Thursday, March 7, 2024
आलेख बंगाल की महिला रंगकर्मी 24
बंगाल की प्रमुख हिंदी महिला रंगकर्मी - - - - -डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज
रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है, यह सच है कि बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। भारत में उन्नत परंपरा और विदूषी महिलाओं के रहते हुए भी स्त्रियों को सदैव ही दोयम दर्जे पर रखा गया है। वैसे तो प्राचीन काल से ही नाटकों का जिक्र महाभारत और संस्कृत में प्रमुखता से मिलता है।कुछ काल तक नाटक और रंगमंच का अभाव रहा लेकिन ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ ही आधुनिक काल में नाटक और रंगमंच की परंपरा एक बार फिर पुनर्जीवित होती है। संपूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रंगमंच को एक नया रूप देने का प्रयास किया गया।
स्त्रियों को कदम कदम पर अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं सुरक्षा हेतु संघर्ष करना पड़ा है। नाटक तो आरंभ से ही पुरुषों के अधिकार में रहा था। यहां तक कि स्त्री पात्र के चरित्र को भी पुरुष ही करते थे तो पुरुषों के वर्चस्ववादी क्षेत्र रंगमंच में स्त्रियों को आसानी से प्रवेश कैसे मिल सकता था? उस दौर में नाटक एवं रंगमंच राज दरबार या कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। स्त्री का नाचना - गाना नीचा और घृणित कार्य समझा जाता था। थियेटर आदि में कार्य करने वाली स्त्रियों को वेश्या तक की संज्ञा दी गई।
बंगाल थियेटर और नाटकों के मंचन के क्षेत्र में सदैव आगे रहा है। बंगाल में हिंदी नाट्य कला को आगे बढ़ाने में प्रसिद्ध नाट्य कार अभिनेत्री ,निर्देशक,कवयित्री साहित्यकार प्रतिभा अग्रवाल, उषा गांगुली, उमा झुनझुनवाला तीनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिन्होंने रंगमंच के नए प्रयोग और प्रतिमान स्थापित किए। बांग्ला और हिंदी के रंगमंच में सेतु का काम किया। वर्तमान में स्त्रियों ने अपनी पहचान का आंकलन किया है और विषम चुनौतियों का सामना कर जीवन के हर क्षेत्र में उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।
बंगाल के जिस पुरुष नाटककार के नाटक सबसे ज्यादा हिंदी में खेले गए उनका नाम बादल सरकार और श्यामानंद जालान है । आधुनिक युग 19-20वीं सदी से बंगाल में हिंदी के नाटकों का मंचन आरंभ हुआ जिसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। बादल सरकार जितने बड़े नाटककार थे उतने ही बड़े अभिनेता और निर्देशक भी। इसके लिए उन्होंने रंगमंच को विकसित किया। वे रंगमंच के सिध्दांतकार थे। उन्होंने तीसरे रंगमंच का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया और उसे बाकायदा मंच पर उतारा भी। भारतीय रंगमंच में तीसरे रंगमंच की मौलिक धारणा को बादल सरकार ने कई पड़ावों से गुजरते वर्षों रंगकर्म करते हुए एक नए रंगभाषा की खोज की। उस खोज के भी कई चरण रहे जिन्हें पार करते हुए ही अंततः तीसरे रंगमंच का सिद्धांत रच सकते थे। बादल सरकार ने नाटक जब हिंदी वह अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित होकर खेले तो उनकी जनप्रियता बंगाल के बाहर समूचे भारत वर्ष में फैली। यानी हिंदी में आने के बाद ही बादल दा पूरे भारत के नाटककार बने। आंगन मंच में उन्होंने अपने नाटक प्रस्तुत किए। इस शैली में शारीरिक अभिनय को विशेष महत्व दिया जाता है। 1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। घर-घर, गांव- गांव और शहरों में, आंगन में, छत पर नुक्कड़ और गांव में नाटकों को पहुंचाया। मराठी, हिंदी, पंजाबी, गुजराती, मलयाली, कन्नड़, ओड़िया आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक लोकप्रिय हुए। एक अलग किस्म के थिएटर के जनक जिसे साइको फिजिकल थिएटर के नाम से जाना गया। सन् 1965 में बादल दा ने दो नाटकों का निर्देशन किया जो एवं इंद्रजीत और बल्लभपुर की रूपकथा थी ।
बंगाल में रंगमंच पर स्त्री रंगकर्मियों की बात हो तो हिंदी में कम से कम तीन हिंदी भाषी रंगकर्मियों का जिक्र आवश्यक है। इस कड़ी में श्यामनंद जालान का प्रमुख नाम है जिन्होंने बंगाल में हिंदी रंगमंच को प्रसिद्धि दिलाई।
प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली , उमा झुनझुनवाला इन तीनों रंग स्तंभों ने स्वतंत्र उत्तर काल में बंगाल तथा हिंदी रंगमंच के बीच महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण किया। इसके पहले नाटककार, निर्देशक और अभिनेता श्यामनंद जालान के नाट्य कला के कुछ बिंदुओं को भी समझने की आवश्यकता है।
श्यामानंद जालान ने बंगाल की कई महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। जालान ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास पगला घोड़ा का हिंदी में नाटक रूपांतरण किया तो बादल सरकार के दो नाटकों एवं इंद्रजीत और पगला घोड़ा का भी हिंदी में नाट्य रूपांतरण कर मंचन किया। जालान ने ही समूची हिंदी पट्टी से बादल सरकार का परिचय कराया था।
श्यामानंद जालान ने महाश्वेता देवी के उपन्यास 'हजार 84 की मॉं' का हिंदी में नाटक रूपांतरण का मंचन किया तो दिव्येंदु पालीत की कहानी मॉं का अभिनय कर हिंदी में पट कथा तैयार की और फिल्म भी बनाई जो जालान द्वारा निर्देशित यह एकमात्र फिल्म थी। जालान ने 1972 में पश्चिम बंगाल नाटक उन्नयन समिति के नाटक तुगलक में बंगाल के लोकप्रिय रंगकर्मी शंभू मित्र के साथ मंच पर अभिनय किया था। इस बांग्ला नाटक में देवव्रत और रूद्र प्रसाद सेनगुप्त ने भी अभिनय किया था। बांग्ला नाटकों के अलावा बांग्ला फिल्मों में भी अभिनय किया। बांग्ला फिल्म चोख में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें श्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। जालान ने रंगमंच साहित्य में ही अपने छह दशक से ज्यादा का जीवन लगा दिया। छात्र जीवन में ही रंगमंच उनकी पसंदीदा विधा बन गई थी। 15 साल की उम्र में उन्होंने 1949 में नया समाज नामक एक नाटक में अभिनय किया। तरुण संघ की तरफ से यह नाटक खेला गया और कोणार्क, चंद्रगुप्त जैसे बहुत से नाटकों का निर्देशन भी किया।
1955 में ही जालान ने अपनी नई रंगसंस्था 'अनामिका' की स्थापना की, बाद में पदातिक भी। तब तक अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में वे अपनी प्रतिभा का लोहा रंगकर्मी के रूप में मनवा चुके थे।
प्रसिद्ध नाटककार साहित्यकार और स्त्री रंगकर्मी प्रतिभा अग्रवाल अनामिका से उसके स्थापना काल से जुड़ी रहीं।
प्रतिभा अग्रवाल के मुताबिक उस समय किसी भी नाटक को मंचन करने का निर्णय करने पर उसके उपयुक्त साधनों को जुटाना बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती थी। कलाकारों, तकनीकी सहायकों को साथ लेना श्यामानंद का पहला काम होता। परिस्थितियों के आगे - पीछे, आजू-बाजू लड़ाई झगड़ा, मत विरोध व मनुष्य कारक वितरण जो भी चला रहा हो,उनका रिहर्सल आमतौर पर सुखद होता था।
श्यामानंद जालान हमेशा बड़े रूप में चीजों की परिकल्पना करते। अनेक बार इतने बड़े रूप में कार्य करने के बाद
कई तरह की उलझने खड़ी हो जाती। पर वे मानते थे कि बड़े रूप में सोचे बिना बड़ा काम नहीं किया जा सकता। इसी कारण अनामिका ने बहुत सी यादगार प्रस्तुतियाँ दी। अनामिका और श्यामानंद जालान जल्द ही एक दूसरे के पर्याय बन गए।
स्त्री नाट्ककार प्रतिभा अग्रवाल एक प्रसिद्ध रंगकर्मी रही हैं जिनकी शुरुआत अनामिका नाट्य संस्था से हुई।
सन् 1955 में भँवरमल सिंघी, सुशीला सिंघी, प्रतिभा अग्रवाल के साथ मिलकर ‘अनामिका’ की स्थापना हुई । संगीत नाटक एकेडमी एवार्ड 2005 से पुरस्कृत प्रतिभा अग्रवाल एक ऐसी प्रतिभा संपन्न महिला है जिन्होंने अपने नाम को सार्थक किया है। उनका जन्म 1930 में बनारस में एक ऐसे घराने में हुआ जिसने हिंदी भाषा और हिंदी नाटक को सशक्त बनाने में विशेष भूमिका निभाई।रंगमंच के प्रति प्रतिभा जी की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण मिलता है जो इस प्रकार है - सन् 1959 में उनके पिता मृत्यु शय्या पर थे। दिल्ली में नाटक नए हाथ का मंचन था। 12 अगस्त को पिता की इह जीवन लीला की समाप्ति हुई। प्रतिभा 18 को दिल्ली गईं 19 अगस्त को नाटक किया और 21 की सुबह लौटकर पिता के दशकर्म विधान में भाग लिया। रंगमंच से उनकी इस प्रतिबद्धता और समर्पण के पीछे अभिनय, संगीत और साहित्य के गहन संस्कार रहे हैं जो उन्हें विरासत में मिले। उनके पिता बाल कृष्ण दास बनारस में रंगमंच की मशहूर शख्सियत थे और दादा राय कृष्ण दास प्रसिद्ध लेखक थे। वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के सगे फुफेरे भाई थे। भारतेंदु के निवास स्थान भारतेंदु भवन में ही 10 अगस्त 1930 को प्रतिभा अग्रवाल का जन्म हुआ था। प्रतिभा का दाखिला वाराणसी के अग्रवाल कन्या पाठशाला में कराया गया, कक्षा तीन में सुशीला का इनाम मिला। स्कूल के वार्षिकोत्सव में नृत्य और गायन का बराबर मौका मिला और रंगमंच से जुड़ने की शुरुआत भी इस समय से हो गई थी। उनको छोटी उम्र में ही डेढ़ सौ कविताएं कंठस्थ थीं । पिता रोज कहीं - न - कहीं नाटक खेलने जाते। कभी-कभी बेटी को भी साथ ले जाते नाटक दिखाने। नाटक देख उनके भीतर भी रंगकर्म की प्रेरणा जागृत हुई और वह स्कूल के वार्षिकोत्सव में नाटकों में भाग लेने लगी। इसके अलावा काशी के महिला मंडल के वार्षिकोत्सव में राधा कृष्ण दास के 'महाराणा प्रताप' में प्रतिभा ने पहली बार मंच पर अभिनय किया। तब उनकी उम्र 13 वर्ष की थी। इस दौरान प्रतिभा को मदन मोहन अग्रवाल ने हनुमान भैया के यहाँ देखा। मदन बाबू को प्रतिभा का रूप रंग भा गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। बगैर दहेज के 15 फरवरी 1945 को विवाह हुआ। तब प्रतिभा की उम्र 15 वर्ष और मदन बाबू की 25 वर्ष थी। शादी के 15 दिन बाद ही प्रतिभा पति के साथ कोलकाता आ गईं। शादी के साल भर बाद ही इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए प्रतिभा को शांतिनिकेतन भेजा गया । वहाँ प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' का आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रूपांतरण किया जिसमें नवाब वाजिद अली शाह की भूमिका प्रतिभा ने निभाई। शांति निकेतन से तीन वर्ष बाद कोलकाता में प्रतिभा ने पहली बार दो अतिथि और कला और जीवन में अभिनय किया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। समस्या अलग-अलग रास्ते, चंद्रगुप्त और शाहजहां में अभिनय करने के बाद 1955 में प्रतिभा 'अनामिका' नाट्य संस्था से जुड़ गई। अनामिका की रंग प्रस्तुतियां नए हाथ, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, घर बाहर, छलावा, सुहाग के नूपुर और आधे अधूरे में उनके अभिनय की धूम मच गई। इसी तरह गोदान में धनिया के रूप में उनके अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं। 1981 में प्रतिभा अग्रवाल ने कोलकाता में नाट्य शोध संस्थान की स्थापना की। यह संस्थान भारत की हर भाषा से जुड़े थिएटर के ऐतिहासिक तत्वों का संग्रह है और इतिहास की मुकम्मल जानकारी प्रदान करता है। दुर्लभ नाट्य पांडुलिपियों, पोस्ट नाट्य समीक्षाएं, पत्र- पत्रिकाओं की कतरनी, पुस्तक ऑडियो वीडियो कैसेट, फिल्म, मॉडल, स्लाइड, तस्वीर, पोशाक आभूषण, ब्रोशर्स आदि का अनुपम संग्रह है। 1986 में मास्टर फिदा हुसैन पर प्रतिभा अग्रवाल की किताब से यह संस्थान काफी सक्रिय हुआ। उसके बाद उनकी किताब रंगकर्मी हबीब तनवीर एक रंगकर्मी पुस्तक भी आई ।
नाट्य संस्थान की स्थापना के बाद से प्रतिभा जी का अभिनय निर्देशन छूट गया लेकिन संस्थान के रंग संरक्षण का महत्वपूर्ण काम उन्होंने किया। वह लेखिका और अनुवादिका भी हैं। उन्होंने सृजन का सुख-दुख दस्तक जिंदगी की मोड जिंदगी का हिंदी में मौलिक कृतियांँ लिखीं। प्रतिभा जी उपन्यासकार भी हैं। प्यारे हरिश्चंद्र जू शीर्षक से उन्होंने जीवनी उपन्यास लिखा। उनका शोध प्रबंध हिंदी मुहावरे विश्लेषणात्मक विवेचन भी एक मूल्यवान कृति है।
मौलिक लेखन के अलावा प्रतिभा जी ने 6 उपन्यासों के नाटक रूपांतरण किया। गोरे भाई (रवींद्रनाथ ठाकुर) , सुहाग के नूपुर (अमृतलाल नागर), गोदान, (प्रेमचंद), मैला आंचल ((रेनू) प्रतिभा अग्रवाल ने 40 से अधिक नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है जिसमें बंगाल और गुजराती नाटकों का विशेष रूप से अंग्रेजी से एप्सन ऑथर मिलर के नाटकों का हिंदी अनुवाद किया। कई पुस्तकों का संपादन भी किया जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है हिंदी रंग कोष और उन्होंने कई वर्षों तक कोलकाता साहित्य संकलन भी निकाला ।
नाट्यकार, साहित्यकार और शिक्षिका डॉ उषा गांगुली ने कोलकाता में हिंदी नाटक को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। बांग्ला नाटक रंगमंच के जरिए बांग्ला हिंदी सेतु बंधन में अहम भूमिका अदा करने वाली उषा गांगुली को जानने का अवसर उन्हीं की रंग प्रस्तुति 'अंतर्यात्रा' देती है। यह नाटक उनकी आत्मकथा है। उनके निजी और रंग जीवन में जो स्त्रियां आईं सभी इसमें है। दूर खड़ी एक स्त्री जो पुरुष के प्रेम के द्वंद में फंसी बीना । आत्म सम्मान से जीने के लिए घर से बाहर आई मुनिया राजनीतिक विप्लव की साकार छवि बन गई, गोर्की की मां। गाड़ी के बोझ को अकेले खींच रही हिम्मत में, साहसी सावित्री। रुदाली की शनिचरी जिसका पेशा है अमीरों के मुर्दे पर रो कर पैसा कमाना। उषा गांगुली निर्देशित अभिनीत अंतर्यात्रा सिर्फ नाटक नहीं, बाहर - भीतर के जंग से निरंतर जूझती स्त्री की संघर्ष गाथा है। इस नाटक में तीन ज्यामिति आकृतियाँ मंच सज्जा का जरूरी हिस्सा है। मंच सज्जा चौधरी की है और प्रकाश व्यवस्था तपन सेन की। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के धुरंधर हैं मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में जो अंतर्यात्रा में कथा की संप्रेषणीयता को कई गुना बढ़ा देती है। ढाक बजता है और उसी के साथ उषा मंच पर प्रकट होती हैं। ढाक की आवाज उषा को बचपन की याद दिलाती है और जब वह स्मृतियों में उतरती है तो उनके निजी जीवन और रंग जीवन में आई कई स्त्रियों की वेदना उनका संघर्ष उनकी आंखों के सामने दर्शाया जाता है। इस तरह उषा गांगुली के अंतर्यात्रा में कई कई स्त्रियों की अंतर्यात्राएँ जुड़ती जाती हैं और सभी मिलकर नाटक को स्त्री संघर्ष की महागाथा के रूप में परिणत कर देती है। उषा गांगुली इसमें हिंदी और बांग्ला में भी अपनी बात कहती हैं। उषा का संपूर्ण जीवन अनुभव व रंग अनुभव इस नाटक में तनाव और जीवंतता को बनाए रखता है। दृश्य श्रव्य के सहारे पूरे एक घंटे तक वह दर्शकों को खींचे रखती हैं। उनकी संवादमयी भंगिमा इतनी असरदार है कि दर्शक पूरी अंतर्यात्रा में शरीक होता चलता है और उनकी चिंताओं में भी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की हैसियत का बोध उषा को बचपन में ही हो जाता है। उनकी यह जिज्ञासा कि छोटे भाई की तरह मेरा जन्मदिन क्यों नहीं मनाया जाता, बहुत ही मार्मिक है। यह छोटा सा संवाद स्त्री-पुरुष समानता की पूरी कहानी खोल देता है। फिर शुरू हो जाती है एक-एक पात्र की दुख भरी कहानी बीना की याद आ रही है। बीना बस ड्राइवर की बेटी है। नौकरी करने दिल्ली जाती है।बुद्धिजीवी सुदीप के प्रेम में डूब जाती है। बीना परिवार के साथ सुदीप का इंतजार करती है, पर सुदीप नहीं आता है। आता है उसका एक खत जिसमें लिखा होता है कि उसने जो जो कहा सब झूठ है। पूरा घर बीना पर बरस पड़ता है। बहुत से ऐसे नाटक हैं जिसमें उषा ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है ।
अंतर्यात्रा नाटक मुनिया के सिंदूर प्रसंग को अनिमा दी के प्रसंग से जोड़ता है। हम सबके घर में अनिमाएं रहती हैं जो उप नगरों से आकर हमारे घरों को संभालती हैं। अनिमा दी अपने घर से निर्वासित होकर कोलकाता आई थी। उषा पूछती है कि सीता से जो निर्वासन शुरु हुआ उसका अंत कब होगा। अनिमा दी मांग में सिंदूर लगाती थी। वे अपना गांव मथुरापुर इसलिए छोड़ कर आई थी क्योंकि वहां उनकी सौत आ गई थी। अनिमा दी के बाद उषा गोर्की व ब्रेख्त की मां का स्मरण करती है। 1992 में मां का मंचन हुआ । किंतु वही एक संपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के प्रति मूर्ति होती है। सिमिलगीं को गोली लग जाती है। तब भी धीरे-धीरे जमीन पर झुकती है झंडा उठाती है। झंडा मैं उठाऊंगी इन सबको बदलना होगा बालासवा तुम्हारे बेटे को गोली मार दी गई है यह सुनकर मां बेटे के शोक में कमजोर नहीं होती बल्कि और मजबूत होकर सामने आती है।सुरक्षा के सवाल से रोज स्त्री को रूबरू होना पड़ता है। स्वयं उषा गांगुली को भी जूझना पड़ा है। अंतर्यात्रा में उषा का स्वयं का एक अनुभव है। वे नंदन सभागार में एक सेमिनार में बोलकर वापस आ रही थीं। सड़क पार कर टैक्सी के इंतजार में गोखले रोड के किनारे खड़ी हुई थी कि अचानक एक अनजान अपरिचित सामने आकर कहता है कि मेरे साथ कॉफी पीने जाएंगी! उस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने हजार हजार बाल्टी ठंडा पानी उषा पर डाल दिया हो। लगा उनकी शिक्षा उनका सम्मान उनका अध्यापन उनका सुंदर थिएटर सब कुछ खाक में मिल गया। वह सिर्फ एक नारी है इस तरह बहुत से कार्य उन्होंने किए। माधुरी रंगकर्मी की संस्थापक सदस्य थी। देखने पढ़ने में सुंदर थी, स्वर्ण पदक मिला था। वही माधुरी एक दिन दोपहर के वक्त दौड़ती आई, उसके पूरे शरीर से केरोसिन की गंध आ रही थी। बोली वह लोग मुझे मार डालेंगे। मेरे हाथ में माचिस की तिल्ली देकर चिल्लाने लगी आग लगा दो। 14 दिन कमांड अस्पताल में रहकर चल बसी। उसने लास्ट स्टेटमेंट दिया मेरी मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं। जीवन में मिली स्त्रियों की कथा व्यथा सुनाते हुए उषा बराबर स्त्री की अवस्था को व्यापक सामाजिक संदर्भों के बीच रखकर जांचने पररखने की कोशिश करती है। नाटक का एक संवाद है मीराबाई की जंजीर भी कम भारी नहीं थी।मेरा मन प्रभु चरणों में लगा ही रहा। इसमें जो होना हो सो हो। उषा आखिर में लिखती हैं कि मैं भी बचूंगी, मैं बच गई इस संवाद के साथ ही पर्दा गिरता है। कहना न होगा कि स्त्री का संघर्ष और उसका आत्म संघर्ष चलता रहता है। अभी भी चल रहा है, संघर्ष में ही निर्मित भी होती है और स्त्री विमर्श के नए गवाक्ष खोलते हैं।(डॉ कृपाशंकर चौबे के लेख बंगाल में रंगमंच का इतिहास और वर्तमान से)
वर्जिनिया वूल्फ ने कहा है कि स्त्री का लेखन स्त्री का लेखन होता है, स्त्रीवादी होने से बच नहीं सकता। हिंदी महिला नाट्यकार उमा झुनझुनवाला लिटिल थेस्पियन थियेटर की संस्थापक हैं जिन्होंने अपने पति अज़हर आलम के सपनों को साकार करने में दिन-रात एक किया। उनकी नाट्य यात्रा तीन दशकों से अनवरत चल रही है जिसमें पति नाटककार अज़हर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं। कोरोना महामारी में अजहर के मरणोपरांत भी उमा ने रंगमंच की बागडोर को संभाले रखा और शो कभी बंद नहीं किया बल्कि एक नया मुकाम हासिल किया।
औरत_की_एक_डायरी महज लेखिका की डायरी नहीं, बल्कि यह किसी भी स्त्री के विश्वास और उसके टूटने तथा उससे उपजी मनस्थितियों के आरोह-अवरोह, द्वंद्व, विषाद, दृश्य-अदृश्य की पीड़ा आदि का लेखाजोखा है, जहां एक औरत के भीतर जीती दो औरतें या फिर एक औरत के भीतर जीती कई-कई औरतें बड़बड़ाती-सी प्रतीत होती हैं। इसके पन्नों में दर्द की अपनी कहानी है, जो एक पात्र से निकल कर दूसरे से होते हुए कई जानी-अनजानी स्त्रियों को छूते हुए, उन्हें कुरेदते हुए पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ती है। इन पन्नों में औरतों के मनोभावों को समझने का प्रयास है और इसीलिए इस डायरी के पन्नों को न तो किसी तारीख में बांधा गया है और न ही दिन में। उन्होंने इसके कुछ पृष्ठों का मंचन भी किया है।
तीन नाटक विसर्जन, भीगी औरतें, लम्हों की मुलाकात,
लाल फूल का एक जोड़ा उमा झुनझुनवाला की नाट्य कला के महत्वपूर्ण नमूने हैं। उनके पात्रों में सीमा सिंह कोई मामूली लड़की नहीं थी। उसके व्यक्तित्व में एक ख़ास आकर्षण था। बातचीत का सलीका ऐसा कि सुनने वाला उसके असर से बंध जाए जबकि आवाज़ में कोई एक रेशा ऐसा भी मिश्रित रहता कि उससे बंध कर भी सुननेवाला नियंत्रण की हद में ही रहे और आँखे तो लगता है ईश्वर ने किसी ख़ास मकसद से ही बनाई थी, गज़ब का चुम्बकीय आकर्षण था। काजल लगी आँखें ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे समंदर में तिरती कोई नौका। शहर के प्रतिष्ठित आनन्द मोहन राय कॉलेज के फाइनल इयर की विख्यात छात्रा थी।
रेंगती परछाई नाटक में एक बेवा और उसके तीन अधेड़ बेटियों की कहानी है ।घर के चप्पे-चप्पे पर रेंगती परछाई के इर्द-गिर्द घूमती है। जहां सभी को एक पुरुष की कमी खलती है। घर के सन्नाटे को दूर करने के लिए वे सभी बेटियां भोग विलास के लिए एक-एक करके मां के शौहर ऑफिज से रिश्ता बना लेती है।बाद में छोटी बेटी यह राज़ खोलती है।
तुम्हे याद है न..कविता में उमा झुनझुनवाला की प्रत्येक कविताओं में सच्चे भोगे हुए शब्दों के भाव लहराते हुए प्रवाहित होते रहते हैं।
जब नदी किनारे हम मिला करते थे तो नदी लहराती हुई हमारे क़दम चूमने आ जाती थी अब तो कई युग बीत गए। तुम्हें याद है न... हरी घास पर बैठे जब हम गिन रहे होते थे। रूमानी घड़ियाँ। हरी घास कैसे कैसे गुलाबी हो जाया ..
कुछ इसी तरह की अन्य कविताओं में भी एक ऐसे लोक में ले जाती हैं जहां प्रेम की ऊंचाईयां हैं - -
नदी में नौका चल रही थी
माझी नदी का दिल गुनगुना रहा था
कि औरत को बहता हुआ एक लाल फूल दिखा
रोज दिखता है इसी वक्त
कोई नहीं जानता रोज़ इसी वक्त
नदी में यह लाल फूल कौन बहाता है
कहीं यह भ्रम तो नहीं
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एक जोड़ी आँख दिख जाती है
वह उस तरफ दौड़ कर जाती है
चारों तरफ घूम घूम कर
उस आँख को तलाशती है
मगर वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता
भीगी औरतें नाटक का निर्देशन किया जिसकी परिकल्पना और नाटक लेखन भी उमा झुनझुनवाला का रहा।
भीगी औरतें नाटक अमृता प्रीतम की कहानियों और कविताओं की आग से उत्पन्न स्त्री कथा है। उमा का मानना है कि अमृता को पढ़ना एक स्त्री के तीव्र दर्द से गुजरने जैसा है। यह स्त्री की आस्था, टूटन और उसकी त्रासदी को दर्शाने वाली है। साथ ही स्त्री के विश्वास उसकी महानता और क्षमा करने और आगे बढ़ने की उदारता की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। वे मानती हैं कि नाटक में स्त्री कलाकार ही अपने रंगों को महसूस कर सकती है। यही इसे एक वास्तविकता को दर्शा सकता है।
21 वीं सदी में निर्देशक,अभिनेत्री के रूप में देश में प्रसिद्धि प्राप्त उमा झुनझुनवाला नाट्य गुरु के रूप में अपनी कला को विस्तार देने के लिए लगातार थियेटर को विकसित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। विभिन्न संभावनाओं को, प्रतिभाओं को उभारने का काम कर रही हैं।13 वर्षों से जश्न ए अज़हर राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन कर रही हैं जो छह दिनों तक चलता है।देश भर की नाट्य संस्थाएं आकर नाटकों का मंचन करती हैं। श्रव्य के अंतर्गत रंग संवाद का सत्र और फिर नाटक की प्रस्तुति इस नाट्य उत्सव की खासियत है।अज़हर आलम मेमोरियल सम्मान से भी नाटककारों को सम्मानित किया गया। इस वर्ष यह नाट्य उत्सव 19-24 जनवरी 2024 तक चला जिसमें कोलकाता के कॉलेज युवाओं को जोड़ा गया। सभी के खाने-पीने की सुचारू रूप से व्यवस्था रहीऔर विद्यार्थियों ने नाटक में भी भाग लिया।
सच कहा गया है कि नाटक प्राण है तो रंगमंच शरीर है। अज़हर आलम और उमा झुनझुनवाला ने 1994 में भारतीय नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन की स्थापना की जो सांस्कृतिक तथा व्यवसायिक आधार पर रंगकर्म के लिए प्रतिबद्ध है। 29 वर्षों से इस संस्था ने 35 नाटक, 46 कहानियाँ,10 एकांकी और 100 से अधिक कहानियों और कविताओं का अभिनयात्मक किस्से ख्वानी के रंगमंच प्रदर्शन किए हैं जिन्हें बहुत सराहना मिली है। रंगमंच की पहली उर्दू मैग्ज़ीन रंगरस का प्रकाशन भी किया गया है।
भीगी औरतें, परछाइयाँ, कोई और रास्ता, रेत और इंद्रधनुष, एंडगे, हजारों ख्वाहिशें, रूहें, बलकान की औरतें, धोखा, कबीरा खड़ा बाजार में, गैंडा, शुतुरमुर्ग, यादों के बुझे हुए सवेरे आदि कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तुतियां हैं।सभी में अज़हर और उमा दोनों का निर्देशन रहा है। पति अज़हर आलम को पश्चिम बंगाल की ओर से नमक की गुड़िया के लिए बेस्ट प्ले राइट तथा सवालिया निशान के लिए बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से सम्मानित किया गया था। नटरंग प्रतिष्ठान ने अज़हर आलम को उनके नाटक रूहें के लिए नेमिचंद्र जैन नाट्यालेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कोरोना काल में अज़हर का साथ छूट गया लेकिन उमा ने हौसला नहीं छोड़ा।
नारी शक्ति और रंगमंच का मतलब नारी को और शक्तिशाली बनाना लेकिन उसमें कलात्मकता और संवेदना भी होनी चाहिए। रंगमंच पर स्त्री का बड़ा रोल है। बिना उसके रंगमंच कुछ नहीं। स्त्री एक प्रेरणा होती है। रंगमंच के क्षेत्र में अभी भी महिला नाटककारों की कमी है। 80 के दशक के बाद से हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी स्त्री नाटककारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है जो रंगमंच के लिए अच्छा संकेत है। वर्तमान में बंगाल में हिंदी रंगमंच के इतिहास में उमा झुनझुनवाला का नाम महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है।
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