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Thursday, July 19, 2018

लू

लू एक लू बाहर चल रही थी और एक लू भीतर सबको और खुद को ख़त्म करने के लिए काफी था न कोई धर्म, न कोई जाति, न कोई लिंग थे वहां मनुष्यता भी नहीं थी शर्मसार असुरों की आंधी थी विध्वंस के ज्वालामुखी थे मन में भरे थे परमाणु बम किसी और दुनिया के थे वे लोग झुलस रहे थे समाज - संस्कृति और नस्लें लू के थपेड़े बढ़ रहे थे,जल रहे थे लोग विश्वास और ईश्वर की हत्या हो चुकी थी वहां लू बढ़ रही थी

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