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Thursday, July 19, 2018

प्रेम के रंग

प्रेम के रंग चाँदनी कहती है हँस लो सूरज कहता है उठ जाओ हाथों ने मिलकर सलाह की एक दूसरे को रगड़कर एक साथ रहकर गीत गाओ रोम रोम में प्रेम सिहर उठा हर धड़कन में धड़कने लगा अँगड़ाई लेता हर युवा के दिल में जगह बना लेता यौवन का वसंत लहलहाने और बहने लगा प्रेम उमड़ने - घुमड़ने लगा प्रेम में मनुष्य, मनुष्य लगने लगा द्वेष की भयावह आँधी प्रेम से जलने लगी प्रेम खोने लगा संवेदना तड़पने लगी घुट घुट कर मनुष्यों के बीच दम तोड़ने लगी बम विस्फोटों के आतंक ने क्षत विक्षत कर दिया उसे प्रेम कराहने लगा नहीं है कोई छत, जहाँ रह सके, प्रेम जिंदा सड़क पर पल रहे मैले कुचैले बच्चे की माँ में प्रेम जीवित था सिर्फ बच्चे से बड़े होने तक ही उसका समय था प्रेम की यही है पराकाष्ठा भविष्य श्वास ले रहा था

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