Powered By Blogger

Thursday, August 5, 2021

कोरोना का अंधविश्वास

विज्ञान पर भारी अंधविश्वास कैसे हो कोरोना वैरियर्स पर विश्वास चिंतन पढ़कर एकबार फिर पुराने दकियानूसी भारत की ओर ध्यान चला गया। झाड़ फूंक, नीम हकीम, जादू-टोना और चमत्कारों से बीमारियों को भगाने का चलन अशिक्षित और निरक्षर लोगों में आदि काल से चला आ रहा है जो शिक्षितों और पढ़े-लिखे को भी आकर्षित करने लगा। विज्ञान लोगों की बुद्धि और तर्क से जुड़ा है जबकि अंधविश्वास तो श्रद्धा और आस्था से जुड़ा है। आस्था की ताकत विज्ञान को नकारती है। निराशा की चरम परिणति ही तंत्र मंत्र जप उपवास पूजा-अर्चना होम यज्ञ आदि विभिन्न राहों को जन्म देते हैं। कोरोना महामारी में फिर एक बार निराशा के भाव अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है। कोरोना का रोगी दहशत में जी रहा है, जहां उसे सिर्फ मृत्यु के खुले दरवाजे ही दिखाई दे रहे हैं। विज्ञान वहां लोगों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। दवाईयां नहीं है। सरकारी व्यवस्था लचर पचर है। स्वास्थ्य व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। कोई अस्पताल नहीं जाना चाहता क्योंकि वहां तो संक्रमण फैला हुआ है तो कोरोना ठीक कैसे होगा। लाखों का बिल बनाया जा रहा है। झाड़ फूंक में पैसा कम लगता है। एक-दो ठीक हो गए तो बस लोगों की भीड़ उधर ही हो लेती है। पढे़ लिखे भी इंसान हैं। उन्हें लगता है कि लोग गलत नहीं है, फायदा हुआ है, तभी लोग जाते हैं। मनुष्य स्वभाव को चमत्कार अधिक आकर्षित करते हैं। कोरोना की आरती, कोरोना के लिए यज्ञ, कोरोना माई की कहानी आदि होने लगे हैं। कार्टून और कविताएं भी बन रही हैं। समाज के दो पहलू हैं विज्ञान और अंधविश्वास। दोनों में ही समाज जीना सीखने लगता है। - डॉ वसुंधरा मिश्र

No comments:

Post a Comment