Tuesday, October 25, 2022
कोरोना की परछाई में शिक्षा का बदलता स्वरूप (लेख)
कोरोना की परछाईं में शिक्षा का बदलता स्वरूप - - -
डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
आज हम जिस कोरोना महामारी से गुजर रहे हैं वह अपनी मंद गति की ओर है। फिर भी कुछ कहा नहीं जा सकता है न ही इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। सर्वेक्षण और व्यवहारिकता के अनुसार अब हमें कोरोना के साथ ही जीना है। कोरोना महामारी के डर से मनुष्य जाति के सभी कार्यों पर ताला लग गया था। वह प्रकृति की इस विभीषिका को कभी नहीं समझ पाएगा कि उसके साथ अब आगे क्या होगा। मनुष्य की सहनशक्ति और इच्छाशक्ति उसे बचाए रखने के लिए प्रेरित करती रहती है। यह मनुष्य जाति की प्राण शक्ति ही है जो उसे जीवन से जुड़ने के नए अवसर खोज देती है। इन दो वर्षों के दौरान बहुत से लोग कोरोना की चपेट में कालकवलित हो गए तथा सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में सब कुछ उलट-पलट हो गया , कुछ संभल गए कुछ संभलना सीख गए।कोरोना महामारी ने जीवन से जुड़े हर क्षेत्र को प्रभावित किया।
विश्व की बात करें तो मई 2021 तक, 26 देशों में स्कूल पूरी तरह से बंद थे और 55 देशों में स्कूल केवल आंशिक रूप से - या तो कुछ स्थानों में या केवल कुछ कक्षाओं के लिए - खुले थे।यूनेस्को के अनुसार, दुनिया भर में स्कूल जाने वाले करीब 90 फीसदी बच्चों की शिक्षा महामारी में बाधित हुई है। रूक्मिणी बनर्जी के कॉलम के अनुसार ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि विदेशों में लाखों छात्रों के लिए स्कूलों का बंद होना उनकी शिक्षा में अस्थायी व्यवधान भर नहीं, बल्कि अचानक से इसका अंत होगा। बच्चों ने काम करना शुरू कर दिया है, शादी कर ली है, माता-पिता बन गए हैं, शिक्षा से उनका मोहभंग हो गया है, यह मान लिया है वे फिर से पढ़ाई शुरू नहीं कर पाएंँगे या उम्र अधिक हो जाने के कारण अपने देश के कानूनों के तहत सुनिश्चित मुफ़्त या अनिवार्य शिक्षा से वंचित हो जाएँगे।
विभिन्न क्षेत्रों की तरह कोरोना महामारी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव डाला है।दो साल से चली आ रही महामारी से अभी पूरी तरह निजात मिलने की उम्मीद भी नहीं दिखायी दे रही है। गत वर्ष जिन छात्रों ने स्नातक कक्षाओं में प्रवेश लिया था, उन्हें कॉलेज कैंपस में पढ़ने का मौका नहीं मिला और अब वे दूसरे वर्ष के छात्र हो गये ।दो अकादमिक सत्रों से सामान्य कक्षाएँ नहीं चल पा रही थीं । शैक्षणिक संस्थानों के पास शिक्षण के अन्य विकल्प तलाशने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। इस दौर में तीन तरह के शिक्षण संस्थान उभरे हैं--
सर्वप्रथम जिन संस्थानों के पास डिजिटल ढाँचा था, उन्होंने कक्षाओं को ऑनलाइन माध्यम में बदल लिया। दूसरी श्रेणी में तकनीकी रूप से उभरते संस्थान हैं, जिन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन शिक्षण का एक मिश्रित स्वरूप बनाया है। तीसरी श्रेणी में ऐसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय आते हैं, जो तकनीकी रूप से बहुत पीछे हैं। इन संस्थाओं के नामांकित छात्र 'डिजिटल असमानता' के शिकार हैं।इसमें भी लड़कियांँ और महिलाएँ डिजिटल और जेंडर दोनों नजरिये से विषमता की शिकार हैं।स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक के शिक्षकों पर तकनीक के साथ सामंजस्य बिठाने का दबाव भी है।इस साल के अंत में भी हमारे सामने ओमिक्रॉन वैरिएंट के रूप में नयी चुनौती खड़ी हो गयी थी। संक्रमण की स्थिति कुछ भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि शिक्षण संस्थाएँ अब पहले जैसी नहीं रह जायेंगी।
देश में कोरोना की आमद 30 जनवरी 2020 में केरल में मिले एक मरीज से हुई थी और धीरे-धीरे 2020 के खत्म होते-होते कोरोना ने देश में तबाही के कई मंज़र दिखा दिए। इसका व्यापक असर, न केवल उद्योगों और व्यापार पर पड़ा, बल्कि इसका एक बड़ा असर स्कूलों पर, बच्चों की मानसिक स्थिति और उनकी मनोदशा पर भी पड़ा है। लगभग दो वर्ष से महामारी के कारण पूरे भारत के अधिकांश स्कूल बंद रहे हैं। बच्चे घरों में ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे । स्कूली छात्रों की सामान्य दिनचर्या, जिसमें केवल क्लासरूम में प्रत्यक्ष पढ़ाई ही नहीं शामिल होती है, बल्कि स्पोर्ट्स, हॉबी विकास, अन्य शिक्षणेतर गतिविधियाँ भी होती हैं, बाधित हो गयी थीं ।
अचानक हुए इस परिवर्तन ने सभी राज्यों, वर्गों, जाति, लिंग और सभी क्षेत्रों के बच्चों की एक बड़ी संख्या को प्रभावित किया है। बच्चे एक प्रकार के कैदखाने में कैद हो गए थे । विशेषकर उन घरों में जो एकल परिवार के थे और छोटे-छोटे फ्लैटों में पहले ही एक प्रकार के आइसोलेशन में जी रहे थे । संयुक्त परिवारों और बड़े घरों में तो थोड़ी बहुत, राहत है, पर एकल परिवार और कामकाजी दंपतियों के परिवार के बच्चों पर इस महामारी जन्य कैदखाने का बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है।ऐसी स्थिति में शिक्षा के क्षेत्र में
हाइब्रिड क्लास एक ऐसी ही व्यवस्था है जो ऑनलाइन सीखने के साथ आमने-सामने की बातचीत को जोड़ती है, जो ऑनलाइन और पारंपरिक दोनों तरह के सीखने के सर्वोत्तम अभ्यासों को जोड़ती है जो पूरक भी है और एक दूसरे को बल देते हैं। यह शिक्षार्थियों को दिनचर्या के आसपास काम करने की अनुमति देता है जो दोनों के लिए उपयुक्त है।
कोरोना काल में तकनीकी कंपनियों के लिए शिक्षा जगत में विशाल बाजार खुल गया है।दुनियाभर में कई कंपनियांँ शिक्षा को ऑनलाइन करने में लगी हुई हैं क्योंकि यह क्षेत्र लाखों-करोड़ों डॉलर के सालाना व्यापार की संभावना जगाता है। तकनीक के सहारे कंटेंट से लेकर एप बनानेवाली कंपनियांँ शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए अनुबंधित कर रही हैं।कई देशों में सरकारें भी शिक्षकों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण की व्यवस्था बना रही हैं। कुछ तकनीकी कंपनियांँ शिक्षकों की भूमिका को एक 'रिसोर्स मैनेजर' के तौर पर देख रही हैं, जो जरूरत के अनुसार बने-बनाये कंटेंट को बच्चों के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं।
दुनियाभर में जब अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता चाल से चल रही थी , तब शिक्षा में तकनीक (जूम, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि) वाली कंपनियों के शेयरों में बड़ी उछाल दर्ज हो रही थी। वर्तमान में जूम, गूगल क्लासरूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम जैसे एप अब शिक्षक के लिए उपयोग होनेवाले कंप्यूटर और मोबाइल के आवश्यक तत्व बन चुके हैं। ट्यूटोरियल के लिए यूट्यूब ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर ली है।महामारी का इतिहास यह संकेत देता है कि कोरोना का कहर साल दो साल में रुक जायेगा लेकिन कोरोना ने शिक्षा के स्वरूप में जो बदलाव किया है, वह आगे भी बना रहेगा।
बिना कंप्यूटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर वाले स्कूल के बच्चों के लिए चुनौतियाँ तो कम होती नहीं दिख रही हैं। जिन स्कूलों में अभी तक शिक्षकों और फर्नीचर की जरूरत पूरी नहीं हुई है, वहाँ के बच्चे 21वीं शताब्दी में शिक्षा के जरिये अपने लिए कैसा सुनहरा सपना बुनते हैं, यह शोध (और शायद क्षोभ!) का विषय होगा! जिन विश्वविद्यालयों में अभी हाइब्रिड मॉडल का अध्यापन भी शुरू नहीं हुआ, उनको आनेवाले दिनों में संसाधनों और छात्रों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
यूनिसेफ ने इस अध्ययन में, ऑनलाइन स्कूली शिक्षा की प्रभावशीलता को अपने अध्ययन का एक प्रमुख बिंदु रखा है।
यूनिसेफ के इस अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार, ‘माता-पिता और शिक्षक दोनों महसूस करते हैं कि छात्र स्कूलों की तुलना में दूरस्थ (ऑनलाइन अध्ययन के लिए, दूरस्थ शब्द का प्रयोग किया गया है) शिक्षा के माध्यम से कम सीखते हैं। 5 से 13 वर्ष की आयु के छात्रों के 76 प्रतिशत और 14 से 18 वर्ष की आयु के 80 प्रतिशत, किशोरों के बारे में इस अध्ययन की रिपोर्ट है कि छात्र स्कूलों में जितना सीखते हैं, उसकी तुलना में ऑनलाइन शिक्षा में वे कम सीख रहे हैं।
अध्ययन के अनुसार, 67 प्रतिशत शिक्षक यह मानते हैं कि यदि स्कूल खुले रहते तो जितना छात्र स्कूलों में जाकर पढ़ते सीखते हैं, उसकी तुलना में छात्र अपनी समग्र सीखने की क्षमता में पिछड़ रहे हैं, खासकर प्राथमिक स्कूलों के छात्र इसमें अधिक नुकसान में हैं।
स्कूल बंद होने के कारण छात्रों के सीखने की क्षमता में कमी के अतिरिक्त, स्कूल बंद होने के कारण, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर (Impact on mental health of students due to school closure) पड़ा है। जैसे-जैसे छात्र अपने घरों में, महामारी जन्य आइसोलेशन में कैद होते गए, वे अपने मित्रों और शिक्षकों से दूर होते गए। साथ ही महामारी में आने वाली बुरी खबरों का असर जो घर के बड़ों पर पड़ा, उनके तनाव से भी बच्चों और किशोरों के मन मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
माता-पिता की नौकरियों पर असर पड़ा, कुछ महामारी के ग्रास बन गए तो, इसका असर पड़ा और घर में लगातार महामारी जन्य नकारात्मकता ने बच्चों को मानसिक रूप से रुग्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। घर के जबरिया थोपे गए एकांत और हमउम्र मित्रों के अभाव के कारण उपजी संवादहीनता ने बच्चों के सीखने की क्षमता और स्वाभाविक जिज्ञासु भाव को बहुत अधिक प्रभावित किया है।
अध्ययन से यह पता चलता है कि, 5 से 13 वर्ष की आयु के एक तिहाई छात्रों और लगभग आधे किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर खराब असर या बहुत ही खराब असर पड़ा है।
अध्ययन के दौरान परिवारों से साक्षात्कार भी लिये गये। उनके अनुसार, सामाजिक अलगाव, सीखने में व्यवधान और परिवार की वित्तीय असुरक्षा खराब मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख कारण हैं।
हाल ही में, मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय ने एजुकेशन पॉलिसी में बदलाव किया है। यह बदलाव इसरो प्रमुख डॉक्टर के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में किया गया है।
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत स्कूलों तथा कॉलेजों में होने वाली शिक्षा की नीति तैयार की जाती है। भारत सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 का आरंभ किया है जिसके अंतर्गत सरकार ने एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे मुख्य बदलाव किए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। अब मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा। नेशनल एजुकेशन पालिसी के अंतर्गत 2030 तक स्कूली शिक्षा में शत प्रतिशत जी ई आर के साथ पूर्व विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय तक शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा (मेडिकल और कानून अध्ययन इसमें शामिल नहीं है ) पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई शिक्षा नीति के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न का अनुकरण किया जाएगा।
राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (एनईपी) केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जुलाई 2020 को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) शुरू करके स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली में परिवर्तनकारी सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में एमएचआरडी का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया ।
पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति जो 1986 में बहुत पहले शुरू की गई थी, उसके बाद यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है जिसने 34 साल पुरानी शिक्षा नीति को बदल दिया है । नया एनईपी चार स्तंभों पर आधारित है जो एक्सेस, इक्विटी, गुणवत्ता और जवाबदेही हैं।
इस नई नीति में, 5+3+3+4 संरचना होगी जिसमें 12 साल का स्कूल और 3 साल का आंँगनबाडी/पूर्व-विद्यालय पुराने 10+2 ढांँचे की जगह शामिल हैं।
कोरोना महामारी के बाद आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों आदि में दूरस्थ शिक्षा और कौशल उद्यम का प्रयोग विशेष रूप से स्थान लेते जा रहे हैं। ट्रांजिशन के दौरान शिक्षकों के लिए स्मार्ट क्लासरूम बनाये जा रहे हैं , जिनमें वीडियो बनाने, आवाज पहचानने और साथ ही अनुवाद करने की तकनीक को भी विकसित किया जा रहा है।
स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए नए कोर्स भी तैयार किए जा रहे हैं। यह सच है कि तकनीक के प्रभाव से शिक्षा का जो स्वरूप आज उभर रहा है, उसकी व्यापकता के साथ पीछे छूट जानेवाले बच्चे और संस्थान कहांँ जायेंगे, इसका रास्ता साफ नहीं दिख रहा है।यह एक गंभीर समस्या है।संकट शिक्षकों पर भी है और सरकारी शिक्षण संस्थानों पर भी। शिक्षा में बदलाव के लिए जरूरी है कि इसके दार्शनिक और वैचारिक आधार पर भी विचार किए जाएंँ । पिछले दशकों में शिक्षा में सुधार के जो प्रयोग हुए, उनसे हमने क्या सीखा है? शिक्षा में बदलाव के मौजूदा तरीके इस संक्रमण में कितने उपयोगी होंगे? आदि पर विचार विमर्श करने की भी आवश्यकता है।
लॉकडाउन का शिक्षा क्षेत्र पर काफी प्रभाव पड़ा है और इसके वास्तविक प्रभाव को आंकना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए उपलब्ध व्यापक आधिकारिक आंकड़े 2019-2020 से पहले के हैं। इन आंकड़ों से कोरोना पूर्व के रुझान का पता चलता है लेकिन यह नहीं पता चलता कि कोरोना की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों का इस रुझान पर क्या असर पड़ा।
वैसे तो कोरोना की वजह से देशभर में एहतियात के तौर पर स्कूल, कॉलेज और शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया गया था।
एएसईआर 2021 की रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूलों में दाखिला नहीं लेने वाले छह से 14 साल की आयुवर्ग के बच्चों की संख्या 2018 में 2.5 फीसदी की तुलना में 2021 में दोगुनी होकर 4.6 फीसदी हो गई।
इस सर्वे में यह भी पता चला कि लॉकडाउन की वजह से माता-पिता के वित्तीय संकट की वजह से बच्चों का निजी स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया गया और कई परिवार गांँव लौटने को मजबूर हुए।
10 में से लगभग छह ग्रामीण बच्चों को महामारी के दौरान किसी तरह की शिक्षण सामग्री नहीं मिली या वे किसी तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाए।
एएसईआर की रिपोर्ट में कहा गया कि डिजिटल विभाजन ने शिक्षा के पहुंँच की असमानता को बढ़ा दिया।
साथ ही स्मार्टफोन नहीं होने और इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़े मुद्दों की वजह से बड़ी संख्या में ग्रामीण बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से महरूम रहे।10 में से लगभग छह ग्रामीण बच्चों को महामारी के दौरान किसी तरह की शिक्षण सामग्री नहीं मिली या वे किसी तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाए।
सर्वेक्षण में कहा गया कि इन आकंड़ों की पुष्टि के लिए कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
भारत अभी तो नियंत्रण में है, कहीं उस ओर चला जाता तो इस महामारी से होने वाली तबाही को रोकना बेकाबू हो जाता ।
आज भी हम कोरोना वायरस के पंजों की गिरफ़्त में हैं जो अदृश्य रूप से मानवता को कुचलने में लगने लगी है। बड़े बड़े देशों में कोरोना वायरस ने खलबली मचा दी थी । क्या यह एकछत्र सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी का खतरनाक खेल तो नहीं? इस वायरस को कहीं से भेजा तो नहीं गया था ? और यदि ऐसा नहीं है तो पूरे विश्व में इस वायरस का प्रकोप कहीं अधिक और कहीं कम क्यों था ? साइबेरिया के पक्षियों की तरह क्या इस वायरस को स्थान विशेष के मार्ग का ज्ञान था? आधुनिक काल ने मनुष्य की अस्मिता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी। व्यक्ति महत्वकांक्षी और मैं यानि अहम् पर केन्द्रित होता चला गया। चरित्र, आदर्श और मूल्यों का स्खलन होता चला गया। हम मनुष्य के नैसर्गिक प्रकृति को भुलाने लगे और भारतीय संस्कृति और मूल्यों से खिलवाड़ करने लगे।
आज हम उत्तर आधुनिक युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्यता के नाम पर संवेदना को परोसे जाने का उत्पाद आरंभ होने लगा है।यह बाजारवाद का बहुत बड़ा सिद्धांत तो नहीं है? चाहे प्राकृतिक आपदा हो या राजनीतिक सत्ताधारियों की आपसी लड़ाई हो, आम आदमी आशंकाओं के बीच ही फंसे रहते हैं।वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटकने को बाध्य होते हैं। सरकार और मीडिया निष्पक्षता के साथ अपनी - अपनी भूमिकाएँ निभाते हुए उन्हें भी खबरदार रहना पड़ता है। भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। सरकार के पास आर्थिक मंदी नहीं थी लेकिन जब आम लोगों को आपदाओं से उबरने के लिए सहायता राशि देने का समय आता है तो सरकार देश के लोगों से ही वसूल करती है। यह लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाता दिखाई पड़ता है। समय पर आम जनता की छोटी-छोटी अनिवार्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का ईनाम लगता है। जनता को पिसना पड़ता है। वर्तमान समय में कोविद महामारी को संभालना भारी लगने लगा था । अचानक ऐसी अदृश्य आपदाओं का प्रकोप होने पर सरकार, प्रशासन और संबंधित विभाग अपने को व्यक्त करने का तरीका भी बदल देते हैं। जनता को उन्हीं की मानसिकता में संवेदना के औजारों द्वारा सेट किया जाता है। वही दिखाया जाता है जो वे देखना चाहते हैं। बिना किसी पूर्व सुरक्षा और सुविधाओं के घर बंद कर बहुत अच्छा कदम उठाया जिसकी सराहना तो पूरे विश्व में हो रही है। भारत भी उससे अपने तरीके से लड़ रहा है। यह महामारी तृतीय विश्व युद्ध के रूप में उभर कर आई है। इसके भयंकर परिणामों को भी जनता को ही झेलना पड़ेगा।
कोविद महामारी की गतिशीलता एक ऐसे योद्धा की चाल है जो दिखाई नहीं दे रही और अपना काम तमाम करती जा रही है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सरकार सभी अपनी बेबसी पर हैरान हैं। यह वायरस पूरी दुनिया के 190 से अधिक देशों को आक्रांत कर चुका है। जहाँ जहाँ गया वहाँ वहाँ उसने अपना संपर्क बनाया और लोगों को गुणात्मक संख्या में लपेटने लगा। कुछ खास लोगों तक गया फिर वहाँ से दूसरों तक चेन बनाता चला गया। जहाँ से शुरू हुआ वहाँ तो सामान्य जीवन भी शुरू हो गया था । लोगों में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चीन के प्रमुख शहरों में कोरोना वायरस का न फैलना कहीं कोई साजिश के तहत तो नहीं है। मानवता को अपनी मुट्ठी में रखने के स्वप्न को पूरा करने के लिए कहीं विश्व को ठगा तो नहीं जा रहा है? लोगों का मनुष्यता पर से ही विश्वास उठता जा रहा है। यह वायरस कहीं मानव संवेदना और संस्कृति पर प्रहार तो नहीं है? सत्ता हथियाने का दम वही देश भर सकता है जिसके पास ताकत और अर्थतंत्र मजबूत हो।प्रतिस्पर्द्धा में वही शक्ति विजयी होती है जो मानवता की सेवा में अपने को लगाती है क्योंकि मानवीय संवेदनाओं से ही सत्ता विजयी होती है अन्यथा उसका भी विनाश होता हैऔर उसकी जगह फिर कोई दूसरा नायक जन्म लेता है। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक पृष्ठ हैं जहाँ मानवता को कुचलकर अपना झंडा फहराया गया है। आधुनिक युग ने हमें जो दिया, उत्तर आधुनिकता हमसे छीन रही है। यह संकेत संकटों का है। हमारी संवेदना को खतरा है। मनुष्यता के नाम पर संवेदना का गला घोटा जा रहा है। मेरी पंक्तियाँ याद आ रही हैं - - संवेदनाओं को धागों में पिरोने के बीच /न जाने टूट जाती हैं कितनी ही कड़ियाँ /मैंने उसे पुचकारा /कोमल स्पर्श को फेरा /उसने हल्की- सी ली करवट /और फिर वह गया बदल - - - उसकी कुर्बानी को /भुनाने लगी रिश्तों में / मेरा शौक बढ़ता चला गया/ और मैं /अपने तानों - बानों को लगी इच्छानुसार मरोड़ने /खेलने लगी तंतुओं की नरमाई से (हर दिन नया(काव्य संग्रह) ,डॉ वसुंधरा मिश्र ताने-बाने, पृष्ठ 28-29)
अभी तो जीने की आशा है।विश्व के बड़े-बड़े देश कोरोना वायरस से जूझ रहे थे । कितने ही डॉक्टर और नर्स भी उसकी चपेट में आ गए थे । हजारों की संख्या में लोग मर रहे थे । इस भयावह स्थिति में हम घर में ही रहें तो अधिक सुरक्षित रह सकते हैं। कोरोना वायरस से बचने का रामबाण औषधि घर में रहना ही था । मानवता को बचाना है तो सुरक्षा से रहना जरूरी है ।
भारत की शिक्षा और संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम् " और "सर्वे भवंतु सुखिनम् " की रही है। पारंपरिक और देशीय पद्धति से जीवन यापन करने वाले भारतीयों में जब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बढ़ी उसके साथ - साथ धर्म-अर्थ - काम- मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की चिंतन पद्धतियों में भी परिवर्तन आता गया। प्रकृति से जुड़ा मनुष्य प्रकृति से दूरी बनाने में अपनी शान समझने लगा। मनुष्य की नैसर्गिक प्रकृति में विरोधी प्रदर्शन की होड़ को बढ़ावा मिलने लगा। मनुष्य ने अपनी एक अलग दुनिया बनाई जिसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय जैसे बड़े- बड़े मुद्दे हैं जिनको अपनी मर्जी से बनाने लगा। विज्ञान, प्रौद्योगिकी तकनीक और संचार क्रांति ने उसे अंतरिक्ष पर भी सत्तासीन करा दिया है।
5जी का उद्घाटन भारत सरकार द्वारा किया गया है जो विकास और उन्नति की विभिन्न संभावनाओं की तलाश करने में महत्वपूर्ण कदम उठाएगा।
देश की उन्नति वहाँ के लोगों की शिक्षा पर निर्भर करती है। शिक्षा की महत्ता प्रत्येक देशकाल एवं परिस्थितियों के लिये उतनी ही आवश्यक रही है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य, लक्ष्य आदि पर चर्चा होती रही है एवं सदैव उसके वास्तविक स्वरूप को खोजने का प्रयास किया जाता रहा है। हमारे भारत के ऋषि मुनियों ने ‘सा विद्या या विमुक्तये’ का ज्ञान देकर शिक्षा की महत्ता पर बल दिया था। वास्तविक शिक्षा वही होती है जो मुक्ति का मार्ग प्रदान करे। मुक्ति का अर्थ सामान्यतः संसार से पलायन के संदर्भ में लिया जाता है परंतु विद्या का जोर इस पलायन पर नहीं अपितु धर्म के साथ जीविका उपार्जन एवं धर्म युक्त कर्मों की महत्ता पर है।
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