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Thursday, August 5, 2021

मेरा जीवन मेरा संदेश है-कस्तूरबा

मेरा जीवन मेरा संदेश है-कस्तूरबा - - आप मुझे जानते हैं। मैं हूं आपकी बा, मोहनदास कर्म चंद गांधी की धर्मपत्नी। मेरा जन्म 11 अप्रेल सन् 1869 में गुजरात के पोरबंदर जिले के छोटे से गांव में पिता गोकुलदास मकनजी और माँ ब्रजकुंवर बा कपाड़िया के यहाँ हुआ। मैं उनकी तीसरी संतान थी। मेरा विवाह सन् 1883 में मेरे पिता के मित्र के बेटे मोहन के साथ 7 साल की अवस्था में कर दिया गया था । मोहन भी उस समय 13 वर्ष के थे। उस समय बाल विवाह होता था। मेरा शुरुआती जीवन कष्ट से भरा रहा। मेरा जीवन देश और पति के लिए ही समर्पित रहा। दूसरी स्त्रियों की तरह मेरी निरक्षरता के लिए बापू मुझसे अप्रसन्न रहते थे। मेरा सजना,संवरना और घर से बाहर निकलना उन्हें पसंद न था, मुझ पर अंकुश लगाते लेकिन बापू के सभी प्रयास असफल रहे। बाद में तो मैं उनके हर कदम पर साथ रही। निरक्षर होने के बावजूद मुझमें अच्छे- बुरे को पहचानने का विवेक था। मैंने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया। 1906 में उनके साथ अफ्रीका गई और उसी दौरान मैंने उनके साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपने जीवन का सबसे पहला सत्याग्रह किया जिसमें मुझे तीन महीने की जेल हुई।अंत में, जीत हम स्त्रियों की हुई। बापू के स्वाधीनता संग्राम के बड़े लक्ष्य के पीछे मैंने सदैव उनके कदम से कदम मिलाया। कई बातों पर हमारी नोक-झोंक भी होती। 1928 में ब्रिटिश हुकूमत ने लगान बढ़ा दिया तब सरदार वल्लभभाई पटेल के सहयोग से मैंने इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को एकजुट किया। इतिहास में पहली बार इतना बड़ा महिलाओं को आंदोलन हुआ। मेरे इस प्रस्ताव को अद्भुत सफलता मिली। इसके बाद सन् 1930 में डांडी यात्रा में बापू के साथ रही। इस दौरान सूरत में शराबबंदी के लिए भी सभी महिलाओं को मैंने एकत्र किया और धरने पर बैठ गई। नतीजा यह हुआ कि सूरत की सारी शराब की दुकानें बंद हो गई। मेरी इस सफलता का यह प्रभाव यह पड़ा कि मैं अंग्रेजी हुकूमत की आँखों में चुभने लगी। 1932-33 का ज्यादातर समय जेल की सलाखों के पीछे ही गुजरा। मुझे बिजलपुर जलकपुर के अध्यक्ष पद के लिए भी शामिल किया गया। मेरा मानना है - - - 'खुशी तब होती है जब आप क्या सोचते हैं, आप क्या कहते हैं और आप क्या करते हैं, सद्भाव में है।' गांव गांव में जाकर सफाई अनुशासन पढ़ाई आदि का महत्व बताती थी, दवाइयों का वितरण भी करती। बापू के अधिकतर उपवासों में उनके खाने पीने का ध्यान रखती। 1942 की बात है जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बापू गिरफ्तार कर लिए गए तो मैंने मुंबई के शिवाजी पार्क में भाषण देने का निश्चय भी किया लेकिन मुझे भी गिरफ्तार कर लिया गया और पूणे के आगा खाँ महल में रखा गया।बापू भी वहीं थे। 1944 में दो बार मुझे हृदय का दौरा पड़ा। सरकार ने आयुर्वेद डॉक्टरों का प्रबंध भी किया लेकिन 22 फरवरी 1944 को बड़ा दिल का दौरा पड़ा और मैं भारत की आज़ादी का स्वप्न लिए ही चल बसी। जहां प्यार है, वहाँ जीवन है। मेरा परिवार, मेरे चार पुत्र हरिलाल, देवदास, मनिलाल और रामदास गांधी अवश्य ही स्वतंत्र भारत में तिरंगा फहराएंगे। बापू की तपस्या विफल नहीं जाएगी। वंदेमातरम।

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