Thursday, February 1, 2024
उमा झुनझुनवाला के नाटक के विषय में
उमा झुनझुनवाला
यह महज लेखिका की डायरी नहीं, बल्कि यह किसी भी स्त्री के विश्वास और उसके टूटने तथा उससे उपजी मनस्थितियों के आरोह-अवरोह, द्वंद्व, विषाद, दृश्य-अदृश्य की पीड़ा आदि का लेखाजोखा है, जहां एक औरत के भीतर जीती दो औरतें या फिर एक औरत के भीतर जीती कई-कई औरतें बड़बड़ाती-सी प्रतीत होती हैं। इसके पन्नों में दर्द की अपनी कहानी है, जो एक पात्र से निकल कर दूसरे से होते हुए कई जानी-अनजानी स्त्रियों को छूते हुए, उन्हें कुरेदते हुए पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ती है। इन पन्नों में औरतों के मनोभावों को समझने का प्रयास है और इसीलिए इस डायरी के पन्नों को न तो किसी तारीख में बांधा गया है और न ही दिन में। उन्होंने इसके कुछ पृष्ठों का मंचन भी किया है।
तीन नाटक विसर्जन भीगी औरतें लम्हों की मुलाकात
लाल फूल का एक जोड़ा उमा झुनझुनवाला सीमा सिंह मामूली लड़की नहीं थी उसके व्यक्तित्व में एक ख़ास आकर्षण था बातचीत का सलीका ऐसा कि सुनने वाला उसके असर से बंध जाए जबकि आवाज़ में कोई एक रेशा ऐसा भी मिश्रित रहता कि उससे बंध कर भी सुननेवाला नियंत्रण की हद में ही रहे और आँखे तो लगता है ईश्वर ने किसी ख़ास मकसद से ही बनाई थी, गज़ब का चुम्बकीय आकर्षण था उन आँखों में काजल लगी आँखें प्रतीत होती जैसे समंदर में तिरती कोई नौका शहर के प्रतिष्ठित आनन्द मोहन राय कॉलेज के फाइनल इयर की विख्यात छात्रा
रेंगती परछाई -एक बेवा और उसके तीन अधेड़ बेटियों की कहानी है ।घर के चप्पे-चप्पे पर रेंगती परछाई के इर्द-गिर्द घूमती है। जहां सभी को एक पुरुष की कमी खलती है। घर के सन्नाटे को दूर करने के लिए वे सभी बेटियां भोग विलास के लिए एक-एक करके मां के शौहर ऑफिज से रिश्ता बना लेती है।बाद में छोटी बेटी यह राज़ खोलती है।
तुम्हे याद है न..
उमा झुनझुनवाला
जब नदी किनारे हम मिला करते थे तो नदी लहराती हुई हमारे क़दम चूमने आ जाती थी अब तो कई युग बीत गए तुम्हे याद है न... हरी घास पर बैठे जब हम गिन रहे होते थे रूमानी घड़ियाँ हरी घास कैसे कैसे गुलाबी हो जाया ...
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment