Powered By Blogger

Tuesday, September 13, 2022

कविता द्वारा

वसुंधरा शत-शत नमन तुमको, हे वसुंधरा। तुमसे ही हैं ये जीव सारे ओ धरा। तुमने ही जीवनदान है सबको दिया। सुख-भाग सबको बाँटती हो ओ धरा। सुख और दुख समरूप से हो झेेलती। उर में छिपा लेती हो निज दुख ओ धरा। सबको तुम्हीं हो बाँटती अमृत-सुधा, पर मिला तुमको गरल-विष ओ धरा। उफ़ न करती तुम रही हँसती सदा। जग ने कहाँ समझा है तुमको ओ धरा।

No comments:

Post a Comment