीदेव सुमन जैस अमर बलिदानियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। यह देवभूमि के साथ ही नायकों की भूमि भी है, जिन्होंने समय-समय पर अपने रक्त और बलिदान के उदाहरण पेश कर उत्तराखंड के इतिहास को गौरवशाली बनाया है।
भारतीय भाषा परिषद का स्थापना दिवस 2021
भाषाओं का तीर्थ भारतीय भाषा परिषद का स्थापना दिवस मनाया गया - - - -
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता ने अॉन-लाइन जूम पर स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर सीताराम जी सेकसरिया और भागीरथ कानोडिया जी के भाषा और शिक्षा प्रेम और उसके लिए उनके सद्प्रयासों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी है। परिषद के निदेशक डॉ शंभूनाथ ने बताया कि परिषद का अतीत गौरवशाली रहा है और यहां से बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। कोरोना काल के दौरान यहां से निकलने वाली पत्रिका वागर्थ अब ई - पत्रिका के रूप में निकल रही है।विश्वंभर दयाल सुरेका जी की सेवाओं के कारण ज्ञान कोष के आठ खंडों का प्रकाशन हुआ जो पचास वर्षों में किसी भी गैर सरकारी संस्था के लिए उल्लेखनीय है।
परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने सीताराम सेकसरिया जी(बाउजी) और भागीरथ कानोडिया जी(काकोजी) को याद करना भविष्य दृष्टा और भविष्य सृष्टा को याद करना है। सीताराम जी यदि कल्पना थे तो भागीरथ जी उनके मूर्त रूप थे, एक दूसरे के पूरक थे।डॉ कुसुम खेमानी ने कहा कि चौबीस साल की अवस्था से ही सीताराम जी सामाजिक कार्यों से जुड गए थे और दोनों ने मिलकर समाज की उन्नति के लिए शिक्षा संबंधित बहुत से ऐतिहासिक कार्य जैसे मारवाड़ी बालिका विद्यालय की स्थापना और कई संस्थाओं से जुड़े हुए थे। 88 वर्ष की आयु में भारतीय भाषाओं की समृध्दि के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की। उन्होंने केवल हिंदी ही नहीं सभी भाषाओं के उन्नयन पर ध्यान दिया । पूरे देश से साहित्यकार, संगीतज्ञ, दार्शनिक, और चिंतक आदि ने यहां पर अपने विचार प्रकट किए हैं। भारतीय भाषा परिषद संस्था भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम और उत्कृष्ट योगदान का प्रतीक है। वहीं राजस्थानी भाषा के पक्षधर रतन लाल शाह ने सीताराम सेकसरिया जी और भागीरथ कानोडिया जी के साथ बिताये क्षणों को ताजा करते हुए कहा कि राजस्थान से व्यवसाय के लिए आए मारवाड़ी जाति का शिक्षा और भाषा के विकास के प्रति रूझान विकास और नई सोच को दर्शाता है। शाह ने आग्रह किया कि ऐसे महापुरुषों पर अधिक से अधिक शोधपरक अध्ययन होना चाहिए जिससे युवा पीढ़ी भी प्रेरित हो सके। लंबे समय से जुड़ी डॉ प्रतिभा अग्रवाल ने अस्वस्थता के बावज़ूद अॉडियो द्वारा परिषद को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की।ईश्वर बाबू जी और काको जी के संरक्षण में बचपन से ही देखती आ रही विमला पोद्दार परिषद से शुरू से जुड़ी रहीं। ईश्वर प्रसाद टांटिया ने शुभकामनाएँ प्रेषित की। कार्यक्रम के प्रथम भाग 'परिषद की यात्रा और वार्ता कल आज और कल' के अंतर्गत वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने वक्तव्य रखे।
द्वितीय भाग 'वर्तमान संदर्भ में संस्कृति और साहित्य' विषय पर वागर्थ वेब की एडमिन डॉ वसुंधरा मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोरोना महामारी काल में किस तरह का साहित्य जन्म लेगा यह आने वाला भविष्य तय करेगा। यह मृत्यु से युद्ध का समय है। साहित्य और संस्कृति मनुष्य की भावना से अन्तर्संबंधित है। इस विषय पर इस समय भी लिखा जा रहा है और आगे आने वाले समय में भी लिखा जाएगा क्योंकि यह इस युग की एक महान घटना है। डॉ संजय जायसवाल ने परिषद के स्थापना दिवस पर सीताराम जी सेकसरिया और भागीरथ कानोडिया जी के सद्प्रयासों की चर्चा की और कोरोना की भयावह स्थिति पर ध्यान आकर्षित करते हुए कार्यक्रम का आयोजन होना अच्छी पहल बताया। मधु सिंह ने कोरोना महामारी के दौरान उम्मीद लिख रही हूँ कविता सुनाकर श्रोताओं को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का प्रयत्न किया। कोलकाता रंगमंच के लोकप्रिय अभिनेता अजहर आलम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। पूजा सिंह ने कुंवर बैचेन जी कविता पाठ द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की और अपनी कविता की प्रस्तुति दी। वहीं आनंद गुप्ता ने समसामयिक भयावह महामारी में 'उम्मीद' कविता सुनाई। रावेल पुष्प ने अजहर आलम की स्मृति में बहुत ही मार्मिक कविता सुनाई। व्यंगकार नुपूर अशोक ने दो कविताएँ सुनाई। कविता 'गेम का प्लान' में किए व्यंग को बहुत पसंद किया गया। डॉ राजश्री शुक्ला ने परिषद को बधाई दी। विनोद कुमार ने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।कोरोना काल में असमय मृत्यु प्राप्त रमेश उपाध्याय, अजहर आलम, मंजूर एहतेशाम, अरविंद कुमार, अमिता शाह, विमल लाठ और कुंवर बैचेन जैसे साहित्य और रंगमंच की प्रमुख हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
इस अवसर पर परिषद की ओर से आने वाले कार्यक्रम 'एक साहित्यकार की खोज' के विषय में डॉ केयुर मजमूदार और डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी दी जिसमें युवा पीढ़ी की विविध साहित्यिक- सांस्कृतिक प्रतिभाओं को स्थान दिया जाएगा और परिषद के मंच पर उनको चयनित कर विभिन्न कॉर्पोरेट जगत के सहयोग से उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। यह प्रतियोगिता स्कूल - कॉलेज और राष्ट्रीय स्तर पर फाइनल आकार लेगी। वागर्थ वेब युवाओं और प्रबुद्ध प्रतिभाओं का डिजिटल पटल है जो भारतीय भाषा परिषद की ही इकाई है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में परिषद के प्रांगण में संस्थापकों की मूर्तियों पर माल्यार्पण किया सचिव डॉ केयुर मजमूदार एवं वित्त सचिव घनश्याम सुगला ने , जूम पर उपस्थित सभी ने नमन किया । पूरे कार्यक्रम का संचालन और तकनीकी सहयोग डॉ केयुर मजमूदार ने किया।
भारतीय भाषा परिषद का परिचय
पश्चिम बंगाल कोलकाता की प्रमुख संस्था भारतीय भाषा परिषद भारत एवं भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली कंपनी एक महत्वपूर्ण संस्था है, जहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले जन-समुदाय की भाषाओं, चिन्तन और चेतना का संगम है। भारतीय भाषा परिषद कोलकाता की गरिमामयी साहित्य, संस्कृति एवं चेतना को न केवल भारत में ही अपितु भारत के बाहर भी अपनी साहित्यिक गतिविधियों को संचारित एवं परस्पर आदान-प्रदान करने के लिए हृदयस्थली की भाँति कार्य करती है। राजभाषा हिन्दी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं से अनुवाद के माध्यम से इसकी अपनी विशेष भूमिका रही है। यही कारण है कि हिन्दी भाषा के माध्यम से ही भारत की गरिमामयी साहित्य संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता भारत के बाहर भी प्रसारित एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अभिव्यक्त करती है।
हिन्दी भाषा और साहित्य के समक्ष आज बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिनमें सूचना-विज्ञान, प्रौद्योगिकी के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को बनाये रखते हुए साहित्य का सृजन करना प्रमुख है।
भारतीय भाषा परिषद के फेसबुक और वागर्थ वेब पर विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विकास से संबंधित कविताएं, निबंध, आलेख, लाइव वेबिनार और विभिन्न हिंदी विधाओं को स्थान दिया जाता है।
हिन्दी की अनेक बहुमुखी प्रतिभाओं को पुरस्कृत किया जाता है। इसलिए हिन्दी के साहित्य विकास, शब्द सामर्थ्य तथा अभिव्यक्ति की क्षमता भी बनाये रखने का गौरव एवं गुरुतर दायित्व के प्रति भी भारतीय भाषा परिषद संकल्पबद्ध है।
किसी भी संस्था की नींव या उसकी मजबूती कर्णधार होते हैं। आज भागीरथ कानोडिया और सीताराम सेकसरिया का जन्मदिन है और उसी को हम संस्था का संस्थापक दिवस के रूप में मनाते हैं।
भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में भारतीय भाषाओं की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करने के उद्देश्य से 1975 में स्थापित हुई थी। यह अपने भवन 36ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता 700017 में 1979 में स्थानांतरित हुई। इसके संस्थापकों में प्रमुख थे सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया। इस गैर-सरकारी संस्थान ने अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय अखंडता, बहुलतावादी संस्कृति और सभी भाषाओं के साहित्य की सृजनशीलता को प्रोत्साहित करना अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है। आज भारतीय भाषा परिषद देश की एक अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के रूप में जानी जाती है। यह भारत की एक अनोखी संस्था है, जो आत्मनिर्भर है और विभिन्न दिशाओं में सक्रिय रहते हुए हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के लिए लगातार सक्रिय है। निजी क्षेत्र से साहित्यिक कार्यों के लिए ऐसी व्यवस्था और साल भर नियमित गतिविधियाँ फिलहाल अन्यत्र कहीं नहीं है। परिषद के संस्थापकों ने अपनी दूरदर्शिता से इस संस्था को स्वावलंबी बनाया है।
समृद्ध पुस्तकालय
भारतीय भाषा परिषद का लगभग 20,000 पुस्तकों से संपन्न भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय है, जो कार्यदिवस पर सवेरे 11 बजे से संध्या 6 बजे तक खुला रहता है।
पुस्तकालय की सभी पुस्तकें कंप्यूटर पर आगणित हैं और सदस्य मुक्त रूप से पुस्तक चयन कर सकते हैं।
ग्रंथालय के पाठकों को पुस्तकों के अलावा महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ने के लिए सुलभ हैं। यहाँ हंस, कथादेश, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, परिकथा, आलोचना, अंतिम जन, गांधी मार्ग, आउटलुक, इंडिया टुडे, फ्रंटलाइन आदि पत्रिकाओं के अलावा कोलकाता से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र उपलब्ध रहते हैं।
भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय में विशिष्ट साहित्यिक कृतियों के अलावा कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के उपयोग के लिए बड़ी संख्या में पुस्तकें हैं। इसमें बांग्ला और अंग्रेजी के अलावा कई अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। ग्रंथालय में एम.पी. बिड़ला फाउंडेशन ग्रंथालय के दुर्लभ ग्रंथों को भी पाठकों के लिए सुलभ बनाया गया है। यहाँ कई इनसाइक्लोपीडिया उपलब्ध हैं और शोध के लिए प्रचुर सामग्री है। कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी नियमित रूप से इस ग्रंथालय का उपयोग करते हैं और लाभान्वित होते हैं। हमारा निरंतर प्रयत्न है कि पुस्तकालय और वाचनालय अध्ययन, अनुसंधान और सहचिंतन का एक प्रमुख केंद्र बने।
विशेष जानकारी : 7003318483
पुस्तक केंद्र
भारतीय भाषा परिषद 2007 से पुस्तक केंद्र का संचालन कर रही है। जहाँ आम पाठकों को चुनी हुई पुस्तकें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होती हैं। पुस्तक केंद्र में हिंदी और हिंदी में अनूदित श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ विक्रय के लिए रखी जाती हैं। इसके अलावा यहाँ प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खरीदने के लिए उपलब्ध हैं। फिलहाल मरम्मत कार्य के कारण पुस्तक केंद्र बंद है।
प्रमुख प्रकाशन
भारतीय भाषा परिषद सभी हिंदीतर भारतीय भाषाओं की प्रमुख रचनाओं का चयन हिंदी में प्रकाशित कर सांस्कृतिक सेतुबंधन का कार्य करती है। इसके कुछ प्रमुख प्रकाशन हैं-
1. संस्कृत वाङमय कोष (4 भाग) : श्रीधर भास्कर वर्णेकर (सं.)
2. भारतीय उपन्यास कथासार (2 भाग) : प्रभाकर माचवे (सं.)
3. गीत-गोविंद (जयदेव) : कपिला वात्स्यायन (सं.)
4. श्रेष्ठ ललित निबंध (2 भाग) : कृष्ण बिहारी मिश्र, बालशौरि रेड्डी (सं.)
5. श्रेष्ठ बाल कहानियाँ : बालशौरि रेड्डी (सं.)
6. विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ (2 भाग) : प्रभाकर श्रोत्रिय
7. श्रेष्ठ भारतीय एकांकी (2 भाग) : प्रभाकर श्रोत्रिय
8. भारतीय श्रेष्ठ कहानियाँ (2 भाग) : सन्हैयालाल ओझा (सं.)
9. नेपाली साहित्य : कमला सांकृत्यायन
10. वचनोद्यान : सिद्धय्य पुराणिक
11. राजा की भेरी (मलयालम) : शाण्डिल्यन
12. हिंदी गद्य मधुसंचय : परमानंद श्रीवास्तव (सं.)
13. भक्ति तत्व दर्शन-साहित्य-कला : कल्याणमय लोढ़ा, जयकिशनदास सादानी (सं)
14. विश्वंभरा : सी. नारायण रेड्डी (सं)
15. नवलेखन के रंग : एकांत श्रीवास्तव- कुसुम खेमानी (सं.)
16. जवाहर भाई : राय कृष्णदास
17. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश (7 खंड-2660 प्रविष्टियां-4,550 पृष्ठ)
हिंदी की सांस्कृतिक गरिमा का उद्घोष
हिंदी साहित्य ज्ञानकोश
7 खंड - 2660 प्रविष्टियाँ – 4,650 पृष्ठ
प्रधान संपादक : शंभुनाथ संयोजक : कुसुम खेमानी
संपादक मंडल : राधाबल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह, अवधेश प्रसाद सिंह
भाषा संपादक : राजकिशोर
प्रमुख वितरक : वाणी प्रकाशन मो. 96433 3 1304
हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका
भारतीय भाषा परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिकाओं में एक है। इसका प्रकाशन 1995 से नियमित रूप से हो रहा है। माई 2021 तक इसके 306 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। यह पत्रिका विभिन्न साहित्यिक विधाओं की उत्कृष्ट रचनाएं प्रकाशित करती हैं। यह हिंदी के वरिष्ठ लेखकों के अलावा नई पीढ़ी के लेखकों की भी अपनी पत्रिका है। वागर्थ पत्रिका देश के विभिन्न शहरों में 60 से अधिक बुक स्टालों पर जाती है। इसके वार्षिक ग्राहकों की संख्या करीब 1 हजार है।
विशेष जानकारी : 7449503734 ईमेल : vagarth.hindi@gmail.com
साहित्यिक सेमिनार, व्याख्यान, कला-प्रदर्शन
भारतीय भाषा परिषद देश की अग्रणी संस्थाओं- साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय फाउण्डेशन, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं दूर संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, केंद्रीय हिंदी निदेशालय आदि के सहयोग से राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करती है। यह स्वतंत्र रूप से भी वर्ष भर राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ, व्याख्यान, कविता पाठ और संवाद के कार्यक्रम आयोजित करती रहती है। प्रसिद्ध संगीतज्ञों और नृत्यांगनाओं के भी सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में स्थित एक प्रमुख हिन्दीसेवी संस्था है। भारतीय भाषाओं की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करने के उद्देश्य से 1975 में इसकी स्थापना की गयी थी। कोलकाता में स्थित यह संस्था अनेक प्रकार के साहित्यिक पुरस्कार देती है। इनकी साहित्यिक पत्रिका वागर्थ मासिक है।
1979 में यह अपने भवन 36ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता 700017 में स्थानांतरित हुई। इसके संस्थापकों में प्रमुख थे सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया। इस गैर-सरकारी संस्थान ने अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय अखंडता, बहुलतावादी संस्कृति और सभी भाषाओं के साहित्य की सृजनशीलता को प्रोत्साहित करना अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है। आज भारतीय भाषा परिषद देश की एक अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के रूप में जानी जाती है। यह भारत की एक अनोखी संस्था है, जो आत्मनिर्भर है और विभिन्न दिशाओं में सक्रिय रहते हुए हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के लिए लगातार सक्रिय है। निजी क्षेत्र से साहित्यिक कार्यों के लिए ऐसी व्यवस्था और साल भर नियमित गतिविधियाँ फिलहाल अन्यत्र कहीं नहीं है। परिषद के संस्थापकों ने अपनी दूरदर्शिता से इस संस्था को स्वावलम्बी बनाया है।
सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत भागीरथ कानोडिया ने १९७४ में अपनी पचहत्तर-अस्सी वर्ष की वृद्धावस्था में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान, सम्पर्क, सहयोग और अनुवाद बढ़ाने के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की थी। दोनों मित्रों की दृष्टि यह थी कि हिन्दी का ढोल पीटने के बजाए भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध कर ही अंग्रेजी के सर्वभक्षी अभियान को रोका जा सकता है।
परिषद के उद्देश्यों की सत्रह सूत्री सूची का प्रथम उद्देश्य ही – 'विभिन्न भारतीय भाषाओं को निकट लाने और उनमें पारस्परिक सम्मान पैदा करने की दृष्टि से विचारों में समन्वय और आदान–प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय मंच की स्थापना करना' था। यह कहने की जरूरत नहीं कि दोनों ही मित्र स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भुक्तभोगी।
वाह्य संपर्क
अशोक सेकसरिया ने कुछ दिनों पहले भारतीय भाषा परिषद में अंग्रेज़ी के प्रति बढ़ते मोह की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी। वे इस संस्था के संस्थापक दिवंगत सीताराम सेकसरिया के पुत्र हैं।
भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए जिन संस्थाओं को गठित किया गया हो , वे अगर अपने उद्देश्य से ठीक विपरीत काम करने लगें तो कम से कम उसका प्रतिवाद करना प्रत्येक भारतीय भाषा प्रेमी का कर्तव्य है । एक समय की ऐसी प्रसिद्ध और प्रतिबद्ध दो संस्थाओं नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी तथा बंगीय साहित्य परिषद , कोलकाता- की दुर्गति के लिए शायद हमारा मौन ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है । इस पत्र के माध्यम से मैं भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता द्वारा अपने संस्थापक दिवस पर आयोजित अंग्रेजी व्याख्यान और अंग्रेजी में ही भेजे गए निमंत्रण पत्र के विरुद्ध अपना प्रतिवाद दर्ज कराना चाहता हूं ।
मेरे दिवंगत पिता सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत भागीरथ कानोडिया ने १९७४ में अपनी पचहत्तर -अस्सी वर्ष की वृद्धावस्था में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान , सम्पर्क ,सहयोग और अनुवाद बढ़ाने के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की थी । दोनों मित्रों की दृष्टि यह थी कि हिन्दी का ढोल पीटने के बजाए भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध कर ही अंग्रेजी के सर्वभक्षी अभियान को रोका जा सकता है । परिषद के उद्देश्यों की सत्रह सूत्री सूची का प्रथम उद्देश्य ही – ‘ विभिन्न भारतीय भाषाओं… को निकट लाने और उनमें पारस्परिक सम्मान पैदा करने की दृष्टि से विचारों में समन्वय और आदान – प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय मंच की स्थापना करना’ था । यह कहने की जरूरत नहीं कि दोनों ही मित्र स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भुक्तभोगी ।
अब भारतीय भाषा परिषद इस उद्देश्य से ठीक विपरीत काम कर रही है । २००४ में एक अंग्रेजी इंटरनेशनल स्कूल खोलकर परिषद को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की सुनियोजित कोशिश की गई थी , जो हिंदी के प्रायः सभी प्रतिष्ठित लेखकों के प्रखर विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई। सात वर्ष के अंतराल के बाद यह कोशिश फिर से शुरु की गई है । अपने कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह लायक वेतन देने में अपने को अक्षम बताने वाली परिषद अंग्रेजी में मंहगे व्याख्यान आयोजित करने के साथ लाखों या करोड़ रुपये के किसी प्रोजेक्ट (परियोजना) के तहत भारतीय भाषा का कोई विश्वकोश या कोश अंग्रेजी में तैयार करने में लगी है । आज बहुत सारे व्यावसायिक प्रकाशन विशुद्ध मुनाफा कमाने के लिए भारतीय भाषाओं ही नहीं , भारतीय व्यंजनों और पाककला तक के विश्वकोश अंग्रेजी में प्रकाशित कर रहे हैं । भारतीय भाषा परिषद के उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से कहा गया है ,’संस्था के पूर्ण रूप से उन्नायक होने के कारण उसकी कोइ भी प्रव्रुत्ति जिसमें मुद्रण और प्रकाशन भी सम्मिलित है,किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ या प्राप्ति के लिए संचालित नहीं की जाएगी ।’अब भारतीय भाषा परिषद इस उद्देश्य से ठीक विपरीत काम कर रही है । २००४ में एक अंग्रेजी इंटरनेशनल स्कूल खोलकर परिषद को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की सुनियोजित कोशिश की गई थी , जो हिंदी के प्रायः सभी प्रतिष्ठित लेखकों के प्रखर विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई। सात वर्ष के अंतराल के बाद यह कोशिश फिर से शुरु की गई है । अपने कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह लायक वेतन देने में अपने को अक्षम बताने वाली परिषद अंग्रेजी में मंहगे व्याख्यान आयोजित करने के साथ लाखों या करोड़ रुपये के किसी प्रोजेक्ट (परियोजना) के तहत भारतीय भाषा का कोई विश्वकोश या कोश अंग्रेजी में तैयार करने में लगी है । आज बहुत सारे व्यावसायिक प्रकाशन विशुद्ध मुनाफा कमाने के लिए भारतीय भाषाओं ही नहीं , भारतीय व्यंजनों और पाककला तक के विश्वकोश अंग्रेजी में प्रकाशित कर रहे हैं । भारतीय भाषा परिषद के उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से कहा गया है ,’संस्था के पूर्ण रूप से उन्नायक होने के कारण उसकी कोइ भी प्रव्रुत्ति जिसमें मुद्रण और प्रकाशन भी सम्मिलित है,किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ या प्राप्ति के लिए संचालित नहीं की जाएगी ।’
हाल ही में भारतीय भाषा परिषद ने अपने मासिक वागर्थ के दो नवलेखन अंकों को मिलाकर बिना किसी संपादन और भूमिका के एक किताब बनाकर राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन उसकी चार सौ पचास प्रतियां बेची हैं । यह किताब बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं , परिषद की पुस्तक की दुकान ‘पुस्तक केन्द्र’ तक में नहीं । जिन लोगों की रचनाएं संकलित हैं , उन्हें पुस्तक भेजना तो दूर , यह भी सूचित नहीं किया गया है कि उनकी रचनाओं का क्या हश्र हुआ है । सूचना के अधिकार के तहत राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन और सरकारी संस्थाओं द्वारा पुस्तकों की खरीद की प्रक्रियाओं – उनके चयन और चयनकर्ताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना और चुप्पाचोरी धांधली को रोकना बहुत जरूरी है । परिषद के मंत्रियों को परिषद के कार्यकलाप के बारे में मैं पत्र लिख चुका हूं , पर व्यर्थ । यही नहीं मुझे आगे पत्राचार न करने के लिए कहा गया है ।
मेरी अपनी कोई निजी पहचान नहीं है । जो है अपने दिवंगत पिता के पुत्र के रूप में ही है । इस पहचान के नाते मेरे लिए यह पत्र लिखना अत्यंत कष्टप्रद और मार्मिक है ।
सीताराम सेकसरिया को समाज सेवा के क्षेत्र में सन १९६२ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये असम राज्य से थे। सीताराम सेकसरिया एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता , गांधीवादी , समाजवादी और पश्चिम बंगाल के संस्था बिल्डर थे , जो मारवाड़ी समुदाय के उत्थान के लिए उनके योगदान के लिए जाने जाते थे । वह एक उच्च विद्यालय संस्थान, मारवाड़ी बालिकिका विद्यालय, समाज सुधार समिति , एक सामाजिक संगठन और भारतीय भाषा परिषद , उच्च शिक्षा संस्थान, श्री शिक्षाशाटन सहित कई संस्थानों और संगठनों के संस्थापक थे। एक गैर सरकारी संगठन भारत सरकार ने समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें 1962 में पद्म भूषण का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। उनके जीवन की कहानी एक किताब,पद्म भूषण सीताराम सेकसरिया अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित की गई है , जिसे भावरमल सिंह द्वारा संपादित किया गया है और 1974 में प्रकाशित किया गया था। वह 19 मई,1982 को अपने घर में मृत पाया गया था,
0
Born in Mukundgarh, Rajasthan, India on 25 Jan 1895 to रामदत्तजी कानोड़िया and Anni devi Poddar. Bhagirath Kanoria married Bhagwani Devi Kejriwal and had 6 children. He passed away on 29 Oct 1979 in Kolkata, West Bengal, India.
परशुराम और परशुराम प्रतीक्षा
परशुरामजी और परशुराम की प्रतीक्षा - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, समय की मांग भी है। समय की आवाज को न सुनना अर्थात बहरा होने की गवाही तो है ही, कायरता एवं नपुंसकता को भी स्वीकारना है।आइए! परशुरामजी के परिचय के साथ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रसिद्ध कविता' परशुराम की प्रतीक्षा' के विषय में भी जाने। पौराणिक मान्यताओं में परशुरामजी - -
परशुराम जयंती---अक्षय तृतीया के दिन मनाया जाता है
ब्राह्मण लोग ही इन्हें अपना आदर्श मानते हैं और पूजा करते हैं।
भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था। वे भगवान विष्णु के छठे अवतार है।
परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विद्या लेने का प्रयास किया। परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।
एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा। किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा। अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वह बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी।
महाभारत काल में एक कथा के अनुसार भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।
एक और कथा आती है कि परशुराम त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
और उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।
ब्रह्मवैवर्त पुराण वेदमार्ग का दसवाँ पुराण माना गया है। अठारह पुराणों में प्राचीनतम पुराण ब्रह्मवैवर्त पुराण को माना गया है। इस पुराण में जीव की उत्पत्ति के कारण और ब्रह्माजी द्वारा समस्त भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले जीवों के जन्म और उनके पालन पोषण का सविस्तार वर्णन किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्री राम की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला और श्री जानकी जी की साकेत-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासनाका सुन्दर निरूपण किया गया है। अनेक भक्तिपरक आख्यानों एवं स्तोत्रों का भी इसमें अद्भुत संग्रह है।
माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है। इसी समाज में एक राजा हुआ था सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इसके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।
ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।
तब सहस्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं।
इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"।उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया।
उन्हें भगवान विष्णु का आवेशावतार माना जाता है। महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए।
भगवान परशुराम मृत्यु से मुक्त हैं। वह उन 7 चिरंजीवी में से हैं, जिन्हें हमेशा के लिए अमर माना जाता है। परशुराम उस युग के सबसे क्रोधी ब्राह्मण या साधु माने जाते थे।
बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम।
पहले उन्होंने अपने पिता ऋषि जमदाग्नि से शिक्षा प्राप्त की । उसके बाद शस्त्र विद्या देवों के देव महादेव से प्राप्त किया। वास्तविक गुरु भगवान महादेव थे। महादेव के शिष्य होकर विश्व से बुराई का अंत करने के लिए युद्ध करते रहे और सदैव ही आगे बढ़ते रहे। शिव ने दक्षिणा स्वरूप शेषनाग मांगने पर पता चलने पर राम के भाई लक्ष्मण जो शेषनाग के रूप में धरती पर जन्म लिया उन्होंने कई बार लक्ष्मण के सिर को काटने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।
आखिरकार उन्हें पता चला कि राम ही भगवान विष्णु है। महादेव ने परशुराम के गुस्से को शांत करने के उद्देश्य से दक्षिणा मांगी थी।
'परशुराम की प्रतीक्षा' की प्रासंगिकता - - -
'परशुराम की प्रतीक्षा' 'रामधारी सिंह दिनकर जी की बहुत प्रसिद्ध रचना है। आज के संदर्भ में इस रचना का विशेष महत्व है जिस पर हमें विचार करना चाहिए। हमें इस रचना के आतंरिक पहलुओं पर बार बार चर्चा करनी चाहिए।
कवि कहता है कि हमें अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए सतत जागरुक रहना चाहिए। युद्धभूमि में शत्रु का विनाश करने के लिए हिंसा अनुचित नहीं है।
दिनकर ने जिस समय लिखना शुरू किया उस समय हमारे देश में ब्रिटिश की गुलामी बड़ियों को तोड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वाधीनता संग्राम का संघर्ष जोरों पर था।
इससे संपूर्ण देश का मानस आंदोलित हो चुका था। आंदोलन की वापसी गांधी इरविन समझौता , मेरठ षड्यंत्र और भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी, कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना और शिक्षित लोगों के बीच समन्वय वादी विचारधारा खूब उमड़ रही थी। इसी समय किसान सभा की स्थापना और उसके समानांतर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भी हो चुकी थी ।अंतरराष्ट्रीय स्तर परबोल्शेविक क्रांति की घटना के साथ-साथ समाजवादी सोवियत संघ नई आशावादी किरण लेकर आया था।
स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर के कवि जो धीरे-धीरे काफी उग्र हो चुके थे । इसलिए उन में पहले के राष्ट्रीय तत्ववादी कवियों की तुलना में एक बलिदानी का भाव है, यही भाव दिनकर में आकर बहुत बढ़ जाता है।
सन 1962 के चीनी आक्रमण के परिणाम स्वरूप भारत को मिली पराजय से क्रुद्ध होकर कवि के मन में जो तिलमिलाहट पैदा हुई उसकी उद्बोधन आत्मक अभिव्यंजना ही परशुराम की प्रतीक्षा है।
जीवन का प्रत्येक परिस्थितियों में क्रांति का राग अलापने वाला कवि दिनकर इस रचना में परशुराम की प्रतीक्षा करता है।
एक समय था जब कवि को लगता था कि अर्जुन एवं भीम जैसे वीरों की आवश्यकता थी। किंतु आज उसे लगता है कि देश पर जो संकटकाल मंडरा रहा है उसके घने बादलों में छिपे सूर्य को परशुराम का कुठार ही बाहर ला सकता है।
इसलिए कवि ने प्रस्तुत कविता में परशुराम धर्म अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। कवि की सोच उसके विश्वास का साथ देती हुई यही निष्कर्ष निकालती है।
वे पीयें शीत तुम आतम घाम पियो रे ।
वे जपें नाम तुम बनकर राम जीओ रे।
चीन की इस धोखाधड़ी से भारत तिलमिला उठा। देश में जागृति की लहर दौड़ गई जनसामान्य के मन में आक्रोश उबरा और साहित्यकारों के मन - मस्तिष्क में एक प्रतिक्रिया ने जन्म लिया।
कितने ही कवियों की लेखनी ने राष्ट्रीय कविताएं लिखीं। दिनकर जी द्वारा लिखित काव्य परशुराम की प्रतीक्षा अभी उपर्युक्त पराजय की प्रतिक्रिया का ही परिणाम था।
नेफा युद्ध के प्रसंग में भगवान परशुराम का नाम अत्यंत प्रासंगिक है जब परशुराम पर मात्र हत्या का पाप चढ़ाते हुए उस से मुक्ति पाने के लिए सभी तीर्थों में घूमते फिरते परंतु कहीं भी उनके ताप का भाव दूर नहीं हुआ। ब्रह्मा कुंड में डुबकी लगाते ही फरसा उनके हाथ से छूट गया अर्थात उनका मन पाप मुक्त हो गया।
नेफा क्षेत्र उसी ब्रह्मा कुंड से निकलती धारा का स्थल है जहां ब्रह्मपुत्र नदी बहती है, वही परशुराम कुंड है जो हिंदुओं का तीर्थ स्थान है, ब्रह्मपुत्र का नाम रोहित भी है।
कवि कहता है कि भारत ने अब अहिंसा के भाव को तिलांजलि देकर पुनः शस्त्र बल का आश्रय लिया है।
तांडवी तेज फिर से पुकार उठा है ।
लोहित में था जो गिरा कुठार उठा है।।
प्रस्तुत कविता की पौराणिक पृष्ठभूमि ही परशुराम धर्म की अनियमिता है। कवि द्वारा परशुराम धर्म की प्रतिष्ठा का उद्देश्य यही है कि चीन द्वारा आक्रांत एवं पद आक्रांत भी है यही इस कविता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
प्रस्तुत रचना में कवि ने शस्त्र प्रयोग को अस्वीकार्य मांगने तथा शारीरिक बल प्रयोग न करने की शिक्षा देने वाला तथाकथित महापुरुषों पर व्यंग्य किया है।
गीता में जो त्रिपिटक निकाय पढ़ते हैं
तलवार गला कर जो तकली गढ़ती है ।
शीतल करते हैं जो अतल प्रबुद्ध प्रजा का
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।।
परशुराम धर्म भारत की जनता का धर्म है परशुराम भारत की जागरूक जनता के प्रतीक थे।
आज सभी अपने अपने स्वार्थ भाव के पोषण में लगे हैं वस्तुतः आज आवश्यकता है एक ऐसे धर्म की जो सर्वजन हितकारी और लोगों के लिए लाभकारी हो। परशुराम धर्म वह धर्म है जो पुरुष चेतना का वाहक है अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आज के युग का एकमात्र धर्म यही है।
परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, समय की मांग है भी है। यह समय की आवाज को न सुनना अर्थात बहरा होने की गवाही तो है ही कायरता एवं नपुंसकता को भी स्वीकारा है।
इस रचना में पूर्ण सत्ताधारियों को कोसा गया है जिनकी गलत नीतियों के कारण भारत को चीन के आक्रमण का शिकार होना पड़ा जिनके गलत आदेशों के परिणाम स्वरुप असंख्य सैनिकों को मृत्यु की घाटी में कूदना पड़ा।
1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय से देश की जनता तो मर्माहत थी ही, हमारे बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी बहुत दुखी थे। सभी चीन के साथ भारत की कमजोर विदेश नीति और अशक्त रक्षा नीति को इस हार के लिए जिम्मेवार ठहरा रहे थे। ऐसे में आग, विरोध, विद्रोह और राष्ट्रीय स्वाभिमान को आवाज देने के लिए मशहूर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कैसे चुप रह सकते थे! कविवर दिनकर ने चीन की हार के बाद ही ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ नाम की काव्य पुस्तक की रचना की। उन्होंने इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों की कविता के माध्यम से आलोचना की। कांग्रेसी शासन के समय देश में व्याप्त भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को भी दिनकर जी ने अपनी लेखनी से रेखांकित किया।
पुस्तक की शुरुआत में ही कवि ने वीरों और सैनिकों से प्रश्न तथा उनके उत्तर के अंदाज में लिखा है-
गरदन पर किसका पाप वीर! ढोते हो?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था,
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गए थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गए थे,
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं,
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का,
कई बार तलवार गलाकर तकली गढ़ने वाली नीतियों की वजह से ही हमारे वीर सैनिकों को शहादत देनी पड़ी और अपने शोणित यानि खून से हमारे वीर ऐसी नीतियों के कलंक को धो रहे हैं। दरअसल, इन पंक्तियों में तत्कालीन विदेश नीति और रक्षा नीति पर करारा प्रहार किया गया है। सभी जानते हैं कि गलत रक्षा नीति के कारण कैसे भारतीय सैनिक युद्ध के लि ए जरूरी सामानों के अभाव में ही युद्ध लड़ रहे थे।
चीन की हार से दिनकर जी गुस्से और दुख से भरे हुए थे। उनके क्षोभ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को इशारों-इशारों में ‘घातक’ तक कह डाला। उन्होंने लिखा-
घातक है जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहां मारा है।
जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतंत्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं बधिक है।
चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं,
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
दिनकर की ये पंक्तियां नेहरू के जमाने की राजनीतिक अक्षमता और भ्रष्टाचार की कहानी कहती हैं। वे बता रहे हैं कि कैसे सच जानकर भी सच को नजरअंदाज किया जाता रहा, चुप्पी साधी जाती रही, भ्रष्टाचारियों तथा चापलूसों को संरक्षण दिया जाता था। यही वजह थी कि भारत अपने ही घर में हार गया।
सरकारी और प्रशासनिक तंत्र को जगाने के लिए बेहद कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए दिनकर जी आगे लिखते हैं-
ओ बदनसीब अंधो! कमजोर अभागो?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में,
किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियां-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर नहीं कढ़ती हैं।
दिनकर जी सिर्फ नेहरू सरकार की नीतियों को गलत ठहरा कर चुप नहीं हो गए बल्कि, वे देश को निर्बलता की ऐसी स्थिति से निकलने का समाधान बताते हुए वीरता और शौर्य का आह्वान भी करते हैं।
पहली आहुति है अभी, यज्ञ चलने दो,
दो हवा, देश की आग जरा जलने दो।
जब हृदय-हृदय पावक से भर जाएगा,
भारत का पूरा पाप उतर जाएगा,
देखोगे कैसा प्रलय चण्ड होता है!
असिवन्त हिन्द कितना प्रचंड होता है
बांहों से हम अंबुधि अगाध थाहेंगे,
धंस जाएगी यह धरा, अगर चाहेंगे .
तूफान हमारे इंगित पर ठहरेंगे।
हम जहां कहेंगे, मेघ वहीं घहरेंगे।
गरजो, अंबर को भरो रणोच्चारों से,
क्रोधान्ध रोर, हांकों से, हुंकारों से।
यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है,
मूढो! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।
जातीय गर्व पर क्रूर प्रहार हुआ है,
मां के किरीट पर ही यह वार हुआ है।
अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,
जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।
1962 की हार के करीब साठ वर्षों के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समय सीमा पर चीन से संघर्ष की स्थिति बनी है। ऐसे में, दिनकर जी के ये वाक्य बहुत ही प्रासंगिक हैं। चीन के खिलाफ कवि का गुस्सा जैसे भारतीय जनमानस में अब तक पलता आ रहा हो!
कुत्सिक कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,
हम बिना लिए प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,
अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,
जब तक जीवित हैं, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।
गरजो हिमाद्रि के शिखर, तुंग पाटों पर,
गुलमर्ग, विन्ध्य, पश्चिमी, पूर्व घाटों पर,
भारत-समुद्र की लहर, ज्वार-भाटों पर,
गरजो, गरजो मीनार और लाटों पर।
वीरों और सेनानियों का आह्वान करते हुए दिनकर लिखते हैं---
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जाए।
दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है,
मरता है जो, एक बार मरता है।
तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे!
जीना है तो मरने से नहीं डरो रे!
कवि ने शांति के लिए संघर्ष और वीरता को अनिवार्य माना है। आपको याद होगा कि हाल ही में लेह का दौरा कर जवानों से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि कमजोर कभी भी शांति की पहल या स्थापना नहीं कर सकता है।
हम मान गये, जब क्रान्तिकाल होता है,
सारी लपटों का रंग लाल होता है।
जाग्रत पौरुष प्रज्वलित ज्वाल होता है,
शूरत्व नहीं कोमल, कराल होता है।
कविवर दिनकर की ये पंक्तियां नेहरू जी की उस तस्वीर की याद दिलाती है, जिसमें वे शांति का संदेश देने के लिए कबूतर उड़ाते हुए दिखते हैं। कवि इस रवैये को कठघरे में खड़ा करते हुए कहता है कि आखिर इस शांतिवाद का हश्र क्या हुआ?
जब तक है यह वैषम्य समाज सड़ेगा,
किस तरह एक होकर यह देश लड़ेगा।
राजनीतिक दलों से अपने मतभेद भुलाकर एक साथ आने की अपील करते हुए कवि कहता है कि आज दक्षिण पंथ और वाम पंथ को भूल कर एकजुट होने का वक्त आया है। यह एकजुटता ही देश को विजयी बना सकता है।
वृक हो कि व्याल, जो भी विरुद्ध आएगा,
भारत से जीवित लौट नहीं पाएगा।
शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण भारत के सनातन पराक्रमी महापुरुष परशुराम की प्रतीक्षा की बेसब्री और आशा में कवि कहता है-
निर्जर पिनाक हर का टंकार उठा है,
हिमवंत हाथ में ले अंगार उठा है,
तांडवी तेज फिर से हुंकार उठा है,
लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है।
संसार धर्म की नयी आग देखेगा,
मानव का करतब पुनः नाग देखेगा।
‘परशुराम की प्रतीक्षा’ एक ओर तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिदृश्य में व्याप्त कदाचार और अनाचार को प्रश्नांकित करती है, तो दूसरी ओर देश की स्वाभिमानी और साहसी जनता और सैनिकों की तपस्या, बलिदान और आशावाद को भी स्वर देती है।
मांगो, मांगो वरदान धाम चारों से,
मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों, गुरुद्वारों से,
जय कहो वीर विक्रम की, शिवा बली की,
उस धर्मखड्ग ईश्वर के सिंह अली की।
जब मिले काल, ‘जय महाकाल’ बोलो रे!
सत श्री अकाल! सत श्री अकाल बोलो रे!
कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता परशुराम के उपदेश आज भी आधुनिक युग में प्रासंगिक है।
राम नाम नहीं, जीवन आदर्श है - रिपोर्ट
राम नाम नहीं, जीवन आदर्श हैं : युगानुरूप चयनित राम हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं - - - भारतीय भाषा परिषद में उद्घाटन सत्र में विद्वानों के उद्गार - - - - -
भारतीय भाषा परिषद के जूम एवं फेसबुक तत्वावधान में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार श्री राम के विभिन्न आयाम विषय का आयोजन किया गया। देश- विदेश के प्रख्यात विद्वानों ने इस राम महायज्ञ में भाग लिया और अपने-अपने राम को समझते हुए "कथा साहित्य, जीवन और कर्म में"राम विषयक शोधपरक व्याख्यान दिए।उद्घाटन समारोह के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलपति अटलबिहारी बाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, विशिष्ट अतिथि वक्ताओं में प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय सुप्रसिद्ध लेखिका, कुलपति पश्चिम बंगाल शिक्षक प्रशिक्षण विश्वविद्यालय कोलकाता की उपस्थिति रही।
प्रथम सत्र में कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज ने कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में राम को कलियुग का सहारा बताते हुए अपनी बात रखी। राम आदर्श चरित्र के प्रतीक के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी व्याप्त हैं। एक अच्छे पति, पिता, राजा और संतान को प्रेम करने वाले राम ने लोकाचार को रखने के लिए संयम, धैर्य, मर्यादा और संस्कार आदि उच्च आदर्शों द्वारा सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया। आज नव उदारवादी युग में मिथकों में बदल गए हैं, आज आत्मकेन्द्रित जीवन में राम की कौन सी आकृति है? राम ने आदर्श लक्ष्मण रेखा खिंचने का कार्य किया है। आज राम का स्वरूप नहीं राम का चरित्र हमारे समाज के लिए महत्वपूर्ण है। परंपरा और प्रसंग बोध की पहचान के साथ साथ लोकतांत्रिक युग में प्रगतिशील, त्याग और प्रेम के रूप में राम की महत्ता है।
स्वागत भाषण और विषय प्रवर्तन करते हुए भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष और कथाकार डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा कि बचपन से ही हमने" जानकी नाथ सहाय करें" और "पायो जी मैंने रामरतन धन पायो" सुनते-सुनते बड़े हुए हैं। राम हमारे हृदयाकाश में अनुभूति के रूप में स्थित हैं। श्रुतियों, भोजपत्र की यात्रा करते हुए राम शब्दातीत, लोकातीत और सत्पथ दिखाने वाले हैं। राम जीवन के आदर्श हैं। प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने विभिन्न भाषाओं में राम कथाओं की चर्चा करते हुए वाल्मीकि की रामायण से लेकर संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, जैन, बौद्ध आदि राम कथा के विषय में जानकारी दी। जावा, वर्मा, म्यांमार, थाईलैंड आदि की राम नृत्य और राम नाटकों की चर्चा की जो विदेशों में उनकी राम संस्कृति को दर्शाता है। तिब्बती और सिंहल भाषा में राम नाम की महिमा का वर्णन किया।भारत में ही लगभग चार सौ रामायण हैं। बंगाल में सूर्य कांत त्रिपाठी निराला की "राम की शक्ति पूजा "और रवींद्र नाथ टैगोर के राम प्रेम के विषय में बताया। भारत में आदिकाल से राम हर धर्म हर भाषा में किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। रवीन्द्र नाथ के कई प्रबंध काव्यों में वाल्मीकि प्रतिभा का जिक्र किया जिसमें रवींद्र नाथ टैगोर ने रामायण की उपेक्षिता उर्मिला के चरित्र को उजागर किया वहीं सोनार तरी संग्रह में पुरस्कार में सीता वनवास पर लिखा। सन् 1893 में रवीन्द्रनाथ ने वाल्मीकि की प्रतिभा में अभिनय भी किया। डॉ. बंद्योपाध्याय ने राम और लक्ष्मण की कथा को बचपन से ही भारतीयों के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना। इस सत्र के समन्वयक डॉ संदीप अवस्थी ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया और भारतीय भाषा परिषद से प्रकाशित वागर्थ पत्रिका जो यूजीसी की टॉप लिस्ट में है, शोधार्थियों और लेखकों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जो ई पत्रिका में प्राप्त है।
द्वितीय सत्र का विषय रहा "श्री राम - त्रेता से नव उदारवादी युग तक - भारत और विदेशों में" विशिष्ट वक्ताओं में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षाविद, आलोचक प्रोफेसर डॉ. अवधेश प्रधान ने राम पर चर्चा करते हुए कहा कि राम को युगानुरूप चयन किया जाता रहा है। तुलसी ने शंभूक और सीता निर्वासन जैसे प्रसंगों को रामचरितमानस में नहीं रखा क्योंकि राम का उदात्त चरित्र इन प्रसंगों से मेल नहीं खाता है। तुलसी के राम आदर्श रूप की मिसाल हैं। नव उदारवादी युग पूंजीवाद का युग है जहां हर वस्तु में मूल्य की प्रधानता है चाहे पति-पत्नी के रिश्ते हों या फिर लोकतंत्र या सत्ता और राजनीति ही क्यों न हो। तुलसी के राम अच्छे पुत्र, केवट को गले लगाने वाले और जटायु का श्राद्ध अपने पिता की तरह करते हैं। नव उदारवादी युग में सत्ता सत्य से बड़ी हो जाती है।
इस सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक,वागर्थ के संपादक, आलोचक और डॉ. शंभूनाथ ने राम को आर्य और अनार्य संस्कृति से जोड़ते हुए भारतीय उच्चतम मूल्यों और आदर्शों के धर्म रथों के बदलते रूपों की विस्तार से चर्चा की। रावण रथी और विरथ रघुवीर की व्याख्या की। लगभग तीन सौ से अधिक रामायण लिखी गई। बारहवीं सदी के कंब रामायण में रावण राम की जीत के लिए पुरोहित का कार्य भी करते हैं। औपनिवेशिक व्यवस्था के कारण धर्म में वायरस का प्रवेश हुआ क्योंकि धर्म में खिड़कियां और दरवाजे नहीं होते।
इस सत्र में इंडोनेशिया बाली के सुग्रीव हिन्दुआ विश्वविद्यालय से पधारे डॉ धर्मयासा ने कई स्लाइड्स के द्वारा इंडोनेशिया में राम के अष्टरथ और धर्म के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। बाली में अष्ट धर्म से संबंधित धर्म की कथा बताते हुए राम के आदर्शों को विस्तार से बताया। इंडोनेशिया में 3600 टन के अष्टरथ की तस्वीर दिखाई जो उनके राष्ट्रीय सांस्कृतिक गौरव है।
प्रथम दिन के द्वितीय सत्र का सफल संयोजन और संचालन प्रयागराज की डॉ ऋतु माथुर ने किया। राम के प्रति जिसकी भावना जैसी है वैसी ही मूर्ति व्यक्ति के मन में विराजमान हो जाती है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तीन तैसी, राम सबके हैं। राम अनुभूति हैं और मर्यादा की रेखा हैं।
द्वितीय दिवस के वेबिनार का विषय" वाल्मीकि : तुलसी से निराला और अन्य साहित्य में श्री राम की दृष्टि और अर्थ" रहा। इस सत्र के अध्यक्ष प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित सुप्रसिद्ध आलोचक पूर्व अध्यक्ष हिंदी अकादमी, उत्तर प्रदेश ने अपने वक्तव्य में भारतीय वांग्मय के राम की अवधारणा का पूर्ण अवलोकन करवाया। वेदों से लेकर अब तक राम हमारे समाज की धरोहर रहे हैं।रामचरितमानस में आए विभिन्न शब्दों अहिल्या आदि की व्याख्या की। विशिष्ट वक्ताओं में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री शुक्ल ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषा परिषद ने इस विशाल अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकादमिक क्षेत्र को प्रथम बार सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। राम सांस्कृतिक पहचान के परिचायक हैं। नीदरलैंड से पधारीं ग्लोबल लेखिका आचार्य कुल की अध्यक्ष डॉ पुषपिता अवस्थी ने संपूर्ण विश्व की भौगोलिक सीमाओं के साथ 3000 वर्षों से राम से संबंधित पात्रों को किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ बताया जो भाषा और संस्कृति के अंग रहे हैं। प्रो. सुधांशु शुक्ल ने राम के आविर्भाव का कारण धर्म की स्थापना है और अधर्म का नाश है।
वैश्विक कवियों ने राम के गीतों के साथ अहिंसा प्रेम करुणा, कुरीतियों प्रहार आदि विषयों पर कविताएं सुनाई। अलीगढ़ से गीतकार गजलकार अशोक अंजुम इंग्लैंड से जय वर्मा कैलिफोर्निया से नीलू गुप्ता मुबंई से अभिनेत्री और मंचीय कवयित्री गीतिका वेदिका, ऋतु प्रिया खरे आदि विशिष्ट कवियों ने अंश ग्रहण किया। इसकी अध्यक्षता रायपुर छत्तीसगढ़ के गिरीश पंकज ने की।
राम से संबंधित पांच शोधपत्र भी पढ़ें गए जिनमें अनिता कुमारी ठाकुर, मनीष जैन, डॉ ऋतु माथुर आदि शोधकर्ता रहे। पीयूष जी का संचालन रहा। राम मंदिर के शिलान्यास के पश्चात अकादमी क्षेत्र के विशिष्ट विद्वानों से राम विषयक विभिन्न दृष्टिकोणों से राम को समझना आज की युवा पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों दिनों तक 1400 लोगों द्वारा पंजीकरण और 23 देशों द्वारा एक मंच को अॉन-लाइन फेसबुक और जूम पर देखना और सुनना डिजिटल युग का महनीय कार्य है जिसके लिए भारतीय भाषा परिषद के मंत्री डॉ केयुर मजमुदार जी साधुवाद के पात्र हैं। श्रीमती विमला पोद्दार जी ने इसे कार्यक्रम में देश और विदेशों इंडोनेशिया लंदन कैलिफोर्निया पोलैंड नीदरलैंड आदि देशों के राम विशेषज्ञों को धन्यवाद दिया और डॉ संदीप अवस्थी जिन्होनें समन्वयक की भूमिका का निर्वाह किया। डॉ कुसुम खेमानी, डॉ शंभूनाथ, डॉ केयुर मजमुदार जी को विशेष धन्यवाद दिया और आभार व्यक्त किया।
भारतीय भाषा परिषद कोलकाता की एडमिन डॉ वसुंधरा मिश्र ने दो दिवसीय वेबिनार की पूरी जानकारी दी।
Wednesday, May 4, 2022
माँ के पेट से बंधा रहा - कविता
माँ के पेट से बंधा रहा
ये तो अच्छा हुआ
माँ के पार्थिव शरीर से बंधा था
वह बच्चा
माँ तेरे पेट से बंधा था मैं
नौ महीने भीतर था
क्या फर्क पड़ता है
अब बाहर से बंधा हूँ
मुझे पता ही नहीं चला
कि तुम्हारी देह मर चुकी है
कुछ अजीब सा लगा था
हांँ मुझे तुम्हारे हाथ का अहसास न मिला
आवाज नहीं सुनाई पड़ी
लोरी कहीं दूर से सुनाई पड़ने लगी
माँ तुम आज कुछ अजीब लगने लगी को कु
मेरी जिद भी तुम पूरी नहीं कर रही थी
सारे खिलौने बिखरे पड़े थे
एक भी उठा कर नहीं दे रही थी
तुम माँ आज चुपचाप थी
कोई हलचल नहीं थी
कभी-कभी घर के पास से
भड़ाम भडा़म की आवाज आती
मैं ताली बजा बजा कर माँ को खुश करने में लगा था
पर माँ को कुछ लोग बांधने में लगे थे
मुझे भी माँ से बांधा गया
कसती हुई रस्सियों से मैं जोर जोर से रोने लगा
उस आदमी ने एक थप्पड़ भी मारा
मैं माँ से और चिपक गया
माँ निर्जीव सी लगी
वह आदमी राक्षस था
मुझे कस कर बांधता जा रहा था
मेरे रोने की आवाज बढ़ती गई
उसने विस्फोटक में आग छुआ दी
मेरी आवाज़ बंद हो गई।
बाद में, खबरों में आया
माँ के पार्थिव शरीर से
बच्चे को बांध कर
एक साथ मार डाला गया
अच्छा लगा, मैं बड़ा नहीं हुआ
माँ के आंचल को पकड़े ही रहा
और उसी के साथ रहा
भावनाओं के भ्रम में मृत्यु के नाम से दूर जो था
अच्छा हुआ बड़े लोगों ने खबरों में पढ़ा
@वसुंधरा मिश्र, 04.05.2022
Monday, May 2, 2022
निधि एक अधूरी सी प्रेम कथा को पढ़ते हुए - समीक्षा
निधि एक अधूरी सी प्रेम कथा को पढ़ते हुए - - - डॉ वसुंधरा मिश्र कोलकाता
कथा या कहानी आपको यदि बार-बार पढ़ने के लिए उकसाए और बार-बार मन में अटकी सी रह जाए तो समझ लीजिए कि उसमें कहानी के महत्वपूर्ण गुण छिपे हैं । हर बार के पाठ में उसके नए अर्थ और संदर्भ खुलें, हर बार यह लगे कि कुछ कहने समझने को बचा रह गया।अब सवाल उठता है कि कोई किसी से कुछ ऐसे ही तो नहीं कह देता।बिना किसी भरोसे के, रिश्ते और संबंध के ऐसी बात कहाँ होती है भला।जी हाँ मैं बात कर रही हूँ निधि एक अधूरी सी प्रेम कथा की।
प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम इन तीन मूल उद्देश्यों को लेकर 'निधि एक अधूरी- सी प्रेम कथा' उपन्यास अपना विषय तलाशती है, कहीं भी अपने विषय से न भटकते हुए, न इधर-उधर होते हुए।शाब्दिक विवरणों से ज्यादा मनोविज्ञान को पढ़ते, पकड़ने और उसके चित्रण में रमती हुई कथा मूल में प्रेम के साथ कर्तव्य को प्रतिष्ठित करती है। कर्तव्य भी तो प्रेम का ही एक रूप होता है और देशप्रेम तो बड़े और वृहद् अर्थों में प्रेम है। इसलिए यह कहानी हर अर्थ में कर्तव्य प्रधान प्रेम कथा है। निश्छल प्रेमिका नायिका निधि की छवि आधुनिक जीवन के मानवीय भावना से भरी स्त्री की है। नायिका अपने द्वारा उठाए गए कदमों पर अडिग रहती है।
कहानी की भाषा बिलकुल बोलचाल की भाषा है जो वातावरण को सजीवता प्रदान करती है। नेपाली परिवार के बेटे मेजर राहुल से प्रेम करने के कारण नेपाली भाषा के भी वाक्य मिलते हैं। दो भाषाओं का मेल काफी प्रयोगशील और प्रगतिशील है जो उपन्यास की प्रयोगधर्मिता का परिचय देता है। प्रेम में भाषा समस्या नहीं बनती है। एक प्रेम-कहानी की रचना जिस आत्मीयता और लगाव से लेखिका ने रचा है वह काबिले तारीफ है।
' निधि एक अधूरी - सी कहानी' लेखिका पूनम त्रिपाठी का प्रथम लघु उपन्यास है । उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि वे सेना का अंग बनना चाहती थीं लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वह अवसर नहीं दिया। संभवतः उनकी दबी हुई इसी भावना ने इस प्रेम कथा को जन्म दिया जो देश के प्रति समर्पित सैनिक को केंद्र में रखकर लिखी गई है। सैनिक से प्रेम करने वाली युवती भी विशेष होती है क्योंकि प्रेम करना और उसे निभाना खांडे की धार पर चलना है। एक आम स्त्री और पुरुष की तरह उसका जीवन सरल और सहज नहीं होता। कबीर ने भी कहा है -
प्रेम की गली अति सांकरी जा में दो न समाए। प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय '
भले ही यह प्रेम अन्य संदर्भ में कहा गया हो लेकिन विशुद्ध प्रेम त्याग और बलिदान की ही मांग करता है। वह चाहे देश प्रेम हो या युवक-युवतियों का लौकिक प्रेम हो।
यह उपन्यास एक आर्मी मेजर थापा और एक एनसीसी कैडट निधि की प्रेम कथा है। युवती निधि प्रेम के साथ सैनिक की बुलंद आवाज और उसके वजूद को जिंदा रखने का 'स्ट्रांग' कदम उठाती है। निधि समाज से लड़ती है, सैनिक सरहद पर लड़ता है। निधि जिंदा रहकर सरहद पर जाने वाले प्रेमी की मृत्यु और जीवन की आशंकाओं से घिरी हुई रोज अपने आप से लड़ती है। दोनों पक्षों की ओर से ही जीवन जीने की अलग - अलग चुनौतियाँ आती हैं जिनका सामना निधि करती है। यह उपन्यास स्त्री की आंतरिक मानवीय भावनाओं के द्वंद्व और पीड़ा का उद्घाटन है। 'निधि एक अधूरी सी प्रेम कथा'
शीर्षक में ही प्रेम कथा के अधूरेपन को समझा जा सकता है जो अपने समय में पूरा आकार नहीं लेती है।
यह प्रेम कथा कब पूर्णता लेती है? और क्या मेजर थापा सरहद से वापस आते हैं? क्या निधि को दोनों परिवारों का सहारा मिलता है?विवाह के पहले गर्भ में आए बच्चे को जन्म क्यों देती है?ऐसा क्या होता है कि निधि के सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं? इस तरह के बहुत से प्रश्नों के उत्तर इस उपन्यास में मिलते हैं।
निधि की होने वाली सास की कहानी भी प्रेम विवाह से शुरू होती है जहाँ उसे अपनी सास से 'डायन' की संज्ञा मिलती है। सास नेपाली लामा परिवार की हैं और उनके पति कर्नल थापा परिवार से लेकिन वहाँ भी जाति को लेकर उनके विवाह में बहुत अड़चनें आईं। नेपाली में भी जाति - पांति का विरोध है। निधि की होने वाली सास को तो उसके परिवार ने नकारते हुए उसका दाह-संस्कार तक करा डाला।फौजी ससुराल होने के बावजूद उसकी सास से उसे 'डायन' सुनने को मिला और साथ में पीठ पर गर्म पानी तक उढे़ला गया। परंतु निधि के विवाह में ऐसी अड़चन या प्रतारणा नहीं आती है । भुक्तभोगी सास ने निधि को पूरे मन से अपनाया और उसको सम्मान दिया क्योंकि वह समाज के इस प्रतारणा से गुजर चुकी है। वह कहती है कि कास्ट, रिलीजन और मनी ये ऐसी चीजें हैं जो एक दूसरे को अलग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पति का साथ और प्रेम मिला जो सास का जीवन प्रेम से भरा रहा। और वह अपनी पुत्रवधु को किसी भी प्रकार की तकलीफ़ नहीं देना चाहती थी। तभी तो निधि के हर फैसले में ससुर कर्नल थापा ने अपनी बेटी की तरह उसका हर कदम पर साथ दिया । समाज का विरोध अवश्य रहा लेकिन बहू निधि के दृढ़ संकल्प के आगे किसी की नहीं चली। बिना किसी विरोध के दोनों परिवारों ने इस विवाह के लिए स्वीकृति भी दे दी।
मेजर राहुल थापा के साथ हुई रिंग सेरेमनी के समय आए 'रिश्तेदारों में खुसुर-पुसुर हो रही थी पर प्रकट कोई नहीं कर रहा था। ये समाज का अघोषित नियम है कि सिर्फ खाना-पीना और नुक्स निकालना है। आपकी जरूरत में बहुत कम लोग साथ देगें लेकिन आलोचना करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझेंगे।' (पृष्ठ 63)लेखिका ने उपन्यास में समाज की नब्ज़ को बहुत गहराई से महसूस किया है।
इस पुस्तक की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं - - 'झूठी शान, झूठा रुतबा, बड़ी जाति का घमंड, ये सब एक दीमक की तरह हैं जो इंसान और उसकी इंसानियत को खोखला बना देते हैं।' (पृष्ठ 75)इंसानियत को जिंदा रखने का भरपूर प्रयास इस उपन्यास की विशेषता है।
सैनिक का जीवन कठिनाइयों और चुनौतियों से भरा होता है जिसे कोई भी सामान्य व्यक्ति नहीं बचा सकता है।सबसे पहले, वे अपने प्रियजनों से दूर बहुत समय बिताते हैं। यह उन्हें भावनात्मक रूप से परेशान करता है और वे राष्ट्र की सुरक्षा में व्यस्त रहते हैं, वे राष्ट्र के संरक्षक हैं और अपने नागरिकों की हर कीमत पर रक्षा करते हैं।
इसके अलावा, वे बहुत निस्वार्थ हैं जो देश के हित को अपने निजी हित से ऊपर रखते हैं। विवाह के एक दिन पहले मेजर राहुल को सरहद पर जाना पड़ता है।
वह अपने माता-पिता और सास - ससुर दोनों के साथ साथ अपनी प्रिया निधि को भावनात्मक सहयोग देने की कोशिश करता है। निधि दो दिन बाद ही मिसेज थापा बन जाती लेकिन जीवन में आई इस अप्रत्याशित घटना ने उसके और मेजर के सुंदर सपने को पलभर में चकनाचूर कर दिया।
वह अपनी मित्र चंदना से कहती है - 'एक पल में चंदना, बस एक पल में, मेरी तो दुनिया ही बदल गई। सपने चकनाचूर हो गए।चंदू मैंने अकेले रहने का सपना नहीं देखा था। उनके साथ (जुड़वा बच्चों का सपना) विहान और यामिनी के परवरिश का सपना देखा था' (उन्माद, एक प्रेम कथा, पृष्ठ 71)
कठिनाइयों के बावजूद उनका जीवन एक सीमा के अंदर बंध जाता है। एक सैनिक के लिए सबसे पहले उसका देश होता है,जो लोग इस नौकरी में आने का फैसला करते है वे इस तथ्य से वाकिफ होते है कि उन्हें अपना सम्पूर्ण जीवन देश के प्रति न्योछावर करना होगा,अपने परिवार से लंबे समय तक दूर रहना होगा,और अपने जीवन के सारे सुख ऐश्वर्य का त्याग करना होगा। ये सारी बातें उन्हें दुखी अवश्य करती है पर उनके मन को निराश नहीं करती, वे पूरी लगन के साथ देश सेवा करने को तैयार रहते हैं ।अनुशासन, साहस,संकल्प, मानसिक स्थिरता,मजबूत काया,देशवासियों से प्यार ये सारे गुण एक सोल्जर में विद्यमान होते है। उन्हें अपने देश से बहुत प्यार होता है और उनका देश के प्रति यह लगाव उन्हें और अधिक प्रोत्साहित करता है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैकडुगल ने मूल प्रवृत्ति को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक "ऐन आउटलाइन ऑफ सायकोलाजी" में लिखा है कि- मूलप्रवृत्ति (instinct) एक ऐसी मनोदैहिक प्रवृत्ति है जिससे प्रभावित होकर व्यक्ति किसी उत्तेजक विशेष की ओर ही अपना ध्यान केन्द्रित करता है व किसी विशेष प्रकार के संवेग या आवेग का ही अनुभव करता है और उस उत्तेजक विशेष के प्रति किसी विशेष प्रकार की ही प्रतिक्रिया प्रकट करता है।
विवाह के एक दिन पहले जब मेजर अपने सास ससुर को बताते हैं कि वे कल दोपहर की ट्रेन से जम्मू जा रहे हैं और फिर बॉर्डर पर। (पृष्ठ 84) देश में इस प्रकार हालात हो जाएंगे यह किसे पता था। वह भी तो शादी करना चाह रहे थे। आफ्टर आल आई एम ए सोल्जर आई हैव टू गो
अपने देश के लिए लड़ना ही होगा। (पृष्ठ 84) 'कर्तव्य सबसे बड़ा होता है।' ( पृष्ठ 85) निधि 'स्ट्रांग' होने और हमेशा उसी की रहेगी यह वादा करती है। हावड़ा स्टेशन भी छोड़ने जाती है।
तीन महीने में आने का वादा किया था लेकिन मेजर के सभी साथी आ गए लेकिन मेजर नहीं आए।
उपन्यास यहीं से नया मोड़ लेता है। अविवाहित निधि मेजर के
बेटे विहान को जन्म देती है और निधि अपनी प्रेम परीक्षा की कसौटी पर खरी उतरती है। वहीं देश प्रेम के लिए भी उसकी भावना ईमानदारी का परिचय देती है। विवाह से पूर्व गर्भवती बहू और बेटी को परिवार के परस्पर सहयोग ने टूटने से बचाया जो उपन्यास की एक और महत्वपूर्ण बात है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए एक और फौजी का स्मरण हो आया। परमवीर चक्र विजेता कर्नल विक्रम बत्रा की मंगेतर डिम्पल चीमा को भी भुलाया नहीं जा सकता जो उनके शहीद हो जाने पर आजीवन विवाह न करने का फैसला करती है। एक परिवार के बेटे का चला जाना बहुत ही दुखदायी घड़ी होती है।वे उसके आने की राह तकते रहते हैं।
उपन्यास नायिका केंद्रित है जहां कहानी स्मृतियों के साथ आरंभ होती है। शुरुआत ही निधि की प्रसव पीड़ा से होती है और वह पीड़ा सुख - दुख के पर्दे के पीछे से प्रेम की झीनी झीनी किरणों का प्रकाश आने वाली सुबह को आनंद से पल भर में भर देता है, पता ही नहीं चलता। माँ नेपाली में कहती है 'निधि होशमा आऊ। - - - भगवान ले हाम्रो प्रार्थना सुन्नु भए को छा। निधि को पता था कि कान्हा इतना निष्ठुर नहीं हो सकता।
100 पृष्ठों का लघु उपन्यास बारह शीर्षकों विहान, मातृत्व, आकर्षण, खूबसूरत, सफर, वापसी, प्रथम परिचय, अनकही, रहस्योद्घाटन, प्रेम बंधन, उन्माद, पीड़ा, विछोह में विभाजित किया गया है जहां संक्षेप में कहानी के सूत्रों को पिरोया गया है। इसे वृहद रूप भी दिया जा सकता है। लेखिका का प्रयास सराहनीय है। ग्रिफिन पब्लिकेशन से प्रकाशित 2021 में प्रथम संस्करण और मूल्य 230 रुपए हैं। शुभकामनाएं।
साहित्यिकी संस्था द्वारा मन्नू भंडारी एक परिचर्चा विषय पर गोष्ठी
साहित्यिकी संस्था द्वारा' मन्नू भंडारी :एक परिचर्चा' विषय पर गोष्ठी - -
प्रेमचंद की तरह ही मन्नू भंडारी की कहानियाँ भी पाठकों में बेहद लोकप्रिय हैं - - अतिथि वक्ता लेखिका सुधा अरोड़ा ने साहित्यिकी संस्था की ओर से आयोजित मन्नू भंडारी एक परिचर्चा गोष्ठी में कही। इस अवसर पर मन्नू भंडारी की कहानी सयानी बुआ का पाठ किया। वक्ता रेणु गौरिसरिया ने मन्नू बहनजी की बतौर शिष्या उनके साथ बिताये कक्षा के व्यक्तिगत अनुभवों को साझा किया। वहीं साहित्यिक यात्रा और उनके व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाए। कार्यक्रम का आरंभ करते हुए संस्था की सचिव डॉ मंजु गुप्ता ने अतिथि वक्ता सुधा अरोड़ा, साहित्यकार वक्ता रेणु गौरिसरिया और पूनम पाठक का स्वागत किया। मन्नू भंडारी पर परिचर्चा का संयोजन और संचालन किया डॉ गीता दूबे ने ।
सातवें दशक की महत्वपूर्ण लेखिका डॉ सुधा अरोड़ा ने मन्नू भंडारी के साथ अपने अंतरंग परिचय को उनकी कहानियों और उपन्यासों से जोड़ते हुए उनकी लोकप्रियता पर चर्चा की। महत्वपूर्ण यह था कि वे दिल्ली में स्थित मन्नू भंडारी के घर से उनकी साड़ी पहन कर और उनकी कुर्सी पर बैठ कर यह अनुभव साझा कर रही थीं जो सभी के लिए एक अद्भुत अनुभव रहा। जूम और फेसबुक पर सभी दर्शकों ने उनके पुरस्कारों, हंस पत्रिका का प्रचलित आवरण फोटो, घर की दिवारें और पुस्तक शेल्फ आदि का कैमरे से अवलोकन करवाया जिसने सभी सदस्याओं को रोमांचित किया। मन्नू भंडारी की पहली कहानी' मैं हार गई', 'स्त्री सुबोधिनी' , 'नई नौकरी' , 'दो कलाकार' , 'खोटे सिक्के' , 'सयानी भुआ' और' महाभोज' और 'आपका बंटी' आदि लेखन पर महत्वपूर्ण चर्चा की। वहीं मन्नू भंडारी की कहानी दो कलाकार पर बनाई फिल्म की चर्चा की जिसकी पटकथा उन्होंने लिखी। जिसका निर्देशन प्रभु जोशी ने किया।इस फिल्म को दूरदर्शन अवार्ड भी मिला। मन्नू भंडारी की कहानियों पर नाटकों का मंचन भी बहुत हुआ है। समाज में कई टूटते घरों को जोड़ने में मन्नू भंडारी की कहानी आपका बंटी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ममता कालिया द्वारा लिया गया मन्नू भंडारी का साक्षात्कार भी पढकर सुनाया जो अपने समय से बहुत आगे की सोच थी। कालजयी लेखिका ने अपने जीवन में कई उतार चढाव का सामना किया। मन्नू भंडारी की आने वाली दो पुस्तकों की चर्चा भी सुधा अरोड़ा ने की। रेणु गौरिसरिया ने कहा कि कक्षा में पढा़ई के साथ मन्नू बहन जी के कारण हमलोगों ने बहुत सी किताबें पढी़। उन्होंने हमें साहित्य से जोड़ा और वे बराबर हमलोगों से संपर्क रखती थीं। हमारी समस्यायों को सुलझाने में भी हमारा साथ देती थीं। पूनम पाठक ने मन्नू भंडारी की सशक्त कहानी सयानी भुआ का वाचन कर बहुत ही सुंदर ढंग से किया। सयानी भुआ कहानी की विवेचना भी की गयी।
पूर्व अध्यक्ष कुसुम जैन, गीता दूबे, रेवा जाजोदिया, वाणी मुरारका ने मन्नू भंडारी की कहानियों पर प्रश्न किए। स्त्री विमर्श पर भी विचार विमर्श किया गया। नुपूर अशोक ने तकनीकी व्यवस्था में सहयोग दिया। संस्था की अध्यक्ष विद्या भंडारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर दुर्गा व्यास,वसुंधरा मिश्र,रचना पांडेय , बबिता मांधडा़,संजना गुप्ता तिवारी, डॉ सुषमा हंस आदि उपस्थित रहीं।
Subscribe to:
Posts (Atom)
