Wednesday, May 4, 2022
माँ के पेट से बंधा रहा - कविता
माँ के पेट से बंधा रहा
ये तो अच्छा हुआ
माँ के पार्थिव शरीर से बंधा था
वह बच्चा
माँ तेरे पेट से बंधा था मैं
नौ महीने भीतर था
क्या फर्क पड़ता है
अब बाहर से बंधा हूँ
मुझे पता ही नहीं चला
कि तुम्हारी देह मर चुकी है
कुछ अजीब सा लगा था
हांँ मुझे तुम्हारे हाथ का अहसास न मिला
आवाज नहीं सुनाई पड़ी
लोरी कहीं दूर से सुनाई पड़ने लगी
माँ तुम आज कुछ अजीब लगने लगी को कु
मेरी जिद भी तुम पूरी नहीं कर रही थी
सारे खिलौने बिखरे पड़े थे
एक भी उठा कर नहीं दे रही थी
तुम माँ आज चुपचाप थी
कोई हलचल नहीं थी
कभी-कभी घर के पास से
भड़ाम भडा़म की आवाज आती
मैं ताली बजा बजा कर माँ को खुश करने में लगा था
पर माँ को कुछ लोग बांधने में लगे थे
मुझे भी माँ से बांधा गया
कसती हुई रस्सियों से मैं जोर जोर से रोने लगा
उस आदमी ने एक थप्पड़ भी मारा
मैं माँ से और चिपक गया
माँ निर्जीव सी लगी
वह आदमी राक्षस था
मुझे कस कर बांधता जा रहा था
मेरे रोने की आवाज बढ़ती गई
उसने विस्फोटक में आग छुआ दी
मेरी आवाज़ बंद हो गई।
बाद में, खबरों में आया
माँ के पार्थिव शरीर से
बच्चे को बांध कर
एक साथ मार डाला गया
अच्छा लगा, मैं बड़ा नहीं हुआ
माँ के आंचल को पकड़े ही रहा
और उसी के साथ रहा
भावनाओं के भ्रम में मृत्यु के नाम से दूर जो था
अच्छा हुआ बड़े लोगों ने खबरों में पढ़ा
@वसुंधरा मिश्र, 04.05.2022
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