Powered By Blogger

Sunday, September 11, 2022

गढ्ढों की जय हो (कविता)

गढ्ढों की जय हो सड़क के दोनों तटों के बीच गढ्ढे क्या सड़क है? उस पर चलने का मजा ही कुछ और है टोटो अॉटो का रिश्तेदार उसकी सवारी करने का सफेद बालों वाला बेचारा वह जवान काले बालों वाली मैं जवान सी दिखने वाली टोटो के हिचकोलों ने कितने करीब ला दिया याद आ गए कॉलेज के वे दिन बाइक पे बैठ जब हो जाती थी सभी दूरियाँ दूर जान बूझ कर खोजी जाती थीं ऐसी सड़कों को अब तो हर सड़क पर नमूने बने हैं गढ्ढे भी सोच - समझ कर डिजाइनदार बनते हैं कभी दायीं ओर का पहिया धँस जाता तो कभी बायें गढ्ढे के पहिया संतुलित करता वो परेशान सा कभी मेरे बाएंँ कंधे से टकराता तो कभी बाएंँ हाथ से स्पर्श कर जाता धीरे से पूछने लगा लगी तो नहीं, सड़कें ही ऐसी हैं अरे ये गढ्ढे क्या हैं, जान की आफत हैं जोर से रॉड को पकड़े रहें सीट भी उछल उछल गढ्ढे को निहारने में लगी है छह महीने में ही उनके कपड़े जगह-जगह से फटने लगते हैं कभी पूजा की आस या फिर चुनाव के इंतजार में गढ्ढों को गालियाँ सुननी पड़ती आते-जाते सभी ताने मारते भगवान ही मालिक है कभी हम टोटो पे तो कभी टोटो हमपे खैर हम सभी प्यारे गढ्ढों को धन्यवाद देते हुए सकुशल पहुँचने वाले ही थे कि हमारी बातों का सिलसिला सरकार, राजनीति के कई गलियारों से गुजरा मीडिया, भ्रष्टाचार और न जाने क्या क्या पर वह बात तो हुई ही नहीं जिस तरह से टकराए थे गढ्ढे अच्छों अच्छों को मिलाते हैं तो तोड़ भी देते हैं पूरी सावधानी से सुरक्षित हो रहें कह कर चला गया गढ्ढे भी तो प्रकृति के ही बनाए हुए हैं न बारिश होती न उसके चेहरे का श्रृंगार हटता इतनी बेरहमी भी ठीक नहीं आखिर मिलवाया तो ऐसे शख्स से जो सामाजिक सरोकारों से वास्ता तो रखता है जहाँ बाजार जोरों पर हो वे अधिक संख्या में बनते हैं गढ्ढों की जय हो @वसुंधरा मिश्र, 10.9.2022

No comments:

Post a Comment