Powered By Blogger

Saturday, May 14, 2022

सांप सीढ़ी - कविता

सांप- सीढ़ी बहुत याद आती है बचपने की खेलते-खेलते नींद आ जाना खाते-खाते सो जाना डांट-फटकार खा खर्राटे भरना चाबी के खिलौनों को पाने के लिए बड़ी बड़ी आंखें फाड़कर देखना लकड़ी के घोड़े पर बैठना गुल्ली डंडा और साईकिल चलाना आईस पाईस में मारपीट और बिना बात हंसाना लूडो और कैरम बस जीतने के लिए ही खेलना पतंग उड़ाने के लिए जिद करना कुत्ता पालने के लिए जोर देना अक्कड़ बक्कड़ खेलते रहना किसी चीज के लिए मना करने पर मुंह फुलाना फिर मुंह बिचकाना माँ समझाते समझाते मारती रहती संस्कारों को दिमाग में ठूंसती रहती लिखने -पढ़ने में लगाए रखती ऐसे मत करो वैसे मत करो और बचपन दूर भागता गया हमारी गिनती समझदारों में होने लगी बहुत अच्छी है का ठप्पा लगने लगा कुछ गलत कर ही नहीं सकते करे तो मरे चोरी की आदत से लाचार हुए छिप कर खाने का स्वाद लेने लगे सामने अच्छे भले लगने लगे बच निकलने वाली गली में रहने लगे सब अपने-अपने रास्ते छिपाने लगे संवाद की भाषा बदलने लगी बड़े-बड़े सपनों के जाल बुनने लगे बड़ी बड़ी नौकरी के सपने देखने लगे दुनिया से अंजान माँ के आंचल से दूर बहुत ऊपर पहुंच गए बीच-बीच में फिसल कर जमीन भी छू लेते फिर ऊपर उठ जाते पासा खेल खिलाता रहता जब हकीकत से हुआ सामना तब सचमुच बडप्पन का अहसास हुआ फिर हमने अपने बच्चों को समझाया और फिर वही चक्कर लगवा दिया जिससे हम निकल कर आए थे। हमें तब तक सभी रास्तों का पता हो चला था जीरो से सौ पर आए थे। @ वसुंधरा मिश्र, 5.6.21

No comments:

Post a Comment