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Thursday, February 1, 2024

मुक्तक वसुंधरा मिश्र

मुक्तक भाव *भयंकर जंगल में रास्ते दिखाई नहीं पड़ते शहरों में रोशनी से भरे रास्ते करते हैं गुमराह *बेइंतहा प्यार करती हूं गुले गुलजार से एक शरीर दो जान हैं हम कह कह थकते नहीं दौर आज वह खत्म हो चला मौसम भी बदले हैं दृष्टि भी बदली है हकीकत की जमीन पर पांव रखते ही प्यार की जमीन पर पैर धसने लगे हैं गहरी खाई का एहसास होने लगा है *जिंदगी क्यों हो जाती है इतनी खौफनाक कि उसे रोंदने की इच्छा होती है *वह लड़का बालों को झटकता पैरों को पटकता सड़कों पर लगा रहा था चक्कर घर से परेशान लगा *विद्यार्थी अब वैसे नहीं है जैसा हम सोचते हैं व्यावसायिक बन हमें खरीदते हैं *प्रेम मायावी है हकीकत जमीन पर चलना सिखाती है *उनके कदमों की आहट पाकर मन मयूर नाच उठता है वही तो प्राणों का स्पंदन है *परिस्पंद से बहती हवा अपनापा को साथ ले चलती अब शमशान सी खामोशी है वहां अब वह नहीं है *ट्रेन से जाती हुई धूप कब किसी को साथ रखती है वह तो फिर मिलेंगे कह कर हाथ हिलाती है

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