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Monday, February 19, 2024

भारतवर्ष में रंगमंच की प्राचीन रंपरा

भारतवर्ष में रंगमंच की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। भारतवर्ष में महाभारत में जिसे आज भी इतिहासकार 5000 वर्ष से अधिक पुराना बताते हैं नाटक की चर्चा है। हरिवंश पुराण में भी श्री कृष्ण के वंशधार यादवों द्वारा रंगमंच पर नाटक खेलने का विस्तृत उल्लेख है। संस्कृत भाषा में नाटक और रंगमंच की एक सुदृढ़ परंपरा दिखलाइए पड़ती है जिसमें कालिदास भास कालिदास भवभूति दंडी विशाखदत शूद्रक इत्यादि विश्व विख्यात रचनाकार हुए। यद्यपि नवी दसवीं शताब्दी के बाद भारत में शास्त्रीय नाटकों का अभाव दिखलाई पड़ता है परंतु ब्रिटिश आगमन के साथ ही आधुनिक काल में नाटक और रंगमंच की परंपरा एक बार फिर पुनर्जीवित हो जाती है और संपूर्ण भारत में विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रंगमंच को एक नया रूप देने का प्रयास किया गया। लेकिन प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के शुरुआती कुछ वर्षों तक स्त्रियों की भूमिका भी स्वयं पुरुष ही करते थे जबकि भारत देश में हमेशा से ही विदुषी महिलाएं होती रही हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही थी लेकिन यह विचारणीय प्रश्न है कि इतनी उन्नत परंपरा के रहते हुए भी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही क्यों करते थे। वैदिक काल से ही प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली स्त्रियों को मंचन के क्षेत्र में प्रवेश मिलने में इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा। आज रंगमंच के क्षेत्र में भारतीय स्त्रियों ने जो मुकाम हासिल किया है वह उसे एकाएक प्राप्त नहीं हुआ बल्कि या कई वर्षों के संघर्षों का परिणाम है। इतिहास गवाह है कि भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान हमेशा ही दोयम दर्जे का रहा है। उसे कदम-कदम पर अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं सुरक्षा हेतु संघर्ष करना पड़ा है। अतः जाहिर सी बात है कि पुरुषों के वर्चस्ववादी क्षेत्र में रंगमंच में उसे इतनी आसानी से प्रवेश कैसे मिल सकता था। विषय वस्तु की बात करें तो भारत में संस्कृत नाटकों की और रंगमंच की एक सुधीर्घ परंपरा है। उस दौर में नाटक एवं रंगमंच राज दरबार या कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। इस स्थिति में स्त्रियों का प्रवेश तो बहुत दूर की बात थी परंतु आश्चर्य की बात यह है कि आधुनिक दौर में जब 1846 से 1931 के मध्य में जीवन तरंग मंच का एक बेहतरीन वातावरण था तो उस दौर में भी स्त्रियों को रंगमंच में प्रवेश क्यों नहीं मिल पाया? जबकि इस दौर में अनेक नाटक थिएटर और रंग मंडलीय सक्रिय रूप से भारतीय रंगमंच को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे थे। फिर चाहे वहां 1846 ई जगन्नाथ शंकर सेठ के प्रयास द्वारा मुंबई में स्थापित बादशाही थिएटर हो या पिस्टन की धनजी भाई मास्टर द्वारा स्थापितपारसी नाटक मंडली नमक क्लब हो या फिर हिंदी क्षेत्र में भारतेंदु जी द्वारा काशी में स्थापित बनारस थिएटर हो यह सभी रंगमंच अपने स्तर पर मराठी गुजराती एवं हिंदी इत्यादि नाटकों का मंचन कर भारतीय रंगमंच को एक नया आयाम प्रदान करने का प्रयास कर रहे थे परंतु स्त्रियों को लेकर इन सभी थिएटर कंपनियों की एक ही सोच थी कि रंग मंच में सभ्य घरों की स्त्रियों का अभिनय करना बहुत ही अशुभनीय एवं गणित कार्य है। इससे स्त्रियों के भीतर नैतिक मूल्यों का ह्रास एवं घर के कार्यों के प्रति अवहेलना का भाव जागृत होता है। शायद यही कारण था कि उस समय स्त्रियों की भूमिका भी पुरुषों द्वारा ही की जाती थी। लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि यद्यपि उस दौर में गाना बजाना और अभिनय करना सभी घर की स्त्रियों के लिए अत्यंत घृणित कार्य माना जाता था परंतु उस समय भी कुछ स्त्रियां मजबूरी वश अपने जीवन यापन हेतु गाना बजाना एवं नृत्य करने जैसे कार्यों में संलग्न थी। जिसे हमारा समाज वैश्या की संज्ञा प्रदान करता है। फिर स्त्रियों को भी 19वीं शताब्दी तक रंगमंच में प्रवेश क्यों नहीं मिला जिनके लिए गाना बजाना या नृत्य करना अपने जीवन यापन का एक साधन था। इस प्रश्न के जवाब में यह कहा जा सकता है कि ऐसी स्त्रियां गाने बजाने में तो ठीक थी लेकिन अभिनय के क्षेत्र में दक्ष नहीं थी या फिर यह स्वयं को प्रसिद्धि से दूर रखना चाहती थीं । सभी जानते हैं कि वक्त और आवश्यकता लोगों की सोच को बदल देती है। शायद यही कारण था कि पारसी थिएटर अपनी व्यावसायिक आवश्यकता के कारण स्त्रियों के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए मजबूर हो गया। पारसी थिएटर एक व्यावसायिक थिएटर था जो अपने आर्थिक लाभ के लिए अधिक संख्या में दर्शन की आकांक्षा रखता था। शायद इसलिए वह अपने नाट्यमंचन को मंध्यवर्गीय जनता के मनोरंजन हेतु विस्तार देता है जो इसके पूर्व धनी लोगों तक ही सीमित था। जब मध्यवर्गी जनता पारसी थिएटर की दर्शक बनी तो उसमें लगातार महिला दर्शकों की बढ़ोतरी हो रही थी। जिसके नजर पारसी थिएटर स्त्री पात्रों की वेशभूषा तथा अन्य रंगमंच पहलुओं को भी स्त्री दर्शकों के नजरिए से भी देखने लगा। पारसी रंगमंच में पहली बार हलचल मच गई जब उसमें मेरी फैंटम नामक एक एंग्लो इंडियन अभिनेत्री को लाया गया। रंगमंच के क्षेत्र में एक महिला के प्रवेश को लेकर तमाम थिएटर मालिकों के मध्य एक युद्ध सा छीड़ गया। उस समय रंगमंच में इस प्रवेश को लेकर काफी विरोध का माहौल बना जिसकी झलक हमें सुनाई पड़ती है। केन कब्र पारसी समुदाय के एक समाज सुधारक होने के साथ-साथ नाटककार भी थे। इन्होंने गुजराती भाषा में कई नाटकों की रचना की तथा 1868 ईस्वी मेंएक नाटक क्लब की स्थापना की जो बाद में विक्टोरिया थीएट्रिकल कंपनी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन इन्होंने 1976 ईस्वी में सिर्फ इसलिए एक नाटक कंपनी की स्थापना की क्यों की विक्टोरिया थीएट्रिक्स अल कंपनी के मालिक दादी पटेल द्वारा इस कंपनी में स्त्रियों को अभिनय करने हेतु प्रवेश दे दिया गया। एक बार दादी पटेल को हैदराबाद में नाट्य मंचन हेतु आमंत्रित किया गया था। वहां से लौटते वक्त इन्होंने कई गाने वालों को अपने साथ ले आए और कंपनी में रख लिया जो की केन कब्र को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि रंगमंच की पवित्र दुनिया वेश्याओं के अभिनय से दूषित हो जाएगी। लेकिन रंगमंच के लिए या खुशी की बात थी कि पुरुष वर्चस्व की परंपरा को तोड़ते हुए पारसी थिएटर द्वारा इस क्षेत्र में स्त्रियों का प्रवेश प्रारंभ हो गया।। उन्हें लगता था कि स्त्री कलाकारों की सुरक्षा करना महंगा पड़ता है क्योंकि पारसी नाटक मंडली के एक महिला कलाकार के साथ कुछ ऐसी घटना घटित हो गई थी। 1872 ईस्वी में लतीफा बेगम नामक एक महिला के साथ इंद्रसभा नाटक का मंचन किया था महिला एक नृत्यांगना थी। इस नाटक में लतीफा बेगम ने परी की भूमिका निभाई थी। नाटक के समाप्त होने के बाद जब वह मंच से बाहर निकली तो किसी पुरुष द्वारा उसका अपहरण कर लिया गया। इस तरह किसी महिला कलाकार का अपहरण हो जाने से रंगमंच जगत में सनसनी फैल गई। इस तरह की घटनाएं छिटपुट थी। लेकिन पारसी रंगमंच ने स्त्रियों के लिए अभिनय का द्वार खोल दिया था जो की एक सराहनीय प्रयास था। पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर वहां के लोग कहीं ना कहीं दो गुट में बंट गए थे। 1873 ईस्वी में सरस चंद्र घोष तथा बिहारी लाल चट्टोपाध्याय ने परस्पर मिलकर बंगाल थिएटर नाम से एक कंपनी की स्थापना की और उसमें बंगाली थिएटर में स्त्रियों को भी प्रवेश दिया जाए ऐसा कहा गया। अनेक समाज सुधार द्वारा विभिन्न प्रकार के उस समय समाज सुधार कार्यक्रम चल रहे थे। इन दिनों में बंगाल में माइकल मधुसूदन दत्त और ईश्वर चंद्र विद्यासागर समाज सुधारक के रूप में कार्य कर रहे थे। रंगमंच में स्त्रियों को के प्रवेश को लेकर इन दोनों का मत बिल्कुल अलग-अलग था। मधुसूदन दत्त स्त्रियों के प्रवेश के पक्ष में थे वहीं ईश्वर चंद्र विद्यासागर इसके विरोध में थे। वे रंग मंच में वेश्याओं के प्रवेश के खिलाफ थे। इसी कारण उन्होंने उस समिति से त्यागपत्र दे दिया जिस समिति ने स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की। इसके बाद थिएटर में कोलकाता के रेड लाइट इलाकों से कई वेश्याओं को शामिल किया गया। इनमें से दो अभिनेत्री शर्मिष्ठा ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया और इस नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचा।इस नाटक की सफलता के बाद कई दिनों तक समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिखा जाता रहा। जनवरी 1874 ईस्वी में अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा कि बंगाल थिएटर सम्राट बंगाली समाज के लिए नई चीज है यह अत्यंत सुखद और खूबसूरत प्रयास है कि महिलाएं स्त्री पात्रों की भूमिका अदा करें पारसी रंगमंच की भांति बंगाल में भी रंगमंच के क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश का कहीं ना कहीं विरोध हो रहा था स्त्री समर्थकों में एक नाम किरण चंद्र दत्त का है। यह बंगाल थिएटर के साथ नाटककार और निर्देशक के रूप में कार्य कर रहे थे इनका कहना था कि यूरोप में कई लोग ग्रहणी महिलाओं को अभिनय को एक पेशे के रूप में अपने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसलिए हमें भी अपनी महिलाओं को अभिनय हेतु स्वतंत्रता देनी चाहिए। हिंदी नाटक और रंगमंच के शुरुआती दिनों में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली नाटक की रचना कर स्वयं इसका मंचन करते थे परंतु स्त्रियों को लेकर उनके मन में वही भावना थी कि स्त्रियों को रंगमंच के क्षेत्र में कम नहीं रखना चाहिए। भारतेंदु युग के दौरान नाट्य मंचन की जो लहर चली थी उसमें भी स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे इसलिए इस दौर में भी किसी स्त्री का जिक्र नहीं होता।रंग वंश के क्षेत्र में स्त्रियों के साथ हो रहे इस भेदभाव के प्रश्न को सर्वप्रथम कुमारी सत्यवती ने अपने एक लेख के माध्यम से उठाया यह लेख माधुरी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और प्रश्न उठाया की हिंदी रंगमंच पर स्त्रियां क्यों नहीं इसके अतिरिक्त जिन्होंने पुरुषों द्वारा स्त्रियों की भूमिका निभाई जाने का भी विरोध किया इन्होंने अपने लेख में लिखा कि जिस प्रकार जीवन स्थिति एवं पुरुषोत्तम दो भागों में विभक्ति है तथा जीवन के हर कार्य में स्त्री तथा पुरुष दोनों को भाग लेना पड़ता है उसी प्रकार कल के अंग नाटक में भी जहां जीवन के सुख और दुख दोनों दिखाए जाते हैं स्त्री एवं पुरुष दोनों को भाग लेना चाहिए

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