Tuesday, October 25, 2022
मैं छोटा सा दीप (कविता)
मैं छोटा सा दीप हूँ
मिल जाऊंगा फिर मिट्टी में।
पर उजाला करके
अंधेरों को खाक करके
इश्क की चाहत में
मैने तुमको चाहा था
नफरत की आंँधी को
स्नेह से जलाया था
मैं छोटा सा दीप हूँ
पानी की बूंँद सा
समंदर की थाह सा
मैं मिट्टी का छोटा सा दीप हूँ
आंँधी ने मुझको छुआ था कभी
घबरा कर मेरी लौ बुझने लगी
हिम्मत न हारी जलता रहा
हिलता रहा ललकारता रहा
हवाओं से मैं लड़ता रहा
अपना बचाव करता रहा
मैं मिट्टी का छोटा-सा दीप हूँ
मेरा तन मन भरा हुआ था
बाती मुझको छू रही थी
एक दूजे में थे लिपटे
मालूम नहीं था कब तक जीते
पर जब तक हम हैं साथ तेरे
साथ जिएंँगे साथ मरेंगे
छोटा हूँ पर बड़ों - बडों को देता हूँ मैं सीख
विश्वास करो अपने ऊपर
काम बड़े बस करते जाओ
फूलों की खुशबू से
जग सुरभित हो जाता है
फूल सभी मिट्टी बन जाते
मैं मिट्टी से बनता हूँ
अग्नि मेरी हमजोली-सी
काली रातों की सहेली-सी
साथ निभाती वह भी तब तक
जब तक रहता जीवन उसमें
भारत की संस्कृति के प्रहरी हैं
नहीं कोई बदले की चाहत
बस देते ही जाना है
भले ही हो थोड़ा ही प्रकाश
धरती का ही वंशज हूँ
धन्य हमारी जाति है
हम अभिमानी और दानी
नहीं कोई हमारा है सानी
पांचों तत्व ही मुझमें रचते - बसते हैं
' वसुधैव कुटुम्बकम' की इस धरती का कण - कण भरा हुआ है मुझमें
छोटा- सा हूँ पर, जीने का उद्देश्य बड़ा है
मानव, दानव, पशु - पक्षी सब मिट्टी से ही बनते हैं
और उसमें ही मिट जाते हैं
समझाते जीवन दर्शन को
मिट्टी से बनते हैं और फिर मिट्टी में मिल जाते
ज्योत से ज्योत जलाता हूँ
छोटा - सा दीप हूँ, हांँ छोटा- सा दीप हूँ
पर अंधकार के बादल को भी चीर कर रख देती है
मेरी दुर्बल और चमकती लौ
दिखा देती है मेरे अस्तित्व का आईना
बिना डरे बिना झुके
राह दिखाता स्वाभिमान से
मैं छोटा - सा नन्हा दीप
आशा और उम्मीद की लौ किरणों को फैलाता
जीवन के संघर्षों से लड़ने की रीति सिखाता
आस्था और विश्वास की सीढ़ी पर चलते रहने की
ऊर्जा को प्रतिपल प्रज्वलित रखता
मैं छोटा - सा दीप हूँ
झिलमिल झिलमिल कर
सबके मन को भाता हूँ
तीज-त्यौहार बिना मेरे लगते सभी अधूरे से
देवों का मंदिर भी करता प्यार मुझे जी भरकर के
स्नेह और भाव के अर्घ्य चढा़ता हरदम
जगमग जगमग करता जगमग जगमग करता
मैं छोटा सा दीप मैं नन्हा - सा दीप
@वसुंधरा मिश्र, 9.10.22
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