Tuesday, May 10, 2022
परशुराम और परशुराम प्रतीक्षा
परशुरामजी और परशुराम की प्रतीक्षा - - - डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, समय की मांग भी है। समय की आवाज को न सुनना अर्थात बहरा होने की गवाही तो है ही, कायरता एवं नपुंसकता को भी स्वीकारना है।आइए! परशुरामजी के परिचय के साथ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रसिद्ध कविता' परशुराम की प्रतीक्षा' के विषय में भी जाने। पौराणिक मान्यताओं में परशुरामजी - -
परशुराम जयंती---अक्षय तृतीया के दिन मनाया जाता है
ब्राह्मण लोग ही इन्हें अपना आदर्श मानते हैं और पूजा करते हैं।
भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था। वे भगवान विष्णु के छठे अवतार है।
परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विद्या लेने का प्रयास किया। परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।
एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा। किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा। अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वह बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी।
महाभारत काल में एक कथा के अनुसार भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।
एक और कथा आती है कि परशुराम त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
और उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।
ब्रह्मवैवर्त पुराण वेदमार्ग का दसवाँ पुराण माना गया है। अठारह पुराणों में प्राचीनतम पुराण ब्रह्मवैवर्त पुराण को माना गया है। इस पुराण में जीव की उत्पत्ति के कारण और ब्रह्माजी द्वारा समस्त भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले जीवों के जन्म और उनके पालन पोषण का सविस्तार वर्णन किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्री राम की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला और श्री जानकी जी की साकेत-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासनाका सुन्दर निरूपण किया गया है। अनेक भक्तिपरक आख्यानों एवं स्तोत्रों का भी इसमें अद्भुत संग्रह है।
माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है। इसी समाज में एक राजा हुआ था सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इसके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।
ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।
तब सहस्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं।
इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"।उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया।
उन्हें भगवान विष्णु का आवेशावतार माना जाता है। महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए।
भगवान परशुराम मृत्यु से मुक्त हैं। वह उन 7 चिरंजीवी में से हैं, जिन्हें हमेशा के लिए अमर माना जाता है। परशुराम उस युग के सबसे क्रोधी ब्राह्मण या साधु माने जाते थे।
बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम।
पहले उन्होंने अपने पिता ऋषि जमदाग्नि से शिक्षा प्राप्त की । उसके बाद शस्त्र विद्या देवों के देव महादेव से प्राप्त किया। वास्तविक गुरु भगवान महादेव थे। महादेव के शिष्य होकर विश्व से बुराई का अंत करने के लिए युद्ध करते रहे और सदैव ही आगे बढ़ते रहे। शिव ने दक्षिणा स्वरूप शेषनाग मांगने पर पता चलने पर राम के भाई लक्ष्मण जो शेषनाग के रूप में धरती पर जन्म लिया उन्होंने कई बार लक्ष्मण के सिर को काटने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।
आखिरकार उन्हें पता चला कि राम ही भगवान विष्णु है। महादेव ने परशुराम के गुस्से को शांत करने के उद्देश्य से दक्षिणा मांगी थी।
'परशुराम की प्रतीक्षा' की प्रासंगिकता - - -
'परशुराम की प्रतीक्षा' 'रामधारी सिंह दिनकर जी की बहुत प्रसिद्ध रचना है। आज के संदर्भ में इस रचना का विशेष महत्व है जिस पर हमें विचार करना चाहिए। हमें इस रचना के आतंरिक पहलुओं पर बार बार चर्चा करनी चाहिए।
कवि कहता है कि हमें अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए सतत जागरुक रहना चाहिए। युद्धभूमि में शत्रु का विनाश करने के लिए हिंसा अनुचित नहीं है।
दिनकर ने जिस समय लिखना शुरू किया उस समय हमारे देश में ब्रिटिश की गुलामी बड़ियों को तोड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वाधीनता संग्राम का संघर्ष जोरों पर था।
इससे संपूर्ण देश का मानस आंदोलित हो चुका था। आंदोलन की वापसी गांधी इरविन समझौता , मेरठ षड्यंत्र और भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी, कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना और शिक्षित लोगों के बीच समन्वय वादी विचारधारा खूब उमड़ रही थी। इसी समय किसान सभा की स्थापना और उसके समानांतर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भी हो चुकी थी ।अंतरराष्ट्रीय स्तर परबोल्शेविक क्रांति की घटना के साथ-साथ समाजवादी सोवियत संघ नई आशावादी किरण लेकर आया था।
स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर के कवि जो धीरे-धीरे काफी उग्र हो चुके थे । इसलिए उन में पहले के राष्ट्रीय तत्ववादी कवियों की तुलना में एक बलिदानी का भाव है, यही भाव दिनकर में आकर बहुत बढ़ जाता है।
सन 1962 के चीनी आक्रमण के परिणाम स्वरूप भारत को मिली पराजय से क्रुद्ध होकर कवि के मन में जो तिलमिलाहट पैदा हुई उसकी उद्बोधन आत्मक अभिव्यंजना ही परशुराम की प्रतीक्षा है।
जीवन का प्रत्येक परिस्थितियों में क्रांति का राग अलापने वाला कवि दिनकर इस रचना में परशुराम की प्रतीक्षा करता है।
एक समय था जब कवि को लगता था कि अर्जुन एवं भीम जैसे वीरों की आवश्यकता थी। किंतु आज उसे लगता है कि देश पर जो संकटकाल मंडरा रहा है उसके घने बादलों में छिपे सूर्य को परशुराम का कुठार ही बाहर ला सकता है।
इसलिए कवि ने प्रस्तुत कविता में परशुराम धर्म अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। कवि की सोच उसके विश्वास का साथ देती हुई यही निष्कर्ष निकालती है।
वे पीयें शीत तुम आतम घाम पियो रे ।
वे जपें नाम तुम बनकर राम जीओ रे।
चीन की इस धोखाधड़ी से भारत तिलमिला उठा। देश में जागृति की लहर दौड़ गई जनसामान्य के मन में आक्रोश उबरा और साहित्यकारों के मन - मस्तिष्क में एक प्रतिक्रिया ने जन्म लिया।
कितने ही कवियों की लेखनी ने राष्ट्रीय कविताएं लिखीं। दिनकर जी द्वारा लिखित काव्य परशुराम की प्रतीक्षा अभी उपर्युक्त पराजय की प्रतिक्रिया का ही परिणाम था।
नेफा युद्ध के प्रसंग में भगवान परशुराम का नाम अत्यंत प्रासंगिक है जब परशुराम पर मात्र हत्या का पाप चढ़ाते हुए उस से मुक्ति पाने के लिए सभी तीर्थों में घूमते फिरते परंतु कहीं भी उनके ताप का भाव दूर नहीं हुआ। ब्रह्मा कुंड में डुबकी लगाते ही फरसा उनके हाथ से छूट गया अर्थात उनका मन पाप मुक्त हो गया।
नेफा क्षेत्र उसी ब्रह्मा कुंड से निकलती धारा का स्थल है जहां ब्रह्मपुत्र नदी बहती है, वही परशुराम कुंड है जो हिंदुओं का तीर्थ स्थान है, ब्रह्मपुत्र का नाम रोहित भी है।
कवि कहता है कि भारत ने अब अहिंसा के भाव को तिलांजलि देकर पुनः शस्त्र बल का आश्रय लिया है।
तांडवी तेज फिर से पुकार उठा है ।
लोहित में था जो गिरा कुठार उठा है।।
प्रस्तुत कविता की पौराणिक पृष्ठभूमि ही परशुराम धर्म की अनियमिता है। कवि द्वारा परशुराम धर्म की प्रतिष्ठा का उद्देश्य यही है कि चीन द्वारा आक्रांत एवं पद आक्रांत भी है यही इस कविता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
प्रस्तुत रचना में कवि ने शस्त्र प्रयोग को अस्वीकार्य मांगने तथा शारीरिक बल प्रयोग न करने की शिक्षा देने वाला तथाकथित महापुरुषों पर व्यंग्य किया है।
गीता में जो त्रिपिटक निकाय पढ़ते हैं
तलवार गला कर जो तकली गढ़ती है ।
शीतल करते हैं जो अतल प्रबुद्ध प्रजा का
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।।
परशुराम धर्म भारत की जनता का धर्म है परशुराम भारत की जागरूक जनता के प्रतीक थे।
आज सभी अपने अपने स्वार्थ भाव के पोषण में लगे हैं वस्तुतः आज आवश्यकता है एक ऐसे धर्म की जो सर्वजन हितकारी और लोगों के लिए लाभकारी हो। परशुराम धर्म वह धर्म है जो पुरुष चेतना का वाहक है अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आज के युग का एकमात्र धर्म यही है।
परशुराम धर्म एक दाहक धर्म अवश्य है पर उसमें प्रासंगिक औचित्य भी है, समय की मांग है भी है। यह समय की आवाज को न सुनना अर्थात बहरा होने की गवाही तो है ही कायरता एवं नपुंसकता को भी स्वीकारा है।
इस रचना में पूर्ण सत्ताधारियों को कोसा गया है जिनकी गलत नीतियों के कारण भारत को चीन के आक्रमण का शिकार होना पड़ा जिनके गलत आदेशों के परिणाम स्वरुप असंख्य सैनिकों को मृत्यु की घाटी में कूदना पड़ा।
1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय से देश की जनता तो मर्माहत थी ही, हमारे बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी बहुत दुखी थे। सभी चीन के साथ भारत की कमजोर विदेश नीति और अशक्त रक्षा नीति को इस हार के लिए जिम्मेवार ठहरा रहे थे। ऐसे में आग, विरोध, विद्रोह और राष्ट्रीय स्वाभिमान को आवाज देने के लिए मशहूर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कैसे चुप रह सकते थे! कविवर दिनकर ने चीन की हार के बाद ही ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ नाम की काव्य पुस्तक की रचना की। उन्होंने इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों की कविता के माध्यम से आलोचना की। कांग्रेसी शासन के समय देश में व्याप्त भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को भी दिनकर जी ने अपनी लेखनी से रेखांकित किया।
पुस्तक की शुरुआत में ही कवि ने वीरों और सैनिकों से प्रश्न तथा उनके उत्तर के अंदाज में लिखा है-
गरदन पर किसका पाप वीर! ढोते हो?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था,
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गए थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गए थे,
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं,
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का,
कई बार तलवार गलाकर तकली गढ़ने वाली नीतियों की वजह से ही हमारे वीर सैनिकों को शहादत देनी पड़ी और अपने शोणित यानि खून से हमारे वीर ऐसी नीतियों के कलंक को धो रहे हैं। दरअसल, इन पंक्तियों में तत्कालीन विदेश नीति और रक्षा नीति पर करारा प्रहार किया गया है। सभी जानते हैं कि गलत रक्षा नीति के कारण कैसे भारतीय सैनिक युद्ध के लि ए जरूरी सामानों के अभाव में ही युद्ध लड़ रहे थे।
चीन की हार से दिनकर जी गुस्से और दुख से भरे हुए थे। उनके क्षोभ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को इशारों-इशारों में ‘घातक’ तक कह डाला। उन्होंने लिखा-
घातक है जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहां मारा है।
जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतंत्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं बधिक है।
चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं,
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
दिनकर की ये पंक्तियां नेहरू के जमाने की राजनीतिक अक्षमता और भ्रष्टाचार की कहानी कहती हैं। वे बता रहे हैं कि कैसे सच जानकर भी सच को नजरअंदाज किया जाता रहा, चुप्पी साधी जाती रही, भ्रष्टाचारियों तथा चापलूसों को संरक्षण दिया जाता था। यही वजह थी कि भारत अपने ही घर में हार गया।
सरकारी और प्रशासनिक तंत्र को जगाने के लिए बेहद कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए दिनकर जी आगे लिखते हैं-
ओ बदनसीब अंधो! कमजोर अभागो?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में,
किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियां-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर नहीं कढ़ती हैं।
दिनकर जी सिर्फ नेहरू सरकार की नीतियों को गलत ठहरा कर चुप नहीं हो गए बल्कि, वे देश को निर्बलता की ऐसी स्थिति से निकलने का समाधान बताते हुए वीरता और शौर्य का आह्वान भी करते हैं।
पहली आहुति है अभी, यज्ञ चलने दो,
दो हवा, देश की आग जरा जलने दो।
जब हृदय-हृदय पावक से भर जाएगा,
भारत का पूरा पाप उतर जाएगा,
देखोगे कैसा प्रलय चण्ड होता है!
असिवन्त हिन्द कितना प्रचंड होता है
बांहों से हम अंबुधि अगाध थाहेंगे,
धंस जाएगी यह धरा, अगर चाहेंगे .
तूफान हमारे इंगित पर ठहरेंगे।
हम जहां कहेंगे, मेघ वहीं घहरेंगे।
गरजो, अंबर को भरो रणोच्चारों से,
क्रोधान्ध रोर, हांकों से, हुंकारों से।
यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है,
मूढो! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।
जातीय गर्व पर क्रूर प्रहार हुआ है,
मां के किरीट पर ही यह वार हुआ है।
अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,
जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।
1962 की हार के करीब साठ वर्षों के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समय सीमा पर चीन से संघर्ष की स्थिति बनी है। ऐसे में, दिनकर जी के ये वाक्य बहुत ही प्रासंगिक हैं। चीन के खिलाफ कवि का गुस्सा जैसे भारतीय जनमानस में अब तक पलता आ रहा हो!
कुत्सिक कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,
हम बिना लिए प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,
अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,
जब तक जीवित हैं, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।
गरजो हिमाद्रि के शिखर, तुंग पाटों पर,
गुलमर्ग, विन्ध्य, पश्चिमी, पूर्व घाटों पर,
भारत-समुद्र की लहर, ज्वार-भाटों पर,
गरजो, गरजो मीनार और लाटों पर।
वीरों और सेनानियों का आह्वान करते हुए दिनकर लिखते हैं---
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जाए।
दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है,
मरता है जो, एक बार मरता है।
तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे!
जीना है तो मरने से नहीं डरो रे!
कवि ने शांति के लिए संघर्ष और वीरता को अनिवार्य माना है। आपको याद होगा कि हाल ही में लेह का दौरा कर जवानों से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि कमजोर कभी भी शांति की पहल या स्थापना नहीं कर सकता है।
हम मान गये, जब क्रान्तिकाल होता है,
सारी लपटों का रंग लाल होता है।
जाग्रत पौरुष प्रज्वलित ज्वाल होता है,
शूरत्व नहीं कोमल, कराल होता है।
कविवर दिनकर की ये पंक्तियां नेहरू जी की उस तस्वीर की याद दिलाती है, जिसमें वे शांति का संदेश देने के लिए कबूतर उड़ाते हुए दिखते हैं। कवि इस रवैये को कठघरे में खड़ा करते हुए कहता है कि आखिर इस शांतिवाद का हश्र क्या हुआ?
जब तक है यह वैषम्य समाज सड़ेगा,
किस तरह एक होकर यह देश लड़ेगा।
राजनीतिक दलों से अपने मतभेद भुलाकर एक साथ आने की अपील करते हुए कवि कहता है कि आज दक्षिण पंथ और वाम पंथ को भूल कर एकजुट होने का वक्त आया है। यह एकजुटता ही देश को विजयी बना सकता है।
वृक हो कि व्याल, जो भी विरुद्ध आएगा,
भारत से जीवित लौट नहीं पाएगा।
शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण भारत के सनातन पराक्रमी महापुरुष परशुराम की प्रतीक्षा की बेसब्री और आशा में कवि कहता है-
निर्जर पिनाक हर का टंकार उठा है,
हिमवंत हाथ में ले अंगार उठा है,
तांडवी तेज फिर से हुंकार उठा है,
लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है।
संसार धर्म की नयी आग देखेगा,
मानव का करतब पुनः नाग देखेगा।
‘परशुराम की प्रतीक्षा’ एक ओर तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिदृश्य में व्याप्त कदाचार और अनाचार को प्रश्नांकित करती है, तो दूसरी ओर देश की स्वाभिमानी और साहसी जनता और सैनिकों की तपस्या, बलिदान और आशावाद को भी स्वर देती है।
मांगो, मांगो वरदान धाम चारों से,
मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों, गुरुद्वारों से,
जय कहो वीर विक्रम की, शिवा बली की,
उस धर्मखड्ग ईश्वर के सिंह अली की।
जब मिले काल, ‘जय महाकाल’ बोलो रे!
सत श्री अकाल! सत श्री अकाल बोलो रे!
कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता परशुराम के उपदेश आज भी आधुनिक युग में प्रासंगिक है।
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