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Thursday, August 5, 2021

देखो! ऋतुराज वसंत आ गया - लेख

देखो! ऋतुराज वसंत आ गया -- डॉ. वसुंधरा मिश्र न जाने अंतरिक्ष की लहरों में लहराता - बहता मादक, मधुर और मदिर मधुमास जीवन के उदास सूने वन खंड पर कब उतर आया! कामायनी में प्रसाद जी ने अंधकार को चीर कर आने वाले वसंत के प्रकाश की ऊर्जा को पहचाना है - - - "मधुमय वसंत जीवन - वन में बह अंतरिक्ष की लहरों में कब आए थे तुम चुपके से रजनी के पिछले प्रहरों में? " चारों ओर मस्ती और मादकता छा गई । प्रीत और गीत से , राग और अनुराग से, रंग और तरंग से, चंग और मृदंग से, गुंजार और झंकार से वन और जीवन भर गए हैं। प्रकृति सुंदरी अपनी अनुपम साज सज्जा से थिरक उठी है। चारों और हरित दुकूल बिछ गया है। "सुमन निकुंजन में" कुंजन के पुंजन में गुंजन मिलिंदन को वृंद मतवारो हैं "। बसंत के मादक वर्णन में कवियों की कल्पना भी झूम उठी। अनुराग के राग में रंग कर, प्यार में डूब कर नूतन झंकृति व वर्णन छटा लेकर थिरकती हुई आई - - - - " ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजित कुंज कुटीरे विहरति हरिरिह सरस वसंते नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरही जनस्य दुरंते।" ऐसा मदिर वातावरण, सरस वसंत और उसमें युवतियों के साथ नृत्य में निरत रसेश्वर हरि! मधु गंध लोभी मधुपों के भार से हिलती झूमती सहकार मंजरी! मैथिल कोकिल विद्यापति ने भी गाया है--- " नाचहु रे तरुणी तजहु लाज। आएल वसंत रितु बनिक राज।।" " अरी तरुणियों! नाचो, खूब नाचो , देखती नहीं वसंत आ गया! ना अब लाज नहीं! " साल भर जीवन की धारा बंधी हुई, घुटी हुई चलती है। वसंत में जीवन की धारा उफनती, कूलों को डुबोती, झूम कर बहती है, गाती हुई नाचती हुई । उन्मत्त और प्रमत्त! भौरों की गुंजार लगती है, घंटावली बज रही हो, रस की धारा मद जल सी झरती है, कुंजों से आती हुई धीमी - धीमी मादक समीर ऐसी लगती है मानो मदोन्मत्त झूमता हुआ गजराज हो। चारों ओर लताओं पर भौरों के झुंड के झुंड अंधे मतवाले हो टूटे पड़ते हैं। बिहारी ने बहुत ही सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है - - - "छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध। ठौर ठौर झौंरत झंँपत, भौंर भौंर मधु अंध।।" वसंत के त्योहार - - - "ऋतुनाम् कुसुमाकरः ।" भगवान कृष्ण ने भी ऋतुओं में अपने को "कुसुमाकर" बताया है। कुसुमाकर, सचमुच यह ऋतु कुसुमों का आकर है। पीले और लाल फूलों की बहार चारों ओर अनुराग को बिखेर देती है। हजारों वर्ष पूर्व वसंत के त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाये जाते थे। वसंत का अर्थ है" वसन्यत्र मदनोत्सव।" जिसमें मदनोत्सव बसता है, वह वसंत है। इसी के अन्य नामों में पिकानंद, माधव, पुष्प समय आदि है। वसंत ऋतु के प्रमुख त्योहार - - - - इस ऋतु में प्रमुख रूप से वसंतक, कंदर्प पूजा या मदन महोत्सव, पुष्पावचयिका, उदक - क्ष्वेडिका, शाल्मली विनोद, दोला , होली या होलिका, अग्नि उत्सव, ढौंढा, उद्यान यात्रा , सलिल क्रीड़ा आदि मनाए जाते हैं। वसंतक त्यौहार वसंत पंचमी का पुराना नाम है। यह वसंत की अगवानी करने का शुभ दिन है । इस ऋतु का सबसे मद भरा त्यौहार है मदनोत्सव। सारा संस्कृत वांग्मय इस त्यौहार के उन्मादक रस से आपूरित है। फूलों को चुनना भी सविधि संपन्न होता है । चैत्र के प्रारंभ में यह त्योहार राजस्थान में धूमधाम से मनाया जाता है । "ओ कुण फुलडा़ बीने जी" कहकर हजारों कुमारियां आज भी राजस्थान में पुष्प चयन करती हुई या फूलों के अभाव के कारण पत्तों को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। अशोक इस ऋतु का प्रधान वृक्ष है जिसके नीचे मन्मथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती थी और जो साभरणा किसी सुंदरी के अलक्तक" रंजीत नुपूरों" से छम-छम की ध्वनि से ध्वनित वाम चरण के कोमल आघात को पाकर ऊपर से नीचे तक लाल लाल पुष्प स्तवकों से भर जाता था। इसी का नाम अशोक दोहद या अशोकोत्तंसिका है । बांस की नाली को रंगीन जल से भर दूसरों पर रंग डालना "उदक क्ष्वेडिका" कहलाती है। शाल्मली के नीचे लुकने - छपने की क्रीड़ा - शाल्मली मूल खेलन या शाल्मली विनोद है। दोला उत्सव ही आगे चलकर होली का त्योहार हो गया होगा। दोला उत्सव में होली का दहन प्रमुख है । इस प्रकार का अग्नि उत्सव संसार के अन्य देशों में भी प्रचलित रहा है। ढौंढा एक राक्षसी मानी गई है, जिसके दहन का वर्णन आता है। उद्यान क्रीड़ा व सलिल क्रीड़ा भी वसंत की मस्ती भरी उमंग का द्योतक है। हास परिहास के साथ मन की रुद्ध वासनाओं, अचेतन मानस की दमित इच्छाओं या कुंठाओं को भी बाहर निकालने का भी यह त्योहार है जिसमें अनजाने में अश्लील कथन की भी खुली छूट मिल गई है। यह अस्वस्थ चिंतन के प्रतिफल हैं । अबीर व गुलाल के स्थान पर राख व कीचड़ , प्रेम भरे गीतों के स्थान पर अश्लील रासक, चर्चरी चांचर या कबीरा का गायन - हमारी मानसिक रुग्णता का उद्घोष है, जिसको हम झांझ व झल्लरी के झनकारो, गंभीर घोषों वाद्यों के निर्घोषों और नृत्यों में बजते घुँघरू के स्वरों में छिपा नहीं सकते। मदन पूजा - - - वसंत ऋतु का प्राण स्वर है - - - मदन पूजा। मन को मथने वाला, मन में पैदा होने वाला, भगवान कन्दर्प की पूजा ही वसंत ऋतु का कामदेव है जो हमेशा ही देवता रहा है। मद से भरी आंखों वाला कंदर्प, इक्षुदंड जिसका धनुष, माला से गुंजरित प्रत्यंचा वाला, अरविंद, अशोक आम्र मल्लिका और नीलोत्पल के पांच बाण धारण करने वाला पंच शायक या उन्मादन, शोषण, स्तंभन, सम्मोहन और तापन के पांच बाणों वाला, हाथों में आम्र के नव पल्लवों में छिपकर अमोघ शर संधान करने वाला कामदेव ही है। रति प्रीति शक्ति और उज्ज्वला चार पत्नियों का स्वामी और अष्ट भुजाधारी है यह दर्प से भर देता है इसलिए कंदर्प। भगवान कृष्ण ने अपने को काम बताया है और काम को महिमामंडित किया है - - - "धर्माविरुद्धो लोकेस्मिन् कामोस्मि भरतर्षभ ।" 'हे भरत श्रेष्ठ! इस लोक में धर्म के अनुकूल काम मैं ही हूँ।' श्री हर्ष ने कुसुम आयुध पूजा की बहुत मनोरम दृश्य अपने ग्रंथ "रत्नावली" में किया है। जहां मकरंद से भरा उद्यान है, आम्रकानन है, कोयल की गूंज की झंकार है, भ्रमर पंक्ति से गुंजरित पागल सी बहने वाली मलय बयार के लिए झकोरे हैं। सुंदरियों के मदभरे नृत्य, नृत्य के वेग से केश पाश खुल रहे हैं और पुष्प स्रक बिखर कर नीचे गिर पड़े हैं। नर्तकी उन्मत्त हो, मदमस्त हो अपने स्तन भार से झुकी जा रही है, कंपायमान हो रही है। तभी तो विदूषक का भी मन नाचने और चर्चरी गाने को करने लगा है। वसंत में सभी बेठिकाने हो गए हैं। आज मदनोत्सव है न, कहीं गीतों का स्वर, कहीं नुपुरों की रुनझुन, वस्त्र स्खलित, अस्फुट वाणी - - - सभी तो क्षीबा हैं, किसी को होश नहीं रहता। "संदेश रासक" में भी चर्चरी, ताल, नाच, खेल, रुनझुन करने वाली किंकिणी से भरे वसंत का वर्णन है। यही वसंत ऋतु है जहां कुछ भी पुराना नहीं है, सभी नये होते हैं। विद्यापति ने कहा - - "नव वृन्दावन नव नव तरुगन नव नव विकसित फूल नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलिकूल ।" भारतीय संस्कृति में काम और वसंत त्यौहार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में भी प्रेम और काम का सूक्ष्म रूप वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही सृष्टि व्यापी हो चला है। अब काम देवता अपदेवता नहीं रहा, वह जीवन का देवता बन गया है। भारतीय मनीषा का निष्कर्ष था - - "काम मंगल से मंडित श्रेय"

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