Powered By Blogger

Monday, February 19, 2024

बंगाल में हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका

बंगाल में हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका - - स्त्रियों को 19वीं शताब्दी तक भी रंगमंच में प्रवेश क्यों नहीं मिला जिनके लिए गाना बजाना या नृत्य करना अपने जीवन यापन का एक साधन था। इस प्रश्न के जवाब में यह कहा जा सकता है कि ऐसी स्त्रियां गाने बजाने में तो ठीक थी लेकिन अभिनय के क्षेत्र में दक्ष नहीं थी या फिर यह स्वयं को प्रसिद्धि से दूर रखना चाहती थीं । सभी जानते हैं कि वक्त और आवश्यकता लोगों की सोच को बदल देती है। शायद यही कारण था कि पारसी थिएटर अपनी व्यावसायिक आवश्यकता के कारण स्त्रियों के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए मजबूर हो गया। पारसी थिएटर एक व्यावसायिक थिएटर था जो अपने आर्थिक लाभ के लिए अधिक संख्या में दर्शन की आकांक्षा रखता था। शायद इसलिए वह अपने नाट्यमंचन को मंध्यवर्गीय जनता के मनोरंजन हेतु विस्तार देता है जो इसके पूर्व धनी लोगों तक ही सीमित था। जब मध्यवर्गीय जनता पारसी थिएटर की दर्शक बनी तो उसमें लगातार महिला दर्शकों की बढ़ोतरी हो रही थी। पारसी थिएटर में भी स्त्री पात्रों की वेशभूषा तथा अन्य रंगमंच पहलुओं को भी स्त्री दर्शकों के नजरिए से भी देखने लगा। पारसी रंगमंच में पहली बार हलचल मच गई जब उसमें मेरी फैंटम नामक एक एंग्लो इंडियन अभिनेत्री को लाया गया। रंगमंच के क्षेत्र में एक महिला के प्रवेश को लेकर तमाम थिएटर मालिकों के मध्य एक युद्ध सा छिड़ गया। उस समय रंगमंच में इस प्रवेश को लेकर काफी विरोध का माहौल बना जिसकी झलक हमें सुनाई पड़ती है। केन कब्र पारसी समुदाय के एक समाज सुधारक होने के साथ-साथ नाटककार भी थे। इन्होंने गुजराती भाषा में कई नाटकों की रचना की तथा 1868 ईस्वी मेंएक नाटक क्लब की स्थापना की जो बाद में विक्टोरिया थीएट्रिकल कंपनी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन इन्होंने 1976 ईस्वी में सिर्फ इसलिए एक नाटक कंपनी की स्थापना की क्यों की विक्टोरिया थीएट्रिकल कंपनी की मालिक दादी पटेल द्वारा इस कंपनी में स्त्रियों को अभिनय करने हेतु प्रवेश दे दिया गया। एक बार दादी पटेल को हैदराबाद में नाट्य मंचन हेतु आमंत्रित किया गया था। वहां से लौटते वक्त इन्होंने कई गाने वालों को अपने साथ ले आए और कंपनी में रख लिया जो की के एन कबरा को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि रंगमंच की पवित्र दुनिया वेश्याओं के अभिनय से दूषित हो जाएगी। लेकिन रंगमंच के लिए या खुशी की बात थी कि पुरुष वर्चस्व की परंपरा को तोड़ते हुए पारसी थिएटर द्वारा इस क्षेत्र में स्त्रियों का प्रवेश प्रारंभ हो गया।। उन्हें लगता था कि स्त्री कलाकारों की सुरक्षा करना महंगा पड़ता है क्योंकि पारसी नाटक मंडली के एक महिला कलाकार के साथ कुछ ऐसी घटना घटित हो गई थी। 1872 ईस्वी में लतीफा बेगम नामक एक महिला के साथ इंद्रसभा नाटक का मंचन किया था महिला एक नृत्यांगना थी। इस नाटक में लतीफा बेगम ने परी की भूमिका निभाई थी। नाटक के समाप्त होने के बाद जब वह मंच से बाहर निकली तो किसी पुरुष द्वारा उसका अपहरण कर लिया गया। इस तरह किसी महिला कलाकार का अपहरण हो जाने से रंगमंच जगत में सनसनी फैल गई। इस तरह की घटनाएं छिटपुट थी। लेकिन पारसी रंगमंच ने स्त्रियों के लिए अभिनय का द्वार खोल दिया था जो की एक सराहनीय प्रयास था। पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर वहां के लोग कहीं न कहीं दो गुट में बंट गए थे। 1873 ईस्वी में सरस चंद्र घोष तथा बिहारी लाल चट्टोपाध्याय ने परस्पर मिलकर बंगाल थिएटर नाम से एक कंपनी की स्थापना की और उसमें बंगाली थिएटर में स्त्रियों को भी प्रवेश दिया जाए ऐसा कहा गया। अनेक समाज सुधार द्वारा विभिन्न प्रकार के उस समय समाज सुधार कार्यक्रम चल रहे थे। इन दिनों में बंगाल में माइकल मधुसूदन दत्त और ईश्वर चंद्र विद्यासागर समाज सुधारक के रूप में कार्य कर रहे थे। रंगमंच में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर इन दोनों का मत बिल्कुल अलग-अलग था। मधुसूदन दत्त स्त्रियों के प्रवेश के पक्ष में थे वहीं ईश्वर चंद्र विद्यासागर इसके विरोध में थे। वे रंगमंच में वेश्याओं के प्रवेश के खिलाफ थे। इसी कारण उन्होंने उस समिति से त्यागपत्र दे दिया जिस समिति ने स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की। इसके बाद थिएटर में कोलकाता के रेड लाइट इलाकों से कई वेश्याओं को शामिल किया गया। इनमें से अभिनेत्री शर्मिष्ठा ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया और इस नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचा।इस नाटक की सफलता के बाद कई दिनों तक समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिखा जाता रहा। जनवरी 1874 ईस्वी में अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा कि बंगाल थिएटर सम्राट बंगाली समाज के लिए नई चीज है। यह अत्यंत सुखद और खूबसूरत प्रयास है कि महिलाएं स्त्री पात्रों की भूमिका अदा करें। पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश का कहीं न कहीं विरोध हो रहा था। स्त्री समर्थकों में एक नाम किरण चंद्र दत्त का है। यह बंगाल थिएटर के साथ नाटककार और निर्देशक के रूप में कार्य कर रहे थे। इनका कहना था कि यूरोप में कई लोग ग्रहणी महिलाओं को अभिनय को एक पेशे के रूप में अपने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसलिए हमें भी अपनी महिलाओं को अभिनय हेतु स्वतंत्रता देनी चाहिए। हिंदी नाटक और रंगमंच के शुरुआती दिनों में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली नाटक की रचना कर स्वयं इसका मंचन करते थे परंतु स्त्रियों को लेकर उनके मन में वही भावना थी कि स्त्रियों को रंगमंच के क्षेत्र में नहीं रखना चाहिए। भारतेंदु युग के दौरान नाट्य मंचन की जो लहर चली थी उसमें भी स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे। इसलिए इस दौर में भी किसी स्त्री का जिक्र नहीं होता।रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के साथ हो रहे इस भेदभाव के प्रश्न को सर्वप्रथम कुमारी सत्यवती ने अपने एक लेख के माध्यम से उठाया। यह लेख माधुरी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और प्रश्न उठाया कि हिंदी रंगमंच पर स्त्रियां क्यों नहीं? इसके अतिरिक्त जिन्होंने पुरुषों द्वारा स्त्रियों की भूमिका निभाई जाने का भी विरोध किया। इन्होंने अपने लेख में लिखा कि जिस प्रकार जीवन स्त्री एवं पुरुष दो भागों में विभक्त है तथा जीवन के हर कार्य में स्त्री तथा पुरुष दोनों को भाग लेना पड़ता है उसी प्रकार रंग नाटक में भी जीवन के सुख और दुख दोनों दिखाए जाते हैं। अतः स्त्री एवं पुरुष दोनों को भाग लेना चाहिए।

No comments:

Post a Comment