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Tuesday, May 10, 2022

भारतीय भाषा परिषद का परिचय

पश्चिम बंगाल कोलकाता की प्रमुख संस्था भारतीय भाषा परिषद भारत एवं भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली कंपनी एक महत्वपूर्ण संस्था है, जहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले जन-समुदाय की भाषाओं, चिन्तन और चेतना का संगम है। भारतीय भाषा परिषद कोलकाता की गरिमामयी साहित्य, संस्कृति एवं चेतना को न केवल भारत में ही अपितु भारत के बाहर भी अपनी साहित्यिक गतिविधियों को संचारित एवं परस्पर आदान-प्रदान करने के लिए हृदयस्थली की भाँति कार्य करती है। राजभाषा हिन्दी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं से अनुवाद के माध्यम से इसकी अपनी विशेष भूमिका रही है। यही कारण है कि हिन्दी भाषा के माध्यम से ही भारत की गरिमामयी साहित्य संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता भारत के बाहर भी प्रसारित एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अभिव्यक्त करती है। हिन्दी भाषा और साहित्य के समक्ष आज बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिनमें सूचना-विज्ञान, प्रौद्योगिकी के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को बनाये रखते हुए साहित्य का सृजन करना प्रमुख है। भारतीय भाषा परिषद के फेसबुक और वागर्थ वेब पर विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विकास से संबंधित कविताएं, निबंध, आलेख, लाइव वेबिनार और विभिन्न हिंदी विधाओं को स्थान दिया जाता है। हिन्दी की अनेक बहुमुखी प्रतिभाओं को पुरस्कृत किया जाता है। इसलिए हिन्दी के साहित्य विकास, शब्द सामर्थ्य तथा अभिव्यक्ति की क्षमता भी बनाये रखने का गौरव एवं गुरुतर दायित्व के प्रति भी भारतीय भाषा परिषद संकल्पबद्ध है। किसी भी संस्था की नींव या उसकी मजबूती कर्णधार होते हैं। आज भागीरथ कानोडिया और सीताराम सेकसरिया का जन्मदिन है और उसी को हम संस्था का संस्थापक दिवस के रूप में मनाते हैं। भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में भारतीय भाषाओं की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करने के उद्देश्य से 1975 में स्थापित हुई थी। यह अपने भवन 36ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता 700017 में 1979 में स्थानांतरित हुई। इसके संस्थापकों में प्रमुख थे सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया। इस गैर-सरकारी संस्थान ने अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय अखंडता, बहुलतावादी संस्कृति और सभी भाषाओं के साहित्य की सृजनशीलता को प्रोत्साहित करना अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है। आज भारतीय भाषा परिषद देश की एक अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के रूप में जानी जाती है। यह भारत की एक अनोखी संस्था है, जो आत्मनिर्भर है और विभिन्न दिशाओं में सक्रिय रहते हुए हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के लिए लगातार सक्रिय है। निजी क्षेत्र से साहित्यिक कार्यों के लिए ऐसी व्यवस्था और साल भर नियमित गतिविधियाँ फिलहाल अन्यत्र कहीं नहीं है। परिषद के संस्थापकों ने अपनी दूरदर्शिता से इस संस्था को स्वावलंबी बनाया है। समृद्ध पुस्तकालय भारतीय भाषा परिषद का लगभग 20,000 पुस्तकों से संपन्न भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय है, जो कार्यदिवस पर सवेरे 11 बजे से संध्या 6 बजे तक खुला रहता है। पुस्तकालय की सभी पुस्तकें कंप्यूटर पर आगणित हैं और सदस्य मुक्त रूप से पुस्तक चयन कर सकते हैं। ग्रंथालय के पाठकों को पुस्तकों के अलावा महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ने के लिए सुलभ हैं। यहाँ हंस, कथादेश, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, परिकथा, आलोचना, अंतिम जन, गांधी मार्ग, आउटलुक, इंडिया टुडे, फ्रंटलाइन आदि पत्रिकाओं के अलावा कोलकाता से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र उपलब्ध रहते हैं। भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय में विशिष्ट साहित्यिक कृतियों के अलावा कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के उपयोग के लिए बड़ी संख्या में पुस्तकें हैं। इसमें बांग्ला और अंग्रेजी के अलावा कई अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। ग्रंथालय में एम.पी. बिड़ला फाउंडेशन ग्रंथालय के दुर्लभ ग्रंथों को भी पाठकों के लिए सुलभ बनाया गया है। यहाँ कई इनसाइक्लोपीडिया उपलब्ध हैं और शोध के लिए प्रचुर सामग्री है। कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी नियमित रूप से इस ग्रंथालय का उपयोग करते हैं और लाभान्वित होते हैं। हमारा निरंतर प्रयत्न है कि पुस्तकालय और वाचनालय अध्ययन, अनुसंधान और सहचिंतन का एक प्रमुख केंद्र बने। विशेष जानकारी : 7003318483 पुस्तक केंद्र भारतीय भाषा परिषद 2007 से पुस्तक केंद्र का संचालन कर रही है। जहाँ आम पाठकों को चुनी हुई पुस्तकें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होती हैं। पुस्तक केंद्र में हिंदी और हिंदी में अनूदित श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ विक्रय के लिए रखी जाती हैं। इसके अलावा यहाँ प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खरीदने के लिए उपलब्ध हैं। फिलहाल मरम्मत कार्य के कारण पुस्तक केंद्र बंद है। प्रमुख प्रकाशन भारतीय भाषा परिषद सभी हिंदीतर भारतीय भाषाओं की प्रमुख रचनाओं का चयन हिंदी में प्रकाशित कर सांस्कृतिक सेतुबंधन का कार्य करती है। इसके कुछ प्रमुख प्रकाशन हैं- 1. संस्कृत वाङमय कोष (4 भाग) : श्रीधर भास्कर वर्णेकर (सं.) 2. भारतीय उपन्यास कथासार (2 भाग) : प्रभाकर माचवे (सं.) 3. गीत-गोविंद (जयदेव) : कपिला वात्स्यायन (सं.) 4. श्रेष्ठ ललित निबंध (2 भाग) : कृष्ण बिहारी मिश्र, बालशौरि रेड्डी (सं.) 5. श्रेष्ठ बाल कहानियाँ : बालशौरि रेड्डी (सं.) 6. विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ (2 भाग) : प्रभाकर श्रोत्रिय 7. श्रेष्ठ भारतीय एकांकी (2 भाग) : प्रभाकर श्रोत्रिय 8. भारतीय श्रेष्ठ कहानियाँ (2 भाग) : सन्हैयालाल ओझा (सं.) 9. नेपाली साहित्य : कमला सांकृत्यायन 10. वचनोद्यान : सिद्धय्य पुराणिक 11. राजा की भेरी (मलयालम) : शाण्डिल्यन 12. हिंदी गद्य मधुसंचय : परमानंद श्रीवास्तव (सं.) 13. भक्ति तत्व दर्शन-साहित्य-कला : कल्याणमय लोढ़ा, जयकिशनदास सादानी (सं) 14. विश्वंभरा : सी. नारायण रेड्डी (सं) 15. नवलेखन के रंग : एकांत श्रीवास्तव- कुसुम खेमानी (सं.) 16. जवाहर भाई : राय कृष्णदास 17. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश (7 खंड-2660 प्रविष्टियां-4,550 पृष्ठ) हिंदी की सांस्कृतिक गरिमा का उद्घोष हिंदी साहित्य ज्ञानकोश 7 खंड - 2660 प्रविष्टियाँ – 4,650 पृष्ठ प्रधान संपादक : शंभुनाथ संयोजक : कुसुम खेमानी संपादक मंडल : राधाबल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह, अवधेश प्रसाद सिंह भाषा संपादक : राजकिशोर प्रमुख वितरक : वाणी प्रकाशन मो. 96433 3 1304 हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका भारतीय भाषा परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिकाओं में एक है। इसका प्रकाशन 1995 से नियमित रूप से हो रहा है। माई 2021 तक इसके 306 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। यह पत्रिका विभिन्न साहित्यिक विधाओं की उत्कृष्ट रचनाएं प्रकाशित करती हैं। यह हिंदी के वरिष्ठ लेखकों के अलावा नई पीढ़ी के लेखकों की भी अपनी पत्रिका है। वागर्थ पत्रिका देश के विभिन्न शहरों में 60 से अधिक बुक स्टालों पर जाती है। इसके वार्षिक ग्राहकों की संख्या करीब 1 हजार है। विशेष जानकारी : 7449503734 ईमेल : vagarth.hindi@gmail.com साहित्यिक सेमिनार, व्याख्यान, कला-प्रदर्शन भारतीय भाषा परिषद देश की अग्रणी संस्थाओं- साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय फाउण्डेशन, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं दूर संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, केंद्रीय हिंदी निदेशालय आदि के सहयोग से राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करती है। यह स्वतंत्र रूप से भी वर्ष भर राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ, व्याख्यान, कविता पाठ और संवाद के कार्यक्रम आयोजित करती रहती है। प्रसिद्ध संगीतज्ञों और नृत्यांगनाओं के भी सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में स्थित एक प्रमुख हिन्दीसेवी संस्था है। भारतीय भाषाओं की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करने के उद्देश्य से 1975 में इसकी स्थापना की गयी थी। कोलकाता में स्थित यह संस्था अनेक प्रकार के साहित्यिक पुरस्कार देती है। इनकी साहित्यिक पत्रिका वागर्थ मासिक है। 1979 में यह अपने भवन 36ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता 700017 में स्थानांतरित हुई। इसके संस्थापकों में प्रमुख थे सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया। इस गैर-सरकारी संस्थान ने अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय अखंडता, बहुलतावादी संस्कृति और सभी भाषाओं के साहित्य की सृजनशीलता को प्रोत्साहित करना अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है। आज भारतीय भाषा परिषद देश की एक अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के रूप में जानी जाती है। यह भारत की एक अनोखी संस्था है, जो आत्मनिर्भर है और विभिन्न दिशाओं में सक्रिय रहते हुए हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के लिए लगातार सक्रिय है। निजी क्षेत्र से साहित्यिक कार्यों के लिए ऐसी व्यवस्था और साल भर नियमित गतिविधियाँ फिलहाल अन्यत्र कहीं नहीं है। परिषद के संस्थापकों ने अपनी दूरदर्शिता से इस संस्था को स्वावलम्बी बनाया है। सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत भागीरथ कानोडिया ने १९७४ में अपनी पचहत्तर-अस्सी वर्ष की वृद्धावस्था में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान, सम्पर्क, सहयोग और अनुवाद बढ़ाने के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की थी। दोनों मित्रों की दृष्टि यह थी कि हिन्दी का ढोल पीटने के बजाए भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध कर ही अंग्रेजी के सर्वभक्षी अभियान को रोका जा सकता है। परिषद के उद्देश्यों की सत्रह सूत्री सूची का प्रथम उद्देश्य ही – 'विभिन्न भारतीय भाषाओं को निकट लाने और उनमें पारस्परिक सम्मान पैदा करने की दृष्टि से विचारों में समन्वय और आदान–प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय मंच की स्थापना करना' था। यह कहने की जरूरत नहीं कि दोनों ही मित्र स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भुक्तभोगी। वाह्य संपर्क अशोक सेकसरिया ने कुछ दिनों पहले भारतीय भाषा परिषद में अंग्रेज़ी के प्रति बढ़ते मोह की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी। वे इस संस्था के संस्थापक दिवंगत सीताराम सेकसरिया के पुत्र हैं। भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए जिन संस्थाओं को गठित किया गया हो , वे अगर अपने उद्देश्य से ठीक विपरीत काम करने लगें तो कम से कम उसका प्रतिवाद करना प्रत्येक भारतीय भाषा प्रेमी का कर्तव्य है । एक समय की ऐसी प्रसिद्ध और प्रतिबद्ध दो संस्थाओं नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी तथा बंगीय साहित्य परिषद , कोलकाता- की दुर्गति के लिए शायद हमारा मौन ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है । इस पत्र के माध्यम से मैं भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता द्वारा अपने संस्थापक दिवस पर आयोजित अंग्रेजी व्याख्यान और अंग्रेजी में ही भेजे गए निमंत्रण पत्र के विरुद्ध अपना प्रतिवाद दर्ज कराना चाहता हूं । मेरे दिवंगत पिता सीताराम सेकसरिया और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत भागीरथ कानोडिया ने १९७४ में अपनी पचहत्तर -अस्सी वर्ष की वृद्धावस्था में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान , सम्पर्क ,सहयोग और अनुवाद बढ़ाने के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की थी । दोनों मित्रों की दृष्टि यह थी कि हिन्दी का ढोल पीटने के बजाए भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध कर ही अंग्रेजी के सर्वभक्षी अभियान को रोका जा सकता है । परिषद के उद्देश्यों की सत्रह सूत्री सूची का प्रथम उद्देश्य ही – ‘ विभिन्न भारतीय भाषाओं… को निकट लाने और उनमें पारस्परिक सम्मान पैदा करने की दृष्टि से विचारों में समन्वय और आदान – प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय मंच की स्थापना करना’ था । यह कहने की जरूरत नहीं कि दोनों ही मित्र स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भुक्तभोगी । अब भारतीय भाषा परिषद इस उद्देश्य से ठीक विपरीत काम कर रही है । २००४ में एक अंग्रेजी इंटरनेशनल स्कूल खोलकर परिषद को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की सुनियोजित कोशिश की गई थी , जो हिंदी के प्रायः सभी प्रतिष्ठित लेखकों के प्रखर विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई। सात वर्ष के अंतराल के बाद यह कोशिश फिर से शुरु की गई है । अपने कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह लायक वेतन देने में अपने को अक्षम बताने वाली परिषद अंग्रेजी में मंहगे व्याख्यान आयोजित करने के साथ लाखों या करोड़ रुपये के किसी प्रोजेक्ट (परियोजना) के तहत भारतीय भाषा का कोई विश्वकोश या कोश अंग्रेजी में तैयार करने में लगी है । आज बहुत सारे व्यावसायिक प्रकाशन विशुद्ध मुनाफा कमाने के लिए भारतीय भाषाओं ही नहीं , भारतीय व्यंजनों और पाककला तक के विश्वकोश अंग्रेजी में प्रकाशित कर रहे हैं । भारतीय भाषा परिषद के उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से कहा गया है ,’संस्था के पूर्ण रूप से उन्नायक होने के कारण उसकी कोइ भी प्रव्रुत्ति जिसमें मुद्रण और प्रकाशन भी सम्मिलित है,किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ या प्राप्ति के लिए संचालित नहीं की जाएगी ।’अब भारतीय भाषा परिषद इस उद्देश्य से ठीक विपरीत काम कर रही है । २००४ में एक अंग्रेजी इंटरनेशनल स्कूल खोलकर परिषद को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की सुनियोजित कोशिश की गई थी , जो हिंदी के प्रायः सभी प्रतिष्ठित लेखकों के प्रखर विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई। सात वर्ष के अंतराल के बाद यह कोशिश फिर से शुरु की गई है । अपने कर्मचारियों को जीवन-निर्वाह लायक वेतन देने में अपने को अक्षम बताने वाली परिषद अंग्रेजी में मंहगे व्याख्यान आयोजित करने के साथ लाखों या करोड़ रुपये के किसी प्रोजेक्ट (परियोजना) के तहत भारतीय भाषा का कोई विश्वकोश या कोश अंग्रेजी में तैयार करने में लगी है । आज बहुत सारे व्यावसायिक प्रकाशन विशुद्ध मुनाफा कमाने के लिए भारतीय भाषाओं ही नहीं , भारतीय व्यंजनों और पाककला तक के विश्वकोश अंग्रेजी में प्रकाशित कर रहे हैं । भारतीय भाषा परिषद के उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से कहा गया है ,’संस्था के पूर्ण रूप से उन्नायक होने के कारण उसकी कोइ भी प्रव्रुत्ति जिसमें मुद्रण और प्रकाशन भी सम्मिलित है,किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ या प्राप्ति के लिए संचालित नहीं की जाएगी ।’ हाल ही में भारतीय भाषा परिषद ने अपने मासिक वागर्थ के दो नवलेखन अंकों को मिलाकर बिना किसी संपादन और भूमिका के एक किताब बनाकर राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन उसकी चार सौ पचास प्रतियां बेची हैं । यह किताब बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं , परिषद की पुस्तक की दुकान ‘पुस्तक केन्द्र’ तक में नहीं । जिन लोगों की रचनाएं संकलित हैं , उन्हें पुस्तक भेजना तो दूर , यह भी सूचित नहीं किया गया है कि उनकी रचनाओं का क्या हश्र हुआ है । सूचना के अधिकार के तहत राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउन्डेशन और सरकारी संस्थाओं द्वारा पुस्तकों की खरीद की प्रक्रियाओं – उनके चयन और चयनकर्ताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना और चुप्पाचोरी धांधली को रोकना बहुत जरूरी है । परिषद के मंत्रियों को परिषद के कार्यकलाप के बारे में मैं पत्र लिख चुका हूं , पर व्यर्थ । यही नहीं मुझे आगे पत्राचार न करने के लिए कहा गया है । मेरी अपनी कोई निजी पहचान नहीं है । जो है अपने दिवंगत पिता के पुत्र के रूप में ही है । इस पहचान के नाते मेरे लिए यह पत्र लिखना अत्यंत कष्टप्रद और मार्मिक है । सीताराम सेकसरिया को समाज सेवा के क्षेत्र में सन १९६२ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये असम राज्य से थे। सीताराम सेकसरिया एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता , गांधीवादी , समाजवादी और पश्चिम बंगाल के संस्था बिल्डर थे , जो मारवाड़ी समुदाय के उत्थान के लिए उनके योगदान के लिए जाने जाते थे । वह एक उच्च विद्यालय संस्थान, मारवाड़ी बालिकिका विद्यालय, समाज सुधार समिति , एक सामाजिक संगठन और भारतीय भाषा परिषद , उच्च शिक्षा संस्थान, श्री शिक्षाशाटन सहित कई संस्थानों और संगठनों के संस्थापक थे। एक गैर सरकारी संगठन भारत सरकार ने समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें 1962 में पद्म भूषण का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। उनके जीवन की कहानी एक किताब,पद्म भूषण सीताराम सेकसरिया अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित की गई है , जिसे भावरमल सिंह द्वारा संपादित किया गया है और 1974 में प्रकाशित किया गया था। वह 19 मई,1982 को अपने घर में मृत पाया गया था, 0 Born in Mukundgarh, Rajasthan, India on 25 Jan 1895 to रामदत्तजी कानोड़िया and Anni devi Poddar. Bhagirath Kanoria married Bhagwani Devi Kejriwal and had 6 children. He passed away on 29 Oct 1979 in Kolkata, West Bengal, India.

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