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Thursday, August 5, 2021

गीतांजलि श्री

गीतांजलि श्री के कृतित्व की एक झलक - - - गीतांजलि श्री का मानना है कि साहित्य तो है ही व्यंजना और लक्षणा का खेल। जानी-मानी कथाकार और उपन्यासकार गीतांजलि श्री केअब तक पांच उपन्यास और पांच कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं;उनकी कृतियों के जर्मन,फ्रेंच और अंग्रेजी भाषाओं मेंअनुवाद हुए हैं तो कई कृतियों पर इतालवी,कोरियन और रसियन भाषाओंमें काम हुआ है। हाल ही में प्रकाशित ‘रेत समाधि’को सब बंधन तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। फ़्रेंच में अनुदित किताब अलग जीवन शैली व संस्कृति वाले लोग पढ़ेंगे और उनकी सोच व समझ कृति में नए आयाम खोलेगी। कृति नए सिरे से जीवन पाएगी। ये लेखिका उपलब्धि मानती हैं । ख़ास अच्छा तब लगता है जब विदेशी पाठक अपनी संस्कृति से भिन्न जीवन में वह पाते हैं जो अलग दिखता है पर उनके अनुभव का हिस्सा भी है, यानी वे बातें जो विशेष होकर भी सार्वजनिक हैं और महज़ इंसानी। पराया भी अपना है! इसके पहले मेरे दो और उपन्यास फ़्रांसीसी में आ चुके हैं और मैं ख़ुशक़िस्मत हूं कि दोनों अनुवादकों से मेरा अच्छा सम्बंध बन गया है। एक हैं जानी मानी हिंदी की विदुषी प्रोफ़ेसर आनी मौंतो जो पेरिस में हैं, और दूसरे हिंदी पढ़ाते हैं स्विटज़रलैंड में, निकोला पोत्ज़ा। दोनों हिंदी साहित्य और हिंदुस्तान से ख़ूब परिचित हैं और कुछ हद तक भारतीय बन चुके हैं मेरी पुस्तक ‘सांस लेती अपनी दुनिया’ में भी ‘वास्तविक जीवन’ की हार्दिक ही बात है। सर्जन क्रिया में कल्पना और वास्तविक जीवन का विचित्र खेल चलता है और अगर एकदम सपाट साधारण लेखन की बात छोड़ दें तो ऐसा नहीं होता कि बस जीवन से सीधे सीधे चरित्र उठाया और साहित्य में बैठा दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत से तत्व मिलते हैं और साहित्य और उसमें आते चरित्र, घटनाएं, इत्यादि जन्मते हैं। अक्सर वास्तविक जीवन के अनेक चरित्र मिलके एक चरित्र निर्मित हो जाता है। सर्जक की कल्पना वहां काम करती है। असल बात यह है कि साहित्यकार अपने आसपास के जीवन से लेते हैं पर उसका अतिक्रमण भी करते हैं और उनकी कल्पना इस मिश्रण को जीवंत कर देती है और असल का विस्तार करती है। यह भी कहूंगी कि साहित्यकार को जीवन की सम्भावनाएं, जो हो सकता है अभी हासिल में नहीं आयी हों, भी प्रेरित करती हैं। ये सम्भावनाएं अच्छाई की भी हो सकती हैं और बुराई की भी। साहित्यकार उत्साहित भी कर सकती है, चेतावनी भी दे सकती है। यही कारण है कि भविष्य अक्सर साहित्य में प्रतिध्वनित होने लगता है। जॉर्ज ओरवेल का साहित्य हो या हमारे यहां टैगोर का गोरा । हिंदू समाज को अभी तक उसका गोरा नहीं मिला है, पर है वह कितना परिष्कृत, परतदार, गहरा चरित्र, और कितना ज़रूरी हमारे उद्धार के लिए। रेत समाधि में आप एक जगह लिखती हैं कि- “बेटियां हवा से बनती हैं। निस्पंद पलों में दिखाईं नहीं पड़ती और बेहद बारीक एहसास कर पाने वाले ही उनकी भनक पाते हैं।” गीतांजलि श्री के लेखन में ढेरों गूंज अनुगूंज हैं। एक बात यह कि बेटियों/औरतों को पुरुष-प्रधान समाज में अनदेखा किया जाता है या ख़ास ‘नज़र’ से देखा जाता है, उस नज़र से नहीं जो स्त्रियां चाहती हैं और जिसकी वे हक़दार हैं। उनका मानना है कि नयी नज़र हो,लड़की पहचानी जाए, उसकी बारीकी दिखे। महिलाएं पुरुष से अलग हैं, कितने अलग, किन बातों में अलग, इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है और वो निर्णायक बात से ज़्यादा एक चर्चा और बहुतेरे आयाम खोलने की बात है। समाज और संस्कृति ने किस तरह उन्हें अलग अलग जीव और पहचान बनाया है, वह चर्चा भी होनी होगी। उसकी जगह यहां नहीं है। अभी नहीं। वे अलग हैं, किन मायनों में हैं, किन मायनों में नहीं, इससे बराबरी की मांग पर फ़र्क़ नहीं ज़रूरी। मैं अलग हूं तो भी बराबरी मांगूंगी। बराबरी यह नहीं कि औरत के भी शिश्न हो और पुरुष के भी स्तन। बल्कि यह कि किसी भी सूरत में दोनों के समान अधिकार हों, समान विकल्प हों, चुनाव की एक-सी आज़ादी हो। हिंदी साहित्य में किसी नए क्राफ्ट,नए शिल्प या बुनाई के प्रयोग कम ही होते हैं। लेकिन रेत समाधि में आपने सब बंधन को तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। आपका मानना है कि रचना तब सशक्त होती है जब वह अपना विशिष्ट स्वर पा लेती है,अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है,अपनी चाल निर्धारित कर लेती है। रचनाकार को अपने को निमित्त बनने देना पड़ता है। ख़ुद को स्वतंत्र छोड़ने का उपक्रम करती हैं और कृति कोख रस्ते, भाषा, शिल्प-शैली चुनने देती हैं। मगर यह किसी अराजकता का पालन करना नहीं है। आपका अंतर्मन, लेखक-मन, चेतन-अवचेतन, संवेदना, सूझबूझ, कल्पना-शक्ति, प्रज्ञा, यह सब रचना शक्ति को तराशते रहते हैं और अभी भी तराश रहे हैं। आपका अंतर्मन अनजाने उन्हें गाइड करता है। अराजक होने से रोकता  है, साहस करने को उकसाता है, जोखिम लेने को भी, मगर धराशायी होने के प्रति चेताता भी है, पांसा ग़लत भी पड़ सकता है, पर वह सृजनधर्म में निहित है। और चैलेंज वही है कि संतुलन मिले पर ऊबा हुआ, रगड़ खाया, सपाट घिसा पिटा अन्दाज़ और ढब न बने। आपको रामानुजन का यह कथन बेहद प्रिय है कि-कि मैं कविता का पीछा नहीं करता,अपने को ऐसे ‘माहौल’ या ‘जगह’ में स्थित कर देता हूँ कि कविता मुझे ढूंढ़ लेती है। जैसा उस्ताद अली अकबर ख़ां ने कहा है – शुरू करता हूं तब सरोद मैं बजाता हूं, फिर सरोद मुझे बजाने लगता है। जहां उपन्यास रेत समाधि ने बंधन तोड़े हैं तो वह उसका अपना तलाशा और पाया हुआ सत्य है। अगर वह विश्वसनीय, ज़ोरदार बन गया, अपना व्यक्तित्व पा गया। सात साल बाद रेत समाधि राजकमल से प्रकाशित हुआ जो 'डूबना’ डुबा नहीं गया, कोई ‘मोती’ तल से भंवरता आख़िरकार ऊपर आया और हाथ लगा। शायद पाठकों के भी।

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