Tuesday, May 10, 2022
राम नाम नहीं, जीवन आदर्श है - रिपोर्ट
राम नाम नहीं, जीवन आदर्श हैं : युगानुरूप चयनित राम हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं - - - भारतीय भाषा परिषद में उद्घाटन सत्र में विद्वानों के उद्गार - - - - -
भारतीय भाषा परिषद के जूम एवं फेसबुक तत्वावधान में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार श्री राम के विभिन्न आयाम विषय का आयोजन किया गया। देश- विदेश के प्रख्यात विद्वानों ने इस राम महायज्ञ में भाग लिया और अपने-अपने राम को समझते हुए "कथा साहित्य, जीवन और कर्म में"राम विषयक शोधपरक व्याख्यान दिए।उद्घाटन समारोह के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलपति अटलबिहारी बाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, विशिष्ट अतिथि वक्ताओं में प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय सुप्रसिद्ध लेखिका, कुलपति पश्चिम बंगाल शिक्षक प्रशिक्षण विश्वविद्यालय कोलकाता की उपस्थिति रही।
प्रथम सत्र में कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज ने कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में राम को कलियुग का सहारा बताते हुए अपनी बात रखी। राम आदर्श चरित्र के प्रतीक के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी व्याप्त हैं। एक अच्छे पति, पिता, राजा और संतान को प्रेम करने वाले राम ने लोकाचार को रखने के लिए संयम, धैर्य, मर्यादा और संस्कार आदि उच्च आदर्शों द्वारा सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया। आज नव उदारवादी युग में मिथकों में बदल गए हैं, आज आत्मकेन्द्रित जीवन में राम की कौन सी आकृति है? राम ने आदर्श लक्ष्मण रेखा खिंचने का कार्य किया है। आज राम का स्वरूप नहीं राम का चरित्र हमारे समाज के लिए महत्वपूर्ण है। परंपरा और प्रसंग बोध की पहचान के साथ साथ लोकतांत्रिक युग में प्रगतिशील, त्याग और प्रेम के रूप में राम की महत्ता है।
स्वागत भाषण और विषय प्रवर्तन करते हुए भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष और कथाकार डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा कि बचपन से ही हमने" जानकी नाथ सहाय करें" और "पायो जी मैंने रामरतन धन पायो" सुनते-सुनते बड़े हुए हैं। राम हमारे हृदयाकाश में अनुभूति के रूप में स्थित हैं। श्रुतियों, भोजपत्र की यात्रा करते हुए राम शब्दातीत, लोकातीत और सत्पथ दिखाने वाले हैं। राम जीवन के आदर्श हैं। प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने विभिन्न भाषाओं में राम कथाओं की चर्चा करते हुए वाल्मीकि की रामायण से लेकर संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, जैन, बौद्ध आदि राम कथा के विषय में जानकारी दी। जावा, वर्मा, म्यांमार, थाईलैंड आदि की राम नृत्य और राम नाटकों की चर्चा की जो विदेशों में उनकी राम संस्कृति को दर्शाता है। तिब्बती और सिंहल भाषा में राम नाम की महिमा का वर्णन किया।भारत में ही लगभग चार सौ रामायण हैं। बंगाल में सूर्य कांत त्रिपाठी निराला की "राम की शक्ति पूजा "और रवींद्र नाथ टैगोर के राम प्रेम के विषय में बताया। भारत में आदिकाल से राम हर धर्म हर भाषा में किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। रवीन्द्र नाथ के कई प्रबंध काव्यों में वाल्मीकि प्रतिभा का जिक्र किया जिसमें रवींद्र नाथ टैगोर ने रामायण की उपेक्षिता उर्मिला के चरित्र को उजागर किया वहीं सोनार तरी संग्रह में पुरस्कार में सीता वनवास पर लिखा। सन् 1893 में रवीन्द्रनाथ ने वाल्मीकि की प्रतिभा में अभिनय भी किया। डॉ. बंद्योपाध्याय ने राम और लक्ष्मण की कथा को बचपन से ही भारतीयों के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना। इस सत्र के समन्वयक डॉ संदीप अवस्थी ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया और भारतीय भाषा परिषद से प्रकाशित वागर्थ पत्रिका जो यूजीसी की टॉप लिस्ट में है, शोधार्थियों और लेखकों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जो ई पत्रिका में प्राप्त है।
द्वितीय सत्र का विषय रहा "श्री राम - त्रेता से नव उदारवादी युग तक - भारत और विदेशों में" विशिष्ट वक्ताओं में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षाविद, आलोचक प्रोफेसर डॉ. अवधेश प्रधान ने राम पर चर्चा करते हुए कहा कि राम को युगानुरूप चयन किया जाता रहा है। तुलसी ने शंभूक और सीता निर्वासन जैसे प्रसंगों को रामचरितमानस में नहीं रखा क्योंकि राम का उदात्त चरित्र इन प्रसंगों से मेल नहीं खाता है। तुलसी के राम आदर्श रूप की मिसाल हैं। नव उदारवादी युग पूंजीवाद का युग है जहां हर वस्तु में मूल्य की प्रधानता है चाहे पति-पत्नी के रिश्ते हों या फिर लोकतंत्र या सत्ता और राजनीति ही क्यों न हो। तुलसी के राम अच्छे पुत्र, केवट को गले लगाने वाले और जटायु का श्राद्ध अपने पिता की तरह करते हैं। नव उदारवादी युग में सत्ता सत्य से बड़ी हो जाती है।
इस सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक,वागर्थ के संपादक, आलोचक और डॉ. शंभूनाथ ने राम को आर्य और अनार्य संस्कृति से जोड़ते हुए भारतीय उच्चतम मूल्यों और आदर्शों के धर्म रथों के बदलते रूपों की विस्तार से चर्चा की। रावण रथी और विरथ रघुवीर की व्याख्या की। लगभग तीन सौ से अधिक रामायण लिखी गई। बारहवीं सदी के कंब रामायण में रावण राम की जीत के लिए पुरोहित का कार्य भी करते हैं। औपनिवेशिक व्यवस्था के कारण धर्म में वायरस का प्रवेश हुआ क्योंकि धर्म में खिड़कियां और दरवाजे नहीं होते।
इस सत्र में इंडोनेशिया बाली के सुग्रीव हिन्दुआ विश्वविद्यालय से पधारे डॉ धर्मयासा ने कई स्लाइड्स के द्वारा इंडोनेशिया में राम के अष्टरथ और धर्म के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। बाली में अष्ट धर्म से संबंधित धर्म की कथा बताते हुए राम के आदर्शों को विस्तार से बताया। इंडोनेशिया में 3600 टन के अष्टरथ की तस्वीर दिखाई जो उनके राष्ट्रीय सांस्कृतिक गौरव है।
प्रथम दिन के द्वितीय सत्र का सफल संयोजन और संचालन प्रयागराज की डॉ ऋतु माथुर ने किया। राम के प्रति जिसकी भावना जैसी है वैसी ही मूर्ति व्यक्ति के मन में विराजमान हो जाती है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तीन तैसी, राम सबके हैं। राम अनुभूति हैं और मर्यादा की रेखा हैं।
द्वितीय दिवस के वेबिनार का विषय" वाल्मीकि : तुलसी से निराला और अन्य साहित्य में श्री राम की दृष्टि और अर्थ" रहा। इस सत्र के अध्यक्ष प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित सुप्रसिद्ध आलोचक पूर्व अध्यक्ष हिंदी अकादमी, उत्तर प्रदेश ने अपने वक्तव्य में भारतीय वांग्मय के राम की अवधारणा का पूर्ण अवलोकन करवाया। वेदों से लेकर अब तक राम हमारे समाज की धरोहर रहे हैं।रामचरितमानस में आए विभिन्न शब्दों अहिल्या आदि की व्याख्या की। विशिष्ट वक्ताओं में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री शुक्ल ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषा परिषद ने इस विशाल अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकादमिक क्षेत्र को प्रथम बार सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। राम सांस्कृतिक पहचान के परिचायक हैं। नीदरलैंड से पधारीं ग्लोबल लेखिका आचार्य कुल की अध्यक्ष डॉ पुषपिता अवस्थी ने संपूर्ण विश्व की भौगोलिक सीमाओं के साथ 3000 वर्षों से राम से संबंधित पात्रों को किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ बताया जो भाषा और संस्कृति के अंग रहे हैं। प्रो. सुधांशु शुक्ल ने राम के आविर्भाव का कारण धर्म की स्थापना है और अधर्म का नाश है।
वैश्विक कवियों ने राम के गीतों के साथ अहिंसा प्रेम करुणा, कुरीतियों प्रहार आदि विषयों पर कविताएं सुनाई। अलीगढ़ से गीतकार गजलकार अशोक अंजुम इंग्लैंड से जय वर्मा कैलिफोर्निया से नीलू गुप्ता मुबंई से अभिनेत्री और मंचीय कवयित्री गीतिका वेदिका, ऋतु प्रिया खरे आदि विशिष्ट कवियों ने अंश ग्रहण किया। इसकी अध्यक्षता रायपुर छत्तीसगढ़ के गिरीश पंकज ने की।
राम से संबंधित पांच शोधपत्र भी पढ़ें गए जिनमें अनिता कुमारी ठाकुर, मनीष जैन, डॉ ऋतु माथुर आदि शोधकर्ता रहे। पीयूष जी का संचालन रहा। राम मंदिर के शिलान्यास के पश्चात अकादमी क्षेत्र के विशिष्ट विद्वानों से राम विषयक विभिन्न दृष्टिकोणों से राम को समझना आज की युवा पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों दिनों तक 1400 लोगों द्वारा पंजीकरण और 23 देशों द्वारा एक मंच को अॉन-लाइन फेसबुक और जूम पर देखना और सुनना डिजिटल युग का महनीय कार्य है जिसके लिए भारतीय भाषा परिषद के मंत्री डॉ केयुर मजमुदार जी साधुवाद के पात्र हैं। श्रीमती विमला पोद्दार जी ने इसे कार्यक्रम में देश और विदेशों इंडोनेशिया लंदन कैलिफोर्निया पोलैंड नीदरलैंड आदि देशों के राम विशेषज्ञों को धन्यवाद दिया और डॉ संदीप अवस्थी जिन्होनें समन्वयक की भूमिका का निर्वाह किया। डॉ कुसुम खेमानी, डॉ शंभूनाथ, डॉ केयुर मजमुदार जी को विशेष धन्यवाद दिया और आभार व्यक्त किया।
भारतीय भाषा परिषद कोलकाता की एडमिन डॉ वसुंधरा मिश्र ने दो दिवसीय वेबिनार की पूरी जानकारी दी।
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