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Tuesday, October 25, 2022

मेरी क्षणिकाएं

*समय के साथ भूल गए हैं लोग चाँद का दाग चंद्र किरणों से खेलना किसे नहीं अच्छा लगता *निंदा की आदतें अच्छी थीं अब प्रशंसा से भी पेट भरता नहीं *वो आज देर से लौटा था देवी के दर्शन से मन नहीं भरा *सडकों पर जगमगाहट थी गलियों में अंधेरा था *चले जाने का दुख न था कुछ भी नहीं कहा *ऊपर से दुख दिखाई नहीं देता भीतर उतरता रहता है *सुख की चाहत में उम्र रीत रही छोटी-छोटी बातों में जिंदगी उलझती गई *शब्दों से खेलते हैं लोग जब जुआ और चौपड़ भी फेल हैं तब आराधना में वाग्देवी बन समाज को नई दिशा देती है तब

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