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Thursday, August 5, 2021

चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूंथा जाऊँ-माखनलाल चतुर्वेदी

सन् 1938 तक पहुंचते पहुंचते कुछ ऐसी कविताएं लिखी जा रही थीं जो प्रारंभिक दौर में तो छायावादी थीं परंतु बाद में कविताओं के रूप स्वरूप में बदलाव आने लगा। छायावाद और प्रगतिवाद के मध्य दो प्रकार की कविताएं सामने आईं - - एक तो राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता और छायावादोतर गीति कविता या प्रणयमूलक वैयक्तिक कविता। आधुनिक कविता में देशभक्ति और राष्ट्रीयता के भावों का गहरा प्रसार दिखाई देता है। इन कविताओं में अंग्रेजी के दमन चक्र के कारण देशवासी पिस रहे थे और अंग्रेज समृद्ध होते जा रहे थे। इसी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ छायावादी संस्कारों के कवियों के हृदय में विद्रोह की आग भड़क उठी। आग की लपटें जैसे जैसे तेज होती गईं, वैसे वैसे कवियों का संवेदनशील हृदय आक्रोश से भरता चला गया। ऐसे ही कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी जी का नाम आता है। इनके समय रामधारी सिंह दिनकर, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान आदि कवियों की रचनाएं भारतवासियों को देशप्रेम से ओतप्रोत कर रही थीं। इस समय की रचनाएं गांधी वादी सौंदर्य चिंतन के साथ साथ भावात्मक और क्रियात्मक रूप से अधिक प्रभावित करने वाली थीं। माखनलाल चतुर्वेदी जी का जन्म 4 अप्रैल सन् 1889 को होशंगाबाद से 14 मील दूर "बाबई" गांव में हुआ था। इनके पिता श्री नंदलाल चतुर्वेदी एक साहसी और संस्कारों से युक्त प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक थे। उनकी असमय मृत्यु के पश्चात वे " सिमरनी" कस्बे में अपनी बुआ के यहाँ भेज दिए गए जहां उन्होंने दस वर्षों तक शिक्षा प्राप्त की। आरंभ से ही तुकबन्दी में रुचि रखने वाले माखनलाल चतुर्वेदी जी ने संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में साहित्य का उच्च कोटि का ज्ञान भी प्राप्त किया । सन् 1904 में उनका विवाह ग्यारसी बाई से हुआ। सन् 1905 में बंबई के पास एक गांव "मसन" में अध्यापक की नौकरी की जो बाद में स्वदेश प्रेम के कारण स्वेच्छापूर्वक त्याग दी। देश की मिट्टी से इनका बचपन से ही अनन्य प्रेम था इसी कारण वे घर पर भी पूरा ध्यान नहीं दे पाए थे। इनकी पत्नी भी राज्यक्षमा रोग से पीड़ित थीं और जल्द ही चल बसीं थीं। माखनलाल चतुर्वेदी जी "भारतीय आत्मा" के नाम से विख्यात राष्ट्रीय जागरण के अमर गायक रहे हैं। उन्होंने अपने आपको कवि कर्म तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय सेनानी का दायित्व निभाने में भी आगे रहे। गांधी जी के असहयोग आंदोलन में इनकी क्रांतिकारी भूमिका रही। इन्हें कारागार का दण्ड भी भोगना पड़ा जहां "कैदी और कविता "रचना लिखी। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध में इनकी कविताओं में क्रांति के स्वर की प्रमुखता रही। हिम किरीटनी, माता, हिम तंरगिणी, युग चरण, समर्पण, वेणु लो गूंजें धरा आदि इनके प्रमुख काव्य - संग्रह हैं। तिलक, महात्मा गांधी, रोलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, गणेश शंकर विद्यार्थी, हिन्दू - मुस्लिम एकता आदि इनकी कविताओं के प्रमुख विषय रहे हैं। इनकी कविताओं में कहीं-कहीं आध्यात्मिकता भी दिखाई देती है। चतुर्वेदी जी के काव्य में प्रेम और भक्ति की धारा राष्ट्रीय चेतना से युक्त होकर सामने आयी है।राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानने वाले चतुर्वेदी जी ने भारतवासियों को सदैव उनके दायित्वबोध से परिचित कराने का सफल प्रयत्न किया है। राष्ट्रीय चेतना के कवियों में चतुर्वेदी जी का शीर्ष स्थान है। भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय जागरण त्याग बलिदान एवं सांस्कृतिक गौरव अभिमान की दृष्टि से चार गीत विशेष महत्व रखते हैं। वे हैं - - राष्ट्रगान (जन मन गन), वंदेमातरम्, सारे जहाँ से अच्छा तथा पुष्प की अभिलाषा। संसार के किसी अन्य कवि ने स्वदेशी स्वतंत्रता के लिए आत्मबलिदान की ऐसी कामना नहीं की है 💐💐💐💐---- चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ भाग्य पर इठलाऊं मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक वे एक सिपाही के रूप में सदैव राष्ट्र मुक्ति के युद्ध में सन्नद्ध खड़े अपने सेनापति के आदेश की प्रतिक्षा करते हैं 💐💐💐💐----- बोल अरे सेनापति मेरे मन की घुंडी खोल, जल-थल- नभ, हिलडुल जाने दे, तू किंचित मत डोल। दे हथियार या कि मत दे तू पर तू ही कर हूंकार। ज्ञातों को मत, अज्ञातों को तू इस बार पुकार। वे सिर पर प्रलय लिए और नेत्रों में मस्ती भरे एक वीर सिपाही के रूप में सदैव राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में लक्ष्य प्राप्ति हेतु अटल खड़े हैं 💐💐💐💐---- सिर पर प्रलय नेत्र में मस्ती मुट्ठी में मनचाही लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है मैं हूँ एक सिपाही। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के सिपाही माखनलाल चतुर्वेदी जी सेनानी से अपनी बलि देने की आज्ञा मांगते हुए कहते हैं 💐💐💐💐---- खिलने के पहले टूटेगीं, तोड़, बता मत भेद वनमाली अनुशासन की सूची से अंतर छेद श्रम- सीकर, प्रहार से जीकर, बना लक्ष्य अराध्य मैं हूँ एक सिपाही, बलि है मेरा अंतिम साध्य। सैनिक केवल लड़ना जानता है। जीवन से उसे मोह कैसा। मृत्यु से उसे भय कैसा। वह तो इतना ही जानता है कि 💐💐💐💐------- मरण के बीच विश्राम कहाँ वे कहते हैं 💐💐💐💐--- धीरज रोग प्रतीक्षा चिंता सपने बने तबाही ऐ दिलदार द्वार खुलने दे, मैं हूँ एक सिपाही। **** * *** *** खून हो जाए न तेरा देख पानी मरण का त्योहार, जीवन की जवानी। मरण का त्योहार मनाने का यह दिव्य स्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। तभी तो देश की स्वतंत्रता के लिए जेल यात्रा और हथकड़ियां उनके लिए गौरव यात्रा और ब्रिटिश राज के गहने थे 💐💐💐💐------ क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना। हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना। जो कवि स्वयं बलिदान की भावना को लेकर मृत्यु का जयगान कर रहा हो, वह राष्ट्रीय पथ का सच्चा पथिक ही हो सकता है। ऐसे कवि की ओजस्विता का क्या कहना। बलिपंथी कारागार को कृष्ण मंदिर, हथकड़ी को माता, पृथ्वी को शैय्या और आकाश को आच्छादन मानकर अपने नाम के संकेत पर सुरपुर तक को ठुकरा कर राष्ट्र के लिए समर्पित हैं। मानव-जीवन की अनुभूति को ओजस्वी स्वर दिया जिसके कारण राष्ट्र जाग उठता है।" अमर राष्ट्र " कविता में वे कहते हैं 💐💐💐💐💐--- मैं यह चला पत्थरों पर चढ़, मेरा दिलवर यहीं मिलेगा। फूंक जला दें सोना चांदी तभी क्रांति का सुमन खिलेगा। युग कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी ने अपने युग की आत्मा को पहचान कर उसे वाणी के स्वर दिए 💐💐💐💐- - - मातृभूमि है उसकी, जिसको उठ जीना आता है, दहन भूमि है उसकी, जो क्षण क्षण गिरता जाता है। बापू के प्रति उनके उद्गार 💐💐💐💐----- युग तुम में, तुम युग में कैसे झांक रहे हो बोलो। उथल-पुथल तब हो कि समय में जब तुम जीवन घोलो। ******* कंठ भले हों कोटि-कोटि तेरा स्वर उनमें गूंजा। हथकड़ियों को पहन राष्ट्र ने पढ़ी क्रांति की पूजा। राष्ट्रीय धारा के सशक्त कवि माखनलाल चतुर्वेदी वास्तव में "भारतीय आत्मा" के प्रतीक हैं जिनके हर शब्द, हर भाव और हर कार्य में राष्ट्रीय अनुगूंज होती है। देश प्रेम और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले भारत के परंपरागत आदर्श, त्याग, बलिदान और गांधीवाद के विचारों को बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया। राष्ट्रीय वेदना, शौर्य और उदात्त भारतीय संस्कृति की आंतरिक चेतना वाले महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की पुण्य तिथि पर शत शत नमन ।🙏 🙏 🙏 - - डॉ वसुंधरा मिश्र

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