Thursday, February 1, 2024
भारतीय पुनर्जागरण कुछ तथ्य
भारतीय पुनर्जागरण का प्रादुर्भाव पहले बंगाल में और फिर महाराष्ट्र में हुआ ।राजा राममोहन राय से प्रारंभ हुए पुनर्जागरण आंदोलन के प्रबल हस्ताक्षर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पुनर्जागरण का समय कुछ ऐसे बुद्ध जीवी भी सामने आए जो अपनी भाषा अपने भाषा क्षेत्र के जागरण के लिए प्रश्न सेल रहे जिससे उन्होंने अपना बनाया ।
डॉक्टर मैनेजर पांडे ने लिखा है कि नव जागरण की केंद्रीय विशेषता है स्वाधीनता की चेतना ।भारतीय नवजागरण में रचित नानक रूपों में व्यक्त हुई है। उसका सबसे व्यापक रूप उपनिवेशवाद विरोधी भावना के जागरण में दिखाई देता है। उसी का दूसरा रूप आत्मा लोचन की प्रवृत्ति के विकास में भी मिलता है ।यह आत्मलोचन की प्रवृत्ति भारतीय समाज संस्कृति और साहित्य के अतीत के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत और अतीत के भोग तथा बोझ में अंतर के समझ और उसे बोझ से मुक्ति के आकांक्षा में प्रकट होती है ।आत्म लोचन की प्रवृत्ति का लक्ष्य भी उपनिवेशवाद विरोधी चेतना को अधिक तेजस्वी और सत्य बनाना है।
केवल प्रशंसा कर देना ही समालोचना है तो अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। झूठे गुणवान से कोई बात स्पष्ट नहीं होती है। प्रखर राष्ट्रवादी होते हुए भी समालोचना के दौरान भारत की झूठी प्रशंसा इतिहास के अनुभव के बिल्कुल विरोधी है। राजनीति शिक्षा सुशासन गणित ज्योतिष भूगोल शिल्प प्रसाद आदि में संपूर्ण संसार का शिक्षण है जिसमें सब प्रकार के विषय में पूर्ण उन्नति कर ली है ।उसके लिए कोई भी विषय सीखने को नहीं बचा है।
सम्मान किसे कहते हैं इस कहानी में स्वतंत्रता और प्रसन्नता के भागों का द्वंद है ।साथ ही स्वदेश प्रेम और देशद्रोह के बीच का भी द्वंद है ।सप्रेजी की कहानी आजम उसमें भी एक उद्देश्य मिलता है एक टोकरी भर मिट्टी कहानी सामाजिक कन्या अत्याचार असमानता को दिखाने वाली अमर कहानी है। आकार में छोटी होने के बावजूद भी कहानी बहुत बड़ी बात कह जाती है।
भारत में राष्ट्रीयता की भावना एवं राष्ट्रवाद के उदय के पीछे एक प्रमुख और शक्ति 19वीं शताब्दी का पुनर्जागरण आंदोलन और उस समय प्रवाहित विभिन्न चिंतन धाराएं थी। जैसे वैदिक काल में और हमारे पुराण साहित्य में संस्कृत भाषा के प्राचीन ग्रंथों में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का वर्णन मिलता है ।परंपरा से गया जाने वाला संस्था अखंड भरता है यह वाक्यांश से समाप्त होता है रामायण महाभारत बृहद संहिता कालिदास के महाकाव्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र पतंजलि के महाभाष्य जैसे हमारे ग्रंथो में भारत का वर्णन मिलता है
इतना सब होने के बावजूद जिन औरतों में राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता को परिभाषित किया गया है ऐसी राष्ट्रीय वाहनों के दर्शन आधुनिक काल में ही दिखाई देते हैं अंग्रेजी साम्राज्यवाद बाधक के साथ सड़क विषय दुआ क्योंकि इसी शासनकाल में भारतीयों ने नव जागृति का संदेश सुना
यह संभवत राष्ट्रीयता के पहले चिंगारी है जो भारत के समष्टि और अस्मिता के लिए तंत्र महत्वपूर्ण और कालजई है राम मंदिर के प्रतिष्ठा यह एक नए युग की शुरुआत और एक नए तर्क के आधार पर अपनी बात को करना इस बात को दर्शाता है
ब्रह्म समाज की स्थापना 20 अगस्त 1828 में हुई राजा राममोहन राय ने कोलकाता में की और बहुत सी रूढ़िवादी दीवारों को ध्वस्त किया हिंदू धर्म को नवजीवन प्राप्त हुआ और अन्य धार्मिक सुधारो को बल प्राप्त हुआ सती प्रथा बाल विवाह बहु विवाह अल्पी विवाह जाति प्रथा पर्दा प्रथा अस्पृश्यता नशा आदि सभी कुरीतियों का विरोध किया गया ब्रह्म समाज आंदोलन भारतीय संस्कृति के महान आंदोलन में से एक है दिनकर जी ने यह कहा क्योंकि यूरोप से आने वाले अनेक विचारों ने आरंभ में ब्रह्म समाज के भीतर से ही हिंदू धर्म में प्रवेश किया समाज सुधारक कार्य किए गए जिसमें आर्य समाज वालों ने कहा कि वेद ही सत्य ज्ञान के स्रोत हैं मूर्ति पूजा का खंडन किया तीर्थ यात्रा और तरवाड़ का विरोध किया कम और पुनर्जन अथवा जीवन के आवागमन के सिद्धांत में विश्वास किया स्त्री शिक्षा में विश्वास किया बाल विवाह विधवा बहु विवाह का विरोध किया हिंदी और संस्कृत भाषा के प्रचार का प्रयास किया तो यह हिंदू धर्म और भारतीय समाज के सुधार हेतु महत्वपूर्ण कार्य हुए थेरामकृष्ण परमहंस का जीवन और विचार इस मिशन की आत्मा है हम देखते हैं कि स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस इन्होंने ना कोई धर्म चलाया नंबर चलाएं नवीन धार्मिक सिद्धांतों को जन्म दिया वह तो साधारण तरीके से अपने उपदेश देते थे और उन्हें उपदेशों में उनके धार्मिक विचारों का पता चल जाता था उनका कहना था कि मनुष्य का मूल लक्ष्य ईश्वर की प्रति होनी चाहिए जो अध्यातवाद के द्वारा होता है उनका कहना था कि संसार में रहो कार्य करो और इच्छाओं का दमन करने के स्थान पर उनको ईश्वर की प्राप्ति में लगाओ वह ज्ञान से अधिक चरित्र निर्माण पर बल देते थे वेदों और उपनिषदों के जटिल ज्ञान को साधारण व्यक्ति के निकट पहुंचा हिंदुओं में अपना प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न किया और सभी धर्म की एकता में विश्वास जागृत करना उनका महत्वपूर्ण कार्य था मनुष्य मात्र की सेवा करना भलाई करना यह परमहंस के संसार को तीसरी महत्वपूर्ण दिन उनके अनुसार सेवा करने वाला नहीं वरन् जिसकी सेवा की जाए उसका स्थान बड़ा होता है फिर उनके विचारों को विवेकानंद ने आगे बढ़ाया
1863 में विवेकानंद ने कोलकाता के धनवान क्षत्रिय परिवार में जन्म लिया अंग्रेजी की शिक्षा पड़ी लेकिन जब रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा के फलस्वरूप उन्होंने सर्व धर्म सम्मेलन में गए। हिंदू अध्यापक का अध्यातवाद का सहारा लेकर हिंदू धर्म समाज और राष्ट्र के निर्माण में सहयोग दिया इतना ही नहीं सभी धर्म के प्रति समान आधार विश्व बंधुत्व का संदेश और भारत के सांस्कृतिक विरासत से समूचे विश्व का साक्षात्कार करवाया विवेकानंद ने कहा कि धर्म प्रत्येक व्यक्ति और समाज के ऐसी आवश्यकता है जो उसके स्वाभाविक प्रकृति की पूर्ति के लिए आवश्यक है एक राष्ट्र की प्रगति का मापदंड भी उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति ही है इसलिए उन्होंने सभी रसों को इसके लिए प्रेरित किया विवेकानंद का चिंतन और धर्म में मानव समाज की सेवा का महत्वपूर्ण स्थान था वह शिक्षा स्त्री पुनरुद्धार और आर्थिक प्रगति के पक्षधर थे निर्धनता शिक्षा अंधविश्वास और रूढ़िवादिता पर उन्होंने कठोरता प्रहार किया वह मानव सेवा को धर्म का प्रमुख अंग मानते थे दिनकर जी ने लिखा है वर्तमान भारत जिस देश को लेकर उठा है उसका सारा आख्यान विवेकानंद कर चुके थे बात के महात्मा और नेता उसे देश को कार्य का रूप देने का प्रयास करते रहे हैं जिस स्वप्न के कवि विवेकानंद थे गांधी और जवाहरलाल नेहरू उसके इंजीनियर हुए
गोस्वामी तुलसीदास जी के साहित्य साधना को तत्कालीन सामाजिक संदर्भ में समझने और समझने का प्रयास करना होगा उनके सामाजिक मूल्य व्यवस्था और विश्व दृष्टि को स्पष्ट करने के लिए उनका अध्ययन करना होगा तुलसीदास जी अपने युग की सामाजिक सांस्कृतिक विकास प्रक्रिया के अपेक्षित अंग थे तत्कालीन समाज के अंतर विरोधों को समझे बिना इस प्रक्रिया को नहीं समझा जा सकता विशेषता द्वैतवादी दर्शन दार्शनिक मान्यता पर आधारित वर्ण आश्रम धर्म संबंधी सामाजिक मान्यताओं के बारे में रहकर मानवता का जितना उत्कर्ष संभव हो सकता है वह तुलसी साहित्य में वर्तमान है अतः यह हमारे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत है इस विरासत में हमारे लिए आज कितना स्वीकार्य और कितना आवश्यक कार्य है इसकी समझ करनी चाहिए
तुलसीदास की रचनाओं में देखा जाए तो तुलसी की सबसे बड़ी उपलब्धि है राम उनके जीवन की मनुष्यता के सर्वोच्च आदर्श राम हमें आज भी प्रेरित करते हैं यह भी राम नहीं है जो मंदिर की मर्यादा भंग करने वाले शुद्ध के गण उतारने के लिए दौड़े थे तुलसी के वास्तविक मनुष्यता से निर्मित राम वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामंती समाज के मानव संबंधों की समूची अचार व्यवस्था का कहीं से भी उल्लंघन किए बिना केवट गुरु निषाद के साथ है कॉल की रात भूल आदि जंगली असभ्यों को भी गले लगाते हैं तुलसी के सजेस्ट आंतरिकता अपने अतिशयुधार और आदर्श क्षणों में प्राय ऐसे ही राम की रचना करती है जिसकी छाया में हम अधिक उदार अधिक नैतिक और महान बन सकते हैं इस राम के लिए हमें तुलसी के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ेगा अपने इस रूप में उनके समस्त साहित्य हमारी महत्वपूर्ण और सांस्कृतिक विरासत है
तुलसी योग इन धार्मिक संदर्भों को अगर हम समझते हैं तो हम पाएंगे कि तत्कालीन सामान्य जनता की दुरावस्था के विरुद्ध उन्होंने यह एकता और समानता की बात करने की जरूरत की थी बौद्ध जैन ईसाई इस्लाम यहूदी आदि मतों के साथी भारतीय निर्गुण सगुण आंदोलन के संबंध में इस तरह से देखे जा सकते हैं यह सर्वे मांग सत्य है कि धर्म जो अपने आरंभिक दौर में साधारण जनता की मुक्ति की आवाज बनकर खड़ा हुआ है कालांतर में वही उसकी धार्मिक सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक दस्त का अस्त्र बना हुआ है
तुलसीदास के पूर्व भारत की धार्मिक स्थिति बड़ी विचित्र रही है इसमें दसवीं सती के आसपास उत्तर भारत में जैन मुनियों सिद्धों और नाथन का पर्याप्त प्रभाव था ई की 15वीं साड़ी के बाद का हिंदी साहित्य भक्ति काल के नाम से जाना जाता है जिसमें ज्ञानेश्वरी और फेमस निर्गुण सभी का योग था तुलसीदास जी ने तभी लिखा
साखी सबदी दोहरा कहि किहनी उपखान
भगती निरूपहिं भगत कली निंदहि वेद पुरान
तुलसीदास जी ने घोर कलयुग का प्रभाव बढ़कर इन सभी साधना पद्धतियों की को निंदनीय ठहराया था इस अवतार वादी वैष्णव भक्ति धारा में अवरोध का प्रमुख कारण रहा शंकराचार्य का पूर्ण अद्वैतवाद और मायावद यह दर्शन वैष्णो भक्ति के प्रवाह में केवल अवरोध ही नहीं बना वर्णन इसने नाथन सिद्धों की साधना पद्धतियों और निर्गुण निराकार के उपासना को प्रोत्साहन दे दिया शंकराचार्य ने ब्रह्मा और जीव को पूर्ण अद्वैत बढ़कर जगत को मिथ्या सिद्ध कर दिया था और इस तथ्य के ज्ञान को ही मोक्ष का साधन बताया था वैष्णो भक्ति के प्रयास सभी आचार्यों ने शंकराचार्य के उक्त मान्यता का खंडन किया था और ब्रह्म को ज्ञान के स्थान पर भक्ति का विषय बनाया इनमें चार आचार्य आते हैं रामानुज निंबार्क माधवाचार्य और वल्लभाचार्य इन सभी आचार्यों ने कर्मकांड आचार्य बहुत शगुन उपासना अवतारवाद आदि का प्रतिपादन किया और ज्ञांन के अपेक्षा भक्ति को और निर्गुण निराकार की अपेक्षा शगुन सरकार को महत्व दिया रामानुजाचार्य का दार्शनिक मत विशिष्ट अद्वैतवाद हैवह जीव से ब्रह्म की विशिष्ट सट्टा स्वीकार करते हैं उनके अनुसार ब्रह्म सर्वशक्तिमान है और जीव अल्प शक्तिमान ब्रह्म सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ है ब्रह्म महान है और जीव शुद्ध है यदि भी उन्होंने भी शंकर की भांति है ब्रह्मा जी के अध्यक्ष सत्ता को शिकार किया है लेकिन में ब्रह्म को ही जीव और जगत की रचना का उपादान और निमित्त कारण भी मानते हैं माया को नहीं
विनय पत्रिका और रामचरितमानस में बहुत सारे प्रमाण मिल जाते हैं ब्रह्म के स्वरूप के संबंध में विनय पत्रिका में वह लिखते हैं
कोउ कह सत्य झूठ कोऊ जुगल प्रबल करि मानै
तुलसीदास परिहरै तिनी गुन सो अआपन पहिचानै
तुलसीदास ने अपने युग की सभी भक्त पद्धतियों और दर्शनों के संबंध में अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है और यथासंभव एक सहज और संबंधित मार्ग भी सुखाया है
है.वै
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