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Monday, June 6, 2022

कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त पुस्तक पढ़ते हुए

कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त पुस्तक पढ़ते हुए - सृजन पथ के अथक पथिक- - - डॉ वसुंधरा मिश्र स्वाधीनता की लड़ाई में जिस पत्रकारिता का स्वरूप था आज उसमें बहुत बदलाव आया है। आजादी की पत्रकारिता एक महत उद्देश्य, सिद्धांत, मूल्यों और आदर्शों पर टिकी हुई थी। स्वाधीनता प्राप्त करना और देश प्रेम को सर्वोपरि स्थान देना उस समय के साहित्यकारों, कलाप्रेमियों, चित्रकारों, पत्रकारों के लिए एक राष्ट्रीय धर्म था।उन्होंने जो भी किया, देश को केंद्र में रखकर किया।जरूरी नहीं है कि हर युग की विचारधारा एक हो। समय परिस्थितियों के * कृपाशंकर चौबे की यात्रा की कहानी बलिया इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से होते हुए बंगाल की धरती पर फलीभूत हुई। वे व्यष्टि से समष्टि को जोड़ने के सेतुबंध तो रहे ही साथ ही मनुष्यता की संवेदना को जोड़ना उनका प्रथम उद्देश्य रहा। कृपाशंकर चौबे ने प्रतिबद्धता की संस्कृति को अपने जीवन की लड़ाई में चाहे वह साहित्य हो या पत्रकारिता, एक अहम भूमिका मानी। प्रो. चंद्रकला पांडेय जी के पहले काव्य संग्रह 'उत्सव नहीं है मेरे शब्द' की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं - - मेरी कविता जुड़ी रहना चाहती है अपने देश से देश से यानी दिल्ली मुंबई कोलकाता मद्रास जैसे महानगरों से नहीं दूर सुदूर के अनाम गाँवों आदिवासी बस्तियों इतिहास से उन्मूलित किए जाते कबीलों, जनजातियों और मिटाई जाती लोक संस्कृतियों से(एक शिनाख़्त पृष्ठ 343) कृपाशंकर के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व पर दृष्टि डाली जाए तो प्रतिबद्धता उनके विचारों और संवेदनाओं दोनों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। 'कृपाशंकर चौबे एक शिनाख़्त' में महाश्वेता देवी ने उनके निबंध संग्रह 'समाज संस्कृति और समय' के बारे में लिखा है कि कृपाशंकर बंगाल के समाज और संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं।साहित्य समालोचक अमरनाथ का कहना है कि कृपाशंकर चौबे के लेखन की रफ्तार बहुत तेज है और उन्होंने हिंदी आलोचना जगत में आज अपनी खास पहचान बना ली है( पृष्ठ 5)।मदर टेरेसा के जीवन पर आधारित प्रोफेसर चौबे ने' करुणा मूर्ति मदर टेरेसा' और महाश्वेता देवी के जीवन और साहित्य पर केंद्रित 'महा अरण्य की मां' पुस्तक लिखी। ज़मीनी हकीक़त से जुड़े डॉ कृपा शंकर चौबे ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पुस्तक लिख कर अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। इसी प्रकार भारतीय कला सिनेमा में सत्यजीत रे के बाद चार्ली चैप्लिन एवं चलचित्र सिनेमा जैसी आधुनिकता से युक्त आदि पुस्तकें लिखीं। इसी प्रकार पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी 'राष्ट्र निर्माताओं की पत्रिकारिता' इन दिनों खास चर्चा में है। महात्मा गांधी की पत्रकारिता, गांधी के इंडियन ओपिनियन आदि के विषय में कृपाशंकर चौबे ने हिंदी बांग्ला दोनों को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्य किए। कृपाशंकर चौबे विविधता में एकता से पूर्ण साहित्य को महत्वपूर्ण मानते हैं। विविधतापूर्ण लेखन का मूल्यांकन इस पुस्तक में बहुत ही गंभीरता से हुआ है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विषयों के लेखक और लेखिकाओं का मूल्यांकन किया है। महाश्वेता देवी, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, केदारनाथ सिंह, हरिवंश, पवन करण, शेखर देशमुख, अभिषेक श्रीवास्तव, प्रभात ओझा, हीरालाल नागर, निर्मला गर्ग, मिथिलेश श्रीवास्तव, उमेश चतुर्वेदी, शर्मिष्ठा बाग, मृत्युंजय, वृषभ प्रसाद जैन, कृष्ण कुमार सिंह, अरुण होता, जय कौशल, सुरजीत कुमार सिंह, पलाश विश्वास, अग्नि शेखर, अरुण कुमार त्रिपाठी, विनय बिहारी सिंह ईश्वर मिश्र, विजय दत्त श्रीधर, बलदेव शर्मा, बलिराज पांडे, गिरीश पंकज, सिराज खान, राय बहादुर राय, राजेंद्र राव, राममोहन पाठक, तस्लीमा नसरीन,चंद्रकला पांडे आदि विभिन्न साहित्यकारों के साथ ही बुद्धिनाथ मिश्र, संजय द्विवेदी, गोपाल जी राय, अरविंद कुमार सिंह, अरविंद चतुर्वेदी, ओमप्रकाश अश्क, कौशल किशोर त्रिवेदी, संजीव भानावत, भवानी शंकर, संदीप कुमार दूबे, नंदनी सिन्हा आदि कृपाशंकर के व्यक्तित्व को जानते और समझते हैं। इसी प्रकार बहुत से विशिष्ट जनों ने कृपाशंकर चौबे के विषय पर बहुत कुछ लिखा जो उनकी विद्वत्ता उनकी तत्परता और उनके व्यक्तित्व को निर्धारित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनमें श्याम नारायण पांडे, अमरकांत, अमृतराय, नजीर बनारसी, विष्णुकांत शास्त्री, शिवप्रसाद सिंह, काशीनाथ सिंह, विद्यानिवास मिश्र, शिवमंगल सिंह सुमन, ठाकुर प्रसाद सिंह, कृष्ण बिहारी मिश्र, विवेकी राय, केदारनाथ सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, विश्वनाथ एन चंद्रशेखरन, नामवर सिंह, कल्याणमल लोढ़ा, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, जगदीश गुप्त, अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर और मदर टेरेसा आदि देश के सभी बड़े साहित्यकार, पत्रकार सभी शामिल हैं। कृपाशंकर चौबे के साथ रवि प्रकाश और हिमांशु बाजपाई की भी बातचीत मिलती है जो इस पुस्तक को और भी गौरवपूर्ण बनाती है 461 पृष्ठों की इस पुस्तक में संपादकीय के साथ-साथ अवदान, मूल्यांकन, व्यक्तित्व विशिष्ट जनों के पत्र, कृपाशंकर चौबे की रचनाओं से चयन, आत्मकथ्य संवाद लेखक परिचय और परिशिष्ट में विभक्त कृपाशंकर चौबे की शिनाख्त को एक बहुत बड़ा आया दिया गया है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर पूर्णता प्रामाणिकता का पूरा चित्र दिखाई पड़ता है अवधान और मूल्यांकन का पहला जो अध्याय है उसी में उसी में शिक्षक हिंदी के एक लेखक की दृष्टि में बंगाल जो महाश्वेतादेवी का मूल्यांकन है लेखक कृपाशंकर के लिए समाज संस्कृति और समय एक ऐसी पुस्तक है जो हिंदी में लिखी गई है और उसके लेखक है कृपाशंकर चौबे स्वयं महाश्वेता देवी ने कहां है की कृपाशंकर चौबे एक हिंदी भाषी लेखक होते हुए भी उन्होंने अपनी रचनाओं से प्रमाणित कर दिया है कि भिन्न भाषी होते हुए भी जो जिस राज्य में रहता है वहां के समाज संस्कृति भाषा और साहित्य पर गंभीर अनुशीलन कर सकता है मृणाल सेन की छाया लोग नजरबंद तस्लीमा करुणामूर्ति मदर टेरेसा चलकर आए शब्द पानी रे पानी और महा अरुण की मां आदि बहुत ही अच्छी किताबें हैं उनकी लिखी हुई जी चौबे को ऊंचाई पर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण है संवाद चलता रहे रंग स्वर और शब्द पत्रकारिता के उत्तर आधुनिक चरण कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी संदर्भ ग्रंथ के रुप में सम्मिलित किए गए श्री चौबे साहित्य अकादमी की जूनियर फैलोशिप समेत कई पुरस्कार से सम्मानित किए गए हैं सुभाष मुखोपाध्याय बांग्ला हिंदू सेतु शीर्षक से लिखा है कि मैं कृपाशंकर चौबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और उनकी पत्रकारिता गहरे सामाजिक अभिप्राय को लेकर चलती है सामाजिक विषयों पर भी चोट करते हैं तो मनुष्य मनुष्य के संबंधों को और मानवी के लिए संघर्षशील दिखते हैं सुनील गंगोपाध्याय जो बंगाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं उन्होंने हिंदी समाज में बांग्ला के दूध कहकर कृपाशंकर जी को सम्मानित किया है और लिखा है कि वह एक मौलिक लेखक है मैं अनेक समय हिंदी साहित्य जगत की खबरें उनसे प्राप्त करता हूं और नए लेखों के बारे में भी उन्हीं से मुझे पता चलता है उनके जैसा कोई लेखक किसी भी भाषा की संपदा के रूप में है बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं की रानी है केदारनाथ सिंह हिंदी के जाने-माने साहित्यकार हैं उन्होंने 11 नवंबर दो हजार आठ 2008 के इंडिया टुडे में कृपाशंकर चौबे के सामाजिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व पर अपनी बात लिखते हुए कहा था कि कृपाशंकर चौबे बांग्ला भाषा और संस्कृति में गहरी पैठ रखने वाले हैं और उनकी कृति समाज संस्कृति और समय विचार के कई स्तरों पर एक साथ सक्रिय दिखाई पड़ती है हरिवंश जी ने कृपाशंकर चौबे की 9 पुस्तकें और पांच पुस्तकों के विषय में बताया कि वे बहुत पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं और प्रभात खबर के शुरुआती दिनों के संघर्ष के साथी हैं आदरणीय कृष्ण बिहारी मिश्र जी शायद इसी प्रेम व यात्री के कारण कृपाशंकर को बलिया विभूति जी कहते हैं देशकाल और परिस्थितियां कैसे हमारे आसपास या संसार को गण बदल या प्रभावित कर रहे हैं यह समझना जानना आसान नहीं है एक संवेदनशील समझदार या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा बसा मन है या पर पीड़ा समझ सकता है बंगाल के दलित कोलकाता के चीनी मूल के बाशिंदे बाबा आमटे आनंदवन से लेकर अंडमान के लुप्त होते जा रहा लुप्त होती आदिम जनजाति पर विषयों की विविधता से भरा खंड संस्कृति खंड में 65 रचनाएं हैं कोलकाता के मशहूर पुस्तक मेला जाने-माने संस्थान नेशनल लाइब्रेरी मशहूर कॉलेज स्ट्रीट के पुस्तक बाजार पर कृपा को पढ़ते हुए नई चीजें जने को मिले प्रभात खबर में हरिवंश जी ने यह टिप्पणी 14 दिसंबर 2006 में पवन करें कृपाशंकर चौबे को एक पत्रकार तथा संवेदना से भरा साहित्यकार बताएं इंडिया टुडे में अपनी बात सही है और कृपाशंकर चौबे को पवन करण का मानना था की समय समाज और संस्कृति पुस्तक यदि आप पढ़े तो आपको गहरी बेचैनी से भरना शुरू कर देती है और आप इस पुस्तक का हिस्सा हो जाते हैं आपने सतर्कता और चौकन्ना पर भर जाता है इसका तथ्य गत प्रामाणिक और घटना गत वर्ष की हो ना आपको लेख धरले कैरियर स्पष्ट इसे भरता है मुनमुन मुनमुन सरकार जैसी युवा विदुषी बांग्ला हिंदी अनुवाद इता की असमय मृत्यु को स्वीकारने के लेखक की व्यवस्था पाठक को अपनी व्यवस्था लगने लगती है कट्टरपंथियों के निरंतर प्रहार झेलते विद्रोही लेखिका तस्लीमा नसरीन की दुर्दशा और संघर्ष अन्य भाषाओं के लेखकों और पाठकों को अपना संघर्ष और जद्दोजहद की तरह महसूस होने लगते हैं इसी प्रकार सिंदूर मुद्दे पर चढ़े उस आंदोलन तक चलकर आती है जिसने एक समय पूरे देश की नजर अपनी तरफ खींची उसी प्रकार बंगाल की क्षेत्र वादी मार्क्सवादी दृष्टि से बाहर निकल कर देखना तथा तथा से भारत के मानस के सामने लाकर रखना बहुत महत्वपूर्ण है क्या बंगला के प्रमुख शास्त्र और उल्लेखनीय कार बंकिम शरद ताराशंकर बिभुतिभूषण रवींद्नाथ विमल मित्र सत्यजीत राय महाश्वेता देवी नैना चक्रवर्ती शंख घोष सुनील गंगोपाध्याय मंदाक्रांता सेन सहित हिंदी के निराला प्रेमचंद रघुवीर सहाय केदारनाथ सिंह से राजेश जोशी तक पर लिखने के साथ-साथ बंगाल के कई सरकारों पर प्रमुखता और गंभीर समझ के साथ लिखने की वजह से कृपाशंकर चौबे को साहित्यकार तथा उनके लेखों को कविताएं या कथा कहता हूं तो जवाब लगा हां में ही निकलता है इसी प्रकार शेखर देशमुख जिन्होंने कृपाशंकर चौबे के लिए व्यक्तित्व चित्रण में महारत क्योंकि उन्होंने बहुत सी ऐसी घटनाएं और आम इंसान की संवेदना को दूसरों तक पहुंचाया है समय का अपना महत्व होता है समय के साथ चलने के लिए आसपास घट रही घटनाओं का सही अर्थ लगाना भी जरूरी होता है संवेदनशीलता के साथ-साथ दूसरों के प्रति सहानुभूति अगर हो भावनाओं के आधार की क्षमता हो दुनिया की तरफ देखने का नजरिया भी बदल जाता है व्यक्तित्व चित्रण चौबे जी का गढ़ रहा है चाहे वह पीड़ितों की मसीहा मदर टेरेसा हो भी वादी शांति क्यों हो या फिर विद्रोही साहित्यकार सुशील गुप्ता हो चौबे जी हर चीज के बारे में एक ही प्रकार का कौतूहल है व्यक्ति हो या घटना वही गुण उन्हें सहायता से रिश्ता कायम करने में मदद करता है अभिषेक श्रीवास्तव एक पत्रकार की बंगाल जाएगी शिक्षक में लिखते हैं कि पुस्तक के सभी लेखों में सांस्कृतिक चेतना अंतर नहीं थे लेखक ने आज महाश्वेता के सानिध्य में आदिवासियों को काफी करीब से देखा है और उनके मसलों से गहरी जुड़े बर्बर सभ्यता के बीच पश्चिम बंगाल के लोधा और खेड़िया आदिवासियों पर सरकारी दमन की एक रिपोर्ट है आदिवासियों के जीवन में लेखक की दिलचस्पी से बंगाल तक सीमित नहीं है उन्होंने अंडमान निकोबार के आदिवासियों पर भी अगला ही लिख दे दिया है इस खंड में दलितों और कोलकाता के असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों पर भी रिपोर्ट है हा करो और हाथ रिक्शा खींचने वालों की समस्याओं पर टिप्पणी है और पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था पर कुछ नोट्स है संस्कृति की छाव शीर्षक में प्रभात ओझा ने लिखा है कि कृपाशंकर की पत्रकारिता की आप प्रारंभिक प्रणाम प्रयोजन पत्रिकाओं का प्रतिज्ञा ओं का स्मरण हमें विकारों से लड़ने की शक्ति देता है मीडिया में जो विकार आ गए हैं उनमें कुछ स्वाभाविक है और उस परिस्थिति जन जब मीडिया उद्योग है तो उद्योगों की जो विकृतियां है वे इसमें सामने ही आएंगे क्योंकि उद्योग का काम धन कमाना है और व्यापार बढ़ाना है लेखक पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन की उन नीतियों की भी जमकर खिंचाई करता है जिस कारण एक तरफ तो विकास का ग्राफ पेपर बढ़ता दिखाई देता है दूसरी ओर फुटपाथ पर रहने वालों की संख्या भी बढ़ती है फिर ऐसा होने के पीछे लेखक वामपंथियों की ईमानदारी पर शक नहीं करता उत्तरी बंगाल के अलगाववादी आंदोलन को कुचलने के लिए वामपंथी सरकार के तरीकों को रेखांकित करने के अलावा वह उस जोशना सिंह पर मिलता है जिसने यह मानते हुए विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी इससे वह अपना परिवार नहीं चला सकते इसलिए जरूरी है कि नौकरी की जाए कृपाशंकर चौबे कोलकाता में चीनी समुदाय पर लिख सकते हैं तो पड़ोसी बांग्लादेश से हो रही समस्याओं पर भी टिप्पणी करते हैं उनकी लेखनी लेखनी समझ बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ मैत्री को महाद्वीप में शांति के लिए यूं ही जरूरी नहीं समझते उन्हें पता है कि इन दिनों दोनों देशों का जनमानस किस कदर एक दूसरे से संपृक्त है इन गंभीर विश्व में खेल फिल्म और रंगमंच के बहाने जब लिखो की श्रंखला शुरू होती है तो लेखक को इन विषयों की पकड़ का भी सबूत मिलता है राजेंद्र राव पत्रकारिता पर दस्ता वाजिद दस्तावेजी लेखन के रूप में मानते हैं मीडिया समय और संस्कृति में अर्चना शर्मा ने कहा है कि वैसे तो हिंदी में बहुत से साहित्यकार हैं जिन्होंने पत्रकारिता के मानदंड स्थापित किए हैं प्रेमचंद से लेकर या परंपरा रघुवीर सहाय आगे मनोहर श्याम जोशी से लेकर मंगलेश डबराल तक विस्तृत है परंतु पत्रकारिता में ऐसे कम लोग हुए हैं जो साहित्य के प्रति अपने उल्लेखनीय जिम्मेदारी समझते हैं पत्रकारिता की 72 भारतीय अवधारणा इस पुस्तक के दूसरे खंड संस्कृति में अपने पूरे शबाब के साथ निखर कर आते हैं साहित्य और संस्कृति के चिंतन के माध्यम से उन्होंने उत्तर भारतीय साहित्य की सच्ची तस्वीर सामने रखी है मीडिया संस्कृति और समय मैं अर्चना शर्मा कहती है कि इस खंड में सबसे चकित करती है लेखक की साहित्य की समकालीन तक अबोध और संभालता से संबंधित इस पुस्तक में 4 लेख हैं दो लेख बांग्ला साहित्य समकालीन तक का जायजा लेते हैं तो 2 लेख हिंदी साहित्य में समकालीन परिदृश्य पर एक सूची ंतत टिप्पणी करते हैं जरूरी कविता के समकालीन परिदृश्य में उन्होंने कविता गीत गजल दोहे मुक्तक सब को शामिल कर लिया जो साहित्य के विद्यार्थियों या जिज्ञासाओं के लिए थोड़ी परेशानी और असमंजस पैदा कर सकता है अरुण कमल मंगलेश डबराल राजेश जोशी के साथ में श्रवण सकता है इसे इसी दृष्टि और व्यापक के साथ स्वीकार करना चाहिए वहां एक जरूरी पुस्तक के रूप में लिखा है कि लेखिका महाश्वेता देवी को वर्ष 1997 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था तो शायद देश की 8% आबादी वाले आदिवासी इलाके को भी सम्मानित किया जा रहा था तो बहुत बड़ी बात है कि आदिवासियों के बीच मां की तरह पूजा और आदरणीय महाश्वेतादेवी एक तरफ से बहुत ही अद्वितीय कर्म कर्म कर रही थी महाश्वेता देवी ने आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किए चिकित्सा सिंचाई और स्वरोजगार योजनाओं का सूत्रपात कराकर महाश्वेता देवी ने आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई यह उन्होंने आजकल अक्टूबर 1998 में अपनी बात कही विश्वंभर नेवर अनूठी और सार्थक पहल बताते हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे बड़ी लकीर खींच कर लेखन में बाजी मारते रहे और दलित साहित्य और बांग्ला साहित्य पर इनकी संभवत पहली पुस्तक जो दलितों और जनजातियों के साथ अन्याय हो रहा है आज के समय की बड़ी चुनौती पर उन्होंने लिखा है हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में कृपाशंकर चौबे का कार्य बहुत ही सराहनीय निर्मला गर्ग उन्होंने कर्म के पीछे चलते शब्द यह मृत्यु का नहीं है मेरा देश मेरा देश मैं खिलाऊंगा अपने देश को सीने में छुपा लूंगा को हाथ से भीगी का संध्या और विसर्जन बांग्ला कवि भट्टाचार्य की कविता की ये पंक्तियां हैं लेकिन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी कहती हैं कि यही है मेरा देश दोनों के एक एक ही बात हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां शब्द के बीच गहरी खाई सच तो यह है शब्द की सामर्थ पर हमें भरोसा नहीं रहा इसके कारण हम कभी उपभोक्तावाद में ढूंढते हैं सभी उत्तर आधुनिकता के ऐसे मॉडल में जहां हर चीज का अंत निश्चित है चाहे वह इतिहास चाहे विचारधारा चाहे साहित्य को चुनौती दी है सतत कार्य महाश्वेता का परिचय देती है कृपाशंकर चौबे की किताब महाश्वेता देवी हिंदी भाषा प्लान जानने हैं रुदाली और हजार चौरासी की मां जैसी उनकी कथाओं पर हिंदी में फिल्में बन चुकी है हिंदी में उनका साहित्य अनुचित हुआ है पत्रकारिता साहित्य और संवाद के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय जीवन में आदिवासियों को सम्मानजनक स्थान और न्याय दिलाने के लिए उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान के लिए आदिवासियों के बीच उनके कार्य के लिए दिया आदिवासियों की मां आदिवासियों की बड़ी दीदी जैसे संबोधन से उन्हें संबोधित किया गया मिथिलेश श्रीवास्तव ने अपने रचना शीलता के संघर्ष शिक्षक में कहा उमेश चतुर्वेदी उपेक्षित जनों की मां कहा कृपाशंकर समय-समय पर उनसे बातचीत करते हैं और उनके विचारों से हिंदी जगत को परिचित भी कराते रहे हैं वहीं शर्मिष्ठा बाग में निर्वासन में भी तसलीमा का संघर्ष विषय पर जब अपनी बात कही तो यही सामने आती है कि निर्वासन में भी तस्लीमा को लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है नजरबंद तसलीमा कृपा शंकर जी की इस पुस्तक में उनके निर्वासन के संघर्ष देश से दूर देश के पास और नसरीना का साहित्य शिक्षक इन अध्याय का महत्व है जिसमें निर्वासन में लेखिका के संघर्ष का विशद विवरण मिलता है तस्लीमा लोकतंत्र मानवतावाद अभिव्यक्ति की आजादी और इससे मुक्त के पक्ष में लिखती है मिस्त्री को उसके मुकम्मल आजादी देने के पक्ष पाते हैं मित्रता पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व वाद की विरोधी हैं वैसे लेखिका हैं जो अपने हृदय की बात सही सही लिखते हैं इसकी परवाह किए बिना ही कुछ लोग नाराज होंगे मृत्युंजय ने दिग्गज का लोक में कहां है इंडिया जो इंडिया टुडे 28 अगस्त 2002 में आता है कि कृपाशंकर इस पुस्तक की एक खूबी है कि वह पथ से शुरू होती है कहना नहीं होगा कि नेट में हमेशा विचार भी रास्ता है और सम्मुख में प्रतिपल खुशकिस्मत से मेनाल से उनकी पैदाइश तब की है जब भारतीय समाज में विचारों की लहर चल रही थी मैंने उनसे उन्हीं विचारों की लहरों से टकरा टकरा कर युवा हुए पुस्तक का पहला अध्याय दृश्य के पीछे का जीवन इसका बयान पड़ता है 8 वर्ष की उम्र में बालक मृणाल सेन ने स्वाधीनता संग्राम के बारे में एक राजनीतिक संस्था का बोध जाता है और वह वामपंथी दिशा की ओर मुड़ते हैं यह राजनीतिक चेतना उन्हें कैसे सिनेमा से जन तक ले आए इसकी कथा दिलचस्प भाषा में कृपाशंकर जी ने लिखी है जिन्होंने अपनी टिप्पणी पर अद्भुत रचना कहते हैं कि कृपाशंकर चौबे दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य की भूमिका में अपनी बात लिखी है कि वर्ण व्यवस्था बहुत पुराने हैं जातियां परवर्ती काल में बनी जिसका आधार जन को माना गया वहीं से जाति भेद और छुआछूत ने जन्म लिया इस पर एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को आसान बनाने के भाव का जन्म जातियों के जन्म के साथ भारत में हुआ कन्नड़ कन्नड़ के प्रथम कंपनी के महाभारत महाकाव्य के नायक कर्ण का उदाहरण दिया जो स्वयं वर्ण व्यवस्था के उच्च नीच का शिकार हुआ था कन्नड़ के प्रसिद्ध कवित्री अक्कमहादेवी की कविता भी उन्होंने बताएं जो दलित की भूख पर उत्पन्न विषम परिस्थिति को दर्शाती है यह कविता भी बहुत है जिसमें उन्होंने इस प्रकार है इतना लिखते हैं मछली पकड़ने वाले थे जन्म से ही चिंता मत करो जाति की वास्तव में थे और दुर्वासा घाट से जूता पंक्तियों में ही पैदा नहीं हुए इतिहास गवाह है कि दलितों के घरों में भी पैदा होते रहे दलितों की भूमिका पर आधारित है जिसमें आधुनिक साहित्य और पत्रकारिता के संदर्भ में बहुत अच्छी तरह उपयोग किया गया है कृष्ण कुमार सिंह ने परंपरा और आधुनिकता का संगत बोध के हवाले से कहा है कि इस पुस्तक में प्रतिष्ठित पत्रकार ने दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य पर गहन अध्ययन चिंतन किया है यही उसका ठोस प्रमाण है जिसमें बाबा साहब का शो चिंतित मत अंतर धारा के रूप में विद्यमान है मतवा धर्म की मान्यताओं के संक्षिप्त चर्चा भी की है जिसमें मतवा यानी जो मतवाले हैं जो जाति धर्म वर्ण से ऊपर उठे हुए हैं मध्यकाल में निर्गुण मार दी कबीर रैदास गुरु नानक दादू दयाल आदि संत कवि एक तरफ से मत वाले ही थे जाति धर्म की संकीर्ण गिरे बंदी को तोड़ने का एहसास मत वाले कर सकते हैं हरि रस पीकर मतवाले बने लोग भी ऐसी जगह पंडित से बाहर निकाल सकते हैं कबीर के शब्दों में मैं ममता घूमर रे ना ही तन को साथ दलित आंदोलन का विकास और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक में होता है बंगाली समझा जा सकता है जहां तुम ने उन्हें अपने आया है जहां तुमने उन्हें अपने आसन से खेल गिराया है वही तुमने अवहेलना से अपनी शक्ति को निर्वाचित किया है पैरों से रोंदे जाकर में धूल में पड़े हुए हैं उसी ने चाय तक उतर आओ नहीं तो परेशान नहीं अपमान में उन सब के समान होना है समाज की शक्ति के रात के लिए जिम्मेदार है तथाकथित उच्च जातियां समाज के नियामक स्वयं को मानने वाले लोग तस्लीम तस्लीमा नसरीन ने अपनी टिप्पणी हिंदी जगत से मेरा परिचय कराने वाले पेपर कहां है कि मैं गत 4 वर्षों से कृपाशंकर को जानती हूं और वह मेरे घनिष्ट बंधुओं में से है पता नहीं क्यों वह मुझे अपने छोटे भाई की तरह लगता है एक कुशल पत्रकार है लेखक है और सबसे बड़ी बात है वह मेरा स्वजन है आदमी मेरे अच्छे समय में जैसे वह मेरे पास रहा उसी समय मेरे उसी तरह मेरे दोस्त समय में भी साकरा हिंदी जगत के साथ मेरा परिचय कराने में कृपा को मैंने सदैव अपने पास पाया कृपा ने मेरे संग संग राम को अनेक लोगों से अधिक अंगीकार किया मेरे निर्वासन की यंत्रणा को लेकर मैंने कृपा को भावुक होते हुए भी देखा वह बड़ा मनुष्य मेरे बहुत निकट का मनुष्य 2009 26 अगस्त हो या बात तस्लीमा नसरीन अरुण होता है साहित्य आलोचना इतिहास और पत्रकारिता का समन्वित रूप इसमें प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे को एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न लेखक माना है उन्होंने बताया कि निबंध आलोचना और पत्रकारिता के क्षेत्र में कृपाशंकर जी एक चर्चित नाम है इनका लेखन आस्था प्रतिबद्धता और विवेक का संतुलन आस्था से चौक में की जरूरत नहीं है इसका आशय यह नहीं है कि जो आज के संदर्भ में धार्मिक अंधी आस्था है बल्कि आस्था में विवेक संबंधित है आस्था विवेक विवेक विवेक होती है जीवन और समाज में आस्था के साथ साथ विवेक का जितना है उतना ही लेखक के संसार में लेखक ने हास्य के साथ समाज के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता दिखाई है दलित विमर्श के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में चौबे जी ने एक कविताओं की रचना की है दलित विमर्श के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए उनका अध्ययन क्षेत्र बंगला साहित्य में दलित चिंतन है इसलिए इन ग्रंथों का चयन करना सो उद्देश्य है श्री मोहन सेन की भारतवर्षीय जातिभेद स्वपन कुमार की भारतीय समाज एवं धारा डॉक्टर अंबेडकर का बौद्ध धर्म सिंधु हड़प्पा कालीन भारतीय धर्म तथा भारतवर्ष के मूल निवासियों और और चिंतन नकुल मलिक की भारत चिंता कपिल कृष्ण ठाकुर कीमत हुआ आंदोलन और बांग्ला नूतन समाज चित्र मंडल पर मंडल द्वारा संपादित बांग्ला दलित आंदोलन इस विश्वास के संपादक में प्रकाशित दलित साहित्य जैसे महत्वपूर्ण कृतियों से गुजर कर उन्होंने अपने दलित संबंधी संकल्पना स्वरूप विश्लेषण को पुख्ता बनाया है इसी प्रकार वेद पुराण मनुस्मृति आदमी भी भारतीय जीवन के आधार जाति समाज बनाम पक किए हैं

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